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13 जुलाई :हमारा कर्ज चुका दिया गया है

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13 जुलाई :हमारा कर्ज चुका दिया गया है
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“उसने तुम्हें भी, जो अपने अपराधों और अपने शरीर की खतनारहित दशा में मुर्दा थे, उसके साथ जिलाया, और हमारे सब अपराधों को क्षमा किया, और विधियों का वह लेख जो हमारे नाम पर और हमारे विरोध में था मिटा डाला, और उसे क्रूस पर कीलों से जड़कर सामने से हटा दिया है।” कुलुस्सियों 2:13-14

क्यों ऐसा हुआ कि यीशु मसीह पृथ्वी पर आया, क्रूस पर मरा और मृतकों में से जीवित हुआ? ताकि विश्वास करने वालों के लिए शाश्वत मोक्ष दिया जा सके और उन्हें परमेश्वर के परिवार में गोद लेने का प्रबन्ध किया जा सके। यह ऐसी वास्तविकता है, जिसका कोई और धर्म दावा नहीं कर सकता: परमेश्वर ने स्वयं मनुष्य के पाप का कर्ज़ चुकाया ताकि हम उसकी सन्तान कहला सकें। गीतकार इस भुगतान के अद्‌भुत पहलू को इस प्रकार व्यक्त करता है:

ओ परिपूर्ण मोक्ष, रक्त से खरीदा गया!

प्रत्येक विश्वासी के लिए परमेश्वर की प्रतिज्ञा;

सबसे बुरा अपराधी जो सच्चे दिल से विश्वास करता है,

उसी क्षण वह यीशु से माफी प्राप्त करता है। [1]

मसीह के मोक्ष के साथ हमारी मुलाकात वैसी ही है, जैसे “वृद्ध महिला बैट्टी” की कहानी, जो भारी वित्तीय कर्ज़ के कारण गरीबी में जी रही थी। एक दिन, एक मसीही सेवक और उसकी मण्डली ने बैट्टी के जीवन में हस्तक्षेप करने का निर्णय लिया और उसका कर्ज़ चुका दिया। वह सेवक बैट्टी के घर गया और उसके दरवाजे पर खटखटाता रहा—लेकिन गिरफ्तारी के डर से उसने पहले कुछ बार दरवाजे की दस्तक को नजरअंदाज कर दिया। जब वह अन्ततः उसे यह खुशखबरी बता पाया, तो बैट्टी ने उसे देखा और कहा, “जरा सोचिए: मैंने आपके लिए दरवाजा बन्द कर दिया था। मैं डर के मारे आपको अन्दर नहीं आने दे रही थी, और देखिए, आप इतना अच्छा उपहार लेकर आए हैं।”

कभी न कभी, हम सभी इस वृद्ध बैट्टी जैसे रहे हैं। एक समय हम जानते थे कि हम पाप के कर्ज़ में थे। हम पछतावे से दबे हुए थे, हम डरते थे कि लोग हमारे दरवाजे पर दस्तक देंगे और हमारी समस्याओं को दूसरों के सामने खोलकर रख देंगे। सबसे अधिक, हम परमेश्वर से डरते थे, क्योंकि उसके हाथ की दस्तक केवल न्याय का संकेत प्रतीत होती थी। लेकिन फिर हमें यह पता चला कि मसीह में परमेश्वर हमारे जीवन के दरवाजे पर दस्तक देता है ताकि हमें वह न दे जो हमें हमारे कर्ज़ के कारण मिलना चाहिए, बल्कि वह दे जो उसके प्रेम ने जीत लिया है: एक ताज़ा आरम्भ, एक कोरा कागज, एक नई कहानी। हमारा कर्ज़ माफ कर दिया गया, और हमने खुशी से अपने जीवन के दरवाजे को खोला और हमारे उद्धारकर्ता, मित्र, और प्रभु के रूप में उसका स्वागत किया।

एक मसीही होने का अर्थ है भुगतान किए जा चुके कर्ज़ के एहसास में जीना। अब हम पाप और उसके दण्ड के दास नहीं रहे; इसके बजाय हम स्वतन्त्र किए गए हैं और परमेश्वर की सन्तान के रूप में गोद लिए गए हैं। और अब, परमेश्वर के पुत्र और पुत्री के रूप में गोद लिए जाने के कारण ही हमें यह महान विशेषाधिकार प्राप्त हुआ है कि हम परमेश्वर को हमारे स्वर्गिक पिता के रूप में पुकार सकते हैं और उसे इतना नजदीकी रूप से जान सकते हैं। अब हम अपने कर्ज़ को थामे हुए अपने दरवाजे के पीछे नहीं छिपते, क्योंकि हमने उस स्वतन्त्रता का स्वाद चखा है, जो दस्तक देकर आई और हमने उसे अपने जीवन में स्वीकार किया।

यह जानने से हमें कितनी अद्‌भुत शान्ति मिलती है कि हमारा कर्ज़ माफ कर दिया गया! यह जानने से हमें कितना अद्‌भुत आनन्द मिलता है कि हमारे जीवित परमेश्वर के सामने हमारी स्थिति चिन्तित कर्ज़दारों से बदलकर गोद लिए गए पुत्रों और पुत्रियों की हो गई है। अब प्रश्न यह है: ये सत्य आपके स्वयं को देखने के दृष्टिकोण को और आज आपके सामने रखे कार्य को देखने के दृष्टिकोण को कैसे बदलेंगे?

  गलातियों 4:21 – 5:1

पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: भजन 7–9; प्रेरितों 10:1-23 ◊


[1] फैनी क्रोस्बी, “टू गॉड बी द ग्लोरी” (1875).

12 जुलाई : धन्यवाद देने का बुलावा

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12 जुलाई : धन्यवाद देने का बुलावा
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“हे सारी पृथ्वी के लोगो, यहोवा का जयजयकार करो! . . . उसके फाटकों से धन्यवाद, और उसके आँगनों में स्तुति करते हुए प्रवेश करो!” भजन 100:1, 4

सौवाँ भजन, जिसमें आराधना का बुलावा दिया गया है, भजन संहिता की पुस्तक का बहुत प्रसिद्ध भजन है। लेकिन इससे इतना अधिक परिचित होने के कारण हो सकता है कि हम इसे बहुत हल्के में लेने लग जाएँ। विभिन्न कारणों की वजह से ऐसे अंशों का अध्ययन करना आसान होता है, जिससे हम कम परिचित होते हैं, क्योंकि तब हम अध्ययन में आलसी नहीं होते। हम यह मानने की गलती नहीं करते कि हम उसे पहले से ही जानते हैं।

हमें कभी भी धन्यवाद के बुलावे को इतना हल्के में नहीं लेना चाहिए कि हम इसे केवल एक आम बात समझ कर अनदेखा कर दें। यह भजन हमें कुछ करने के लिए प्रेरित करता है! परमेश्वर के लोग होने के नाते हमें आनन्द से भरी आराधना और धन्यवाद से भरी स्तुति करने के लिए बुलाया गया है।

“जयजयकार करो” का अर्थ ऊर्जावान और आनन्द से भरी आराधना का बुलावा है। ऐसी स्तुति को किसी मजबूरी के रूप में नहीं लिया जाना चाहिए, मानो हमने कुछ अप्रिय चीज खा ली हो। इसके बजाय, यह हमारे जीवन में परमेश्वर के काम का प्रत्युत्तर होना चाहिए। सी. एस. लुईस इस बारे में इस प्रकार कहते हैं कि हम “आनन्द से चौंक” जाएँ। आराधना का अवसर सच्चे विश्वासियों की आत्मा को उन्नत करता है—और कोई भी इस प्रोत्साहन से बाहर नहीं है। परमेश्वर ने “सारी पृथ्वी” को अपनी महिमा के लिए बनाया है।

यह बुलावा हमें “उसके आँगनों में स्तुति करते हुए प्रवेश” करने का आमन्त्रण भी देता है। लंदन में बकिंघम पैलेस के बाहर एक सामान्य व्यक्ति के अनुभव पर विचार करें, जहाँ आप बस अपनी नाक उसके बाड़ में घुसाकर दूर से शाही परिवार की एक झलक पाने की उम्मीद करते हैं। फाटकों को जानबूझकर बन्द किया गया है ताकि शाही परिवार की सुरक्षा सुनिश्चित की जा सके। लेकिन हमारे परमेश्वर पिता के साथ हमारा अनुभव ऐसा नहीं है। यीशु की मृत्यु ने मन्दिर के परदे को दो टुकड़ों में फाड़ दिया (मत्ती 27:51) और हमारे लिए जीने का एक नया रास्ता खोला। यीशु के द्वारा हमें पिता तक पहुँच प्राप्त हुई है और फाटक अब स्वागत के लिए खुले पड़े हैं।

हमारी आनन्द से भरी आराधना और धन्यवाद से भरी स्तुति हमारे हालात या भावनाओं से जुड़ी नहीं होनी चाहिए। धन्यवाद की असली नींव यह ज्ञान है कि हमारा प्रभु ही परमेश्वर है और उसने हमें अपने आँगन में आमन्त्रित किया है, ताकि हम उसके सिंहासन के चारों ओर उसकी प्रजा के तौर पर और साथ ही उसकी सन्तान के तौर पर भी खड़े हो सकें। इसे पहचानने का अर्थ यह है कि हम एक दृढ़ आधार पर खड़े हैं ताकि हम सभी भजनकार के साथ कह सकें:

उसने मुझे सत्यानाश के गड़हे

और दलदल की कीच में से उबारा,

और मुझ को चट्टान पर खड़ा करके मेरे पैरों को दृढ़ किया है।

उसने मुझे एक नया गीत सिखाया

जो हमारे परमेश्‍वर की स्तुति का है।” (भजन 40:2-3)

एक दिन आप उसके आँगनों में खड़े होंगे। तब तक प्रत्येक रविवार आप अपनी स्थानीय कलीसिया में—जो उस स्वर्गिक सिंहासन कक्ष का दूतावास है—खड़े हो सकते हैं और भविष्य के उस दिन की प्रत्याशा में प्रभु के लिए आनन्द से गा सकते हैं।

भजन 100

◊ पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: भजन 4– 6; प्रेरितों 9:23-43

12 July : विश्वास आमचे दोष, लोभ, आणि भिती दूर घालवितो

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12 July : विश्वास आमचे दोष, लोभ, आणि भिती दूर घालवितो
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ताकींद देण्याचा हेतू हा आहे कीं, शुद्ध अंतःकरणात, चांगल्या विवेकभावात व निष्कपट विश्वासात उद्भवणारी प्रीति व्यक्त व्हावी. (1 तीमथ्य 1:5)

येथें पौलाचा मुख्य हेतू प्रीतिवर जोर देणें आहे. आणि या थोर गाभाऱ्यातून स्वाभाविकपणें उद्भवणाऱ्या गोष्टींपैकीं एक आहे निष्कपट विश्वास. नक्कीच प्रीति ही विश्वासातून उद्भवते याचे कारण हे आहे कीं देवाच्या कृपेवरील विश्वास प्रीतिस अडखळण आणणाऱ्या पापी शक्तींस आमच्या अंतःकरणातून दूर करतो.

जर आम्हांला दोषी असल्यासारखे वाटत असेल, तर आमचा कल आत्मकेंद्रित नैराश्य आणि स्वतःवर कींव वाटणाऱ्या भावनेंत लोळत पडून राहण्याकडें असतो, इतरांच्या गरजांकडें पाहणें किंवा त्यांची काळजी करणें तर दूर राहिले. किंवा आपण आपला दोष लपविण्यासाठीं ढोंग करीत बसतो, आणि म्हणून नात्यांमधील सर्व खरेपणा नष्ट करून बसतो, ज्यामुळें खरे प्रेम अशक्य होते. किंवा आपण आपला स्वतःचा दोष कमी दाखविण्यासाठीं इतर लोकांच्या चुकांबद्दल बोलतो, म्हणजें असे काहीं जी प्रीति कधी करीत नाहीं. म्हणून, जर आम्हीं प्रीति करणार असू, तर आम्हांला दोषाच्या विनाशकारक प्रभावांवर मात करावी लागेल.

भितीचेही असेच आहे. जर आम्हांला भिती वाटत असेल, तर मंडळीत आलेंल्या अनोळखी व्यक्तीजवळ आम्हीं जाणार नाहीं ज्याला कदाचित स्वागत आणि प्रोत्साहनाच्या शब्दाची गरज असू शकते. किंवा पाचारण म्हणून आम्हीं सरहद्दीवरील मिशनचा नाकार करू शकतो, ते फार जोखिमेचे काम वाटते. किंवा आपण अतिरिक्त विम्यासाठीं पैसे वाया घालवत असू, आणि सर्व प्रकारच्या लहान-सहान भयगंडाने घाबरत असू, इतके कीं आम्हीं स्वतःमध्यें गुरफटलेले राहतो आणि इतरांच्या गरजा आम्हांला दिसू शकत नाहींत. या सर्व गोष्टी प्रीतिच्या विपरीत आहेत.

लोभाच्या बाबतीतही हेच खरे आहे. जर आम्हीं लोभी असू, तर आम्हीं चैनविलासावर पैसे खर्च करीत राहणार – तो पैसा जो सुवार्ता प्रसारासाठीं गेला पाहिजे. आम्हीं कुठलाही धोका पत्करत नाहीं, आमची मूल्यवान संपत्ति आणि आर्थिक भविष्य धोक्यात येईल अशी भिती आम्हांला वाटते. आम्हीं लोकांऐवजी ऐहिक वस्तूंवर लक्ष केंद्रिंत करतो, आणि लोकांकडें आमच्या भौतिक लाभासाठीं संसाधने म्हणून पाहतो. यामुळें प्रीतिचा नाश होतो.

पण भविष्यातील कृपेवरील विश्वास दोष आणि भिती आणि लोभ यांस अंतःकरणातून दूर सारून प्रीति उत्पन्न करतो.

विश्वास दोष दूर करतो कारण तो त्या आशेस दृढ धरून ठेवतो कीं ख्रिस्ताचा मृत्यू आता आणि सर्वकाळासाठीं निर्दोषमुक्तता आणि नीतिमत्व प्राप्त करण्यासाठीं पुरेसा आहे (इब्री 10:14).

विश्वास भय घालवून टाकतो कारण तो या अभिवचनावर अवलंबून राहतो, “तू भिऊ नकोस, कारण मी तुझ्याबरोबर आहे,………..मी तुला शक्ती देतो, मी तुझे साहाय्यही करतो, मी आपल्या नीतिमत्तेच्या उजव्या हाताने तुला सावरतो” (यशया 41:10).

आणि विश्वास लोभ दूर घालवून टाकतो कारण त्याला ही खात्री असते कीं ख्रिस्त हा त्या सर्व संपत्तीपेक्षा जी हे संपूर्ण जग देऊ करते, मोठा आहे (मत्तय 13:44).

म्हणून जेव्हा पौल म्हणतो, “ताकींद देण्याचा हेतू हा आहे कीं… निष्कपट विश्वासात उद्भवणारी प्रीति व्यक्त व्हावी”, तेव्हा तो प्रीतिस अडखळण आणणाऱ्या सर्व अडखळणांवर मात करणाऱ्या विश्वासाच्या प्रचंड सामर्थ्याविषयी बोलत आहे. जेव्हा आम्हीं विश्वासाचे युद्ध करतो – दोष आणि भिती आणि लोभास मारणाऱ्या देवाच्या अभिवचनांवर विश्वास करण्यासाठींचा लढा – तेव्हा आपण प्रीतिसाठीं लढा देत असतो.

11 जुलाई : मसीही परिपक्वता

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11 जुलाई : मसीही परिपक्वता
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“यह मतलब नहीं कि मैं पा चुका हूँ, या सिद्ध हो चुका हूँ; पर उस पदार्थ को पकड़ने के लिए दौड़ा चला जाता हूँ, जिसके लिए मसीह यीशु ने मुझे पकड़ा था। . . . निशाने की ओर दौड़ा चला जाता हूँ, ताकि वह इनाम पाऊँ जिसके लिए परमेश्‍वर ने मुझे मसीह यीशु में ऊपर बुलाया है। हम में से जितने सिद्ध हैं, यही विचार रखें, और यदि किसी बात में तुम्हारा और ही विचार हो तो परमेश्‍वर उसे भी तुम पर प्रगट कर देगा।” फिलिप्पियों 3:12, 14-15

छोटे बच्चों की कुछ बातें इतनी प्यारी होती हैं, जब वे बड़ी-बड़ी कल्पनाओं में खो जाते हैं और अवास्तविक दावे करते हैं। ये दावे उनके माता-पिता के बारे में हो सकते हैं—“मेरे पापा ये कर सकते हैं” या “मेरी मम्मी इसमें बहुत अच्छी हैं”—या फिर ये दावे उनके खुद के बारे में हो सकते हैं। लेकिन ये दावे तब उतने प्यारे नहीं लगते जब ये किसी 25 या 50 साल की उम्र के व्यक्ति की ओर से आते हैं! उस समय किसी को यह कहने की जरूरत होती है, “खुदा का वास्ता है, अपनी उम्र के हिसाब से चलो!”

जैसा कि हम उम्मीद करते हैं कि उम्र के बीतने के साथ-साथ लोगों में परिपक्वता आनी चाहिए और जैसा कि हम जानते हैं कि शारीरिक, भावनात्मक, और मानसिक क्षेत्रों में परिपक्वता के कुछ चिह्न होते हैं, वैसे ही हमें आध्यात्मिक जीवन के क्षेत्र में भी परिपक्वता की उम्मीद करनी चाहिए। और यदि हम वास्तव में परिपक्वता में बढ़ रहे हैं, तो पौलुस के अनुसार हमारे जीवन में और हमारे परमेश्वर के साथ चलने में कुछ विशेष गुण दिखाई देंगे।

हमारे समाज का अधिकांश हिस्सा हमें यह जानने के लिए लगातार प्रेरित करता है कि हम क्या हैं, हमने क्या हासिल किया है, या हम कितनी दूर आ गए हैं। इसके विपरीत, मसीही परिपक्वता का आरम्भ इस बात से होती है कि हम क्या नहीं हैं। जहाँ अपरिपक्वता हमें खुद को अपनी योग्यता से अधिक ऊँचा समझने की ओर ले जाती है (रोमियों 12:3 देखें), वहीं परिपक्वता आवश्यकता से अधिक ऊँचे दावों को अस्वीकार करती है। बल्कि यह हमारी आध्यात्मिक प्रगति का एक वास्तविक अनुमान लगाती है। यह ऊँचे-ऊँचे शब्दों से नहीं, बल्कि एक विनम्र और स्थिर निरन्तरता वाले जीवन से प्रकट होती है।

“कछुए और खरगोश” की पुरानी कहानी में, खरगोश दौड़ की आरम्भ में तेज़ी से भागता है, जबकि कछुआ धीरे-धीरे चलता है। खरगोश इस आत्म-विश्वास से इतना अधिक भरा होता है कि वह दौड़ जीत चुका है कि वह रुकने, विश्राम करने और सोने का निर्णय लेता है। और जैसे ही वह खरगोश, जो इतना नाटकीय रूप से दौड़ आरम्भ करता है, सो जाता है, वह छोटा कछुआ उसी गति से—धीरे, धीरे, धीरे—आता है, और अन्त में वह विजेता बनता है और खरगोश कहीं दिखाई भी नहीं देता।

आध्यात्मिक खरगोशों से घिरे रहना एक बड़ी चुनौती हो सकती है, जो हमेशा कूदते-फांदते रहते हैं, अपनी बड़ी आकांक्षाओं की घोषणा करते हैं और यह बताते हैं कि वे कहाँ जा रहे हैं, क्या कर रहे हैं, और क्या हासिल कर रहे हैं। मुझे यह बहुत निराशाजनक लगता है कि मैं तो बस मसीही जीवन में बने रहने की कोशिश करता रहता हूँ!

एक बुद्धिमान पादरी के रूप में, पौलुस खरगोश बनने की कोशिश नहीं करता। इसके बजाय, वह हमें प्रेरित करते हुए कहता है, मैं चाहता हूँ कि आप जानें कि मैं एक यात्री हूँ। मैं चाहता हूँ कि आप जानें कि मैं अभी भी प्रक्रिया में हूँ, अभी भी यात्रा में हूँ—कि मुझे अभी बहुत दूर जाना है। पौलुस समापन रेखा की ओर बढ़ रहा है, और वह हमें भी यही करने के लिए प्रेरित कर रहा है। एक चमकदार आरम्भ या प्रभावशाली गति के बारे में घमण्ड करने के बजाय, उसके शब्द हमें बुनियादी बातों में दृढ़ होने और अपने संकल्प को याद रखने का बुलावा देते हैं।

विनम्रता और निरन्तरता: ये दोनों मसीही जीवन की परिपक्वता के लक्षण हैं, जो जानते हैं कि वे अनुग्रह के द्वारा ही यहाँ तक पहुँचे हैं, और अनुग्रह के द्वारा ही वे घर तक पहुँचने के लिए आगे बढ़ेंगे। ये परिपक्वता के लक्षण आपके जीवन में कैसे बढ़ेंगे?

1 पतरस 1:22 – 2:6

पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: भजन 1–3; प्रेरितों 9:1-22 ◊

11July : आपण विश्वासाने आत्म्याचा अनुभव घेतो

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11July : आपण विश्वासाने आत्म्याचा अनुभव घेतो
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जो तुम्हांला आत्मा पुरवतो व तुमच्यामध्यें अद्भुते करतो, तो नियमशास्त्रातील कृत्यांनी करतो कीं विश्वासपूर्वक ऐकण्याकडून? (गलती 3:5)

प्रत्येक ख्रिस्ती व्यक्तीमध्यें पवित्र आत्मा वस्ती करून राहतो. प्रेषित पौल म्हणतो, “जर कोणाला ख्रिस्ताचा आत्मा प्राप्त झालेंला नसेल तर तो ख्रिस्ताचा नाहीं” (रोम 8:9). आत्मा तुमच्याकडें पहिल्यांदा तेव्हा आला जेव्हा तुम्हीं रक्ताने विकत घेतलेल्या परमेश्वराच्या अभिवचनांवर विश्वास ठेवला. आणि आत्मा याच माध्यमाद्वारे येत राहतो आणि कार्य करत राहतो.

म्हणून पौल गलती 3:5 मध्यें अलंकारिक शब्दांत असे विचारतो, “जो तुम्हांला आत्मा पुरवतो व तुमच्यामध्यें अद्भुते करतो, तो नियमशास्त्रातील कृत्यांनी करतो कीं विश्वासपूर्वक ऐकण्याकडून?“ उत्तर आहे: “विश्वासपूर्वक ऐकण्याकडून.”

तर अशाप्रकारे, आत्मा पहिल्यांदा आला, आणि विश्वासपूर्वक ऐकण्याकडून आत्म्याचा पुरवठा होत राहतो. जे काहीं तो आमच्यामध्यें आणि आमच्याद्वारे साध्य करतो ते सर्व तो विश्वासाद्वारे करतो.

जर तुम्हीं माझ्यासारखे असाल, तर तुमच्या जीवनात पवित्र आत्म्याने सामर्थ्याने कार्य करावें अशी प्रबळ उत्कंठा  तुम्हांला वेळोवेळी होत असेलच. कदाचित तुम्हीं तुमच्या जीवनात अथवा तुमच्या कुटुंबात किंवा मंडळीत किंवा शहरात देवाच्या आत्म्याच्या वर्षावासाठीं त्याचा धावा करत असाल. अशाप्रकारचा धावा अथवा आक्रोश योग्य आणि चांगला आहे. येशूनें म्हटले, “तर मग स्वर्गीय पित्याजवळ जे मागतांत त्यांना तो किती विशेषेकरून पवित्र आत्मा देईल?” (लूक 11:13).

पण देवाच्या विशिष्ट अभिवचनांवर विश्वास करण्याद्वारे विपुलतेने आत्म्याच्या कार्यासाठीं स्वतःस तयार करण्यात मी विफल आहे हे मला माझ्या स्वतःच्या जीवनात बरेचदा आढळून आलें आहे. माझ्या बोलण्याचा अर्थ केवळ हे अभिवचन नाहीं कीं आम्हीं मागितल्यावर आत्मा येईल. माझ्या बोलण्याचा अर्थ त्यां सर्व इतर मौल्यवान अभिवचनांकडें संकेत करणें आहे जी प्रत्यक्ष आत्म्याबद्दल नाहींत, पण कदाचित माझ्या भविष्यासाठीं देवाच्या तरतूदीविषयी आहेत – उदाहरणार्थ, “माझा देव तुमची सर्व गरज पुरवील” (फिलिप्पै 4:19). विशिष्ट परिस्थितींसाठीं विशिष्ट अभिवचनांवरील विश्वासाच्या विशिष्ट कृतींद्वारे देवाचा आत्मा सतत आणि सामर्थ्यवान मार्गाने पुरविला जातो. त्यानें जे करण्याचे अभिवचन दिलें आहे ते करण्यासाठीं मी आत्ताच ह्या क्षणी त्याच्यावर विश्वास ठेवतो का?

कित्येक ख्रिस्ती लोकांच्या जीवनात आत्म्याच्या सामर्थ्याचा शोध घेत असतांना त्यांच्या अनुभवांत उणीव याच गोष्टीची असते. “विश्वासपूर्वक ऐकण्याकडून” (गलती 3:5) आत्मा आम्हांला पुरवला जातो – स्वतः आत्माविषयीच्या फक्त एक दोन अभिवचनांवरील विश्वासाद्वारे नाहीं, तर आम्हास ज्या गोष्टीची गरज आहे ती करण्यासाठीं, आणि ती आमच्यासाठीं घडून यावी म्हणून आमच्या भविष्यातील देवाच्या आत्म्याचे समाधान देणारे देवाचे सान्निध्य या सर्व अभिवचनांवरील विश्वासाद्वारे.

10 जुलाई : मृत्यु का डंक निकाल दिया गया है

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10 जुलाई : मृत्यु का डंक निकाल दिया गया है
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“‘हे मृत्यु, तेरी जय कहाँ रही? हे मृत्यु, तेरा डंक कहाँ रहा?’ मृत्यु का डंक पाप है, और पाप का बल व्यवस्था है। परन्तु परमेश्‍वर का धन्यवाद हो, जो हमारे प्रभु यीशु मसीह के द्वारा हमें जयवन्त करता है।” 1 कुरिन्थियों 15:55-57

हाल की पीढ़ियाँ मृत्यु की वास्तविकता का सामना करने से व्यापक रूप से इनकार कर रही हैं, और शायद हमारे समय की पीढ़ी ने इसे अधिक नकारा है। लोग इसे लगातार छिपाने या इसकी मौजूदगी को नकारने की कोशिश करते हैं, यह उम्मीद करते हुए कि शायद यह नहीं आएगी। लेकिन मसीहियों को अन्य लोगों से अधिक तैयार रहना चाहिए कि वे मृत्यु का सामना पूरे साहस से करें और यह स्वीकार करें कि इसे नकारा नहीं जा सकता और इससे बचने का कोई तरीका नहीं है—लेकिन यह भी स्वीकार करें कि अब इसे डरने की कोई जरूरत नहीं है, क्योंकि इसे पराजित कर दिया गया है।

वास्तव में, मसीहत प्रत्येक क्षेत्र में हमारे दृष्टिकोण को बदल देती है। बाइबल हमें यह वास्तविकता दिखाती है कि जीवन संक्षिप्त है, मृत्यु निश्चित है, और न्याय आ रहा है। लेकिन हमें पवित्रशास्त्र में स्पष्ट, अद्‌भुत, और मार्गदर्शन करने वाली बातें भी मिलती हैं, जो यह बताती हैं कि मृत्यु के प्रति विश्वासियों का दृष्टिकोण कैसा होना चाहिए।

मसीहियों के लिए, मृत्यु का डंक निकाल दिया गया है। इसे इस तरह से समझें: यदि आप कभी अपने छोटे बच्चे के साथ बाहर गए हों और एक गुस्सैल ततैया उसके पास आ जाए, तो आप जानबूझकर बच्चे और ततैया के बीच आकर डंक को खुद पर “निकाल” लेंगे। ऐसा होने के बाद बच्चे को अब डरने की कोई जरूरत नहीं है। ठीक इसी तरह, यीशु ने क्रूस पर अपनी मृत्यु के कार्य के माध्यम से हमारे पाप की सजा का सामना किया है। उसने हमारे जीवन में पाप की शक्ति को बन्धन को तोड़ दिया है। उसने पाप और मृत्यु के डंक को निकाल दिया है। मसीह की विजय हमारी विजय है; मृत्यु को पराजित कर दिया गया है। हम अभी भी मृत्यु का सामना करेंगे, लेकिन हम इससे पार हो जाएँगे। यह हमें अपना शिकार नहीं बना पाएगी।

पवित्रशास्त्र में मसीहियों की मृत्यु की तुलना नींद से की गई है, क्योंकि नींद एक अस्थाई स्थिति है, स्थाई नहीं। और इसका वर्णन हमारे शरीरों के सम्बन्ध में किया गया है, हमारी आत्माओं के सम्बन्ध में नहीं। थिस्सलुनीकियों को लिखी अपनी एक पत्री में पौलुस कहता है, “यदि हम विश्‍वास करते हैं कि यीशु मरा और जी भी उठा, तो वैसे ही परमेश्‍वर उन्हें भी जो यीशु में सो गए हैं, उसी के साथ ले आएगा” (1 थिस्सलुनीकियों 4:14)। दूसरे शब्दों में, हम यीशु से वही कह सकते हैं जो छोटे बच्चे सोने से पहले अक्सर अपने माता-पिता से कहते हैं: “क्या आप मेरे साथ रहेंगे जब मैं सो जाऊँगा?” और यीशु कहता है, हाँ, मैं रहूँगा। लेकिन उससे भी बेहतर, मैं उस नींद में भी तुम्हारे साथ रहूँगा। यीशु में सोने का—अर्थात विश्वासियों की मृत्यु होने का—मतलब है कि हमें तुरन्त ही उसकी उपस्थिति में, प्रभु की महिमा के आनन्द में प्रवेश मिल जाता है।

यीशु जीवित है, और हर नया दिन हमें उसके पुनरुत्थान की याद दिला सकता है। हर सुबह, हम एक नए सूर्योदय के लिए जागते हैं, जो उस महान दिन की याद दिलाता है जब तुरही बजेगी, मसीह में मरे हुए पहले जी उठेंगे, और जो लोग जीवित रहेंगे और पृथ्वी पर होंगे, वे उनके साथ एकत्रित हो जाएँगे। विश्वासियों के रूप में हमें नया जन्म मिला है, एक जीवित आशा के साथ कि क्योंकि यीशु मसीह कब्र पर विजय प्राप्त कर चुका है, इसलिए हम भी हमेशा के लिए उसके साथ होंगे। मृत्यु के प्रति हमारा दृष्टिकोण यही होना चाहिए: हम इसके पार  देखते हैं। और जब हम डर के बिना मरने में सक्षम हो जाते हैं, तो हम डर के बिना जीने में भी सक्षम हो जाते हैं।

प्रकाशितवाक्य 3:7-13

◊ पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: रूत; प्रेरितों 8:26-40

10 July : अभिमानास्पद कर्म विरुद्ध विनम्र विश्वास

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10 July : अभिमानास्पद कर्म विरुद्ध विनम्र विश्वास
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त्या दिवशी पुष्कळ जण मला म्हणतील, ‘प्रभो, प्रभो, आम्हीं तुझ्या नावाने संदेश दिला, तुझ्या नावाने भुते घालवली व तुझ्या नावाने पुष्कळ महत्कृत्ये केलीं नाहींत काय?’ (मत्तय 7:22)

“विश्वासा” मागची मानसिकता आणि “कर्माच्या” मागची मानसिकता यातील फरक विचारात घ्या.

स्वतःच्या बळावर एखादी गोष्ट साध्य केलीं या गर्वाच्या भावनेने कर्माच्या मानसिकतेंचे समाधान प्राप्त होते. तो उभ्या खडकावर चढण्याचा प्रयत्न करेल, किंवा कामाच्या ठिकाणी अतिरिक्त जबाबदाऱ्या हाती घेईल, किंवा युद्ध क्षेत्रात जीव धोक्यात घालेल, किंवा मॅरेथॉनमध्यें वेदना सहन करील, किंवा कित्येक आठवडे धार्मिक प्रवृत्तीने उपवास करेल – सर्व काहीं स्वतःच्या इच्छेच्या बळाने आणि स्वतःच्या शरीराच्या जोमाने समोर असलेले आव्हान जिंकण्याच्या समाधानासाठीं.

कर्म-केंद्रित मानसिकता विकोपाला जाऊ शकते आणि दुसऱ्याला श्रेय देणें, आत्म्याचा दीनपणा व नैतिकता याविरुद्ध बंड करून स्वतःच्या स्वातंत्र्याविषयीची आणि ‘मीच माझा मार्गदर्शक’ याविषयी आणि स्वतःच्या कामगिरीविषयी आपली प्रीति व्यक्त करू शकते (गलती 5:19-21). पण ही तीच स्व-निर्धारित, आत्मगौरवी कर्म-केंद्रित मानसिकता आहे – मग ते अनैतिक होणें असो किंवा अनैतिक वागणुकींविरुद्ध धर्मयुद्ध करणें असो. यांत सर्वसामान्य कारक म्हणजें स्वदिशानिर्देशन, आत्मनिर्भरता आणि आत्म-गौरव. या सर्वांमध्यें, कर्म-केंद्रित मानसिकतेचे मूलभूत समाधान म्हणजें एक खंबीर, स्वायत्त आणि शक्य असल्यास, विजयी आत्मनिर्भरतेचा आस्वाद.

विश्वासाची मानसिकता पूर्णपणें वेगळीच असते. जेव्हा तो भविष्याकडें पाहतो त्यावेळी त्याची इच्छा बळकट असते. परंतु ज्या गोष्टीची तो इच्छा करतो ती म्हणजें येशूमध्यें परमेश्वर आपल्यासाठीं जे काहीं आहे त्या सर्व गोष्टींना अनुभवाने जाणून घेण्यांत पूर्ण समाधान प्राप्त करण्याची.

जर “कर्म” स्वतःला अडखळणावर विजय मिळविल्याचे समाधान प्राप्त करू पाहते, तर “विश्वास” देवानें अडखळणावर विजय मिळविला या समाधानाचा आस्वाद घेतो. कर्म सक्षम, बलवान आणि चतूर म्हणून गौरवान्वित झाल्याच्या आनंदाची इच्छा धरतो. विश्वास देवाला त्याचे कर्तुत्व आणि बळ आणि बुद्धी आणि कृपेसाठीं गौरवान्वित होतांना पाहण्याची उत्कंठा करतो.

आपल्या धार्मिक स्वरूपात, कर्मे नैतिकतेचे आव्हान स्वीकारतांत, त्याच्या अडखळणांवर मोठ्या कष्टाने विजय मिळवतांत आणि त्याची मान्यता व प्रतिफळ म्हणून देवाकडें आपण विजयी झाल्याचा प्रस्ताव सादर करतांत. विश्वास देखील, नैतिकतेचे आव्हान स्वीकारतो, परंतु केवळ देवाच्या सामर्थ्याचे साधन बनण्याचा एक प्रसंग म्हणून. आणि जेव्हा विजय मिळविला जातो तेव्हा विश्वास आनंद करतो कीं सर्व गौरव आणि उपकारस्तवन देवाचे आहेत.

9 जुलाई : पिताओं के लिए एक वचन

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9 जुलाई : पिताओं के लिए एक वचन
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“हे बच्चे वालो, अपने बच्चों को रिस न दिलाओ, परन्तु प्रभु की शिक्षा और चेतावनी देते हुए उनका पालन–पोषण करो।” इफिसियों 6:4

रोमन समाज में एक पिता का अधिकार सर्वोपरि होता था। जैसा कि विलियम बार्कले ने लिखा, “एक रोमन पिता को अपने परिवार पर पूर्ण अधिकार प्राप्त होता था . . . वह अपने बेटे को बांध सकता था या पीट सकता था; वह उसे गुलाम के तौर पर बेच सकता था; और उसके पास उसे मृत्युदण्ड देने का अधिकार भी था . . . यदि कभी किसी ने पारिवारिक अनुशासन का अर्थ समझा है, तो वह रोम के लोगों ने किया।”[1]

इसलिए ध्यान दें कि यहाँ पौलुस केवल माता-पिता के अधिकार का प्रयोग करने का बुलावा नहीं दे रहा है। बल्कि वह इसकी वैधता को स्वीकार कर रहा है और इसे सन्तुलित भी कर रहा है। उसका पहला निर्देश नकारात्मक है: “अपने बच्चों को रिस न दिलाओ।” वह पिताओं से आग्रह करता है कि वे अपने बच्चों को अनुशासित करते समय संयम का प्रयोग करें, ताकि वे उन्हें हताश, निराश, या क्रोधित करके ज्यादा नुकसान न कर बैठें।

हम अपने बच्चों को किस प्रकार रिस दिला सकते हैं अर्थात क्रोधित कर सकते हैं? स्वार्थ, कठोरता, असंगति, अनुपयुक्तता, पक्षपात, चिढ़ाने, दोषारोपण करने, प्रगति की सराहना न करने के द्वारा . . . फिर भी ऐसी लम्बी सूची से हमें हतोत्साहित नहीं हो जाना चाहिए; इसके बजाय, हमें यह याद रखना चाहिए कि यह जिम्मेदारी केवल परमेश्वर के अनुग्रह से ही पूरी की जा सकती है।

और फिर भी पौलुस के निर्देश केवल नकारात्मक नहीं बल्कि सकारात्मक भी हैं। “उनका पालन–पोषण करो,” क्रिया का अर्थ कुछ-कुछ बागवानी जैसा है—यह हमें याद दिलाता है कि हमें अपने बच्चों को कोमलता से पालना है, और यह भी कि यह कोई तात्कालिक कार्य नहीं है; बल्कि यह कई वर्षों का एक सफर है। साथ ही, इस पालन-पोषण “अनुशासन” शामिल है—विशेष रूप से पवित्रशास्त्र का अनुशासन, जिसके द्वारा पिता स्वयं मसीह के स्वरूप में ढलता है—और “शिक्षा” शामिल है, जिसमें हम अपने बच्चों के मन पर परमेश्वर के वचनों की धीरे-धीरे छाप डालते हैं, ताकि उनका चरित्र सच में परिवर्तित हो जाए।

यदि आप माता-पिता हैं, तो आप इस कार्य को कैसे पूरा कर सकते हैं? इसके लिए अनुग्रह की आवश्यकता है। इसके साथ ही, इसके लिए धैर्य भी चाहिए। स्टॉक मार्केट की भाषा में, माता-पिता होना एक दिन भर में किया जाने वाला व्यापार नहीं है; यह दीर्घकालिक निवेश है। यह अद्‌भुत है कि एक चार साल का बच्चा, जिसे लगातार परमेश्वर के प्रेम और अनुशासन से सम्भाला जाता है, किशोरावस्था के अन्त तक एक विचारशील और प्रेमपूर्ण युवा वयस्क बन सकता है। यदि आप माता-पिता नहीं हैं, तो उन लोगों के लिए प्रार्थना करें, जो हैं। उन्हें इसकी आवश्यकता है! और यदि आप माता-पिता हैं, तो अपनी स्वयं की पद्धति पर विचार करें।

आप अपने घर में माता-पिता के अधिकार को कैसे स्थापित कर रहे हैं? आप इसे करते समय किस तरह से अपने बच्चों को क्रोधित करने के सबसे अधिक खतरे में हैं? आप अपने बच्चों को परमेश्वर के वचन में कैसे शिक्षा देंगे, और आप माता-पिता होने के अनुभव से अपने चरित्र को मसीह के समान बनाने में किस तरह से देख सकते हैं? इस सब में, याद रखें कि माता-पिता होना एक अनुग्रह का कार्य है। हमें अपनी जिम्मेदारियाँ विश्वासयोग्यता से निभानी हैं। लेकिन यदि आप यह नहीं याद रखते कि हर एक गलती को माफ करने के लिए अनुग्रह पर्याप्त है, तो आप हताश हो जाएँगे—यह एक ऐसा सत्य है जो आपको सशक्त करेगा और आपको घुटनों पर बनाए रखेगा!

  व्यवस्थाविवरण 6:1-15

पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: ओबद्याह; प्रेरितों 8:1-25 ◊


[1] द लैटर टू द हिब्रूज़, द न्यू डेली स्टडी बाइबल (वैस्टमिंस्टर जॉन नॉक्स, 2002), पृ. 208.

9 July : येशूनें ज्यां सहा प्रकारे खिन्नतेस लढा दिला

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9 July : येशूनें ज्यां सहा प्रकारे खिन्नतेस लढा दिला
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मग त्यानें पेत्र व जब्दीचे दोघे मुलगे ह्यांना बरोबर घेतले आणि तो खिन्न व अति कष्टी होऊ लागला. (मत्तय 26:37)

ज्या दिवशी येशूला वधस्तंभावर खिळण्यात आलें त्याच्या आदल्या रात्री येशूचा अंतरात्मा ज्यां अति कष्टांत होता त्याचे पवित्र शास्त्र आम्हांला एक अद्भुत ओझरते दर्शन देते. येशूनें ज्या प्रकारे औदासिन्य अथवा खिन्नतेविरुद्ध आपला गंभीर लढा दिला तो पहा आणि त्याद्वारे शिका.

1. त्यानें त्याच्यासोबत राहण्यासाठीं काहीं जवळच्या मित्रांची निवड केलीं. “त्यानें पेत्र व जब्दीचे दोघे मुलगे ह्यांना बरोबर घेतले” (मत्तय 26:37).

2. त्यानें आपलें अंतःकरण त्यांच्यापुढे मोकळे केलें. त्यानें त्यांना म्हटले, “‘माझा जीव’ मरणप्राय, ‘अति खिन्न झाला आहे,’ तुम्हीं येथे थांबा व माझ्याबरोबर जागे राहा” (मत्तय 26:38).

3. त्यानें या लढ्यात त्यांस मध्यस्थीची आणि सहभागी होण्याची विनंती केलीं. “त्यानें पेत्र व जब्दीचे दोघे मुलगे ह्यांना बरोबर घेतले” (मत्तय 26:38).

4. त्यानें प्रार्थनेत पित्यासमोर आपलें अंतःकरण ओतले. “हे माझ्या बापा, होईल तर हा प्याला माझ्यावरून टळून जावो” (मत्तय 26:39).

5. त्यानें देवाच्या सार्वभौम बुद्धीत आपल्या अंतःकरणास विसावा दिला. “तथापि माझ्या इच्छेप्रमाणें नको तर तुझ्या इच्छेप्रमाणें होवो” (मत्तय 26:39).

6. वधस्तंभाच्या दुसऱ्या बाजूला त्याची वाट पाहत असलेल्या गौरवी भविष्यातील कृपेवर त्यानें आपलें डोळे लावले. “जो आनंद त्याच्यापुढे होता त्याकरता त्यानें लज्जा तुच्छ मानून वधस्तंभ सहन केला, आणि तो देवाच्या राजासनाच्या उजवीकडें बसला आहे” (इब्री 12:2).

जेव्हा तुमच्या भविष्यास भेडसावणारी अशी काहीं गोष्ट तुमच्या जीवनात घडते, तेव्हा हे लक्षात ठेवा: तुमच्या अंतःकरणातील स्फोटकाचे पहिले आघात-तंरग, जसे येशूनें गेथशेमाने येथे अनुभवले, पाप नाहीं. खरा धोका त्याच्या अधीन होणें आहे. त्यास बळी पडणें पाप आहे. कुठलाही आत्मिक लढा न देणें. आणि त्या पापमय शरणागतीचे मूळ आहे अविश्वास – भविष्यातील कृपेत विश्वासासाठीं लढा देण्यात अपयश. येशूमध्यें देव आपल्यासाठीं जे अभिवचन देतो त्यास जोपासण्यात अपयश.

गेथशेमानेमध्यें येशू आपल्याला दुसरा मार्ग दाखवतो. तो वेदनारहित नाहीं, आणि उदासीन नाहीं. त्याचे अनुसरण करा. तुमचे विश्वासू आत्मिक मित्र शोधून काढा. आपलें अंतःकरण त्यांच्यापुढे मोकळे करा. त्यांना विनंती करा कीं त्यांनी तुमच्यासोबत जागे राहावे आणि प्रार्थना करावी. तुमचे अंतःकरण पित्यापुढे ओता. देवाच्या सार्वभौम बुद्धीत विसावा घ्या. आणि देवाच्या मौल्यवान आणि आलिशान अभिवचनांत तुमच्यापुढे जो आनंद ठेवण्यात आला आहे त्यावर तुमचे डोळे लावा.

8 जुलाई : दीनता से आएँ, ईमानदारी से ढूँढें

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8 जुलाई : दीनता से आएँ, ईमानदारी से ढूँढें
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“फिर फरीसी आकर उससे वाद–विवाद करने लगे, और उसे जाँचने के लिए उससे कोई स्वर्गीय चिह्न माँगा। उसने अपनी आत्मा में आह भर कर कहा, ‘इस समय के लोग क्यों चिह्न ढूँढ़ते हैं? मैं तुम से सच कहता हूँ कि इस समय के लोगों को कोई चिह्न नहीं दिया जाएगा।’” मरकुस 8:11-12

स्कूल के शिक्षक और कॉलेज के प्रोफेसर अक्सर दो प्रकार के प्रश्न पूछने वालों का सामना करते हैं: पहले वे जो विनम्रता से और वास्तविक रुचि के साथ पूछते हैं, और दूसरे वे जो चुनौती देने के इरादे से प्रश्न पूछते हैं। पहले वाले स्पष्ट रूप से समझने की कोशिश करते हैं। दूसरे वाले अपनी राय को पेश करने, अपने किसी मुद्दे को आगे बढ़ाने या बस खुद को चतुर दिखाने में रुचि रखते हैं।

जहाँ एक ओर लोगों की भीड़ ने मसीह के चमत्कारों को देखा और उन पर आश्चर्य व्यक्त किया, वहीं दूसरी ओर फरीसियों ने अक्सर यीशु की शिक्षाओं और सार्वजनिक सेवाकार्य को चुनौती दी, ताकि उसे परख सकें और उसे कमजोर कर सकें। वे वहाँ इस उद्देश्य से नहीं थे कि मसीह के अद्‌भुत कार्यों को देखें और सोचें कि क्या वह वास्तव में वही व्यक्ति है, जो उसने होने का दावा किया है। उनका उद्देश्य केवल मसीह को फँसाना और उलझाना ही था।

यीशु को अपने पीछे आ रही लोगों की भीड़ पर तरस आया। उसके पास उन लोगों के लिए दिव्य दया थी, जो अपनी आवश्यकता को पहचानकर अपने दिल में विनम्रता से उसके पास आते थे। उसने सत्य की तलाश में सच्चे दिल से उसके पास आने वाले किसी भी व्यक्ति को खाली हाथ नहीं मोड़ा। लेकिन उसने विरोधी धार्मिक नेताओं, जो अपने दावों को साबित करने और उसके दावों को चुनौती देने के लिए आए थे, का सामना न्यायपूर्ण निराशा और दिव्य अधीरता के साथ किया।

प्रश्न पूछने के दो तरीके हैं: विनम्रता से या घमण्ड से। और शिक्षक हमेशा अन्तर को पहचानता है।

ऐसे कुछ लोग, जो कहते हैं कि वे धार्मिक हैं, वे बाइबल की शिक्षा से कुछ नहीं सीखते। वे रविवार-दर-रविवार उपदेश सुनते हैं और कारण ढूँढते रहते करते हैं कि वे मसीह के द्वारा पूर्ण किए गए कार्य पर पूरी तरह से विश्वास क्यों न करें। वे प्रभु को दूर रखने के इरादे से प्रश्न पूछते हैं, और फिर सोचते हैं कि उन्हें कभी सन्तोषजनक उत्तर क्यों नहीं मिलता। यह परमेश्वर के बच्चों का तरीका नहीं है। हमें विनम्रता और जिज्ञासा के साथ अपने शिक्षक से सीखने की कोशिश करनी चाहिए, और जब हमारा दिल परेशान हो, तो हमें विनम्रता से उसके पास आकर यह प्रार्थना करनी चाहिए कि हम उत्तर को स्वीकारने के लिए खुले रहें और यह मांग न करें कि यीशु हमारे मुद्दे या अपेक्षाओं का पालन करे।

यदि आपकी समझने की क्षमता बड़ी है, तो बाइबल आपके बौद्धिक दृष्टिकोण को सन्तुष्ट कर सकती है। लेकिन यदि आपका घमण्ड सिर चढ़कर बोलने लगे, तो आप पाएँगे कि यह घमण्ड परमेश्वर के वचन की स्पष्टता और सत्य को देखने की आपकी क्षमता को विकृत कर देगा। मसीह बौद्धिक ईमानदारी की मांग को पूरा करने के लिए तैयार है, लेकिन वह घमण्ड को बिल्कुल भी बढ़ावा नहीं देगा।

हम सभी के पास इस संसार के बारे में, हमारे जीवन के बारे में और इस बारे में कि हमें किस रास्ते पर जाना चाहिए, बहुत सारे प्रश्न होते हैं, जो हम यीशु से पूछना चाहते हैं। यीशु उन्हें कभी खाली हाथ नहीं लौटाता जो उसके पास आते हैं, और वह अपने भाइयों और बहनों की प्रार्थनाओं का स्वागत करता है। लेकिन अपने प्रश्नों पर विचार करने के साथ-साथ, अपने हृदय पर भी विचार करें। अपने प्रश्न पूछें, लेकिन पहले यह सोचें कि आप ये प्रश्न कैसे पूछ रहे हैं: क्या आप विश्वास से समझ प्राप्त करने के लिए प्रेरित हैं या घमण्ड से सही प्रमाणित होने की कोशिश कर रहे हैं?

मरकुस 10:2-22

◊ पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: व्यवस्थाविवरण 32–34; प्रेरितों 7:44- 60