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17 August : परमेश्वराचा धन्यवाद करणें म्हणजें काय

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17 August : परमेश्वराचा धन्यवाद करणें म्हणजें काय
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माझ्या जिवा, परमेश्वराचा धन्यवाद कर; हे माझ्या सर्व अंतर्यामा, त्याच्या पवित्र नावाचा धन्यवाद कर. (स्तोत्र 103:1)

या स्तोत्राच्या सुरुवातीला आणि शेवटी स्तोत्रकर्ता त्याच्या जिवाला आव्हानात्मक उपदेश देऊन परमेश्वराचा धन्यवाद करण्यास सांगतो— “हे माझ्या जिवा, परमेश्वराचा धन्यवाद कर” — शिवाय, तो देवदूतांना आणि स्वर्गातील सैन्यांना आणि देवाच्या सर्व हस्तकृतींना देखील तेच करण्याचे आव्हान करतो.

अहो परमेश्वराच्या दूतांनो, जे तुम्हीं बलसंपन्न आहात,

आणि त्याचा शब्द ऐकून त्याप्रमाणें चालता

ते तुम्हीं त्याचा धन्यवाद करा.

अहो परमेश्वराच्या सर्व सैन्यांनो,

जे तुम्हीं त्याची सेवा करून त्याचा मनोदय सिद्धीस नेता,

ती तुम्हीं त्याचा धन्यवाद करा.

परमेश्वराच्या सर्व कृत्यांनो,

त्याच्या साम्राज्यातील सर्व ठिकाणी त्याचा धन्यवाद करा;

हे माझ्या जिवा, परमेश्वराचा धन्यवाद कर! (स्तोत्र 103:20-22)

या स्तोत्राचा मुख्य विषय परमेश्वराचा धन्यवाद करण्यावर केंद्रित आहे. परमेश्वराचा धन्यवाद करणें म्हणजें काय?

याचा अर्थ त्याची महानता व चांगुलपण यांविषयी प्रशंसनीय शब्द बोलणें – आणि खरं तर त्याचा अर्थ म्हणजें ती प्रशंसा आपल्या जीवाने व अंतर्यामाने करणें.

दावीद या स्तोत्राच्या पहिल्या आणि शेवटच्या वचनांमध्यें जेव्हां असें म्हणतो, “हे माझ्या जिवा, परमेश्वराचा धन्यवाद कर,” तेव्हां तो असे म्हणत आहे कीं देवाचे चांगुलपण आणि त्याची महानता यांविषयी प्रामाणिकपणाचे शब्द हें आत्म्याच्या खोलीतून आलें पाहिजे.

जीव व अंतर्याम यांवाचून मुखाने परमेश्वराचा धन्यवाद करणें हे ढोंगीपणाचे ठरेल. येशूनें म्हटलें, “हे लोक, ओठांनी माझा सन्मान करतांत. पण त्यांचे अंतःकरण माझ्यापासून दूर आहे.” (मत्तय 15:8). ही गोष्ट किती भयप्रद आहे याची दाविदाला जाणीव आहे, म्हणून तो स्वतःलाच आव्हानात्मक उपदेश करतो. तो आपल्या जिवाला सांगत आहे कीं त्यानें असले ढोंग करू नये.

“हे माझ्या जिवा, ये आणि देवाचे वैभव व त्याचे चांगुलपण पाहा. माझ्या मुखाबरोबर स्वर-सांगड घाल म्हणजें आपण आपल्या संपूर्ण व्यक्तित्वाने परमेश्वराचा धन्यवाद करूं. हे माझ्या जिवा, आपण ढोंगीपणा करणार नाहीं!”

16 अगस्त : अयोग्य सेवक

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16 अगस्त : अयोग्य सेवक
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“[योना] ने यहोवा से यह कहकर प्रार्थना की, ‘हे यहोवा, जब मैं अपने देश में था, तब क्या मैं यही बात न कहता था? इसी कारण मैं ने तेरी आज्ञा सुनते ही तर्शीश को भाग जाने के लिए फुर्ती की; क्योंकि मैं जानता था कि तू अनुग्रहकारी और दयालु परमेश्‍वर है, और विलम्ब से कोप करने वाला करुणानिधान है, और दुख देने से प्रसन्न नहीं होता’ . . . यहोवा ने कहा, “तेरा जो क्रोध भड़का है, क्या वह उचित है?’” योना 4:2, 4

जब बच्चे कुछ गलत करते हैं, तो वे अक्सर अपने माता-पिता से क्षमा मांगते हैं, उसे प्राप्त करते हैं, और फिर कहते हैं, “मुझे पता है कि मैं गलत था, लेकिन . . . जो कुछ मैंने किया उसके पीछे एक बहुत अच्छा कारण था।” हम कुछ ऐसा ही भविष्यवक्ता योना के साथ देखते हैं। परमेश्वर ने उसे क्षमा किया, उसे उठाया, और उसे सही मार्ग पर वापस रखा—फिर भी उसने अपनी पिछली अवज्ञा को उचित ठहराने की कोशिश की। वह एक ही समय में क्रोधित हो रहा था, तर्क कर रहा था, और प्रार्थना कर रहा था—जो आसान कार्य नहीं है!

ध्यान दें कि योना के इस तर्क-वितर्क में “मैं” शब्द कितनी बार उभरकर आता है। उसकी बातचीत में बहुत अधिक “योना” था—और इसलिए उसके हृदय में भी—क्योंकि वह इस पूरे विषय को अपनी इच्छा और परमेश्वर की इच्छा के बीच की लड़ाई के रूप में प्रस्तुत कर रहा था। उसने मूर्खतापूर्वक यह मान लिया था कि उसकी योजना परमेश्वर की योजना से बेहतर थी।

योना की शिकायत एक दोहरे मापदण्ड पर आधारित थी। हालाँकि हाल ही में वह स्वयं परमेश्वर की करुणा और दया का पात्र बना था, फिर भी उसने उसी दया को नीनवे के लोगों पर प्रकट करने के लिए परमेश्वर को दोषी ठहराया, जिन्हें वह उद्धार के योग्य नहीं समझता था।

योना के लिए सबसे बड़ी समस्या थी परमेश्वर का सम्प्रभु अनुग्रह। वह इस बात से क्रोधित था कि परमेश्वर ने उस तरीके से कार्य किया था जिसे वह न तो समझता था और न ही स्वीकार करता था। लेकिन बहुत पहले ही प्रभु ने घोषणा कर दी थी, “जिस पर मैं अनुग्रह करना चाहूँ उसी पर अनुग्रह करूँगा, और जिस पर दया करना चाहूँ उसी पर दया करूँगा” (निर्गमन 33:19)। पापियों के प्रति परमेश्वर का अनुग्रह कभी समझाया नहीं जा सकता। इसका कोई कारण नहीं होता; यह केवल परमेश्वर के स्वभाव को दर्शाता है।

योना की प्रतिक्रिया के उत्तर में प्रभु ने उससे यह नहीं पूछा कि क्या वह क्रोधित है, बल्कि यह पूछा कि क्या उसे क्रोधित होने का कोई अधिकार है। यही असली मुद्दा था: क्या योना को परमेश्वर की दया पर आपत्ति करने का कोई उचित कारण था—जो स्वयं एक ऐसे राष्ट्र का प्रतिनिधि था जिसे परमेश्वर ने अनुग्रहपूर्वक आशीषित किया था, भले ही वे पथभ्रष्ट हो गए थे, और जिसने अपनी अवज्ञा में व्यक्तिगत रूप से परमेश्वर के उद्धारक हाथ का अनुभव किया था? उत्तर स्पष्ट है: नहीं। और न ही हमारे पास यह अधिकार है कि हम परमेश्वर से प्रश्न करें कि वह किस पर और कैसे अपनी दया प्रकट करता है या वह अपने लोगों को बचाने के लिए और अपने पुत्र की महिमा करने के लिए सभी चीज़ों को कैसे संचालित करता है।

यदि हम स्वयं को परमेश्वर से नाराज़ पाते हैं और उसके द्वारा अपनी योजनाओं को पूरा करने के तरीके पर शिकायत करते हुए पाते हैं, तो यह इसलिए है क्योंकि हम यह भूल गए हैं कि हम स्वयं उसकी दया और अनुग्रह के अयोग्य हैं। सबसे बड़ा खतरा यह है: कि हम अपनी अवज्ञा के इतने आदी हो जाएँ कि हम स्वयं को परमेश्वर की कृपा और आशीष के योग्य समझने लगें। लेकिन प्रतिदिन सब कुछ केवल अनुग्रह से ही प्राप्त होता है। केवल जब हम इस अनुग्रह से पूरी तरह प्रभावित होंगे, तब ही हम परमेश्वर की उस असीमित दया में आनन्दित हो सकेंगे जो वह अपने अयोग्य संतों पर लुटाता है।

योना 4

पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: भजन 94–96; गलातियों 1 ◊

16 August : आपण लैंगिक पापात का पडतो

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16 August : आपण लैंगिक पापात का पडतो
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आनंदाचे व हर्षाचे शब्द माझ्या कानी पडू दे; म्हणजें तू मोडलेली माझी हाडे उल्लासतील. . . . तू केलेंल्या उद्धाराचा आनंद मला पुन्हा होऊ दे; आणि उत्सुकतेच्या आत्म्याने मला सावरून धर. (स्तोत्र 51:8, 12)

दावीद त्याला लैंगिक दुराचारी प्रवृत्तीवर शक्ती मिळावी असा धावा का करत नाहीं? लोकांनी आपल्याला जाब विचारावा अशी तो लोकांकडें जाऊन मागणी का करत नाहीं? स्त्रीकडें वासनेने पाहण्यापासून देवानें त्याच्या डोळ्यांचे रक्षण करावें व त्याला वासना-मुक्त असे विचार द्यावेंत अशी प्रार्थना तो का करत नाहीं? खरे पाहता, बेथशेबेवर जणू बलात्कारच केल्यानंतर त्यानें पापाचा अंगीकार आणि पश्चात्तापाचे हे जे स्तोत्र लिहिलें, त्यांत दाविदाने अशीच काहींतरी विनवणी करायला पाहिजे होती अशी तुम्हीं अपेक्षा करत असाल.

याचे कारण असे कीं लैंगिक पाप हे एक लक्षण आहे, रोग नाहीं, हे त्याला ठाऊक आहे.

लोक लैंगिक पापं करतांत कारण त्यांना ख्रिस्तामध्यें आनंद व हर्षाची पूर्णता प्राप्त झालेंलीं नसते. त्यांची अंत:करणें स्थिर, खंबीर, आणि घट्ट पायावर उभारलेली नाहींत. ते अडखळतांत. परीक्षा आली कीं ते लगेच पापांत पडतांत कारण त्यांच्या भावना आणि विचार यांमध्यें देवाला ते सर्वोच्च स्थान नाहीं जे त्यांनी त्याला द्यायला पाहिजे.

दावीद हे स्वतःविषयी जाणून होता. आमच्याबाबतही ते खरे आहे. म्हणून दावीद जी विषयवस्तू घेऊन प्रार्थना करतो त्याद्वारे तो आम्हांला दाखवून देत आहे कीं, जे लोग लैंगिक पापांत पडतांत त्यांना खरी गरज कशाची आहे: देवाची! देवामध्यें असलेला आनंद व हर्ष.

हे शहाणपण आपल्यासाठीं अफाट आहे.

15 अगस्त : परमेश्वर की योजना के साथ सामंजस्य में

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15 अगस्त : परमेश्वर की योजना के साथ सामंजस्य में
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“जब परमेश्‍वर ने उनके कामों को देखा, कि वे कुमार्ग से फिर रहे हैं, तब परमेश्‍वर ने अपनी इच्छा बदल दी, और उनकी जो हानि करने की ठानी थी, उसको न किया। यह बात योना को बहुत ही बुरी लगी, और उसका क्रोध भड़का।” योना 3:10 – 4:1

यहाँ तक कि भविष्यवक्ताओं को भी कभी-कभी बहुत कुछ सीखने की आवश्यकता होती है।

जल-जन्तु के पेट में समय बिताने के बाद योना अब परमेश्वर की आज्ञा का उल्लंघन नहीं कर रहा था, लेकिन अपनी आज्ञाकारिता में अब वह उलझन में था। वह अभी भी परमेश्वर की सम्प्रभु कृपा को समझने के लिए संघर्ष कर रहा था। पहले, जब उसने परमेश्वर की योजना से भागने की कोशिश की थी, तब उसकी अवज्ञा स्पष्ट थी; लेकिन अब, जब उसने वह किया जो उसे करने के लिए कहा गया था और वहाँ गया जहाँ उसे भेजा गया था, तब भी वह नीनवे के लिए परमेश्वर की दयालु योजना के साथ पूरी तरह सामंजस्य में नहीं था। एक ऐसे नगर में आत्मिक जागृति आ गई थी जो इस्राएल के परमेश्वर के प्रति पूरी तरह कठोर हो चुका था—और परमेश्वर का भविष्यवक्ता इस पर क्रोधित हो गया!

फिर भी, भले ही योना कठोर और संकीर्ण दृष्टिकोण वाला था और परमेश्वर की भलाई पर गलत प्रतिक्रिया दे रहा था, फिर भी परमेश्वर ने उसे त्यागा नहीं। जिस परमेश्वर ने उसे अवज्ञा से बचाने के लिए एक बड़ी जल-जन्तु भेजा था, वह उसे उचित रूप से दण्ड देने के लिए एक बड़ा सिंह भी भेज सकता था! लेकिन उसने ऐसा नहीं किया, क्योंकि वह अनुग्रहकारी और दयालु है। परमेश्वर ने उसे धैर्य और कोमलता से सम्भाला, ताकि वह यह समझ सके कि सबसे बड़ी समस्या उसकी परिस्थिति नहीं, बल्कि उसका अपना मनोभाव था।

नीनवे के लोगों के पश्चाताप पर योना की प्रतिक्रिया एक प्रचारक के लिए अजीब थी। हमें उससे यह अपेक्षा करनी चाहिए थी कि वह इस बात के लिए आभारी होगा कि परमेश्वर ने उसे त्यागने के बजाय अपनी सेवा में उपयोग होने का सौभाग्य दिया था। लेकिन इसके बजाय, पूरे नगर के पश्चाताप से योना का “क्रोध भड़का।” इस पद का एक शाब्दिक अनुवाद इसे और भी आगे ले जाता है: “योना की दृष्टि में यह बुरी बात थी, बहुत बुरी बात।” जिस विपत्ति की उसने नीनवे पर गिरने की आशा की थी—जिसका उसने अनुमान लगाया था और जिसकी उसने कामना की थी—उसकी अनुपस्थिति स्वयं उसके अपने मन और विचारों में एक विपत्ति बन गई।

यद्यपि यह सुनने में कटु लगता है, हम योना की भावनाओं और प्रतिक्रियाओं को अपने जीवन में भी प्रतिबिम्बित देख सकते हैं। हम वहाँ जा सकते हैं जहाँ हमें जाने के लिए कहा गया है, हम वह कह सकते हैं जो हमें कहने के लिए कहा गया है, हम बाहरी रूप से परमेश्वर की सभी आज्ञाओं का पालन कर सकते हैं . . . और फिर भी, अपने जीवन के मूल में हम वास्तव में उसके उद्देश्य के साथ सामंजस्य में नहीं हो सकते हैं। हम न्याय की कामना कर सकते हैं, जबकि परमेश्वर दया दिखाना चाहता है। हम इस बात से बेचैन हो सकते हैं कि परमेश्वर दूसरों को उस तरीके से आशीषित कर रहा है जैसा उसने हमें नहीं किया—या दूसरों को बिना किसी प्रतिबद्धता के आशीष दे रहा है, जबकि हमें लगता है कि हमने उसके लिए अधिक प्रयास किया है। हम स्वयं परमेश्वर को बताने लग सकते हैं कि उसे अपने संसार को कैसे संचालित करना चाहिए!

फिर, हमें उसकी दया के साथ सामंजस्य में लाने और खुशी-खुशी उसके मिशन में भेजने के लिए क्या आवश्यक है? केवल यही: यह समझना कि हम किसी से भी बेहतर नहीं हैं—हम उसकी दया के उतने ही अयोग्य हैं जितने अन्य लोग हैं और हम उसके क्रोध के उतने ही योग्य हैं जितने अन्य लोग हैं। परमेश्वर की दया को प्रकट करते हुए क्रूस हमारे हृदयों को नम्र करता है और इसमें वही करुणा तथा अनुग्रह भरता है, जिसने उसके पुत्र को कलवरी तक पहुँचाया। क्या आप दूसरों के प्रति ऐसी करुणा दिखाने में संघर्ष कर रहे हैं? क्रूस की ओर निहारें और प्रभु से प्रार्थना करें कि वह आपको वही सिखाए जो योना को भी सीखने की आवश्यकता थी।

कुलुस्सियों 1:21-29

◊ पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: भजन 91–93; 1 पतरस 5

15 August : आम्हांला मुळांत कोणत्या उद्देश्याने बनविले होते

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15 August : आम्हांला मुळांत कोणत्या उद्देश्याने बनविले होते
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कारण, आपल्याला देवाकडें आणण्यास ख्रिस्तसुद्धा पापांसाठीं, नीतिमान अनीतिमान लोकांसाठीं, एकदा मरण पावला. (1 पेत्र 3:18)

सुवार्तेची- म्हणजें शुभवर्तमानाची –  सर्वात मोठ्या आनंदाची बाजू म्हणजें स्वतः देवाबरोबर सहभागीतेचा आनंद घेणें. ही सत्य येथे 1 पेत्र 3:18 मध्यें “आपल्याला देवाकडें आणण्यास” या वाक्यात अगदी स्पष्ट शब्दांत मांडलेले आहे. ख्रिस्त यासाठींच मरण पावला.

सुवार्तेत असलेली इतर सर्व दानें हा आनंद साध्य केला जावा म्हणूनच आहेत.

  • आपल्या अपराधांची क्षमा झाली आहे, कीं यापुढे आपलें अपराध आपल्याला देवापासून दूर नेणार नाहींत.
  • आपण नीतिमान ठरविलेले गेलें आहोंत, कीं यापुढे दंडाज्ञा आपल्याला देवापासून दूर करणार नाहींत.
  • ख्रिस्ताच्या प्रायश्चित्ताद्वारे देवाचा कोप दूर केला गेला, कीं यापुढे आपला पिता झालेंल्या देवाचा कोप त्याच्या आणि आपल्यामध्यें अडखळण नसावा.
  • आम्हांला आता सार्वकालिक जीवन दिलें गेले आहे, व पुनरुत्थान होईल तेव्हा नवीन शरीरे दिली जातील, कीं ज्यामुळें आपण सर्वकाळासाठीं देवाबरोबर राहण्यांस व त्याच्या सहवासाचा आनंद घ्यावयांस पूर्णपणें समर्थ व्हावें.

आपली अंत:करणें चाचपडून पाहा. तुम्हांला तुमच्या पातकांची क्षमा का हवी आहे? का तुम्हांला नीतिमान ठरविले ज्याण्याची गरज आहे? देवाचा कोप शमविला जावा म्हणून प्रायश्चित व्हावे असे तुम्हांला का वाटते? तुम्हांला सार्वकालिक जीवन का हवे आहे? “कारण मला देवाचा आत्ता आणि सर्वकाळासाठीं आनंद घ्यायचा आहे” हे याचे निर्णायक उत्तर आहे का?

देवानें ह्या शुभवर्तमानांत आम्हांला प्रीतिची जी भेट दिली ती भेट स्वतः देव आहे. मुळांत आम्हांला यासाठींच निर्माण केलें गेलें होते. पण आम्हीं आपल्या पापामुळें देवाचा हा सहवास गमाविला होता. ख्रिस्त हेच नाते व सह्भागीता पुन्हा स्थापित करण्यासाठीं आला.

“तुझ्या उपस्थितीत विपुल हर्ष आहे, तुझ्या उजव्या हातांत सुख सर्वकाळ आहेत” (स्तोत्र 16:11).

14 अगस्त : हमारा अपरिवर्तनीय परमेश्वर

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14 अगस्त : हमारा अपरिवर्तनीय परमेश्वर
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“जब परमेश्‍वर ने उनके कामों को देखा, कि वे कुमार्ग से फिर रहे हैं, तब परमेश्‍वर ने अपनी इच्छा बदल दी, और उनकी जो हानि करने की ठानी थी, उसको न किया।” योना 3:10

बाइबल स्पष्ट रूप से बताती है कि परमेश्वर अपरिवर्तनीय है। साथ ही, योना की पुस्तक यह पुष्टि करती है कि वह लोगों के प्रति अपने दृष्टिकोण और उनके साथ व्यवहार करने के अपने तरीके को बदल सकता है और बदलता भी है। हम इस स्पष्ट विरोधाभास को कैसे समझें?

हम इस प्रकार के विरोधाभास को अन्य स्थानों पर भी पाते हैं। उदाहरण के लिए, जब परमेश्वर ने राजा शाऊल के साथ व्यवहार किया, तो उसने कहा, “मैं शाऊल को राजा बना के पछताता हूँ; क्योंकि उसने मेरे पीछे चलना छोड़ दिया, और मेरी आज्ञाओं का पालन नहीं किया” (1 शमूएल 15:11)। लेकिन कुछ ही पदों बाद कहा गया है, “जो इस्राएल का बलमूल है वह न तो झूठ बोलता और न पछताता है; क्योंकि वह मनुष्य नहीं है कि पछताए” (पद 29)। ऐसा प्रतीत होता है कि परमेश्वर को अपने निर्णय पर पछतावा हुआ, फिर भी यह कहा गया कि वह पछताता नहीं है।

फिर भी, इन दोनों प्रकार की अभिव्यक्तियों में कोई परम असंगति नहीं है। जब परमेश्वर को पछताने या मन बदलने वाला कहा जाता है, तो यह वर्णनात्मक भाषा हमारी सीमित मानव समझ के अनुरूप होती है। ऐसा प्रतीत होता है कि परमेश्वर बदल गया है, लेकिन वास्तव में जो बदला है, वह हमारा मानवीय आचरण है। सरल शब्दों में, शाऊल अब वह व्यक्ति नहीं रहा जो वह पहले था। वह निरन्तर अवज्ञाकारी हो गया था, और परमेश्वर ने उस बदले हुए हालात का जिस प्रकार उत्तर दिया, वह पूरी तरह उसके चरित्र के अनुसार था।

इसी तरह, योना के प्रचार के परिणामस्वरूप नीनवेवासियों ने अपना व्यवहार बदल लिया—इस बार विपरीत दिशा में, अर्थात वे बुराई से दूर हो गए। परमेश्वर सदा पाप के विरुद्ध और पश्चाताप तथा विश्वास के पक्ष में रहता है; उसका चरित्र नहीं बदलता। उसकी चेतावनियाँ भटके हुए लोगों को सचेत करने और उन्हें पश्चाताप की ओर ले जाने के लिए होती हैं—और जब पश्चाताप होता है, तो परमेश्वर उसी के अनुसार उत्तर देता है।

चूंकि परमेश्वर इस प्रकार उत्तर देता है, इस कारण यीशु पर विश्वास करने वाला पापी उसकी स्वीकृति को प्राप्त कर सकता है। क्योंकि “यीशु मसीह कल और आज और युगानुयुग एक–सा है” (इब्रानियों 13:8), हम यह निश्चयपूर्वक जान सकते हैं कि जब हम पश्चाताप और सरल विश्वास के साथ उसके पास आते हैं, तो वह हमें करुणा और दया के साथ ग्रहण करता है। यही उसका वास्तविक स्वभाव है, और वह कभी नहीं बदलेगा। हमारे दृष्टिकोण से यह प्रतीत हो सकता है कि उसने अपना मन बदल लिया है—परन्तु परमेश्वर सदा अपने प्रत्येक वचन के प्रति सच्चा रहता है। एक ऐसे संसार में, जो निरन्तर बदल रहा है और जहाँ हममें से सर्वश्रेष्ठ लोग भी हमेशा अपने वचन को निभाने में असफल हो सकते हैं, यही आपके आत्मविश्वास और आनन्द का महान आधार है।

योना 3

पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: भजन 89–90; 1 पतरस 4 ◊

14 August : देव कश्याप्रकारे पातकांची क्षमा करूनही नीतिमान ठरतो

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14 August : देव कश्याप्रकारे पातकांची क्षमा करूनही नीतिमान ठरतो
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दावीद नाथानाला म्हणाला, “मी परमेश्वराविरुद्ध पातक केलें आहे,” नाथान दाविदाला म्हणाला, “परमेश्वराने तुझे पातक दूर केलें आहे; तू मरणार नाहींस. तरी तू हे काम करून परमेश्वराच्या शत्रूंना उपहास करायला निमित्त दिलें आहेस, ह्यास्तव तुला जो पुत्र झाला आहे तो खात्रीने मरणार.” (2 शमुवेल 12:13-14)

जे झालें ते संतापजनक आहे. उरिया मृत झाला आहे. बथशेबेवर बलात्कार झाला आहे. ह्यातून जे बाळ जन्मास आलें तेहि खात्रीने मरणार. तरी नाथान म्हणतो, “परमेश्वराने तुझे पातक दूर केलें आहे.”

बस असेच? दावीदाने व्यभिचार केला. त्यानें हत्येचा आदेश दिला. त्यानें लबाडी केलीं. त्यानें “परमेश्वराची आज्ञा तुच्छ” मानली (2 शमुवेल 12:9). त्यानें परमेश्वराच्या शत्रूंना उपहास करायला निमित्त दिलें. तरी “परमेश्वराने [त्याचे] पातक बस असेच सहजपणें दूर केलें”?!

हा देव कोणत्या प्रकारचा नीतिमान न्यायाधीश आहे? तुम्हीं बलात्कार व खून करून व खोटे बोलून असेच निर्दोषपणें सुटून जाऊ शकत नाहीं. कोणी नीतिमान न्यायाधीश असे करणार नाहीं.

पौलासाठीं ही एक मोठी पेंचांत पाडणारी धर्मशास्त्रीय अडचण होती – आज लोक ज्या अडचणींशी झुंज देत आहेत त्यापेक्षा खूपच वेगळी : देव एकाच वेळी अपराध क्षमा करणारा व तरीही नीतिमान असावे हे कसे शक्य आहे? रोमकरांस 3:25-26 मध्यें पौलाने जे म्हटले त्यांत या प्रश्नाचे उत्तर आहे :

त्याच्या रक्ताने विश्वासाच्या द्वारे प्रायश्‍चित्त होण्यास देवानें [ख्रिस्ताला]  पुढे ठेवले. ह्यासाठीं कीं, पूर्वी झालेंल्या पापांची देवाच्या सहनशीलतेने उपेक्षा झाल्यामुळें त्यानें आपलें नीतिमत्त्व व्यक्त करावे; म्हणजें आपलें नीतिमत्त्व सांप्रतकाळी असे व्यक्त करावे कीं, आपण नीतिमान असावे आणि येशूवर विश्वास ठेवणार्‍याला नीतिमान ठरवणारे असावे

दुसऱ्या शब्दांत सांगायचे तर, देव दावीदाच्या पातकाची शुद्ध उपेक्षा करत असल्याचे जे दिसून येते त्यामुळें आपल्याला होणारा मनस्ताप योग्यच आहे जर देव दावीदाचे पाप अगदी सहजपणें गालिच्याखाली दाबून टाकून देत असेल. पण तो तसे करित नाहींये.

देव जेव्हां दावीदाने पाप केलें त्यां काळापासून पुढे भविष्यांत अनेक शतकानंतर त्याचा पुत्र येशू ख्रिस्त याच्या मृत्यूकडें पाहतो जेव्हां तो दावीदाच्या जागी मरण सोसणार होता, ज्यामुळें देवाच्या दयेवर असलेला दावीदाचा विश्वास आणि भविष्यात ख्रिस्ताद्वारे देवाचे मुक्तीचे कार्य ह्या दोन्ही गोष्टी दावीद व ख्रिस्त यांमध्यें समेट घडवून आणतांत. आणि ज्याला सर्व गोष्टींचे ज्ञान आहे तो देव आपल्या मनांत दावीदाची पापे ही ख्रिस्ताची पापे म्हणून गणतो आणि ख्रिस्ताचे नीतिमत्त्व हे त्याचे नीतिमत्त्व म्हणून गणतो आणि अशाप्रकारे देव ख्रिस्तामुळें सहनशीलतेने दावीदाच्या पापाची न्याय्यत्वाने उपेक्षा करतो.

देवाच्या पुत्राचे मरण मनस्ताप देण्यांस पुरे आहे, आणि त्याद्वारे देवाचा जो गौरव कायम राहतो तोही मर्यादेपलीकडें आहे, म्हणजें असे कीं जेव्हां देव दावीदाला त्याचे व्यभिचाराचे, खून करण्याचे व लबाड बोलण्याचे पातक क्षमा करतो त्यांत तो नीतिमान ठरतो. तसेच, आमच्याही पातकांची क्षमा करण्यांत तो नीतिमान ठरतो.

अशाप्रकारे देव त्याचे परिपूर्ण नीतिमत्व आणि न्याय दोन्हींचे रक्षण करतो आणि त्याच वेळी येशूवर विश्वास ठेवणाऱ्यांवर दया करतो, मग त्यांची पातकें कितीही असंख्य असों वा कितीही भयानक असों. अनिर्वचनीय (अकथनीय) सुवार्ता हीच आहे.

13 अगस्त : पश्चाताप का एक अनुस्मारक

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13 अगस्त : पश्चाताप का एक अनुस्मारक
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“तब नीनवे के मनुष्यों ने परमेश्‍वर के वचन की प्रतीति की; और उपवास का प्रचार किया गया और बड़े से लेकर छोटे तक सभों ने टाट ओढ़ा। तब यह समाचार नीनवे के राजा के कान में पहुँचा; और उसने सिंहासन पर से उठ, अपने राजकीय वस्त्र उतारकर टाट ओढ़ लिया, और राख पर बैठ गया।” योना 3:5-6

क्या आप कल्पना कर सकते हैं कि आपके देश का राष्ट्रपति या प्रधानमन्त्री एक राष्ट्रीय प्रसारण में पूरे राष्ट्र से आग्रह करे कि वे अपनी हिंसक गतिविधियाँ छोड़ दें, अपनी बुराइयों से विमुख हों, और परमेश्वर की दया की याचना करें ताकि वह आकर अपने न्याय से उन्हें बचा सके? वास्तव में, योना की आँखों के सामने नीनवे में यही हुआ।

यह वास्तव में आश्चर्यजनक है कि नीनवेवासियों ने परमेश्वर पर इतनी शीघ्रता और पूर्णता से विश्वास किया। जब उन्होंने योना द्वारा दिए गए न्याय के सन्देश को सुना, तो उनकी प्रतिक्रिया व्यापक और सच्चे हृदय से हुई थी, जिसे उनके पश्चाताप के वस्त्रों से देखा जा सकता था। और इस सार्वजनिक प्रतिक्रिया के अनुरूप ही राजा ने भी प्रतिक्रिया की थी। राजा ने अपने वस्त्र बदले और अपने राजसी वस्त्र उतारकर टाट ओढ़ लिए; उसने अपनी जगह बदली और अपने सिंहासन को छोड़कर धूल में बैठ गया; और उसने अपने शब्द बदले और पश्चाताप की घोषणा जारी कर दी।

यह यीशु के समय के लोगों, और शायद हमारे अपने समय के लोगों से बिल्कुल विपरीत है। स्वयं यीशु ने सिखाया कि नीनवेवासियों ने “योना का प्रचार सुनकर मन फिराया,” जबकि जिनसे यीशु ने बात की, उनमें से बहुतों ने यह पहचानने से इनकार कर दिया कि “देखो, यहाँ वह है जो योना से भी बड़ा है”—अर्थात स्वयं मसीह (लूका 11:32)। उन्होंने वह अस्वीकार कर दिया जो नीनवे के राजा ने समझ लिया था जब उसने कहा, वे . . . पश्चाताप करें। सम्भव है, परमेश्‍वर दया करे और अपनी इच्छा बदल दे, और उसका भड़का हुआ कोप शान्त हो जाए और हम नष्ट होने से बच जाएँ (योना 3:8-9)। राजा समझ गया था कि नीनवेवासियों के पश्चाताप का अर्थ यह नहीं था कि परमेश्वर अनिवार्य रूप से उन्हें क्षमा कर देगा। वह अब भी अनिश्चित था कि उनके पश्चाताप के साथ परमेश्वर भी अपना निर्णय बदलेगा या नहीं।

यह हमें एक महत्त्वपूर्ण सत्य की याद दिलाता है: यहाँ तक कि पश्चाताप करने वालों के पास भी परमेश्वर की स्वीकृति के लिए कोई दावा नहीं है। वे पूरी तरह से परमेश्वर के अनुग्रह पर निर्भर होते हैं। पश्चाताप क्षमा के लिए आवश्यक है, लेकिन यह उसे अर्जित नहीं करता। जैसे कि उड़ाऊ पुत्र ने कहा था, वैसे ही सच्चा पश्चाताप करने वाला व्यक्ति भी कहता है, “पिता जी, मैं ने स्वर्ग के विरोध में और तेरी दृष्‍टि में पाप किया है। अब इस योग्य नहीं रहा कि तेरा पुत्र कहलाऊँ” (लूका 15:18-19)। सच्चा पश्चाताप यह स्वीकार करने से आरम्भ होता है कि हम वास्तव में परमेश्वर के न्याय के योग्य हैं और हमें उसकी दया की अत्यन्त आवश्यकता है।

चूंकि “यहाँ वह है जो योना से भी बड़ा है,” इसलिए हम जान सकते हैं और घोषित कर सकते हैं कि पश्चाताप के उत्तर में हमेशा क्षमा ही मिलेगी, क्योंकि “जो कोई प्रभु का नाम लेगा, वह उद्धार पाएगा” (रोमियों 10:13)। लेकिन हमें इस गैर-यहूदी राजा से यह सीख लेना चाहिए कि हम अपने पश्चाताप या आज्ञाकारिता के द्वारा परमेश्वर को नियन्त्रित नहीं कर सकते, और यह कि सच्चा पश्चाताप केवल बाहरी नहीं बल्कि हृदय से होता है, जिसमें हमेशा हमारे दृष्टिकोण और व्यवहार में परिवर्तन शामिल होता है। यह एक ऐसा पाठ है जिसे हमें अपने मसीही जीवन के हर दिन अपनाना चाहिए—क्योंकि, जैसा कि मार्टिन लूथर ने कहा था, “जब हमारे प्रभु और उद्धारकर्ता यीशु मसीह ने कहा, ‘पश्चाताप करो,’ तो उसका आशय था कि विश्वासियों का पूरा जीवन पश्चाताप होना चाहिए।”[1]

  लूका 11:29-32

◊ पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: भजन 87– 88; 1 पतरस 3


[1] द नाइनटी-फाईव थेसिस, फर्स्ट थेसिस

13 August : चांगुलपणाचा प्रत्येक मनोदय विश्वासाने कसा पूर्ण होतो याची तीन उदाहरणें

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13 August : चांगुलपणाचा प्रत्येक मनोदय विश्वासाने कसा पूर्ण होतो याची तीन उदाहरणें
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ह्याकरता तर आम्हीं तुमच्यासाठीं सर्वदा अशी प्रार्थना करतो कीं, आपल्या देवानें तुम्हांला झालेंल्या ह्या पाचारणाला योग्य असे मानावे आणि चांगुलपणाचा प्रत्येक मनोदय व विश्वासाचे कार्य सामर्थ्याने पूर्ण करावे. (2 थेस्सलनीका 1:11)

जेव्हा पौल म्हणतो कीं देवानें…..चांगुलपणाचा प्रत्येक मनोदय व विश्वासाचे कार्य सामर्थ्याने पूर्ण करावे (तो आमच्या कर्मांना “विश्वासाची कार्ये” म्हणतो), तेव्हा त्याचा अर्थ आपण पापाचा पराभव करावा आणि आपण विश्वासाने नीतिमत्वाला योग्य अशी कर्मे करावी असा होतो, म्हणजेंच पुढील पाच मिनिटे, पाच महिने, पाच दशके आणि अनंतकाळ यां एकूणच सर्व टप्प्यांमध्यें देव ख्रिस्ताठायीं आपल्यासाठीं काय काय करेल अशी जी त्यानें आम्हांला अभिवचने दिलीं आहेंत त्यांवर आपण अवलंबून राहतो.

तुमच्या जीवनात ह्याचे परिदृश्य कसे दिसते याची तीन उदाहरणें पुढीलप्रमाणें आहेत :

1. जर तुम्हीं तुमच्या अंतःकरणांत त्याग व औदार्याने देण्याचे ठरविता, तर चांगुलपणाचा हा मनोदय पूर्ण करण्यासाठीं तुम्हांला देवाचे सामर्थ्य प्राप्त होईल कारण या संदर्भांत त्यानें भावी कृपा पुरविण्याची जी जी अभिवचनें दिलींत त्यांवर तुम्हीं विश्वास ठेवता, ती अभिवचनें अशी : “माझा देव आपल्या संपत्त्यनुरूप तुमची सर्व गरज ख्रिस्त येशूच्या ठायीं गौरवाच्या द्वारे पुरवील” (फिलिप्पै 4:19); आणि “जो उदार हाताने पेरील तो त्याच प्रमाणात कापणी करील” (2 करिंथकर 9:6); त्याचप्रमाणें, “तुमच्याजवळ सर्व गोष्टींत सदा, सर्व पुरवठा रहावा आणि प्रत्येक चांगल्या कामात तुम्हीं संपन्न व्हावे म्हणून देव तुम्हास सर्व प्रकारची कृपा पुरवण्यास समर्थ आहे ” (2 करिंथ 9:8).

2. जर तुम्हीं तुमच्या अंतःकरणांत पोर्नोग्राफीचा त्याग करण्याचे ठरविता, तर चांगुलपणाचा हा मनोदय पूर्ण करण्यासाठीं तुम्हांला देवाचे सामर्थ्य प्राप्त होईल कारण या संदर्भांत त्यानें भावी कृपा पुरविण्याची जी जी अभिवचनें दिलींत त्यांवर तुम्हीं विश्वास ठेवता, ती अभिवचनें अशी : “जे अंतःकरणाचे शुद्ध ते धन्य, कारण ते देवाला पाहतील” (मत्तय 5:8); आणि “तुझे संपूर्ण शरीर नरकात टाकले जावे यापेक्षा तुझ्या एका अवयवाचा नाश व्हावा हे तुझ्या हिताचे आहे” (मत्तय 5:29). हे किती बरे. अद्भुत कार्य. पूर्णपणें समाधान देणारे सामर्थ्याचे काम.

3. आणि जर तुम्हीं तुमच्या अंतःकरणांत असे ठरविता कीं जेव्हां जेव्हां संधी येईल, तुम्हीं ख्रिस्ताच्या साक्षीसाठीं आपलें तोंड उघडाल, तर चांगुलपणाचा हा मनोदय पूर्ण करण्यासाठीं तुम्हांला देवाचे सामर्थ्य प्राप्त होईल कारण या संदर्भांत त्यानें जी भावी कृपा पुरविण्याचे अभिवचन दिलें त्यावर तुम्हीं विश्वास ठेवता, ते अभिवचन असे, “जेव्हा तुम्हास अटक करतील तेव्हा काय बोलावे किंवा कसे बोलावे याविषयी काळजी करू नका. तेव्हा तुम्हीं काय बोलायचे ते तुम्हांला सांगितले जाईल” (मत्तय 10:19).

देवानें त्याच्या मौल्यवान अभिवचनांवर आपला दैनंदिन विश्वास वाढवावा – म्हणजें भावी कृपेविषयी असलेल्या त्याच्या अक्षय, रक्ताने विकत घेतलेल्या, व ख्रिस्ताला उंचविणाऱ्या अभिवचनांवर असलेला विश्वास.

12 अगस्त : दया का ऐलान

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12 अगस्त : दया का ऐलान
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“तब यहोवा का यह वचन दूसरी बार योना के पास पहुँचा : ‘उठकर उस बड़े नगर नीनवे को जा, और जो बात मैं तुझ से कहूँगा, उसका उस में प्रचार कर।’ तब योना यहोवा के वचन के अनुसार नीनवे को गया। नीनवे एक बहुत बड़ा नगर था, वह तीन दिन की यात्रा का था।” योना 3:1-3

परमेश्वर दूसरा मौका देने वाला परमेश्वर है।

योना ने अपनी अवज्ञा के कारण नीनवे को आने वाले न्याय के बारे में चेतावनी देने के लिए परमेश्वर की आवाज़ का पालन करने के बजाय भागने का निर्णय लिया। लेकिन जब बुलावा दूसरी बार आया, तो उसने दूसरी बार आलसी होकर काम नहीं किया। अपनी असफलता और परमेश्वर की कृपा को जानकर वह पहले ही अवसर पर उन्हें प्रचार करने के लिए तत्पर दिखाई दिया।

जब हम आखिरकार योना को लोगों को पश्चाताप का बुलावा देते हुए पढ़ते हैं, तो हम यह कल्पना कर सकते हैं कि उसके ऊपर अपने स्वयं के अनुभवों का बोझ कितना अधिक होगा, जब वह अवज्ञा पर आने वाले दिव्य न्याय के बारे में बता रहा होगा। उसने चेतावनी दी, और इसमें निश्चित रूप से यह व्यक्तिगत गवाही भी शामिल थी कि परमेश्वर पापी लोगों को भी सबसे कठिन परिस्थितियों में से बचाने के लिए इच्छुक और सक्षम है। हालाँकि वह बाद में यह साबित करेगा कि उसने परमेश्वर की कृपा की विशालता और सीमा को पूरी तरह से नहीं समझा था (योना 4:1-3), परन्तु परमेश्वर की जो कृपा योना पर हुई थी, वह निश्चित रूप से उसके सन्देश में नीनवेवासियों तक पहुँची थी। जिस व्यक्ति को जल-जन्तु के रूप में दिव्य प्रावधान से दूसरा मौका मिला था, उसने अब एक ऐसे नगर को दूसरा मौका दिया था जो परमेश्वर से पूरी तरह विमुख हो चुका था।

क्या आप यह समझ पाए हैं कि परमेश्वर दूसरा (और तीसरा और चौथा) मौका देने वाला परमेश्वर है? क्या आप यह समझ पाए हैं कि न तो आप परमेश्वर की कृपा से तेज भाग सकते हैं या न ही उसकी कृपा की अथाह गहराइयों में पहुँच सकते हैं? यदि आप यह समझ गए हैं, तो आप निश्चित रूप से दूसरों को सुसमाचार का सन्देश देंगे। और जिस तरह से आप इसे साझा करेंगे, वह परमेश्वर की दी हुई कृपा को दर्शाएगा। यदि मसीही लोग अपने विश्वास के बारे में बात करते हुए कठोर, दयाहीन और कर्मकाण्डवादी प्रतीत होते हैं, तो इसका अर्थ है कि उन्होंने अभी तक अपने दिलों को परमेश्वर की कृपा, अनुग्रह और प्रेम से पर्याप्त रूप से कोमल नहीं किया है। लेकिन यदि किसी मसीही के शब्दों और कार्यों में परमेश्वर की कृपा का आकर्षण और सौम्यता है, तो यह इस बात का पर्याप्त प्रमाण है कि उसने ऐसी कृपा को स्वयं अनुभव किया है।

भजन लेखक चार्ल्स वेस्ले ने, जिसे परमेश्वर की कृपा ने जीत लिया था, यह घोषणा की:

कृपा की गहराई! क्या मेरे लिए अब भी कृपा बची है?

क्या मेरा परमेश्वर अपने क्रोध को सह सकता है? मुझे, सबसे बड़े पापी को बचा सकता है?

मैंने लम्बे समय तक उसकी कृपा का विरोध किया है: लम्बे समय तक उसे क्रोध दिलाया है;

मैंने उसकी पुकारों को नहीं सुना; बार-बार असफलताओं से उसे दुखी किया . . .

उद्धारकर्ता मेरे लिए वहाँ खड़ा है, अपने घाव दिखाता है और अपने हाथ फैलाता है:

परमेश्वर प्रेम है! मैं जानता हूँ, मैं महसूस करता हूँ; यीशु रोता है, लेकिन फिर भी मुझसे प्रेम करता है।[1]

अभी परमेश्वर की कृपा पर विचार करें—कि कैसे वह आपको विश्वास तक लाया है, आपके प्रति धीरज धरता है और आपको क्षमा करता रहता है। उसके साथ आपके व्यवहार में जो आश्चर्य की भावना है, वह आपकी कहानी में झलकनी चाहिए जब आप दूसरों को उसकी उद्धारक प्रेम कथा सुनाते हैं। और यदि कोई ऐसा व्यक्ति है जिसे आप परमेश्वर की दया दिखाने में असफल रहे हों या जब अवसर था तब उसे उसके बारे में बताने से चूक गए हों, तो अब उसके लिए एक दूसरा अवसर मिलने की प्रार्थना करें—और जब वह अवसर मिले, तो उसे पकड़ लें।

  भजन 30

पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: भजन 84–86; 1 पतरस 2 ◊


[1] चार्ल्स वैस्ले, “डेप्थ ऑफ मर्सी” (1740).