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5 June : ऐहिक गरजांसाठीं देवावर अवलंबून राहणें

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5 June : ऐहिक गरजांसाठीं देवावर अवलंबून राहणें
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“तर तुम्हीं पहिल्यानें देवाचे राज्य व त्याचे नीतिमत्त्व मिळवण्यास झटा म्हणजें त्यांच्याबरोबर ह्याही सर्व गोष्टी तुम्हांला मिळतील.” (मत्तय 6:33)

देवाच्या संपन्न भावी कृपे विषयीं असलेंल्या सर्वात सामर्थ्यशाली साक्षींपैकीं एक म्हणजें “विश्वासाचा नियम” ज्यांवर पुष्कळ मिशनऱ्यांच्या जीवनाची वाटचाल आधारलेंली होती, विशेषता: ओवर्सीज मिशनरी फेलोशिप (ओ एम एफ) या संस्थेच्या मिशनऱ्यांचे जीवन.

इतरांच्या कार्य-पद्धतीचा निषेध न करता, विश्वासाचा हा नियम त्यां लोकांचे जीवन-तत्व होते जे हडसन टेलर आणि जॉर्ज मुलर यांच्या पथ-चिन्हांवर चालून, लोकांकडें निधि न मागता थेट देवाकडें विनवणी करित असत कीं दान देण्याकरिता लोकांच्या मनात त्यानेंच कार्य करावें.

जेम्स एच, टेलर जे ओ एम एफ च्या संस्थापकांचे पणतू होते, स्पष्ट करतांत कीं भावी काळातील कृपेवर असलेंला हा विश्वास, जो गत काळात झालेंल्या कृपेत मूळांवलेंला असतो, तो कसा देवाचे गौरव करतो.

“आम्हीं ….. विश्वासापासून सुरुवात करतो. आम्हीं विश्वास ठेवतो कीं देव आहे. अनेक मार्गानी आम्हांला याची खात्री पटली आहे, पण आम्हीं सर्वांनी देवाच्या कृपेचा अनुभव घेतला आहे कीं आम्हीं येशू ख्रिस्ता द्वारें आणि आत्म्याच्या नवीन जन्माद्वारें त्याला ओळखू  शकतो. येशू ख्रिस्ताच्या मरणातून पुनरुत्थानाचा इतिहासातील पुरावा हा त्याच्यावर विश्वास ठेवण्यास भक्कम पाया आहे; जो बोलला कीं तो मरेल आणि पुन्हा जीवंत होईल आणि तो झाला, तो सर्वच बाबतीत विश्वासार्ह आहे. त्यामुळें, आम्हीं त्याच्यावर विश्वास ठेवण्यास तयार आहोत, केवळ आमच्यां आत्म्याच्या सार्वकालिक तारणासाठींच नाहीं तर, आमच्यां रोजच्या भाकरीसाठीं आणि आर्थिक पुरवठयासाठीं सुद्धा.

ओ एम एफ नें आपल्यां मासिकांत देवाच्या अढ्भुत भावी पुरवठा करणार्‍या त्याच्या गौरवीपणा बद्दल आणि त्याच्या विश्वासूपणा बद्दल अशी साक्ष प्रकाशित केली : “आम्हांला हे दर्शवायचे आहे कीं देव जे सांगतो कीं तो जे करील, ते करण्याबाबत तो विश्वासू आहे. तो सामान्य गरजा जसे कीं विमानाचे टिकिट, अन्न, दवाखान्याचा खर्च आणि ख्रिस्ती गटाच्या नेंहमीच्या गरजांचा पुरवठा शंभर वर्षाहून अधिक काळ तो करत आला आहे.”

ओ एम एफ त्यांच्या संदेशामधून आणि त्यांच्या पद्धतीमधून, देवाच्या विश्वासूपणाचा गौरव करण्यात समर्पित आहे. हडसन टेलर असें म्हणतात : “एक जीवंत देव आहे. आणि तो पवित्र शास्त्रात आपल्यांशी बोललेंला आहे. आणि तो ज्या गोष्टींचे अभिवचन देतो, त्या गोष्टी तो पूर्णहि करतो.”

विश्वासावर चालणारे जीवन हे देवाच्या भरवश्याचा आरसा आहे.

4 जून : दीपकों के समान चमकना

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4 जून : दीपकों के समान चमकना
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“सब काम बिना कुड़कुड़ाए और बिना विवाद के किया करो, ताकि तुम निर्दोष और भोले होकर टेढ़े और हठीले लोगों के बीच परमेश्‍वर के निष्कलंक सन्तान बने रहो, जिनके बीच में तुम जीवन का वचन लिए हुए जगत में जलते दीपकों के समान दिखाई देते हो।” फिलिप्पियों 2:14-15

मसीह के लहू के द्वारा मुक्त किए गए लोग होने के नाते हमें चमकना है। जो यीशु को जानते हैं, उनमें एक विशेष गौरव होना चाहिए। लेकिन कुड़कुड़ाना हमेशा उस गौरव को छिपा लेता है। यद्यपि यह बच्चों का एक गीत है, तौभी इसके शब्द हमेशा हमारे दिल में गूंजने चाहिएँ:

छोड़ दो अब कुड़कुड़ाने की गली,

और सूरज चौक में आ जाओ,

क्योंकि वहीं यीशु रहता है,

और वहाँ सदा उजियाला रहता है।”

मसीहियों के लिए यह समझना बहुत आवश्यक है कि यीशु के कारण हमें पाप के दोष और मलिनता से शुद्ध कर दिया गया है। मसीह में हमें असाधारण स्वतन्त्रता मिली है, और हमारे भीतर वास करने वाले पवित्र आत्मा के द्वारा हम उथल-पुथल से भरे इस जीवन में और मसीह को अस्वीकार करने वाले इस संसार में स्वतन्त्रता और आशा का अनुभव कर सकते हैं। सुसमाचार केवल हमारे विश्वास का आरम्भिक बिन्दु नहीं है; यह सम्पूर्ण उद्देश्य है। और प्रभु अपनी कृपा में होकर हमें लगातार यह याद दिलाता है कि हम उसकी सन्तान हैं, जिससे हम उसके साथ अपनी जीवन-यात्रा में आगे बढ़ सकें।

मसीह में हमारी स्थिति अडिग और अपरिवर्तनीय है। एक बार जब हम उसके परिवार में गोद ले लिए जाते हैं, तो परमेश्वर हमारे प्राणों को कभी नहीं छोड़ता। हमारे सबसे अच्छे सप्ताह में भी हम परमेश्वर के उतने ही निकट होते हैं, जितने कि अपने सबसे बुरे सप्ताह में, क्योंकि पिता के साथ हमारा सम्बन्ध मसीह की धार्मिकता पर आधारित है, न कि हमारी अपनी धार्मिकता पर। हम परमेश्वर के साथ सही सम्बन्ध में इसलिए नहीं हैं, क्योंकि हमने कुछ किया या हमारे भीतर से कुछ निकला, बल्कि इसलिए क्योंकि यह हमारे लिए किया गया है।

मार्टिन लूथर ने कहा था कि एक अर्थ में, सुसमाचार हमारे बाहर है।[1] यदि हम बार-बार अपने भीतर झांकें कि हम सब कुछ कितना अच्छे से कर रहे हैं, तो हमें लगेगा कि परमेश्वर के सामने हमारी कोई स्थाई स्थिति नहीं है। लेकिन जब हम यह समझ जाते हैं कि परमेश्वर की शाश्वत योजना हमें अपने पुत्र के स्वरूप में ढालने की है, और कि मसीह की आज्ञा का पालन करने की प्रक्रिया हमें उसी स्वरूप में ढालती जाती है, तो हम आत्मा-प्रेरित आनन्द का अनुभव करने लगेंगे, जिसे परमेश्वर अनुग्रहपूर्वक हमें प्रदान करता है। और जब ऐसा होगा, तो हमें शिकायत करने का अवसर बहुत कम मिलेगा!

हमें भय और कांपते हुए अपने उद्धार का कार्य पूरा करना है, क्योंकि परमेश्वर का यही उत्तम कार्य है, जो हमें उसकी प्रसन्नता के लिए और इसी के साथ हमारे आनन्द और सन्तोष के लिए जीने योग्य बनाता है (फिलिप्पियों 2:12-13)। जब हम ऐसा करते हैं, तो हम सच में चमकने लगते हैं—और दूसरे लोग हमारे द्वारा मसीह को देख सकते हैं। तो फिर, आप किन बातों को लेकर कुड़कुड़ाते हैं? क्या परमेश्वर की सन्तान होने का गौरव आपके लिए ठण्डा पड़ गया है? आज जब आपको यह एहसास हो कि आप शिकायत करने वाले हैं, चाहे अपने मन में या किसी और से, तो उन शब्दों को बदलकर परमेश्वर के प्रति कृतज्ञता के शब्द बना दें—उन सब बातों के लिए जो प्रभु ने आपके लिए की हैं और कर रहा है। तब आप सच में चमक उठेंगे।

  मत्ती 5:1-16

◊ पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: होशे 12–14; मत्ती 20:1-16


[1] “दो प्रकार की धार्मिकता।”

4 June : देवाला ज्यां गोष्टीचा अभिमान वाटतो

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4 June : देवाला ज्यां गोष्टीचा अभिमान वाटतो
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पण आता ते अधिक चांगल्या देशाची म्हणजें स्वर्गीय देशाची उत्कंठा धरतात; ह्यामुळें आपणाला त्यांचा देव म्हणवून घ्यायला देवाला त्यांची लाज वाटत नाहीं; कारण त्यानें त्यांच्यासाठीं नगर तयार केलें आहे. (इब्री 11:16)

देव जे अब्राहाम, इसहाक व याकोबाबद्दल बोलला ते त्यानें माझ्या बद्दल देखील बोलावे असें मला खूप वाटते, कीं “मला तुमचा देव म्हणवून घ्यायलालाज वाटत नाहीं “

हे जरी जोखमीचे वाटत असलें तरी, याचा अर्थ असा नाहीं आहे का, कीं देवाला तो माझा देव असण्याबद्दल खरेच “गर्व” वाटत असावा? सुदैवानें ही अद्भुत शक्यता (इब्री 11:16 मध्यें) त्याच्या कारणांनी वेढलेंली आहे : एक आधी आणि एक नंतर.

पहिलं कारण म्हणजें : “आपणाला त्यांचा देव म्हणवून घ्यायला देवाला त्यांची लाज वाटत नाहीं; कारण त्यानें त्यांच्यासाठीं नगर तयार केलें आहे.”

त्याला आपला देव म्हणून घेण्यास लाज वाटत नाहीं याचे पहिलें कारण जे तो देतो ते हे कीं त्यानें त्यांच्यासाठीं काहीं तरी केलें आहे. त्यानी त्यांच्यासाठीं एक नगर बनवलें आहे – स्वर्गीय नगर जे “देवानें योजलेलें व बांधलेलें आहे ” (इब्री 11:10). यास्तव त्याला त्यांचा देव म्हणवून घेण्यास लाज वाटत नाहीं याचे पहिलें कारण हे कीं त्यानें त्यांच्यासाठीं कार्य केलें आहे. ना कीं आपण त्याच्यासाठीं काहींतरी केलें आहे.

आता, तो पुढे काय कारण देतो ते पहा. ते अश्या प्रकारे आहे : “पण ते अधिक चांगल्या देशाची म्हणजें स्वर्गीय देशाची उत्कंठा धरतात. त्यामुळें देवाला त्यांचा देव म्हणवून घ्यायला लाज वाटत नाहीं.”

“ह्यामुळें” निर्देशित करते कीं, आताच कारण दिलें गेलें आहे कीं का देवाला आमचा देव म्हणवून घेण्यास लाज वाटत नाहीं. याचे कारण आहे कीं ते उत्कंठा धरतात. ते चांगल्या देशाची इच्छा करतात – म्हणजेंच ते आता ज्या भौतिक राष्ट्रात राहत आहेत त्यापेक्षा जास्त चांगल्या देशाची ते उत्कंठा धरतात, स्वर्गीय शहर जेथे देव आहे.

जेव्हां आपण हे जग आपल्यांला जे देईल त्यापेक्षा, त्या स्वर्गीय नगराची उत्कंठा धरतो – जे देवाचे निवासस्थान आहे – तेव्हां देवाला आपला देव म्हणवून घेण्यास लाज वाटत नाहीं. देव आपल्यांला जे काहीं देऊ करणार आहे त्या अभिवचनांना आपण जेव्हां महत्व देतो तेव्हां, देवाला आपला गर्व वाटतो. ही चांगली बातमी आहे.

म्हणून, एका चांगल्या देशाकडें तुमची नजर वळवा, जे नगर देवानें आपल्यांकरिता बनवलें आहे, आणि पूर्ण अंत:करणनें त्याची उत्कंठा धरा. देवाला तुमचा देव म्हणवून घेण्यास लाज वाटणार नाहीं.

3 जून : विरासत छोड़कर जाना

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3 जून : विरासत छोड़कर जाना
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“पर तू सब बातों में सावधान रह, दुख उठा, सुसमाचार प्रचार का काम कर, और अपनी सेवा को पूरा कर।” 2 तीमुथियुस 4:5

हममें से प्रत्येक व्यक्ति एक विरासत छोड़ रहा है। हर दिन, हम अपने जीवन के चित्र में कुछ नया जोड़ रहे हैं, और अन्ततः जो कुछ हम पीछे छोड़ेंगे—हमारे निर्णय, हमारे योगदान, हमारी प्राथमिकताएँ—वे कुछ समय तक दूसरों के विचारों और चिन्तन में रहेंगे।

पौलुस द्वारा तीमुथियुस को लिखी दूसरी पत्री के अन्त में हमें एक वृद्ध व्यक्ति के शब्द मिलते हैं, जिसका जीवन समाप्ति की ओर बढ़ रहा था: वह कहता है, “अब मैं अर्घ के समान उण्डेला जाता हूँ, और मेरे कूच का समय आ पहुँचा है।” (2 तीमुथियुस 4:6)। इस सन्दर्भ में, वह तीमुथियुस को अपने उत्तरदायित्व को गम्भीरता से लेने, अपनी विरासत पर विचार करने, और उन अनेक लोगों द्वारा छोड़ी गई अच्छी और बुरी विरासतों पर ध्यान देने के लिए प्रेरित करता है, जिनसे पौलुस का सामना हुआ था।

पत्र के पहले अध्याय में, पौलुस तीमुथियुस को यह याद दिलाता है कि “आसिया वाले सब मुझ से फिर गए हैं, जिनमें फूगिलुस और हिरमुगिनेस हैं” (2 तीमुथियुस 1:15)। इन व्यक्तियों का बाइबल में केवल एक बार उल्लेख हुआ है और वह भी इस तथ्य को दर्ज करने के लिए कि उन्होंने जरूरत के समय पौलुस को छोड़ दिया। पौलुस तीमुथियुस को हुमिनयुस और फिलेतुस जैसे लोगों से भी सावधान रहने के लिए कहता है, जिनका “वचन सड़े घाव की तरह फैलता जाएगा।” और जिन्होंने “सत्य से भटक” कर गलत शिक्षा दी, और वह सिकन्दर ठठेरे का भी उल्लेख करता है, जिसने पौलुस के साथ “बहुत बुराइयाँ की” (2:17-18; 4:14)। जब हम इन व्यक्तियों द्वारा छोड़ी गई विरासत को देखते हैं, तो हमें त्याग, झूठी शिक्षा, और सुसमाचार के विरोध की विरासत दिखाई देती है।

लेकिन पौलुस का यह पत्र उन लोगों का भी उल्लेख करता है, जिन्होंने एक प्रेरणादायक और उपयोगी विरासत छोड़ी। उदाहरण के लिए, लोइस और यूनीके ने एक सच्चे विश्वास का प्रदर्शन किया, और पौलुस को पूरा भरोसा था कि वही विश्वास अब युवा पास्टर तीमुथियुस में भी है (2 तीमुथियुस 1:5)। इसी तरह, वह तीमुथियुस को उनेसिफुरुस को याद रखने के लिए कहता है, जिसने “बहुत बार मेरे जी को ठंडा किया और मेरी जंजीरों से लज्जित न हुआ। पर जब वह रोम में आया, तो बड़े यत्न से ढूँढ़कर मुझ से भेंट की” (पद 16-17)। उनेसिफुरुस ने विश्वास, साहस और दृढ़ निश्चय की विरासत छोड़ी। यदि उसने किसी स्थान पर रहने का वादा किया, तो वह वहाँ अवश्य होता था। वह ऐसा व्यक्ति था जिस पर पौलुस पूरी तरह भरोसा कर सकता था।

हम सभी एक विरासत छोड़ रहे हैं। जब हम किसी कमरे से बाहर निकलते हैं, तो या तो हम मसीह की सुगन्ध छोड़ते हैं, जो हर जगह उसकी पहचान फैलाती है (2 कुरिन्थियों 2:15-16), या हम आत्म-प्रचार की अप्रिय गन्ध या अर्थहीन उपस्थिति की शून्यता छोड़ जाते हैं। विश्वासयोग्यता, भक्ति, दयालुता, कोमलता, ईमानदारी, सत्यनिष्ठा, प्रेम, और शान्ति की विरासत वह विरासत है, जिसे स्नेह के साथ याद किया जाएगा। लेकिन सबसे महत्त्वपूर्ण बात यह है कि यह विरासत लोगों का ध्यान उस व्यक्ति की ओर ले जाएगी, जिसका जीवन सबसे अधिक मायने रखता है—अर्थात प्रभु यीशु की ओर।

एक विरासत, प्रतिदिन लिए गए उन छोटे-छोटे निर्णयों से बनती है, जो मसीह के लिए फर्क पैदा करने के लिए किए जाते हैं: उससे प्रेम करने, अपने पड़ोसी से प्रेम करने, शान्ति की खोज करने और उसके बारे में बात करने के निर्णय। आज, आप अपनी विरासत का एक छोटा—या शायद बहुत महत्त्वपूर्ण—हिस्से का निर्माण करेंगे। इसलिए वह कार्य करें जो परमेश्वर ने आपके लिए तैयार किया है, और उसके लिए एक फर्क पैदा करें। आखिरकार, क्या पता कि हम अपनी विरासत में आखिरी योगदान देकर कूच कर जाएँ।

तीतुस 2:2-14

पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: होशे 9–11; मत्ती 19 ◊

3 June :अशक्य गोष्टींसाठीं विश्वास

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3 June :अशक्य गोष्टींसाठीं विश्वास
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परंतु देवाच्या अभिवचनाकडें पाहून तो अविश्वासामुळें डळमळला नाहीं, तर विश्वासानें सबळ होऊन त्यानें देवाचा गौरव केला; ‘आणि देव आपण दिलेलें अभिवचन पूर्ण करण्यासही समर्थ आहे अशी त्याची पक्की खातरी होती. ( रोम 4:20-21).

विश्वास भविष्यातील देवाच्या कृपेचा गौरव करितो हे मानण्याकरिता पौलाकडें विशेष कारण होते. सरळ शब्दात सांगायचे झालें तर, याचे कारण म्हणजें देवाला गौरव देणारा विश्वास हा भविष्यातील अभिवचनांविषयीं देवाचा विश्वासूपणा आणि त्याचे सामर्थ्य आणि त्याचे ज्ञान यांत असणारी खात्री आहे.

अब्राहामानें देवाच्या अभिवचनांना कसा प्रतिसाद दिला याचे उदाहरण देऊन पौल हे स्पष्ट करतो : कीं तो अनेक राष्ट्रांचा पिता होणार जरी तो वयस्कर झाला होता आणि त्याची पत्नी वांझ होती तरीही. ‘“तशी तुझी संतती होईल,” ह्या वचनाप्रमाणें त्यानें ‘बहुत राष्ट्रांचा बाप’ व्हावे म्हणून आशेला जागा नसताही त्यानें आशेनें विश्वास ठेवला. (रोम 4:18) म्हणजेंच देवाच्या अभिवचनांत असलेंल्या भविष्यातील कृपेवर त्याचा विश्वास होता, जरी सर्व भौतिक पुरावे प्रतिकूल असलें तरी.

तथापि विश्वासानें दुर्बळ न होता, आपलें निर्जीव झालेलें शरीर (तो सुमारे शंभर वर्षांचा होता) व सारा हिच्या गर्भाशयाचे निर्जीवपण ही त्यानें लक्षात घेतली; आणि देव आपण दिलेलें अभिवचन पूर्ण करण्यासही समर्थ आहे अशी त्याची पक्की खातरी होती. परंतु देवाच्या अभिवचनाकडें पाहून तो अविश्वासामुळें डळमळला नाहीं, तर विश्वासानें सबळ होऊन त्यानें देवाचा गौरव केला; ‘आणि देव आपण दिलेलें अभिवचन पूर्ण करण्यासही समर्थ आहे अशी त्याची पक्की खातरी होती.  ( रोम 4:19-20)

अब्राहामाचा विश्वास देवाच्या या अभिवचनांवर होता कीं देव त्याला अनेक राष्ट्रांचा पिता बनविल. हा विश्वास देवाला गौरवणारा विश्वास होता कारण त्याद्वारें देवाच्या सर्वसमर्थ, अलौकिक संसाधंनें जे तो सर्व अभिवचनें पूर्ण करण्यासाठीं पुरवणार होता त्याच्यावर लक्ष केंद्रीत करणारा होता.

अब्राहाम हा वयस्कर झाला होता आणि सारा वांझ होती. इतकेच नाहीं तर : तुम्हीं एक किंवा दोन मुलां द्वारें “अनेक राष्ट्र” कशी बनवू शकता, ज्या बद्दल देवानें अब्राहमाला वचन दिलें होते? हे सर्व अशक्यप्राय होते.

त्यामुळें, अब्राहामाचा विश्वास देवाचा गौरव करणारा विश्वास होता, कीं देव जे मनुष्याला अशक्य ते शक्य करूं शकतो आणि तो ते करणार. आपल्यांला देखील अश्याप्रकारे विश्वास ठेवण्यास बोलावलें आहे. आपण जे आपल्यांसाठीं करूं शकत नाहीं ते देव आपल्यांसाठीं करील.  

2 जून : क्या वह फल पाएगा?

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2 जून : क्या वह फल पाएगा?
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“वह दूर से अंजीर का एक हरा पेड़ देखकर निकट गया कि क्या जाने उसमें कुछ पाए : पर पत्तों को छोड़ कुछ न पाया; क्योंकि फल का समय न था। इस पर उसने उससे कहा, ‘अब से कोई तेरा फल कभी न खाए!’ और उसके चेले सुन रहे थे।” मरकुस 11:13-14

यहाँ एक घटना प्रस्तुत की गई है जो “कठिनाइयों से भरी हुई है।”[1]

यीशु द्वारा अंजीर के पेड़ को श्राप देना चौंकाने वाली बात है क्योंकि यह विनाश का चमत्कार था। मरकुस के सुसमाचार में अब तक हमने यीशु को केवल रूपान्तरण या पुनर्स्थापना के चमत्कार करते हुए देखा था। चूंकि यह यीशु के अन्य कार्यों से पूरी तरह विपरीत था, इसलिए हमें इसके महत्त्व को गहराई से समझने की आवश्यकता है।

पुराने नियम में, दाखलता और अंजीर के पेड़ का उपयोग अक्सर इस्राएलियों की परमेश्वर के सामने स्थिति को दर्शाने के लिए रूपक के तौर पर किया गया है। जब दाखलता या अंजीर का पेड़ अच्छा फल उत्पन्न करता था, तो सब कुछ सही माना जाता था; लेकिन जब कोई फल नहीं होता था या बुरा फल उत्पन्न होता था, तो इसका अर्थ था कि परमेश्वर के लोग भटक गए हैं।

जब यीशु ने उस समय की धार्मिक गतिविधियों की ऊपरी चमक के पीछे के पूरे खालीपन को देखा, तो नबी मीका के ये शब्द उसके मन में आए होंगे: “हाय मुझ पर! क्योंकि मैं उस जन के समान हो गया हूँ जो धूपकाल के फल तोड़ने पर, या रही हुई दाख बीनने के समय के अन्त में आ जाए, मुझे तो पक्की अंजीरों की लालसा थी, परन्तु खाने के लिये कोई गुच्छा नहीं रहा।” (मीका 7:1)।

इसलिए, यीशु द्वारा अंजीर के पेड़ को श्राप देना कोई आकस्मिक घटना नहीं थी। यह एक भविष्यवाणी के तौर पर प्रतीकवाद से भरी हुई दृष्टान्त क्रिया थी। इस दृश्य के माध्यम से यीशु ने यह दिखाया कि यरूशलेम पर शीघ्र ही न्याय आने वाला था। यीशु धार्मिक जीवन का केन्द्र माने जाने वाले नगर में प्रार्थना और आत्मिक फलवन्तता की खोज में आया था, लेकिन वहाँ कुछ भी नहीं पाया। वह बाँझ अंजीर का पेड़ एक धार्मिक व्यवस्था का प्रतीक था, जो दिखावे के लिए परमेश्वर को सन्तुष्ट करने और आत्मा की भूख को तृप्त करने का दावा करता था, लेकिन जब लोग ऐसे धर्म की अधीनता में आते थे, तो उनकी सन्तुष्टि के लिए उसमें कुछ भी नहीं होता था—और परमेश्वर-पुत्र के इस दिव्य कार्य से यह स्पष्ट हो गया कि परमेश्वर इससे प्रसन्न नहीं था।

क्या भविष्यवाणी के तौर पर आई यह चेतावनी हमारे लिए भी कोई महत्त्व रखती है, जबकि हम अंजीर के पेड़ों और मन्दिरों से बहुत दूर हैं? हाँ! अच्छा फल उत्पन्न करने की चुनौती हमारे लिए भी बनी हुई है। लेकिन हमें इस बात से भी सावधान रहना चाहिए कि धार्मिक कर्मकाण्ड को निभाने या नियमों का पालन करने से आने वाली आत्म-धार्मिकता को हम सच्चे आत्मिक फल न समझ बैठें। परमेश्वर के लोग जीवन्त सम्बन्ध का स्थान खोखले कर्मकाण्ड को दे देने के खतरे में हमेशा रहते हैं। इस सूखे अंजीर के पेड़ की चेतावनी को मानने का सही तरीका क्या है? यीशु हमें बताता है: “जो डाली मुझमें है और नहीं फलती, [मेरा पिता] उसे वह काट डालता है . . . मैं दाखलता हूँ, तुम डालियाँ हो। जो मुझमें बना रहता है और मैं उसमें, वह बहुत फल फलता है, क्योंकि मुझसे अलग होकर तुम कुछ भी नहीं कर सकते” (यूहन्ना 15:2, 5)। दूसरे शब्दों में, समाधान यह नहीं है कि हम बेहतर करने का प्रयास करें, बल्कि यह है कि हम यीशु को और अधिक जानें और उसमें बने रहें।

क्या इस अंजीर के पेड़ के विवरण का कोई भी हिस्सा हमारे जीवन में भी सत्य है? जब यीशु आएगा और हमारी जाँच करेगा, तो क्या वह हमारे जीवन में फल पाएगा? क्या वह विश्वास पाएगा? अपने आप को यीशु से, जो सच्ची दाखलता है, जुड़ा रखें, और उसका आत्मा आपके जीवन में वही फल उत्पन्न करेगा जिसकी वह खोज कर रहा है।

  यूहन्ना 15:1-11

◊ पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: होशे 5–8; मत्ती 18:21-35


[1] सी. ई. बी. क्रैनफील्ड, द गॉस्पल अकोर्डिंग टू मार्क, केम्ब्रिज ग्रीक टेस्टामेण्ट कॉमैण्ट्री, सम्पादक सी.एफ.डी. मूल (1959; पुनः मुद्रित केम्ब्रिज यूनिवर्सिटी प्रेस, 2000), पृ. 354.

2 June : अब्राहामाचे वंशज कोण?

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2 June : अब्राहामाचे वंशज कोण?
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“तुझ्या द्वारें पृथ्वीवरील सर्व कुळे आशीर्वादित होतील.” (उत्पत्ती 12:3)

जे तुम्हीं ख्रिस्तामध्यें आशा ठेवता आणि आज्ञाधारकपणें त्याला अनुसरता, ते तुम्हीं अब्राहामाचे वंशज आहात आणि त्याच्या कराराच्या अभिवचनांचे वारस आहात.

उत्पत्ती 17:4, मध्यें देव अब्राहामाला म्हणाला, ‘“पाहा, तुझ्याशी माझा करार हा : तू राष्ट्रसमूहाचा जनक होशील.” पण उत्पत्तीच्या पुस्तकांतून हे स्पष्ट होते कीं अब्राहाम हा पृथ्वीवरील सर्व कुळांचा जनक झाला तो ते शारीरिकरित्या किंवा राजकींयरित्या नाहीं. म्हणूनच देवाच्या ह्या अभिवचनाचा अर्थ असा असण्याची शक्यता आहे कीं, अनेक राष्ट्रे, जरी ते देहानुसार अब्राहामाच्या रक्ताचे नसलें तरी ते कोणत्या तरी प्रकारे त्याचे पुत्र म्हणून आशीर्वादीत होतील.

उत्पत्ती 12:3 मध्यें देव जे अब्राहामाला बोलला, “तुझ्या द्वारें पृथ्वीवरील सर्व कुळे आशीर्वादित होतील” तेव्हां हांच त्याचा अर्थ होता यांत काहींच शंका नाहीं. सुरुवातीपासूनच देवाचा मानस होता कीं येशू ख्रिस्ताचा जन्म अब्राहामाच्या वंशात व्हावा आणि जे सर्व ख्रिस्तामध्यें विश्वास ठेवतात त्यांनी अब्राहामाला दिलेल्यां आशीर्वादांचे वारस व्हावे. गलती 3:29 मध्यें पौल म्हणतो, ‘आणि तुम्हीं जर ख्रिस्ताचे आहात तर अब्राहामाचे संतान आणि अभिवचनानुसार वारस आहां.’

4,000 हजार वर्षापूर्वी जेव्हां देव अब्राहामाला बोलला, ‘“पाहा, तुझ्याशी माझा करार हा : तू राष्ट्रसमूहाचा जनक होशील” तेव्हां देवानें त्या द्वारें आपल्यांकरिता मार्ग मोकळा केला, आपण परराष्ट्रीय असलो तरी आपण अब्राहामाची संतान बनू शकतो आणि देवाच्या अभिवचनांचे वारस बनू शकू. आपल्यांला इतकेच करायचे आहे कीं आपल्यांला अब्राहामा सारखाच विश्वास ठेवायचा आहे- म्हणजें देवाच्या अभिवचनांवर भाव ठेवायचा आहे, तो इतका कीं, जर या आज्ञाधारकपणात आपल्यांला प्रिय असणार्‍या गोष्टी देखील बलिदान करण्याची तयारी ठेवावी लागेल जसे अब्राहामानें इसाकाला.

आपण अब्राहामाच्या अभिवचनांचे वारीस कोणतेही कर्म केल्यां द्वारें होऊ शकत नाहीं, तर देव स्वतः आपल्यां करिता कार्य करतो या गोष्टीची खात्री ठेवून आपण वारीस होऊ शकतो. “[ अब्राहाम ] परंतु देवाच्या अभिवचनाकडें पाहून तो अविश्वासामुळें डळमळला नाहीं, तर विश्वासानें सबळ होऊन त्यानें देवाचा गौरव केला; ‘आणि देव आपण दिलेलें अभिवचन पूर्ण करण्यासही समर्थ आहे अशी त्याची पक्की खातरी होती.’ ( रोम 4:20-21). यामुळेंच अब्राहाम देवाची आज्ञा पाळू शकला जरी आज्ञापालन व्यर्थ वाटत असलें तरी. देव अशक्य ते शक्य करूं शकतो यावर त्यानें भरवसा ठेवला – जसे कीं त्याच्या मुलाला मरणातून पुन्हा जीवंत करणें.

देवाच्या अभिवचनांमध्यें विश्वास ठेवणें – किंवा आज आपण म्हणू शकतो कीं, ख्रिस्तावर विश्वास ठेवणें, जो देवाच्या अभिवचनाची पूर्तता आहे – त्याच्यावर विश्वास ठेवणें हा अब्राहामाची संतान  होण्याचा मार्ग आहे; आज्ञापालन या गोष्टीचा पुरावा आहे कीं आपला विश्वास हा खरा आहे ( उत्पत्ती 22:12-19). म्हणून येशू योहान 8:39 मध्यें म्हणतो, “जर तुम्हीं अब्राहामाची मुलें आहात तर अब्राहामाची कृत्ये करा.”

अब्राहामाची संतान ही सर्व राष्ट्रातील ती लोकं आहेत ज्यांनी त्यांची आशा येशू ख्रिस्तामध्यें ठेवली आहे, आणि त्यामुळें जशी अब्राहामानें मोरीया पर्वतावर आशा ठेवली, त्याप्रमाणें त्यांचा सर्वात मोलवान जगीक ठेवा देखील त्यांच्या आज्ञाधारकतेला रोखू शकत नाहीं.

जे तुम्हीं येशू ख्रिस्तामध्यें आशा ठेवता आणि विश्वासाचे आज्ञापालन करून त्याला अनुसरता, ते तुम्हीं अब्राहामाचे वंशज आहात आणि त्याच्या कराराच्या अभिवचनाचे वारस आहात.

1 जून : नबी का बोझ

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1 जून : नबी का बोझ
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“भारी वचन जिसको हबक्कूक नबी ने दर्शन में पाया।” हबक्कूक 1:1

सच्चे भविष्यवक्ताओं का महत्त्व कभी इस बात में नहीं था कि वे कौन थे, बल्कि उस सन्देश में था जो वे सुनाते थे। हमारे लिए भी यही सच होना चाहिए।

उदाहरण के लिए, हबक्कूक को ही लें। उसकी जीवनी सम्बन्धी जानकारी लगभग न के बराबर है। हम उसके बारे में जो कुछ भी जानते हैं, वह केवल उस भविष्यवाणी की पुस्तक से मिलता है जो उसके नाम से जानी जाती है, और वह भी हमें बहुत कम जानकारी देती है। आपको हबक्कूक का उल्लेख पुराने नियम में कहीं और नहीं मिलेगा। हालाँकि, यह चुप्पी अपने आप में महत्त्वपूर्ण है। हबक्कूक की पहचान उसके व्यक्तित्व में नहीं, बल्कि उसके बुलावे और उसके सन्देश में थी।

हमें यह दृष्टिकोण पूरी बाइबल में भविष्यवाणी से सम्बन्धित घटनाओं में मिलता है। कुछ भविष्यवक्ताओं के बारे में हमें अधिक जानकारी मिलती है, तो कुछ के बारे में बहुत कम। लेकिन जो कुछ भी हमें उनके बारे में बताया गया है, वह असाधारण या प्रभावशाली नहीं है। उदाहरण के लिए, परमेश्वर द्वारा आमोस को बुलावा दिए जाने से पहले वह केवल “गाय–बैलों का चरवाहा, और गूलर के वृक्षों का छाँटने वाला था” (आमोस 7:14)। इसी तरह, जब यूहन्ना बपतिस्मा देने वाले से पूछा गया कि वह कौन है, तो उसने गवाही दी, मैं जंगल में पुकारने वाले की आवाज़ हूँ। मैं कुछ समय के लिए जलती और चमकती हुई जोत हूँ, लेकिन यीशु संसार की ज्योति हैं। मैं केवल मसीह की ओर इशारा करने वाली अंगुली हूँ; वह बढ़ता जाए और मैं घटता जाऊँ (यूहन्ना 1:23; 5:35; 3:30 देखें)।

हबक्कूक की पुस्तक के पहले पद में जिस शब्द का अनुवाद “भारी वचन” किया गया है, उसका अनुवाद कभी-कभी “बोझ” भी किया जाता है। यह बोझ क्या था? यह वही बोझ था जिसे भविष्यवक्ता ने परमेश्वर से मिली समझ के अनुसार कुछ परिस्थितियों को देखकर महसूस किया—ऐसी परिस्थितियों को जिन्हें दूसरे भी देख रहे थे, लेकिन समझ नहीं पा रहे थे। यह परमेश्वर की बुद्धि और योजनाओं को उन लोगों के सामने प्रस्तुत करने का बोझ भी था, जो उसे सुन रहे थे।

आज के समय में, जब लोग व्यक्तित्व और योग्यताओं पर अधिक ध्यान देते हैं, वहीं हमारा मुख्य ध्यान सुसमाचार प्रचार, शिक्षण, और साझा करने में इसके सन्देश पर होना चाहिए। हर प्रवचन, हर शिक्षण और हर सुसमाचार वार्तालाप घास की तरह मुरझा जाता है, लेकिन इसकी एकमात्र सच्ची कीमत तब सामने आती है जब परमेश्वर के अटल सत्य और विश्वसनीयता की जड़ें सुनने वाले के हृदय में जम जाती हैं। जैसा कि डेविड वेल्स लिखते हैं, “प्रचार—और परमेश्वर के वचन में से परमेश्वर के किसी भी सत्य का संवाद—कोई साधारण बातचीत या दिलचस्प विचारों की चर्चा नहीं है. . . नहीं! यह परमेश्वर की वाणी है! जब प्रचारक का मन पवित्रशास्त्र के पदों पर केन्द्रित होता है और उसका हृदय परमेश्वर की उपस्थिति में होता है, तब उसके मुख से निकलने वाले शब्दों में से स्वयं परमेश्वर बोल रहा होता है।”[1]

चाहे हमें प्रचार करने, सिखाने, या अपने पड़ोसी के साथ परमेश्वर का वचन साझा करने के लिए बुलाया गया हो, इस सन्देश में हमारे लिए एक महत्त्वपूर्ण शिक्षा है: हमारे भीतर सच्ची नम्रता होनी चाहिए, जो हमारे जीवन में परमेश्वर के जबरदस्त बुलावे की समझ में से उत्पन्न होती है। साथ ही, हमें इसमें उत्साह भी होना चाहिए, क्योंकि इस जीवन में इससे अधिक मूल्यवान कार्य और क्या हो सकता है? यह सन्देश हमसे बहुत बड़ा है, और लोगों के जीवन में इसके प्रभाव अनन्त काल तक बने रहेंगे। आज, सन्देशवाहक की अपनी योग्यताओं और क्षमताओं की चिन्ता न करें; बल्कि इस बात की चिन्ता करें कि परमेश्वर का सन्देश सही तरीके से साझा हो, चाहे वह किसी भी रूप में हो और किसी भी व्यक्ति के साथ हो।

  रोमियों 10:11-17 पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: होशे 1–4; मत्ती 18:1-20 ◊


[1] द करेज टू बी प्रोटेस्टेण्ट: ट्रुथ-लवर्स, मार्केटर्स ऐण्ड इमर्जेण्ट्स इन द पोस्टमोडर्न वर्ल्ड (आई.वी.पी., 2008), पृ. 230.

1 June : देवाच्या कृपेला उंचवणारा विश्वास

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1 June : देवाच्या कृपेला उंचवणारा विश्वास
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मी देवाची कृपा व्यर्थ करत नाहीं. (गलती 2:22)

मी लहानपणी समुद्रकिनारी असताना एका मोठ्या लाटेमुळें पाय सटकून पडलो, तेव्हां मला वाटलें कीं मी क्षणातच समुद्रात ओढला जाणार आहे.

ती खूप भीतीदायक गोष्ट होती. मी माझा तोल सावरू लागलो आणि पाहू लागलो कीं उभे कसे राहता येईल. पण लाटेचा जोर इतका शक्तिशाली होता कीं मी पोहू देखील शकत नव्हतो, आणि मी माझें पाय जमिनीवर ठेवू शकत नव्हतो. शिवाय, मी चांगला पोहू पण शकत नव्हतो.

मी भीतीच्या त्या अवस्थेंत असतांना मला एकच विचार आला : कोणी माझी मदत करील का? पण पाण्याच्या आतून मी कुणाला हाक पण मारू शकत नव्हतो.

जेव्हां माझ्या वडिलांनी माझ्या हाताला मजबुतीनें पकडलें, तो माझ्या जीवनातला सर्वात मधुर क्षण होता. मी त्यांच्या ताकती पुढे स्वता:ला पूर्णपणें आत्म-समर्पण केलें. मला उचलून धरण्याची त्यांची जी इच्छा होती तिचा मी आनंद घेऊ लागलो. मी त्यांचा प्रतिकार केला नाहीं.

माझ्या मनात हा विचार आला नाहीं कीं मी असें दाखवावे कीं स्थिति इतकीं पण वाईट नव्हती, आणि माझ्या वडीलांच्या हाताला मी पण माझी ताकत लावावी. मला इतकेच वाटत होते कीं, होय! मला तुमची गरज आहे! मी तुमचा आभारी आहे ! मला तुमचे सामर्थ्य आवडलें! मला तुमचा पुढाकार आवडला! मला तुमची पकड आवडली! तुम्हीं महान आहां!

आत्म-समर्पणाच्या त्या प्रीतिमध्यें कोणी आढ्यता मिरवू शकत नाहीं. आत्म-समर्पणाच्या त्या प्रीतिला मी “विश्वास” असें मानतो. आणि पाण्यात बुडत असताना मला ज्या साहाय्याची गरज होती, म्हणजें माझें वडील, ते देवाच्या भावी कृपेची प्रचिती होते, व हेच साहाय्य मला हवे होते. हाच तो विश्वास आहे जो कृपेला उंचवितो.

ख्रिस्ती जीवन कसे जगायचे याचा जेव्हां आपण विचार करतो तेव्हां ह्या विचाराला प्रथम स्थान दिलें गेलें पाहिजे कीं : मी देवाच्या कृपेला व्यर्थ न ठरवता तिला कसे उंचावू शकतो? याचे उत्तर पौल गलती 2:20:21 मध्यें देतो. “मी ख्रिस्ताबरोबर वधस्तंभावर खिळलेंला आहे; आणि ह्यापुढे मी जगतो असें नाहीं, तर ख्रिस्त माझ्या ठायी जगतो; आणि आता देहामध्यें जे माझें जीवित आहे ते देवाच्या पुत्रावरील विश्वासाच्या योगानें आहे; त्यानें माझ्यावर प्रीती केली व स्वत:ला माझ्याकरता दिलें. मी देवाची कृपा व्यर्थ करत नाहीं.”

त्याचे जीवन देवाची कृपा व्यर्थ करणारे का नव्हते? कारण तो देवाच्या पुत्रावर विश्वास ठेवणारे जीवन जगत होता. विश्वास सर्व लक्ष कृपेकडें निर्देशित करतो, ना कीं ती व्यर्थ करतो. 

31 मई : हम कभी आगे नहीं बढ़ते

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31 मई : हम कभी आगे नहीं बढ़ते
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“तुम जो पहले निकाले हुए थे और बुरे कामों के कारण मन से बैरी थे; उसने अब उसकी शारीरिक देह में मृत्यु के द्वारा तुम्हारा भी मेल कर लिया ताकि तुम्हें अपने सम्मुख पवित्र और निष्कलंक, और निर्दोष बनाकर उपस्थित करे। यदि तुम विश्‍वास की नींव पर दृढ़ बने रहो और उस सुसमाचार की आशा को जिसे तुम ने सुना है न छोड़ो, जिसका प्रचार आकाश के नीचे की सारी सृष्टि में किया गया, और जिसका मैं, पौलुस, सेवक बना।” कुलुस्सियों 1:21-23

21वीं सदी के पश्चिमी समाज के अधिकांश लोग यह कहेंगे कि कुल मिलाकर सब मनुष्य अच्छे हैं। हालाँकि, एक दिन का समाचार बहुत जल्दी इस धारणा को चुनौती दे देगा। और हमारे अपने जीवन में एक दिन भी इस दावे को कमजोर करने के लिए पर्याप्त होना चाहिए। क्योंकि यदि हम पूरी तरह से ईमानदार हों, तो हमें स्वीकार करना होगा कि हमारे अपने दिल नियन्त्रित नहीं हैं—और इस समस्या के लिए जो लोकप्रिय समाधान हैं, जैसे कि उच्च शिक्षा या सामाजिक परिस्थितियों में बदलाव, कभी भी परिस्थितियों को ठीक नहीं कर सकते। मनुष्यजाति लगातार एक अव्यवस्थित स्थिति में बनी हुई है।

जब हम बाइबल की ओर मुड़ते हैं, तो हम अपने बारे में एक कड़वा सच पाते हैं: क्या कारण है कि हम दूसरों से अलग-थलग महसूस करते हैं—क्या कारण है कि मैं कभी-कभी खुद से अलग-थलग महसूस करता हूँ—वह कारण यह है कि हम परमेश्वर से अलग-थलग हैं। हमारा क्षैतिज अलगाव हमारे गहरे और अधिक गम्भीर ऊर्ध्वाधर अलगाव का संकेत है। परमेश्वर ने हमें इसलिए बनाया था कि हम उसके साथ एक सम्बन्ध में रह सकें, फिर भी हमारे मन उससे दूर हो चुके हैं। हम उसके बारे में नहीं सोचते। हम उससे प्यार नहीं करते। हम उसे खोजते भी नहीं हैं।

फिर भी, एक अच्छी खबर है। पहले हम अपना जीवन बर्बाद कर रहे थे, लेकिन अब मसीह के अनुयायी बनकर हम नवीनीकरण पा चुके हैं। हम अलग-थलग थे, लेकिन अब हमारा पुनर्मिलन हो चुका है। हम अन्धेरे में जी रहे थे, लेकिन अब हम रोशनी में लाए गए हैं। हम फँसे हुए थे, और अब हम स्वतन्त्र किए गए हैं। हम मृत थे, और अब हम मसीह के साथ जीवित किए गए हैं। यह उन लोगों का अनुभव है जो परमेश्वर को वैसे जान गए हैं जैसे उसने अपने वचन के माध्यम से स्वयं को प्रकट किया है।

यह परिवर्तन केवल जीवन को नया रूप देने का निर्णय लेने का परिणाम नहीं है। किसी न किसी समय, हममें से अधिकांश लोगों ने सोचा होगा, “मैं एक नया पन्ना पलट रहा हूँ और बदलाव कर रहा हूँ। इस साल मैं पिछले साल से ज्यादा आभारी रहने वाला हूँ।” और यह अच्छा है! इसमें कोई बुराई नहीं है। हमारे मित्र और परिवार शायद इसे सुनकर खुश होंगे। लेकिन सिर्फ यह ही एक मसीही जीवन का अन्तिम लक्ष्य नहीं है। बल्कि मसीही जीवन में परिवर्तन परमेश्वर के उद्धारक अनुग्रह द्वारा प्रेरित और आरम्भ किया जाता है। हम उसी तरह आगे बढ़ते हैं, जैसे हमने आरम्भ किया था: अनुग्रह से।

सुसमाचार की खुशखबरी यह है कि यीशु नासरी हमारे लिए आया ताकि हमारे अलगाव को समाप्त करे। केवल उसने ही वह किया है जो हमें सबसे ज्यादा चाहिए था, लेकिन वह हम अपने लिए नहीं कर सकते थे। इसलिए हमें दिया गया बुलावा बहुत सरल है: “विश्‍वास की नींव पर दृढ़ बने रहो और उस सुसमाचार . . . को . . . न छोड़ो।” हमें कभी भी मसीह के क्रूस पर मरने, जी उठने, और राज्य करने के सरल सुसमाचार से आगे बढ़ने की आवश्यकता नहीं है; बल्कि हमें ऐसा करने का साहस भी नहीं करना चाहिए। और फिर भी, यह हमारे लिए कितना आसान है कि हम इन सच्चाइयों के प्रति ठण्डे पड़ जाते हैं; परिचितता यदि तिरस्कार न पैदा करे तो कम से कम आत्म-सन्तुष्टि का कारण अवश्य बन सकती है। इसलिए अपने दिल को ईमानदारी से जांचें। अपने पाप को स्वीकार करें। और एक बार फिर सुसमाचार की ओर लौटें, विस्मय में “कि तू, मेरे परमेश्वर, मेरे लिए मरने के लिए आया।”[1]

भजन 32

◊ पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: 2 राजाओं 24–25; मत्ती 17