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13 अगस्त : पश्चाताप का एक अनुस्मारक

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13 अगस्त : पश्चाताप का एक अनुस्मारक
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“तब नीनवे के मनुष्यों ने परमेश्‍वर के वचन की प्रतीति की; और उपवास का प्रचार किया गया और बड़े से लेकर छोटे तक सभों ने टाट ओढ़ा। तब यह समाचार नीनवे के राजा के कान में पहुँचा; और उसने सिंहासन पर से उठ, अपने राजकीय वस्त्र उतारकर टाट ओढ़ लिया, और राख पर बैठ गया।” योना 3:5-6

क्या आप कल्पना कर सकते हैं कि आपके देश का राष्ट्रपति या प्रधानमन्त्री एक राष्ट्रीय प्रसारण में पूरे राष्ट्र से आग्रह करे कि वे अपनी हिंसक गतिविधियाँ छोड़ दें, अपनी बुराइयों से विमुख हों, और परमेश्वर की दया की याचना करें ताकि वह आकर अपने न्याय से उन्हें बचा सके? वास्तव में, योना की आँखों के सामने नीनवे में यही हुआ।

यह वास्तव में आश्चर्यजनक है कि नीनवेवासियों ने परमेश्वर पर इतनी शीघ्रता और पूर्णता से विश्वास किया। जब उन्होंने योना द्वारा दिए गए न्याय के सन्देश को सुना, तो उनकी प्रतिक्रिया व्यापक और सच्चे हृदय से हुई थी, जिसे उनके पश्चाताप के वस्त्रों से देखा जा सकता था। और इस सार्वजनिक प्रतिक्रिया के अनुरूप ही राजा ने भी प्रतिक्रिया की थी। राजा ने अपने वस्त्र बदले और अपने राजसी वस्त्र उतारकर टाट ओढ़ लिए; उसने अपनी जगह बदली और अपने सिंहासन को छोड़कर धूल में बैठ गया; और उसने अपने शब्द बदले और पश्चाताप की घोषणा जारी कर दी।

यह यीशु के समय के लोगों, और शायद हमारे अपने समय के लोगों से बिल्कुल विपरीत है। स्वयं यीशु ने सिखाया कि नीनवेवासियों ने “योना का प्रचार सुनकर मन फिराया,” जबकि जिनसे यीशु ने बात की, उनमें से बहुतों ने यह पहचानने से इनकार कर दिया कि “देखो, यहाँ वह है जो योना से भी बड़ा है”—अर्थात स्वयं मसीह (लूका 11:32)। उन्होंने वह अस्वीकार कर दिया जो नीनवे के राजा ने समझ लिया था जब उसने कहा, वे . . . पश्चाताप करें। सम्भव है, परमेश्‍वर दया करे और अपनी इच्छा बदल दे, और उसका भड़का हुआ कोप शान्त हो जाए और हम नष्ट होने से बच जाएँ (योना 3:8-9)। राजा समझ गया था कि नीनवेवासियों के पश्चाताप का अर्थ यह नहीं था कि परमेश्वर अनिवार्य रूप से उन्हें क्षमा कर देगा। वह अब भी अनिश्चित था कि उनके पश्चाताप के साथ परमेश्वर भी अपना निर्णय बदलेगा या नहीं।

यह हमें एक महत्त्वपूर्ण सत्य की याद दिलाता है: यहाँ तक कि पश्चाताप करने वालों के पास भी परमेश्वर की स्वीकृति के लिए कोई दावा नहीं है। वे पूरी तरह से परमेश्वर के अनुग्रह पर निर्भर होते हैं। पश्चाताप क्षमा के लिए आवश्यक है, लेकिन यह उसे अर्जित नहीं करता। जैसे कि उड़ाऊ पुत्र ने कहा था, वैसे ही सच्चा पश्चाताप करने वाला व्यक्ति भी कहता है, “पिता जी, मैं ने स्वर्ग के विरोध में और तेरी दृष्‍टि में पाप किया है। अब इस योग्य नहीं रहा कि तेरा पुत्र कहलाऊँ” (लूका 15:18-19)। सच्चा पश्चाताप यह स्वीकार करने से आरम्भ होता है कि हम वास्तव में परमेश्वर के न्याय के योग्य हैं और हमें उसकी दया की अत्यन्त आवश्यकता है।

चूंकि “यहाँ वह है जो योना से भी बड़ा है,” इसलिए हम जान सकते हैं और घोषित कर सकते हैं कि पश्चाताप के उत्तर में हमेशा क्षमा ही मिलेगी, क्योंकि “जो कोई प्रभु का नाम लेगा, वह उद्धार पाएगा” (रोमियों 10:13)। लेकिन हमें इस गैर-यहूदी राजा से यह सीख लेना चाहिए कि हम अपने पश्चाताप या आज्ञाकारिता के द्वारा परमेश्वर को नियन्त्रित नहीं कर सकते, और यह कि सच्चा पश्चाताप केवल बाहरी नहीं बल्कि हृदय से होता है, जिसमें हमेशा हमारे दृष्टिकोण और व्यवहार में परिवर्तन शामिल होता है। यह एक ऐसा पाठ है जिसे हमें अपने मसीही जीवन के हर दिन अपनाना चाहिए—क्योंकि, जैसा कि मार्टिन लूथर ने कहा था, “जब हमारे प्रभु और उद्धारकर्ता यीशु मसीह ने कहा, ‘पश्चाताप करो,’ तो उसका आशय था कि विश्वासियों का पूरा जीवन पश्चाताप होना चाहिए।”[1]

  लूका 11:29-32

◊ पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: भजन 87– 88; 1 पतरस 3


[1] द नाइनटी-फाईव थेसिस, फर्स्ट थेसिस

13 August : चांगुलपणाचा प्रत्येक मनोदय विश्वासाने कसा पूर्ण होतो याची तीन उदाहरणें

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13 August : चांगुलपणाचा प्रत्येक मनोदय विश्वासाने कसा पूर्ण होतो याची तीन उदाहरणें
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ह्याकरता तर आम्हीं तुमच्यासाठीं सर्वदा अशी प्रार्थना करतो कीं, आपल्या देवानें तुम्हांला झालेंल्या ह्या पाचारणाला योग्य असे मानावे आणि चांगुलपणाचा प्रत्येक मनोदय व विश्वासाचे कार्य सामर्थ्याने पूर्ण करावे. (2 थेस्सलनीका 1:11)

जेव्हा पौल म्हणतो कीं देवानें…..चांगुलपणाचा प्रत्येक मनोदय व विश्वासाचे कार्य सामर्थ्याने पूर्ण करावे (तो आमच्या कर्मांना “विश्वासाची कार्ये” म्हणतो), तेव्हा त्याचा अर्थ आपण पापाचा पराभव करावा आणि आपण विश्वासाने नीतिमत्वाला योग्य अशी कर्मे करावी असा होतो, म्हणजेंच पुढील पाच मिनिटे, पाच महिने, पाच दशके आणि अनंतकाळ यां एकूणच सर्व टप्प्यांमध्यें देव ख्रिस्ताठायीं आपल्यासाठीं काय काय करेल अशी जी त्यानें आम्हांला अभिवचने दिलीं आहेंत त्यांवर आपण अवलंबून राहतो.

तुमच्या जीवनात ह्याचे परिदृश्य कसे दिसते याची तीन उदाहरणें पुढीलप्रमाणें आहेत :

1. जर तुम्हीं तुमच्या अंतःकरणांत त्याग व औदार्याने देण्याचे ठरविता, तर चांगुलपणाचा हा मनोदय पूर्ण करण्यासाठीं तुम्हांला देवाचे सामर्थ्य प्राप्त होईल कारण या संदर्भांत त्यानें भावी कृपा पुरविण्याची जी जी अभिवचनें दिलींत त्यांवर तुम्हीं विश्वास ठेवता, ती अभिवचनें अशी : “माझा देव आपल्या संपत्त्यनुरूप तुमची सर्व गरज ख्रिस्त येशूच्या ठायीं गौरवाच्या द्वारे पुरवील” (फिलिप्पै 4:19); आणि “जो उदार हाताने पेरील तो त्याच प्रमाणात कापणी करील” (2 करिंथकर 9:6); त्याचप्रमाणें, “तुमच्याजवळ सर्व गोष्टींत सदा, सर्व पुरवठा रहावा आणि प्रत्येक चांगल्या कामात तुम्हीं संपन्न व्हावे म्हणून देव तुम्हास सर्व प्रकारची कृपा पुरवण्यास समर्थ आहे ” (2 करिंथ 9:8).

2. जर तुम्हीं तुमच्या अंतःकरणांत पोर्नोग्राफीचा त्याग करण्याचे ठरविता, तर चांगुलपणाचा हा मनोदय पूर्ण करण्यासाठीं तुम्हांला देवाचे सामर्थ्य प्राप्त होईल कारण या संदर्भांत त्यानें भावी कृपा पुरविण्याची जी जी अभिवचनें दिलींत त्यांवर तुम्हीं विश्वास ठेवता, ती अभिवचनें अशी : “जे अंतःकरणाचे शुद्ध ते धन्य, कारण ते देवाला पाहतील” (मत्तय 5:8); आणि “तुझे संपूर्ण शरीर नरकात टाकले जावे यापेक्षा तुझ्या एका अवयवाचा नाश व्हावा हे तुझ्या हिताचे आहे” (मत्तय 5:29). हे किती बरे. अद्भुत कार्य. पूर्णपणें समाधान देणारे सामर्थ्याचे काम.

3. आणि जर तुम्हीं तुमच्या अंतःकरणांत असे ठरविता कीं जेव्हां जेव्हां संधी येईल, तुम्हीं ख्रिस्ताच्या साक्षीसाठीं आपलें तोंड उघडाल, तर चांगुलपणाचा हा मनोदय पूर्ण करण्यासाठीं तुम्हांला देवाचे सामर्थ्य प्राप्त होईल कारण या संदर्भांत त्यानें जी भावी कृपा पुरविण्याचे अभिवचन दिलें त्यावर तुम्हीं विश्वास ठेवता, ते अभिवचन असे, “जेव्हा तुम्हास अटक करतील तेव्हा काय बोलावे किंवा कसे बोलावे याविषयी काळजी करू नका. तेव्हा तुम्हीं काय बोलायचे ते तुम्हांला सांगितले जाईल” (मत्तय 10:19).

देवानें त्याच्या मौल्यवान अभिवचनांवर आपला दैनंदिन विश्वास वाढवावा – म्हणजें भावी कृपेविषयी असलेल्या त्याच्या अक्षय, रक्ताने विकत घेतलेल्या, व ख्रिस्ताला उंचविणाऱ्या अभिवचनांवर असलेला विश्वास.

12 अगस्त : दया का ऐलान

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12 अगस्त : दया का ऐलान
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“तब यहोवा का यह वचन दूसरी बार योना के पास पहुँचा : ‘उठकर उस बड़े नगर नीनवे को जा, और जो बात मैं तुझ से कहूँगा, उसका उस में प्रचार कर।’ तब योना यहोवा के वचन के अनुसार नीनवे को गया। नीनवे एक बहुत बड़ा नगर था, वह तीन दिन की यात्रा का था।” योना 3:1-3

परमेश्वर दूसरा मौका देने वाला परमेश्वर है।

योना ने अपनी अवज्ञा के कारण नीनवे को आने वाले न्याय के बारे में चेतावनी देने के लिए परमेश्वर की आवाज़ का पालन करने के बजाय भागने का निर्णय लिया। लेकिन जब बुलावा दूसरी बार आया, तो उसने दूसरी बार आलसी होकर काम नहीं किया। अपनी असफलता और परमेश्वर की कृपा को जानकर वह पहले ही अवसर पर उन्हें प्रचार करने के लिए तत्पर दिखाई दिया।

जब हम आखिरकार योना को लोगों को पश्चाताप का बुलावा देते हुए पढ़ते हैं, तो हम यह कल्पना कर सकते हैं कि उसके ऊपर अपने स्वयं के अनुभवों का बोझ कितना अधिक होगा, जब वह अवज्ञा पर आने वाले दिव्य न्याय के बारे में बता रहा होगा। उसने चेतावनी दी, और इसमें निश्चित रूप से यह व्यक्तिगत गवाही भी शामिल थी कि परमेश्वर पापी लोगों को भी सबसे कठिन परिस्थितियों में से बचाने के लिए इच्छुक और सक्षम है। हालाँकि वह बाद में यह साबित करेगा कि उसने परमेश्वर की कृपा की विशालता और सीमा को पूरी तरह से नहीं समझा था (योना 4:1-3), परन्तु परमेश्वर की जो कृपा योना पर हुई थी, वह निश्चित रूप से उसके सन्देश में नीनवेवासियों तक पहुँची थी। जिस व्यक्ति को जल-जन्तु के रूप में दिव्य प्रावधान से दूसरा मौका मिला था, उसने अब एक ऐसे नगर को दूसरा मौका दिया था जो परमेश्वर से पूरी तरह विमुख हो चुका था।

क्या आप यह समझ पाए हैं कि परमेश्वर दूसरा (और तीसरा और चौथा) मौका देने वाला परमेश्वर है? क्या आप यह समझ पाए हैं कि न तो आप परमेश्वर की कृपा से तेज भाग सकते हैं या न ही उसकी कृपा की अथाह गहराइयों में पहुँच सकते हैं? यदि आप यह समझ गए हैं, तो आप निश्चित रूप से दूसरों को सुसमाचार का सन्देश देंगे। और जिस तरह से आप इसे साझा करेंगे, वह परमेश्वर की दी हुई कृपा को दर्शाएगा। यदि मसीही लोग अपने विश्वास के बारे में बात करते हुए कठोर, दयाहीन और कर्मकाण्डवादी प्रतीत होते हैं, तो इसका अर्थ है कि उन्होंने अभी तक अपने दिलों को परमेश्वर की कृपा, अनुग्रह और प्रेम से पर्याप्त रूप से कोमल नहीं किया है। लेकिन यदि किसी मसीही के शब्दों और कार्यों में परमेश्वर की कृपा का आकर्षण और सौम्यता है, तो यह इस बात का पर्याप्त प्रमाण है कि उसने ऐसी कृपा को स्वयं अनुभव किया है।

भजन लेखक चार्ल्स वेस्ले ने, जिसे परमेश्वर की कृपा ने जीत लिया था, यह घोषणा की:

कृपा की गहराई! क्या मेरे लिए अब भी कृपा बची है?

क्या मेरा परमेश्वर अपने क्रोध को सह सकता है? मुझे, सबसे बड़े पापी को बचा सकता है?

मैंने लम्बे समय तक उसकी कृपा का विरोध किया है: लम्बे समय तक उसे क्रोध दिलाया है;

मैंने उसकी पुकारों को नहीं सुना; बार-बार असफलताओं से उसे दुखी किया . . .

उद्धारकर्ता मेरे लिए वहाँ खड़ा है, अपने घाव दिखाता है और अपने हाथ फैलाता है:

परमेश्वर प्रेम है! मैं जानता हूँ, मैं महसूस करता हूँ; यीशु रोता है, लेकिन फिर भी मुझसे प्रेम करता है।[1]

अभी परमेश्वर की कृपा पर विचार करें—कि कैसे वह आपको विश्वास तक लाया है, आपके प्रति धीरज धरता है और आपको क्षमा करता रहता है। उसके साथ आपके व्यवहार में जो आश्चर्य की भावना है, वह आपकी कहानी में झलकनी चाहिए जब आप दूसरों को उसकी उद्धारक प्रेम कथा सुनाते हैं। और यदि कोई ऐसा व्यक्ति है जिसे आप परमेश्वर की दया दिखाने में असफल रहे हों या जब अवसर था तब उसे उसके बारे में बताने से चूक गए हों, तो अब उसके लिए एक दूसरा अवसर मिलने की प्रार्थना करें—और जब वह अवसर मिले, तो उसे पकड़ लें।

  भजन 30

पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: भजन 84–86; 1 पतरस 2 ◊


[1] चार्ल्स वैस्ले, “डेप्थ ऑफ मर्सी” (1740).

12 August : माझा जीव देवासाठींतान्हेला झाला आहे

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12 August : माझा जीव देवासाठींतान्हेला झाला आहे
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हरिणी जशी पाण्याच्या प्रवाहांसाठीं लुलपते तसा हे देवा, माझा जीव तुझ्यासाठीं लुलपत आहे. माझा जीव देवासाठीं, जिवंत देवासाठीं तान्हेला झाला आहे; मी केव्हा देवासमोर येऊन त्याचे दर्शन घेईन? (स्तोत्र 42:1-2)

जी गोष्ट आपल्यासाठीं हा शास्त्रपाठ इतका प्रिय आणि इतका महत्त्वाचा बनवते ती ही कीं स्तोत्रकर्त्याचा जीव येथें मुख्यतः त्याच्या जीवावर उठून आलेंल्या संकटमय परिस्थितीतून मुक्त होण्यासाठीं तान्हेला झालेंला नाहीं. आपल्याला आपल्या शत्रूंपासून सुटका मिळावी किंवा त्यांचा नाश व्हावा यासाठीं त्याचा जीव प्रामुख्याने तान्हेला झालेंला नाहीं.

सुटकेसाठीं व्याकूळ होणें, आणि त्यासाठीं प्रार्थना करणें चुकींचे नाहीं. अनेक प्रसंगी शत्रूंच्या पराभवासाठीं प्रार्थना करणें योग्यच आहे. पण त्याहीपेक्षा महत्त्वाचा व्यक्ती जर कोणी असेल, ज्याच्यासाठीं आपला जीव तान्हेला व्हावयाला पाहिजे,  तर तो देव स्वतः आहे.

आपण स्तोत्रांवर मनन करतांना जेव्हां देवाविषयी विचार करतो आणि त्याला अनुभवतो, तेव्हा त्याचा मुख्य परिणाम पुढीलप्रमाणें होतो : आपण देवावर प्रीति करू लागतो, आणि देवाच्या दर्शनासाठीं व्याकूळ होऊन जातो, व देवासोबत राहण्याची उत्कंठा बाळगू लागतो, आणि देवाची प्रशंसा करण्यात आणि त्याच्यांत आनंद करण्यात समाधानी होऊं लागतो.

वचन 2 च्या शेवटचा संभाव्य अनुवाद असा आहे, “मी कधी येऊन साक्षात देवाचे मुख पाहीन?” या प्रश्नाचे अंतिम उत्तर योहान 14:9 आणि 2 करिंथ 4:4 मध्यें दिलेंलें आहे. तिथें येशूनें म्हटलें, “ज्याने मला पाहिले आहे त्यानें पित्याला पाहिले आहे.” तसेच पौल सुद्धा म्हणतो कीं आपण ख्रिस्तामध्यें रूपांतरित होऊं तेव्हा आपण “ख्रिस्त….त्याच्या गौरवी सुवार्तेचा प्रकाश” ह्याला पाहूं.

आपण ख्रिस्ताचे मुख पाहतो तेव्हा आपण देवाचे मुख पाहतो. आणि पौल 2 करिंथ 4: 4 आणि 6 मध्यें म्हणतो त्याप्रमाणें जेव्हा आपण ख्रिस्ताचे मरण व पुनरुत्थान याविषयीची सुवार्ता ऐकतो, तेव्हां आपण ख्रिस्ताच्या मुखावरील गौरव पाहतो. तो ह्या गोष्टीला “ख्रिस्ताच्या गौरवाची सुवार्ता, जो देवाची प्रतिमा आहे” असे म्हणतो. किंवा जसे तो पुढे वचन 6 मध्यें म्हणतो : “येशू ख्रिस्ताच्या मुखावरील देवाच्या गौरवाच्या ज्ञानाचा प्रकाश.”

देव करो, तुम्हींहि देवाचे मुख पाहण्यासाठीं भुकेलें आणि तान्हेले व्हावे व ती भूक व तहान अधिकाधिक वाढत जावी. आणि आजच देवाची प्रतिमा असलेल्या ख्रिस्ताच्या गौरवाच्या सुवार्तेद्वारे तो तुमची ही व्याकुळता (लुलपतपणा) तृप्त करो.

11 अगस्त : किनारा सामने है

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11 अगस्त : किनारा सामने है
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“तब योना ने उसके पेट में से अपने परमेश्‍वर यहोवा से प्रार्थना करके कहा, ‘मैं ने संकट में पड़े हुए यहोवा की दोहाई दी, और उस ने मेरी सुन ली है; अधोलोक के उदर में से मैं चिल्ला उठा, और तू ने मेरी सुन ली।’” योना 2:1-2

यह वचन संघर्षशील विश्वासियों के लिए हैं, प्रभु से विमुख हो चुके विश्वासियों के लिए है और हम में से उन लोगों के लिए है जो अपनी अवज्ञा के कारण गहरे संकट में हैं।

योना की पुस्तक का जोर योना की परेशानियों पर नहीं बल्कि परमेश्वर के प्रावधान पर है। परमेश्वर ने योना को उसके पाप और अवज्ञा से बचाने के लिए असाधारण उपायों का उपयोग किया। भविष्यद्वक्ता यह स्वीकार करता है कि यह परमेश्वर ही था जिसने उसे “गहरे सागर में समुद्र की थाह तक डाल दिया” (योना 2:3)। हाँ, यह नाविक थे जिन्होंने योना को समुद्र में फेंका था, लेकिन योना ने पहचाना कि जो कुछ भी हुआ था वह परमेश्वर के सर्वशक्तिमान हाथ के नीचे हुआ था और नाविक तो केवल परमेश्वर के कार्य का माध्यम बने थे। परमेश्वर ने उसका पीछा किया और उसे उफनते समुद्र में फेंक दिया ताकि वह उस स्थिति में आ सके जहाँ वह कह सके, “मैं ने संकट में पड़े हुए यहोवा की दोहाई दी, और उस ने मेरी सुन ली है।”

इसके अलावा, बड़े जल-जन्तु के पेट में भविष्यद्वक्ता ने परमेश्वर से अलग होने का दर्द महसूस किया, मानो वह कह रहा हो “मैं [उसके] सामने से निकाल दिया गया हूँ” (योना 2:4)। योना के लिए समुद्र में लगभग डूब जाने का शारीरिक आतंक और जल-जन्तु द्वारा निगले जाने का भय उतना अधिक नहीं था, जितना उसके परमेश्वर से सदा के लिए अलग हो जाने का था। योना परमेश्वर के प्रेम को जानता था; वह जानता था कि परमेश्वर की उपस्थिति में होना क्या होता है। वह यह समझ गया था कि परमेश्वर से अलग होने का क्या अर्थ होता है, हालाँकि उसने स्वयं ही परमेश्वर से अलग होने का चुनाव किया था—और यही पाप का विकृत पहलू है।

यह हमारे लिए कितना महत्त्वपूर्ण सन्देश है! जब हम परमेश्वर से दूर हो जाते हैं, तो वह हमसे मिलने के लिए आँधियों और घाटियों में आता है, जो हमारी परिस्थितियों को बदलता है ताकि वह हमारा ध्यान आकर्षित कर सके, जो हमें अकेला और अलग महसूस करने देता है, ताकि हम कह सकें, “यह वह स्थान नहीं है जहाँ मुझे होना चाहिए। यह वह नहीं है जो परमेश्वर मेरे लिए चाहता है। मैं इस परिस्थिति से बाहर नहीं निकल सकता। लेकिन वह सक्षम है।”

आज आप गहरी असफलता और पछतावे की भावना से जूझ रहे हो सकते हैं। आप भाग रहे थे। आपने परमेश्वर की स्पष्ट आवाज़ की अवज्ञा की और छिपने की कोशिश की। लेकिन आपकी कहानी वहीं खत्म नहीं होनी चाहिए। अपनी कृपा और दया में परमेश्वर तय कर चुका है कि वह आपको बचाएगा और उस कार्य को पूरा करेगा, जिसे उसने आपके जीवन में आरम्भ किया है (फिलिप्पियों 1:6)। मसीही जीवन में हमेशा पश्चाताप की आवश्यकता होती है, लेकिन कभी भी निराश होने का कोई कारण नहीं होता।

जब योना किनारे पर पहुँचा, तो यह इसलिए नहीं हुआ क्योंकि वह इसके योग्य था। यह परमेश्वर के अनुग्रह के कारण हुआ था। इसी तरह, केवल परमेश्वर ही है जो हमारे पाप और अवज्ञा में हमारे पास आता है, ताकि वह हमें शुद्ध करे, हमें बचाए और उसके उद्देश्यों के लिए हमें फिर से स्थापित करे। क्या आप आज किनारा देख पा रहे हैं?

योना 2

◊ पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: भजन 81– 83; 1 पतरस 1

11 August : कृपेचे भिन्न काळ

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11 August : कृपेचे भिन्न काळ
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ह्याकरता तर आम्हीं तुमच्यासाठीं सर्वदा अशी प्रार्थना करतो कीं, आपल्या देवानें तुम्हांला झालेंल्या ह्या पाचारणाला योग्य असे मानावे आणि चांगुलपणाचा प्रत्येक मनोदय व विश्वासाचे कार्य सामर्थ्याने पूर्ण करावे; ह्यासाठीं कीं, आपला देव व प्रभू येशू ख्रिस्त ह्यांच्या कृपेने आपला प्रभू येशू ह्याच्या नावाला तुमच्या ठायीं व तुम्हांला त्याच्या ठायीं गौरव मिळावा. (2 थेस्सलनीका 1:11-12)

कृपा ही देवाची केवळ अशी प्रवृत्ती नाहीं कीं आपण पात्र नसतांनाहि तो आपलें कल्याण करतो – आपण तिला “आमच्या प्रतिकूलतेंत पात्र नसतांनाहि आम्हांसाठीं देवाची अनुकूलता” असे म्हणतो; तर देवाची कृपा ही देवाकडून येणारे सामर्थ्य देखील आहे जे आपल्या जीवनात कार्य करते आणि आपल्यामध्यें आणि आपल्यासाठीं चांगल्या गोष्टी घडवते – आणि ह्या कृपेस देखील आपण पात्र नसतो.

पौलाने म्हटले कीं आपल्यात चांगुलपणाचा प्रत्येक मनोदय हा देवाच्या “सामर्थ्याने” पूर्ण होतो (वचन 11). आणि मग तो वचन 12 च्या शेवटी असे म्हणतो, “आपला देव व प्रभू येशू ख्रिस्त ह्यांच्या कृपेने.”  हे सामर्थ्य जे आमच्यांत ख्रिस्ताला उंचविणारी आज्ञाधारकता निर्माण करण्यासाठीं आमच्या जीवनात प्रत्यक्षात कार्य करते, देवाच्या कृपेने घडून येणारे परिश्रम आहे.

आपण हे 1 करिंथ 15:10 मध्यें देखील पाहू शकता:

तरी जो काहीं मी आहे तो देवाच्या कृपेने आहे आणि माझ्यावर त्याची जी कृपा झाली आहे ती व्यर्थ झाली नाहीं; परंतु ह्या सर्वांपेक्षा मी अतिशय श्रम केलें, ते मी केलें असे नाहीं, तर माझ्याबरोबर असणार्‍या देवाच्या कृपेने केलें.

तर मग, कृपा ही एक सक्रिय, सदैव उपस्थित, जीवन बदलून टाकणारी, आज्ञाधारक शक्ती आहे.

म्हणून, ही कृपा, जी वेळोवेळी देवाकडून तुमच्याकडें सामर्थ्याने वाहत येते, ती गतकालीन व भावी अशी दोन्ही स्वरुपाची आहे. ज्याअर्थी तिच्याद्वारे आपल्यासाठीं किंवा आपल्या अंतकरणात पूर्वी काहींतरी घडवून आणिले गेलें, म्हणून ती गतकालीन कृपा म्हटली जाते. आणि ज्याअर्थी आता त्यांच कृपेद्वारे आपल्यासाठीं किंवा आपल्या अंतकरणात वर्तमान समयी काहींतरी घडवून आणिले जात आहे म्हणून, तिला भावी कृपा म्हटले जाते – आतापासून पुढे पाच सेकंद आणि आतापासून पुढे पाच दशलक्ष वर्षे, दोनहि.

देवाची कृपा ही कृपेच्या अक्षय झऱ्यातून वाहणाऱ्या वर्तमानाच्या धबधब्यावरून सतत झिरपत असते जी आमच्यावर भूतकाळात झालेंल्या कृपेच्या सतत वाढत जाणाऱ्या जलाशयातून भविष्याकडून आमच्याकडें वाहत येत आहे. पुढच्या पाच मिनिटांत, तुम्हांला भविष्याकडून येणारी सांभाळ करणारी कृपा प्राप्त होईल — तुमचा यावर विश्वास आहे; तसेच भूतकाळात झालेंल्या कृपेच्या जलाशयाकडून आणखी पाच मिनिटांची कृपा तुमच्या खाती जमा होईल – यासाठीं तुम्हीं देवाचे आभार मानता.

10 अगस्त : समस्त सृष्टि का प्रभु

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10 अगस्त : समस्त सृष्टि का प्रभु
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“योना यहोवा के सम्मुख से तर्शीश को भाग जाने के लिए उठा, और याफा नगर को जाकर तर्शीश जानेवाला एक जहाज़ पाया; और भाड़ा देकर उस पर चढ़ गया कि उनके साथ यहोवा के सम्मुख से तर्शीश को चला जाए। तब यहोवा ने समुद्र में एक प्रचण्ड आँधी चलाई, और समुद्र में बड़ी आँधी उठी, यहाँ तक कि जहाज़ टूटने पर था।” योना 1:3-4

हम सृष्टि पर नियन्त्रण नहीं रखते। लेकिन परमेश्वर रखता है—और इसलिए वह हमारी सारी प्रशंसा और आराधना के योग्य है।

महासागरों पर—वास्तव में सम्पूर्ण सृष्टि पर—परमेश्वर का नियन्त्रण भजनकारों के कार्य में निरन्तर प्रशंसा का कारण था। जब हम भजनों को पढ़ते हैं, तो हम बार-बार पाते हैं कि सृष्टि की रचना पर, महासागरों पर, यहाँ तक कि उनके ज्वारों और लहरों के उतार-चढ़ाव पर भी परमेश्वर के नियन्त्रण रखने के परम सामर्थ्य की प्रशंसा करने में परमेश्वर के लोग आनन्दित होते हैं।

उदाहरण के लिए हम भजन 33 में देखते हैं कि “वह समुद्र का जल ढेर के समान इकट्ठा करता; वह गहिरे सागर को अपने भण्डार में रखता है” (पद 7)। यह एक नाटकीय चित्र है—और यह परमेश्वर की उत्कृष्टता और महिमा का हिस्सा है। जैसे हम एक जग नींबू पानी को हिला कर उसे एक बर्तन में से दूसरे बर्तन में डाल सकते हैं, वैसे ही सर्वशक्तिमान परमेश्वर पृथ्वी के सभी महासागरों को इकट्ठा करके मटकों में रख सकता है। इसलिए यह कितना सही और उचित है कि हम अपने सृष्टिकर्ता परमेश्वर की आराधना श्रद्धा और आदर के साथ करें!

इसी तरह, सृष्टि पर परमेश्वर की सत्ता हमें उसके प्रावधान पर विश्वास करने के लिए प्रोत्साहित करती है। योना की कहानी में आगे हम पाते हैं कि प्रभु ने “रेंड़ का पेड़ उगाकर बढ़ाया,” परमेश्‍वर ने “एक कीड़े को भेजा,” और “परमेश्‍वर ने पुरवाई बहाकर लू चलाई” ताकि वह योना और नीनवे के लोगों के लिए अपनी योजनाओं को पूरा कर सके (योना 4:6-8)। यह उस समय के और आज के परमेश्वर-विहीन लोगों की मानसिकता से बहुत अलग है।

योना के जहाज के चालक समुद्र को एक अप्रत्याशित और निरंकुश प्राचीन शक्ति मानते थे, जिसकी दया पर वे सभी बन्दी थे। उसी तरह, आज हम इस विचार का सामना करते हैं कि “प्रकृति माँ” एक ऐसी निर्दयी ताकत है, जिसे वश में नहीं किया जा सकता। लेकिन सच्चाई यह है कि सभी चीजें, सम्पूर्ण सृष्टि, परमेश्वर के सेवक हैं (भजन 119:91)। हम भाग्य के सागर में बहने या अंधी, निराकार शक्तियों के प्रहार सहने के लिए छोड़ नहीं दिए गए हैं। नहीं, परमेश्वर “तारों को गिनता, और उनमें से एक-एक का नाम रखता है” (भजन 147:4)।

केवल सर्वशक्तिमान सृष्टिकर्ता प्रभु ही सागर को ढेरों में इकट्ठा कर सकता है और सम्पूर्ण सृष्टि को अपने निर्देशों का पालन करने का आदेश दे सकता है। केवल यही नहीं, वह अपने आदेशों को अपने लोगों के भले के लिए निर्देशित करता है। वह बड़ा तूफान जिसे परमेश्वर ने समुद्र पर भेजा था, जब योना का जहाज तर्शीश की ओर जा रहा था, वह उसके ऊपर शाप नहीं था, बल्कि यह उसे अपने परमेश्वर के प्रति विश्वासपूर्वक आज्ञाकारिता में वापस लौटने के लिए एक पुकार थी। जो कुछ परमेश्वर ने योना पर भेजा, उससे परमेश्वर ने उसे बचाया भी। कितना अद्‌भुत है: परमेश्वर ने एक बड़ी आँधी की शक्ति को केवल एक भटके हुए बच्चे को घर वापस लाने के लिए बुलाया।

सचमुच, सभी चीजें परमेश्वर की महिमा और उसके लोगों के भले के लिए व्यवस्थित हैं—जिसमें आप भी शामिल हैं। यही वह परमेश्वर है जिसकी हम वन्दना करते हैं, यही वह परमेश्वर है जिस पर हम विश्वास करते हैं, और यही वह परमेश्वर है जिसे हम अपने जीवन अर्पित करते हैं। आज इस सत्य को अपनी जुबान पर रखें: “यहोवा महान और अति स्तुति के योग्य है, और उसकी बड़ाई अगम है” (भजन 145:3)।

भजन 145

पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: भजन 79– 80; प्रेरितों 28 ◊

10 August : हे देवा, माझ्यावर कृपा कर

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10 August : हे देवा, माझ्यावर कृपा कर
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हे देवा, तू आपल्या वात्सल्याला अनुसरून माझ्यावर कृपा कर; तू आपल्या विपुल करुणेंला अनुसरून माझे अपराध काढून टाक. (स्तोत्र 51:1)

तीनदा : “कृपा कर,” ” आपल्या वात्सल्याला अनुसरून,” आणि ” आपल्या विपुल करुणेंला अनुसरून.”

निर्गम 34:6-7 मध्यें देवानें हे अभिवचन दिलें होते:

“परमेश्वर, परमेश्वर, दयाळू व कृपाळू देव, मंदक्रोध, दयेचा व सत्याचा सागर, हजारो जणांवर1 दया करणारा, अन्याय, अपराध व पाप ह्यांची क्षमा करणारा, (पण अपराधी जनांची) मुळीच गय न करणारा, असा तो वडिलांच्या दुष्टाईबद्दल पुत्रपौत्रांचा तिसर्‍या व चौथ्या पिढीपर्यंतही समाचार घेतो.”

दाविदाला ठाऊक होते कीं काहीं अपराधी असे आहेंत कीं त्यांना क्षमा केलीं जाणार नाहीं. त्याचप्रमाणें, त्याला हेही ठाऊक होते कीं काहीं अपराधी असे आहेंत कीं ज्यांच्या तारणासाठीं केलेंल्या काहीं गूढ कार्यामुळें त्यांचे अपराध गणिले जाणार नाहींत, तर त्यांना क्षमा केलीं जाईल. स्तोत्र 51 मध्यें तो देवाच्या कृपेच्या यांच रहस्याला दृढ धरून ठेवत आहे.

“हे देवा, तू आपल्या वात्सल्याला अनुसरून माझ्यावर कृपा कर; तू आपल्या विपुल करुणेंला अनुसरून माझे अपराध काढून टाक.” दाविदाला या मुक्तीच्या रहस्याचे जितके गूढ ठाऊक होते, त्यापेक्षा अधिक आता आपल्याला या मुक्तीच्या रहस्याचे गूढ ठाऊक आहे. आम्हीं ख्रिस्ताला ओळखतो. तरी त्या करुणेंला मात्र आपण त्याच्याप्रमाणेंच दृढ धरून ठेवतो.

आपल्या असहाय स्थितींत एक निर्णायक गोष्ट जी तो करतो ती म्हणजें देवाची करुणा व प्रीति ह्यांकडें वळणें. आज याचा अर्थ आपल्या असहाय स्थितींत ख्रिस्ताकडें वळणें असा होतो, ज्याने त्याच्या स्वतःच्या रक्ताने आपल्याला आवश्यक असलेली सर्व करुणा प्राप्त करून घेतलीं.

9 अगस्त : अवज्ञा और हिचकिचाहट

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9 अगस्त : अवज्ञा और हिचकिचाहट
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“योना यहोवा के सम्मुख से तर्शीश को भाग जाने के लिए उठा, और याफा नगर को जाकर तर्शीश जाने वाला एक जहाज़ पाया; और भाड़ा देकर उस पर चढ़ गया कि उनके साथ यहोवा के सम्मुख से तर्शीश को चला जाए।” योना 1:3

अवज्ञा का मार्ग हमेशा एक नीचे की ओर जाने वाला मार्ग होता है—जब तक कि परमेश्वर हस्तक्षेप नहीं करता।

योना ने जब नीनवेवासियों को पश्चाताप का सन्देश देने के लिए प्रभु के आदेश से भागने की जल्दी की, तो वह नीचे की ओर “याफा नगर को” गया, जहाज़ के “निचले भाग में” उतर गया और फिर नीचे “पहाड़ों की जड़ तक पहुँच गया” (योना 2:6), जहाँ वह जल-जन्तु के पेट में बन्द हो गया था।

जब परमेश्वर से भागने की कोशिश में योना जहाज के निचले भाग में गहरी नींद में सो रहा था, “तब यहोवा ने समुद्र में एक प्रचण्ड आँधी चलाई . . . यहाँ तक कि जहाज़ टूटने पर था” (1:4)। फिर भी, प्रचण्ड तूफान और नाविकों की उत्तेजित गतिविधियों के बीच—जो चिल्ला रहे थे, रो रहे थे, प्रार्थना कर रहे थे, और अपना सामान समुद्र में फेंक रहे थे—योना सो रहा था।

योना इतना थका हुआ कैसे हो सकता था? निश्चित रूप से, वह परमेश्वर से भागने के अपने निर्णय के कारण शारीरिक और मानसिक रूप से थक गया होगा। जबकि अवज्ञा उस पल में रोमांचक हो सकती है—यह एक क्षणिक उत्तेजना दे सकती है—परन्तु अन्त में यह हमेशा थकावट का कारण बनती है। यह पैने पर लात मारने जैसा होता है (प्रेरितों 26:14)। परमेश्वर के वचन के विरुद्ध हमारे विद्रोह के बाद और फिर हर किसी से छुपने की इच्छा में बिस्तर की एकान्तता में शरण लेने के बाद जो नींद आती है, उससे अधिक दुखदायी या निराशाजनक नींद शायद ही कोई और हो।

योना चाहता था कि परमेश्वर उसे अकेला छोड़ दे। परन्तु परमेश्वर बहुत दयालु था कि उसने ऐसा नहीं किया। इसलिए परमेश्वर ने एक तूफान भेजा और उस तूफान ने जहाज के कप्तान को योना को खोजने और उसे जगाने के लिए भेजा। कप्तान ने वही शब्द इस्तेमाल किया जो परमेश्वर ने पहले योना से कहा था: “उठ, अपने देवता की दोहाई दे!” (योना 1:6, विशेष रूप से बल दिया गया है; 1:2 से तुलना करें)।

यहाँ हमें एक बड़ी हिचकिचाहट का चित्र देखने को मिलता है—न केवल योना द्वारा उसे दिए गए काम को पूरा करने की हिचकिचाहट, बल्कि परमेश्वर की हिचकिचाहट भी, जो अपने सेवक को उसकी पापी हालत और दुखों में अकेला नहीं छोड़ना चाहता। वे तीन दिन, जो योना को विशाल जल-जन्तु के पेट में बिताने थे, इस सत्य का और भी प्रमाण देते हैं। यद्यपि योना की अवज्ञा के कारण दण्ड मिलना चाहिए था, परमेश्वर जल्द ही उसे समुद्र में नष्ट होने से बचाने वाला था और उसे वापिस भेजने वाला था, ताकि वह नीनवेवासियों में न्याय और दया का सन्देश प्रचार कर सके।

परमेश्वर हमारी अवज्ञा में बार-बार हमारे पास आता है और हमें हमारे पाप में धसने नहीं देता। भले ही हम अपनी अंगुलियाँ अपने कानों में डालकर यह दिखाएँ कि हम उसे नहीं सुन रहे हैं और भले ही हम पूरी तरह से उसकी आज्ञा मानने से मना कर दें, परमेश्वर अपने भटकते हुए बच्चों का पीछा करता है। वह हमें इतना प्यार करता है कि वह हमें हमारी अपनी चालों में छोड़ना नहीं चाहता। हम अपने पाप में फँसे रहकर परमेश्वर की दया से भाग नहीं सकते, क्योंकि वह हमें कभी नहीं छोड़ेगा और कभी नहीं त्यागेगा।

योना 1

◊ पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: भजन 77–78; प्रेरितों 27:27-44

9 August : शुभवर्तमानाचा शेवट

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9 August : शुभवर्तमानाचा शेवट
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तर आता त्याच्या रक्ताने नीतिमान ठरवण्यात आल्यामुळें आपण विशेषेकरून त्याच्या द्वारे देवाच्या क्रोधापासून तारले जाणार आहोत. कारण आपण शत्रू असता देवाबरोबर त्याच्या पुत्राच्या मृत्यूद्वारे आपला समेट झाला, तर आता समेट झाला असता त्याच्या जीवनाने आपण विशेषेकरून तारले जाणार आहोत; इतकेच केवळ नाहीं, तर ज्याच्या द्वारे समेट ही देणगी आपल्याला आता मिळाली आहे त्या आपल्या प्रभू येशू ख्रिस्ताच्या द्वारे आपण देवाच्या ठायीं अभिमान बाळगतो. (रोमकरांस 5:9-11)

आपल्याला कशापासून तारले जाण्याची गरज आहे? वचन 9 ह्या प्रश्नाचे स्पष्ट उत्तर देते : देवाच्या क्रोधापासून. “तर आता त्याच्या रक्ताने नीतिमान ठरवण्यात आल्यामुळें आपण विशेषेकरून त्याच्या द्वारे देवाच्या क्रोधापासून तारले जाणार आहोत.” पण शुभवर्तमानाचा सर्वोच्च, सर्वोत्कृष्ट, पूर्ण, व सर्वात समाधानकारक पुरस्कार केवळ हाच आहे का?

नाहीं, कारण पुढे वचन 10 असें म्हणते, “तर आता….त्याच्या जीवनाने आपण विशेषेकरून तारले जाणार आहोत.” मग पुढे वचन 11 निष्कर्षावर येऊन सुवार्तेचा परम शेवट आणि उद्देश काय ते सांगते : “इतकेच केवळ नाहीं… तर… आपण देवाच्या ठायीं अभिमान बाळगतो.”

शुभवर्तमानाचा अंतिम आणि सर्वोच्च चांगुलपणा हांच आहे. “इतकेच केवळ नाहीं” ह्यानंतर काहींही शिल्लक किंवा अपूर्ण असे काहींही नाहीं. आपलें हे तारण कसे घडून येते हे सांगणें येथें पौलाचा मुख्य हेतू आहे, “ज्याच्या द्वारे समेट ही देणगी आपल्याला आता मिळाली आहे त्या आपल्या प्रभू येशू ख्रिस्ताच्या द्वारे.”

सुवार्तेचा शेवट हा कीं “आपण देवाच्या ठायीं अभिमान बाळगतो.” शुभवर्तमानांत जाहिर केलेंलीं सर्वोच्च, पूर्ण, सखोल, गोड अशी जी गोष्ट आहे ती म्हणजें देव स्वतः, ज्याच्या ठायीं तारलेले सर्व लोग अभिमान बाळगतांत.

परमेश्वर ख्रिस्तामध्यें खंडणी झाला (रोमकरांस 5:6-8), आणि परमेश्वर ख्रिस्तामध्यें पुरस्कारहि बनला (रोमकरांस 5:11).

सुवार्ता ही आनंदाची बातमी आहे कीं देवानें आपल्यासाठीं देवाचा सार्वकालिक आनंद खंडणी देऊन विकत घेतला आहे.