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21 September : चिंते विरुद्ध लढण्यासाठीं शस्त्रसामग्री किंवा  दारूगोळा

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21 September : चिंते विरुद्ध लढण्यासाठीं शस्त्रसामग्री किंवा  दारूगोळा
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कशाविषयीही चिंताक्रांत होऊ नका, तर सर्व गोष्टींविषयी प्रार्थना व विनंती करून आभारप्रदर्शनासह आपली मागणी देवाला कळवा. (फिलिप्पै 4:6)

आपण आपल्या विनंत्या देवाला कळवतो तेव्हा आपण ज्या गोष्टींसाठीं आभारप्रदर्शन करतो त्यांपैकीं एक म्हणजें त्यानें आम्हांला दिलेंली त्याची अभिवचनें. ही अभिवचनें तोफेत वापरला जाणारा दारूगोळा आहेत जीं चिंतेला जन्म देणाऱ्या अविश्वासाला ध्वस्त करतांत. म्हणून, मी कसा युद्ध करतो ती नीति येथे आहे.

माझी सेवा निरुपयोगी आणि व्यर्थ आहे या विषयीं मी चिंताक्रांत होऊन जातो तेव्हां मी यशया 55:11 मध्यें असलेले अभिवचन घेऊन अविश्वासाशी लढतो. “त्याप्रमाणें माझ्या मुखातून निघणारे वचन होईल; ते माझी इच्छा पूर्ण केल्यावाचून व ज्या कार्यासाठीं मी ते पाठवले ते केल्यावाचून माझ्याकडें विफल होऊन परत येणार नाहीं.”

मी माझे कार्य करण्याच्या बाबतीत अशक्त आहे अशी मला चिंता वाटू लागते, तेव्हा मी ख्रिस्तानें दिलेंलें हे अभिवचन घेऊन अविश्वासाशी लढतो, “माझी कृपा तुला पुरेशी आहे; कारण अशक्तपणातच माझी शक्ती पूर्णतेस येते” (2 करिंथ 12:9).

मला भविष्याविषयी निर्णय घ्यायचे असतांत आणि मी त्यांविषयी चिंताग्रस्त असतो, तेव्हा मी हे अभिवचन घेऊन अविश्वासाशी लढतो, “मी तुला बोध करीन; ज्या मार्गाने तुला गेले पाहिजे त्याचे शिक्षण तुला देईन; मी आपली दृष्टी तुझ्यावर ठेवून तुला बुद्धिवाद सांगेन” (स्तोत्र 32:8).

जेव्हां मीं माझ्या विरोधकांना तोंड देण्याविषयीं चिंताक्रांत असतो, तेव्हा मी हे अभिवचन घेऊन अविश्वासाशी लढतो, “देव आपल्याला अनुकूल असल्यास आपल्याला प्रतिकूल कोण?” (रोमकरांस 8:31).

मी ज्यांच्यावर प्रीति करतो त्यांच्या कल्याणासाठीं मीं चिंताक्रांत असतो, तेव्हा मी हे अभिवचन घेऊन अविश्वासाशी लढतो कीं, मीं वाईट असताना आपल्या मुलाबाळांना चांगल्या देणग्या देणें मला समजते, “तर तुमच्या स्वर्गातील पित्याजवळ जे मागतांत त्यांना तो किती विशेषेकरून चांगल्या देणग्या देईल!” (मत्तय 7:11).

आणि मी माझे आध्यात्मिक जीवन स्थिर राखण्यासाठीं स्वतःला हे अभिवचन स्मरण देऊन लढतो कीं ज्याने ज्याने ख्रिस्ताकरितां आपलें घर किंवा भाऊ किंवा बहिणी किंवा आई किंवा वडील किंवा मुले किंवा शेती सोडली आहे, “अशा प्रत्येकाला सांप्रतकाळी छळणुकींबरोबर शंभरपटीने घरे, भाऊ, बहिणी, आया, मुले, शेते आणि येणार्‍या युगात सार्वकालिक जीवन मिळाल्याशिवाय राहणार नाहीं” (मार्क 10:29-30).

जेव्हा मी आजारी असण्याविषयीं चिंताक्रांत होतो, तेव्हा मी हे अभिवचन घेऊन अविश्वासाशी लढतो, “नीतिमानाला फार कष्ट होतांत, तरी परमेश्वर त्या सर्वांतून त्याला सोडवतो” (स्तोत्र 34:19).

आणि मी थरथर कापत हे अभिवचन स्मरण करतो : “कीं, संकटाने धीर, धीराने शील व शीलाने आशा निर्माण होते; आणि ‘आशा लाजवत नाहीं;’ कारण आपल्याला दिलेंल्या पवित्र आत्म्याच्या द्वारे आपल्या अंतःकरणात देवाच्या प्रीतिचा वर्षाव झाला आहे” (रोमकरांस 5:3-5).

20 सितम्बर : स्वीकार करना कि हम दीन हैं

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20 सितम्बर : स्वीकार करना कि हम दीन हैं
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“तब उसने अपने चेलों की ओर देखकर कहा, ‘धन्य हो तुम जो दीन हो, क्योंकि परमेश्‍वर का राज्य तुम्हारा है।’” लूका 6:20

यीशु उस वस्तु को महत्त्व देता है जिसे संसार तुच्छ समझता है, और जिसे संसार सराहता है, उसे यीशु अस्वीकार करता है।

यही है धन्य-वचनों की सबसे बड़ी चुनौती, और विशेष रूप से तब जब यीशु धन-सम्पत्ति के विषय में सिखाता है। हम एक ऐसे संसार में जीते हैं जो हमें लगातार यह कहता है कि हम अपनी पहचान विशेष रूप से वित्तीय सफलता और भौतिक सुख-सुविधाओं में खोजें। आराम और सुविधा इस उपभोक्तावादी संस्कृति का राजा है—और यह संस्कृति वह जल है, जिसमें हम सब तैर रहे हैं।

इसलिए यीशु के इस उपदेश के आरम्भिक शब्द हमें चुनौती देते हैं: “धन्य हो तुम जो दीन हो।” वह क्या कहना चाह रहा है? क्या वह सिखा रहा है कि दीन-दरिद्रता उद्धार की कुंजी है? बिल्कुल नहीं! बल्कि वह यह समझा रहा है कि जो व्यक्ति अपनी आत्मिक दरिद्रता को पहचान लेता है, वही परमेश्वर के राज्य में प्रवेश करता है।

कुछ लोग दावा करते हैं कि यीशु का अर्थ यह है कि यदि आप दरिद्र हैं, तो आपको अत्यन्त प्रसन्न होना चाहिए क्योंकि आप स्वर्ग के राज्य में स्वाभाविक रूप से ही प्रवेश कर जाते हैं। लेकिन इस प्रकार की दरिद्रता परमेश्वर के राज्य में प्रवेश की कुंजी नहीं है और न ही धन-सम्पत्ति किसी के बाहर रह जाने का मुख्य कारण है। वास्तविकता तो यह है कि दरिद्र और धनवान—दोनों को ही जब यह अहसास होता है कि उन्हें उनके पापों के लिए क्षमा की आवश्यकता है और जब वे यीशु मसीह पर विश्वास करते हैं, तभी वे परमेश्वर के राज्य में प्रवेश पाते हैं। यदि ऐसा न होता, तो फिलिप्पी में रहने वाली एक समृद्ध व्यापारी स्त्री लुदिया कभी सुसमाचार की सच्चाई को न समझ पाती (प्रेरितों 16:11-15)। नहीं, आवश्यक यह है कि हम मसीह के बिना अपनी आत्मिक दरिद्रता को पहचानें।

हालाँकि यह समझना भी आवश्यक है कि वित्तीय दरिद्रता आत्मिक आशीष का माध्यम बन सकती है। दरिद्रता अक्सर मनुष्यों को परमेश्वर पर सम्पूर्ण निर्भरता की ओर ले जाती है—न केवल भौतिक आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए, बल्कि आत्मिक आशिषों के लिए भी। यही कारण है कि दरिद्र वर्ग में सुसमाचार को लेकर अधिक सकारात्मक और विनम्र प्रतिक्रिया देखने को मिलती है, जबकि भौतिक समृद्धि हमारी गहरी आत्मिक आवश्यकता को, अर्थात् परमेश्वर के राज्य में प्रवेश पाने की आवश्यकता को ढँक सकती है। धन अक्सर गर्व के पनपने की भूमि बन जाता है, जहाँ हृदय यह भूल जाता है कि चाहे धनवान हो या दरिद्र, “वह घास के फूल की तरह जाता रहेगा” (याकूब 1:10)।

जैसा कि जॉन कैल्विन ने कहा: “वही व्यक्ति आत्मा में दरिद्र होता है, जो अपने आप को पूरी तरह शून्य समझता है और केवल परमेश्वर की दया पर निर्भर रहता है।” दरिद्रता के साथ कठिनाइयाँ आती हैं, लेकिन क्या आपने कभी यह सोचा है कि धन के साथ भी परीक्षाएँ आती है—जैसे कि अहंकार, आत्मनिर्भरता और आत्मिक सुस्ती की परीक्षा?

तो क्या हम अपनी आत्मिक दरिद्रता को स्वीकार करने के लिए तैयार हैं? या क्या हम अपनी सांसारिक समृद्धि में पूर्णतः आत्म-निर्भर और आत्म-सन्तुष्ट हो गए हैं? इन प्रश्नों का सच्चा उत्तर जानने का एक तरीका यह है: क्या आपका हृदय नीतिवचन में आगूर की इस प्रार्थना को दोहरा सकता है—“मुझे न तो निर्धन कर और न धनी बना” (नीतिवचन 30:8)?

लूका 6:20-36

◊ पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: यहेजकेल 1–2; यूहन्ना 8:30-59

20 September : खरेखुरे सौख्यवादी नाहीं

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20 September : खरेखुरे सौख्यवादी नाहीं
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“पृथ्वीवर आपल्यासाठीं संपत्ती साठवू नका; तेथे कसर व जंग खाऊन नाश करतांत आणि चोर घर फोडून चोरी करतांत; तर स्वर्गात आपल्यासाठीं संपत्ती साठवा; तेथे कसर व जंग खाऊन नाश करत नाहींत व चोर घरफोडी करत नाहींत व चोरीही करत नाहींत.” (मत्तय 6:19-20)

देशाच्या राष्ट्रीय बँकांतून मोठ्याने ओरडून सांगणें आवश्यक असलेला संदेश हा आहे: जगिक मनुष्या, तू खराखुरा सौख्यवादी नाहींस!

ज्यां वाढत्या महागाईचे भक्ष बनतांत आणि ज्यांना मृत्यूचा जंग लागतो अशा किरकोळ आनंद देणाऱ्या गोष्टींत समाधानी राहणें सोडा. गुंतवणूक करायची असेल तर ती उच्च-उत्पन्न देणाऱ्या स्वर्गातील दैवी विम्यात करा जिथें तुमचे धन पूर्णपणें सुरक्षित राहते.

भौतिक सुखसोयी आणि सुरक्षितता आणि रोमांचक आनंद अशा नश्वर गोष्टींसाठीं आपलें आयुष्य घालवणें म्हणजें पैसे उंदराच्या छिद्रांत टाकण्यासारखे आहे. परंतु प्रीतिचे जे श्रम त्यांत जर आपण आपलें आयुष्य गुंतवतो तर शेवटी अतुल्य आणि सार्वकालिक अश्या मोठ्या आनंदाचा लाभांश मिळतो:

“जे तुमचे आहे ते विकून दानधर्म करा; तसेच स्वर्गातील अक्षय धनाच्या जीर्ण न होणार्‍या थैल्या आपणांसाठीं करून ठेवा; तेथे चोर येत नाहीं व कसर लागत नाहीं” (लूक 12:33).

हा उपदेश उत्तम गोष्टींची बातमी आहे : ख्रिस्ताकडें या, ज्याच्या सान्निध्यात पूर्णानंद आणि सौख्ये सदोदित आहेत. खरे ख्रिस्ती सौख्यवादी बनण्यासाठीं श्रम घ्या. कारण परमेश्वर बोलला आहे: ऐशोआरामात जगण्यापेक्षा प्रीति करणें अधिक धन्य आहे! सांप्रतकाळी अति धन्य आणि येणाऱ्या युगात सर्वकाळासाठीं धन्य.

19 सितम्बर : दिल से किया गया बलिदान

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19 सितम्बर : दिल से किया गया बलिदान
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विश्‍वास ही से हाबिल ने कैन से उत्तम बलिदान परमेश्‍वर के लिए चढ़ाया, और उसी के द्वारा उसके धर्मी होने की गवाही भी दी गई, क्योंकि परमेश्‍वर ने उसकी भेंटों के विषय में गवाही दी।” इब्रानियों 11:4

वह क्या है जो हमारे कार्यों को परमेश्वर के लिए सराहनीय बनाता है?

उत्पत्ति 4 में इस संसार में सबसे पहले जन्मे दो पुत्रों—कैन और हाबिल—की कहानी बताई गई है: “कुछ दिनों के पश्चात कैन यहोवा के पास भूमि की उपज में से कुछ भेंट ले आया, और हाबिल भी अपनी भेड़–बकरियों के कई एक पहलौठे बच्चे भेंट चढ़ाने ले आया और उनकी चर्बी भेंट चढ़ाई; तब यहोवा ने हाबिल और उसकी भेंट को तो ग्रहण किया, परन्तु कैन और उसकी भेंट को उसने ग्रहण न किया” (उत्पत्ति 4:3-5)। इसी बलिदान का उल्लेख इब्रानियों का लेखक करता है जब वह हाबिल और उसके विश्वास के बारे में हमें बताता है।

सबसे पहले वह यह कहता है कि “विश्वास से” ही हाबिल ने अपने भाई से उत्तम बलिदान चढ़ाया। और इसी बलिदान के कारण हाबिल “धर्मी ठहराया गया।” यदि हम यह अनुमान लगाते रहेंगे कि क्यों परमेश्वर ने हाबिल की भेंट को स्वीकार किया और कैन की भेंट को नहीं, तो हम खो जाएँगे। लेकिन हमें उन तथ्यों पर ध्यान देना चाहिए जो स्पष्ट रूप से बताए गए हैं—और जो जानकारी हमें दी गई है, उसका केन्द्र में यह तथ्य सुस्पष्ट रीति से बताया गया है: परमेश्वर हमारे कार्यों को इसलिए स्वीकार नहीं करता कि वे बाहरी रूप से कितने बड़े या प्रभावशाली हैं, बल्कि इसलिए क्योंकि वे एक आज्ञाकारी और समर्पित हृदय की सच्ची अभिव्यक्ति होते हैं।

हाबिल की भेंट इसलिए स्वीकार नहीं की गई थी क्योंकि वह पशु की बलि थी, जबकि कैन की भेंट पौधों की उपज थी। अन्तर भेंटों में नहीं, बल्कि भेंट चढ़ाने वालों में था। जॉन कैल्विन इस पर टिप्पणी करते हैं कि हाबिल की भेंट को इसलिए ग्रहण किया गया क्योंकि वह “विश्वास के द्वारा पवित्र की गई” थी।[1]

यह सिद्धान्त वही है, जो परमेश्वर ने अपने भविष्यद्वक्ताओं के द्वारा भी स्पष्ट किया है। उदाहरण के लिए, वह यशायाह में कहता है: “व्यर्थ अन्नबलि फिर मत लाओ; धूप से मुझे घृणा है। नए चाँद और विश्रामदिन का मनाना, और सभाओं का प्रचार करना, यह मुझे बुरा लगता है। महासभा के साथ ही साथ अनर्थ काम करना मुझसे सहा नहीं जाता” (यशायाह 1:13)। यह ऐसा है मानो परमेश्वर कह रहा हो: मुझे बछड़ों, बकरों और मेमनों की मिमियाहट में कोई रुचि नहीं है। मैं बलिदान से अधिक आज्ञाकारिता की लालसा करता हूँ (1 शमूएल 15:22 देखें)। यदि तुम इन कार्यों पर इस आशा से निर्भर हो कि वे तुम्हें मेरे लिए ग्रहणयोग्य बना देंगे, तो मैं तुम्हें यह स्पष्ट कर देना चाहता हूँ कि ऐसा कभी नहीं होगा।

“विश्वास बिना उसे प्रसन्न करना अनहोना है” (इब्रानियों 11:6)। हमारे अच्छे कार्य परमेश्वर के सामने स्वीकृति पाने का माध्यम नहीं हैं, बल्कि वे उस स्वीकृति का फल हैं जो हमें विश्वास के द्वारा मिलती है। वे हमारी ओर से परमेश्वर के प्रेम का प्रत्युत्तर हैं, न कि उसके प्रेम को पाने का साधन। यदि आपके कार्य—हाबिल के समान—परमेश्वर की महिमा और प्रसन्नता के कारण बनते हैं, तो यह केवल इसलिए होगा क्योंकि वे आपके प्रेम, समर्पण और व्यक्तिगत विश्वास की बाहरी अभिव्यक्ति हैं। इसलिए आज, परमेश्वर की आज्ञाओं का पालन इस उद्देश्य से न करें कि आप उसके द्वारा स्वीकृत किए जाएँ या उसकी स्वीकृति बनाए रखें। वह स्वीकृति तो विश्वास के द्वारा पहले ही मिल चुकी है। साथ ही, इस कारण लापरवाही भी न बरतें कि आप पहले से ही स्वीकृत हैं। बल्कि, उसके प्रेम में अपनी स्थिति का आनन्द लें—और यही आनन्द आपकी आज्ञाकारिता के पीछे की प्रेरणा बने।

  यशायाह 1:10-20

पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: आमोस 7–9; यूहन्ना 8:1-29 ◊


[1] कॉमैणट्रीज़ ऑन दि एपिस्ट्ल ऑफ पॉल दि अपोस्ट्ल टू द हिब्रूज़, अनुवादक जॉन ओवेन (कैल्विन ट्रांसलेशन सोसायटी, 1853), पृ. 267.

19 September : आम्हांला मिळालेला अवर्णनीय विशेषाधिकार

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देव मोशेला म्हणाला, “मीं आहें तो आहें.” (निर्गम 3:14)

“मीं आहें तो आहें” (I AM WHO I AM) या पराक्रमी नावाची एक अभिव्यक्ती म्हणजें ही कीं हा अविनाशी, अद्वितीय, सर्वकाहीं पूर्वनियोजित करणारा देव येशू ख्रिस्तामध्यें प्रकट होऊन आपल्याजवळ आला आहे.

योहान 8:56-58 मध्यें येशू यहुदी पुढाऱ्यांनी त्याच्या केलेंल्यां टीकेला उत्तर देत आहे. तो म्हणतो, “तुमचा बाप अब्राहाम माझा दिवस पाहण्यासाठीं उल्लसित झाला; तो त्यानें पाहिला व त्याला हर्ष झाला.” तेव्हा यहूदी त्याला म्हणाले, “तुम्हांला अजून पन्नास वर्षे झाली नाहींत आणि तुम्हीं अब्राहामाला पाहिले आहे काय?” येशू त्यांना म्हणाला, “मी तुम्हांला खचीत खचीत सांगतो, अब्राहामाचा जन्म झाला त्यापूर्वी मी आहे.”

येशू ह्याहीपेक्षा गौरवी शब्द बोलू शकला असता का? जेव्हा येशू म्हणाला, “अब्राहामाचा जन्म झाला त्यापूर्वी मी आहे,” तेव्हा त्यानें देवाच्या नावाला लागू होणारे असें महान परम सत्य स्वतःसाठीं वापरलें, जो नम्र होऊन दासाचे स्वरूप घेऊन आला, ज्याने आमच्या सर्व अपराधांसाठीं प्रायश्चित करण्यासाठीं स्वतःला अर्पण केलें, आणि आपल्यासाठीं मार्ग मोकळा केला, जेणेंकरून आपल्याला यापुढे कोणतीही भीती न बाळगता या अविनाशी, अद्वितीय, सर्वसमर्थ देवाचा महिमा पाहता यावा.

आपण जें देवापासून जन्मलेलें आहों त्यां आपणाला येशू ख्रिस्ताद्वारे परमेश्वर – जो महान “मीं आहें तो आहें” म्हणजें प्रत्यक्ष देव – त्याला आपला पिता म्हणून ओळखण्याचा अवर्णनीय विशेषाधिकार मिळाला आहे :

  • जो आहे
  • जो स्वतःच्या व्यक्तिमत्वाचा आणि सामर्थ्याचा कर्ता आहे
  • जो कधीही बदलत नाहीं
  • जो या विश्वात असलेल्या सर्व शक्तींचा आणि सर्व उर्जेंचा प्रवाह आहे
  • आणि ज्याचे प्रतिबिंब या संपूर्ण सृष्टीला आपल्या जीवनातून प्रकट करणें अगत्याचे आहे.

देव करो, ज्यांना देवाच्या नावाची ओळख झालेंली आहे त्यांनी त्याजवर आपला भाव ठेवावा (स्तोत्र 9:10).

18 सितम्बर : अब और सदा के लिए

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“फिर मैंने नए आकाश और नयी पृथ्वी को देखा, क्योंकि पहला आकाश और पहली पृथ्वी जाती रही थी, और समुद्र भी न रहा।” प्रकाशितवाक्य 21:1

यीशु मसीह की वापसी के बारे में हम क्या जानते हैं? बाइबल हमें कुछ बातें बताती है, जो सीधी और स्पष्ट हैं। हम जानते हैं कि यीशु व्यक्तिगत रूप से, शारीरिक रूप से, दृश्यमान रूप से और महिमामय रूप से लौटेगा। हम यह भी जानते हैं कि उसके पुनः प्रकट होने का समय गुप्त होगा, यह अचानक होगा, और यह उन लोगों के बीच विभाजन लाएगा जो उसकी प्रतीक्षा कर रहे हैं और जो उसे अस्वीकार कर रहे हैं।

इसके अलावा, जैसा कि पहले शताब्दी में कष्ट सहने वाले संतों को प्रकाशितवाक्य की पुस्तक में बताया गया था, वही आज हमें भी बताया जा रहा है: हमें इस संसार की समस्याओं से घबराना नहीं चाहिए, क्योंकि सब कुछ यीशु के नियन्त्रण में है। मसीह का राज्य तब पूर्ण रूप से स्थापित हो जाएगा, जब उसका राज्य सम्पूर्ण और स्थाई रूप में आएगा और उसकी वापसी एक नए स्वर्ग और नई पृथ्वी का आरम्भ करेगी।

यह विचार कि स्वर्ग पृथ्वी पर आ सकता है—कि एक दिन “नया यरूशलेम स्वर्ग से परमेश्‍वर के पास से” उतरेगा (प्रकाशितवाक्य 21:2)—यह विचार आधुनिक संसार के कई दृष्टिकोणों में, विशेषकर पश्चिमी संस्कृति में, अपूर्ण रूप से झलकता है। हमारी संस्कृति स्वाभाविक रूप से आत्मविश्वासी है, इसलिए यह थोड़ी सी और शिक्षा, थोड़े से और सामाजिक कल्याण और दूसरों के प्रति थोड़ी सी और संवेदनशीलता के जरिए इस संसार को सुधारने का प्रयास करती है। लेकिन मनुष्य द्वारा बनाई गई कोई भी योजना उस वास्तविक पुनर्स्थापना को नहीं ला सकती, जिसकी हमारे संसार को ज़रूरत है। मानवीय प्रयास चीज़ों को बेहतर बना सकते हैं, परन्तु उन्हें सिद्ध नहीं कर सकते। स्वर्ग तब तक पृथ्वी पर नहीं आएगा, जब तक मसीह स्वयं वापिस नहीं आता। सृष्टि इस समय पाप की पकड़ में जकड़ी हुई है, और अन्त में केवल परमेश्वर ही इसे पूरी तरह सुधार सकता है— और वह ऐसा अवश्य करेगा—जब उसकी प्रजा मेमने के सामने दण्डवत करेगी और उसकी स्तुति करेगी।

फिलहाल, आप और मैं एक परदेशी भूमि में निर्वासितों के समान जी रहे हैं। हम ऐसे संसार में रह रहे हैं, जो मसीह का विरोधी है, उसके वचन का विरोधी है और उस जीवन का विरोधी है जो उसकी आज्ञाकारिता में जीया जाता है। विश्वासियों के रूप में हमारे लिए यह प्रलोभन आता है कि हम भाग जाएँ और छिप जाएँ—एक छोटी-सी “पवित्र मण्डली” बनाकर संसार से खुद को अलग कर लें और उसकी चिन्ता न करें। लेकिन जैसा कि यिर्मयाह ने बेबीलोन में निर्वासित लोगों से कहा था कि वे उस नगर की भलाई की खोज करें जिसमें वे रह रहे हैं (यिर्मयाह 29:7), उसी प्रकार हमें भी उस संसार की भलाई की खोज करनी है, जिसमें हम रह रहे हैं। इसका अर्थ यह है कि हम इस संसार में तो रहें, परन्तु इसके जैसे न बनें—ऐसा जीवन जीएँ और ऐसे वचन बोलें जो एक भिन्न स्थान की ओर इशारा करते हैं।

मसीह की—जो कि क्रूस पर मरा, मरे हुओं में से जी उठा, अब राज्य कर रहा है और एक दिन लौटकर आएगा—विजयी कहानी में आनन्दित होना ही हमें यह साहस देता है कि हम इस संसार से आगे देख सकें। उसकी वापसी की आशा और उसकी उपस्थिति में अनन्त जीवन की आशा ही वह उत्तम प्रेरणा है, जो हमें लगातार पवित्र जीवन जीने और उसके नाम में उत्साह के साथ सुसमाचार प्रचार के लिए प्रेरित करती है। अब विश्वास की दृष्टि से उसके लौटने की आशा करें—और फिर आज उठकर अपने आस-पास के लोगों की भलाई के लिए जीवन जीएँ।

1 कुरिन्थियों 15:50-58

◊ पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: आमोस 4– 6; यूहन्ना 7:28-53

18 September : एकमेव खरे स्वातंत्र्य

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18 September : एकमेव खरे स्वातंत्र्य
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“जीविताची आवड धरून, चांगले दिवस पाहावे, अशी ज्याची इच्छा असेल. . . त्यानें वाइटाकडें पाठ फिरवून बरे ते करावे.” (1 पेत्र 3:10-11)

खरे स्वातंत्र्य म्हणजें काय? तुम्हीं स्वतंत्र आहांत का?

जर तुम्हीं पूर्णपणें स्वतंत्र आहांत, तर येथे अशा चार गोष्टी आहेंत ज्यां तुमच्या बाबतींत सत्य असायला पाहिजेत.

  1. जर तुम्हांला एखादी गोष्ट करण्याची इच्छा नसेल, तर तुम्हीं ती करण्यास पूर्णपणें स्वतंत्र नाहीं. ओह, तुम्हांला जे करावेसे वाटत नाहीं ते करण्याची इच्छाशक्ती तुमच्याकडें असू शकते, परंतु आपण याला खरे स्वातंत्र्य म्हणत नाहीं. आपल्याला ज्या प्रकारे जीवन जगायचे आहे हे ते नाहीं. आपण एका अशा बंधनांत आणि दबावात असतो जे आपल्याला नको आहे.
  2. आणि जर तुम्हांला एखादी गोष्ट करण्याची इच्छा असेल, परंतु ती साध्य करण्याची शक्ती मात्र नसेल, तर तुम्हीं ती करण्यास पूर्णपणें स्वतंत्र नाहीं.
  3. आणि जर तुम्हांला एखादी गोष्ट करण्याची इच्छा आणि शक्ती ह्या दोन्ही असतील, परंतु ती करण्याची संधीच जर नसेल, तर तुम्हीं ती करण्यास पूर्णपणें स्वतंत्र नाहीं.
  4. आणि जर तुम्हांला एखादी गोष्ट करण्याची इच्छा असेल, आणि ती करण्याची शक्ती असेल, आणि ती करण्याची संधीही असेल, परंतु शेवटी ती तुमचा नाश करत असेल, तर जेव्हां तुम्हीं ती करता, तुम्हीं पूर्णपणें स्वतंत्र नाहीं —जे खरे स्वात्यंत्र आहे, त्यानुसार नक्कीच स्वतंत्र नाहीं.

जर पूर्णपणें स्वतंत्र व्हावयाचे असेल, तर आपल्याजवळ ती इच्छा, ती शक्ती आणि ती संधी आवश्यक आहे ज्यां द्वारे साध्य केलेंल्यां गोष्टीं आपल्याला सर्वकाळचा आनंद देतील. म्हणजें पश्चात्ताप होणार नाहीं. आणि केवळ येशू, जो देवाचा पुत्र जो मरण पावला आणि आपल्यासाठीं पुन्हा उठला, तोच हे शक्य करू शकतो.

जर पुत्र तुम्हांला बंधमुक्त करील तर तुम्हीं खरेखुरे बंधमुक्त व्हाल (योहान 8:36).

17 सितम्बर : कोई और नहीं है

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17 सितम्बर : कोई और नहीं है
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“मेरी ओर फिरो और उद्धार पाओ! क्योंकि मैं ही परमेश्‍वर हूँ और दूसरा कोई और नहीं है।” यशायाह 45:22

हर दिन, जैसे ही भोर होता है, भारत में गंगा के किनारे पूजा करने के लिए भीड़ उमड़ पड़ती है और सूर्योदय का स्वागत करती है। कई लोग अपने प्रियजनों की अस्थियाँ पानी में प्रवाहित करते हैं, ताकि वे अपनी शाश्वत सुख-शान्ति प्राप्त कर सकें। भारत के करोड़ों हिन्दुओं की तरह ये पुरुष और महिलाएँ मानते हैं कि “भगवान” हर चीज़ में विद्यमान है।

हालाँकि हम लोग ऐसी पूजा के दृश्यों और स्वरों से बहुत दूर हैं, लेकिन एक अन्य भाव में हम इसके कहीं ज़्यादा क़रीब हैं, जिसे हम स्वीकार नहीं करना चाहते।

हमारी अपनी संस्कृति में देखें तो आप पाएँगे कि मूर्तिपूजा और उसकी सूक्ष्मताएँ अब भी उतनी ही प्रचलित हैं, जितनी पहले थीं। यह धारणा में पाई जाती है कि इसका कोई महत्त्व नहीं है कि आप क्या मानते हैं, क्योंकि दुनिया के सारे बड़े धर्म “मूल बातों पर सहमत हैं।” मसीहत के भ्रष्ट और विकृत रूपों की भरमार पाई जाती है, क्योंकि हम अपने अनुसार बनाए गए एक “ईश्वर” की पूजा करने में माहिर हैं—एक ऐसा ईश्वर जो संयोगवश हमारी इच्छाओं के अनुकूल होता है और हमारे निर्णयों से सहमत रहता है। इसी तरह, सतही प्रकार के ‘सर्वेश्वरवाद’ (Panentheism) की झलक हमें आलीशान स्पा और योगा कक्षाओं में मिल सकती है, क्योंकि हम अपने आप को और अपने शरीर को भी एक देवता मानने में बड़े कुशल हैं।

असल में, हमारे पास सैकड़ों प्रतिस्थापित देवता हैं—ऐसी मूर्तियाँ जो हमें स्वतन्त्रता का वादा करती हैं, लेकिन वास्तव में हमें तुच्छ और बन्धक बना देती हैं। यदि आप सेक्स की पूजा करते हैं, तो यह आपकी प्रेम करने या प्रेम प्राप्त करने की क्षमता को नष्ट कर देगा। शराब की पूजा करें, तो यह आपको जकड़ लेगी। पैसे की पूजा करें, तो यह आपको निगल जाएगा। अपने परिवार की पूजा करें और आप (या वे) अधूरी उम्मीदों के बोझ तले टूट जाएँगे। किसी भी प्रतिस्थापित देवता की पूजा करें और आप पाएँगे कि वह सन्तुष्टि नहीं दे सकता।

जब हम मूर्तिपूजा में धीरे-धीरे और गहराई से उलझते जाते हैं, तो इसके परिणामस्वरूप बाइबल में हमारा विश्वास कम होता जाता है—उस बाइबल में जो परमेश्वर का अचूक वचन है। जब ऐसा होता है, तो यीशु नासरी के विशेष और अनन्य दावों की सीधी घोषणा के लिए कोई स्थान नहीं रह जाता—कि वह त्रिएक परमेश्वरत्व का दूसरा व्यक्ति है, सृष्टिकर्ता है, पुनरुत्थित प्रभु है, स्वर्गारोहित राजा है, और—एक दिन—लौटने वाला मसीह है। इसलिए यह परमेश्वर की कृपा का कार्य है—भले ही एक विचलित कर देने वाला कार्य हो—कि वह अपने वचन में कहता है: मैं सब लोगों को, हर जगह, यह आज्ञा देता हूँ कि वे पश्चाताप करें, अपनी निरर्थक मूर्तियों से मुड़ें, और मेरी—सृष्टिकर्ता, पालनहार, शासक, पिता और न्यायी की—उपासना करें (प्रेरितों 17:30 देखें)।

आपके हृदय की उस निरन्तर इच्छा का इलाज क्या है, जो बार-बार उन मूर्तियों की ओर झुकती है जो प्रभु का अपमान करती हैं और उद्धार नहीं कर सकतीं? उत्तर बहुत सरल है: “हे पृथ्वी के दूर-दूर के देश के रहने वालो, तुम मेरी ओर फिरो और उद्धार पाओ! क्योंकि मैं ही परमेश्‍वर हूँ और दूसरा कोई और नहीं है।” उन मूर्तियों की पहचान करें जिनकी उपासना करने की ओर आपका मन झुकता है—और फिर उन्हें उस सृष्टिकर्ता और सम्पूर्ण सृष्टि के पालनहार के सामने रखकर देखें। वह परमेश्वर है, वे नहीं हैं। वह उद्धार कर सकता है, वे नहीं कर सकते। फिर से उनसे मुड़ें, और उसकी ओर लौट आएँ।

यशायाह 45:18-25

पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: आमोस 1–3; यूहन्ना 7:1-27 ◊

17 September : गडगडाटी वादळांत देवाची उपासना करा.

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17 September : गडगडाटी वादळांत देवाची उपासना करा.
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“कारण जशी वीज आकाशाच्या एका बाजूस चमकून दुसर्‍या बाजूपर्यंत प्रकाशते, तसेच मनुष्याच्या पुत्राचेही त्याच्या दिवशी होईल.” (लूक 17:24)

मी एकदा रात्री शिकागोहून मिनियापोलिसला जात होतो, आणि विमानात जवळजवळ एकटाच होतो. पायलटने जाहीर केलें कीं मिशिगन सरोवर आणि विस्कॉन्सिनमध्यें गडगडाटी वादळ आहे. गोंधळ होऊं नये म्हणून तो विमान पश्चिमेकडें स्कर्ट करायचा.

मी विमानाच्या पूर्वेकडें असलेल्या घनदाट काळोखाकडें पाहत बसलो असताना, अचानक संपूर्ण आकाश प्रकाशाने चकाकले आणि विमानाच्या खाली चार मैलांवर पांढऱ्या ढगांची एक पोकळ पडली व लगेच नाहींशी झाली.

एका सेकंदानंतर, क्षितिजावर उत्तरेकडून दक्षिणेंकडें प्रकाशाचा एक विशाल पांढरा बोगदा फुटला आणि पुन्हा घनदाट काळोखांत नाहींसा झाला. लगेच त्या गडगडाटी विजांची सर स्थिरावली , ज्यामुळें ढगांच्या अथांगातून आणि ढगांच्या दूरच्या पांढऱ्या पर्वतांच्या मागे प्रकाशाचे ज्वालामुखी फुटलेलें दिसू लागलें.

मी अक्षरशः अविश्वासाने डोके हलवत बसलो, आणि ओरडू लागलो, हे परमेश्वरा, जर या तुझ्या तलवारीला धारदार करतांना उडणाऱ्या केवळ ठिणग्यामात्र असतील, तर तुझ्या प्रकट होण्याचा दिवस कसा असेल! आणि मला ख्रिस्ताचे शब्द आठवले : “जशी वीज आकाशाच्या एका बाजूस चमकून दुसर्‍या बाजूपर्यंत प्रकाशते, तसेच मनुष्याच्या पुत्राचेही त्याच्या दिवशी होईल” (लूक 17:24).

आताही ते दृश्य आठवत असताना माझे मुख त्याच्या गौरवाच्या शब्दांनी भरून जाते. मी देवाचे आभार मानतो कीं त्यानें माझ्या अंतःकरणात त्याच्या प्रकट होण्याची, त्याला पाहण्याची आणि ख्रिस्ती परमानंदाच्या मेजवानीला बसून गौरवाच्या राजाची उपासना करण्याची इच्छा वारंवार जागृत केलीं आहे. तो मैफिल हॉल खूप मोठा आहे. या.

16 सितम्बर : अनन्त लाभ

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16 सितम्बर : अनन्त लाभ
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“यह नहीं कि मैं दान चाहता हूँ परन्तु मैं ऐसा फल चाहता हूँ जो तुम्हारे लाभ के लिए बढ़ता जाए। मेरे पास सब कुछ है, वरन् बहुतायत से भी है; जो वस्तुएँ तुम ने इपफ्रुदीतुस के हाथ से भेजी थीं उन्हें पाकर मैं तृप्त हो गया हूँ, वह तो सुखदायक सुगन्ध, ग्रहण करने योग्य बलिदान है, जो परमेश्‍वर को भाता है।” फिलिप्पियों 4:17-18

फिलिप्पी की कलीसिया को पत्र लिखते हुए पौलुस ने यह कहने के लिए कि “आपकी वित्तीय सहायता के लिए धन्यवाद,” जिस तरीके का उपयोग किया, वह एकदम अनोखा था: वह कहता है कि उनकी उदारता ने उसे इस कारण से प्रसन्न नहीं किया कि उनका उपहार उसके लिए क्या मायने रखता था, बल्कि इसलिए कि वह उनके लिए अर्थात उपहार देने वालों के लिए क्या मायने रखता है। वह उन्हें बताता है कि उनका दान उनके स्वयं के लिए अधिक लाभकारी होगा, न कि उसके अपने लिए अर्थात प्राप्त करने वाले के लिए!

पौलुस की खुशी उनकी उदारता को लेकर इस आश्वासन से उत्पन्न हुई कि उनके लिए यह अनन्तकाल के लिए लाभकारी होगा। उसका यह विश्वास यीशु की शिक्षा पर आधारित था। उदाहरण के लिए, लूका के सुसमाचार में पतरस ने यीशु से कहा था, “देख, हम तो घर-बार छोड़कर तेरे पीछे हो लिए हैं” (लूका 18:28)। हम ठीक-ठीक नहीं जानते कि पतरस ने यह बात किस उद्देश्य से कही थी, लेकिन हम यीशु का उत्तर अवश्य जानते है: उसने कहा, “ऐसा कोई नहीं जिसने परमेश्‍वर के राज्य के लिए घर, या पत्नी, या भाइयों, या माता–पिता, या बाल–बच्चों को छोड़ दिया हो; और इस समय कई गुणा अधिक न पाए और आने वाले युग में अनन्त जीवन” (लूका 18:29-30)। यीशु यह कह रहा था कि पतरस और अन्य चेलों ने यह सब छोड़ा नहीं था, बल्कि अपने भविष्य के लिए निवेश किया था।

बाइबल वर्तमान समय और अनन्तकाल की निकटता—दोनों के बारे में पूर्णतः स्पष्ट है। हम अक्सर ऐसे जीने लग जाते हैं जैसे अनन्तकाल का हमारे देने, सोचने और जीने के तरीके पर कोई असर ही नहीं होता। लेकिन सच्चाई यह है कि अनन्तकाल हममें से हर एक के लिए बस एक श्वास की दूरी पर हो सकता है और इस क्षणभंगुर जीवन की तुलना में कहीं अधिक लम्बा है। इसलिए यह उपयुक्त है कि हम इस दृष्टिकोण से दें कि उसका प्रतिफल हमें अनन्त जीवन में समृद्ध रूप से मिलेगा।

हमारे द्वारा खुले हाथों से देने की क्षमता और अनन्तता को ध्यान में रखते हुए देने की प्रेरणा, परमेश्वर की स्वयं की उदारता में निहित है, जो सबसे महान दाता है। शायद सबसे बड़ी गलती जो हम देने में कर सकते हैं वह यह है कि हम कुछ भी न दें। हमें यह सोचने का प्रलोभन हो सकता है कि हम देने का सामर्थ्य नहीं रखते—लेकिन सच्चाई यह है कि हम न देने का जोखिम नहीं उठा सकते! जैसे यीशु हमें स्नेहपूर्वक वचन देता है, “दिया करो, तो तुम्हें भी दिया जाएगा। लोग पूरा नाप दबा दबाकर और हिला हिलाकर और उभरता हुआ तुम्हारी गोद में डालेंगे, क्योंकि जिस नाप से तुम नापते हो, उसी से तुम्हारे लिए भी नापा जाएगा” (लूका 6:38)।

इसलिए अपनी निवेशों पर विचार करें—रिटायरमेंट की योजनाओं, शेयर बाजार, या कॉलेज फंड में नहीं, बल्कि उस प्रकार के भुगतान में जो अनन्त जीवन में “आपके खाते में बढ़ता जाएगा।” सुसमाचार के लिए देने में महान लाभ है। आने वाले जीवन को अपने आज के खर्चों पर निर्णायक प्रभाव डालने दें और आप पाएँगे कि आप उदारता से और खुशी से देने वाले बन गए हैं।

2 कुरिन्थियों 8:1-15

◊ पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: विलापगीत 3–5; यूहन्ना 6:52-71