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14 सितम्बर : सेवा में साझेदारी

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14 सितम्बर : सेवा में साझेदारी
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“भाई अपुल्लोस से मैं ने बहुत विनती की है कि तुम्हारे पास भाइयों के साथ जाए।” 1 कुरिन्थियों 16:12

मसीह की देह एक व्यक्ति के अकेले काम करने की जगह नहीं है, विशेषकर सेवाकार्य के काम में। मसीही जीवन एक टीम का खेल है, कोई प्रतियोगिता नहीं। प्रेरित पौलुस आरम्भिक कलीसियाओं को लिखे अपने पत्रों में हमें इस बारे में बार-बार याद दिलाता है।

कुरिन्थियों की कलीसिया के आरम्भ में ही पौलुस जान गया था कि इस तरह के संघर्षों से खतरा हो सकता है और कुछ लोग अपुल्लोस की देखभाल को उसकी स्वयं की देखभाल से अधिक पसन्द करते थे (1 कुरिन्थियों 3:3-7)। यदि पौलुस अपने स्वयं के हितों का ध्यान रखता और अपनी प्रतिष्ठा को बढ़ाने और कलीसिया को अपनी ओर खींचने के लिए काम करता, तो वह यह सुनिश्चित करता कि अपुल्लोस कभी कुरिन्थुस वापस नहीं लौटता। लेकिन हम पढ़ते हैं कि उसने ऐसा नहीं किया। बल्कि उसने इसके विपरीत किया। वह केवल यही चाहता था कि परमेश्वर का लोग सेवा प्राप्त करें। वह जानता था कि सेवाकार्य एक साझा प्रयास होना चाहिए।

परमेश्वर ने प्रारम्भिक कलीसिया में सेवाकार्य की टीम को अद्‌भुत तरीकों से तैयार किया। उदाहरण के लिए, तीमुथियुस को लें। पौलुस ने कुरिन्थियों से कहा, “यदि तीमुथियुस आ जाए, तो देखना कि वह तुम्हारे यहाँ निडर रहे; क्योंकि वह मेरे समान प्रभु का काम करता है। इसलिए कोई उसे तुच्छ न जाने, परन्तु उसे कुशल से इस ओर पहुँचा देना कि मेरे पास आ जाए; क्योंकि मैं उसकी बाट जोह रहा हूँ कि वह भाइयों के साथ आए” (1 कुरिन्थियों 16:10-11)। कई लोगों के लिए, तीमुथियुस सेवा के लिए अपर्याप्त प्रतीत हो सकता था: वह स्वभाव से संकोची था (शायद यही कारण था कि पौलुस ने कलीसिया को उसका अच्छे से स्वागत करने की याद दिलाई), शारीरिक रूप से कमजोर था (उसे अपने पेट के लिए थोड़ा दाखरस पीने के लिए जाना जाता था), और अधिकांश साथियों से उम्र में छोटा था (1 तीमुथियुस 4:12; 5:23)। लेकिन पौलुस जानता था कि परमेश्वर ने तीमुथियुस को एक कार्य सौंपा था, और वह उसे पूरा करने में उसकी मदद करना चाहता था।

कई अन्य पुरुषों और महिलाओं, जैसे फीबे, प्रिस्का, अक्विला, फूरतूनातुस और अखइकुस, ने भी पौलुस के साथ सेवाकार्य में सहभागिता की। इनमें से कोई भी एक जैसा नहीं दिखता था और न ही एक जैसा व्यवहार करता था। उनके वरदान भी एक जैसे नहीं थे। लेकिन फिर भी, वे सभी सेवाकार्य के काम में महत्त्वपूर्ण थे। यह बात आज की कलीसिया की देह के बारे में भी सच है: हम सभी को प्रभु द्वारा विभिन्न कार्यों की जिम्मेदारी दी गई है। इसलिए यह महत्त्वपूर्ण है कि हम केवल उन्हीं लोगों के साथ सेवा करने की प्रवृत्ति से बचें, जो हमारे जैसे हैं या जिनसे हम प्रभावित होते हैं। हमें यह नहीं कहना चाहिए, “मुझे तो केवल उसी का प्रचार पसन्द है,” “मैं केवल उसी की बात मान सकता हूँ,” या “मैं बस उसे पसन्द नहीं करता।” इसके बजाय, हमें परमेश्वर के सभी सेवकों के लिए आभारी होना चाहिए।

हममें से अधिकांश लोग अपने जीवन ऐसे जीएँगे कि कोई भी हमें हमारे तत्काल प्रभाव क्षेत्र के बाहर नहीं जान पाएगा। लेकिन हमारे कब्र के शिलालेख पर यह लिखना काफी हो सकता है, “यहाँ वह व्यक्ति विश्राम कर रहा है, जो दूसरों की मदद करने के लिए जाना जाता था।” क्या आप विश्वास करते हैं कि “यीशु के पास एक ऐसा कार्य है, जो केवल आप ही कर सकते हैं”?[1] जब परमेश्वर अपना हाथ आप पर रखता है और आपको एक कार्य सौंपता है, तो क्या आप उसे गम्भीरता से लेते हैं, भले ही वह महत्त्वहीन सा लगे? हमें एक साथ एक समुदाय के रूप में उसके राज्य के लिए एक एकीकृत टीम बनकर उसकी सेवा करनी है। आज अपना किरदार निभाने और दूसरों को उनका किरदार निभाने के लिए प्रोत्साहित करने में, आपको आनन्द और सन्तोष की अनुभूति होगी।

1 कुरिन्थियों 3:1-23

◊ पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: न्यायियों 19–21; यूहन्ना 6:1-21


[1] एल्सी डंकन येल, “देयर्ज़ ए वर्क फॉर जीज़स” (1912).

14 September : देव तुमची सर्व गरज भागवील

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14 September : देव तुमची सर्व गरज भागवील
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माझा देव ख्रिस्त येशूमधील त्याच्या वैभवशाली समृद्धीनुसार तुमची सर्व गरज भागवील. (फिलिप्पै 4:19 RV-BSI)

फिलिप्पैकर 4:6 मध्यें, पौल म्हणतो, “कशाविषयीही चिंताक्रांत होऊ नका, तर सर्व गोष्टींविषयी प्रार्थना व विनंती करून आभारप्रदर्शनासह आपली मागणी देवाला कळवा.” आणि मग (केवळ 13 वचनांनंतर), फिलिप्पै 4:19 मध्यें तो चिंतामुक्त करणारे असे भावी कृपेविषयीचे अभिवचन देतो : “माझा देव ख्रिस्त येशूमधील त्याच्या वैभवशाली समृद्धीनुसार तुमची सर्व गरज भागवील.”

जर आपण भावी कृपेच्या या अभिवचनावरील विश्वासाने जगतो, तर चिंतेला निभाव करणें खूप कठीण होईल. देवाची “वैभवशाली समृद्धी” अक्षय आहे. आपण आपल्या भविष्याविषयी चिंताक्रांत होऊ नये अशी त्याची खरोखर इच्छा आहे.

पौलाने आपल्यासाठीं मांडलेल्या ह्या धोरणावर आपण चालावें. आपण भावी कृपेचे हे अभिवचन दृढ धरूनच चिंतारूपी अविश्वासाशी सुयुद्ध केलें पाहिजे.

जेव्हा मी एखादी धोकादायक नवी सेवा किंवा सार्वजनिक सभा यांविषयी चिंताक्रांत होऊन जातो, तेव्हा मी नेहमीच माझी जी सर्वात जास्त उपयोगांत आणली जाणारी अभिवचने आहेंत त्यांपैकीं एक म्हणजें यशया 41:10 हे अभिवचन घेऊन अविश्वासाशी लढा देतो.

ज्या दिवशी मी पुढील तीन वर्षे जर्मनीत जाऊन राहण्यासाठीं अमेरिकेहून निघालो त्यावेळी माझ्या वडिलांनी मला दूरध्वनीवरून फोन करून हेच अभिवचन दिलें होते. प्रचंड ताणतणावातून बाहेर निघण्यासाठीं मी सलग तीन वर्षें हेच अभिवचन स्वतःला पाचशे वेळा तरी वाचून दाखविले असेल. “तू भिऊ नकोस, कारण मी तुझ्याबरोबर आहे, घाबरू नकोस, कारण मी तुझा देव आहे; मी तुला शक्ती देतो, मी तुझे साहाय्यही करता, मी आपल्या नीतिमत्तेच्या उजव्या हाताने तुला सावरतो.”

मी हे अभिवचन घेऊन इतक्या वेळा चिंतेशी लढा दिला आहे कीं जेव्हा माझे मन कोणताही विचार करित नसते, तेव्हा जो आवाज मला माझ्या मनांत ऐकू येतो तो यशया 41:10 चा आवाज असतो.

13 सितम्बर : कब तक? क्यों?

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13 सितम्बर : कब तक? क्यों?
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हे यहोवा, मैं कब तक तेरी दोहाई देता रहूँगा, और तू न सुनेगा? मैं कब तक तेरे सम्मुख “उपद्रव”, “उपद्रव”, चिल्लाता रहूँगा? क्या तू उद्धार नहीं करेगा? तू मुझे अनर्थ काम क्यों दिखाता है? क्या कारण है कि तू उत्पात को देखता ही रहता है?” हबक्कूक 1:2-3

हम यह मानने के प्रलोभन में आ सकते हैं कि हम पुराने नियम में वर्णित परिस्थितियों से बहुत दूर हैं। लेकिन जब हम इन पदों में हबक्कूक की शिकायत को पढ़ते हैं, तो हम यह पहचान सकते हैं कि हालाँकि हम काल और स्थान में दूर हैं, फिर भी हम उस परिस्थिति से बहुत दूर नहीं हैं जिसमें वह स्वयं था।

हबक्कूक ने परमेश्वर के लोगों के बीच के मुद्दों का वर्णन किया। वे उन चीजों से भटक चुके थे जिन्हें परमेश्वर ने उनके लिए निर्धारित किया था, और कोई अन्त दिखाई नहीं दे रहा था। और इससे भी बुरी बात यह थी कि परमेश्वर हस्तक्षेप करता प्रतीत नहीं हो रहा था। हबक्कूक की दृष्टि में यह समस्या दोहरी थी: परमेश्वर का समय (तू कब तक गलत को सहन करता रहेगा?) और परमेश्वर की सहिष्णुता (तू इसको सहन क्यों करता है?)। ये प्रश्न आज भी कई विचारशील विश्वासियों के होंठों पर होते हैं जब वे कलीसिया को देखते हैं: “यह कब तक चलेगा? ऐसा क्यों है कि अच्छा, नैतिक, सर्वशक्तिमान परमेश्वर, जिसकी हम सेवा करते हैं, उन लोगों के बीच आध्यात्मिक और नैतिक पतन को सहन करता है, जो स्वयं को उसके अनुयायी कहते हैं?”

क्या आप कभी इन प्रश्नों से जूझे हैं? आप अकेले नहीं हैं; यह कोई नया मुद्दा नहीं है। परमेश्वर के विश्वासयोग्य लोग इतिहास भर में इससे जूझते रहे हैं। यहाँ दो अवलोकन हैं जो हमें हमारे जीवन के “कब तक” वाले प्रश्नों के साथ संघर्ष करते समय सहायक हो सकते हैं।

पहला, हम आभारी हो सकते हैं कि परमेश्वर हमारी समय-सीमा में हमारी प्रार्थनाओं का उत्तर देने के लिए इतना कठोर नहीं हैं। परमेश्वर की देरी हमेशा उद्देश्यपूर्ण होती है। उसका दृष्टिकोण हमारी कल्पना से कहीं अधिक व्यापक है। वह इसलिए देरी कर सकता है, ताकि वह हमारे स्वार्थ से या हमारे जीवन के किसी अवज्ञा के क्षेत्र से निपट सके, हमें उस पर विश्वास करना सिखा सके, या हमें हमारे स्वयं से बचा सके। यही कारण है कि बाइबल हमें अक्सर प्रभु की प्रतीक्षा करने के लिए कहती है। हमारी निराशाएँ, विफलताएँ, और भ्रम परमेश्वर के शाश्वत उद्देश्य की समग्र सुरक्षा में लाए जा सकते हैं।

दूसरा, हम भविष्यद्वक्ता के उदाहरण का पालन कर सकते हैं और परमेश्वर से सहायता की मांग कर सकते हैं। हबक्कूक ने अपनी शिकायत को उसी स्थान पर रखा जहाँ हमें अपनी शिकायतें रखनी चाहिएँ: अर्थात प्रभु के पास। उसने पहचान लिया कि भजनकार क्या कहता है: “मुझे सहायता यहोवा की ओर से मिलती है, जो आकाश और पृथ्वी का कर्ता है” (भजन 121:2)। बहुत से धार्मिक विश्वासी भजनों के माध्यम से अपने भ्रम और प्रश्नों को परमेश्वर के पास लेकर आए। इससे हमें भी ऐसा ही करने की अनुमति मिलती है। जब हम “कब तक?” और “क्यों?” कहकर पुकारते हैं, तो वह हमारी व्यथा को समझता है। उसका अन्तिम उत्तर हमें यीशु और उसकी विजय में दिया गया है। वह अंधेरी रात के बाद सुबह की किरण लाने में आनन्दित होता है। इसलिए जब आप अपने दिल को या जीवन को, या कलीसिया को देखते हैं, और यह पूछने के लिए प्रेरित होते हैं, “हे यहोवा, मैं कब तक तेरी दोहाई देता रहूँगा?” तो आप इस प्रकार के शब्दों में सान्त्वना पा सकते हैं:

परमेश्वर अभी भी सिंहासन पर है,

और वह अपने लोगों को याद रखेगा;

हालाँकि संकट हमें दबाते हैं और बोझ हमें कष्ट देते हैं,

वह हमें कभी अकेला नहीं छोड़ेगा।[1]

भजन 121

पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: न्यायियों 16–18; यूहन्ना 5:25-47 ◊


[1] किट्टी एल. सफ्फील्ड, “गॉड इज़ स्टिल ऑन द थ्रोन” (1929).

13 September : चिंता न करण्याची 7 कारणें, भाग 3

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13 September : चिंता न करण्याची 7 कारणें, भाग 3
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“ह्यास्तव ‘काय खावे? काय प्यावे? काय पांघरावे?’ असे म्हणत चिंता करत बसू नका. (कारण ह्या सर्व गोष्टी मिळवण्याची धडपड परराष्ट्रीय लोक करत असतांत.) तुम्हांला ह्या सर्वांची गरज आहे हे तुमचा स्वर्गीय पिता जाणून आहे. तर तुम्हीं पहिल्याने देवाचे राज्य व त्याचे नीतिमत्त्व मिळवण्यास झटा म्हणजें त्यांच्याबरोबर ह्याही सर्व गोष्टी तुम्हांला मिळतील. ह्यास्तव उद्याची चिंता करू नका, कारण उद्याची चिंता उद्याला; ज्या दिवसाचे दुःख त्या दिवसाला पुरे.” (मत्तय 6:31-34)

आपण गेल्या दोन दिवसांत पाहिले आहे कीं मत्तय 6:25-34 मध्यें येशूनें योजिलेली अशी किमान सात अभिवचनें आहेंत, जी आम्हांला विश्वासासंबंधीचे जे सुयुद्ध ते लढण्यास आणि चिंतामुक्त होण्यास मोठे सहाय्य पुरवितांत. आज आपण अंतिम तीन अभिवचने पाहूं.

अभिवचन #5: “ह्यास्तव ‘काय खावे? काय प्यावे? काय पांघरावे?’ असे म्हणत चिंता करत बसू नका. (कारण ह्या सर्व गोष्टी मिळवण्याची धडपड परराष्ट्रीय लोक करत असतांत.) तुम्हांला ह्या सर्वांची गरज आहे हे तुमचा स्वर्गीय पिता जाणून आहे.” (मत्तय 6:31-32)

देवाला तुमच्या गरजां माहित नाहीं असे समजू नका. तो त्यां सर्व गरजां जाणून आहे. शिवाय तो “तुमचा स्वर्गीय पिता” आहे. तो तटस्थ किंवा बेपर्वा अशी भूमिका घेऊन दुरू उभा राहून पाहत नाहीं. तो काळजी करतो. त्यानें ठरविलेल्या योग्य वेळी तो तुमच्या गरजां भागविल.

अभिवचन # 6: “तर तुम्हीं पहिल्याने देवाचे राज्य व त्याचे नीतिमत्त्व मिळवण्यास झटा म्हणजें त्यांच्याबरोबर ह्याही सर्व गोष्टी तुम्हांला मिळतील.” (मत्तय 6:33)

जर तुम्हीं तुमच्या खाजगी भौतिक गरजांविषयी चिंता करित बसण्याऐवजी, या जगात त्याचा उद्देश्य सिद्धीस न्यावयांस त्याच्या नामास्तव स्वतःचे जीवन ओतून द्याल तर त्याचा उद्देश्य सिद्धीस न्यावयांस आणि त्याचे गौरव व्हावे म्हणून तुमच्याकडें सर्व काहीं आहे याची खात्री तो स्वतः करून घेईल. “ह्याही सर्व गोष्टी तुम्हांला मिळतील.” म्हणजें काय खावे, काय प्यावे, काय पांघरावे त्यां सर्व गरजां- आणि त्याचबरोबर इतर गरजां देखील – ज्यां तुम्हांला त्याची इच्छा पूर्ण करण्यांसाठीं आणि त्याचे गौरव करण्यासाठीं आवश्यक आहेत. याचा अर्थ असा असू शकतो कीं तुम्हीं त्याच्यासाठीं मरावे हा त्याचा उद्देश आहे, परंतु तो त्याच्या गौरवासाठीं तुम्हांला आवश्यक असलेल्या सर्व गोष्टी पुरवील.

हे अगदी रोमकरांस 8:32 मध्यें असलेल्या अभिवचनासारखे आहे, “[देव] त्याच्या [ख्रिस्ता] बरोबर आपल्याला सर्वकाहीं कसे देणार नाहीं?” मग पुढे असे लिहिले आहे, “ख्रिस्ताच्या प्रीतिपासून कोण आपल्याला वेगळे करील? संकट किंवा दुःख, पाठलाग, भूक किंवा नग्नता, आपत्ती किंवा तलवार करील काय?  कारण पवित्र शास्त्रात असे लिहिले आहे कीं, ‘तुझ्याकरता आम्हीं दिवसभर मारले जात आहोत, आम्हीं वधाच्या मेंढराप्रमाणें गणलेले आहोत.’ पण ज्याने आपल्यावर प्रीति केलीं, त्याच्याद्वारे या सर्व गोष्टींत आपण महाविजयी ठरतो.” (रोमकरांस 8:35-37). भूक किंवा नग्नता यां येऊ शकतांत. परंतु आपल्याला यां सर्व गोष्टींत महाविजयी होण्यासाठीं आवश्यक असलेल्यां सर्व वस्तु आपल्याकडें असतील.

अभिवचन # 7: “ह्यास्तव उद्याची चिंता करू नका, कारण उद्याची चिंता उद्याला; ज्या दिवसाचे दुःख त्या दिवसाला पुरे.” (मत्तय 6:34)

तुमची कसोटी तुमच्या शक्तीपलीकडें कधीही होऊं नये याची देव खात्री करून घेतो (1 करिंथ 10:13). तो तुमच्याठायीं आपलें कार्य सिद्धीस नेईल, जेणेंकरून तुमचे “सामर्थ्य आयुष्यभर कायम” राहावे (अनुवाद 33:25).

प्रत्येक दिवसाचे दुःख हे त्या दिवसाला ठरविलेले आहे. परंतु त्याच्या करुणेंमुळें ते दुख तुमच्या शक्तीपलीकडें कधीही जात नाहीं. आमच्यावर दररोज करुणा केलीं जाईल जी रोज सकाळी नवी होते – आणि ती त्या दिवसाच्या दुखासाठीं पुरे आहे (विलाप 3:22-23). तो तुमच्याकडून असे कोणतेही चांगले काम करून घेणार नाहीं जे सिद्धीस नेण्यांस तो स्वतः तुम्हांला आवश्यक असलेली सर्व कृपा पुरवणार नाहीं (2 करिंथ 9:8).

12 सितम्बर : हमें उसने जन्म दिया है

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12 सितम्बर : हमें उसने जन्म दिया है
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उसने अपनी ही इच्छा से हमें सत्य के वचन के द्वारा उत्पन्न किया।” याकूब 1:18

प्रसिद्ध टेलीविजन मेजबान जॉनी कार्सन ने एक बार एक खिझे हुए किशोर और एक निराश पिता के बीच एक बातचीत का वर्णन किया, जब वे एक-दूसरे से लड़ रहे थे। जब किशोर दरवाजा बन्द करने और बाहर जाने ही वाला था कि वह चिल्लाया, “मैंने दुनिया में जन्म लेने के लिए नहीं कहा था!” इसके जवाब में पिता ने भी चिल्लाते हुए कहा, “और यदि तुमने कहा भी होता, तो मैं कह देता ‘नहीं’!”

हममें से किसी ने भी जन्म लेने के लिए नहीं कहा। और वास्तव में, हममें से किसी ने भी नया जन्म लेने के लिए भी नहीं कहा। याकूब इस विनम्र सत्य की ओर इशारा करता है कि हमारा आध्यात्मिक जन्म वह नहीं था जिसे हमने परमेश्वर से करने को कहा। परमेश्वर की भलाई के कारण मसीह में हमारा नया जन्म उसका चुनाव था, और न तो हमारी विवशता का इस पर कोई प्रभाव पड़ा और न ही हमारी दिखावटी भलाई ने इसमें कोई योगदान दिया। उसने अपनी स्वतन्त्र, सर्वोच्च इच्छा के अनुसार ही कार्य किया। जैसा यीशु ने कहा, “हवा जिधर चाहती है उधर चलती है और तू उसका शब्द सुनता है, परन्तु नहीं जानता कि वह कहाँ से आती और किधर को जाती है? जो कोई आत्मा से जन्मा है वह ऐसा ही है” (यूहन्ना 3:8)।

आत्मा के कार्य के बिना, जो हमें मसीह के दर्शन कराता है, हमारे मूर्ख हृदय अंधे रहते हैं, और पाप हमारी नैतिकता की समझ पर मृत्यु-तुल्य प्रभाव डालता है। स्वभाव से हम पाप के शिकंजे में खोए हुए हैं, हमें अपनी स्थिति का समाधान जानने की बहुत आवश्यकता होती है, लेकिन हम यह भी नहीं देख पाते कि हमारी स्थिति वास्तव में है क्या। लेकिन भले ही हम अनुग्रह के द्वारा विश्वास से परमेश्वर के परिवार के सदस्य बन चुके हैं, तौभी हम कभी-कभी यह मानने के लिए प्रवृत्त होते हैं कि हमारा उद्धार उस काम का परिणाम है जो हमने किया है—कि हमने एक चुनाव किया, और हमें पाप से मुँह मोड़ने और बालकों जैसा विश्वास रखकर परमेश्वर की ओर मुड़ने का चुनाव करते रहना है। सत्य यह है कि परमेश्वर ने “अपनी ही इच्छा से हमें . . . उत्पन्न किया,” और जब हमने यह सुना, तब उसने हमें “सत्य के वचन” का प्रत्युत्तर देने के लिए सक्षम किया। जब हम इन टुकड़ों को आपस में जोड़ते हैं, तो हमें पता चलता है कि हम जो उसे चुनते हैं, वह केवल इसलिए सम्भव है क्योंकि उसने हमें पहले चुना।

जैसा कि एलेक मोट्यर ने कहा, “हमारे नए जन्म में हमारा किसी प्रकार का साधन या योगदानकर्ता बनना उतना ही असम्भव है, जितना कि हमारा प्राकृतिक जन्म लेने में होना। प्रारम्भिक चयन से लेकर पूरा होने तक, सारा काम उसका है . . . और जब तक उसकी इच्छा नहीं बदलती, उसका शब्द नहीं बदलता, या उसका सत्य गलत साबित नहीं होता, तब तक मेरा उद्धार खतरे में नहीं पड़ सकता और न ही खो सकता है।”[1]

यह जानकर कैसी सुरक्षा, शान्ति और आराम मिलता है कि यीशु मसीह के माध्यम से परमेश्वर की भलाई न केवल आपको पश्चात्ताप और विश्वास की ओर ले आई, बल्कि आपको विश्वास में बनाए भी रखेगी! यदि आपका विश्वास और उद्धार आप पर निर्भर होते, तो वे कभी सुरक्षित नहीं होते और आप हमेशा चिन्तित रहते। लेकिन यह उस पर निर्भर है और “न अदल बदल के कारण उस पर छाया पड़ती है” (याकूब 1:17)। आपने जन्म लेने के लिए नहीं कहा; उसने यह इच्छा की। इसलिए आप निश्चिन्त हो सकते हैं कि आप उसके बच्चे हैं—अब, कल, हर दिन और सदा के लिए।

  यहेजकेल 36

◊ पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: न्यायियों 13–15; यूहन्ना 5:1-24


[1] द मैसेज ऑफ एक्लेज़िआस्टेस: द बाइबल स्पीक्स टूडे (आई.वी.पी. अकेडेमिक, 1985), पृ. 60.

12 September : चिंता न करण्याची 7 कारणें, भाग 2

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12 September : चिंता न करण्याची 7 कारणें, भाग 2
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“चिंता करून आपल्या आयुष्याची दोरी हातभर वाढवण्यास तुमच्यापैकीं कोण समर्थ आहे? तसेच वस्त्राविषयी का चिंता करत बसता? रानातील फुले पाहा, ती कशी वाढतांत? ती कष्ट करत नाहींत व सूत कातत नाहींत; तरी मी तुम्हांला सांगतो, शलमोनदेखील आपल्या सर्व वैभवात त्यांतल्या एकासारखाही सजला नव्हता. जे रानातले गवत आज आहे व उद्या भट्टीत पडते त्याला जर देव असा पोशाख घालतो, तर, अहो तुम्हीं अल्पविश्वासी, तो विशेषेकरून तुम्हांला पोशाख घालणार नाहीं काय?” (मत्तय 6:27-30)

मत्तय 6:25-34 मध्यें येशूनें योजिलेली अशी किमान सात अभिवचनें आहेंत, जी आम्हांला विश्वासासंबंधीचे जे सुयुद्ध ते लढण्यास आणि चिंतामुक्त होण्यास मोठे सहाय्य पुरवितांत. काल आपण अभिवचन क्र.1 आणि अभिवचन क्र.2 ही पहिली; आज आपण अभिववचन क्र.3 आणि अभिवचन क्र.4 ही पाहूं.

अभिवचन क्र.3: “चिंता करून आपल्या आयुष्याची दोरी हातभर वाढवण्यास तुमच्यापैकीं कोण समर्थ आहे?” (मत्तय 6:27)

हे स्वतःमध्यें एक विशिष्ठ प्रकारचे अभिवचन आहे — वास्तविकतेविषयी एक सामान्य ज्ञान देणारे अभिवचन जे तुम्हीं तुमच्या अनुभवातून शिकू शकता : चिंता करून तुमचा काहींही फायदा होणार नाहीं. हेंच ते अभिवचन आहे. हा मुख्य युक्तिवाद नाहीं, परंतु काहींवेळा आपल्याला स्वतःशी कठोरपणें वागावे लागते आणि हे मान्य करावें लागते, कीं “हे जिवा, तुझी ही कुरकुर पूर्णपणें निरुपयोगी आहे. ती तुला कसलीही खात्री देत नाहीं. तू केवळ तुझाच नाहीं तर इतर लोकांचाही दिवस वाया घालवत आहेंस. चिंता करणें सोड. ती सर्व देवावर टाक. आणि आपला नित्यक्रम सुरू ठेव.”

ज्यामुळें आपलें कल्याण होईल असे काहींही चिंता साध्य करत नाहीं. ह्याविषयीचे ते अभिवचन आहे. यावर विश्वास ठेवा. त्याप्रमाणें वागा.

अभिवचन क्र 4: “रानातील फुले पाहा, ती कशी वाढतांत? ती कष्ट करत नाहींत व सूत कातत नाहींत; तरी मी तुम्हांला सांगतो, शलमोनदेखील आपल्या सर्व वैभवात त्यांतल्या एकासारखाही सजला नव्हता. जे रानातले गवत आज आहे व उद्या भट्टीत पडते त्याला जर देव असा पोशाख घालतो, तर, अहो तुम्हीं अल्पविश्वासी, तो विशेषेकरून तुम्हांला पोशाख घालणार नाहीं काय?” (मत्तय 6:28-30)

देवाच्या दृष्टित तुमचे मूल्य हे रानातील फुलांपेक्षा अधिक आहे, कारण तुम्हीं सर्वकाळ जिवंत राहाल, आणि अशा प्रकारे त्याची प्रिय मुले म्हणून सर्वकाळ त्याची उपासना करू शकाल.

तरीसुद्धा, देवाकडें व्यवस्थापणाची उर्जा आणि खबरदारीचा असा भरभरून वाहणारा पुरवठा आहे, जो तो फक्त मोजके दिवस टिकणाऱ्या फुलांवर ओततो. म्हणून, तो नक्कीच तीच ऊर्जा आणि व्यवस्थापणाचे तेच कौशल्य यांचा उपयोग आपल्या त्या लेकरांची काळजी घेण्यासाठीं करावयांस समर्थ आहे जे सर्वकाळ जिवंत राहतील. आता प्रश्न हा आहे : आपण या अभिवचनावर विश्वास ठेऊन स्वतःला चिंतामुक्त करणार आहों का?

11 सितम्बर : परमेश्वर के प्रावधान की कहानियाँ

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11 सितम्बर : परमेश्वर के प्रावधान की कहानियाँ
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“यद्यपि तुम लोगों ने मेरे लिए बुराई का विचार किया था; परन्तु परमेश्‍वर ने उसी बात में भलाई का विचार किया, जिससे वह ऐसा करे, जैसा आज के दिन प्रगट है, कि बहुत से लोगों के प्राण बचे हैं।” उत्पत्ति 50:20

जो बच्चे अपने दादाओं से प्यार करते हैं, वे अक्सर उनकी कहानियाँ भी पसन्द करते हैं। यूसुफ के दादा इसहाक ने निश्चित रूप से उसके साथ बैठकर उसे परमेश्वर के प्रावधान की अनेक कहानियाँ सुनाई होंगी, ताकि वह अपने पोते के जीवन में सत्य बोले। आप और मैं केवल कल्पना कर सकते हैं कि यूसुफ ने इसहाक की कहानियों और शिक्षाओं को कितना संजोया होगा। लेकिन ऐसा प्रतीत होता है कि बीते समय में उनके परिवार को परमेश्वर की जो भलाई मिली, उसने यूसुफ को उनके सबसे दुखद क्षणों में भी स्थिर बनाए रखा, क्योंकि इस व्यक्ति की एक महत्त्वपूर्ण सच्चाई यह है कि वह हमेशा जानता था कि सारा नियन्त्रण परमेश्वर के हाथ में है। निश्चय ही यूसुफ यह कहना सीख रहा था, जैसा कि बाद में भजनकार ने गाया, “यदि मुझे विश्वास न होता कि जीवितों की पृथ्वी पर यहोवा की भलाई को देखूँगा, तो मैं मूर्छित हो जाता!” (भजन 27:13)।

वास्तव में, यूसुफ को परमेश्वर के प्रावधान का अनुभव प्राप्त करने के लिए एक के बाद एक अवसर मिले। 17 साल के किशोर के रूप में उसने देखा कि उसके भाइयों की घृणा के बीच भी परमेश्वर काम कर रहा था। रूबेन का यह सुझाव कि उन्हें यूसुफ को गड्ढे में डाल देना चाहिए, अन्ततः उसकी जान बचाने में मददगार साबित हुआ, लेकिन यह परमेश्वर का हस्तक्षेप था जिसने रूबेन को यह विचार दिया और यूसुफ के भाइयों को उसकी योजना के अनुसार करने के लिए प्रेरित किया।

कुछ समय बाद, एक इश्माएली कारवाँ ठीक समय पर वहाँ पहुँचा, जैसे कि कोई दिव्य नियुक्ति हो (जो कि थी भी!) वे अपने सामान्य तरीके से व्यापार कर रहे थे; वे यूसुफ को देखकर कह सकते थे, नहीं, हमें इसकी आवश्यकता नहीं है। फिर भी, परमेश्वर के प्रावधान ने यह निश्चित किया कि वे यूसुफ को खरीदें।

हर मामले में, परमेश्वर ने दूसरों के स्वार्थी हितों और इच्छाओं को यूसुफ की जान बचाने के लिए उपकरण के रूप में उपयोग किया, और अन्ततः कई अन्य लोगों की जानें बचाईं।

उत्पत्ति 50:20 का सत्य यूसुफ के जीवन का आधार है: हालाँकि उसके भाइयों ने बुराई की योजना बनाई, परन्तु परमेश्वर भलाई की योजना बना रहा था—और परमेश्वर का इरादा हमेशा विजयी होता है। यूसुफ का पार्थिव पिता चाहे पीछे कनान में छूट गया था, लेकिन उसका स्वर्गिक पिता उसके साथ मिस्र जा रहा था। चाहे उसका रास्ता उसके भाइयों की ईर्ष्या, पोतीपर की पत्नी की वासना, पोतीपर का क्रोध और पिलानेहार के स्वार्थ द्वारा बार-बार मोड़ा गया था, लेकिन सर्वोच्च रूप से यह उसके परमेश्वर द्वारा निर्देशित था, ताकि वह अपनी प्रजा का भला कर सके।

क्या यूसुफ के अनुसार हम भी परमेश्वर के बारे में इस सत्य को संजोते हैं? परमेश्वर अपने उद्देश्यों को पूरा करेगा, भले ही हमें यह न पता हो कि हम कहाँ जा रहे हैं या वह क्या कर रहा है। हर परिस्थिति में यही हमारी आशा है। जब परीक्षाएँ आती हैं, तब हमें उन्हें नकारना नहीं चाहिए, क्योंकि हम जानते हैं कि वे एक दयालु पिता के हाथ से आती हैं और वे किसी न किसी तरह से उसकी योजनाओं को पूरा करती हैं, ताकि वह अपनी प्रजा को बचा सके और उन्हें स्थिर बनाए रख सके। हम परमेश्वर की भलाई को अपने आध्यात्मिक परिवार के जीवन में देख सकते हैं, जो बीते समय में पवित्रशास्त्र और कलीसिया के इतिहास में देखने को मिलती है। आप यह निश्चित रूप से जान सकते हैं कि आपके सभी दिनों और सन्देहों, आपके सभी डर और असफलताओं, आपके सभी टूटे रिश्तों और अधूरे सपनों में, आप अपने स्वर्गिक पिता की देखभाल में बने रहते हैं।

उत्पत्ति 49:28 – 50:21

पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: न्यायियों 11–12; यूहन्ना 4:31-54 ◊

11 September : चिंता न करण्याची 7 कारणें, भाग 1

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11 September : चिंता न करण्याची 7 कारणें, भाग 1
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“ह्यास्तव मी तुम्हांला सांगतो कीं, आपल्या जिवाविषयी, म्हणजें आपण काय खावे व काय प्यावे; आणि आपल्या शरीराविषयी, म्हणजें आपण काय पांघरावे, ह्याची चिंता करत बसू नका. अन्नापेक्षा जीव आणि वस्त्रापेक्षा शरीर अधिक आहे कीं नाहीं? आकाशातील पाखरांकडें निरखून पाहा; ती पेरणी करत नाहींत, कापणी करत नाहींत कीं कोठारात साठवत नाहींत; तरी तुमचा स्वर्गीय पिता त्यांना खायला देतो; तुम्हीं त्यांच्यापेक्षा श्रेष्ठ आहात कीं नाहीं?” (मत्तय 6:25-26)

आपण येशूच्या डोंगरावरील प्रवचनाच्या या भागावर तीन दिवस मनन करणार आहों. मत्तय 6:25-34 मध्यें येशू विशेषतः अन्न आणि वस्त्रांविषयी आम्हांला असलेल्या चिंतेचा विषय हाताळत आहे. पण, खरे पाहता, हा विषय सर्व प्रकारच्या चिंतेंशी संबंधित आहे.

अमेरिकेतही, जरी तिथें व्यापक प्रमाणांत कल्याणकारी योजना राबविल्या जात असल्यां, तरी, अन्न वस्त्र व निवारा यांशी संबंधित मूलभूत गरजांसाठीं तीव्र चिंता असू शकतांत. त्यां ख्रिस्ती बांधवांचा तर विचारच नको जे अशा परिस्थितीत राहतांत जिथे अति दारिद्रयामुळें जीवन जगणें कठीण आहे. परंतु येशू 30 व्या वचनात म्हणतो कीं आपली चिंता खरे पाहता पित्यानें आपल्याला जी भावी कृपा पुरविण्याचे अभिवचन दिलें त्यावर असलेल्या आमच्या अल्प विश्वासामुळें उद्भवते : “अहो तुम्हीं अल्पविश्वासी.”

या वचनांत (25-34) किमान सात अशी अभिवचनें आहेत जीं येशूनें आम्हांला अविश्वासाविरुद्ध सुयुद्ध लढण्यास आणि चिंतामुक्त राहण्यास मदत करण्याच्या उद्देशाने योजिलेली आहेत. (आज आपण त्यांपैकीं पहिल्यां आणि दुसऱ्या अभिवचनाकडें पाहूं – आणि उर्वरित अभिवचनें येत्यां दोन दिवसांत.)

अभिवचन # 1: “ह्यास्तव मी तुम्हांला सांगतो कीं, आपल्या जिवाविषयी, म्हणजें आपण काय खावे व काय प्यावे; आणि आपल्या शरीराविषयी, म्हणजें आपण काय पांघरावे, ह्याची चिंता करत बसू नका. अन्नापेक्षा जीव आणि वस्त्रापेक्षा शरीर अधिक आहे कीं नाहीं?” (मत्तय 6:25)

ज्याअर्थी तुमचे शरीर आणि तुमचा जीव हे अन्न आणि वस्त्र यांचा पुरवठा करण्यापेक्षाही अति गुंतागुंतीनें बनविलेले आहे आणि गरज भागविण्याच्या दृष्टिने कठीण आहेंत आणि तरीही देवानें खरे पाहता तुमचे शरीर आणि तुमचा जीव दोन्ही निर्माण केलें आहे आणि तुम्हांला दिलेंत, मग त्याअर्थी तो नक्कीच तुम्हांला अन्न आणि वस्त्र यांचा पुरवठा करण्यास समर्थ आणि तत्पर आहे.

शिवाय, काहींही झालें तरी, एक दिवस येईल जेव्हां देव तुमची शरीरें मेलेल्यांतून उठवेल आणि तुमचा जीव आणि तुमची शरीरें ही स्वतः बरोबर सर्वकाळच्या सहवासासाठीं राखून ठेवील.

अभिवचन # 2: “आकाशातील पाखरांकडें निरखून पाहा; ती पेरणी करत नाहींत, कापणी करत नाहींत कीं कोठारात साठवत नाहींत; तरी तुमचा स्वर्गीय पिता त्यांना खायला देतो; तुम्हीं त्यांच्यापेक्षा श्रेष्ठ आहात कीं नाहीं?” (मत्तय 6:26)

जर देव पाखरांसारख्या अति क्षुल्लक जिवांना जें आपलें अन्न मिळविण्यासाठीं काहींही करू शकत नाहींत- जसे तुम्हीं शेती करतां – खायला देतो आणि तसे करावयांस तो समर्थही आहे, तर तो नक्कीच तुम्हांला तुमच्या गरजेच्या सर्व वस्तु पुरवील, कारण तुम्हीं त्यांच्यापेक्षा श्रेष्ठ आहां. तुमच्यात देवावर विश्वास ठेवून व त्याच्या आज्ञा पाळत व त्याचे आभार मानून देवाचे गौरव करण्याची अद्भुत क्षमता आहे जी पाखरांमध्यें नाहीं.

10 सितम्बर : हमारा महान महायाजक

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10 सितम्बर : हमारा महान महायाजक
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“इसलिए जब हमारा ऐसा बड़ा महायाजक है, जो स्वर्गों से होकर गया है, अर्थात् परमेश्‍वर का पुत्र यीशु, तो आओ, हम अपने अंगीकार को दृढ़ता से थामे रहें . . . इसलिए आओ, हम अनुग्रह के सिंहासन के निकट हियाव बाँधकर चलें कि हम पर दया हो, और वह अनुग्रह पाएँ जो आवश्यकता के समय हमारी सहायता करे।” इब्रानियों 4:14-16

पुराना नियम बार-बार यह बताता है कि इस्राइल के महायाजकों पर कितनी बड़ी जिम्मेदारी होती थी (उदाहरण के लिए, निर्गमन 29 और लैव्य. 16 देखें)। महायाजक के पद को हल्के में नहीं लिया जा सकता था। केवल वही परम पवित्र स्थान में प्रवेश कर सकता था, जो यहूदी मन्दिर का भीतरी कक्ष था। केवल वही “लोगों की भूल-चूक के लिए” रक्त बलि अर्पित कर सकता था (इब्रानियों 9:7)। हालाँकि वह स्वयं निष्पाप नहीं होता था, फिर भी वह अपने समुदाय के लिए परमेश्वर के सामने एक अभिभावक के रूप में कार्य करता था।

लेकिन जैसा कि इब्रानियों का लेखक हमें बताता है, एक महान महायाजक हुआ है—अर्थात यीशु—जिसने वह किया जो कोई अन्य याजक नहीं कर सका और जिसने उस जिम्मेदारी को उठाया जिसका भार कोई अन्य मनुष्य नहीं उठा सका।

यीशु ने यरूशलेम के मन्दिर में पर्दे के पीछे परम पवित्र स्थान में प्रवेश नहीं किया। इसके बजाय, परमेश्वर के पुत्र के रूप में वह स्वर्गों में से होकर गया, ताकि वह अब हमारे लिए पिता के सिंहासन के सामने प्रकट हो सके। हमें पृथ्वी पर उसकी शारीरिक अनुपस्थिति का शोक नहीं करना चाहिए, केवल इसलिए नहीं कि वह पवित्र आत्मा के माध्यम से हमारे साथ है, बल्कि इस कारण से भी कि उसकी शारीरिक अनुपस्थिति का अर्थ है कि वह अब भी हमारे लिए परमेश्वर पिता से सीधे बात कर रहा है (इब्रानियों 7:25)।

इसीलिए नए नियम में सेवाकार्य को उन याजकों के लिए अलग नहीं किया गया है, जो रक्त बलियाँ अर्पित करते हैं। जिन्हें परमेश्वर ने बुलाया है और जिन्हें अपने लोगों का मार्गदर्शन करने और शिक्षा देने की जिम्मेदारी दी है, उन्हें परमेश्वर के सामने अपने लोगों के लिए वैसे याजकों की तरह मध्यस्थी करने की आवश्यकता नहीं है, जैसे पुराने नियम के याजकों को थी। क्योंकि हमारे महान महायाजक ने पापों के लिए एक महान बलि अर्पित कर दी है, इसलिए अब किसी और मध्यस्थ की आवश्यकता नहीं है। वास्तव में, उसका याजक पद न तो स्वर्ग में और न ही पृथ्वी पर पाप के लिए किसी और बलि की आवश्यकता छोड़ता है। केवल वही हमारे लिए मर सकता था और हमारे लिए बोल सकता था, और केवल वही ऐसा कर चुका है।

मसीह के याजक पद की महानता इस तथ्य में निहित है कि उसने हमारे पापों के लिए एक बार और हमेशा के लिए स्वयं को बलि चढ़ा दिया। हमें और कुछ नहीं चाहिए, सिवाय इसके कि हम यह पहचानें कि “यह युगानुयुग रहता है, इस कारण उसका याजक पद अटल है” (इब्रानियों 7:24)। केवल यीशु ही हममें से उन लोगों को बचा सकता है, जो अपनी नहीं बल्कि उसकी योग्यताओं के आधार पर परमेश्वर के पास आते हैं। वह अपने लोगों के लिए मध्यस्थी करने के लिए हमेशा जीवित है। वह अभी, इस समय, आपके लिए यही कर रहा है। इसलिए आप आत्मविश्वास के साथ यह जानकर जी सकते हैं कि जब भी आप प्रार्थना करते हैं, आपको स्वर्ग के सिंहासन कक्ष में पहुँच प्राप्त होती है—और आपकी मृत्यु के बाद आपकी आत्मा को भी वहाँ प्रवेश मिलेगा। आज आपको बस इतना करना है कि आप अपने महान महायाजक में अपने विश्वास के अंगीकार को बनाए रखें, जिसने सारा आवश्यक कार्य पूरा कर दिया है।

इब्रानियों 7:23-28

◊ पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: न्यायियों 9–10; यूहन्ना 4:1-30

10 September : चिंतेशी सुयुद्ध कसे करावे

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10 September : चिंतेशी सुयुद्ध कसे करावे
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त्याच्यावर तुम्हीं ‘आपली’ सर्व ‘चिंता टाका’ कारण तो तुमची काळजी घेतो. (1 पेत्र 5:7)

स्तोत्र 56:3 म्हणते, “मला भीती वाटेल तेव्हा मी तुझ्यावर भरवसा टाकींन.”

लक्ष द्या: हे वचन “मला कधीही भीती वाटणार नाहीं” असे म्हणत नाहीं. भीती हल्ला करते आणि मग एक संघर्ष सुरू होतो. त्यामुळें खऱ्या विश्वासणाऱ्यांना कोणतीही चिंता नसते असे बायबल गृहीत धरत नाहीं. तर, जेव्हा चिंता प्रहार करतांत तेव्हा त्यांशी कसे सुयुद्ध करावे ते बायबल आपल्याला सांगते.

जसे कीं 1 पेत्र 5:7 म्हणते, “त्याच्यावर तुम्हीं ‘आपली’ सर्व ‘चिंता टाका’ कारण तो तुमची काळजी घेतो.” हे वचन असे म्हणत नाहीं कीं तुम्हांला कधीही चिंता वाटणार नाहीं. ते म्हणते, जेव्हा तुम्हांला चिंता वाटतील तेव्हा तुम्हीं त्यां सर्व देवावर टाका. तुम्हीं गाडी चालवत असतांना जर अचानक चिखल तुमच्या कारच्या समोरील काचेवर (विंडशील्डवर) उडून येतो आणि लगेच समोरचे दृश्य तात्पुरते अस्पष्ट होऊन जाते, आणि तुम्हीं चिंतेने हडबडू लागता, तेव्हा तुम्हीं त्वरित तुमचे वायपर चालू करता आणि कारचे विंडशील्ड वॉशर देखील सुरु करता, व चिखलाने माखलेली काच स्वच्छ करता.

म्हणून एखादी व्यक्ती जिला दररोज चिंतेच्या भावनांशी संघर्ष करावा लागतो तिला माझे उत्तर हेच आहे: चिंता ह्या सामान्य आहेत. कमीतकमी माझ्याबाबतींत तरी ते खरे आहे, विशेषकरून माझ्या किशोरवयीन काळापासूनच प्रश्न     आहे: आपण त्यांच्याशी कसे सुयुद्ध करतो?

या प्रश्नाचे उत्तर आहे : आपण अविश्वासाविरुद्ध लढा देत व भावी काळातील कृपेवर विश्वासाची धाव धावीत आपल्या चिंतेंशी सुयुद्ध करतो. आणि ज्या प्रकारे तुम्हीं हे “विश्वासासंबंधीचे सुयुद्ध” लढता (1 तीमथ्य 6:12; 2 तीमथ्य 4:7) ते म्हणजें भविष्यातील कृपेच्या देवाच्या अभिवचनांवर मनन करित व त्याच्या आत्म्याच्या सहाय्यासाठीं प्रार्थना करित.

विंडशील्ड वाइपर ही देवाची वचने आहेत जी अविश्वासाचा चिखल स्वच्छ करतांत आणि विंडशील्डवर आपण जे पाण्याचे फव्वारे मारतो ते पवित्र आत्म्याचे साहाय्य आहे. आपण पापापासून – त्यांत चिंतेचे देखील पाप आहे – मुक्तीचे सुयुद्ध “आत्म्याच्या द्वारे व सत्यावरच्या विश्वासात” लढतो (2 थेस्सलनीकाकर 2:13).

आत्म्याचे कार्य आणि सत्याचे वचन. ही दोन्ही मिळून मोठा विश्वास निर्माण करतांत. चिखल मऊ करणाऱ्या पवित्र आत्म्याच्या कार्याशिवाय, वचनाचे वाइपर केवळ विंडशील्डवरील अविश्वासाच्या आंधळ्या गुच्छांवर खरवडतांत.

दोन्ही आवश्यक आहेत : आत्मा व वचन. आपण देवाची वचने वाचतो आणि त्याच्या आत्म्याच्या सहाय्यासाठीं प्रार्थना करतो. आणि जसजसे विंडशील्ड स्वच्छ होत जाते, जेणेंकरून देवानें आपल्यासाठीं जे कल्याणाची योजना आखली आहे ती आपण पाहू शकू (यिर्मया 29:11), तसतसा आपला विश्वास बळकट होत जातो आणि चिंता ह्या नाहींश्या होऊं लागतांत.