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6 नवम्बर : आश्वासन की खोज

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6 नवम्बर : आश्वासन की खोज
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“एक मनुष्य यीशु के पास आया और उससे कहा, ‘हे गुरु, मैं कौन सा भला काम करूँ कि अनन्त जीवन पाऊँ?’ … यीशु ने उससे कहा, ‘यदि तू सिद्ध होना चाहता है तो जा, अपना माल बेचकर कंगालों को दे, और तुझे स्वर्ग में धन मिलेगा; और आकर मेरे पीछे हो ले।’ परन्तु वह जवान यह बात सुन उदास होकर चला गया, क्योंकि वह बहुत धनी था।” मत्ती 19:16, 21-22

धार्मिक नियमों और विधानों का पालन करके स्वर्ग में प्रवेश पाने का प्रयास न तो मन को शान्ति देता है, न सुरक्षा की भावना उत्पन्न करता है, और न ही हमें पापों की क्षमा का आश्वासन देता है। और न ही यह हमें अनन्त जीवन दिलाता है।

इसी क्षमा के आश्वासन की कमी ने एक युवा शासक को यीशु के पास जाने और साहसपूर्वक यह प्रश्न पूछने के लिए प्रेरित किया। वह धनी था; लूका हमें यह भी बताता है कि वह एक प्रधान था—शक्तिशाली और प्रभावशाली (लूका 18:18)—ऐसा व्यक्ति जिसे संसार आदर की दृष्टि से देखता है और धन्य मानता है। इसके अलावा, वह परमेश्वर की आज्ञाओं का पालन करने के प्रति गम्भीर था (मत्ती 19:20)। हमें यह सोचने के लिए प्रेरित किया जाता है, “यदि कोई अनन्त जीवन प्राप्त कर सकता है, तो निश्चय ही यह व्यक्ति कर सकता है।” इसलिए इस व्यक्ति को शायद यह उम्मीद थी कि यीशु उसकी धार्मिकता की सराहना करेगा और उसे स्वर्गिक प्रतिफल का आश्वासन देगा।

लेकिन यीशु ने कोमलता से उसे यह दिखाया कि वह परमेश्वर की व्यवस्था का पूर्णतः पालन नहीं कर रहा था। वास्तव में, इस युवक ने सबसे पहली और सबसे महत्त्वपूर्ण आज्ञा को तोड़ा था: उसने अपने पूरे हृदय, आत्मा, शक्ति और बुद्धि से परमेश्वर से प्रेम करने के बजाय अपने धन को अधिक प्रिय माना था। यही कारण था कि जब यीशु ने उसे अपने धन को छोड़कर उनका अनुसरण करने के लिए कहा, तो वह दुखी होकर चला गया। यीशु ने इस व्यक्ति को दिखाया कि परमेश्वर की आज्ञाएँ कोई सीढ़ी नहीं हैं, जिन्हें चढ़कर हम परमेश्वर की स्वीकृति प्राप्त कर सकते हैं, बल्कि वे एक दर्पण हैं, जो हमारी वास्तविक आत्मिक स्थिति को प्रकट करती हैं।

इस धनी युवक की समस्या उसके हृदय की थी। यही हमारी भी समस्या है। बाइबल कहती है कि हम परमेश्वर से स्वाभाविक रूप से विमुख हैं और स्वयं को सही सम्बन्ध में लाने में असमर्थ हैं। हमने परमेश्वर से पूरे हृदय से प्रेम नहीं किया है, क्योंकि हमने उससे अधिक अन्य चीजों से प्रेम किया है।

परमेश्वर की आज्ञाओं को पूरी तरह मानने और उससे प्रेम करने में इस युवक की असमर्थता हमारी भी असमर्थता है। कोई भी मनुष्य न तो ऐसा कर पाया है, न कर सकता है, और न ही कभी कर पाएगा कि वह परमेश्वर से पूरी तरह से प्रेम करे और उसकी सभी आज्ञाओं का सिद्ध रूप में पालन करे—सिवाय स्वयं यीशु के। और यही हमारे लिए शुभ समाचार है! हमारा उद्धार हमारे कार्यों पर निर्भर नहीं है। बल्कि, शान्ति, सुरक्षा, क्षमा, और परमेश्वर के साथ सही सम्बन्ध हमें तब प्राप्त होता है, जब हम पूरी तरह उसकी दया पर निर्भर होते हैं—जब हम उद्धार के उसके मुफ्त उपहार को स्वीकार करते हैं और जब हम यीशु के क्रूस पर किए गए बलिदान को नम्रता और कृतज्ञता के साथ ग्रहण करते हैं।

उस धनी युवक को दुखी होकर यीशु के पास से चले जाने की आवश्यकता नहीं थी। वह अपने अहंकार और आत्मनिर्भरता को त्याग सकता था। अपनी धार्मिकता और सम्पत्ति को थामे रहने के कारण निरन्तर अशान्ति में रहने के बजाय वह यीशु को पहले स्थान पर रखने के आनन्द को अनुभव कर सकता था। आत्मनिर्भरता सदैव व्यर्थ सिद्ध होगी और जैसा उसके साथ हुआ था वैसे ही हमें भी चिन्ता और असुरक्षा में डाल देगी। लेकिन यदि हम बालकों के समान विश्वास और भरोसे के साथ अपने उद्धारकर्ता के पास जाएँ, तो हम सच्ची शान्ति और अनन्त जीवन का आश्वासन प्राप्त कर सकते हैं।

इसलिए अपने हृदय में यीशु को सिंहासन पर बैठाएँ और आप जो कुछ हैं तथा आपके पास जो कुछ है, उसे उसकी सेवा में अर्पित करने के लिए तैयार रहें। यीशु के पास खाली हाथ आएँ और उस आनन्द तथा जीवन को प्राप्त करें, जो केवल वही दे सकता है।

मत्ती 19:16-30

पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: सपन्याह; कुलुस्सियों 4 ◊

6 November : एकमेकांवर आनंदानें प्रीति करा

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6 November : एकमेकांवर आनंदानें प्रीति करा
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“हे मनुष्या, बरें काय ते त्यानें तुला दाखवलें आहे; नीतीनें वागणें, आवडीनें दया करणें व आपल्या देवासमागमें राहून नम्रपणें चालणें ह्यांवाचून परमेश्वर तुझ्याजवळ काय मागतो?” (मीखा 6:8)

एखाद्या व्यक्तीला असें सांगण्यात आल्यामुळें कीं जेव्हां त्याला आनंद प्राप्त होतो तेव्हा दुसऱ्या व्यक्तीस आनंदाची प्राप्ती होईल , म्हणून आपण प्रेमास पात्र नाहीं असें कोणालाही कधीही वाटलें नाहीं. आवडीनें दया करणें मला आनंद देतो या आधारावर दयाळूपणाचे समर्थन करत असतांना माझ्यावर कधीही स्वार्थीपणाचा आरोप करण्यात आलेला नाहीं. या उलट, कुरकुर न करता करण्यात आलेंली प्रीतिची कृत्ये अस्सल असतांत.

आणि नाखुशीनें दया करणें चा योग्य पर्याय तटस्थपणें किंवा कर्तव्यबुद्धीनें दया करणें नसून, तर आनंदानें दया करणें हा आहे. अस्सल प्रीतिनें भरलेलें परिपूर्ण अंतःकरण दयाळूपणामध्यें आनंद करते (मीखा 6:8); ते फक्त दया करत नाहीं. ख्रिस्ती पूर्णानंद हे सत्य विचारात घेण्यास भाग पाडते.

“आपण देवावर प्रीति करतो व त्याच्या आज्ञा पाळतो तेव्हां त्यावरून आपल्याला कळून येते कीं, आपण देवाच्या मुलांवर प्रीति करतो. देवावर प्रीति करणें म्हणजें त्याच्या आज्ञा पाळणें होय; आणि त्याच्या आज्ञा कठीण नाहींत. कारण जे कांहीं देवापासून जन्मलेलें आहे ते जगावर जय मिळवते; आणि ज्यानें जगावर जय मिळवला तो म्हणजें आपला विश्वास.” (1 योहान 5:2-4)

ही वाक्ये उलट् क्रमानें वाचा आणि तर्कावर लक्ष द्या. प्रथम, जेव्हां आपण देवापासून जन्मलेलें असतो, तेव्हां आपल्याला ह्या जगावर जय मिळविण्याचे सामर्थ्य प्राप्त होते. देवाच्या आज्ञा कठीण नाहींत या कथनासाठीं पार्श्वभूमी किंवा आधार म्हणून ही गोष्ट आपल्या निदर्शनास आणण्यांत आली आहे (“कारण” या शब्दावर लक्ष द्या).

तर मग, देवापासून जन्मलेलें असल्यामुळेच आम्हास असें सामर्थ्य प्राप्त होते ज्याद्वारें आपण जगाच्या तिरस्कारावर विजय मिळवितो आणि देवाची इच्छा पाळतो. यापुढे आपल्यासाठीं त्याच्या आज्ञा “कठीण” नाहींत, तर त्यां आपल्या अंतःकरणाचे मनोदय व आनंद आहेत. ही परमेश्वराची खरी प्रीति आहे : केवळ आपण त्याच्या आज्ञांचे पालन करतो असें नाहीं, तर आता त्या कठीणहि नाहींत.

मग दुसऱ्या वचनांत असें सांगितलें आहे कीं देवाच्या मुलांवर आपण जी प्रीति करतो तिच्या खरेपणाचा पुरावा म्हणजें देवावर प्रीति करणें हा आहे. देवाच्या मुलांवर प्रीतिविषयी हे आपल्याला काय शिकवते?

ज्याअर्थी देवावर प्रीति हे कठीण काम जाणवत नसून आनंदानें त्याची इच्छा पूर्ण करणें आहे, आणि देवावर प्रीति ही देवाच्या मुलांवरील आमच्या प्रीतिचे मोजमाप आहे, त्याअर्थी देवाच्या मुलांवरील आपली प्रीति ही देखील नाखुशीनें नव्हे तर आनंदानें केली गेलेली असलीं पाहिजे.

ख्रिस्ती पूर्णानंद म्हणजें प्रामाणिकपणें केलेल्या प्रीतिची सेवा, कारण तो पूर्णानंद आम्हास नाखुशीनें आज्ञापालन करण्यांस नाहीं, तर आनंदानें आज्ञापालन करण्यास आवरून धरतो.

5 नवम्बर : इतिहास का रहस्य

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5 नवम्बर : इतिहास का रहस्य
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“उसकी पड़ोसिनों ने यह कहकर, ‘नाओमी के एक बेटा उत्पन्न हुआ है,’ लड़के का नाम ओबेद रखा। यिशै का पिता और दाऊद का दादा वही हुआ।” रूत 4:17

इतिहास महत्त्वपूर्ण है। आपका इतिहास महत्त्वपूर्ण है।

आप आज जो भी हैं, उसमें एक बड़ा योगदान आपके माता-पिता, आपके दादा-दादी, और उनके पूर्वजों का है। अनिवार्य रूप से, हम सभी अपने वंश के उत्पाद हैं—और इस कारण से, हम परमेश्वर की पूर्व-निर्धारित योजना का जीवन्त प्रमाण हैं, जिसने हमें इस समय और इस स्थान तक पहुँचाया है।

जब रूत ने ओबेद को जन्म दिया, जो नाओमी का पोता था, तो वह यह नहीं जान सकती थी कि आगे क्या होने वाला है। लेकिन इस घटनाक्रम का लेखक हमें बताता है कि ओबेद आगे चलकर महान राजा दाऊद का दादा बनेगा—और इस प्रकार, वह यीशु मसीह के पूर्वजों में से एक होगा। लेकिन परमेश्वर यह सब पहले से जानता था। यहाँ हम परमेश्वर की उद्धारकारी योजना को कार्य करते हुए देखते हैं। रूत और उसका परिवार अन्धी शक्तियों के नियन्त्रण में नहीं थे और न ही भाग्य की लहरों से उछाले जा रहे थे। ओबेद का जन्म परमेश्वर की देखभाल, सम्प्रभुता और प्रावधान की एक और याद दिलाता है—कि वह हमारे निर्णयों, जीवन के उतार-चढ़ाव और परिस्थितियों के पीछे कार्यरत रहता है और अपनी योजनाओं को पूरा करता रहता है।

यही सम्पूर्ण इतिहास का रहस्य है: परमेश्वर ने हमारे अतीत के सभी तत्वों को, चाहे वे कितने भी अलग-अलग क्यों न हों, इस तरह जोड़ दिया है कि वे हमें आज यहाँ तक ले आए हैं। इससे पहले कि हमारे नन्हे दिल यह समझ पाते कि क्या हो रहा है, परमेश्वर कृपा और दया के साथ हमारी देखभाल कर रहा था—उन माताओं के रूप में जो हमें भोजन देती थीं, उन पारिवारिक मित्रों के रूप में जो हमारी देखभाल करते थे, या उन दादा-दादी के रूप में जो हमारे पास आते थे।

आपके गर्भाधान के समय से ही परमेश्वर ने आपको सुरक्षित रखा है और आपका मार्गदर्शन किया है, यहाँ तक कि आपके सबसे अन्धकारमय दिनों में भी वह आपके साथ रहा है। आप और मैं केवल परमाणुओं का एक संयोग मात्र नहीं हैं। हम परमेश्वर की दिव्य सृष्टि हैं, और वह हमारी देखभाल कर रहा है। न केवल वह हमारी रक्षा करता है, बल्कि उसने हमें उद्धार भी दिया है। सृष्टि के आरम्भ से ही परमेश्वर ने व्यक्तियों और परिवारों के माध्यम से कार्य किया है, ताकि वह अपनी विशेष निज प्रजा को संजो सके। उत्पत्ति से लेकर प्रकाशितवाक्य तक, हमें परमेश्वर की इस उद्धारकारी और अनन्त योजना की झलक मिलती है। मोआबिन रूत का इस चुनी हुई प्रजा में शामिल किया जाना, परमेश्वर की सम्प्रभु और व्यापक दया को प्रमाणित करता है। उसने रूत और बोअज़ के इस अनपेक्षित विवाह को उपयोग करके एक ऐसा वंश तैयार किया, जिससे राजा दाऊद और अन्ततः मसीह का जन्म हुआ।

रूत जैसे उदाहरण से हमारा विश्वास इस बात में दृढ़ होना चाहिए कि परमेश्वर क्या-क्या कर सकता है। ऐसे उदाहरण से हमें साहस मिलना चाहिए कि हम अपने मित्रों और पड़ोसियों से कहें कि हमारे राष्ट्र में घटित होने वाले महिमामय काम और त्रासदियाँ, हमारे जीवन की खुशियाँ और दुख, और पारिवारिक जीवन के दुख-दर्द और निराशाएँ—इन सबका अन्तिम अर्थ मानव इतिहास या व्यक्तिगत जीवनकथा में नहीं, बल्कि परमेश्वर की योजना में पाया जाता है। उसने स्वयं को प्रेममय और पवित्र, व्यक्तिगत और अनन्त, सृष्टिकर्ता और उद्धारकर्ता, पालक और शासक के रूप में प्रकट किया है। उसने हमें मुक्ति की उस महान कथा में सम्मिलित किया है—एकमात्र ऐसी कथा जो अनन्तकाल तक बनी रहेगी।

यह एक शुभ समाचार है! जब दिन अन्धकारमय होते हैं और सन्देह वास्तविक लगते हैं, तब यह हमारे आत्मा के लिए भोजन बनता है। यह हमें यह आश्वासन देता है कि परमेश्वर हमें कभी नहीं छोड़ेगा। यह हमारे जीवन को सार्थक बनाता है।

मत्ती 1:1-18

◊ पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: हबक्कूक; कुलुस्सियों 3

5 November : तुम्हीं तुमच्यां तारणाकडे दुर्लक्ष करतां का?

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5 November : तुम्हीं तुमच्यां तारणाकडे दुर्लक्ष करतां का?
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“तर आपण एवढ्या मोठ्या तारणाकडे दुर्लक्ष केल्यास आपला कसा निभाव लागेल?” (इब्री 2:3)

तुमचे तारण किती मोठे आहे ह्याची जाणीव तुम्हांला आहे का? कीं तुम्हीं त्याकडे दुर्लक्ष करतां?

तुम्हीं तुमच्यां ह्या मोठ्या तारणाकडे कसे पाहतां? कीं तुम्हीं त्याच्याशी तुमची अंतिम इच्छा आणि मृत्युपत्र, किंवा तुमच्यां कारचा अधिकार किंवा तुमच्यां घराचे विक्रीपत्र यांशी व्यवहार करावा तसे वागता? तुम्हीं त्यावर एकदा स्वाक्षरी केली आणि ते आता कुठेतरी फाईलच्या एका कपाटात आहे, पण तुमच्यां दृष्टीनें ती खरें पाहतां इतकी पण मोठी गोष्ट नाहीं. तुम्हीं त्या विषयीं क्वचितच विचार करता. रोज पडावा तसा त्याचा तुमच्यांवर काहीं फरक पडत नाहीं. मुळांत तुम्हीं त्याकडे दुर्लक्ष करता.

पण जेव्हां तुम्हीं तुमच्यां अशा मोठ्या तारणाकडे दुर्लक्ष करता तेव्हां तुम्हीं खरोखर कशाकडे दुर्लक्ष करत असतां? “तुमच्यां मोठ्या तारणाकडे दुर्लक्ष करूं नका!“ असें जेव्हां तो म्हणतो तेव्हां त्याला हेंच म्हणायचे आहे.

  • देवानें तुमच्यांवर प्रीति केलीं याकडे दुर्लक्ष करूं नका.
  • सर्वशक्तिमान परमेश्वरानें तुम्हांला तुमच्यां पापांची क्षमा प्राप्त केलीं आणि तुम्हांला आपलें केलें आणि सुरक्षित केलें आणि तुम्हांला बळ दिलें व तो तुमचे मार्गदर्शनहि करित आहे याकडे दुर्लक्ष करूं नका.
  • वधस्तंभावर ख्रिस्तानें त्याचे जीवन अर्पण केलें याकडे दुर्लक्ष करूं नका.
  • विश्वासाद्वारें गणिले गेलेले जे नीतिमत्व त्याच्या विनामूल्य देणगीकडे दुर्लक्ष करूं नका.
  • देवाचा कोप तुमच्यांपासून दूर करण्यांत आला आणि देवाबरोबर तुमचा सुखद समेट करण्यांत आला त्याकडे दुर्लक्ष करूं नका.
  • तुमच्यांत पवित्र आत्म्याचा निवास आणि जिवंत ख्रिस्ताची सहभागिता व तसेच त्याशी तुमचे सौख्य याकडे दुर्लक्ष करूं नका.
  • येशू ख्रिस्ताच्या मुखावर प्रकट झालेल्या देवाच्या गौरवाचे तेज व त्याच्या तत्त्वाचे प्रतिरूप याकडे दुर्लक्ष करूं नका.
  • कृपेच्या सिंहासनासमोर तुम्हांला जो विनामूल्य प्रवेंश दिला गेला आहे याकडे दुर्लक्ष करूं नका.
  • परमेश्वराच्या अभिवचनाच्या अफाट खजिन्याकडे दुर्लक्ष करूं नका.

हे खरोखर मोठे तारण आहे. त्याकडे दुर्लक्ष करणें म्हणजें अति दुष्टपणाच. इतक्या मोठ्या तारणाकडे दुर्लक्ष करूं नका. कारण जर तुम्हीं दुर्लक्ष्य केलें तर न्यायाच्या दिवशी तुमचा कसा निभाव लागेल? लेखक हांच प्रश्न विचारत आहे: “एवढ्या मोठ्या तारणाकडे दुर्लक्ष केल्यास आपला कसा निभाव लागेल?”

म्हणून, ख्रिस्ती असणें ही एक अतिशय गंभीर बाब आहे – ही सामान्य गोष्ट नाहीं तर एक गंभीर विषय आहे. आपल्या मोठ्या तारणात आनंद करण्याविषयी आपल्याला कळकळ असली पाहिजे.

आपण या जगाद्वारें पापाच्या क्षणिक आणि आत्मघाती सुखविलासाकडे ओढले जाऊ नये. आपण परमेश्वराठायीं आमच्या सनातन आनंदाकडे दुर्लक्ष करूं नये – हेंच या तारणाचे ध्येय होय. एवढ्या मोठ्या तारणापासून दूर वाहवत जाण्यापेक्षा आपण आपलें डोळे उपटून काढलें तर बरे होईल.

4 नवम्बर : साधारण बातों में महिमा

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4 नवम्बर : साधारण बातों में महिमा
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“तब स्त्रियों ने नाओमी से कहा, ‘यहोवा धन्य है, जिसने तुझे आज छुड़ाने वाले कुटुम्बी के बिना नहीं छोड़ा; इस्राएल में इसका बड़ा नाम हो। और यह तेरे जी में जी ले आने वाला और तेरा बुढ़ापे में पालने वाला हो …’ फिर नाओमी उस बच्चे को अपनी गोद में रखकर उसकी धाय का काम करने लगी।” रूत 4:14-16

एक नवजात शिशु को प्रसन्न दादा-दादी से मिलवाया जाना कोई असामान्य दृश्य नहीं है। लेकिन नाओमी के अतीत और इस छोटे परिवार के भविष्य को देखते हुए यह दृश्य साधारण होते हुए भी असाधारण बन जाता है।

नाओमी अपने पति और पुत्रों को दफनाने के बाद खाली हाथ और दुखी बैतलहम लौट आई थी। लेकिन अब उसका जीवन और उसकी गोद एक बार फिर आनन्द और आशा से भर गए थे। यह बालक भविष्य की एक पीढ़ी था, जो उसके बुढ़ापे में उसके जीवन का सहारा बनने वाला था। इस भाव में, यह बालक उसके लिए स्वतन्त्रता अर्थात छुटकारा लेकर आया था। लेकिन जब हम इस साधारण दृश्य को यीशु के देहधारण के प्रकाश में देखते हैं, तो हम जानते हैं कि यह एक असाधारण समाचार की घोषणा भी करता है: परमेश्वर की अनुग्रहपूर्ण देखभाल के कारण, न केवल दो असहाय विधवाओं को सहायता मिली, बल्कि समस्त इस्राएल—बल्कि सम्पूर्ण मानवजाति—को भी लाभ हुआ। रूत के माध्यम से परमेश्वर ने उस वंश को आगे बढ़ाया, जिससे आगे चलकर राजा दाऊद और फिर स्वयं यीशु मसीह आए।

यहाँ तक कि यीशु, जो राजाओं का राजा और प्रभुओं का प्रभु है, साधारण जीवन की परिस्थितियों में पाया गया। वह भी किसी की गोद में लेटा था। उसके भी साधारण सांसारिक माता-पिता थे। उसका जन्म किसी भव्य महल में नहीं, बल्कि एक पशुशाला में हुआ था। उसकी विजय किसी जीते हुए सिंहासन के माध्यम से नहीं, बल्कि अपराधियों के लिए बने क्रूस के माध्यम से आई थी। अधिकांश लोगों की सर्वशक्तिमान परमेश्वर के देहधारण से ये अपेक्षाओं नहीं थीं—और फिर भी, ठीक वैसे ही जैसे जब ज्योतिषी यीशु को सबसे पहले महल में खोजने गए (मत्ती 2:1-3), हम भी कई बार उसे गलत स्थानों में खोजने लगते हैं। जब ऐसा होता है, तो हम भी “नाओमी” बनने के बजाय “मारा” बनने का खतरा उठाते हैं (रूत 1:20)—हम सन्तोष का आनन्द लेने के बजाय कटुता अनुभव कर सकते हैं।

परमेश्वर की अनन्त योजनाएँ साधारण स्थानों में साधारण लोगों द्वारा साधारण कार्य करते हुए उनके साधारण जीवन के बीच प्रकट होती हैं। यदि आपका जीवन भी साधारण है, तो इससे आपको प्रोत्साहन मिलना चाहिए! हममें से बहुत कम लोगों का शायद ही इतिहास में कोई उल्लेख भी हो। चाहे आप एक साधारण माँ हों, जो अपने साधारण बच्चों का पालन-पोषण कर रही है, एक साधारण दादा हों, जो वही पुरानी कहानियाँ बार-बार सुना रहे हैं, या एक साधारण छात्र हों, जो अपने साधारण गृहकार्य और दैनिक गतिविधियों में व्यस्त हैं—आप चाहे जिस भी तरह के साधारण हों, परमेश्वर की महिमा आपके चारों ओर देखी जा सकती है। और परमेश्वर के अनुग्रह के द्वारा आपकी साधारण निष्ठा सुसमाचार के उद्देश्य के लिए असाधारण प्रभाव डाल सकती है।

जब आपको लगे कि आप कुछ खास नहीं कर रहे हैं—जब शैतान आपको इस झूठ पर विश्वास दिलाने की कोशिश करे कि आप कोई अन्तर नहीं ला सकते या आप परमेश्वर की योजना के बाहर हैं—तो इसे याद रखें: जब मानव उपलब्धियाँ, शब्द और ज्ञान विलीन हो जाएँगे, तब भी परमेश्वर आपके माध्यम से जो विश्वासयोग्यता, दया, सत्यनिष्ठा, प्रेम और कोमलता उत्पन्न करता है, वह पुरुषों और स्त्रियों के जीवन में आपकी कल्पना से कहीं अधिक प्रभाव डालेंगे। यही नाओमी की कहानी का और सम्पूर्ण इतिहास का आश्चर्यजनक तथ्य है—कि परमेश्वर की असाधारण महिमा साधारण बातों में कार्यरत रहती है। यह सत्य आपके दिन को देखने और उसे जीने के दृष्टिकोण को पूरी तरह बदल सकता है।

रूत 4:13-21

पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: नहूम; कुलुस्सियों 2 ◊

4 November : चिंतेची वास्तविक समस्या

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4 November : चिंतेची वास्तविक समस्या
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“जे रानातलें गवत आज आहे व उद्या भट्टीत पडते त्याला जर देव असा पोशाख घालतो, तर, अहो तुम्हीं अल्पविश्वासी, तो विशेषेकरूंन तुम्हांला पोशाख घालणार नाहीं काय?” (मत्तय 6:30).

येशू म्हणतो कीं आमचा अल्पविश्वास हा आमच्यां चिंतेचे मूळ आहे – आमचा पिता आम्हांला भविष्यांत जी कृपा पुरविणार असतो त्याविषयी “अल्पविश्वास”.

ह्याला आम्हीं कदाचित अशी प्रतिक्रिया देऊं: “ही सुवार्ता नाहीं! वस्तुतः, हे ऐकून फार निराशा होते कीं जो विचार मी केला होता तो चिंताग्रस्त स्वभावाशी असलेला संघर्ष मात्र होता तो खरे पाहता मी परमेश्वरावर विश्वास ठेवतो कीं नाहीं याविषयीच एक अतिशय गंभीर संघर्ष होता.”

या निराशेला मीं आधी होय, हें खरे आहे असें म्हणतो, पण नंतर असहमत होतो.

समजां तुमच्यां पोटात दुखत असेल आणि तुम्हीं सर्व प्रकारची औषधे आणि आहार घेत असाल, पण कांहीं फायदा होत नाहीं. आणि मग समजा कीं तुमचा डॉक्टर तुम्हांला तुमच्यां नियमित भेटीनंतर सांगतो, कीं तुमच्यां लहान आतड्यात कँसर झाला आहे. आता, तुम्हीं तिला चांगली बातमी म्हणणार का? तुम्हीं ठामपणें म्हणाल, नाहीं! आणि मला ते मान्य आहे.

पण आता मी तुम्हांला हाच प्रश्न दुसऱ्या पद्धतीनें विचारतो: डॉक्टरांनी कँसरचा उपचार करता येईल अशा वेंळी त्याचे निदान केलें, आणि खरोखरच त्यावर यशस्वीपणें इलाज केला जाऊ शकतो याचा तुम्हांला आनंद झाला का? तुम्हीं म्हणाल, होय, मला खूप आनंद झाला कीं डॉक्टरांना खरी समस्या आढळून आली. मीं तेहि मान्य करतो.

तर मग, ही बातमी कीं तुम्हांला कॅन्सर आहे चांगली बातमी नाहीं. परंतु, दुसऱ्या अर्थानें पाहता, ही चांगली बातमी आहे, कारण तुमच्यांत खरी व्याधी काय आहे हे जाणून घेणें कधीही योग्यच, विशेषतः जेव्हां तुमच्यां त्यां व्याधीचा इलाज यशस्वीरित्या करता येऊ शकतो.

म्हणजें (येशूनें म्हटल्याप्रमाणें) आमच्या चिंतेमागील खरी समस्या ही परमेश्वराच्या भावी कृपेविषयी त्यानें दिलेल्यां अभिवचनांवर आमचा असलेला “अल्प विश्वास” आहे हे आम्हीं शिकतो. आणि जेव्हां आपण आक्रोश करतो, “प्रभूजी, माझा विश्वास आहे, माझा अविश्वास घालवून टाका!” (मार्क 9:24) – तेव्हां तो अद्भुतरित्या आमचे रोग बरे करण्यास समर्थ आहे.

3 नवम्बर : प्रतिबद्धता की वाचा

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3 नवम्बर : प्रतिबद्धता की वाचा
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“तब फाटक के पास जितने लोग थे उन्होंने और वृद्ध लोगों ने कहा, ‘हम साक्षी हैं …’ तब बोअज़ ने रूत से विवाह कर लिया, और वह उसकी पत्नी हो गई; और जब वह उसके पास गया तब यहोवा की दया से उस को गर्भ रहा, और उसके एक बेटा उत्पन्न हुआ।” रूत 4:11, 13

बाइबल के समय में नगर का फाटक स्थानीय गतिविधियों का मुख्य केन्द्र हुआ करता था। यह एक बाज़ार और नागरिक केन्द्र के रूप में कार्य करता था, जहाँ व्यापारी, भिखारी, नगर के अधिकारी, धार्मिक नेता, और अन्य बहुत से लोग व्यवसाय करने, कानून लागू करने, दान प्राप्त करने, खरीददारी करने और मेल-जोल बढ़ाने के लिए इकट्ठा होते थे। यही वह भीड़-भाड़ वाली जगह थी जहाँ बोअज़ गया ताकि वह सार्वजनिक रूप से रूत से विवाह करने की अपनी प्रतिबद्धता की घोषणा कर सके। उनका विवाह हमें बाइबल में विवाह की परिभाषा पर विचार करने के लिए प्रेरित करता है।

पहला, बाइबल आधारित विवाह में प्रतिबद्ध प्रेम होना चाहिए। ऐसा प्रेम केवल भावनाओं या परिस्थितियों पर आधारित नहीं होता, बल्कि जीवन के सभी उतार-चढ़ाव और स्थितियों में गहराई से स्थिर और शर्त रहित बना रहता है। यही प्रतिबद्धता आज भी विवाह समारोहों में लिए जाने वाले वचनों में दिखाई देती है—अच्छे या बुरे समय में, धन-सम्पत्ति या गरीबी में, स्वास्थ्य या बीमारी में, यह प्रेम स्थिर बना रहता है।

दूसरा, विवाह में प्रतिबद्ध गवाह होने चाहिए। जब एक पुरुष और एक स्त्री विवाह करते हैं, तो वे प्रेम और देखभाल की वाचा के अधीन एक नई इकाई बनते हैं। हम त्रुटिपूर्ण मनुष्य हैं, और हमें इस प्रतिबद्धता में दृढ़ बने रहने के लिए दूसरों की सहायता की आवश्यकता होती है। इसलिए विवाह समारोह में कम से कम एक गवाह आवश्यक होता है, जो इस नए सम्बन्ध, एक नए परिवार की स्थापना की पुष्टि कर सके। बोअज़ ने नगर फाटक पर इसी सिद्धान्त को अपनाया, जहाँ नगर के बुजुर्गों और लोगों की भीड़ ने रूत से विवाह करने की उसकी प्रतिज्ञा को सुना और प्रमाणित किया। फिर वे उसे उसके वचन पर स्थिर रहने के लिए प्रेरित कर सकते थे।

तीसरा, भक्तिपूर्ण विवाह में प्रतिबद्ध सहभागिता होनी चाहिए। परमेश्वर ने विवाह को इस प्रकार स्थापित किया कि यह उस आत्मिक निकटता को प्रतिबिम्बित करे, जो हम उसकी भावी दुल्हन के रूप में उसके साथ अनुभव करते हैं। पति और पत्नी के बीच का व्यक्तिगत सम्बन्ध विवाह में गहराता जाना चाहिए, जिसमें अन्य पहलुओं के साथ-साथ शारीरिक एकता भी शामिल है। ऐसी शारीरिक निकटता केवल एक प्रतिबद्ध, प्रेमपूर्ण, और सार्वजनिक रूप से मान्यता प्राप्त सम्बन्ध के भीतर ही होनी चाहिए। यदि विवाह के शारीरिक सम्बन्ध को भावनात्मक, मानसिक, आध्यात्मिक और बौद्धिक पहलुओं से अलग कर दिया जाए, तो यह परमेश्वर की योजना का अनादर होगा।

आज के संसार में प्रेम और विवाह की जो धारणा प्रचलित है, वह एक निष्ठावान, प्रतिबद्ध, एकनिष्ठ, और विवाह के परमेश्वर-निर्धारित विषमलैंगिक स्वरूप की सुन्दरता और आशीष की तुलना में फीकी पड़ जाती है। जब हम इस वाचा के प्रत्येक पहलू को व्यावहारिक जीवन में देखते हैं, तो हमें अपने स्वर्गिक दूल्हे—मसीह—की अपनी कलीसिया के प्रति प्रतिबद्धता की झलक मिलती है (इफिसियों 5:22-27)। मसीही विवाह स्वयं में एक आशीष है और उस महिमामयी वास्तविकता का प्रतिबिम्ब है। पृथ्वी पर कोई भी विवाह पूर्ण नहीं होता, परन्तु विश्वासियों का विवाह उस दिव्य विवाह का एक उदाहरण बनने का प्रयास करता है। इसलिए जब आप विवाह के बारे में सोचें, उसके विषय में बात करें, उसके लिए प्रार्थना करें और वैवाहिक जीवन में व्यवहार करें—फिर चाहे यह वैवाहिक जीवन आपका अपना हो या आपके आस-पास के किसी अन्य व्यक्ति का—तो बाइबल की परिभाषा को बनाए रखें और उसे अपने जीवन में लागू करें।

श्रेष्ठगीत 6:4-12

◊ पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: 2 शमूएल 23–24; कुलुस्सियों 1

3 November : दु:खें सोसण्यामागचा हेतूं

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3 November : दु:खें सोसण्यामागचा हेतूं
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“ख्रिस्ताप्रीत्यर्थ विटंबना सोसणें’ ही मिसर देशातील धनसंपत्तीपेक्षा अधिक मोठी संपत्ती आहे असें त्यानें गणलें; कारण त्याची दृष्टी प्रतिफळावर होती.” (इब्री 11:26).

आपण दु:खें सोसण्याचा निर्णय घेतो ते केवळ आम्हांस ते सोसावयांस सांगितलें आहे म्हणून नाहीं, परंतु जो आम्हांस ते सोसण्यांस सांगतो तो स्वत: त्यांचे वर्णन सार्वकालिक आनंदाचा मार्ग म्हणून करतो.

आपल्या कर्तव्याप्रत असलेंल्या निष्ठेचे सामर्थ्य प्रगट करण्यासाठीं नव्हे, किंवा आपल्या नैतिक निर्धाराचा जोम प्रकट करण्यासाठीं नव्हे, अथवा दुःख सहन करण्याची आमची पराकाष्ठा सिद्ध करण्यासाठीं नव्हे, तर बालकासारख्या विश्वासात, त्याच्या सर्वसमाधानकारक अभिवचनांची अमर्याद बहुमूल्यता प्रगट करण्यासाठीं तो आम्हास क्लेशांमध्ये आज्ञा पाळणारे होण्यासाठीं पाचारण करतो – त्या सर्वांचे प्रतिफळ म्हणजें त्याच्या स्वतःच्या गौरवाची सर्व-समाधानकारक थोरवी आणि सुंदरता.

”पापाचे क्षणिक सुख भोगणें ह्यापेक्षा देवाच्या लोकांबरोबर दुःख सोसणें हे त्यानें (मोशेनें) पसंत करूंन घेतलें…. कारण त्याची दृष्टी प्रतिफळावर होती.” (इब्री 11:25-26). म्हणून, त्याच्या आज्ञापालनानें प्रतिफळास गौरवान्वित केलें – ख्रिस्ताठायीं त्याच्याकरिता परमेश्वर जे कांहीं आहे ते सर्व – केवळ दुःख सहन करण्याचा निर्धार नव्हे.

ख्रिस्ती पूर्णानंदाचा (मुळांत पायपर यांचा विलासवाद म्हणजें आत्म-सुख हेच अंतिम उद्दिष्ट असा सिद्धांत) हा सारांश आहे. विटंबना सोसत आनंदाचा पाठलाग करीत असतांना, आमच्या आनंदाचा जो स्रोत त्याच्या सर्वसमाधानकारक मूल्याची आम्हीं वाखाणणी करतो. आमच्या दुःखाच्या बोगद्याच्या शेवटी उज्वल प्रकाश म्हणून साक्षांत परमेश्वराचे तेज दिसून येते.

क्लेशात आमच्या आनंदाचे लक्ष्य आणि आधार तोच आहे असें जर आम्हीं सांगत नाहीं, तर आमच्या क्लेशाचा अर्थ नाहींसा होईल. अर्थ हा आहे : परमेश्वर हा स्वतः आमचा लाभ आहे. परमेश्वर हांच लाभ आहे. परमेश्वर स्वतः लाभ आहे. आम्हीं जर विटंबना सोसतो त्यामागचा हेतू हाच आहे.

मानव-अस्तित्वाचे मुख्य ध्येय परमेश्वराचा गौरव करणें हा आहे. इतर कुठल्याही गोष्टीच्या तुलनेंत ते क्लेशाबाबत खरे आहे कीं जेव्हां आम्हीं परमेश्वराठायीं सर्वाधिक समाधानी असतो तेव्हां तो आमच्याठायीं सर्वाधिक गौरव पावतो.

2 नवम्बर : सही करने का संकल्प

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2 नवम्बर : सही करने का संकल्प
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“तब बोअज़ ने वृद्ध लोगों और सब लोगों से कहा, ‘तुम आज इस बात के साक्षी हो कि जो कुछ एलीमेलेक का और जो कुछ किल्योन और महलोन का था, वह सब मैं नाओमी के हाथ से मोल लेता हूँ। फिर महलोन की स्त्री रूत मोआबिन को भी मैं अपनी पत्नी करने के लिए इस विचार से मोल लेता हूँ।’” रूत 4:9-10

हर दिन जब हम विभिन्न परिस्थितियों का सामना करते हैं, तो हमें स्वयं से यह प्रश्न पूछना चाहिए: “क्या करना सही है?”

यही बात बोअज़ ने तब सोची जब उसने नगर के फाटक पर जाने का निश्चय किया। वह रूत से विवाह करना चाहता था और निस्तारक-कुटुम्बी के रूप में उसकी रक्षा और देखभाल करना चाहता था। लेकिन वह जानता था कि रूत का एक अन्य सम्बन्धी उसके स्वयं से अधिक उसका निकट-सम्बन्धी था, जिसे इस भूमिका को स्वीकार करने का पहला अधिकार प्राप्त था। बोअज़ एक ईमानदार व्यक्ति था, जो केवल भावनाओं में बहकर कोई निर्णय नहीं लेना चाहता था, जब रूत ने उसे खलिहान में विवाह का प्रस्ताव दिया था। उसकी दृष्टि पूरी तरह इस बात पर केन्द्रित थी कि वह रूत को उचित रीति से अपनाए। बोअज़ ने अपनी प्रतिष्ठा से अधिक सही कार्य करने को प्राथमिकता दी। वह नगर के सबसे सार्वजनिक स्थान—नगर फाटक—पर गया ताकि वह एक परदेशी से विवाह कर सके, जो उसकी प्रतिष्ठा और विरासत को खतरे में डाल सकता था। अन्य निकट-सम्बन्धी इस जोखिम को उठाने के लिए तैयार नहीं था (रूत 4:6)। पवित्रशास्त्र में इस व्यक्ति का नाम तक नहीं दिया गया। यह हमारे लिए एक शिक्षा है: हमें स्वयं के लिए नाम बनाने और उसे सुरक्षित रखने का प्रयास नहीं करना चाहिए। दूसरों को हमारे बारे में बात करने और हमारी प्रशंसा करने दें। हमें केवल सही काम करने का प्रयास करना चाहिए।

बोअज़ के शब्दों से स्पष्ट होता है कि उसका एक प्रमुख उद्देश्य था: “मरे हुए का नाम उसके निज भाग पर स्थिर करूँ” (रूत 4:10)। अर्थात, उसने नाओमी के दिवंगत पति एलीमेलेक के नाम और परिवार की वंशावली को बनाए रखने के लिए यह कदम उठाया। यह निस्वार्थता का परिचायक है और प्रशंसनीय है। यदि बोअज़ केवल अपने स्वार्थ और इच्छाओं की चिन्ता करता, तो वह रूत को चुपचाप अपनी पत्नी बना सकता था। लेकिन उसने अपने दायित्व को पूरा किया और सार्वजनिक रूप से इस स्थिति को स्वीकार किया। उन दिनों में निस्तारक-कुटुम्बी की भूमिका को त्यागने और अपनाने वाले व्यक्ति इस काम को मुहरबन्द करने के लिए अपने जूतों का सार्वजनिक रूप से आदान-प्रदान करते थे (पद 7)। यह आदान-प्रदान एक बड़ी सच्चाई का, अर्थात रूत के लिए बोअज़ की प्रतिबद्धता, प्रेम और व्यक्तिगत बलिदान का प्रतीक था। इसी तरह क्रूस भी सार्वजनिक रूप से सबके सामने खड़ा है, जहाँ हम हमारे लिए मसीह की प्रतिबद्धता, प्रेम और बलिदान को देखते हैं। बोअज़ को रूत से विवाह करने के लिए आर्थिक बलिदान देना पड़ा। हमें छुड़ाने और अपनी प्रिय दुल्हन बनाने के लिए मसीह को अपने स्वयं के जीवन का बलिदान देना पड़ा।

बोअज़ और मसीह के बलिदानों ने भविष्य और आशा प्रदान करने वाली महान आशिषों और विरासतों को उत्पन्न किया, जिनमें से एक, एक मोआबिन युवती और उसकी सास के लिए थी और दूसरी सम्पूर्ण मानवता के लिए थी। बोअज़ के सत्यनिष्ठ प्रयासों के परिणामस्वरूप एक ऐसा विवाह हुआ, जिसने इतिहास में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई, क्योंकि इस वंश से हमारे उद्धारकर्ता का जन्म हुआ (मत्ती 1:5)। और मसीह के बलिदान के कारण अब हम उस दिन की प्रतीक्षा करते हैं जब हम महिमा में खड़े होंगे, उसका मुख देखेंगे, और सदा के लिए उसके नाम की स्तुति करेंगे। हमारा दूल्हा आया और हमें बड़ी कीमत चुकाकर उचित रूप से अपना बना लिया।

कल्पना करें कि जब रूत ने सुना कि बोअज़ ने अपने जूते दे दिए हैं और विवाह की पुष्टि कर दी है, तो उसे कितनी प्रसन्नता हुई होगी। हमें भी वैसा ही आनन्द अनुभव करना चाहिए जब हम क्रूस को देखते हैं और जानते हैं कि हम मसीह के हो चुके हैं। और बोअज़ के उदाहरण से हमें अपने दैनिक निर्णयों और संघर्षों में यह पूछना सीखना चाहिए: “क्या करना सही है?”

रूत 4:1-12

पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: 2 शमूएल 21–22; 3 यूहन्ना ◊

2 November : छळवणूकित आनंद करणें

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2 November : छळवणूकित आनंद करणें
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“माझ्यामुळें जेव्हां लोक तुमची निंदा व छळ करतील आणि तुमच्यांविरुद्ध सर्व प्रकारचे वाईट लबाडीनें बोलतील तेव्हां तुम्हीं धन्य. आनंद करा, उल्लास करा, कारण स्वर्गात तुमचे प्रतिफळ मोठे आहे; कारण तुमच्यांपूर्वी जे संदेष्टे होऊन गेलें त्यांचा त्यांनी तसाच छळ केला.” (मत्तय 5:11-12)

ख्रिस्ती पूर्णानंद (मुळांत पायपर यांचा विलासवाद म्हणजें आत्म-सुख हेच अंतिम उद्दिष्ट असा सिद्धांत) म्हणतो कीं ख्रिस्ती या नात्यानें आमची छळवणूक होत असतां आनंद करण्याचे निरनिराळे मार्ग आहेत. त्या सर्वांचे अनुसरण परमेश्वराच्या अमर्याद व पूर्ण करणाऱ्या अशा कृपेची अभिव्यक्ती म्हणून करावयाचा असतो.

छळवणूक होत असतां आनंद करण्याचा एक मार्ग म्हणजें आपलें पुनरुत्थान होईल त्यावेळी आपल्याला प्राप्त होणाऱ्या प्रतिफळाच्या थोरवीवर आपली मनें स्थिर करणें हा होय. त्या वैभवाकडें दृष्टि लावण्याचा परिणाम हा आहे कीं जे गौरव प्रकट होणार आहे त्या तुलनेंत सांप्रत काळाची दुःखे नगण्य वाटतांत : “कारण आपल्यासाठीं जो गौरव प्रकट होणार आहे त्याच्यापुढे सांप्रत काळाची दुःखे कांहींच नाहींत असें मी मानतों.” (रोमकरांस. 8:18; 2 करिंथ 4:16-18 बरोबर तुलना करा). दुःखे सहन करण्यायोग्य व्हावें म्हणून, आपल्याला मिळणाऱ्या प्रतिफळाकडे नजरां ठेऊन आनंद केल्यानें देखील प्रीति करणें शक्य होईल.

“तुम्हीं तर आपल्या वैऱ्यांवर प्रीति करा, त्यांचे बरे करा, निराश न होता उसनें द्या, म्हणजें तुमचे प्रतिफळ मोठे होईल आणि तुम्हीं परात्पराचे पुत्र व्हाल” (लूक 6:35). गरीबांना औदार्याने वागवून घ्यां “म्हणजें तुम्हीं धन्य व्हाल, कारण तुमची फेड करण्यास त्यांच्याजवळ कांहीं नाहीं; तरी नीतिमानांच्या पुनरुत्थानासमयी तुमची फेड होईल” (लूक 14:14). या अभिवचनाद्वारें प्राप्त होणाऱ्या प्रतिफळाठायीं विश्वास जगिकतेची दोर तोडून आम्हांस प्रीतिचें श्रम करण्यासाठीं मुक्त करतो.

छळवणूक होत असतां आनंद करण्याचा दुसरा मार्ग हा आपल्याला दिलेल्यां आशेच्या खात्रीवर क्लेशांचा जो परिणाम होतो त्यापासून येतो. छळवणूक होत असतां क्लेशांमध्ये आनंदाचे मूळ हे केवळ पुनरुत्थान आणि प्रतिफळ याबाबतींत असलेल्या आशेमध्येंच नाहीं तर ती आशा आणखी सखोल बनविण्यासाठीं दुःख ज्याप्रकारे कार्य करते त्यातहि त्यां आनंदाचे मूळ आहे.

उदाहरणार्थ, पौल म्हणतो, “इतकेच नाहीं, तर संकटांचाही अभिमान बाळगतो, कारण आपल्याला ठाऊक आहे कीं, संकटानें धीर, धीरानें शील व शीलानें आशा निर्माण होते.” (रोम 5:3-4).

दुसऱ्या शब्दांत म्हणजें, पौलाच्या आनंदाचे मूळ केवळ त्याला मिळणाऱ्या महान प्रतिफळात नाहीं, तर क्लेश व दु:खें यांमुळे जे परिणाम समोर येतांत त्यातही आहे जें त्या प्रतिफळाच्या आशेला बळकट बनवितांत. संकटानें धीर उत्पन्न होतो, आणि धीर ही जाणीव उत्पन्न करतो कीं आपला विश्वास खरा आणि अस्सल आहे, आणि यामुळें आपली ही आशा कीं आपण खरोखर ख्रिस्तास प्राप्त करूं आणखी बळकट होते.

तर मग, आपण प्रतिफळाच्या वैभवावर अथवा क्लेशाच्या शुद्ध करणाऱ्या परिणामांवर लक्ष केंद्रित करीत असलो तरी, छळवणूक होत असतां येणाऱ्या क्लेशांतहि आपला आनंद टिकून राहावा हा देवाचा उद्देश आहे.