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22 November : आध्यात्मिक प्रौढपणाची किल्ली

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22 November : आध्यात्मिक प्रौढपणाची किल्ली
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पण ज्यांच्या ज्ञानेंद्रियांना वहिवाटीनें चांगलें आणि वाईट समजण्याचा सराव झाला आहे अशा प्रौढांसाठीं जड अन्न आहे. (इब्री 5:14)

पाहा, हे किती अद्भुत आहे. हे समजून घ्यां. हे तुमची वर्षे वाया जाण्यापासून वाचवील. 

या वचनाचा अर्थ असा आहे कीं जर तुम्हांस प्रौढ व्हावयाचे असेल आणि वचनाची आणखी जड अशी शिकवण समजून तिचे महत्व जाणायचे असेल, तर परमेश्वराच्या सुवार्तेत असलेल्यां अभिवचनांच्या समृद्ध, पोषक तत्वांनी भरपूर, आणि बहुमूल्य दुधामुळें तुमची नैतिक ज्ञानेंद्रिये – तुमचे आत्मिक मन – बदलने गरजेचे आहे- यासाठीं कीं तुम्हांला चांगलें आणि वाईट समजण्याचा सराव व्हावा.

किंवा, मीं हे दुसऱ्या शब्दांत मांडतो. परमेश्वराच्या सर्व वचनाचा आस्वाद घेण्यास तयार होणें प्रथमतः एक बौद्धिक आव्हान नाहीं; ते प्रथमतः एक नैतिक आव्हान आहे. जर तुम्हांला वचनाचे जड अन्न खावयाचे असेल , तर तुम्हीं तुमच्यां आत्मिक ज्ञानेंन्द्रियांस तसा सरावही दिला पाहिजे, यासाठीं कीं तुमच्यांठायीं असें मन उत्पन्न व्हावे ज्यास बऱ्यावाईटाची ओळख आहे. हे फक्त बौद्धिक आव्हान नसून एक नैतिक आव्हान आहे. 

उल्लेखनीय सत्य हे आहे कीं, जर तुम्हीं उत्पत्ती आणि इब्रीकरांस लिहिलेंल्या पत्रातील मलकींसदेकास समजून घेण्याविषयी अडखळणत असाल तर त्याचे कारण कदाचित हे असू शकते कीं तुम्हीं दूरदर्शनावरील आक्षेपार्ह कार्यक्रम पाहता. देवानें जगाच्या स्थापनेपूर्वी त्याच्या लोकांची केलेलीं निवड यामुळें जर तुम्हीं अडखळत असाल, तर कदाचित त्याचे कारण हे आहे कीं तुम्हीं अजूनही कुठल्यातरी लबाड टीवी उपदेशाकाला ऐकत आहां. जर तुम्हीं वधस्तंभावरील ख्रिस्ताच्या परमेश्वर-केंद्रित कार्याबाबत अडखळत असाल, तर याचे कारण कदाचित हे आहे कीं तुमचे पैशावर प्रेम आहे आणि तुम्हीं जास्त खर्च करता आणि फार कमी देता.

प्रौढपणाकडे आणि पवित्र शास्त्राच्या जड अन्नाकडे जाणारा मार्ग प्रथमतः बौद्धिक व्यक्ती बनणें नाहीं, तर आज्ञाधारक व्यक्ती बनणें आहे. तुम्हीं दारू आणि यौनसंबंध आणि पैसा आणि फुरसतीची वेळ आणि अन्न आणि कम्प्युटर यासोबत काय करता, आणि तुम्हीं इतर लोकांशी कसे वागता, याचा संबंध तुम्हीं कोणत्या शाळेत जाता किंवा कोणते पुस्तक वाचता यापेक्षा जड अन्न पचविण्याच्या तुमच्यां क्षमतेशी आहे.

हे अत्यंत महत्त्वाचे आहे याचे कारण आपल्या उच्च तंत्रज्ञानसंपन्न समाजात आपण असा विचार करण्याची शक्यता असते कीं शिक्षण – विशेषेकरून बौद्धिक शिक्षण – प्रौढपणाची किल्ली आहे. असें अनेक पीएच.डी. झालेलें लोक आहेत जे त्यांच्या आध्यात्मिक अप्रौढत्वात परमेश्वराच्या गोष्टींवर अडखळतात. आणि असें अनेंक कमी-शिक्षित पवित्र जन आहेत जे अतिशय प्रौढ आहेत आणि जे परमेश्वराच्या वचनाच्या गहन गोष्टींवर भरण-पोषण पाऊन प्रगती करूं शकतांत.

21 नवम्बर : चुप रहो और सुनो

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21 नवम्बर : चुप रहो और सुनो
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“हाय उस पर जो काठ से कहता है, जाग, या अबोल पत्थर से, उठ! क्या वह सिखाएगा? देखो, वह सोने चाँदी में मढ़ा हुआ है, परन्तु उसमें आत्मा नहीं है। परन्तु यहोवा अपने पवित्र मन्दिर में है; समस्त पृथ्वी उसके सामने शान्त रहे।” हबक्कूक 2:19-20

हबक्कूक के समय का संसार उथल-पुथल अवस्था में था और ऐसा प्रतीत होता था कि अब उसकी कोई सुध नहीं ली जा सकती। उसका अपना हृदय भी बहुत व्याकुल था, जिससे वह परमेश्वर से यह पूछने को प्रेरित हुआ कि जो कुछ हो रहा है, वह उसे क्यों होने दे रहा है (हबक्कूक 1:2-3)। भविष्यवक्ता चाहता था कि कुछ किया जाए। वह उत्तर चाहता था। वह परिवर्तन चाहता था। और परमेश्वर ने हबक्कूक से कहा, याद रखो कि मैं अब भी राज्य करता हूँ। याद रखो कि मैं कौन हूँ, और तुम कौन हो। परमेश्वर अब भी “अपने पवित्र मन्दिर में” उपस्थित था, और सम्पूर्ण पृथ्वी पर सम्प्रभुता के साथ शासन कर रहा था। उसने पहले ही उस योजना को निश्चित कर दिया था जिसके द्वारा उसकी इच्छा पूरी होनी थी। इस सच्चाई को स्वीकार करना हबक्कूक के लिए नम्रता और मौन का बुलावा था। यद्यपि उसके पास प्रश्न और शिकायतें थीं, और यद्यपि परमेश्वर ने उसे उन्हें उठाने की अनुमति दी थी, परन्तु उससे भी अधिक आवश्यक यह था कि वह परमेश्वर की बातों को सुने और उन पर विचार करे।

हम इस मौन के बुलावे को सम्पूर्ण पवित्रशास्त्र में देखते हैं। परमेश्वर भजनकार के माध्यम से कहता है, “चुप हो जाओ, और जान लो कि मैं ही परमेश्‍वर हूँ” (भजन संहिता 46:10)। नए नियम में, जब यीशु अपनी स्वर्गिक महिमा में रूपान्तरण पर्वत पर पतरस, याकूब और यूहन्ना के सामने प्रकट हुआ और पतरस ने डर के कारण जो पहली बात मन में आई, कह दी, तब यह दिव्य वाणी शिष्यों ने सुनी: “यह मेरा प्रिय पुत्र है, जिससे मैं प्रसन्न हूँ : इसकी सुनो” (मत्ती 17:5, विशेष बल दिया गया)।

जब समय कठिन होता है, तो हम में से कुछ लोग अपने स्वभाव के अनुसार एक कार्यकर्ता की तरह प्रतिक्रिया करते हैं: समस्या को हल करना है, इसलिए हम स्वयं को समाधान खोजने में झोंक देते हैं। हममें से कुछ निराशावादी हो जाते हैं: इस समस्या का कोई समाधान नहीं है, इसलिए हम उसके नीचे दब जाते हैं या उससे बचने के लिए व्यर्थ की गतिविधियों में लग जाते हैं। दोनों ही प्रतिक्रियाएँ इस कारण होती हैं कि हम परमेश्वर के सामने शान्त होकर उसकी बातों को सुनने और विचार करने के लिए रुकते नहीं हैं। हम एक शोरगुल से भरी दुनिया में जीते हैं: शब्द, शब्द, शब्द—विशेषज्ञों, प्रोफेसरों और नेताओं की निरन्तर बकबक। लेकिन यदि हम परमेश्वर की नहीं सुनेंगे, तो अन्ततः हम किसी ऐसी मूरत पर भरोसा कर बैठेंगे जो बोल ही नहीं सकती (हबक्कूक 2:18-19)। मूरतें न हमारे जीवन के बारे में, न ही हमारे संसार की परिस्थितियों के बारे में कोई सत्य बात कह सकती हैं।

जब कठिन दिनों का सामना होता है, तो हबक्कूक हमें स्मरण कराता है, “समस्त पृथ्वी उसके सामने शान्त रहे।” हमारे पास सभी उत्तर नहीं हैं, और न ही विशेषज्ञों के पास हैं। प्रश्न करना या समाधान खोजना गलत नहीं है, परन्तु यदि ऐसा करते हुए हम परमेश्वर के वचन को सुनने और उसकी आवाज़ पर ध्यान देने को अनदेखा कर दें, तो यह गलत है। हमारे चारों ओर चाहे जो कुछ भी हो रहा हो, हमें सबसे अधिक आवश्यकता इस बात की है कि हम याद रखें कि प्रभु अपने पवित्र मन्दिर में है, और वह अपने सिंहासन से अपने लोगों की भलाई के लिए इतिहास का संचालन कर रहा है। यही वह नींव है, जिस पर हम इस संसार में परमेश्वर के कार्य को समझने की समझदारी की रूपरेखा बना सकते हैं।

क्या आपको ऐसा लगता है कि राष्ट्र क्रोधित हो रहे हैं और राज्य हिल रहे हैं? क्या पर्वत डगमगा रहे हैं और लहरें उछाल मार रही हैं (भजन 46:2-3, 6)? शान्त हो जाएँ, जान लें कि परमेश्वर ही परमेश्वर है, और उसकी सुनें।

भजन 46

◊ पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: 2 इतिहास 1–3; लूका 5:1-16

21 November : कृतज्ञतेची गंभीरता

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21 November : कृतज्ञतेची गंभीरता
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शेवटल्या काळी कठीण दिवस येतील हे समजून घे. कारण माणसे स्वार्थी, धनलोभी, बढाईखोर गर्विष्ठ, निंदक, आईबापांना न मानणारी, उपकार न स्मरणारी, अपवित्र… (2 तीमथ्य 3:1-2)

लक्षात घ्या कीं कृतघ्नतेसोबत गर्व, गैरवर्तन, आणि अवमान यांचा प्रादुर्भाव कसा होतो.

एका ठिकाणी पौल म्हणतो, “तसेच अमंगळपण, बाष्कळ गोष्टी व टवाळी ह्यांचाही उच्चार न होवो, ती उचित नाहींत; तर त्यापेक्षा उपकारस्तुती होवो” (इफिस 5:4). म्हणून, असें दिसते कीं कृतज्ञता आणि आभारी असणें ही विद्रपुता आणि हिंसेच्या सर्वथा उलट आहे.

हे असें असण्याचे कारण हे आहे कीं उपकारबुद्धीची म्हणजें कृतज्ञतेची भावना ही अहंकाराची भावाना नसून नम्रतेची भावना आहे. ही स्वतःचे गौरव शोधणारी नसून, ती इतरांची प्रशंसा करणारी भावना आहे. आणि ती रागीष्ट नसून प्रसन्नचित्त असते. ती कटुत्व बाळगत नाहीं. कटु उपकारशीलता ही जणू शब्दांचा विरोधाभास आहे.

कृतज्ञतायुक्त अंतःकरणास उघडणारी आणि कटुत्व व कुरूपता आणि अनादर व हिंसा यावर मात करणारी किल्ली म्हणजें आपला उत्पन्नकर्ता आणि प्रतिपालक व प्रदाता आणि आशा देणाऱ्या परमेश्वराठायीं दृढ विश्वास असणें. आम्हीं जर हा विश्वास धरत नाहीं कीं आमच्याजवळ जे कांहीं आहे आणि जे प्राप्त करण्याची आम्हीं आशा धरतो त्या सर्व गोष्टींसाठीं आम्हीं परमेश्वराचे अतिशय ऋणी आहोत, तर मग कृतज्ञतेचा झराच ओसरला आहे.

म्हणून, मी असें म्हणून शेवट करतो कीं अंतिम समयी हिंसाचार आणि पवित्र वस्तू भ्रष्ट करणें आणि कुरूपता आणि अवज्ञा ही परमेश्वराची समस्या आहे जी तो स्वतः हाताळेल. जर आमची मूळ समस्या जर आहे तर ती आमच्या निर्भरतेच्या उच्च पातळीवर कृतज्ञतेची भावना नसणें ही आहे.

जेव्हा आपण देवाचे आभार न मानण्याचा कळस पार करतो, तेव्हा आभारपणाचा सर्व तलाव डोंगराखाली जाऊन आणखीच कोरडा होऊ लागतो. आणि जेव्हा आभारपणा नाहींसा होतो, स्वतःचे प्रभूत्व त्याच्या सुखासाठीं भ्रश्टाचाराकडे आणखी डोळेझाक करू लागते.

विनम्र भावानें आभारी असण्याविषयीं मोठे संजीवन यावे म्हणून प्रार्थना करा.

20 नवम्बर : धन्यवाद से अभिभूत होना

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20 नवम्बर : धन्यवाद से अभिभूत होना
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“उसी में चलते रहो, और उसी में जड़ पकड़ते और बढ़ते जाओ; और जैसे तुम सिखाए गए वैसे ही विश्‍वास में दृढ़ होते जाओ, और अधिकाधिक धन्यवाद करते रहो।” कुलुस्सियों 2:6-7

यदि हम एक भरे हुए गिलास को लेकर चल रहे हों और अचानक कोई हमसे टकरा जाए, तो जो कुछ भी उस गिलास में है, वही बाहर निकलेगा। यही सिद्धान्त हमारे चरित्र पर भी लागू होता है: यदि हमारे भीतर कड़वाहट, कृतघ्नता, ईर्ष्या या जलन भरी हुई है, तो थोड़ा-सा “धक्का” ही इन भावनाओं को बाहर लाने के लिए पर्याप्त होता है।

जब पौलुस ने कुलुस्से के मसीही विश्वासियों को लिखा, तो उसने उन्हें इस बात के लिए प्रोत्साहित किया कि वे एक आभारी हृदय से पहचाने जाएँ—जो कि मसीही जीवन की एक प्रमुख विशेषता है। पौलुस ने इस धन्यवाद को व्यक्त करने के लिए जिस शब्द का उपयोग किया है, “अधिकाधिक” (कुलुस्सियों 2:7), वह यूनानी शब्द perisseuo है, जिसका अर्थ होता है “बहकर निकलना” या “उफन पड़ना।” पौलुस का तात्पर्य स्पष्ट है: जब लोग इन विश्वासियों से “टकराएँ,” तो जो बाहर निकले वह कृतज्ञता होनी चाहिए।

जब स्त्री-पुरुष मसीह द्वारा परिवर्तित नहीं होते, तो उनके जीवन में अक्सर कृतघ्नता का ही शासन होता है—और उसके फलस्वरूप कड़वाहट, शिकायत, क्रोध और द्वेष भी उनमें भरा रहता है। परन्तु मसीह में विश्वासियों का जीवन इस प्रकार बदलता है कि वे कृतघ्नता की जगह धन्यवाद, कड़वाहट की जगह आनन्द, और क्रोध की जगह शान्ति को अपनाते हैं। हमने परमेश्वर की सम्पूर्ण सच्चाई में प्रकट हुए अनुग्रह की खुशखबरी को सुना है और मन फिराकर तथा विश्वास करके उसकी ओर लौटे हैं। हमारे पाप क्षमा कर दिए गए हैं। हमारे भीतर उसका आत्मा वास करता है। हम परमेश्वर की कलीसिया में एक नए परिवार का हिस्सा हैं। हमारे सामने अनन्त जीवन है। हम प्रार्थना के द्वारा स्वर्गिक सिंहासन तक पहुँच सकते हैं। दूसरे शब्दों में कहें तो, हमारे पास आभारी होने के लिए काफी कुछ है। कृतज्ञता मसीही जीवन का गीत बन जाती है—जो भीतर से उफनता रहता है।

इस प्रकार की कृतज्ञता के गहरे प्रभाव होते हैं। यह हमारी दृष्टि को परमेश्वर की ओर मोड़ देती है और हमें स्वयं पर तथा अपनी परिस्थितियों पर केन्द्रित रहने से हटा देती है। यह हमें शैतान की कानाफूसी से बचाती है, जो हमें निराशा की ओर खींचती है और परमेश्वर की कही बातों पर अविश्वास करने को प्रेरित करती है। यह हमें घमण्ड से भी सुरक्षित रखती है, और हमारे शब्दकोश से ऐसे वाक्य मिटा देती है जैसे—“मुझे इससे ज्यादा मिलना चाहिए था” या “मेरे साथ ऐसा नहीं होना चाहिए था।” और यह हमें इस सच्चाई में विश्राम करने देती है कि परमेश्वर अपनी प्रेमपूर्ण योजना को केवल सुखद और उत्साहवर्धक अनुभवों में ही नहीं, बल्कि अस्थिर और पीड़ादायक परिस्थितियों में भी पूरा करता है। केवल अनुग्रह के द्वारा ही हम यह सीख सकते हैं: “हर बात में धन्यवाद करो” (1 थिस्सलुनीकियों 5:18, अतिरिक्त बल दिया गया है)।

कृतघ्नता का एकमात्र इलाज मसीह के साथ मेल में ही पाया जाता है। क्या आप अपने भीतर यह अनुभव करते हैं कि परमेश्वर ने आपको जो नहीं दिया, उसके लिए कोई कड़वाहट या असन्तोष अब भी बाकी है? तो उस भावना को मसीह के चरणों में ले आएँ, मसीह से क्षमा माँगें, और उससे यह प्रार्थना करें कि वह आपको दिखाए कि उसने अपने सुसमाचार में आपको कितना कुछ निशुल्क दे दिया है। हर दिन कुछ समय निकालें और परमेश्वर से प्राप्त आशिषों को लिखें और उन्हें स्वयं को याद दिलाएँ। तब आप वास्तव में कृतज्ञता से उफनने लगेंगे।

भजन 103

पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: 1 इतिहास 28–29; लूका 4:31-44 ◊

20 November : मरण हे लाभ आहे याची पाच कारणें

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20 November : मरण हे लाभ आहे याची पाच कारणें
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कारण मला तर जगणें हे ख्रिस्त आणि मरणें हा लाभ आहे. (फिलिप्पै 1:21)

मरणें हे “लाभ” कसे आहे?

  1. आमचे आत्मे सिद्ध केले जातील  (फिलिप्पै 1:21).

पण तुम्हीं सीयोन पर्वत, जिवंत देवाचे नगर म्हणजें स्वर्गीय यरुशलेम, लाखो देवदूत, स्वर्गातील यादीतल्या ज्येष्ठांचा समाज व मंडळी, सर्वांचा न्यायाधीश देव, पूर्ण केलेल्या नीतिमानांचे आत्मे, नव्या कराराचा मध्यस्थ येशू, आणि शिंपडण्याचे रक्त ह्यांच्याजवळ आला आहात; 

आमच्याठायीं आणखी पाप नसेल. आमचे आंतरिक युद्ध आणि ज्याने आमच्यावर प्रीति केली आणि स्वतःस आमच्यासाठीं दिलें त्या प्रभूस दुखविणाऱ्या हृदयविदारक निराशा समाप्त होतील.

  • आम्हास या जगाच्या दुःखापासून सुटका मिळेल (लूक 16:24-25).

आम्हांला पुनरुत्थानाचा आनंद जरी त्वरित मिळणार नसला, तरी वेदनांपासून मुक्तीचा आनंद आम्हास लाभेल. मृत्यूच्या वेळी घडून येणारे एक मोठे परावर्तन दाखविण्यासाठीं येशूनें लाजर आणि श्रीमंत माणसाची गोष्ट सांगतली.

तेव्हा [श्रीमंत माणसानें] हाक मारून म्हटले, ‘हे बापा अब्राहामा, माझ्यावर दया करून लाजराला पाठव, ह्यासाठीं की त्यानें आपल्या बोटाचे टोक पाण्यात बुडवून माझी जीभ थंड करावी; कारण ह्या जाळात मी क्लेश भोगत आहे.’ अब्राहाम म्हणाला, ‘मुला, तू आपल्या आयुष्यात आपले सुख भरून पावलास, तसा लाजर आपले दुःख भरून पावला, ह्याची आठवण कर; आता ह्याला येथे समाधान मिळत आहे व तू क्लेश भोगत आहेस.

  • आमच्या जीवनास भरपूर विश्रांती दिली जाईल (प्रकटी 6:9-11).

डोळ्याखाली एक धीरगंभीरपणा आणि परमेश्वराची जपणूक असेल जी सर्वात शांत जलाशयाजवळील सर्वात कोमल उन्हाळ्याच्या सायंकाळी आम्हांला लाभणाऱ्या कोणत्याही सर्वात मोठ्या आनंदाच्या क्षणापेक्षा श्रेष्ठ असेल.

त्यानें पाचवा शिक्का फोडला तेव्हा मी वेदीखाली आत्मे पाहिले; ते आत्मे देवाच्या वचनामुळे व त्यांनी जी साक्ष दिली होती तिच्यामुळे जिवे मारलेल्या लोकांचे होते. ते मोठ्याने ओरडून म्हणाले, “हे स्वामी, तू पवित्र व सत्य आहेस. तू ‘कोठपर्यंत न्यायनिवाडा करणार’ नाहींस आणि पृथ्वीवर राहणार्‍या लोकांपासून आमच्या ‘रक्ताचा सूड घेणार’ नाहींस?” तेव्हा त्या प्रत्येकाला एकेक शुभ्र झगा देण्यात आला आणि त्यांना असें सांगण्यात आले की……तुम्हीं आणखी थोडा वेळ विश्रांती घ्या.

  • प्रभूसह गृहवास करणें हे आम्हीं अनुभवू करू (2 करिंथ 5:8).

आम्हीं धैर्य धरतो, आणि शरीरापासून दूर जाऊन प्रभूसह गृहवास करणें हे आम्हांला अधिक बरे वाटते.

संपूर्ण मानवजातीस परमेश्वराच्या घराची आस लागलेली आहे. जेव्हा आपण ख्रिस्ताकडे घरी जाऊ तेव्हा कधी जाणली नाहीं अशी सुरक्षा आणि शांती यांच्या पलीकडे समाधान असेल.

  • आपण ख्रिस्तासोबत असू (फिलिप्पै 1:21-23). 

ख्रिस्त पृथ्वीवरील कोणत्याही व्यक्तीपेक्षा श्रेष्ठ आहे. तो त्या कोणत्याही व्यक्तीपेक्षा अधिक बुद्धिमान, अधिक बलवान, आणि अधिक दयाळू आहे ज्याच्यासोबत वेळ घालविण्यात तुम्हांला आनंद येतो. तो अतिशय चित्तवेधक आहे. त्याच्या निमंत्रित  पाहुण्यांस शक्य तितका आनंद देण्यासाठीं दर क्षणी काय केले पाहिजे आणि काय म्हटले पाहिजे हे तो निश्चितपणें जाणतो. त्याची प्रीति ओसंडून वाहते आणि त्याच्या प्रियजनांनी ती प्रीति जाणावी म्हणून त्या प्रीतिचा कसा उपयोग करावा याचे त्याला अमर्याद ज्ञान आहे. यास्तव पौलाने म्हटले, 

कारण मला तर जगणें हे ख्रिस्त आणि मरणें हा लाभ आहे. पण जर देहात जगणें हे माझ्या कामाचे फळ आहे तर कोणते निवडावे हे मला समजत नाहीं. मी ह्या दोहोसंबंधाने पेचात आहे; येथून सुटून जाऊन ख्रिस्ताजवळ असण्याची मला उत्कंठा आहे; कारण देहात राहण्यापेक्षा हे फारच चांगले आहे.

19 नवम्बर : आत्म-सन्तोष पर एक चेतावनी

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19 नवम्बर : आत्म-सन्तोष पर एक चेतावनी
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“मैं तुमसे सच कहता हूँ कि ऐसा कोई नहीं, जिसने मेरे और सुसमाचार के लिए घर या भाइयों या बहिनों या माता या पिता या बाल–बच्चों या खेतों को छोड़ दिया हो, और अब इस समय सौ गुणा न पाए, घरों और भाइयों और बहिनों और माताओं और बाल–बच्चों और खेतों को, पर सताव के साथ और परलोक में अनन्त जीवन। पर बहुत से जो पहले हैं, पिछले होंगे; और जो पिछले हैं, वे पहले होंगे।” मरकुस 10:29-31

यीशु की प्राथमिकता यह नहीं है कि हम आरामदायक जीवन जीएँ।

जब एक धनी युवक ने यीशु से अनन्त जीवन पाने की बात की, लेकिन अपनी सम्पत्ति को त्यागने को तैयार न होकर दुखी होकर चला गया, तब यीशु ने अपने शिष्यों से कहा: “परमेश्‍वर के राज्य में धनवान के प्रवेश करने से ऊँट का सूई के नाके में से निकल जाना सहज है।” (मरकुस 10:25) इसके उत्तर में पतरस ने—जो ऐसे अवसरों पर अक्सर तुरन्त बोल पड़ता था—यह इंगित किया कि उसने और बाकी शिष्यों ने यीशु का अनुसरण करने के लिए बहुत कुछ त्याग दिया है (पद 28)।

सम्भवतः पतरस इस बात की पुष्टि चाहता था कि वह और अन्य शिष्य यीशु की उस चेतावनी से “सुरक्षित” हैं, क्योंकि उन्होंने अपनी सम्पत्ति छोड़ दी है। और वास्तव में, यीशु ने उत्तर में उन्हें उत्साहवर्धक आश्वासन दिया कि जो कोई भी उसके और सुसमाचार के लिए बहुत कुछ त्याग देता है, वह भरपूर प्रतिफल पाएगा। दूसरे शब्दों में, इस जीवन में और आने वाले युग में भी परमेश्वर उनकी देखभाल करेगा। लेकिन यीशु केवल अपने शिष्यों को अच्छा महसूस कराने में रुचि नहीं रखता था। इसलिए उन्होंने इसके साथ एक गम्भीर चेतावनी भी जोड़ दी: “बहुत से जो पहले हैं, पिछले होंगे; और जो पिछले हैं, पहले होंगे।”

हम कल्पना कर सकते हैं कि पतरस ने ये शब्द सुनकर स्वयं की तुलना उस धनी युवक से की होगी और राहत महसूस की होगी। लेकिन शायद यीशु का उद्देश्य यही नहीं था। धन के विषय में तो वह पहले ही बात कर चुका था। बल्कि ऐसा प्रतीत होता है कि यीशु अपने शिष्यों को चेतावनी दे रहा था: सावधान रहो कि कहीं आत्म-सन्तुष्टि तुम्हें न घेर ले। ऐसे लोग हैं जो अपने आप को “पहले” समझते हैं—ऐसे बहुत सारे लोग हैं, जिन्हें या तो संसार या फिर कलीसिया कहती है कि वे “पहले” हैं—परन्तु एक दिन यीशु का न्याय उन्हें चौंका देगा। वे लोग जो चुपचाप, बिना मान्यता पाए, अपना सब कुछ यीशु के लिए अर्पित करते हैं, उन्हीं के लिए यीशु सबसे ऊँचा सम्मान सुरक्षित रखता है।

शायद हम भी पतरस की तरह अपने आप को यीशु की सम्पत्ति सम्बन्धी चुनौती से सुरक्षित मानते हैं—या तो इसलिए कि हमारे पास सम्पत्ति है ही नहीं, या फिर इसलिए कि हमने पहले ही बहुत कुछ त्याग दिया है। हमें हमेशा कोई न कोई ऐसा जरूर मिलेगा जो हमसे अधिक धनी है या जिसने हमसे कम त्याग किया है—और फिर हम अपनी आत्मिक सुरक्षा की भावना उसी तुलना पर आधारित कर देते हैं। लेकिन यीशु का उद्देश्य हमें आरामदायक महसूस कराना नहीं है। बल्कि वह हमें आत्म-सन्तोष से बाहर बुलाता है और समर्पण के साथ उसका अनुसरण करने के लिए बुलाता है। सापेक्ष गरीबी कोई गुण नहीं है, वैसे ही जैसे कि सापेक्ष सम्पन्नता कोई दोष नहीं है। यीशु ने हमें यह प्रतिज्ञा दी है कि वह हमारी देखभाल करेगा, और हमें बुलाया है कि हम अपनी सुरक्षा उस कार्य में खोजें जो उसने हमारे लिए पूरा किया है—न कि उस कार्य में जो हम उसके लिए कर रहे हैं। दूसरों से तुलना करके उत्पन्न आत्म-सन्तोष के आगे मत झुकें। बल्कि यीशु के उस बुलावे को सुनें जो उसने बाद में पतरस को तब दिया जब पतरस ने पूछा कि यूहन्ना का जीवन उसके जीवन से अलग होगा या नहीं: “तू मेरे पीछे हो ले!” (यूहन्ना 21:22)।

भजन 73

◊ पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: 1 इतिहास 25–27; लूका 4:1-30

19 November : आम्हां सर्वांना साहाय्याची गरज असते

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19 November : आम्हां सर्वांना साहाय्याची गरज असते
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तर मग आपल्यावर दया व्हावी आणि ऐन वेळी साहाय्यासाठीं कृपा मिळावी, म्हणून आपण धैऱ्याने कृपेच्या राजासनाजवळ जाऊ. (इब्री 4:16)

आमच्यापैकी प्रत्येकाला साहाय्याची गरज आहे. आम्हीं परमेश्वर नाहीं. आमच्या गरजा आहेत. आम्हीं सर्व निरनिराळ्या दुर्बळपणाने ग्रस्त आहों. आम्हांला गोंधळलेलें असल्याचे जाणवते. आम्हांला सर्व प्रकारच्या मर्यादा आहेत. आम्हांला साहाय्याची गरज आहे.

पण आमच्यापैकी प्रत्येकाला एक वेगळाच वारसा आहे  : आमच्याठायीं आमची पापे आहेत. म्हणून आपण आपल्या खोल अंतःकरणात जाणतो की आम्हांला ज्या साहाय्याची गरज आहे त्यांस आम्हीं पात्र नाहीं. म्हणून आम्हांला फसल्यासारखे वाटते.

मला माझे जीवन जगण्यासाठीं, आणि मृत्यूचे अडखळण दूर करण्यासाठीं आणि अनंतकाळात प्रवेश करण्यासाठीं साहाय्याची गरज आहे – माझे कुटुंब, माझा जोडीदार, माझी मुले, माझा एकाकीपणा, माझी नोकरी, माझे आरोग्य, माझा पैसा, ह्या सर्व बाबतींत मला साहाय्याची गरज आहे. मला साहाय्याची गरज आहे. पण मला ज्या साहाय्याची गरज आहे त्यांस मी पात्र नाहीं.

तर मग मी काय करावें? मला जर शक्य असते तर मी हे सर्व नाकारण्याचा प्रयत्न करू शकलो असतो आणि सुपरमॅन किंवा सुपरवुमन बनू शकलो असतो, ज्यांना कोणत्याही साहाय्याची गरज भासत नाहीं. किंवा मी हे सर्व बुडवण्याचा प्रयत्न करू शकतो आणि माझे जीवन लैंगिक सुखांच्या गारव्यांत ओतून टाकू शकतो. किंवा मी केवळ निराशेच्या आहारी जाऊ शकतो.

परंतु परमेश्वर या आशारहित परिस्थितीच्या वेळी अशी घोषणा करतो: येशू ख्रिस्त आशेने त्या निराशेचा चुराडा करण्यासाठीं, आणि त्या सुपरमॅन किंवा सुपरवुमनला नम्र करण्यासाठीं, आणि त्या बुडणाऱ्या दुखितास वाचवण्यासाठीं  महायाजक बनला.

होय, आम्हा सर्वांना साहाय्याची गरज आहे. होय, आपल्यापैकी कोणीही आपल्याला आवश्यक असलेल्या साहाय्यास पात्र नाहीं. पण निराशा आणि गर्व आणि कामुकतेस नाहीं. परमेश्वर काय म्हणतो ते पहा. कारण आपल्याजवळ एक थोर महायाजक आहे, देवाचे सिंहासन हे कृपेचे सिंहासन आहे. आणि कृपेच्या सिंहासनावर आपल्याला जे साहाय्य मिळते ती म्हणजें गरजेच्या वेळी साहाय्य करण्यासाठीं मिळणारी दया आणि कृपा. साहाय्य करण्यासाठीं कृपा! साहाय्यास पात्र नाहीं – कृपापूर्ण साहाय्य. म्हणूनच महायाजक येशू ख्रिस्तानें स्वतःचे रक्त सांडले.

तुमची फसवणूक झालेली नाहीं. म्हणून त्या फसव्या लबाडीस नाहीं म्हणा. आम्हांला साहाय्याची गरज आहे. आम्हीं त्यास पात्र नाहीं. पण आपल्याला ती मिळू शकते. तुम्हीं ती आताच आणि सदाकाळसाठीं मिळवू शकता. जर तुम्हीं तुमचा महायाजक, देवाचा पुत्र येशू याचा स्वीकार करतां आणि त्याच्यावर विश्वास ठेवतां आणि त्याच्याद्वारे देवाजवळ येतां.

18 नवम्बर : मूल बात का सार

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“जैसे मनुष्यों के लिए एक बार मरना और उसके बाद न्याय का होना नियुक्त है, वैसे ही मसीह भी बहुतों के पापों को उठा लेने के लिए एक बार बलिदान हुआ; और जो लोग उसकी बाट जोहते हैं उनके उद्धार के लिए दूसरी बार बिना पाप उठाए हुए दिखाई देगा।” इब्रानियों 9:27-28

अन्तिम और निश्चित आँकड़ा यही है कि हर एक व्यक्ति को मरना है। मृत्यु जीवन की एकमात्र सुनिश्चितता है। एक मसीही के रूप में, यद्यपि हम मृत्यु की घटना से डर सकते हैं, परन्तु हमें उसके परिणाम से डरने की आवश्यकता नहीं है।

हमें डरने की ज़रूरत इसलिए नहीं है, क्योंकि यीशु केवल हमारे सुखों में वृद्धि करने, हमें जीवन में सफलता या सांसारिक समृद्धि देने के लिए नहीं आया, बल्कि वह पापियों को उद्धार देने और न्याय से बचाने के लिए आया।

बाइबल सिखाती है कि जिन लोगों के नाम जीवन की पुस्तक में नहीं पाए जाते, उन पर परमेश्वर का न्याय और अनन्त दण्ड आएगा (प्रकाशितवाक्य 20:11-15)। तो फिर हम कैसे सुनिश्चित हो सकते हैं कि हमारे नाम उस पुस्तक में लिखे होंगे? इसका केवल एक ही उपाय है: प्रभु यीशु में विश्वास करना। हमें मसीह की ओर देखना है, जो खुले हृदय से उन सब को क्षमा करता है और धर्मी ठहराता है, जो मन फिराकर और विश्वास से उसके पास आते हैं। और यीशु के पास आना केवल बौद्धिक सहमति देना नहीं है—यद्यपि वह आवश्यक है। केवल मसीही सिद्धान्तों को समझना ही पर्याप्त नहीं है। हमें यह पहचानना होगा कि हमने परमेश्वर के साथ सही व्यवहार नहीं किया है। हमने उसे अस्वीकार किया है और उसका विरोध किया है। हमें अपने जीवन को उसकी प्रेमी प्रभुता के अधीन कर देना है और पूरी तरह उस पर निर्भर होना है जो मसीह ने क्रूस पर हमारे लिए किया, ताकि हम परमेश्वर के सामने स्वीकृत हो सकें।

मूल प्रश्न यह नहीं है कि क्या हम यीशु या बाइबल के बारे में कुछ तथ्य मानते हैं, या क्या हमने अपनी जीवनशैली को सुधार लिया है। असली सवाल यह है: क्या हम कभी आत्मिक रूप से इतने प्यासे हुए हैं कि हमने पुकारा हो, “हे प्रभु यीशु मसीह, मुझे अपना जीवन जल दे ताकि मैं फिर कभी प्यासा न रहूँ”?

लेकिन क्या होगा यदि यीशु हमें ठुकरा दे? क्या होगा यदि हमारा नाम जीवन की पुस्तक में दर्ज होने ही नहीं वाला? यीशु ने स्वयं यह प्रतिज्ञा करते हुए इस डर का उत्तर दिया: “जो कोई मेरे पास आएगा, उसे मैं कभी न निकालूँगा।” (यूहन्ना 6:37)

क्या आपने परमेश्वर के इस बुलावे की करुणा को पहचाना है? क्या आपने यीशु में शरण लेने के लिए परमेश्वर का बुलावा सुना है? क्या आप उसे हर दिन नए सिरे से सुनते हैं और उसके पंखों की छाया में शरण लेते हैं (भजन 57:1)? हम भजन लेखक के साथ कह सकें:

मैं जैसे था वैसे ही यीशु के पास आया,

थका हुआ, बोझिल और दुखी;

मैंने उसमें विश्राम का स्थान पाया,

और उसने मुझे आनन्दित कर दिया।[1]

क्योंकि यदि हमने पुत्र में शरण ली है, तो हम यह निश्चित तौर पर जान सकते हैं कि उसने हमारे पापों को अपनी मृत्यु में उठा लिया है, और जब वह लौटेगा, तब हमें भयावह दण्ड नहीं, बल्कि महिमामय स्वागत मिलेगा। और फिर हम यह सत्य सुन सकते हैं कि “मनुष्यों के लिए एक बार मरना नियुक्त है”, और फिर भी हमारा हृदय शान्त बना रह सकता है।

  भजन 49 पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: 1 इतिहास 22–24; लूका 3 ◊


[1] होराटियस बोनार, “आई हर्ड द वोयस ऑफ जीज़स सेय” (1846).

18 November : वचनाचे मर्मभेदी सामर्थ्य

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18 November : वचनाचे मर्मभेदी सामर्थ्य
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कारण देवाचे वचन सजीव, सक्रिय, कोणत्याही दुधारी तलवारीपेक्षा तीक्ष्ण असून, जीव व आत्मा, सांधे व मज्जा ह्यांना भेदून आरपार जाणारे आणि मनातील विचार व हेतू ह्यांचे परीक्षक असें आहे. (इब्री 4:12)

देवाचे वचन हीच आमची एकमात्र आशा आहे. देवाच्या अभिवचनांची सुवार्ता आणि त्याच्या न्यायाचे सावधगिरीचे इशारे इतके तीक्ष्ण आणि सजीव आणि सक्रिय आहेत कीं ती माझ्या अंतकरणाच्या तळाशी जातांत आणि मला दाखवतांत की पापाचा खोटेपणा हा खरोखर खोटेपणाच आहे.

 गर्भपात माझ्यासाठीं उज्वल भविष्य निर्माण करणार नाहीं. तसेच फसवणूक, अथवा भडकाऊ वस्त्र घालणें, अथवा माझी लैंगिक शुद्धता धुळीस मिळवणें, अथवा कामाच्या ठिकाणी प्रामाणिकपणाविषयी शांत राहणें, किंवा सोडचिठ्ठी, किंवा सूड घेणें ह्याही गोष्टींनी माझे कसलेच कल्याण होणार नाहीं. आणि या फसवणुकीपासून जर कोणी मला वाचवत असेल तर ते आहे देवाचे  वचन.

देवाच्या वचनाचे अभिवचन आमच्या अंतःकरणातील संतोषकारक सुखविलासाप्रमाणें पापाच्या झुरळांवर पहाटेच्या उज्वल सूर्यप्रकाशाची मोठी खिडकी उघडण्यासारखे आहे. परमेश्वराने तुम्हांला तुमचे अंतःकरण कठोर करण्याचा प्रयत्न करणाऱ्या आणि तुम्हांस भुरळ पाडून परमेश्वरापासून दूर नेणाऱ्या आणि विनाशाकडे घेऊन जाणाऱ्या पापाच्या खोल फसवणुकीपासून तुमचे रक्षण करण्याकरिता त्याची सुवार्ता, त्याची अभिवचने, त्याचे वचन दिलें आहे.

विश्वासाचे जे सुयुद्ध ते आनंदाने करा. कारण देवाचे वचन सजीव आणि सक्रिय आणि कोणत्याही दोधारी तलवारीपेक्षा अधिक तीक्ष्ण आहे. ते पापाच्या कोणत्याही फसवणुकीस भेदून आरपार जाते आणि जे खरोखर मूल्यवान आहे आणि जे खरोखर विश्वास ठेवण्यास पात्र आणि प्रिय आहे ते उघडकीस आणते.

17 नवम्बर : आशिषें और श्राप

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17 नवम्बर : आशिषें और श्राप
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“फिर अपने परमेश्‍वर यहोवा की सुनने के कारण ये सब आशीर्वाद तुझ पर पूरे होंगे … परन्तु यदि तू अपने परमेश्‍वर यहोवा की बात न सुने, और उसकी सारी आज्ञाओं और विधियों के पालने में जो मैं आज सुनाता हूँ चौकसी नहीं करेगा, तो ये सब शाप तुझ पर आ पड़ेंगे।” व्यवस्थाविवरण 28:2, 15

मोआब के मैदानों में यरदन नदी के किनारे इस्राएली लोग अन्ततः उस देश में प्रवेश करने पर थे, जिसे परमेश्वर ने उन्हें देने की प्रतिज्ञा की थी। मूसा ने लोगों को अन्तिम बार सम्बोधित किया, यह सुनिश्चित करने की कोशिश करते हुए कि वे पिछली पीढ़ी की तरह अवज्ञा करके परमेश्वर के साथ अपने सम्बन्ध को खराब न करें। उसने उन्हें स्मरण कराया कि परमेश्वर ने अतीत में क्या कहा और क्या किया, और उसने उन्हें परमेश्वर के महान हस्तक्षेप के और वाचा निभाने वाली विश्वासयोग्यता के आधार पर परमेश्वर के लिए एक अलग किए हुए लोग बने रहने का आग्रह किया।

मूसा की शिक्षाओं के माध्यम से परमेश्वर ने अपने लोगों के सामने दो स्पष्ट विकल्प रखे—और अपेक्षाएँ बहुत ऊँची थीं। उसने उन्हें आशीर्वाद की एक प्रतिज्ञा दी और फिर एक चेतावनी दी। उसने उनसे एक सरल प्रश्न किया: वे कैसा जीवन जीने वाले हैं? क्या वे वाचा का पालन करेंगे और देश में आशीर्वादों का आनन्द लेंगे, या वे अवज्ञा करेंगे और उस देश से निकाल दिए जाएँगे?

जो लोग उस देश की सीमा पर एकत्रित हुए थे, उन्होंने शायद परमेश्वर के वचनों को सुनकर कहा होगा, अरे नहीं, ऐसी अवज्ञा तो हमसे कभी नहीं होगी! लेकिन कुछ सौ वर्षों के बाद हम उन्हें कहाँ पाते हैं? “बेबीलोन की नहरों के किनारे हम लोग बैठ गए, और सिय्योन को स्मरण करके रो पड़े . . . हम यहोवा के गीत को, पराए देश में कैसे गाएँ?” (भजन 137:1, 4)। विदेशी लोगों के बन्दी बनकर इस्राएली पीछे मुड़कर देखते हैं और सोचते हैं कि वे इस दशा तक कैसे पहुँच गए।

एक पतित संसार में जीते हुए प्राणी के रूप में आप और मैं बहुत ही असुरक्षित, प्रलोभन के खतरे में, और बार-बार परीक्षा में पड़ने के खतरे में बने रहते हैं। हम अवज्ञा से और परमेश्वर से दूर हो जाने से केवल एक निर्णय की दूरी पर होते हैं। हमें परमेश्वर की सहायक कृपा की अत्यन्त आवश्यकता है। दुख की बात यह है कि बहुत से लोग जो कभी समर्पित, प्रतिबद्ध और प्रतिज्ञा किए हुए देश की ओर बढ़ते प्रतीत होते थे, वे सिर्फ लड़खड़ाए नहीं, बल्कि अविश्वास में गिर पड़े। और हमारी सबसे बड़ी गलती यह सोच है, “अरे नहीं, यह तो मेरे साथ कभी नहीं होगा!”

दुष्ट एक झूठ फैलाना पसन्द करता है—कि परमेश्वर ने हमें अपना व्यवस्था-विधान और आज्ञाएँ इसलिए दी हैं ताकि वह हमारे जीवन को फीका बना दे, हमें आनन्द से वंचित कर दे, और हमारे दिन दुखों और पीड़ाओं से भर दे। यह सब झूठों में सबसे बड़ा झूठ है। परमेश्वर ने अपना वचन हमारे भले के लिए दिया है! पवित्रशास्त्र की सभी चेतावनियाँ इसलिए दी गई हैं कि जब हम विनाश के कगार पर खड़े हों तो हमें चेताएँ और हमें नियन्त्रण में रखें; पवित्रशास्त्र की सभी प्रतिज्ञाएँ इसलिए दी गई हैं कि जब हम भयभीत और अनिश्चित हों तो हमें सम्भालें; और पवित्रशास्त्र की सभी आज्ञाएँ इसलिए दी गई हैं कि हमें परमेश्वर के संसार में, परमेश्वर की उपस्थिति में, परमेश्वर की आशिषों से भरे जीवन में ले जाएँ। हमारी भलाई के लिए उसकी प्रतिबद्धता सबसे पूर्ण रूप से उसके पुत्र में प्रकट होती है, जो हमारी अवज्ञा के शाप को सहने के लिए आया, ताकि हम वह आशीष पा सकें जो केवल वही पाने के योग्य था।

क्या आप परमेश्वर से प्रेम करते हैं? क्या आप जानते हैं कि परमेश्वर आपसे प्रेम करता है? तो फिर उसकी चेतावनियों पर ध्यान दें, उसकी आज्ञाओं का पालन करें, और उसकी प्रतिज्ञाओं की सान्त्वनाओं को संजो कर रखें।

गलातियों 3:10-14

◊ पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: 1 इतिहास 19–21; लूका 2:22-52