ArchivesAlethia4India

27 November : परमेश्वराचा महिमा कसा वर्णावा

Alethia4India
Alethia4India
27 November : परमेश्वराचा महिमा कसा वर्णावा
Loading
/

गीत गाऊन मी देवाच्या नावाचे स्तवन करीन. त्याचे उपकारस्मरण करून त्याचा महिमा वर्णीन. (स्तोत्र 69:30)

दोन प्रकारचे भिंग आहेत: सूक्ष्मदर्शक भिंग आणि दुर्बिणीचे भिंग. सूक्ष्मदर्शक भिंगामुळें लहान वस्तू तिच्या आकारापेक्षा मोठी दिसते. दुर्बिणीच्या भिंगामुळें मोठी वस्तू तितकींच मोठी दिसते जितकीं मोठी ती प्रत्यक्षात आहे.

जेव्हा दावीद म्हणतो, “त्याचे उपकारस्मरण करून त्याचा महिमा वर्णीन,” तेव्हा त्याचा अर्थ असा नाहीं कीं, “मी लहान परमेश्वरास तो जसा आहे त्यापेक्षा मोठा करीन.” याचा अर्थ, “मी मोठ्या परमेश्वराचे गौरव त्यामानाने वर्णीन जितकी मोठी त्याची महती प्रत्यक्षात आहे.”

आम्हास सूक्ष्मदर्शक होण्यासाठीं पाचारण करण्यात आलेंलें नाहीं. आम्हास दुर्बिण होण्यासाठीं पाचारण करण्यांत आलें आहे. ख्रिस्ती लोकांस ठग होण्यासाठीं  बोलावण्यात आलेंलें नाहीं ज्यांना हे माहीत असतांनाहीं कीं त्यांच्या प्रतिस्पर्धीची वस्तू अतिशय उत्तम प्रतीची आहे, ते त्यांची वस्तू तिच्या वास्तविकतेपेक्षा सर्व प्रमाणांनी वाढवितात. परमेश्वरापेक्षा श्रेष्ठ कांहींही नाहीं आणि कोणीही नाहीं. आणि म्हणून परमेश्वरावर प्रीति करणाऱ्यांचे पाचारण आहे त्याची महानता इतकीं मोठी दाखविणें जितकीं ती खरोखर आहे.

म्हणूनच आम्हीं अस्तित्वात आहोत, आमचे तारण यासाठींच झालें होते, जसे पेत्र 1 पेत्र 2:9 मध्ये म्हणतो, “पण तुम्हीं तर ‘निवडलेला वंश, राजकीय याजकगण, पवित्र राष्ट्र,’ देवाचे ‘स्वत:चे लोक’ असें आहात; ह्यासाठीं कीं, ज्यानें तुम्हांला अंधकारातून काढून आपल्या अद्भुत प्रकाशात पाचारण केलें ‘त्याचे गुण तुम्हीं प्रसिद्ध करावेत.’”

ख्रिस्ती व्यक्तीचे संपूर्ण कर्तव्य यां शब्दांत सारगर्भित केलें जाऊ शकते : ओळखा, चिंतन करा, आणि तसेच आपलें आचरण ठेवा  ज्यामुळें परमेश्वर खरोखर जितका थोर आहे तितके थोर त्याला दाखविता यावें. जगासाठीं परमेश्वराच्या गौरवाच्या अमर्याद तारांकित संपत्तीची दुर्बिण बना.

ख्रिस्ती व्यक्तीसाठीं परमेश्वराचे गौरव करण्याचा हाच अर्थ आहे. पण तुम्हीं जे पाहिलें नाहीं अथवा जे तुम्हीं लगेच विसरून जाता त्याची तुम्हीं वाखाणणी करू शकत नाहीं.

यास्तव, आमचे पहिलें काम परमेश्वराची महानता आणि त्याचे चांगुलपण पाहणें आणि ते आठवणीत ठेवणें हे आहे. म्हणून आम्हीं परमेश्वराजवळ प्रार्थना करतो, “माझे अंतश्चक्षू प्रकाशित कर!” (इफिस 1:18), आणि आम्हीं आपल्या जीवास उपदेश देतो, “हे माझ्या जिवा, त्याचे सर्व उपकार विसरू नको” (स्तोत्र 103:2).

26 नवम्बर : दान क्यों दें?

Alethia4India
Alethia4India
26 नवम्बर : दान क्यों दें?
Loading
/

“तुम हर बात में सब प्रकार की उदारता के लिए जो हमारे द्वारा परमेश्‍वर का धन्यवाद करवाती है, धनवान किए जाओ।” 2 कुरिन्थियों 9:11

परमेश्वर कोई स्वर्गिक मनोरंजन-विरोधी नहीं है। वह हमें ऐसा निराशाजनक जीवन जीने को नहीं कहता, जिसमें हमें बैठकर झूठी प्रसन्नता का दिखावा करना पड़े। इसके विपरीत, वह हमें सब कुछ भरपूरी से प्रदान करता है। हमें उसकी दी हुई आशिषों के लिए माफी माँगने की ज़रूरत नहीं है; लेकिन हमें उन्हें दूसरों के साथ बाँटना अवश्य है।

परमेश्वर हमें हमारी आवश्यकताओं के लिए जो कुछ भी देता है (और अक्सर उससे भी अधिक देता है), तो उसमें उसका उद्देश्य यही है कि हम दूसरों को भी दें। जब हम “धनवान किए” जाते हैं, तो पौलुस कहता है कि यह “सब प्रकार की उदारता के लिए होता है, जो हमारे द्वारा परमेश्‍वर का धन्यवाद करवाती है।” हमने जो कुछ परमेश्वर से उपहार स्वरूप पाया है, उसे हमें दूसरों को भी परमेश्वर के उपहार स्वरूप देना है। याकूब इस विचार को चुनौतीपूर्ण रूप में आगे बढ़ाता है जब वह पूछता है: “यदि कोई कहे कि मुझे विश्वास है पर वह कर्म न करता हो, तो इससे क्या लाभ?” (याकूब 2:14)। उत्तर स्पष्ट है: ऐसे विश्वास का कोई लाभ नहीं है! जब हम जरूरतमंदों की मदद करने की अपनी ज़िम्मेदारी को निभाते हैं, तब हम न केवल परमेश्वर की स्तुति को प्रेरित करते हैं, बल्कि अपने विश्वास की वास्तविकता का प्रमाण भी देते हैं।

परमेश्वर हमें संसाधनों के साथ-साथ वह अनुग्रह भी देता है जिसकी जरूरत हमें सच्ची उदारता दिखाने के लिए होती है—यहाँ तक कि स्वयं का त्याग करने के लिए भी, ताकि औरों को आशीष मिल सके (2 कुरिन्थियों 8:1-3)। वही परमेश्वर है जो “सब प्रकार का अनुग्रह तुम्हें बहुतायत से दे सकता है जिस से हर बात में और हर समय, सब कुछ, जो तुम्हें आवश्यक हो, तुम्हारे पास रहे; और हर एक भले काम के लिए तुम्हारे पास बहुत कुछ हो” (2 कुरिन्थियों 9:8)।

एक उदार मन हमें स्वार्थ से और अधिक धन इकट्ठा करने की इच्छा से बचाता है। परमेश्वर की आशीष का आनन्द कोई मजबूत आर्थिक नींव रखने में नहीं है, जिससे हम किसी शानदार जगह पर रिटायर हो सकें, बड़ी विरासत छोड़ सकें, या बचत खाते में सुकून पा सकें। बल्कि हमें जो सम्पत्ति अभी दी गई है, उसे दूसरों के साथ साझा करने के लिए बुलाया गया है, ताकि जब दूसरे उसमें सहभागी हों, तो वे परम दाता परमेश्वर में सच्चा सन्तोष पाएँ।

यदि हम ईमानदारी से कहें, तो अक्सर हम इसलिए उदारता से नहीं देते, क्योंकि हमें डर होता है कि दान दे देने के बाद कहीं परमेश्वर हमें अकेला और खाली न छोड़ दे। लेकिन पवित्रशास्त्र हमें आश्वस्त करता है कि वही परमेश्वर, जिसने हमारे बचपन में हमारी देखभाल की, वह बुढ़ापे में भी हमारी आवश्यकता पूरी करेगा (यशायाह 46:4 देखें)।

सच्चा आनन्द तब पाया जाता है जब हम अपने स्वामित्व के बन्धनों से मुक्त हो जाते हैं। यह हमारा सौभाग्य और उत्तरदायित्व है कि हम भले कामों में धनवान हों और दूसरों के साथ बाँटने में तत्पर हों, चाहे हमें बहुत कुछ मिला हो या थोड़ा ही। परमेश्वर से यह अनुग्रह माँगें कि आप बिना संकोच और खुशी-खुशी दे सकें, और यह कभी न भूलें: आप परमेश्वर से अधिक नहीं दे सकते।

1 कुरिन्थियों 9:6-15

पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: 2 इतिहास 15–16; लूका 7:24-50 ◊

26 November : येशू आम्हांसाठीं प्रार्थना करतो

Alethia4India
Alethia4India
26 November : येशू आम्हांसाठीं प्रार्थना करतो
Loading
/

ह्यामुळें ह्याच्या द्वारे देवाजवळ जाणाऱ्यांना पूर्णपणें तारण्यास हा समर्थ आहे; कारण त्यांच्यासाठीं मध्यस्थी करण्यास हा सर्वदा जिवंत आहे. (इब्री 7:25)

हा शास्त्रलेख म्हणतो कीं ख्रिस्त पूर्णपणें तारण्यास समर्थ आहे – सर्वदा – कारण तो आमच्यासाठीं मध्यस्थी करण्यास हा सर्वदा जिवंत आहे. दुसऱ्या शब्दांत, जर तो आमच्यासाठीं सर्वदा मध्यस्थी करित नाहीं, तर तो आम्हास सर्वदा तारावयास समर्थहि असणार नाहीं.

याचा अर्थ असा कीं आमचे तारण तितकेच सुरक्षित आहे जितके ख्रिस्ताचे याजकपण अविनाशी आहे. म्हणूनच आम्हास कोणत्याही मानवी याजकापेक्षा अति श्रेष्ठ अशा याजकाची गरज होती. ख्रिस्ताचे ईश्वरत्व आणि मेलेल्यांतून त्याचे झालेलें पुनरूत्थान आमच्यासाठीं त्याचे अविनाशी याजकपद सुरक्षित करते.

याचा अर्थ हा कीं आपण आपल्या तारणाविषयी निष्क्रिय शब्दांत बोलता कामा नये जसे आम्हीं बरेचदा बोलतो – जणू कांहीं मी माझा एकदाचा निर्णय घेऊन माझे कर्तव्य केलें, आणि ख्रिस्तानें मरण सोसून व परत जिवंत होऊन त्यानें एकदाचे त्याचे काम संपविलें, बस इतकेच काय ते. परंतु ते इतकेच नाहीं.

स्वर्गात येशूच्या सार्वकालिक मध्यस्थीद्वारे मी आजहि तारला जात आहे. येशू आमच्यासाठीं प्रार्थना करीत आहे आणि हे आमच्या तारणासाठीं आवश्यक आहे.

आम्हीं आमचा महायाजक म्हणून स्वर्गातील येशूच्या सर्वदा सक्रिय असलेल्यां प्रार्थनांद्वारे (रोम 8:34) आणि मध्यस्थीद्वारे (1 योहान 2:1) सार्वकालिकरित्या तारण पावतो. तो आमच्यासाठीं प्रार्थना करतो आणि त्याच्या प्रार्थनांची उत्तरे मिळतात कारण तो त्याच्या सिद्ध बलिदानाच्या आधारे सिद्धपणें प्रार्थना करतो.

25 नवम्बर : सत्य को जीना

Alethia4India
Alethia4India
25 नवम्बर : सत्य को जीना
Loading
/

“तुम ये बातें जानते हो, और यदि उन पर चलो तो धन्य हो।” यूहन्ना 13:17

क्या आपको कभी ऐसा समय याद आता है जब कोई अजनबी अचानक आपके पास आया हो और आपसे पूछा हो कि आप यीशु मसीह और मसीही विश्वास के बारे में क्या मानते हैं? शायद आपके ऐसे अनुभव बहुत कम या बिल्कुल नहीं हुए होंगे। निश्चय ही, हमें ऐसे अवसरों के लिए तैयार रहना चाहिए; प्रेरित पतरस हमें बताता है कि हमें उस आशा का कारण बताने के लिए तैयार रहना चाहिए जो हमारे भीतर है (1 पतरस 3:15)। लेकिन हमारे विश्वास को समझाने के अवसर अक्सर अजनबियों से हुई आकस्मिक मुलाकातों से नहीं, बल्कि हमारे दैनिक जीवन के उस तरीके से उत्पन्न होते हैं, जिसे हम अपने परिचितों के सामने प्रतिदिन जीते हैं।

हम कैसे जीते हैं और क्या मानते हैं, यह हमारे मसीह से जुड़े होने को प्रतिबिम्बित करना चाहिए। इसी कारण पतरस कहता है कि मसीही “[परमेश्‍वर की] निज प्रजा” हैं (1 पतरस 2:9)। यीशु से हमारा सम्बन्ध व्यापक और सम्पूर्ण है। इसका अर्थ यह है कि हमें अब अपनी इच्छानुसार कुछ भी मानने की स्वतन्त्रता नहीं है; अब हम विवाह, लैंगिकता, धन-सम्पत्ति, या किसी भी अन्य विषय में अपने विचार नहीं बना सकते। अब हमारे विचार हमारे मसीह और गुरु, यीशु, के विचारों को प्रतिबिम्बित करने चाहिएँ। परन्तु यीशु केवल इतना नहीं चाहता कि उसके शिष्य सत्य को केवल जानें, वह यह भी चाहता है कि वे सत्य को जीएँ: “तुम ये बातें जानते हो, और यदि उन पर चलो तो धन्य हो।” अतः विश्वास का परिणाम कार्य में प्रकट होना चाहिए। इसका अर्थ यह भी है कि अब हमें अपनी इच्छानुसार आचरण करने की स्वतन्त्रता नहीं है। हमारा व्यवहार हमारे बलिदानी उद्धारकर्ता यीशु के समान होना चाहिए।

आज की बहुत-सी आधुनिक धार्मिक और धर्मनिरपेक्ष मान्यताएँ आपकी जीवनशैली से कुछ नहीं माँगतीं; वे आपको अपनी इच्छा से जीने की पूरी आज़ादी देती हैं। (वास्तव में, कई विचारधाराएँ इसी सिद्धान्त को प्राथमिकता देती हैं: “जो तुम्हें ठीक लगे वही करो।”) लेकिन मसीही शिष्यता का बुलावा बिल्कुल भिन्न है, क्योंकि इसके केन्द्र में यह बुलावा है: एक ऐसे राजा का अनुसरण करना जो आप स्वयं नहीं हैं। मसीही जीवन का बुलावा केवल सुसमाचार पर विश्वास करने का नहीं, बल्कि यह भी है कि “तुम्हारा चाल–चलन मसीह के सुसमाचार के योग्य हो” (फिलिप्पियों 1:27)। हम सभी इसमें पीछे रह जाते हैं। क्या आपके जीवन में कोई ऐसा व्यक्ति है जो आपको यह पहचानने में मदद करता है—और जिसकी आप भी मदद कर सकते हैं—कि आपके व्यवहार के कौन-कौन से क्षेत्र अभी भी सुसमाचार के योग्य नहीं हैं? मसीह में एक भाई या बहन के साथ साझेदारी करें, परमेश्वर के वचन का प्रकाश एक-दूसरे पर डालें, और सत्य को जीवन में लाने का प्रयास करें!

इस संसार में परमेश्वर के सुसमाचार को पहुँचाने का परमेश्वर द्वारा निर्धारित प्राथमिक साधन कलीसिया है। आप इसका हिस्सा हैं। लेकिन यदि आप स्वयं सुसमाचार के अनुसार नहीं जीते, तो दूसरों से यह अपेक्षा मत करें कि वे आपसे सुसमाचार के बारे में पूछेंगे—और उससे भी कम यह कि वे पश्चाताप करें और विश्वास करें:

आप एक सुसमाचार लिख रहे हैं,

हर दिन एक अध्याय,

अपने कामों के द्वारा,

अपनी बातों के द्वारा।

आप जो लिखते हैं उसे लोग पढ़ते हैं,

चाहे यह बिना विश्वास के हो, या सच्चा हो।

आपके अनुसार सुसमाचार क्या है?[1]

यूहन्ना 13:31-35

◊ पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: 2 इतिहास 13–14; लूका 7:1-23


[1] सामान्यतः इसका श्रेय पॉल गिलबर्ट को दिया जाता है।

25 November : आभारप्रदर्शनाद्वारें देवाचे गौरव करा

Alethia4India
Alethia4India
25 November : आभारप्रदर्शनाद्वारें देवाचे गौरव करा
Loading
/

हे सर्व तुम्हांसाठीं आहे, जितके अधिक लोक त्याच्या कृपेने त्याच्याजवळ येतील, तितके त्याच्या अपार दयेबद्दल त्याचे आभार मानतील आणि परमेश्वराचे अधिक गौरव होईल. (2 करिंथ 4:15)

देवाचे कृतज्ञ असणें ही एक आनंदी भावना आहे. त्याच्या कृपेसाठीं आम्हांमध्ये आनंदाने भरलेली उपकार-स्तुतीची जाणीव आहे. म्हणून एका अर्थानें जर पाहिलें तर आभारप्रदर्शनाच्या भावनेंतच, आम्हीं आजही लाभार्थी आहोत. पण आभारप्रदर्शनाचा गुणच असा आहे कीं त्यामुळें कृपा करणाऱ्याचे गौरव होते. आम्हीं आभारप्रदर्शन करतो तेव्हा आम्हीं आमची गरज आणि परमेश्वराचा दानशील गुण, परमेश्वराची पूर्णता, व त्याच्या गौरवाच्या संपत्तीची कबूली देतो.

ज्याप्रकारे मी रेस्टॉरेंटमध्ये अन्न वाढणाऱ्यास, “धन्यवाद” म्हणतो, तेव्हा मी स्वतःस नम्र करतो आणि त्याची वाखाणणी करतो, त्याचप्रमाणें जेव्हा मी परमेश्वरासाठीं आभारप्रदर्शनाची जाणीव बाळगतो तेव्हा मी स्वतःस नम्र करतो आणि त्यास गौरव देतो. अर्थात फरक हा आहे कीं देवानें मजवर जी कृपा केलीं त्याबद्दल मी त्याचा अतिशय ऋणी आहे, आणि जे कांहीं तो माझ्यासाठीं करतो ते सर्व तो विनामूल्य करतो ज्यांस मी पात्र नाहीं.

मुद्दा हा आहे कीं आभारप्रदर्शन देणाऱ्याचे गौरव करते. त्यामुळें परमेश्वराचे गौरव होते. पौलाच्या सर्व परिश्रमात त्याचे हेच अंतिम ध्येय होते. होय, त्याचे परिश्रम मंडळीसाठीं होते – मंडळीच्या उन्नतीसाठीं. पण मंडळी सर्वोच्च ध्येय नाहीं. पुन्हा ऐका: “हे सर्व तुम्हांसाठीं आहे, जितके अधिक लोक त्याच्या कृपेने त्याच्याजवळ येतील, तितके त्याच्या अपार दयेबद्दल त्याचे आभार मानतील आणि परमेश्वराचे अधिक गौरव होईल.” सर्व तुम्हांसाठीं – परमेश्वराच्या गौरवासाठीं!

सुवार्तेविषयी अद्भुत गोष्ट ही आहे कीं परमेश्वराच्या गौरवासाठीं आमच्याकडून तिला जो प्रतिसाद हवा आहे तो असा प्रतिसाद देखील आहे जो अतिशय स्वाभाविक आणि आनंदाने भरलेला असतो; अर्थात, कृपेसाठीं उपकारबुद्धी किंवा आभार. कृपा करण्यांत परमेश्वराचे सर्व-संपन्न गौरव आणि प्राप्त करण्यात आमचा विनम्र आनंद यांत तोड नाहीं. आनंदानें आभार मानण्याद्वारे परमेश्वराचे गौरव होते.

त्याच्या कृपेसाठीं परमेश्वरास गौरव देणारे जीवन आणि अतिशय आनंदाचे जीवन हे एकच जीवन आहे. आणि यांस जे एकत्र करते ते म्हणजें आभारप्रदर्शन अथवा कृतज्ञता.

24 नवम्बर : आओ, धन्यवाद करने वाले लोगो

Alethia4India
Alethia4India
24 नवम्बर : आओ, धन्यवाद करने वाले लोगो
Loading
/

हर बात में धन्यवाद करो … शान्ति का परमेश्‍वर आप ही तुम्हें पूरी रीति से पवित्र करे; और तुम्हारी आत्मा और प्राण और देह हमारे प्रभु यीशु मसीह के आने तक पूरे-पूरे और निर्दोष सुरक्षित रहें। तुम्हारा बुलाने वाला सच्चा है, और वह ऐसा ही करेगा।” 1 थिस्सलुनीकियों 5:18, 23-24

धन्यवाद देना हमेशा आसान नहीं होता, भले ही अमेरिका एक राष्ट्र के रूप में इसके लिए विशेष अवकाश निर्धारित करता है। इस अवकाश के दौरान हममें से कई लोग जीवन की ऐसी परिस्थितियों से अवगत होते हैं, जो धन्यवाद की भावना उत्पन्न नहीं करतीं। कुछ लोग अपने सबसे अकेले दिनों का सामना कर रहे होते हैं, तो कुछ लोग किसी प्रियजन के सुसमाचार से भटक जाने के भारी बोझ से दबे होते हैं। कुछ लोग इस मौसम में किसी असफलता के कारण बहुत निराश होते हैं—जैसे नौकरी का छूटना, किसी सम्बन्ध का टूटना, या एक और पदोन्नति चूक जाना। कभी-कभी हम खुद को पूरी तरह से फँसा हुआ पाते हैं, निराशा से बाहर निकलने में असमर्थ होते हैं, और कृतज्ञता से उतना ही दूर महसूस करते हैं जितना पूरब से पश्चिम दूर है।

जब हम ऐसी परिस्थितियों का सामना करते हैं और पढ़ते हैं, “हर बात में धन्यवाद करो,” तो हम अक्सर सोचते हैं कि इसका पालन कैसे करें। फिर भी, बाइबल कभी भी किसी आज्ञा को सहायता के बिना नहीं देती।

इस प्रश्न का उत्तर कि हम निरन्तर धन्यवाद कैसे दे सकते हैं, परमेश्वर के हमारे अन्दर पवित्रीकरण के कार्य में छिपा है। “पवित्रीकरण” का अर्थ है “परमेश्वर के लिए अलग किया जाना।” जब प्रभु यीशु मसीह हमारे जीवन में शासन करने आता है, तो पवित्र आत्मा हमारे अन्दर प्रवेश करता है ताकि आत्मिक विकास के लिए आवश्यक निरन्तर शुद्धिकरण कर सके। यही परमेश्वर का कार्य है जो हमें वह बनने की शक्ति देता है जो यीशु हमसे चाहता है: “क्योंकि परमेश्‍वर ही है जिसने अपनी सुइच्छा निमित्त तुम्हारे मन में इच्छा और काम, दोनों बातों के करने का प्रभाव डाला है” (फिलिप्पियों 2:13)।

जब हम मसीह में बने रहते हैं—“उसी में जड़ पकड़ते और बढ़ते” जाते हैं (कुलुस्सियों 2:7)—अपना बाइबल का अध्ययन करते हैं, प्रार्थना करना सीखते हैं, परमेश्वर के लोगों के साथ संगति रखते हैं, और दूसरों को उसके बारे में बताते हैं—तो हमें याद दिलाया जाता है कि वह हमारे लिए क्या है और उसने हमारे लिए और हमारे भीतर क्या-क्या किया है। हम भजनकार के साथ गाना सीखते हैं: “हे परमेश्‍वर, हम तेरा धन्यवाद करते, हम तेरे नाम का धन्यवाद करते हैं; क्योंकि तेरा नाम प्रगट हुआ है, तेरे आश्चर्यकर्मों का वर्णन हो रहा है” (भजन 75:1)।

हमारे अपने पछतावों और निराशाओं के बावजूद, जब हम उसके अद्‌भुत कामों—उसका क्रूस, उसका पुनरुत्थान, उसका स्वर्गारोहण, और उसके पवित्र आत्मा के द्वारा हमारे अन्दर किया गया कार्य जो हमें विश्वास में लाता है और विश्वास में बनाए रखता है—को याद करते हैं, तो हम कृतज्ञता से भर सकते हैं।

हमारी परीक्षाएँ कठिन और उदास हो सकती हैं। हो सकता है हम हर क्षण में आभारी न महसूस करें। यह ठीक है, क्योंकि बात यह नहीं है कि हम क्या महसूस कर रहे हैं—मुद्दा यह है कि परमेश्वर हमें आभारी बनने का सामर्थ्य देता है। वही हमें पौलुस की शिक्षाओं को पूरा करने की शक्ति प्रदान करता है।

यदि आप इस समय अपने जीवन में कृतज्ञता की कमी महसूस कर रहे हैं, तो कम से कम एक क्षण के लिए अपनी परिस्थितियों से ध्यान हटाएँ और परमेश्वर के प्रेम के उपहार पर मनन करें। जब आप मसीह में बने रहते हैं और परमेश्वर के आत्मा को उसका पवित्रीकरण का कार्य जारी रखने देते हैं, तो वह आपको भीतर से जागृत करेगा, ताकि आँसुओं, पीड़ा और निराशा के बावजूद, जब वह पुकारे, “आओ, हे कृतज्ञ जनो, आओ,”[1] तो आप उसका उत्तर दे सकें।

  भजन 149

पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: 2 इतिहास 10–12; लूका 6:27-49 ◊


[1] हेनरी एलफर्ड, “कम, ये थैंकफुल पीपल, कम” (1844).

24 November : तुमची आशा हस्तगत करां

Alethia4India
Alethia4India
24 November : तुमची आशा हस्तगत करां
Loading
/

म्हणून आपल्या संकल्पाची अचलता अभिवचनाच्या वतनदारांना विशेषत्वानें दाखवावी ह्या इच्छेनें देव शपथेच्या द्वारे मध्ये पडला, ह्यासाठीं कीं, जे आपण, स्वतःपुढे ठेवण्यात आलेंली आशा हस्तगत करण्याकरता आश्रयाला धावलो, त्या आपणांला ज्याविषयी खोटे बोलणें देवाला अशक्य आहे अशा दोन अचल गोष्टींच्या द्वारे चांगलें उत्तेजन मिळावे. (इब्री 6:17-18)

आपण आपली आशा हस्तगत करून ती आम्हीं दृढ धरून राहावी असें उत्तेजन इब्रीलोकांस पत्राचा लेखक आम्हांला का देतो? जर आमच्या आशेचा अंतिम आनंद आपण येशूच्या रक्ताद्वारे प्राप्त केला आणि मिळवला, तर परमेश्वर आम्हास दृढ धरून राहण्यास का सांगतो?

उत्तर येणेंप्रमाणें आहे :

  • जेव्हा ख्रिस्त मरण पावला तेव्हा त्यानें आमच्यासाठीं जे विकत घेतलें ते म्हणजें आपण दृढ धरून राहण्यापासून मुक्त व्हावें हे नसून, दृढ धरून राहण्याचे सामर्थ्यकारी बळ आहे.
  • त्यानें जे विकत घेतलें ते आमच्या इच्छांस रद्द करणें नव्हते जणूकांहीं आम्हांला दृढ धरून राहण्याची गरज नाहीं, पण आमच्या इच्छांचे सामर्थ्य देणारे परिवर्तन होते यासाठीं कीं आम्हीं दृढ धरून राहाण्याची उत्कंठा बाळगावी.
  • त्यानें जे विकत घेतलें ते दृढ धरून राहण्याची आज्ञा रद्द करणें नव्हते, तर दृढ धरून राहण्याच्या आज्ञेची परिपूर्तता विकत घेतली.
  • त्यानें जे विकत घेतलें ते उपदेशाचे अंत नव्हते, तर उपदेशाचा विजय त्यानें विकत घेतला.

तो यासाठीं मेला कीं तुम्हीं अगदी तेच करावे जे पौल फिलिप्पै 3:12 मध्ये म्हणतो, “ज्यासाठीं ख्रिस्त येशूनें मला आपल्या कह्यात घेतलें ते मी आपल्या कह्यात घ्यावे म्हणून मी त्याच्यामागे लागतो आहे.” हा मूर्खपणा नाहीं, ही सुवार्ता आहे, पापी व्यक्तीस ते करावयास सांगणें जे करण्याचे सामर्थ्य केवळ ख्रिस्त त्याला देऊ शकतो; म्हणजें परमेश्वराठायीं आशा.

म्हणून, मी तुम्हांला संपूर्ण अंतःकरणानें असें उत्तेजन देतो : पुढे जा आणि ज्यासाठीं ख्रिस्तानें तुम्हांला आपल्या कह्यात घेतलें आहे ती गोष्ट आपल्या कह्यात घेण्यासाठीं तिच्या मागे लागा. आपल्या संपूर्ण शक्तीनें ती दृढ धरून राहा – जे त्याचे सामर्थ्य आहे, म्हणजें त्यानें आपल्या रक्तानें विकत घेतलेंलें तुमच्यां आज्ञापालनाची देणगी.

23 नवम्बर : पीड़ा का सवाल

Alethia4India
Alethia4India
23 नवम्बर : पीड़ा का सवाल
Loading
/

“भूमि तेरे कारण शापित है। तू उसकी उपज जीवन भर दुख के साथ खाया करेगा।” उत्पत्ति 3:17

कोई भी व्यक्ति पीड़ा से अछूता नहीं है। चाहे वह किसी प्रियजन की मृत्यु हो, कोई दर्दनाक निदान, कार्यस्थल पर संघर्ष, टूटा हुआ रिश्ता, या कोई अन्य कष्टदायक परिस्थिति—परीक्षाएँ केवल किसी एक व्यक्ति तक सीमित नहीं होतीं। पूरे पवित्रशास्त्र में हमें पीड़ा के अनेक उदाहरण मिलते हैं।

जैसे-जैसे हम जीवन जीते हैं और बाइबल पढ़ते हैं, यह बात निर्विवाद रूप से स्पष्ट हो जाती है कि पीड़ा मानव अस्तित्व का एक स्वाभाविक हिस्सा है।

जब हम इस सच्चाई को स्वीकार कर लेते हैं, तब एक सबसे महत्त्वपूर्ण प्रश्न हमारे मन में उठता है: “क्यों?” लोग पीड़ा क्यों सहते हैं? सभी विश्वदृष्टियाँ और धर्म इस प्रश्न का उत्तर देने का प्रयास करते हैं: “दर्द केवल एक भ्रान्ति है।” “कोई परमेश्वर नहीं है; दर्द व्यर्थ है।” “दर्द परमेश्वर के नियन्त्रण से बाहर है।” “दर्द वर्तमान या पूर्व जीवन के कर्मों का फल है।” इन सभी उत्तरों में एक बात समान है: ये कोई आशा नहीं देते। लेकिन परमेश्वर स्वयं हमें एक बेहतर उत्तर देता है।

हालाँकि परमेश्वर शैतान को धोखा देने से, या आदम और हव्वा को धोखा खाने से, या यहाँ तक कि पीड़ा को पूरी तरह रोक सकता था। फिर भी परमेश्वर ने पीड़ा का उपयोग करने का मार्ग चुना, ताकि मनुष्य प्रेमपूर्वक आज्ञाकारिता और उद्धारकर्ता की आवश्यकता का अर्थ सीख सके। यह हमारी स्वतन्त्रता ही है, जो इस पाठ को सीखने को सम्भव बनाती है। परमेश्वर ने हमें रोबोट की तरह नहीं बनाया; वह चाहता था कि हम स्वेच्छा और प्रेम से उसकी सेवा-उपासना करें, न कि मजबूरी या डर से। दुख की बात यह है कि उसी स्वतन्त्रता में मानवता ने परमेश्वर से अलग जीवन चुन लिया, जिसके भयानक परिणाम हुए। और जब भी हम पाप करते हैं, हम दिखाते हैं कि हम आदम और हव्वा से अलग नहीं हैं।

परमेश्वर जानता था कि पुरुषों और महिलाओं को इस सच्चाई का सामना करना होगा कि उसके विरुद्ध विद्रोह करना मूर्खता है। इसी कारण उसने आदम और हव्वा को जीवन के वृक्ष से दूर कर दिया (उत्पत्ति 3:22–24)। इसी कारण यह संसार और हमारे शरीर भी अब वैसे काम नहीं करते, जैसा इन्हें बनाया गया था (उत्पत्ति 3:16–19)। जैसे कोई विद्रोही बच्चा अपनी गलती समझ कर स्वेच्छा से घर लौट आता है और अपने परिवार की अधिक सराहना करता है, वैसे ही हम भी परमेश्वर के प्रेम की लालसा करते हुए उसके पास लौट सकते हैं। परमेश्वर ने पाप को उसकी समस्त भयानकता के साथ संसार में आने की अनुमति दी, ताकि हम अपने चुनावों के परिणामों को महसूस कर सकें और जब वह बुराई से भरी इस दुनिया में अपने प्रेम की सुन्दरता प्रकट करता है, तब हम उसे और भी अधिक प्रेम करना सीखें।

सी.एस. लुईस ने इस प्रकार कहा: “परमेश्वर हमारे सुख में फुसफुसाता है, हमारी अन्तरात्मा में बोलता है, परन्तु हमारे दर्द में चिल्लाता है। यह एक बहरे संसार को जगाने के लिए उसका मेगाफोन है।”[1]

परमेश्वर बुराई का रचयिता नहीं है, लेकिन वह बुराई पर सम्प्रभु हैं। इसलिए हमें यह आशा है: एक दिन वह सारी बुराई को समाप्त कर देगा। फिलहाल, वह सब कुछ वैसा ही रहने देता है, ताकि हमारी परीक्षाओं के बीच हम उस दुखी सेवक को थामे रहें जो हमारा उद्धारकर्ता है। इस पतित संसार के जीवन में आपके निराशा भरे अनुभव आपको यह सोचने पर मजबूर न करें कि परमेश्वर मौजूद नहीं हैं या उसे कोई परवाह नहीं है। बल्कि ये अनुभव बार-बार आपको आपके उद्धारकर्ता की ओर लौटाएँ—जो यह प्रतिज्ञा करता है कि वह एक दिन हर बुराई का अन्त करेगा और आपके सामने एक ऐसा अनन्त भविष्य रखेगा जिसमें सब कुछ ठीक होगा।

  लूका 15:11-32

◊ पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: 2 इतिहास 7–9; लूका 6:1-26


[1] द प्रोब्लम ऑफ पेन (हार्पर कोलिंस, 2001), पृ. 91.

23 November : जेव्हा परमेश्वर आपलीच शपथ वाहतो

Alethia4India
Alethia4India
23 November : जेव्हा परमेश्वर आपलीच शपथ वाहतो
Loading
/

त्याला शपथ वाहण्यास स्वतःपेक्षा कोणी मोठा नसल्यामुळें त्यानें ‘आपलीच शपथ वाहून’ म्हटलें कीं, “मी तुला आशीर्वाद देईनच देईन व तुला बहुगुणित करीनच करीन.” (इब्री 6:13-14)

एक आत्मा आहे ज्याचे मोल आणि आदर आणि प्रतिष्ठा आणि महानता आणि थोरवी आणि सौंदर्य आणि ख्याती ही इतर सर्व संयुक्त केलेंल्या मूल्यांपेक्षा अमूल्य असें आहे – दहा हजार पटींपेक्षा जास्त – तो म्हणजें स्वतः परमेश्वर. म्हणून, जेव्हा परमेश्वर शपथ वाहतो, तो ती स्वतःची शपथ वाहतो.

जर तो आणखी उंच जाऊ शकला असता, तर तो आणखी उंच गेला असता. का? यासाठीं कीं त्यानें तुम्हांला तुमच्यां आशेविषयी अधिक बळकटी व उत्तेजन द्यावें. स्वतःची शपथ वाहतांना परमेश्वर असें म्हणतो कीं आम्हांला आशीर्वाद देण्याचे आपलें अभिवचन मोडणें त्याच्यासाठीं तितकेच अशक्य आहे जितके कीं त्याच्यासाठीं स्वतःला तुच्छ मानणें अशक्य आहे.

या विश्वात देवाचे मोल सर्वाधिक आहे. परमेश्वरापेक्षा अधिक मौल्यवान किंवा अद्भुत असा कोणी नाहीं. म्हणून, परमेश्वर परमेश्वराचीच शपथ वाहतो. आणि असें करतांना तो म्हणतो, “तुमच्यांसाठीं माझा हेतू हा आहे कीं तुम्हीं शक्य होईल तितका माझ्याठायीं विश्वास ठेवावा.” कारण जर यापेक्षा अधिक शक्य असते, तर इब्री 6:13 म्हणते कीं त्यानें आम्हास तेहि दिलें असते. “त्याला शपथ वाहण्यास स्वतःपेक्षा कोणी मोठा नसल्यामुळें त्यानें ‘आपलीच शपथ वाहून’ म्हटलें.”

लक्षांत घ्या, हा आमचा परमेश्वर आहे, असा परमेश्वर जो तुम्हांला त्याच्याठायीं अढळ आशा ठेवण्यास प्रेरणा देण्यासाठीं जितके उंच जाता येईल तितके उंच जातो. म्हणून, आश्रयाला परमेश्वराकडे धाव घ्या. जगाच्या सर्व बाह्य आणि स्वतःहून अपयशी ठरणाऱ्या आशांपासून दूर व्हा, आणि परमेश्वरावर आपला भाव ठेवा. आश्रय आणि आशेचा खडक म्हणून परमेश्वरासारखा कोणी नाहीं आणि कांहींही नाहीं.

22 नवम्बर : स्वर्ग का चित्र

“मैंने दृष्‍टि की, और देखो, हर एक जाति और कुल और लोग और भाषा में से एक ऐसी बड़ी भीड़, जिसे कोई गिन नहीं सकता था, श्वेत वस्त्र पहने और अपने हाथों में खजूर की डालियाँ लिए हुए सिंहासन के सामने और मेमने के सामने खड़ी है, और बड़े शब्द से पुकारकर कहती है, ‘उद्धार के लिए हमारे परमेश्‍वर का, जो सिंहासन पर बैठा है, और मेमने का जय–जय कार हो!’” प्रकाशितवाक्य 7:9-10

स्वर्ग के बारे में हमारे कई विचार और गीत वास्तव में बाइबल कम आधारित हैं और विक्टोरियन युग के ईसाई धर्म तथा यूनानी दार्शनिक प्लेटो की शिक्षा पर आधारित ब्रह्मांड-दृष्टिकोण पर अधिक आधारित हैं। कुछ कलाकारों ने जैसा दिखाया है कि हम बादलों पर बैठकर वीणा बजाते रहेंगे—ऐसा स्वर्ग में नहीं होगा। हम इससे कहीं अधिक बेहतर काम करेंगे। पवित्रशास्त्र हमें दिखाता है कि हम परमेश्वर की स्तुति और मेमने की आराधना करेंगे।

प्रकाशितवाक्य की पुस्तक हमें मेमने के चारों ओर के प्रशंसा के सतत बढ़ते हुए घेरे को देखने के लिए आमन्त्रित करती है। पहले घेरे में हम चार जीवित प्राणी और चौबीस प्राचीनों को देखते हैं, जो धूप चढ़ाते हैं और स्तुति का नया गीत गाते हैं (प्रकाशितवाक्य 5:8-9)। दूसरे घेरे में, पद 11-13 में, हजारों-हजार स्वर्गदूत उसे आदर देते हैं, और फिर समस्त सृष्टि के सारे प्राणी इस गीत में सम्मिलित हो जाते हैं।

इसके बाद, प्रकाशितवाक्य की पुस्तक उन लोगों को उजागर करती है, जो मेमने के लहू से छुड़ाए गए हैं (7:4, 9)। उन्हें 1,44,000 की निश्चित संख्या में और एक ऐसी भीड़ के रूप में दर्शाया गया है, जिसे कोई गिन नहीं सकता। वे एक ओर इस्राएल की बारह जातियों से हैं, और दूसरी ओर हर जाति और भाषा के लोगों का समूह हैं। ये विवरण एक-दूसरे के विरोधी लग सकते हैं, लेकिन परमेश्वर के दृष्टिकोण से यह बिल्कुल संगत है। निश्चित संख्या पूर्णता और समाप्ति को दर्शाती है; परन्तु मनुष्य की दृष्टि से वह भीड़ इतनी विशाल है कि उसे गिना नहीं जा सकता।

परमेश्वर की दृष्टि में, जो लोग छुड़ाए गए हैं, वे उसके चुने हुए बेटे और बेटियाँ हैं, और हर जाति का प्रतिनिधित्व करते हुए। वह हर एक को व्यक्तिगत रूप से जानता है। फिर भी, उसकी प्रजा सभी लोगों में से बुलाई गई है। यह परमेश्वर की पूर्ण और सम्पूर्ण विजय का दृश्य है—और उसकी प्रजा उसकी जयजयकार करते हुए उसकी विजय में आनन्दित होती है।

इसलिए, हालाँकि इस दृश्य का आरम्भ चार जीवों और चौबीस प्राचीनों से होता है, लेकिन यह हजारों-हजारों की भीड़ तक पहुँचता है, जैसा कि पौलुस कहता है: “जो स्वर्ग में और पृथ्वी पर और पृथ्वी के नीचे हैं, वे सब यीशु के नाम पर घुटना टेकें” (फिलिप्पियों 2:10, विशेष बल दिया गया है)। हमारी स्तुति उस अनगिनत भीड़ की स्तुति से जुड़ जाएगी, और हम सभी यह घोषणा करेंगे कि मसीह वह मेमना है जो बलिदान हुआ, कि उसके लहू से हमारे पाप धो दिए गए हैं, कि हम धार्मिकता को धारण किए हुए हैं, और कि उसकी संगति में हम अनन्तकाल तक जीवित रहेंगे।

एक दिन हम मसीह के चारों ओर इस स्तुति के घेरे में शामिल होंगे, और हमारा प्रिय दूल्हा विजयी सिंह और दीन मेमने के रूप में आगे बढ़ेगा। लेकिन हमें तब तक प्रतीक्षा करने की आवश्यकता नहीं है, क्योंकि हम अभी भी उसकी ओर अपनी दृष्टि लगाए हुए आराधना का गीत गा सकते हैं। एक दिन आप उसके सामने खड़े होंगे और उसे देखेंगे! और तब तक, आप प्रतिदिन उस दिन की ओर बढ़ते जा रहे हैं।

प्रकाशितवाक्य  7:1-17

पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: 2 इतिहास 4– 6; लूका 5:17-39 ◊