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25 अक्तूबर : शरीर में काँटा

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25 अक्तूबर : शरीर में काँटा
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“इसलिए कि मैं प्रकाशनों की बहुतायत से फूल न जाऊँ, मेरे शरीर में एक काँटा चुभाया गया, अर्थात् शैतान का एक दूत कि मुझे घूँसे मारे ताकि मैं फूल न जाऊँ।” 2 कुरिन्थियों 12:7

यदि आप विभिन्न प्रतिभाशाली संगीतकारों को इकट्ठा करें, जो केवल अपने व्यक्तिगत भागों में ही रुचि रखते हैं, तो वे एक ऑर्केस्ट्रा नहीं बना सकते। वे केवल असंगत शोर उत्पन्न करेंगे, जो श्रोताओं के कानों के लिए अपमानजनक होगा। परन्तु जब वही प्रतिभा निस्वार्थ भाव और दीनता में एक संचालक के अधीन और एक स्वरूप के नियम के अनुसार उपयोग की जाती है, तो वह सुन्दर और सामंजस्यपूर्ण संगीत उत्पन्न करती है।

जिस प्रकार किसी संगीतकार की व्यक्तिगत महानता की इच्छा ऑर्केस्ट्रा की उपयोगिता के लिए विनाशकारी होती है, वैसे ही हमारे मसीही विश्वास के साथ भी है। आत्मिक वरदान कभी भी घमण्ड का स्रोत नहीं होना चाहिए—क्योंकि, आखिरकार, यह एक वरदान है! फिर भी, हमें अक्सर यह प्रलोभन होता है कि हम परमेश्वर द्वारा दिए गए वरदानों को अपनी उपलब्धि समझें, मानो हमने उन्हें स्वयं विकसित किया हो या हम उनके योग्य हों, या फिर हम उनका उपयोग केवल अपने लिए करें, मानो वे हमारे अपने हों। यह हमें अपने महत्त्व के बारे में बढ़ा-चढ़ाकर सोचने के गम्भीर खतरे में डाल देता है—और जिनके पास सबसे महत्त्वपूर्ण वरदान होते हैं, वे सामान्यतः इस खतरे में सबसे अधिक होते हैं।

पौलुस को स्वयं इस प्रलोभन का सामना करना पड़ा। वह अत्यन्त बुद्धिमान था, उसने उत्तम शिक्षा प्राप्त की थी, वह एक प्रतिष्ठित पृष्ठभूमि से था, और वह बहुतों के जीवन में प्रभावशाली रहा था (फिलिप्पियों 3:4-6 देखें)। जब वह अपने समय के झूठे प्रेरितों का सामना कर रहा था, जो परमेश्वर के विषय में अपने ज्ञान के बारे में बढ़ा-चढ़ाकर दावे कर रहे थे, तो पौलुस ने ईमानदारी से वर्णन किया कि उसने असाधारण दर्शन देखे थे (2 कुरिन्थियों 12:2-4)। वह अहंकार से भर जाने के लिए एक आसान लक्ष्य था।

उसे इससे किसने बचाया? उसके शरीर में एक काँटे ने। पौलुस यह स्पष्ट रूप से नहीं बताता कि यह क्या था, और इसलिए हमें भी अनुमान लगाने से बचना चाहिए। महत्त्वपूर्ण यह नहीं है कि वह काँटा क्या था, बल्कि यह कि उसने क्या उद्देश्य पूरा किया; क्योंकि पौलुस ने स्वीकार किया कि यह काँटा परमेश्वर की ओर से उसे उसकी दुर्बलता की याद दिलाने के लिए दिया गया था, ताकि वह अपने महत्त्व पर घमण्ड न करे और निरन्तर परमेश्वर पर निर्भर रहे।

उन झूठे शिक्षकों की तरह, जिनसे पौलुस ने मसीही समुदाय की रक्षा की, हमारे सामने भी यह प्रलोभन आते हैं कि अपने प्रभाव और बाहरी सफलता के आधार पर हम अपने मूल्य को आँकें। परन्तु अन्ततः ये सब अस्थाई चीजें अस्थाई ही सिद्ध होंगी और समाप्त हो जाएँगी। परमेश्वर की बुद्धिमानी और भलाई में, पौलुस का “काँटा” हमें हमारी कठिनाइयों को समझने में सहायता करता है—चाहे वह बीमारी हो, आर्थिक संघर्ष हो, सम्बन्धों की समस्याएँ हों, बच्चों का पालन-पोषण हो, या पाप से निरन्तर संघर्ष हो। परमेश्वर जानता है कि वह हमारे जीवन में इन आवश्यक, असुविधाजनक, और निरन्तर चुनौतीपूर्ण परिस्थितियों को क्यों अनुमति देता है।

बेहतर है कि हम दीन और संघर्षरत विश्वासी बने रहें, जिनके जीवन में काँटे हों, बजाय इसके कि हम अहंकारी और आत्मनिर्भर होकर विश्वास से दूर हो जाएँ और किसी भी संघर्ष से मुक्त हो जाएँ। हमें अपनी दुर्बलता को पहचानने की आवश्यकता है, ताकि हम अपने अनन्त उद्धार के लिए परमेश्वर के अनुग्रह और अपने दैनिक जीवन के लिए उसके सामर्थ्य पर पूरी तरह निर्भर रहें।

प्रश्न यह नहीं है कि काँटे आपके जीवन में आएँगे या नहीं, बल्कि यह है कि क्या आप परमेश्वर को अपने “काँटों” का उपयोग करने देंगे, ताकि वह आपको यह स्मरण कराए कि आपके वरदानों का एकमात्र स्रोत वही है और वही आपको आत्मिक रूप से उपयोगी बनाता है।

2 कुरिन्थियों 11:30 – 12:10

पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: 2 शमूएल 1–2; 1 तीमुथियुस 5 ◊

25 October : महान प्रेषितीय (मिशनरी) आशा

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25 October : महान प्रेषितीय (मिशनरी) आशा
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पण आपल्यां अपराधांमध्यें मृत झालों असतांहि (देवानें) ख्रिस्तामध्यें आपणांस जीवंत केलें व कृपेनेच तुमचें तारण झालें आहे. (इफिस 2:5)

महान प्रेषितीय किंवा मिशनरी आशा ही आहे कीं जेव्हां पवित्र आत्म्याच्या सामर्थ्यानें सुवार्ता सांगितली जाते, तेव्हां जे मनुष्याला करणें अशक्य आहे ते देव स्वत: करतो : तो आम्हांमध्यें तारणदायी विश्वास निर्माण करतो. मनुष्याचे पाचारण जे करू शकत नाहीं ते देवाचे पाचारण करते. त्याची पाचारण मृतांना जिवंत करते. ती आध्यात्मिक जीवन उत्पन्न करते. येशूनें कबरेंत मृत पडलेल्या लाजराला “बाहेर ये” अशी जी हाक मारली त्याच हाकेसारखी ही हाक आहे. आणि मृत पडलेल्या माणसाने त्याची आज्ञा पाळली आणि बाहेर आला. ह्या हाकेने जीवन उत्पन्न करून आज्ञाधारकपणा उत्पन्न केला (योहान 11:43). प्रत्येक मनुष्य असाच तारला जातो.

आपण हाक मारून एखाद्याला झोपेतून उठवू शकतो, परंतु देवाचे पाचारण (हाक) ज्यां गोष्टीं नाहीं त्यां गोष्टीं अस्तित्वात आणावयांस समर्थ आहे (रोमकरांस 4:17). देवाचे पाचारण या अर्थाने अप्रतीरोध्य आहे कीं ते सर्व प्रतिकारांवर मात करण्यांस समर्थ आहे. देवाच्या सत्संकल्पानुसार हे पाचारण चमत्कारीकरित्या प्रभावी आहे – इतके कीं पौलानें म्हटलें, “आणि [देवानें]  ज्यांना पाचारण केलें त्यांना त्यानें नीतिमानहि ठरवलें” (रोमकरांस 8:30), तथापि आपण केवळ विश्वासाने नीतिमान ठरविलें जातो.

दुसऱ्या शब्दांत सांगायचे झाल्यांस, देवाचे पाचारण इतके प्रभावी असते कीं ते न चुकता आम्हांमध्यें तो विश्वास निर्माण करते ज्याद्वारे आपण नीतिमान ठरविले जातो. रोमकरांस 8:30 च्या प्रमाणें पाचारण करण्यांत आलेल्यां सर्वांना नीतिमान ठरविले जाते. परंतु विश्वासावांचून कोणीही नीतिमान ठरविला जात नाहीं (रोमकरांस 5:1). म्हणून देव ज्यां हेतूनें पाचारण करतो त्याचा तो हेतू पूर्ण झाल्यावांचून राहत नाहीं. तो अप्रतीरोध्यपणें असा विश्वास अस्तित्वात आणतो ज्या द्वारे तो आम्हांला नीतिमान ठरवतो.

मनुष्य हे करू शकत नाहीं. हे त्याच्यासाठीं अशक्य आहे. पाषाणरुपी-हृदय फक्त देवच काढू शकतो (यहेज्केल 36:26). केवळ देवच लोकांना पुत्राकडे आकर्षित करू शकतो (योहान 6:44, 65). केवळ देवच आध्यात्मिकरित्या मृतावस्थेंत असलेलें अंत: करण उघडू शकतो जेणेंकरून ते सुवार्तेच्या सांगण्याकडे लक्ष देईल (प्रेषितांची कृत्ये 16:14). केवळ उत्तम मेंढपाळ, जो ख्रिस्त, आपल्या मेंढरांना ओळखतो, आणि त्यांना नावाने एका अशा आकर्षक शक्तीने हाक मारतो कीं ते सर्व त्याच्या मागे येतांत – आणि त्यांचा कधीही नाश होत नाहीं (योहान 10:3-4, 14).

देवाची सर्वोच्च सार्वभौम कृपा, जी गोष्ट येशू ख्रिस्ताच्या सुवार्तेद्वारे मनुष्याला अशक्य असलेली गोष्ट अस्तित्वात आणते, ही महान प्रेषितीय किंवा मिशनरी आशा आहे.

24 अक्तूबर : उद्धार के गीत

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24 अक्तूबर : उद्धार के गीत
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“तू मेरे छिपने का स्थान है; तू संकट से मेरी रक्षा करेगा; तू मुझे चारों ओर से छुटकारे के गीतों से घेर लेगा।” भजन 32:7

यदि आप रॉबिन हुड या राजा आर्थर की पुरानी ब्लैक एण्ड व्हाईट फ़िल्में देखें, तो आपको रानियाँ युद्ध के मैदानों में घोड़ों पर सवार दिखाई देंगी। वे अकेली यात्रा नहीं करतीं, बल्कि उनके चारों ओर घुड़सवार सैनिक होते हैं जो उनकी सुरक्षा करते हैं।

कठिन दिनों में, हम अपने आप को यह स्मरण दिला सकते हैं कि परमेश्वर “अपने दूतों को तेरे [हमारे] निमित्त आज्ञा देगा, कि जहाँ कहीं तू जाए [हम जाएँ], वे तेरी [हमारी] रक्षा करें” (भजन 91:11)। इसके अतिरिक्त, उसने हमें उन विश्वासियों की संगति में रखा है जो मसीह के ध्वज का अनुसरण कर रहे हैं—अर्थात हमारी कलीसिया। मसीही जीवन एक व्यक्तिगत यात्रा नहीं, बल्कि एक सामूहिक यात्रा है। हमें इस अद्‌भुत अवसर का लाभ उठाना चाहिए कि हम मसीह के उद्देश्य के लिए एक साथ खड़े हो सकते हैं। हमें उन लोगों से घिरा रहना चाहिए जो “छुटकारे के गीतों” को गाते हैं। जब हम सामूहिक रूप से आराधना करते हैं, तो हम उस उद्धार के आशीर्वादों का अनुभव करते हैं जो परमेश्वर हमें प्रदान करता है।

जब हम जीवन की परेशानियों से घिरे होते हैं या अपनी कमजोरियों, असफलताओं, निराशाओं और सन्देहों से अवगत होते हैं, तो समाधान यह नहीं है कि हम अपने ही बल पर खड़े होने की कोशिश करें। बल्कि हमें यह देखना चाहिए कि यीशु ने हमारे लिए क्या किया है और यह सुनिश्चित करना चाहिए कि हमारे भाई-बहन हमें यह याद दिला रहे हैं कि मसीह ने हमारे लिए क्या किया है। परमेश्वर के वचन के साथ एक साधारण भजन-संग्रह की सहायता से हम एक-दूसरे को अंधकारमय दिनों में प्रोत्साहित कर सकते हैं और अपने मनों को पवित्रशास्त्र और गीतों के माध्यम से सत्यों से भर सकते हैं।

एलेक मोट्यर ने एक बार लिखा, “जब कोई सत्य किसी विश्वास-संहिता या भजन-संग्रह में समाहित हो जाता है, तो वह पूरी कलीसिया की आत्म-विश्वासपूर्ण सम्पत्ति बन जाता है।”[1] जब हम उन गीतों को गाते हैं जो गहरी आत्मिक सच्चाइयों से भरे होते हैं, तो हम प्रतिदिन अपने आप से कह सकते हैं, “मसीह ही मेरे लिए पर्याप्त है।” फिर परमेश्वर के लोगों के साथ मिलकर हम सामूहिक आराधना कर सकते हैं और अपने प्रभु से अनुग्रह और शान्ति माँग सकते हैं। एक जीवित कलीसिया हमेशा गाने वाली कलीसिया होगी।

आपको केवल एकान्त में आराधना करने के लिए नहीं बुलाया गया है। सामूहिक आराधना का एक उद्देश्य यही है: उद्धार के गीतों से घिरे रहना। आपके सृजनहार ने आपको इस रीति से बनाया है कि आप उन लोगों के साथ खड़े हों जो इन स्मरणीय शब्दों के द्वारा इस सच्चाई की आपके लिए पुष्टि करें और आप उनके लिए इसकी पुष्टि करें:

गाओ, मेरे उद्धारकर्ता के विषय में गाओ!

उसने अपने लहू से मुझे मोल लिया;

क्रूस पर उसने मेरी क्षमा को सुनिश्चित किया,

ऋण चुका दिया और मुझे स्वतन्त्र कर दिया।[2]

भजन 147

◊ पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: 1 शमूएल 30–31; 1 तीमुथियुस 4


[1] लुक टू द रॉक: ऐन ओल्ड टेस्टामेण्ट बैकग्राऊण्ड टू आवर अण्डरस्टैण्डिग ऑफ क्राईस्ट (क्रेगेल, 2004), पृ. 222 टिप्पणी 48.

[2] पि. पि. ब्लिस, “आई विल सिंग ऑफ माई रिडीमर” (1876).

23 अक्तूबर : नया और उत्तम आदम

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23 अक्तूबर : नया और उत्तम आदम
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“क्योंकि जैसा एक मनुष्य के आज्ञा न मानने से बहुत लोग पापी ठहरे, वैसे ही एक मनुष्य के आज्ञा मानने से बहुत लोग धर्मी ठहरेंगे।” रोमियों 5:19

आदम, जो पहला मनुष्य था, परमेश्वर के स्वरूप में बनाया गया था। प्रभु ने आदम को सारी सृष्टि में एक अनूठी भूमिका दी थी, लेकिन वह अपनी जिम्मेदारी को पूरा करने में असफल रहा और उसे अदन से निकाल दिया गया। फिर परमेश्वर ने इस्राएलियों के साथ एक नया आरम्भ किया; उन्हें उसकी प्रजा के रूप में बुलाया गया ताकि वे उसके व्यवस्था-विधान का पालन करके उसके चरित्र को प्रकट करें। लेकिन आदम की तरह इस्राएल भी अपने बुलावे में असफल रहा और उन्हें निर्वासन में भेज दिया गया।

लेकिन जब हम नए नियम में आते हैं, तो हम देखते हैं कि जहाँ आदम और इस्राएल असफल हुए, वहाँ यीशु ने पूर्ण सफलता पाई। यीशु वही है जो परमेश्वर की प्रजा को होना चाहिए था—अर्थात नया और उत्तम आदम, सच्चा इस्राएल। वह आदम का वंशज है और आदम की सन्तान के साथ पूरी तरह से एक है। यीशु हमारे साथ पूरी तरह से एक हो गया, फिर भी आदम पाप कर बैठा था, लेकिन जब यीशु की परीक्षा ली गई, तो उसने कभी पाप नहीं किया (इब्रानियों 4:15)।

प्रभु यीशु वह एकमात्र व्यक्ति है जिसने सिद्ध रूप में परमेश्वर की पूरी आज्ञाकारिता की, और जिससे परमेश्वर सदा प्रसन्न है। उसने व्यवस्था के प्रत्येक शब्द का पालन किया। इसलिए यीशु एकमात्र मनुष्य है जो परमेश्वर की उपस्थिति से निकाले जाने के योग्य नहीं था। लेकिन फिर भी, उसे निकाला गया। क्रूस पर उसने स्वेच्छा से वह दण्ड झेला जिसे आदम की सन्तानों को भुगतना चाहिए था, जो आदम के पाप में बंधे हुए पापी हैं।

सम्पूर्ण मनुष्यजाति अपनी प्रकृति और वंश के द्वारा आदम से जुड़ी हुई है। हम पाप में जन्मे हैं और परमेश्वर के विरुद्ध आदम के विद्रोह में भागीदार हैं। इसमें कोई अपवाद नहीं है। इस स्थिति का एकमात्र उत्तर यही है कि मनुष्य उस एकमात्र व्यक्ति को जानें जिसने पूरी व्यवस्था को सिद्ध रूप से पूरा किया और जो परमेश्वर की उपस्थिति से निकाले जाने के योग्य नहीं था, लेकिन जिसने हमारे लिए क्रूस पर मृत्यु तक आज्ञाकारिता दिखाई ताकि हम अनुग्रह द्वारा विश्वास से वह सब पा सकें जो वह पाने के योग्य था, बजाय इसके कि हम वह सब भुगतें जिसे आदम ने भुगतना था।

यह सत्य हर बात का केन्द्र बिन्दु है। विश्वासियों के बारे में जो कुछ पहले सत्य था, उसकी जड़ आदम के एक ही कार्य में थी, लेकिन अब विश्वासियों के बारे में जो कुछ सत्य है, वह मसीह की आज्ञाकारिता का परिणाम है।

यदि आप आश्वासन में कमी महसूस कर रहे हैं, तो शायद आप अपने आत्मिक जीवन की जाँच इस दृष्टि से कर रहे हैं कि क्या आप पर्याप्त रूप से कार्य कर रहे हैं। लेकिन याद रखें कि आपका उद्धार आपके द्वारा किए गए किसी भी कार्य के कारण नहीं हुआ है। जैसे कि एक भजनकार हमें स्मरण कराता है, हमें उस कार्य के द्वारा बचाया गया है जो हमारे लिए किया गया है:

क्योंकि निर्दोष उद्धारकर्ता मरा,

मेरा पापी प्राण स्वतन्त्र ठहरा,

धर्मी परमेश्वर सन्तुष्ट हुआ,

उसे देखकर मुझे क्षमा किया।[1]

रोमियों 5:6-21

पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: 1 शमूएल 27–29; 1 तीमुथियुस 3 ◊


[1] चारिटी लीस बानक्रोफ्ट, “बिफोर द थ्रोन ऑफ गॉड अबव” (1863).

22 अक्तूबर : प्रत्येक उत्तर जो हमें चाहिए

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22 अक्तूबर : प्रत्येक उत्तर जो हमें चाहिए
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“जब पौलुस एथेंस में उनकी बाट जोह रहा था, तो नगर को मूरतों से भरा हुआ देखकर उसका जी जल गया। अतः वह आराधनालय में यहूदियों और भक्तों से, और चौक में जो लोग उससे मिलते थे उनसे हर दिन वाद–विवाद किया करता था। तब इपिकूरी और स्तोईकी दार्शनिकों में से कुछ उससे तर्क करने लगे।” प्रेरितों 17:16-18

जब पौलुस एथेंस नगर में अपने समय के बुद्धिजीवियों को सम्बोधित कर रहा था, तब उसने पाया कि उसके श्रोता दो मूलभूत विचारधाराओं से प्रभावित थे: स्टॉइकवाद और एपिक्यूरियनवाद। स्टॉइकवाद यह मानता है कि संसार की घटनाएँ एक कठोर, भावशून्य और व्यक्तिगत रूप से असम्बद्ध नियति द्वारा नियन्त्रित होती हैं, जबकि एपिक्यूरियनवाद यह सिखाता है कि “अच्छाई” वही है जिससे सबसे अधिक सुख मिलता है। लेकिन ये दोनों ही विचारधाराएँ सर्वशक्तिमान परमेश्वर की सन्तान के लिए उपयुक्त नहीं हैं।

मसीही विश्वास की एक विशिष्ट विशेषता यह है कि हम संसार को देखने और समझाने के अपने दृष्टिकोण को स्पष्ट रूप से प्रस्तुत कर सकते हैं। अपने चारों ओर की संस्कृति के विपरीत, हम जानते हैं कि हमारा समय परमेश्वर के हाथ में है (भजन 31:15)—कि हम किसी अंधी ताकत के शिकंजे में फँसे हुए नहीं हैं और न ही हम किस्मत की लहरों पर उछाले जा रहे हैं। चाहे कोई व्यक्ति मार्क्सवाद, हिन्दू धर्म, नास्तिकता या किसी अन्य दर्शन या धर्म से प्रभावित हो—हर कोई अन्ततः उन प्रश्नों और असुरक्षाओं का सामना करता है जो उनकी आस्था के भीतर छिपे होते हैं। क्या वे एक वर्गहीन समाज के संघर्ष में उलझे हुए हैं या जन्म और पुनर्जन्म के अन्तहीन चक्र में? शायद वे मानते हैं कि जीवन का कोई अर्थ ही नहीं है। लेकिन किसी के प्रश्न या मान्यताएँ चाहे जो भी हों, परमेश्वर उनके हर प्रश्न का उत्तर देता है।

एक मूर्खतापूर्ण और असंवेदनशील नियति के बन्धन में जीने, या अनिश्चितता की गिरफ्त में रहने के बजाय, विश्वासी लोग अब अटल आशा के साथ जीवन जीते हैं। पौलुस की तरह ही अब हमें भी वे उत्तर सौंपे गए हैं जो परमेश्वर ने अपने वचन के द्वारा हमें दिए हैं—वे उत्तर जिन्हें हमें इस संसार से साझा करना है। परमेश्वर ने हमें एक महान भरोसा दिया है और उसका नाम है यीशु।

इसलिए प्रश्न यह नहीं है कि क्या हमारे पास ऐसा सन्देश है जो प्रत्येक मनुष्य की गहरी तड़प और हर दर्शन या धर्म की आपत्तियों का उत्तर दे सकता है—क्योंकि हमें ऐसा ही सन्देश दिया गया है। असली प्रश्न तो यह है कि क्या हम उस सन्देश को साझा करेंगे? जब पौलुस एथेंस में था, तो उसने वह देखा जो दूसरों ने नहीं देखा था। उसने उन प्रभावशाली स्थलों का आनन्द नहीं लिया, न ही वह नगर की बौद्धिक प्रतिष्ठा से अभिभूत हुआ। उसने देखा कि यह नगर मूर्तिपूजा में डूबा हुआ है—और “उसका जी जल गया,” क्योंकि हर बार जब किसी मूर्ति की पूजा की जाती है, तो प्रभु यीशु की उस महिमा को छीना जाता है, जो केवल उसी को मिलनी चाहिए। और इसलिए अपनी प्रतिष्ठा की परवाह किए बिना, पौलुस ने उस नगर के नागरिकों के साथ तर्क किया और उन्हें पुनरुत्थान की आशा का सुसमाचार सुनाया (प्रेरितों 17:18)।

आज जहाँ भी आप रहते हैं, किसी न किसी रूप में आप अपने आप को एक आधुनिक एथेंस में पाते हैं। आपके आस-पास के लोग किन मूर्तियों की पूजा कर रहे हैं? क्या उन्हें देखने से आपका जी भी जल उठता है? आपके पास वह उत्तर है जो किसी भी मूर्ति की तुलना में अधिक सन्तोष दे सकता है। आपके पास परमेश्वर को महिमा देने का अवसर है। आज आप किससे बात कर सकते हैं और कह सकते हैं: “क्या आप देख सकते हैं कि जिसे आप पूज रहे हैं, वह आपको सन्तुष्ट नहीं कर सकता? क्या मैं आपको सावधान कर सकता हूँ कि आप उस परमेश्वर की उपेक्षा कर रहे हैं जो अर्थ और आशा देता है—परन्तु जिसका उपहास नहीं किया जा सकता? क्या मैं आपको यीशु मसीह को जानने में मिले उत्तरों के बारे में बता सकता हूँ?”

1 थिस्सलुनीकियों 1:1-10

◊ पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: 1 शमूएल 25–26; 1 तीमुथियुस 2

22 October : पती-पत्नींसाठीं पूर्णानंद

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22 October : पती-पत्नींसाठीं पूर्णानंद
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री मंडळी जशी ख्रिस्ताच्या अधीन असते, तसे स्त्रियांनीही सर्व गोष्टींत आपापल्या पतीच्या अधीन असावे.पतींनो, जशी ख्रिस्ताने मंडळीवर प्रीति केलीं तशी तुम्हींही आपापल्या पत्नीवर प्रीति करा; ख्रिस्ताने मंडळीवर प्रीति केलीं आणि स्वतःस तिच्यासाठीं समर्पण केलें. (इफिस 5:24-25)

देवानें वैवाहिक जीवनासाठीं प्रीतिचा एक अनुकरणीय आदर्श नेमून दिलेला आहे.

पती-पत्नीच्या भूमिका सारख्या नसतांत. पतीने मंडळीचा मस्तक असलेल्या ख्रिस्ताकडून त्याच्यासाठीं ठरविलेलें सुत्रे घायची आहें. तर पत्नीने ख्रिस्ताच्या अधीन असलेल्या मंडळीसाठीं देवानें जो नमुना दिला आहे त्यापासून तिनें तिचे सुत्रे घायची आहें.

असे केल्यानें, पापांत झालेंल्या पतनाची दुष्टायी आणि त्याचे विनाशकारी परिणाम पालटू लागतांत. पापांत झालेंल्यां पतनामुळें स्त्रीचे मस्तक म्हणून पुरुषाची वात्सल्यमय भूमिका पालटून काही पुरुषांमध्यें तिने जुलूमशाही वर्चस्वाचे विकृत रूप घेतलें आहे, तर इतर पुष्कळ पुरुषांमध्यें तिचे रुपांतर आपल्या कर्तव्याशी हलगर्जीपणा बाळगण्यांत झाला. या पतनामुळें स्त्रीचे शहाणपण आणि ऐच्छिक अधीनता विकृत होऊन तिचे रुपांतर काहीं स्त्रियांमध्यें कावेबाज व कारस्थानी वृत्तीत झालें आहे तर इतर काहीं स्त्रियांमध्यें निर्लज्ज मुजोरी आणि दबंगपणाची वृत्ती निर्माण झालीं आहें.

पापाच्या या बंधनापासून सोडविणारा मशीहा काळाची पूर्णता झाल्यावर जेव्हां येशू ख्रिस्तामध्यें प्रकट होणार होता तेव्हा आम्हीं ज्या मुक्तीची प्रतीक्षा करित होतो ती मुक्ती म्हणजें स्त्रीचे मस्तक म्हणून पुरुषाची वात्सल्यमय भूमिका आणि स्त्रीची ऐच्छिक अधीनता ह्या व्यवस्थेचा विध्वंस करण्यासाठीं नव्हती तर ती पुन्हा स्थापित व्हावी म्हणून होती. पत्नींनो, आनंदी मंडळीसाठीं देवानें जो कित्ता घालून दिला आहे त्याचे अनुकरण करून तुम्हीं तुमच्या पतन पावलेल्या अधिनस्थ भूमिकेची पुनर्स्थापना करा! पतींनो, प्रीतिनें भरलेला ख्रिस्त असा जो मंडळीचा प्रेमळ मस्तक म्हणून देवानें जो आदर्श तुमच्यापुढे मांडीला त्याचे अनुकरण करून तुम्हीं तुमच्या पतन पावलेल्या मस्तकपणाच्या भूमिकेची पुनर्स्थापना करा!

मी इफिस 5:21-33 मध्यें या दोन गोष्टी पाहतो: (1) वैवाहिक जीवनांत ख्रिस्ती पूर्णानंद काय आहे याचे दर्शन आणि (2) आणि त्याच्या प्रेरक-शक्तीचा उद्गम.

पत्नींनो, तुमच्या वैवाहिक नात्यातील “मस्तक” किंवा पुढारी म्हणून देवानें तुमच्या पतींना जी भूमिका नेमून दिलीं आहे ती मान्य करून आणि त्याला पूर्ण सन्मान देऊन तुमच्या पतीच्या आनंदात तुमचा आनंद शोधा. पतींनो, जसे ख्रिस्तानें मंडळीचे पुढारपण केलें आणि स्वतःस तिच्यासाठीं समर्पण केलें अगदी तसेच पुढारपण करण्याची आपली जबाबदारी स्वीकारून तुमच्या पत्नीच्या आनंदात तुमचा आनंद शोधा.

मी आनंदाने माझ्या आयुष्यात देवाच्या चांगुलपणाची साक्ष देऊं इच्छितो. 1968 मध्यें माझे लग्न झालें त्याच वर्षी मला ख्रिस्ती पूर्णानंदाचा शोध लागला. तेव्हापासून, नोएल आणि मी, येशू ख्रिस्ताच्या आज्ञेत राहून, आम्हीं शक्य तितक्या आवेशाने, पूर्णपणें चिरस्थायी असलेल्या आनंदाचा एकमेकांमध्यें शोध करित आलेले आहों. जरी अपूर्णपणें, तर पुष्कळ प्रसंगी अर्ध्या मनाने का होईना, आम्हीं एकमेकांच्या आनंदातच स्वतःचा आनंद लुटला आहे.

आणि आम्हीं लग्नाच्या जवळजवळ 50 वर्षांनंतर एक मनानें अशी साक्ष देऊ शकतो : जे लग्न करण्याचा विचार करित आहेत त्यांना आमचा संदेश हा कीं तुमचा मनोरथ साध्य करण्याचा हाच मार्ग आहे. माझ्या आणि नोएलच्या बाबतींत, विवाह म्हणजें ख्रिस्ती पूर्णानंदाचा आवश्यक घटक आहे. जेव्हां एक जोडीदार आपल्या दुसऱ्या जोडीदाराच्या आनंदात आपल्या आनंदाचा शोध घेतो आणि देवानें नेमून दिलेली आपली भूमिका पार पाडतो, तेव्हा ख्रिस्त आणि मंडळी यांच्यातील नात्याचा दृष्टांत म्हणून विवाहाचे रहस्य त्याच्या महान गौरवासाठीं आणि आपल्या महान आनंदासाठीं प्रकट होते.

21 अक्तूबर : परमेश्वर की स्वीकृति

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21 अक्तूबर : परमेश्वर की स्वीकृति
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“अपने आप को परमेश्‍वर का ग्रहणयोग्य और ऐसा काम करने वाला ठहराने का प्रयत्न कर, जो लज्जित होने न पाए।” 2 तीमुथियुस 2:15

आप किसकी सराहना के लिए जी रहे हैं?

स्वभाव से ही हम दूसरों से स्वीकृति पाने की इच्छा करते हैं। लेकिन विश्वासियों के रूप में जिस स्वीकृति की हमें सबसे अधिक चाहत रखनी है, वह है परमेश्वर की स्वीकृति। इस अद्‌भुत सत्य पर विचार करने के लिए समय निकालना आवश्यक है कि आज हम जो कुछ भी करते हैं, वह उस परमेश्वर को प्रसन्न कर सकता है, जो सारी सृष्टि का पालक है (1 थिस्सलुनीकियों 4:1), और एक दिन, वह उन लोगों का स्वागत करेंगे जिन्होंने उसके लिए पूरी तरह से जीवन व्यतीत किया, और स्वागत के समय ये शब्द बोलेगा, “धन्य, हे अच्छे और विश्वासयोग्य दास” (मत्ती 25:21, 23)। कल्पना कीजिए कि दिव्य होंठों से आपको ये शब्द सुनने को मिलेंगे!

तो फिर, कैसे हम “अपने आप को परमेश्‍वर का ग्रहणयोग्य और ऐसा काम करने वाला ठहराने का प्रयत्न करें, जो लज्जित होने न पाए”?

सर्वप्रथम, हमें अन्त तक विश्वास बनाए रखने का संकल्प लेना होगा। पौलुस ने अपनी दौड़ के अन्तिम मोड़ पर तीमुथियुस से कहा, “मैं अच्छी कुश्ती लड़ चुका हूँ, मैंने अपनी दौड़ पूरी कर ली है, मैंने विश्वास की रखवाली की है” (2 तीमुथियुस 4:7)। पौलुस का जीवन क्षणिक उत्साह के झटकों और फिर लम्बे निष्क्रियता के दौरों से भरा हुआ नहीं था। वह जानता था कि विश्वास की दौड़ एक आजीवन चलने वाली मैराथॉन है, जिसे अन्त तक दृढ़ता से दौड़ना होता है।

हम नहीं चाहते कि हमें केवल कभी-कभार आने वाले छोटे-छोटे उत्साह के झोंकों के लिए जाना जाए। विशेषकर हमें ऐसे लोग बनने से बचना चाहिए जो परमेश्वर का कार्य केवल तभी करते हैं, जब अन्य मसीही लोग हमें देख रहे हों। इसके बजाय, हमें हर दिन पूरी लगन से दौड़ लगानी है, यह स्मरण रखते हुए कि परमेश्वर की दृष्टि सदा हम पर बनी रहती है।

जब हम विश्वास में आगे बढ़ते हैं, तो हम यह याद रख सकते हैं कि हमें “धर्म का वह मुकुट” प्रतिज्ञा किया गया है, जो हमारे लिए “रखा हुआ है” और “जिसे प्रभु, जो धर्मी और न्यायी है,” हमें देगा (2 तीमुथियुस 4:8)। और हमें यह याद रखना चाहिए कि हम अपनी ताकत से नहीं दौड़ रहे हैं। बल्कि हमें यह पूरा विश्वास रखना चाहिए कि “जिसने तुम में अच्छा काम आरम्भ किया है, वही उसे यीशु मसीह के दिन तक पूरा करेगा” (फिलिप्पियों 1:6)। परमेश्वर ने प्रतिज्ञा की है कि वह हमें मार्ग में कभी अकेला नहीं छोड़ेगा (इब्रानियों 13:5)। यदि समापन रेखा अभी दूर है, तो हमें उस पर ध्यान केन्द्रित करने के बजाय यीशु पर ध्यान लगाए रखना है, और अपनी आँखें “विश्वास के कर्ता और सिद्ध करने वाले” पर लगाए रखनी हैं (इब्रानियों 12:2)।

कभी भी उस एक जीवन के प्रभाव को कम मत आँकिए जो पूरी तरह परमेश्वर की महिमा के लिए जीया गया हो। उस दिन की कल्पना करें, जब आप अपने स्वर्गिक पिता के सामने एक स्वीकृत सेवक के रूप में खड़े होंगे और यह विचार आपके दिल में नम्रता भर देगा और आप कहेंगे, “प्रभु, मैं पूरे मन से यही चाहता हूँ कि मेरे जीवन पर तेरी स्वीकृति बनी रहे। ‘मैं केवल एक हूँ, लेकिन मैं ही हूँ। जो मैं कर सकता हूँ, वह मुझे करना चाहिए। और जो मुझे करना चाहिए, उसे मैं तेरे अनुग्रह से करूँगा।’”[1]

मत्ती 25:14-46

पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: 1 शमूएल 22–24; 1 तीमुथियुस 1 ◊


[1] एडवर्ड एवरेट हेल को श्रेय दिया जाता है।

21 October : विवाहाचे मोठे रहस्य

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21 October : विवाहाचे मोठे रहस्य
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म्हणून पुरुष आपल्या आईबापांना सोडून आपल्या पत्नीला जडून राहील; आणि ती उभयता एकदेह होतील.” हे रहस्य मोठे आहे, पण मी ख्रिस्त व मंडळी ह्यांच्यासंबंधाने बोलतो आहे. (इफिस 5:31-32)

येथे इफिस 5:31 मध्यें पौल उत्पत्ति 2:24 चा संदर्भ घेत आहे, जे मोशे बोलला – आणि येशूनें म्हटलें कीं ही वचनें मोशेद्वारे देव बोलला (मत्तय 19:5) – “ह्यास्तव पुरुष आपल्या आईबापांस सोडून आपल्या बायकोशी जडून राहील आणि ती दोघे एकदेह होतील.” पौल म्हणतो कीं देवाचे हे वचन, जे देव मनुष्याचे पापात पडण्यापूर्वी बोलला, ख्रिस्त आणि मंडळीला संबोधून आहे आणि म्हणून यांत एक मोठे रहस्य दडलेलें आहे.

याचा अर्थ असा आहे कीं जेव्हां देवानें पुरुष आणि स्त्री यांना बनवलें आणि विवाहाद्वारे त्यांनी एकदेह व्हावें हे ठरविलें, तेव्हा त्यानें फासा टाकून किंवा एक रुपयाचे नाणें हवेत फेकून ते एकमेकांशी कसे संबंधित असावेंत असा नशिबी खेळ खेळला नाहीं. देवानें आपला पुत्र आणि मंडळी यांच्यातील नातेसंबंधाचा नमुना सादर करून अतिशय हेतुपुरस्सर विवाहाचा आदर्श आपल्या समोर ठेवला आहे, ज्याची योजना त्यानें जगाचा पाया घालण्यापूर्वी केलीं होती.

म्हणून, विवाह हे रहस्य मोठे आहे – आपण जे बाह्यरूपाने पाहतो त्यापेक्षा कितीतरी मोठा असा गूढ अर्थ त्यात सामावलेला आहे. देवानें पुरुष आणि स्त्री यांना बनवलें आणि विवाह संस्थेची स्थापना केलीं ती यासाठींच कीं ख्रिस्त आणि त्याची मंडळी यांच्यातील सार्वकालिक करार-बद्ध नात्याचे प्रतिबिंब त्यांच्या वैवाहिक एकदेहाद्वारे दिसून यावें.

पौलानें या रहस्यातून काढलेला निष्कर्ष असा कीं वैवाहिक जीवनांत पती-पत्नींची एकमेकांप्रत असलेली कर्तव्यें ही अहेतुकपणाने किंवा स्वैराचाराने ठरवली जात नाहींत, तर ती ख्रिस्त आणि त्याची मंडळी यांची एकमेकांप्रत असलेली अद्वितीय कर्तव्यें यांत मुळावलेली आहेत.

आपल्यांपैकीं जे विवाहित आहेत त्यांनी वारंवार यावर चिंतन करण्याची गरज आहे कीं आपण आपल्या वैवाहिक जीवनातून वैवाहिक संबंधात असलेल्या आपल्यापेक्षा प्रचंड मोठ्या आणि महान अशा अद्भुत दैवीय वास्तविकतेचे प्रतिबिंब दाखवावे असा विशेषाधिकार देव आपल्याला देतो ही गोष्ट किती रहस्यमय आणि आश्चर्यकारक आहे.

हेंच ते ख्रिस्त आणि मंडळी यांचे रहस्यमय नाते आहे जे आमच्यासाठीं प्रीतिच्या नमुन्याचा पाया आहे ज्याविषयी पौल बोलत आहे. प्रत्येक जोडीदाराने आपल्या जोडीदाराच्या आनंदात स्वतःचा आनंद शोधला पाहिजे असे म्हणणें पुरेसे नाहीं. हे खरे आहे. पण ते पुरेसे नाहीं. हे सांगणें देखील तितकेच महत्त्वाचे आहे कीं पती-पत्नींनी आपल्या वैवाहिक जीवनातून जाणीवपूर्वक ख्रिस्त आणि मंडळी यांच्यासाठीं देवानें ठरविलेल्या नातेसंबंधाचे प्रतिबिंब प्रदर्शित केलें पाहिजे. म्हणजेंच, प्रत्येक जोडप्याने ख्रिस्त आणि मंडळीसाठीं देवानें तयार केलेंल्या शुद्ध आणि आनंदी आलेखाच्या विशिष्ट नमुन्यानुसार आपले वैवाहिक जीवन जगण्याचा प्रयत्न केला पाहिजे.

आपण अविवाहित असा अगर विवाहित, वृद्ध असा अगर तरुण, मला आशा आहे कीं तुम्हीं हे गांभीर्याने घ्याल. करार-पाळणारा ख्रिस्त आणि त्याचा करार-पाळणारी मंडळी यांच्या रहस्याचे प्रकटीकरण त्यावर टिकलेले आहे.

20 अक्तूबर : अलौकिक धैर्य

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20 अक्तूबर : अलौकिक धैर्य
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“हे भाइयो, हम तुम्हें समझाते हैं कि जो ठीक चाल नहीं चलते उनको समझाओ, कायरों को ढाढ़स दो, निर्बलों को सम्भालो, सब की ओर सहनशीलता दिखाओ।” 1 थिस्सलुनीकियों 5:14

धैर्य एक महान गुण है। यह एक बड़ी चुनौती भी है!

जब प्रेरित पौलुस ने थिस्सलुनीकियों को अपनी पहली पत्री समाप्त की, तो उसने अमूल्य सिद्धान्तों की एक शृंखला लिख डाली। प्रत्येक सिद्धान्त माला में लगे एक रत्न की तरह है, एक पवित्र सत्य जिसे हमें अपने जीवन के राह पर चलते हुए अपने गले में धारण करना चाहिए (नीतिवचन 3:3)। इन सिद्धान्तों में सबसे प्रमुख आदेश है धैर्य रखना।

यूनानी भाषा में पौलुस ने ‘makrothumeo’ शब्द का उपयोग किया है, जिसका शाब्दिक अर्थ है “लम्बे दिल वाला” और जिसे पवित्रशास्त्र में आमतौर पर परमेश्वर के चरित्र को व्यक्त करने के लिए उपयोग किया गया है (उदाहरण के लिए, रोमियों 2:4; 2 तीमुथियुस 1:16; याकूब 5:10)। धैर्य का मतलब है उन लोगों के प्रति जल्दी गुस्सा न होना जो असफल होते हैं। पौलुस हमें बताता है कि हमें इस प्रकार का दिव्य धैर्य रखना चाहिए, जब हमारा सामना आलसी, निराश और कमजोर भाइयों-बहनों से होता है। इनका सामना करने से हमें परमेश्वर के धैर्य को अपने जीवन में जीने का अवसर मिलता है।

हम इस तरह का धैर्य कैसे प्राप्त करें? यह स्वाभाविक रूप से नहीं आता! सबसे पहले हमें परमेश्वर को देखना होगा। हमारा परमेश्वर ऐसा परमेश्वर है, जो “दयालु और अनुग्रहकारी, विलम्ब से कोप करने वाला [makrothumeo] और अति करुणामय है” (भजन 103:8)। वह हमारे पापी और विद्रोही दिलों को देखता है और फिर भी हमें माफ कर देता है। वह हमारी बार-बार होने वाली असफलताओं को देखता है और फिर भी हमें त्यागता नहीं है। वह हमारी शंकाओं और चिन्ताओं को देखता है और फिर भी हमारे साथ कोमल रहता है। हमें इस प्रकार के धैर्य को अपने जीवन में दर्शाना है। और इसलिए हमें परमेश्वर से मदद मांगनी होगी। यह अलौकिक धैर्य केवल परमेश्वर ही अपने पवित्र आत्मा के द्वारा हमारे जीवनों में उत्पन्न कर सकता है।

उदाहरण के लिए, पौलुस ने प्रार्थना की कि कुलुस्से के विश्वासी “उसकी महिमा की शक्ति के अनुसार सब प्रकार की सामर्थ्य से बलवन्त होते जाएँ, यहाँ तक कि आनन्द के साथ हर प्रकार से धीरज और सहनशीलता दिखा सकें” (कुलुस्सियों 1:11)। हममें से प्रत्येक को कोई ऐसा व्यक्ति चाहिए जो हमारे लिए यह प्रार्थना करे, और साथ ही हमें स्वयं के लिए भी यह प्रार्थना करनी चाहिए। हममें से प्रत्येक को दूसरों के लिए भी यही करना चाहिए, क्योंकि यह एक ऐसी प्रार्थना है जिसका उत्तर देने के लिए परमेश्वर तत्पर है। जब परमेश्वर की शक्ति हमारे जीवन में प्रकट होती है, तो हम तब भी सहन कर सकते हैं जब हमें हार मान लेने का मन होता है, और हम तब भी धैर्य दिखा सकते हैं जब भीतर से सब कुछ खो देने जैसा महसूस होता है।

आप दैनिक जीवन की परेशानियों का कैसे जवाब देंगे—जब आप किसी लाइन में खड़े हों, या हरी बत्ती खड़े हों लेकिन आपके सामने वाली कार नहीं चल रही हो? आप उन भाई-बहनों से कैसे पेश आएँगे जो आलसी, निराश, या कमजोर हैं? उन परिस्थितियों में और उन लोगों के साथ आपका बस एक ही नारा होना चाहिए—धैर्य। हो सकता है कि आपके आस-पास के लोग आपके धार्मिक ज्ञान से ज्यादा प्रभावित न हों, लेकिन वे निश्चित रूप से आपकी अधीरता को देखेंगे, जो यह दर्शाता है कि आप दूसरों की तुलना में अपने समय और रुचियों को अधिक महत्त्वपूर्ण मानते हैं। लेकिन इसके विपरीत, वे आपके धैर्य को भी देखेंगे, जो उन्हें यह बताएगा है कि आप दूसरों की भलाई और उनकी जरूरतों को अपने से ऊपर मानते हैं (फिलिप्पियों 2:3)—ठीक वैसे ही जैसे हमारा स्वर्गिक पिता करता है।

निश्चित रूप से आज आपको ऐसे अवसर मिलेंगे जब आप मानव अधीरता दिखाने के बजाय ईश्वरीय धैर्य दिखा सकें। उन क्षणों में, परमेश्वर के धैर्य की विशालता को पहचानें जो उसने आपके प्रति दिखाया है और आप निश्चित रूप से दूसरों के लिए अपने धैर्य में वृद्धि करेंगे।

कुलुस्सियों  1:9-12

◊ पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: 1 शमूएल 19–21; 2 पतरस 3

20 October : प्रार्थनेचा प्रथम हेतू

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20 October : प्रार्थनेचा प्रथम हेतू
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ह्यास्तव तुम्हीं ह्या प्रकारे प्रार्थना करा :‘हे आमच्या स्वर्गातील पित्या, तुझे नाव पवित्र मानले जावो.” (मत्तय 6:9)

प्रभूनें शिकविलेल्यां प्रार्थनेत, येशूनें शिकवलें कीं प्रार्थना करताना प्रथम प्राधान्य म्हणजें आपल्या स्वर्गीय पित्याला त्याचे नाव पवित्र मानले जावो अशी प्रार्थना करणें : आम्हांमध्यें, मंडळीत, जगात आणि सर्वत्र.

लक्षात घ्या कीं ही एक याचिका आहे, विनंती आहे. ही घोषणा किंवा भव्य स्वागत नाहीं. ही स्तुतीची अभिव्यक्ती नाहीं, तर याचना आहे. वर्षानुवर्षे मी प्रभूच्या प्रार्थनेचे चुकीचे वाचन करत आलेला आहे कीं जणू तिची सुरुवात स्तुतीने होते : “देवाची स्तुती करा, परमेश्वराचे नाव पवित्र, आदरणीय, व पराक्रमी आहे!” पण ती स्तुती नाहीं. ती प्रार्थना आहे. ती देवाला विनवणी आहे कीं त्याचे स्वतःचे नाव पवित्र मानले जात आहे ह्याची त्यानें खात्री करून घ्यावीं.

हे अगदी मत्तय 9:38 मधील एका आणखी शास्त्रलेखाप्रमाणें आहे, जिथे येशू आपल्याला पिकाच्या धन्याने आपल्या कापणीस कामकरी पाठवून द्यावेत म्हणून त्याची प्रार्थना करावयास सांगतो. आपण जे कामकरी आहों त्यां आम्हीं पिकाच्या धन्याला, ज्याला कापणीचे ज्ञान आमच्यापेक्षा जास्त आहे, त्यानें आपल्या कापणीस आणखी कामकरी पाठवून द्यावेत अशी प्रार्थना आपण त्याला करावीं असा बोध आम्हांला करण्यांत यावा ही गोष्ट मला नेहमीच आश्चर्यचकित करून सोडते.

पण इथे प्रभूच्या प्रार्थनेत हीच गोष्ट नाहीं का—येशू आपल्याला सांगत आहे कीं देवाला, जो आपल्या नावाच्या प्रतिष्ठेसाठीं इतका इर्ष्यावान आहे, त्याचे नाव पवित्र मानले जावे याची त्यानें स्वतः खात्री करून घावीं अशी आपण प्रार्थना करावीं, ज्याचा अर्थ आहे प्रतिष्ठित मानलें जावें, आदरणीय मानलें जावें, अति मौल्यवान म्हणून गौरविले जावें?

कदाचित आपल्याला याचे आश्चर्य वाटेल, परंतु ते असेच आहे. आणि यातून आपण दोन गोष्टी शिकतो.

1. पहिली ही कीं प्रार्थना देवाला त्यां गोष्टी करण्यास प्रवृत्त करत नाहीं ज्यां त्याला करायच्या नसतांत, किंवा ज्या करण्यांस तो नाखूष आहे. त्याचे नाव पवित्र मानलें जावें हा त्याचा पावित्राच (अगदी मूळ उद्देश) आहे. देवानें ज्यां ज्यां गोष्टींना प्राधान्य दिलें आहे त्यांत ह्यापेक्षा सर्वप्रथम असें काहीही नाहीं. पण तरीही आपण तशी प्रार्थना करावीं.

2. दुसरी म्हणजें ही कीं प्रार्थना हा देवाचा तो मार्ग आहे ज्याद्वारे तो आपलें प्राधान्य त्याच्या प्रधान्याशी सुसंगत बनवितो. जेव्हा आमच्या प्रार्थना त्याच्या महान उद्देष्ट्याशी सुसंगत परिणाम म्हणून समोर येतांत तेव्हा आपल्या प्रार्थनेने उद्भवणारे परिणाम याद्वारे महान गोष्टी घडवून आणाव्यात ही देवाची इच्छा आहे.

आपले नांव पवित्र मानले जावें अशी जी देवाची ईर्ष्या आहे त्याशी तुमचे अंतःकरण सुसंगत करा म्हणजें तुमच्या प्रार्थना मोठ्या परिणामकारक ठरतील. तुमची पहिली आणि खात्रीदायक प्रार्थना देवाचे नांव पवित्र मानलें जावें यासाठींच असू द्या म्हणजें तुमच्या प्रार्थना त्याला त्याच्या नावासाठीं असलेल्या सामर्थ्यवान ईर्षेबरोबर सुसंगत होतील.