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30 अक्तूबर : परमेश्वर के प्रावधान की सान्त्वना

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30 अक्तूबर : परमेश्वर के प्रावधान की सान्त्वना
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“नाओमी ने उससे कहा, ‘हे मेरी बेटी, क्या मैं तेरे लिए ठाँव न ढूँढ़ूँ कि तेरा भला हो? अब जिसकी दासियों के पास तू थी, क्या वह बोअज़ हमारा कुटुम्बी नहीं है? वह तो आज रात को खलिहान में जौ फटकेगा। तू स्नान कर तेल लगा, और अच्छे वस्त्र पहिनकर खलिहान को जा।’” रूत 3:1-3

परमेश्वर सम्प्रभु है, इसलिए हम साहसिक निर्णय ले सकते हैं।

जैसे कोई भी भला व्यक्ति करता है, वैसे ही नाओमी भी चाहती थी कि उसकी विधवा बहू रूत का जीवन सुरक्षित और स्थिर हो। इसलिए उसने रूत से आग्रह किया कि वह बोअज़ के पास जाए और उससे विवाह करके जीवनभर की सुरक्षा की याचना करे।

निस्सन्देह, हमें इस पुराने नियम की कथा में आज के समय के विचारों को ज़रूरत से ज़्यादा नहीं डालना चाहिए, क्योंकि उस समय की अपनी सांस्कृतिक परम्पराएँ थीं। परन्तु यह भी याद रखना ज़रूरी है कि यह वास्तविक लोगों का वास्तविक जीवन था, जो एक वास्तविक मध्य-पूर्वी गाँव में एक जीवित परमेश्वर से मिल रहे थे और अपने जीवन को पूरी तरह से उसे समर्पित कर रहे थे।

इसलिए इसमें कुछ शाश्वत सत्य हैं, जिन्हें हम सीख सकते हैं। मुख्य रूप से, हम सीख सकते हैं कि हालाँकि परमेश्वर की सर्वशक्तिमान योजना हमारे जीवनों पर शासन करती है, तौभी वह हमारे निर्णय लेने की स्वतन्त्रता को सीमित नहीं करती। परमेश्वर की प्रभुता न तो नाओमी की सोच को रोकती है, न ही रूत की प्रतिक्रिया को। प्रभु उन सभी बातों पर प्रभुत्व रखता है, लेकिन वह उनके चुनावों को जबरन प्रभावित नहीं कर रहा था।

रूत की कहानी यह भी याद दिलाती है कि भले ही गलतियाँ हमारे जीवन की दिशा को बदल दें, तौभी परमेश्वर उन्हें हमारे अन्तिम भले और अपनी महिमा के लिए छुटकारे में बदल देता है। नाओमी के पति को अपने परिवार को प्रतिज्ञा के देश से परमेश्वर की प्रजा के शत्रु देश मोआब में नहीं ले जाना चाहिए था; और उसके बेटों को मोआबी स्त्रियों से विवाह नहीं करना चाहिए था, क्योंकि परमेश्वर के व्यवस्था-विधान के अनुसार अन्य धर्मों के लोगों से विवाह करने की मनाही थी। फिर भी इन गलत चुनावों ने रूत को नाओमी तक पहुँचाया, परमेश्वर तक पहुँचाया, और यीशु के पूर्वज के रूप में उसे उद्धार की वंशावली में शामिल कर दिया (मत्ती 1:1-6)।

इस प्रकार का छुटकारा जानबूझकर विद्रोह करने का बहाना नहीं है, बल्कि यह निरन्तर आश्वासन है कि हमें अपने अतीत की गलतियों के कारण निराश होने की आवश्यकता नहीं है। उसी प्रकार, परमेश्वर की प्रभुता—जो पहले उसके पुत्र को संसार में लाकर और फिर अपने लोगों को उसमें विश्वास करने के लिए बुलाकर उसके छुटकारे की योजना को बुनती है—तब हमारे लिए निरन्तर आश्वासन बनी रहती है, जब हम निर्णयों का सामना करते हैं और इस या उस मार्ग को चुनने का विचार करते हैं।

हम विश्वास से भरे कार्यों के माध्यम से परमेश्वर पर भरोसा करते हैं। नाओमी बस अपने घर में बैठकर परमेश्वर के चमत्कार की प्रतीक्षा नहीं करती रही और यह नहीं कहती रही, जो होगा देखा जाएगा। नहीं—उसने कार्य किया, उसने रूत को आगे बढ़ने और अगला कदम उठाने को कहा, जो कि परमेश्वर की योजना का हिस्सा लगता था। परमेश्वर की प्रभुता पर विश्वास का अर्थ यह नहीं कि हम निष्क्रिय होकर बस योजना को घटित होते हुए देखें और Que será, será गाते रहें—अर्थात जो होना है, वह होकर रहना है—क्योंकि “भविष्य हमारे हाथों में नहीं है”[1]

इसके बजाय, हमें यीशु के शब्दों को दोहराना चाहिए: “मेरी नहीं परन्तु तेरी ही इच्छा पूरी हो” (लूका 22:42)। इस प्रार्थना को करने के बाद यीशु ने इसे अपने जीवन में पूरी तरह आज्ञाकारिता से जीया, यहाँ तक कि मृत्यु तक। जीवन का मार्ग चाहे जितना भी टेढ़ा-मेढ़ा हो, परमेश्वर का वचन यह प्रतिज्ञा करता है: “कि जो लोग परमेश्‍वर से प्रेम रखते हैं, उनके लिए सब बातें मिलकर भलाई ही को उत्पन्न करती हैं; अर्थात् उन्हीं के लिए जो उसकी इच्छा के अनुसार बुलाए हुए हैं” (रोमियों 8:28)। इस प्रतिज्ञा में ढाढ़स रखें।

क्या आप किसी निर्णय का सामना कर रहे हैं? क्या आप सोच रहे हैं कि कौन सा मार्ग चुनें? परमेश्वर सम्प्रभु है और वह उद्धार करता है। आप जो भी निर्णय लें, परमेश्वर के प्रावधान की सान्त्वना के भीतर साहसपूर्वक और स्वतन्त्र रूप से जीवन जीएँ।

प्रेरितों 16:6-15

◊ पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: 2 शमूएल 14–15; 1 यूहन्ना 4


[1] रेय इवैंस, “क्यू सेरा, सेरा” (1956).

30 October : वाहवत जाण्याचा धोका

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30 October : वाहवत जाण्याचा धोका
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ह्या कारणामुळें ऐकलेल्या गोष्टींकडे आपण विशेष लक्ष लावले पाहिजे, नाहीं तर आपण त्यांपासून वाहवत जाऊ. (इब्री 2:1)

आपल्यांपैकीं प्रत्येकाला हे ठाऊकच आहे कीं वाहवत जाण्याच्या घटना झाल्यां आहेत. कोणतीही तत्परता नाहीं. दक्षता घेणें नाहीं. लक्ष लावून ऐकणें किंवा ऐकलेल्या गोष्टींवर काळजीपूर्वक विचार करणें नाहीं, कीं येशू ह्याच्यावर आपलें लक्ष केंद्रित करणें नाहीं, आणि परिणामी विश्वासांत टिकाव धरून उभें न राहता त्यांपासून वाहवत जाणें.

येथे तोच मुद्दा आहे : ते विश्वासांत टिकाव धरून राहत नाहींत. जगिक जीवन म्हणजें काहीं सरोवर नाहीं. ते एका नदीप्रमाणें आहे. आणि ते विनाशाकडे वाहवत जात आहे. येशू काय म्हणतो त्याकडे जर तुम्हीं विशेष लक्ष लावत नाहीं आणि प्रती दिवशी त्याजवर चिंतन-मनन करित नाहीं आणि क्षणोक्षणी त्याच्याकडे आपली दृष्टि लावलेली ठेवित नाहीं तर तुम्हीं टिकाव धरणार नाहीं; तुम्हीं मागे जाल. तुम्हीं ख्रिस्तापासून दूर जाल.

वाहवत जाणें ही ख्रिस्ती जीवनासाठीं विनाशकारक गोष्ट आहे. आणि जसे इब्री 2:1 सांगते, यावर एकच उपाय आहे : तुम्हीं ऐकलेल्या गोष्टींकडे विशेष लक्ष लावा. म्हणजेंच, देव त्याचा पुत्र येशू ह्याच्याद्वारें काय म्हणत आहे त्यावर काळजीपूर्वक विचार करा. देवाचा पुत्र, येशू ख्रिस्त ह्याच्याद्वारें देव जें बोलत आहे आणि जें करत आहे त्यावर आपले लक्ष केंद्रित करा (किंवा पाहत असावे).

हे कौशल शिकणें म्हणजें नदींत पोहण्यासाठीं हात-पाय मारण्याचे कौशल शिकण्याइतके कठीण नाहीं. फक्त एक गोष्ट जी आपल्याला ह्या पापी संस्कृतीच्या विपरीत दिशेनें पोहण्यास प्रतिरोध करते ती म्हणजें पोहण्यासाठीं हात-पाय मारण्यांस लागणारे परिश्रम नाहीं तर प्रवाहाबरोबर जाण्याची आपली पापी प्रवृत्ती, ही मूळ समस्या आहे.

देवानें आपल्याला कठीण काम दिलें, अशी तक्रार आपण करू नये. ऐका, त्यावर काळजीपूर्वक विचार करा, आपले लक्ष केंद्रित करा (किंवा पाहत असा)— याला तुम्हीं कठीण कामाचे विवरण म्हणू शकत नाहीं. खरे पाहता, हे कामाच्या स्वरूपाचे वर्णन नाहीं. आपण येशूनें केलेंल्या कामामध्यें संतुष्ट असावे यासाठीं हे एक निकडीचे पाचारण आहे जेणेंकरून आपण आपल्या फसव्या इच्छांनी बहकून जाऊ नये.

जर तुम्हीं आज वाहवत जात असाल, तर तुमचा नव्याने जन्म झाला आहे या आशेच्या लक्षणांपैकीं एक म्हणजें हे वाचल्यावर तुम्हांला तुमच्या अं:तकरणात टोचल्यासारखे जाणवत आहे आणि आपण येशूकडे आपली दृष्टि फिरवावी आणि त्याच्याकडे आपलें लक्ष्य केंद्रित करावें आणि दिवसोंदिवस, महिनोन्महिने, आणि वर्षानुवर्षे त्याचे पूर्ण लक्ष देऊन ऐकावें अशी कळकळीची उत्कंठा तुमच्यांत वाढत चालली आहे.

29 अक्तूबर : परमेश्वर की कृपा को दूसरों तक बढ़ाना

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29 अक्तूबर : परमेश्वर की कृपा को दूसरों तक बढ़ाना
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“उसने अपनी सास को बता दिया कि मैंने किसके पास काम किया, और कहा, ‘जिस पुरुष के पास मैं ने आज काम किया उसका नाम बोअज़ है।” नाओमी ने अपनी बहू से कहा, “वह यहोवा की ओर से आशीष पाए, क्योंकि उसने न तो जीवित पर से और न मरे हुओं पर से अपनी करुणा हटाई!’” रूत 2:19-20

आज आप अदृश्य परमेश्वर को दृश्य बना सकते हैं।

जब रूत खेतों में अनाज बीनने के लिए निकली, तो उसे यह कभी नहीं पता था कि परमेश्वर का प्रावधान कितना अद्‌भुत होगा। वह परमेश्वर में शरण में तो आ ही चुकी थी, लेकिन बोअज़ के माध्यम से उसने यह अनुभव किया कि प्रभु उसकी सोच या उसके मांगने से कहीं अधिक करने में सक्षम था।

जब परमेश्वर ने इस्राएल के साथ अपनी वाचा स्थापित की, तो उसने अपनी कृपा का परिचय इस रूप में दिया कि वह “अनाथों और विधवाओं का न्याय चुकाता, और परदेशियों से ऐसा प्रेम करता है कि उन्हें भोजन और वस्त्र देता है” (व्यवस्थाविवरण 10:18)। उसने अपना व्यवस्था-विधान अपने लोगों को इसलिए नहीं दिया था कि वे कर्मकाण्डवादी बन जाएँ, बल्कि इसलिए कि वे उसके गुणों को प्रदर्शित करें और अपने आज्ञापालन के माध्यम से उसके नाम की महिमा करें। उस व्यवस्था-विधान के एक हिस्से ने कठिनाई में जी रहे लोगों के लिए प्रावधान करने का एक ढांचा प्रदान किया था।

जब बोअज़ ने व्यवस्था-विधान के निर्देश का पालन करते हुए रूत को भोजन करने के लिए आमन्त्रित किया (रूत 2:14), तो उसने यह कृपापूर्वक किया। उसने परमेश्वर की कृपा प्राप्त की थी, और उसे यह एहसास हुआ कि वह इसे दूसरों के साथ साझा कर सकता है। उसने परमेश्वर के आदेशों का पालन करने के लिए सचमुच हाथ-पैर लगाए और इसके परिणामस्वरूप रूत ने परमेश्वर का हृदय और भी अधिक जाना। इसके अतिरिक्त, बोअज़ की कृपा उदारता के साथ जुड़ी हुई थी: उसने रूत को केवल भोजन करने का आमन्त्रण नहीं दिया, बल्कि उसे अपनी फसल काटने वाले मजदूरों के बीच बैठने का स्थान भी दिया। उसने उसे अपनी तृप्ति तक खाने के लिए प्रोत्साहित किया। उसने उसे केवल बाकी बचा हुआ अनाज नहीं, बल्कि गेहूँ के सबसे अच्छे पूलों में से अन्न लेने की अनुमति दी। उसके सामाजिक और जातीय भेदभाव के बावजूद उसने रूत को अलग-थलग नहीं किया, और न ही उसे दूरी पर रखा।

इसके विपरीत, बोअज़ ने परमेश्वर के व्यवस्था-विधान से कहीं अधिक किया। यह उस स्वागत की केवल एक झलक है, जो परमेश्वर मसीह के माध्यम से हमें प्रदान करता है, जब वह हमें अपनी स्वर्गिक मेज़ पर आमन्त्रित करता है। और यह वही प्रस्ताव है जिसे हम सभी मसीहियों को अपने जीवन में प्रदर्शित करना चाहिए। यदि कोई—चाहे वह विधवा हो, गरीब हो, दुखी हो या कड़वाहट से भरा हो—कलीसिया की सभा या किसी मसीही घर में प्रवेश करता है, तो वहाँ उसे विश्वासयोग्य स्वीकृति का अनुभव होना चाहिए, क्योंकि परमेश्वर की प्रजा उसकी वाचागत देखभाल को अपने जीवन से प्रकट करती है।

दिन के अन्त तक, रूत बोअज़ द्वारा बार-बार दिखाए जा रहे अनुग्रह से अभिभूत हो गई थी। जब वह अपने प्रचुर प्रावधान के साथ घर लौटी, तो नाओमी ने उस उदारता पर आनन्दित होकर उसका वर्णन ख़ेसेद शब्द से किया—जो परमेश्वर की निरन्तर प्रेममय करुणा और दयालु प्रावधान को दर्शाता है। बोअज़ के ख़ेसेद ने रूत और नाओमी के हृदयों को उस परमेश्वर की आराधना करने के लिए प्रेरित किया जो ख़ेसेद में भरपूर है (निर्गमन 34:6-7)।

बोअज़ की कृपा उस अनुग्रहपूर्ण, उदार, और निरन्तर करुणा से प्रवाहित हुई जो उसने स्वयं परमेश्वर से प्राप्त की थी। प्रभु की देखभाल के सह-प्राप्तकर्ता होने के नाते जब हम दूसरों पर ऐसी करुणा दर्शाते हैं, तब वे भी परमेश्वर को जान सकते हैं। अदृश्य परमेश्वर हर पीढ़ी में अपने लोगों की करुणा के माध्यम से दृश्य हो जाता है। आज आप किस पर ऐसी अनुग्रहपूर्ण, उदार, और अप्रत्याशित करुणा प्रकट करेंगे?

रूत 2:14-23

पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: 2 शमूएल 12–13; 1 यूहन्ना 3 ◊

29 October : पाप, सैतान, आजार किंवा विध्वंस

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29 October : पाप, सैतान, आजार किंवा विध्वंस
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“हा माझ्यापासून दूर व्हावा अशी मी प्रभूजवळ तीनदा विनंती केलीं; परंतु त्यानें मला म्हटलें आहे, “माझी कृपा तुला पुरेशी आहे; कारण अशक्तपणातच माझी शक्ती पूर्णतेस येते.” म्हणून ख्रिस्ताच्या सामर्थ्याची छाया माझ्यावर राहावी म्हणून मी विशेषेकरून आपल्या अशक्तपणाची प्रौढी फार आनंदाने मिरवीन. (2 करिंथ 12:8-9)

ख्रिस्ती लोकांना छळवणूकमुळें उद्भवणारी संकटें व दुःखें यांमुळें ज्यां वेदना सोसाव्या लागतांत त्यां कर्करोगामुळें सोसाव्या लागणाऱ्या वेदनांसारख्यांच असतांत का? जर देवानें एखाद्या गोष्टी संदर्भात काहीं अभिवचनें दिलीं तर ती दुसऱ्या गोष्टींवर देखील लागू होतांत का? माझे उत्तर होय आहे. संपूर्ण जीवन, जेव्हां ते देवाच्या गौरवासाठीं आणि इतरांचे तारण व्हावें या कळकळीने विश्वासाद्वारें जगले जाते, तर अशा जीवनांत कोणती ना कोणती अडखळणें आणि दुःखें येतीलच. आज्ञाधारक जीवन जगण्यासाठीं ख्रिस्ती लोकांना जी किंमत मोजावी लागते, दुःखें ही त्याचा एक अविभाज्य भाग आहे जी सोसून तुम्हीं देवानें केलेंलें पाचारण अनुसरत असतां.

ख्रिस्त ज्या मार्गाने घेऊन जातो त्या मार्गाने त्याच्या मागे मागे जाण्याचा निर्धार करून, आपण या मार्गात त्यानें त्याच्या सार्वभौम इच्छेने ज्यां ज्यां गोष्टीं नेमून दिल्यां आहें त्या सर्व गोष्टी निवडतो. अशाप्रकारे, आज्ञाधारकतेच्या मार्गात येणारी सर्व दुःखें व संकटें ही ख्रिस्तासोबत आणि ख्रिस्तासाठीं सोसलेलीं दुःखें व संकटें असतांत- मग ती घरातच झालेला कर्करोग असो किंवा बाहेर अविश्वासणाऱ्यांनी मांडलेला आपला करणारा छळ असो.

शिवाय, ती आपण “निवडलेलीं” असतांत — म्हणजें, जिथें जिथें दुःख आपल्यावर येतांत तिथें तिथें आपण स्वेच्छेने आज्ञाधारकतेचा मार्ग निवडतो आणि आपण देवाविरुद्ध कुरकुर करत नाहीं. आपण अशी प्रार्थना करूं — जशी पौलाने केलीं — कीं हे दुःख माझ्यापासून दूर व्हावे (2 करिंथ 12:8); परंतु जर देवाची इच्छा असेल, तर स्वर्गाच्या मार्गावर असतांना आज्ञाधारक शिष्य म्हणून आम्हांला जी किंमत मोजावी लागते तिचा एक भाग म्हणून आम्हीं ती स्वीकारतो.

ख्रिस्ती आज्ञाधारकतेच्या मार्गात सोसावी लागणारी सर्व संकटें व दुःखें, मग ती छळामुळें उद्भवोत किंवा आजार किंवा अपघात यांमुळें उद्भवोत, त्यां सर्वांचा स्वभावगुण हा एकच आहे : ती सर्व देवाच्या चांगुलपणावर आपल्या विश्वासाला धोका निर्माण करतांत आणि आपण आज्ञाधारकतेचा मार्ग सोडून द्यावा म्हणून प्रवृत्त करतांत.

म्हणून, विश्वासाचा आपला प्रत्येक विजय, आणि आज्ञाधारकतेमध्यें आपली सर्व चिकाटी, ही सर्व देवाच्या चांगुलपणाची आणि ख्रिस्तच आमच्यासाठीं सर्वकाही आहे याची साक्ष देतांत – मग तो शत्रू आजार, सैतान, पाप असो किंवा विध्वंस असो. म्हणून, आपल्या ख्रिस्ती पाचारणाच्या मार्गात आपण सहन करत असलेलीं सर्व दुःखें, नाना प्रकारची सर्व दुःखें ही “ख्रिस्ताबरोबर” आणि “ख्रिस्तासाठीं” आहेंत.

त्याच्याबरोबर  या अर्थाने कीं आपण त्याच्याबरोबर विश्वासाने चालत असताना दुःखें आपल्यावर येतांत, आणि या अर्थाने देखील कीं आपण ती सर्व दु:खें त्यां सामर्थ्याने सहन करतो जो तो आपल्याला त्याच्या सहानुभूतीपूर्ण महायाजकीय सेवेद्वारे पुरवतो (इब्री 4:15).

आणि त्याच्यासाठीं  या अर्थाने कीं ही दुःखें आपण त्याचा चांगुलपणा आणि सामर्थ्य यांवर किती विश्वास ठेवितो याची कसौटी घेऊन तो प्रमाणित केला जातो, आणि या अर्थाने देखील कीं ही दुःखें तोंच सर्वांमध्यें सर्वकाही भरून काढतो याबाबतींत त्याची योग्यता प्रकट करतांत.

28 अक्तूबर : चौकस रहो!

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28 अक्तूबर : चौकस रहो!
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“कुत्तों से चौकस रहो, उन बुरे काम करने वालों से चौकस रहो, उन काट कूट करने वालों से चौकस रहो। क्योंकि खतना वाले तो हम ही हैं।” फिलिप्पियों 3:2-3

प्रेरित पौलुस ने अपनी सभी पत्रियों में शायद ही कहीं इतना तीव्र और स्पष्ट वक्तव्य दिया हो जितना इस पद में दिया है। अपने समय के झूठे शिक्षकों को “कुत्ते” कहकर सम्बोधित करना आज की तुलना में उस समय और भी अधिक साहसी और टकरावपूर्ण था। लेकिन पौलुस ने इस भाषा का उपयोग केवल प्रभाव डालने के लिए नहीं किया; वह गम्भीर रूप से चिन्तित था क्योंकि कुछ खतरनाक लोग फिलिप्पी की कलीसिया में घूम रहे थे।

झूठे सम्प्रदाय और झूठे शिक्षक प्रायः आनन्दहीन होते हैं, और फिलिप्पी के ये दुष्ट पुरुष कोई अपवाद नहीं थे। वे जो होने का दावा करते थे, उससे बिल्कुल विपरीत थे—वे इस बात पर ज़ोर दे रहे थे कि पुराने नियम की धार्मिक विधियाँ सच्चे मसीही होने के लिए आवश्यक थीं। वे उन फिलिप्पी विश्वासियों से, जिन्होंने प्रभु में आनन्द प्राप्त किया था, मूल रूप से यह पूछ रहे थे: यदि तुम बाहरी खतना की विधि पर ध्यान नहीं देते तो क्या तुम सच में सच्चे मसीही हो? पौलुस की यह चेतावनी कि “चौकस रहो” (फिलिप्पियों 3:2), इस युवा कलीसिया को यह स्मरण दिलाने के लिए थी कि जब मसीही विश्वास में कुछ जोड़ दिया जाता है, तो वह वास्तव में सुसमाचार को बिगाड़ देता है। सुसमाचार में कुछ भी जोड़ने से हमेशा उसमें से आनन्द और यहाँ तक कि उद्धार भी निकल जाता है।

इसलिए जब हम इस पद में “कुत्ते” शब्द पढ़ते हैं, तो हमें एक प्यारे पारिवारिक पालतू जानवर की कल्पना नहीं करनी चाहिए। पौलुस यहाँ किसी गोल्डन रिट्रीवर की बात नहीं कर रहा था। इसके बजाय, एक ऐसे आवारा, रोगग्रस्त कुत्ते की कल्पना करें जो कूड़ेदानों के आस-पास घूमता रहता है और जिसके काटने से आप गम्भीर रूप से घायल हो सकते हैं। पौलुस ने यह स्पष्ट रूप से कहा कि ये लोग, जो अनुग्रह के योग्य बनने के लिए लोगों से विधिवत आवश्यकताओं को पूरा करने की मांग कर रहे थे, उन कुत्तों के समान ही खतरनाक थे। वे मसीह से ध्यान हटा रहे थे और उसकी मृत्यु, पुनरुत्थान, और स्वर्गारोहण की पर्याप्तता को कम कर रहे थे।

पौलुस ने लगातार झूठी शिक्षा के दुखद परिणामों के बारे में चेतावनी दी—और क्योंकि वह फिलिप्पी की कलीसिया के लोगों से प्रेम करता था, उन्हें अपना “आनन्द और मुकुट” (फिलिप्पियों 4:1) कहकर सम्बोधित करता था, इसलिए वह किसी भी व्यक्ति और किसी भी चीज़ का विरोध करता था जो उन्हें महिमा के एकमात्र मार्ग से भटका देती। वह चाहता था कि वे चौकस रहें।

हम भी बहुत आसानी से यह भूल सकते हैं कि सुसमाचार का सन्देश केवल यह है, “अपना सर्वोत्तम करो और पर्याप्त रूप से अच्छे बनो!” जबकि सुसमाचार का सच्चा सन्देश यह है: “तुम्हारा सर्वोत्तम कभी पर्याप्त नहीं होगा—परन्तु यीशु पर्याप्त है।”

इसलिए शुभ समाचार यह है: केवल मसीह में विश्वास के द्वारा हम सच्चा “खतना” हैं—अर्थात वे लोग जो परमेश्वर की सच्ची प्रजा के रूप में अलग किए गए हैं, इसलिए नहीं कि हमारे शरीर से कुछ काटा गया है, बल्कि इसलिए कि मसीह हमारे लिए काटा गया। हर पीढ़ी में कुछ लोग होते हैं जो विश्वास के बाहरी रूपों पर ज़ोर देते हैं और—प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से—उन रीति-रिवाजों को उद्धार के लिए आवश्यक बना देते हैं। लेकिन कोई भी बाहरी अनुष्ठान या धार्मिक कार्य हमें उद्धार नहीं दे सकता। अपने शरीर पर भरोसा न रखें—न अपनी कलीसिया में उपस्थिति पर, न अपनी दैनिक बाइबल पढ़ने की आदत पर, न अपने पति या पत्नी, माता-पिता, कर्मचारी या सुसमाचार प्रचारक के रूप में प्रदर्शन पर। अपना सारा भरोसा मसीह में रखें। वह और केवल वही पर्याप्त है।

गलातियों 2:11-21

◊ पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: 2 शमूएल 9–11; 1 यूहन्ना 2

28 October : शंभर पटीनें परत फेड

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28 October : शंभर पटीनें परत फेड
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“मी तुम्हास खरे सांगतो, ज्याने ज्याने माझ्याकरिता व सुवार्तेकरिता घरदार, बहिण, भाऊ, आईवडील, मुलेबाळे किंवा शेतीवाडी सोडली आहे, अशा प्रत्येकाला शेवटच्या काळी छळणुकीबरोबर शंभरपटीने घरे, भाऊ, बहिणी, आया, मुले, शेते आणि येणाऱ्या युगात सार्वकालिक जीवन मिळाल्याशिवाय राहणार नाहीं.” (मार्क 10:29-30)

येथें येशूच्या बोलण्याचा अर्थ असा आहे कीं तुमच्या प्रत्येक बलिदानाची परतफेड तो स्वतःने भरून काढील.

  • जर तुम्हीं तुमच्याशी घनिष्ठ असलेल्या तुमच्या ममताळू आईचा आणि तिच्या सान्निध्याचा त्याग करतां, तर तुम्हांबरोबर सर्वकाळ उपस्थित राहणारा जो ख्रिस्त याजकडून तुम्हांला शंभरपटीने ममता आणि सान्निध्य प्राप्त होईल.
  • जर तुम्हीं तुमच्या जिवलग भावाबरोबर असलेल्या उदार व प्रेमळ सहचर्याचा त्याग करतां, तर तुम्हाला ख्रिस्ताकडून  शंभरपटीने उदार व प्रेमळ सहचर्य प्राप्त होईल.
  • जर तुम्हीं तुम्हांला तुमच्या घरात मिळत असलेली विश्रांती व सुरक्षितपणाची भावना सोडून देतां, तर जेव्हां तुम्हाला कळेल कीं तुमचा प्रभू हाच प्रत्येक घराचा स्वामी आहे, तेव्हां तुम्हाला शंभरपटीने विश्रांती आणि सुरक्षितता प्राप्त होईल.

जें तरुण मिशनरी होऊं पाहत आहें, त्यांना येशू म्हणतो, “मी अभिचचन देतों कीं मीं तुमचे सर्व श्रम साध्य करीन, आणि तुम्हांबरोबर असा राहीन कीं तुम्हीं कधी कोणत्या गोष्टीचा त्याग केला असे तुम्हीं म्हणूंच शकणार नाहीं.”

पेत्रानें आपली “त्याग” करण्याची भावना व्यक्त केलीं त्यावेळी येशूचा विरोधी-पवित्रा काय होता? पेत्र म्हणाला, “पाहा, आम्हीं सर्व सोडले आहे आणि आपल्यामागे आलो आहोत” (मार्क 10:28). येशूनें “आत्मत्याग” करण्याची जी आज्ञा आम्हांला दिलीं त्या आत्मत्यागाची ही भावना आहे का? नाहीं, त्यानें अशा भावनेला फटकारलें.

येशू पेत्राला म्हणाला, “ज्याची मी शंभरपटीने परतफेड करणार नाहीं असा त्याग माझ्यासाठीं कोणीही कधीच करूं शकत नाहीं- होय, एका अर्थाने या जीवनातच, येणाऱ्या युगात जे सार्वकालिक जीवन मिळेल त्याची तर बातच नको.”

27 अक्तूबर :यीशु द्वारा स्वीकार किया गया

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27 अक्तूबर :यीशु द्वारा स्वीकार किया गया
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“‘बालकों को मेरे पास आने दो और उन्हें मना न करो, क्योंकि परमेश्‍वर का राज्य ऐसों ही का है। मैं तुम से सच कहता हूँ कि जो कोई परमेश्‍वर के राज्य को बालक के समान ग्रहण न करे, वह उसमें कभी प्रवेश करने न पाएगा।’ और उसने उन्हें गोद में लिया, और उन पर हाथ रखकर उन्हें आशीष दी।” मरकुस 10:14-16

21वीं सदी में जब हम बच्चों के बारे में सोचते हैं, तो हम अक्सर उनके व्यक्तिगत गुणों पर ध्यान केन्द्रित करते हैं; वे प्यारे और कोमल होते हैं और कभी-कभी हम यह सोचने की गलती कर बैठते हैं कि वे सिद्ध हैं और सारी सृष्टि का केन्द्र हैं। बच्चों के प्रति यह आधुनिक दृष्टिकोण वास्तव में हमें यीशु की इस बात के अर्थ को समझने में रुकावट डालता है, “बालकों को मेरे पास आने दो।”

यीशु की इस उपमा के केन्द्र में वास्तव में बच्चों के वस्तुनिष्ठ गुण हैं। बच्चे न तो मतदान करते हैं, और न उनके पास ड्राइविंग लाइसेंस होता है। वयस्क आमतौर पर उनसे उनके जीवन या अपने परिवार के महत्त्वपूर्ण अवसरों पर अन्तिम निर्णय लेने के बारे में भी नहीं कहते। अपनी प्रारम्भिक अवस्था में वे पूरी तरह किसी और पर निर्भर होते हैं। सीधे शब्दों में कहें, तो छोटे बच्चे छोटे और असहाय होते हैं, उनके पास कोई विशेष बाहरी योग्यता या दावा दिखाई नहीं देता।

क्या यह आश्चर्य की बात नहीं है कि बच्चों को यीशु इतनी गर्मजोशी से अपनाता है? लेकिन यद्यपि यह सचमुच आश्चर्य की बात है, तौभी हमें चकित नहीं होना चाहिए—विशेषकर जब हम यह देखते हैं कि परमेश्वर कितनी बार नम्र और तुच्छ समझे जाने वालों का उपयोग महान कार्यों के लिए करता है। हम स्वर्ग में अपने गुणों या आत्म-मूल्य के आधार पर प्रवेश करने की आशा नहीं कर सकते। बल्कि परमेश्वर का राज्य उन लोगों का है जो जरूरतमंद हैं, अकेले हैं, असहाय हैं, जिनके पास अपने बल पर कोई दावा या योग्यताएँ नहीं हैं—अर्थात ऐसे लोग जो बिल्कुल बच्चों के समान हैं।

जैसे-जैसे हम यह समझने लगते हैं कि “बच्चों के समान” होने का क्या अर्थ है, हमें यह स्पष्ट दिखने लगता है कि परमेश्वर के राज्य में प्रवेश तभी सम्भव है जब हम अपनी असहायता और पूर्ण निर्भरता को स्वीकार कर लें। हम मसीह के पास अपने गुणों या उपलब्धियों से भरे हाथों के साथ नहीं, बल्कि खाली हाथों के साथ आते हैं—ऐसे हाथ जो प्राप्त करने को तैयार होते हैं। और यह उल्लेखनीय है कि सुसमाचार हमें उसी परमेश्वर की ओर देखने के लिए कहता है, जिसने स्वयं देहधारण किया और एक असहाय शिशु के रूप में संसार में आया। इसलिए यह एकदम उचित है कि उसके राज्य में वही प्रवेश करेंगे जो उसके इस नम्र उदाहरण का अनुसरण करते हैं।

यीशु द्वारा बच्चों को गले लगाना—जैसा हम इन वचनों में देखते हैं—हमारे अहंकार को धराशायी करता है और हमारी निर्बलता में हमें थाम लेता है। शायद आप अपने कार्य को सराहनीय मानते हैं, या अपनी पदवी को कुछ विशेष समझते हैं, और आप स्वयं दाता बनाना चाहते हैं, लाभार्थी नहीं। या फिर सम्भव है कि आप जानते हैं कि लोग आपको बहुत छोटा समझते हैं—या आप स्वयं को बहुत छोटा समझते हैं—और यह जानकर चौंकते हैं कि परमेश्वर आपको कुछ भी देना चाहता है, यहाँ तक कि आपके साथ अनन्तकाल बिताने की इच्छा रखता है। परन्तु चाहे आपका स्वभाव जैसा भी हो, या आपकी परिस्थितियाँ कैसी भी हों—हर दिन अपनी कमजोरी और असहायता को जानते हुए एक बालक जैसे विश्वास के साथ यीशु के पास आएँ। उसके राज्य में प्रवेश पाने का और उसके निकट रहने के आशीष को अनुभव करने का एकमात्र मार्ग यही है।

लूका 11:1-13

पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: 2 शमूएल 6– 8; 1 यूहन्ना 1 ◊

27 October : देवाला शक्य आहे

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27 October : देवाला शक्य आहे
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“ह्या मेंढवाड्यातली नाहींत अशी माझी दुसरी मेंढरे आहेत, तीही मला आणली पाहिजेत……” (योहान 10:16)

जगातील प्रत्येक लोकगटांत देवाचे निवडलेलें लोक आहेत. ज्यां सामर्थ्यानें त्यानें हे विश्व निर्माण केलें त्याच सामर्थ्यानें तो त्यांना सुवार्तेद्वारें हाक मारून बोलावितो, आणि ते विश्वास ठेवतांत! पृथ्वीच्या सीमांवर असलेल्या आव्हानात्मक प्रांतांत नैराश्येवर मात करण्यासाठीं सामर्थ्य मिळावे म्हणून या शब्दांमध्यें किती ताकद आहे!

पीटर कॅमेरॉन स्कॉट यांचा मिशनरी इतिहास या बाबतींत एक चांगले उदाहरण आहे. स्कॉट यांचा जन्म 1867 मध्यें ग्लासगो येथे झाला. त्यांनी आफ्रिका-इनलँड मिशनची स्थापना केलीं. पण आफ्रिकेत सुवार्ता प्रसाराची त्यांची सुरुवात ही मुळीच अनुकूल किंवा आशादायक नव्हतीं.

आफ्रिकेला त्यांचा पहिला प्रवास मलेरियाच्या तीव्र आक्रमणामुळें अर्ध्यावर संपुष्टात आला आणि त्यांना घरी परतावे लागलें. आजारातून बरे होतांच त्यांनी पुन्हां आफ्रिकेला जाण्याचा बेत केला. हा दुसरा प्रवास त्यांच्यासाठीं विशेष समाधान देणारा होता कारण यावेळी त्यांचा भाऊ जॉन सुद्धा त्यांच्यासोबत सामील झाला. पण कांहीं दिवसातच जॉन आजारी पडला.

असहाय झालेंल्यां पीटरनें आपल्या भावाला आफ्रिकन भूमीत पुरलें आणि अशा दु:खाच्या प्रसंगी देखील त्यांनी आफ्रिकेत सुवार्ता सांगण्यासाठीं स्वतःला पुन्हा समर्पित केलें. परंतु त्यांची प्रकृती पुन्हा बिघडलीं आणि विवश होऊन त्यांना इंग्लंडला परतावे लागलें.

त्या दिवसांत ते ज्यां उजाडपणा आणि नैराश्यांमुळें विव्हळ झालें त्यांतून ते कसे बाहेर निघणार होते? त्यांनी देवासाठीं समर्पित होण्याचा निश्चय केलेंला होता. पण आफ्रिकेला परत जाण्याचे सामर्थ्य त्यांना कुठून प्राप्त होणार होते? मनुष्याला हे अशक्य होते!

त्यांना हे सामर्थ्य वेस्टमिन्स्टर ॲबे याठिकाणी मिळालें. डेव्हिड लिव्हिंगस्टोनची कबर आजही तिथें आहे. स्कॉट यांनी शांतपणें वेस्टमिन्स्टर ॲबे मध्यें प्रवेश केला, त्यांना ती कबर आढळलीं आणि प्रार्थना करण्यासाठीं त्यांनी कबरेसमोर गुडघे टेकले. त्यावर असा शिलालेख होता:

ह्या मेंढवाड्यातली नाहींत अशी माझी दुसरी मेंढरे आहेत, तीही मला आणली पाहिजेत

ते एका नव्या आशेनें उत्तुंग होऊन उभें झालें, आणि आफ्रिकेला परतलें. आणि आज, शंभर वर्षांपेक्षा अधिक काळ उलटूनही, त्यांनी स्थापन केलेंलीं मिशनरी संस्था आफ्रिकेत सुवार्तेसाठीं संजीवनाचे कार्य करणारे व वाढत चाललेलें कार्यदल आहे.

जर तुम्हांला सर्वात मोठा आनंद देवाच्या भरभरून वाहणाऱ्या कृपेचा अनुभव घेण्यात असेल, कीं जेणेंकरून ती इतरांच्या कल्याणार्थ तुमच्याकडून ओसंडून वाहावी, तर जगातील सर्वात शुभ वृत्त हे आहे कीं देव सुवार्ताविरहित लोकांपर्यंत त्यांच्या तारणानिमित्त पोहोचावे म्हणून तुमच्यासाठीं अशक्य असलेल्यां गोष्टीं तुमच्याठायीं शक्य करील.

26 अक्तूबर : थामे रखने वाली थियोलॉजी

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26 अक्तूबर : थामे रखने वाली थियोलॉजी
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“यूसुफ ने अपने भाइयों से कहा, ‘मैं तो मरने पर हूँ; परन्तु परमेश्‍वर निश्चय तुम्हारी सुधि लेगा, और तुम्हें इस देश से निकालकर उस देश में पहुँचा देगा, जिसके देने की उसने अब्राहम, इसहाक, और याकूब से शपथ खाई थी’… इस प्रकार यूसुफ एक सौ दस वर्ष का होकर मर गया।” उत्पत्ति 50:24, 26

बाइबल में अनेक व्यक्तियों की मृत्यु का उल्लेख हमें अपनी मृत्यु की वास्तविकता का सामना करने के लिए प्रेरित करता है। हम सभी के दिन सीमित हैं। परमेश्वर ने हमारे प्रस्थान की तिथि हमें प्रकट नहीं की है, परन्तु भजनकार हमें बताता है कि हमारे जीवन का प्रत्येक दिन परमेश्वर की पुस्तक में पहले से ही लिखा हुआ है (भजन 139:16)। यूसुफ 110 वर्ष तक जीवित रहा—परन्तु अन्ततः, हम सभी के समान उसे भी अपनी नश्वरता को स्वीकार करना पड़ा।

यूसुफ ने अपनी मृत्यु को समझा और स्वीकार किया। कवि डिलन थॉमस के शब्दों में कहें,[1] तो उसमें “प्रकाश के बुझने पर क्रोधित होने” जैसी कोई बात नहीं थी, बल्कि जैसा हमारे प्यूरिटन पूर्वज कहते थे, यह एक “अच्छी मृत्यु” थी। वह क्या है जो हमें अच्छी मृत्यु की ओर ले जाता है? एक ठोस थियोलॉजी—एक गहरी समझ कि परमेश्वर कौन था और कौन है। अन्त समय में, यूसुफ ने अपने विश्वास को इस तरह मजबूत किया कि उसने अपने जीवन भर परमेश्वर की देखभाल और अपने लोगों के लिए उसकी प्रतिज्ञाओं को याद किया। परमेश्वर की भलाई में विश्वास के कारण वह मृत्यु का सामना बिना डरे और बिना स्वार्थ के कर सका। उसने न तो भ्रम को थामने की कोशिश की, न ही व्यर्थ की आशाओं में चिपका। बल्कि उसके शब्द संक्षिप्त थे, और उसका ध्यान उसके परिवार और परमेश्वर पर केन्द्रित था। ऐसी प्रतिक्रिया केवल तभी सम्भव है जब हमारी दृष्टि परमेश्वर के स्वभाव और उद्देश्यों से गढ़ी गई हो।

क्या हम यूसुफ की तरह यह विश्वास रखते हैं कि परमेश्वर अपने लोगों को छुड़ाएगा? क्या हमारे जीवन में इस विश्वास का प्रमाण दिखाई देता है? क्या हमने परमेश्वर की विश्वासयोग्यता को पीछे मुड़कर देखा है और यह पाया है कि चाहे हमने कैसी भी कठिनाई या टूटापन झेला हो, फिर भी हम भजनकार के साथ कह सकते हैं, “मेरे उद्धार और मेरी महिमा का आधार परमेश्वर है; मेरी दृढ़ चट्टान, और मेरा शरणस्थान परमेश्वर है” (भजन 62:7)?

हमें जीवन में जो थामे रखता है और मृत्यु के संघर्ष में जो हमें सान्त्वना देता है, वह हमारी भावनाएँ नहीं, अच्छी थियोलॉजी होती है। जब कठिन दिन आते हैं, तब हम उसी सत्य को थामते हैं जिसे हम जानते हैं—जो अटल और अपरिवर्तनीय है। यूसुफ और उसके जीवन से हम यह अद्‌भुत सत्य सीख सकते हैं: जिस परमेश्वर ने हमें अपने हाथों से रचा है, उसी ने हमारे जीवन के हर दिन के लिए हर एक कदम निर्धारित किया है, और वह हमारे जीवन को अपनी सम्प्रभु योजना की महान कहानी में बुन रहा है—एक ऐसी योजना जिसमें वह अपनी प्रतिज्ञाओं को अपनी प्रजा के लिए पूर्ण करता है। इस परमेश्वर पर विश्वास रखकर, हम मृत्यु का सामना भी गीत गाते हुए कर सकते हैं:

करुणा और न्याय के साथ उसने मेरा समय बुना;

दुख की ओस भी उसकी प्रेम की आभा से दमक उठी;

मैं उस हाथ को धन्य कहूँगा जिसने मेरा मार्गदर्शन किया,

मैं उस हृदय को धन्य कहूँगा जिसने मेरी योजना बनाई,

जब मैं महिमा में विराजमान रहूँगा इम्मानुएल के देश में।[2]

भजन 62

◊ पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: 2 शमूएल 3–5; 1 तीमुथियुस 6


[1] इन कण्ट्री स्लीप, ऐण्ड अदर पोएम्स  में “डू नॉट गो जेण्टल इनटू दैट गुड नाईट” (डेण्ट, 1952)

[2] ऐनी आर. कज़न, “द सैण्ड्स ऑफ टाईम आर सिंकिंग” (1857).

26 October : सुवार्तीकांसाठीं औषध

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26 October : सुवार्तीकांसाठीं औषध
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देवाला सर्वकाही शक्य आहे.” (मार्क 10:27)

देवाची सार्वभौम कृपा ही ख्रिस्ती पूर्णानंदासाठीं जीवनाचा झरा आहे. कारण ख्रिस्ती पूर्णानंदाच्या शोधांत असलेल्या व्यक्तीला सर्वात अधिक प्रिय असलेली गोष्ट म्हणजें ही कीं देवाच्या सार्वभौम कृपेचा आस्वाद त्याला भरून काढतो आणि त्याच्याद्वारे इतरांचेहि कल्याण व्हावे म्हणून तो झरा त्याच्यांतून विपुलपणें वाहतो.

ख्रिस्ती पूर्णानंदाच्या शोधांत असलेला प्रत्येक सुवार्तिक “ते मी केलें असे नाहीं, तर माझ्याबरोबर असणार्‍या देवाच्या कृपेनें केलें” (1 करिंथ 15:10) ह्या सत्याचा आस्वाद घेण्यांस आतुर असतो. त्यांनी सुवार्तेसाठीं घेतलेल्यां श्रमाचे फळ हे पूर्णपणें देवाकडून आहे या सत्यांत ते आनंद करतांत (1 करिंथ 3:7; रोम 11:36).

जेव्हा प्रभू म्हणतो, “माझ्यापासून वेगळे असल्यास तुम्हांला काही करता येत नाहीं” (योहान 15:5) तेव्हा या गोष्टीचा त्यांना अति आनंद होतो. एका नव्या सृष्टीची निर्मिती करण्याचा अशक्य भार देवानें त्यांच्या खांद्यावर न टाकता तो त्यानें स्वतःवर घेतला आहे हे सत्य जाणून घेतल्यावर ते निरागस कोकऱ्यांप्रमाणें आनंदाने उडी मारतात. आपल्या मनांत न गोंधळता, ते म्हणतात, “आम्हीं स्वत: कोणतीही गोष्ट आपण होऊनच ठरवण्यास समर्थ आहोत असे नव्हे, तर आमच्या अंगची पात्रता देवाकडून आलेली आहे” (2 करिंथ 3:5).

जेव्हा ते काहीं काळ रजा घेऊन विश्रांतीसाठीं घरी येतात, तेव्हां ते मोठ्या आनंदाने भारावून जाऊन पाठवणाऱ्या मंडळीला आपल्या यशाचा समाचार या शब्दांत देतांत, “ख्रिस्ताने माझ्या हातून न घडवलेले काही सांगण्याचे धाडस मी करणार नाहीं; तर परराष्ट्रीयांनी आज्ञापालन करावे म्हणून त्यानें माझ्या शब्दांनी व कृतींनी, चिन्हे व अद्भुते ह्यांच्या सामर्थ्याने, देवाच्या पवित्र आत्म्याच्या सामर्थ्याने जे जे घडवले तेच मी सांगतो” (रोम 15:18).

“देवाला सर्वकाही शक्य आहे!” –हे शब्द समोरून आपल्याला आशा देतांत, तर पाठीमागून आम्हांला दीन अं:तकरणाचे बनवितांत. ते आमच्या नैराश्यासाठीं रोगप्रतिकारक आणि अभिमानासाठीं रोगप्रतिकारक असे आहेत – म्हणजें सुवार्तीकांसाठीं एक सार्थक व परिपूर्ण औषध.