ArchivesAlethia4India

4 नवम्बर : साधारण बातों में महिमा

Alethia4India
Alethia4India
4 नवम्बर : साधारण बातों में महिमा
Loading
/

“तब स्त्रियों ने नाओमी से कहा, ‘यहोवा धन्य है, जिसने तुझे आज छुड़ाने वाले कुटुम्बी के बिना नहीं छोड़ा; इस्राएल में इसका बड़ा नाम हो। और यह तेरे जी में जी ले आने वाला और तेरा बुढ़ापे में पालने वाला हो …’ फिर नाओमी उस बच्चे को अपनी गोद में रखकर उसकी धाय का काम करने लगी।” रूत 4:14-16

एक नवजात शिशु को प्रसन्न दादा-दादी से मिलवाया जाना कोई असामान्य दृश्य नहीं है। लेकिन नाओमी के अतीत और इस छोटे परिवार के भविष्य को देखते हुए यह दृश्य साधारण होते हुए भी असाधारण बन जाता है।

नाओमी अपने पति और पुत्रों को दफनाने के बाद खाली हाथ और दुखी बैतलहम लौट आई थी। लेकिन अब उसका जीवन और उसकी गोद एक बार फिर आनन्द और आशा से भर गए थे। यह बालक भविष्य की एक पीढ़ी था, जो उसके बुढ़ापे में उसके जीवन का सहारा बनने वाला था। इस भाव में, यह बालक उसके लिए स्वतन्त्रता अर्थात छुटकारा लेकर आया था। लेकिन जब हम इस साधारण दृश्य को यीशु के देहधारण के प्रकाश में देखते हैं, तो हम जानते हैं कि यह एक असाधारण समाचार की घोषणा भी करता है: परमेश्वर की अनुग्रहपूर्ण देखभाल के कारण, न केवल दो असहाय विधवाओं को सहायता मिली, बल्कि समस्त इस्राएल—बल्कि सम्पूर्ण मानवजाति—को भी लाभ हुआ। रूत के माध्यम से परमेश्वर ने उस वंश को आगे बढ़ाया, जिससे आगे चलकर राजा दाऊद और फिर स्वयं यीशु मसीह आए।

यहाँ तक कि यीशु, जो राजाओं का राजा और प्रभुओं का प्रभु है, साधारण जीवन की परिस्थितियों में पाया गया। वह भी किसी की गोद में लेटा था। उसके भी साधारण सांसारिक माता-पिता थे। उसका जन्म किसी भव्य महल में नहीं, बल्कि एक पशुशाला में हुआ था। उसकी विजय किसी जीते हुए सिंहासन के माध्यम से नहीं, बल्कि अपराधियों के लिए बने क्रूस के माध्यम से आई थी। अधिकांश लोगों की सर्वशक्तिमान परमेश्वर के देहधारण से ये अपेक्षाओं नहीं थीं—और फिर भी, ठीक वैसे ही जैसे जब ज्योतिषी यीशु को सबसे पहले महल में खोजने गए (मत्ती 2:1-3), हम भी कई बार उसे गलत स्थानों में खोजने लगते हैं। जब ऐसा होता है, तो हम भी “नाओमी” बनने के बजाय “मारा” बनने का खतरा उठाते हैं (रूत 1:20)—हम सन्तोष का आनन्द लेने के बजाय कटुता अनुभव कर सकते हैं।

परमेश्वर की अनन्त योजनाएँ साधारण स्थानों में साधारण लोगों द्वारा साधारण कार्य करते हुए उनके साधारण जीवन के बीच प्रकट होती हैं। यदि आपका जीवन भी साधारण है, तो इससे आपको प्रोत्साहन मिलना चाहिए! हममें से बहुत कम लोगों का शायद ही इतिहास में कोई उल्लेख भी हो। चाहे आप एक साधारण माँ हों, जो अपने साधारण बच्चों का पालन-पोषण कर रही है, एक साधारण दादा हों, जो वही पुरानी कहानियाँ बार-बार सुना रहे हैं, या एक साधारण छात्र हों, जो अपने साधारण गृहकार्य और दैनिक गतिविधियों में व्यस्त हैं—आप चाहे जिस भी तरह के साधारण हों, परमेश्वर की महिमा आपके चारों ओर देखी जा सकती है। और परमेश्वर के अनुग्रह के द्वारा आपकी साधारण निष्ठा सुसमाचार के उद्देश्य के लिए असाधारण प्रभाव डाल सकती है।

जब आपको लगे कि आप कुछ खास नहीं कर रहे हैं—जब शैतान आपको इस झूठ पर विश्वास दिलाने की कोशिश करे कि आप कोई अन्तर नहीं ला सकते या आप परमेश्वर की योजना के बाहर हैं—तो इसे याद रखें: जब मानव उपलब्धियाँ, शब्द और ज्ञान विलीन हो जाएँगे, तब भी परमेश्वर आपके माध्यम से जो विश्वासयोग्यता, दया, सत्यनिष्ठा, प्रेम और कोमलता उत्पन्न करता है, वह पुरुषों और स्त्रियों के जीवन में आपकी कल्पना से कहीं अधिक प्रभाव डालेंगे। यही नाओमी की कहानी का और सम्पूर्ण इतिहास का आश्चर्यजनक तथ्य है—कि परमेश्वर की असाधारण महिमा साधारण बातों में कार्यरत रहती है। यह सत्य आपके दिन को देखने और उसे जीने के दृष्टिकोण को पूरी तरह बदल सकता है।

रूत 4:13-21

पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: नहूम; कुलुस्सियों 2 ◊

4 November : चिंतेची वास्तविक समस्या

Alethia4India
Alethia4India
4 November : चिंतेची वास्तविक समस्या
Loading
/

“जे रानातलें गवत आज आहे व उद्या भट्टीत पडते त्याला जर देव असा पोशाख घालतो, तर, अहो तुम्हीं अल्पविश्वासी, तो विशेषेकरूंन तुम्हांला पोशाख घालणार नाहीं काय?” (मत्तय 6:30).

येशू म्हणतो कीं आमचा अल्पविश्वास हा आमच्यां चिंतेचे मूळ आहे – आमचा पिता आम्हांला भविष्यांत जी कृपा पुरविणार असतो त्याविषयी “अल्पविश्वास”.

ह्याला आम्हीं कदाचित अशी प्रतिक्रिया देऊं: “ही सुवार्ता नाहीं! वस्तुतः, हे ऐकून फार निराशा होते कीं जो विचार मी केला होता तो चिंताग्रस्त स्वभावाशी असलेला संघर्ष मात्र होता तो खरे पाहता मी परमेश्वरावर विश्वास ठेवतो कीं नाहीं याविषयीच एक अतिशय गंभीर संघर्ष होता.”

या निराशेला मीं आधी होय, हें खरे आहे असें म्हणतो, पण नंतर असहमत होतो.

समजां तुमच्यां पोटात दुखत असेल आणि तुम्हीं सर्व प्रकारची औषधे आणि आहार घेत असाल, पण कांहीं फायदा होत नाहीं. आणि मग समजा कीं तुमचा डॉक्टर तुम्हांला तुमच्यां नियमित भेटीनंतर सांगतो, कीं तुमच्यां लहान आतड्यात कँसर झाला आहे. आता, तुम्हीं तिला चांगली बातमी म्हणणार का? तुम्हीं ठामपणें म्हणाल, नाहीं! आणि मला ते मान्य आहे.

पण आता मी तुम्हांला हाच प्रश्न दुसऱ्या पद्धतीनें विचारतो: डॉक्टरांनी कँसरचा उपचार करता येईल अशा वेंळी त्याचे निदान केलें, आणि खरोखरच त्यावर यशस्वीपणें इलाज केला जाऊ शकतो याचा तुम्हांला आनंद झाला का? तुम्हीं म्हणाल, होय, मला खूप आनंद झाला कीं डॉक्टरांना खरी समस्या आढळून आली. मीं तेहि मान्य करतो.

तर मग, ही बातमी कीं तुम्हांला कॅन्सर आहे चांगली बातमी नाहीं. परंतु, दुसऱ्या अर्थानें पाहता, ही चांगली बातमी आहे, कारण तुमच्यांत खरी व्याधी काय आहे हे जाणून घेणें कधीही योग्यच, विशेषतः जेव्हां तुमच्यां त्यां व्याधीचा इलाज यशस्वीरित्या करता येऊ शकतो.

म्हणजें (येशूनें म्हटल्याप्रमाणें) आमच्या चिंतेमागील खरी समस्या ही परमेश्वराच्या भावी कृपेविषयी त्यानें दिलेल्यां अभिवचनांवर आमचा असलेला “अल्प विश्वास” आहे हे आम्हीं शिकतो. आणि जेव्हां आपण आक्रोश करतो, “प्रभूजी, माझा विश्वास आहे, माझा अविश्वास घालवून टाका!” (मार्क 9:24) – तेव्हां तो अद्भुतरित्या आमचे रोग बरे करण्यास समर्थ आहे.

3 नवम्बर : प्रतिबद्धता की वाचा

Alethia4India
Alethia4India
3 नवम्बर : प्रतिबद्धता की वाचा
Loading
/

“तब फाटक के पास जितने लोग थे उन्होंने और वृद्ध लोगों ने कहा, ‘हम साक्षी हैं …’ तब बोअज़ ने रूत से विवाह कर लिया, और वह उसकी पत्नी हो गई; और जब वह उसके पास गया तब यहोवा की दया से उस को गर्भ रहा, और उसके एक बेटा उत्पन्न हुआ।” रूत 4:11, 13

बाइबल के समय में नगर का फाटक स्थानीय गतिविधियों का मुख्य केन्द्र हुआ करता था। यह एक बाज़ार और नागरिक केन्द्र के रूप में कार्य करता था, जहाँ व्यापारी, भिखारी, नगर के अधिकारी, धार्मिक नेता, और अन्य बहुत से लोग व्यवसाय करने, कानून लागू करने, दान प्राप्त करने, खरीददारी करने और मेल-जोल बढ़ाने के लिए इकट्ठा होते थे। यही वह भीड़-भाड़ वाली जगह थी जहाँ बोअज़ गया ताकि वह सार्वजनिक रूप से रूत से विवाह करने की अपनी प्रतिबद्धता की घोषणा कर सके। उनका विवाह हमें बाइबल में विवाह की परिभाषा पर विचार करने के लिए प्रेरित करता है।

पहला, बाइबल आधारित विवाह में प्रतिबद्ध प्रेम होना चाहिए। ऐसा प्रेम केवल भावनाओं या परिस्थितियों पर आधारित नहीं होता, बल्कि जीवन के सभी उतार-चढ़ाव और स्थितियों में गहराई से स्थिर और शर्त रहित बना रहता है। यही प्रतिबद्धता आज भी विवाह समारोहों में लिए जाने वाले वचनों में दिखाई देती है—अच्छे या बुरे समय में, धन-सम्पत्ति या गरीबी में, स्वास्थ्य या बीमारी में, यह प्रेम स्थिर बना रहता है।

दूसरा, विवाह में प्रतिबद्ध गवाह होने चाहिए। जब एक पुरुष और एक स्त्री विवाह करते हैं, तो वे प्रेम और देखभाल की वाचा के अधीन एक नई इकाई बनते हैं। हम त्रुटिपूर्ण मनुष्य हैं, और हमें इस प्रतिबद्धता में दृढ़ बने रहने के लिए दूसरों की सहायता की आवश्यकता होती है। इसलिए विवाह समारोह में कम से कम एक गवाह आवश्यक होता है, जो इस नए सम्बन्ध, एक नए परिवार की स्थापना की पुष्टि कर सके। बोअज़ ने नगर फाटक पर इसी सिद्धान्त को अपनाया, जहाँ नगर के बुजुर्गों और लोगों की भीड़ ने रूत से विवाह करने की उसकी प्रतिज्ञा को सुना और प्रमाणित किया। फिर वे उसे उसके वचन पर स्थिर रहने के लिए प्रेरित कर सकते थे।

तीसरा, भक्तिपूर्ण विवाह में प्रतिबद्ध सहभागिता होनी चाहिए। परमेश्वर ने विवाह को इस प्रकार स्थापित किया कि यह उस आत्मिक निकटता को प्रतिबिम्बित करे, जो हम उसकी भावी दुल्हन के रूप में उसके साथ अनुभव करते हैं। पति और पत्नी के बीच का व्यक्तिगत सम्बन्ध विवाह में गहराता जाना चाहिए, जिसमें अन्य पहलुओं के साथ-साथ शारीरिक एकता भी शामिल है। ऐसी शारीरिक निकटता केवल एक प्रतिबद्ध, प्रेमपूर्ण, और सार्वजनिक रूप से मान्यता प्राप्त सम्बन्ध के भीतर ही होनी चाहिए। यदि विवाह के शारीरिक सम्बन्ध को भावनात्मक, मानसिक, आध्यात्मिक और बौद्धिक पहलुओं से अलग कर दिया जाए, तो यह परमेश्वर की योजना का अनादर होगा।

आज के संसार में प्रेम और विवाह की जो धारणा प्रचलित है, वह एक निष्ठावान, प्रतिबद्ध, एकनिष्ठ, और विवाह के परमेश्वर-निर्धारित विषमलैंगिक स्वरूप की सुन्दरता और आशीष की तुलना में फीकी पड़ जाती है। जब हम इस वाचा के प्रत्येक पहलू को व्यावहारिक जीवन में देखते हैं, तो हमें अपने स्वर्गिक दूल्हे—मसीह—की अपनी कलीसिया के प्रति प्रतिबद्धता की झलक मिलती है (इफिसियों 5:22-27)। मसीही विवाह स्वयं में एक आशीष है और उस महिमामयी वास्तविकता का प्रतिबिम्ब है। पृथ्वी पर कोई भी विवाह पूर्ण नहीं होता, परन्तु विश्वासियों का विवाह उस दिव्य विवाह का एक उदाहरण बनने का प्रयास करता है। इसलिए जब आप विवाह के बारे में सोचें, उसके विषय में बात करें, उसके लिए प्रार्थना करें और वैवाहिक जीवन में व्यवहार करें—फिर चाहे यह वैवाहिक जीवन आपका अपना हो या आपके आस-पास के किसी अन्य व्यक्ति का—तो बाइबल की परिभाषा को बनाए रखें और उसे अपने जीवन में लागू करें।

श्रेष्ठगीत 6:4-12

◊ पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: 2 शमूएल 23–24; कुलुस्सियों 1

3 November : दु:खें सोसण्यामागचा हेतूं

Alethia4India
Alethia4India
3 November : दु:खें सोसण्यामागचा हेतूं
Loading
/

“ख्रिस्ताप्रीत्यर्थ विटंबना सोसणें’ ही मिसर देशातील धनसंपत्तीपेक्षा अधिक मोठी संपत्ती आहे असें त्यानें गणलें; कारण त्याची दृष्टी प्रतिफळावर होती.” (इब्री 11:26).

आपण दु:खें सोसण्याचा निर्णय घेतो ते केवळ आम्हांस ते सोसावयांस सांगितलें आहे म्हणून नाहीं, परंतु जो आम्हांस ते सोसण्यांस सांगतो तो स्वत: त्यांचे वर्णन सार्वकालिक आनंदाचा मार्ग म्हणून करतो.

आपल्या कर्तव्याप्रत असलेंल्या निष्ठेचे सामर्थ्य प्रगट करण्यासाठीं नव्हे, किंवा आपल्या नैतिक निर्धाराचा जोम प्रकट करण्यासाठीं नव्हे, अथवा दुःख सहन करण्याची आमची पराकाष्ठा सिद्ध करण्यासाठीं नव्हे, तर बालकासारख्या विश्वासात, त्याच्या सर्वसमाधानकारक अभिवचनांची अमर्याद बहुमूल्यता प्रगट करण्यासाठीं तो आम्हास क्लेशांमध्ये आज्ञा पाळणारे होण्यासाठीं पाचारण करतो – त्या सर्वांचे प्रतिफळ म्हणजें त्याच्या स्वतःच्या गौरवाची सर्व-समाधानकारक थोरवी आणि सुंदरता.

”पापाचे क्षणिक सुख भोगणें ह्यापेक्षा देवाच्या लोकांबरोबर दुःख सोसणें हे त्यानें (मोशेनें) पसंत करूंन घेतलें…. कारण त्याची दृष्टी प्रतिफळावर होती.” (इब्री 11:25-26). म्हणून, त्याच्या आज्ञापालनानें प्रतिफळास गौरवान्वित केलें – ख्रिस्ताठायीं त्याच्याकरिता परमेश्वर जे कांहीं आहे ते सर्व – केवळ दुःख सहन करण्याचा निर्धार नव्हे.

ख्रिस्ती पूर्णानंदाचा (मुळांत पायपर यांचा विलासवाद म्हणजें आत्म-सुख हेच अंतिम उद्दिष्ट असा सिद्धांत) हा सारांश आहे. विटंबना सोसत आनंदाचा पाठलाग करीत असतांना, आमच्या आनंदाचा जो स्रोत त्याच्या सर्वसमाधानकारक मूल्याची आम्हीं वाखाणणी करतो. आमच्या दुःखाच्या बोगद्याच्या शेवटी उज्वल प्रकाश म्हणून साक्षांत परमेश्वराचे तेज दिसून येते.

क्लेशात आमच्या आनंदाचे लक्ष्य आणि आधार तोच आहे असें जर आम्हीं सांगत नाहीं, तर आमच्या क्लेशाचा अर्थ नाहींसा होईल. अर्थ हा आहे : परमेश्वर हा स्वतः आमचा लाभ आहे. परमेश्वर हांच लाभ आहे. परमेश्वर स्वतः लाभ आहे. आम्हीं जर विटंबना सोसतो त्यामागचा हेतू हाच आहे.

मानव-अस्तित्वाचे मुख्य ध्येय परमेश्वराचा गौरव करणें हा आहे. इतर कुठल्याही गोष्टीच्या तुलनेंत ते क्लेशाबाबत खरे आहे कीं जेव्हां आम्हीं परमेश्वराठायीं सर्वाधिक समाधानी असतो तेव्हां तो आमच्याठायीं सर्वाधिक गौरव पावतो.

2 नवम्बर : सही करने का संकल्प

Alethia4India
Alethia4India
2 नवम्बर : सही करने का संकल्प
Loading
/

“तब बोअज़ ने वृद्ध लोगों और सब लोगों से कहा, ‘तुम आज इस बात के साक्षी हो कि जो कुछ एलीमेलेक का और जो कुछ किल्योन और महलोन का था, वह सब मैं नाओमी के हाथ से मोल लेता हूँ। फिर महलोन की स्त्री रूत मोआबिन को भी मैं अपनी पत्नी करने के लिए इस विचार से मोल लेता हूँ।’” रूत 4:9-10

हर दिन जब हम विभिन्न परिस्थितियों का सामना करते हैं, तो हमें स्वयं से यह प्रश्न पूछना चाहिए: “क्या करना सही है?”

यही बात बोअज़ ने तब सोची जब उसने नगर के फाटक पर जाने का निश्चय किया। वह रूत से विवाह करना चाहता था और निस्तारक-कुटुम्बी के रूप में उसकी रक्षा और देखभाल करना चाहता था। लेकिन वह जानता था कि रूत का एक अन्य सम्बन्धी उसके स्वयं से अधिक उसका निकट-सम्बन्धी था, जिसे इस भूमिका को स्वीकार करने का पहला अधिकार प्राप्त था। बोअज़ एक ईमानदार व्यक्ति था, जो केवल भावनाओं में बहकर कोई निर्णय नहीं लेना चाहता था, जब रूत ने उसे खलिहान में विवाह का प्रस्ताव दिया था। उसकी दृष्टि पूरी तरह इस बात पर केन्द्रित थी कि वह रूत को उचित रीति से अपनाए। बोअज़ ने अपनी प्रतिष्ठा से अधिक सही कार्य करने को प्राथमिकता दी। वह नगर के सबसे सार्वजनिक स्थान—नगर फाटक—पर गया ताकि वह एक परदेशी से विवाह कर सके, जो उसकी प्रतिष्ठा और विरासत को खतरे में डाल सकता था। अन्य निकट-सम्बन्धी इस जोखिम को उठाने के लिए तैयार नहीं था (रूत 4:6)। पवित्रशास्त्र में इस व्यक्ति का नाम तक नहीं दिया गया। यह हमारे लिए एक शिक्षा है: हमें स्वयं के लिए नाम बनाने और उसे सुरक्षित रखने का प्रयास नहीं करना चाहिए। दूसरों को हमारे बारे में बात करने और हमारी प्रशंसा करने दें। हमें केवल सही काम करने का प्रयास करना चाहिए।

बोअज़ के शब्दों से स्पष्ट होता है कि उसका एक प्रमुख उद्देश्य था: “मरे हुए का नाम उसके निज भाग पर स्थिर करूँ” (रूत 4:10)। अर्थात, उसने नाओमी के दिवंगत पति एलीमेलेक के नाम और परिवार की वंशावली को बनाए रखने के लिए यह कदम उठाया। यह निस्वार्थता का परिचायक है और प्रशंसनीय है। यदि बोअज़ केवल अपने स्वार्थ और इच्छाओं की चिन्ता करता, तो वह रूत को चुपचाप अपनी पत्नी बना सकता था। लेकिन उसने अपने दायित्व को पूरा किया और सार्वजनिक रूप से इस स्थिति को स्वीकार किया। उन दिनों में निस्तारक-कुटुम्बी की भूमिका को त्यागने और अपनाने वाले व्यक्ति इस काम को मुहरबन्द करने के लिए अपने जूतों का सार्वजनिक रूप से आदान-प्रदान करते थे (पद 7)। यह आदान-प्रदान एक बड़ी सच्चाई का, अर्थात रूत के लिए बोअज़ की प्रतिबद्धता, प्रेम और व्यक्तिगत बलिदान का प्रतीक था। इसी तरह क्रूस भी सार्वजनिक रूप से सबके सामने खड़ा है, जहाँ हम हमारे लिए मसीह की प्रतिबद्धता, प्रेम और बलिदान को देखते हैं। बोअज़ को रूत से विवाह करने के लिए आर्थिक बलिदान देना पड़ा। हमें छुड़ाने और अपनी प्रिय दुल्हन बनाने के लिए मसीह को अपने स्वयं के जीवन का बलिदान देना पड़ा।

बोअज़ और मसीह के बलिदानों ने भविष्य और आशा प्रदान करने वाली महान आशिषों और विरासतों को उत्पन्न किया, जिनमें से एक, एक मोआबिन युवती और उसकी सास के लिए थी और दूसरी सम्पूर्ण मानवता के लिए थी। बोअज़ के सत्यनिष्ठ प्रयासों के परिणामस्वरूप एक ऐसा विवाह हुआ, जिसने इतिहास में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई, क्योंकि इस वंश से हमारे उद्धारकर्ता का जन्म हुआ (मत्ती 1:5)। और मसीह के बलिदान के कारण अब हम उस दिन की प्रतीक्षा करते हैं जब हम महिमा में खड़े होंगे, उसका मुख देखेंगे, और सदा के लिए उसके नाम की स्तुति करेंगे। हमारा दूल्हा आया और हमें बड़ी कीमत चुकाकर उचित रूप से अपना बना लिया।

कल्पना करें कि जब रूत ने सुना कि बोअज़ ने अपने जूते दे दिए हैं और विवाह की पुष्टि कर दी है, तो उसे कितनी प्रसन्नता हुई होगी। हमें भी वैसा ही आनन्द अनुभव करना चाहिए जब हम क्रूस को देखते हैं और जानते हैं कि हम मसीह के हो चुके हैं। और बोअज़ के उदाहरण से हमें अपने दैनिक निर्णयों और संघर्षों में यह पूछना सीखना चाहिए: “क्या करना सही है?”

रूत 4:1-12

पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: 2 शमूएल 21–22; 3 यूहन्ना ◊

2 November : छळवणूकित आनंद करणें

Alethia4India
Alethia4India
2 November : छळवणूकित आनंद करणें
Loading
/

“माझ्यामुळें जेव्हां लोक तुमची निंदा व छळ करतील आणि तुमच्यांविरुद्ध सर्व प्रकारचे वाईट लबाडीनें बोलतील तेव्हां तुम्हीं धन्य. आनंद करा, उल्लास करा, कारण स्वर्गात तुमचे प्रतिफळ मोठे आहे; कारण तुमच्यांपूर्वी जे संदेष्टे होऊन गेलें त्यांचा त्यांनी तसाच छळ केला.” (मत्तय 5:11-12)

ख्रिस्ती पूर्णानंद (मुळांत पायपर यांचा विलासवाद म्हणजें आत्म-सुख हेच अंतिम उद्दिष्ट असा सिद्धांत) म्हणतो कीं ख्रिस्ती या नात्यानें आमची छळवणूक होत असतां आनंद करण्याचे निरनिराळे मार्ग आहेत. त्या सर्वांचे अनुसरण परमेश्वराच्या अमर्याद व पूर्ण करणाऱ्या अशा कृपेची अभिव्यक्ती म्हणून करावयाचा असतो.

छळवणूक होत असतां आनंद करण्याचा एक मार्ग म्हणजें आपलें पुनरुत्थान होईल त्यावेळी आपल्याला प्राप्त होणाऱ्या प्रतिफळाच्या थोरवीवर आपली मनें स्थिर करणें हा होय. त्या वैभवाकडें दृष्टि लावण्याचा परिणाम हा आहे कीं जे गौरव प्रकट होणार आहे त्या तुलनेंत सांप्रत काळाची दुःखे नगण्य वाटतांत : “कारण आपल्यासाठीं जो गौरव प्रकट होणार आहे त्याच्यापुढे सांप्रत काळाची दुःखे कांहींच नाहींत असें मी मानतों.” (रोमकरांस. 8:18; 2 करिंथ 4:16-18 बरोबर तुलना करा). दुःखे सहन करण्यायोग्य व्हावें म्हणून, आपल्याला मिळणाऱ्या प्रतिफळाकडे नजरां ठेऊन आनंद केल्यानें देखील प्रीति करणें शक्य होईल.

“तुम्हीं तर आपल्या वैऱ्यांवर प्रीति करा, त्यांचे बरे करा, निराश न होता उसनें द्या, म्हणजें तुमचे प्रतिफळ मोठे होईल आणि तुम्हीं परात्पराचे पुत्र व्हाल” (लूक 6:35). गरीबांना औदार्याने वागवून घ्यां “म्हणजें तुम्हीं धन्य व्हाल, कारण तुमची फेड करण्यास त्यांच्याजवळ कांहीं नाहीं; तरी नीतिमानांच्या पुनरुत्थानासमयी तुमची फेड होईल” (लूक 14:14). या अभिवचनाद्वारें प्राप्त होणाऱ्या प्रतिफळाठायीं विश्वास जगिकतेची दोर तोडून आम्हांस प्रीतिचें श्रम करण्यासाठीं मुक्त करतो.

छळवणूक होत असतां आनंद करण्याचा दुसरा मार्ग हा आपल्याला दिलेल्यां आशेच्या खात्रीवर क्लेशांचा जो परिणाम होतो त्यापासून येतो. छळवणूक होत असतां क्लेशांमध्ये आनंदाचे मूळ हे केवळ पुनरुत्थान आणि प्रतिफळ याबाबतींत असलेल्या आशेमध्येंच नाहीं तर ती आशा आणखी सखोल बनविण्यासाठीं दुःख ज्याप्रकारे कार्य करते त्यातहि त्यां आनंदाचे मूळ आहे.

उदाहरणार्थ, पौल म्हणतो, “इतकेच नाहीं, तर संकटांचाही अभिमान बाळगतो, कारण आपल्याला ठाऊक आहे कीं, संकटानें धीर, धीरानें शील व शीलानें आशा निर्माण होते.” (रोम 5:3-4).

दुसऱ्या शब्दांत म्हणजें, पौलाच्या आनंदाचे मूळ केवळ त्याला मिळणाऱ्या महान प्रतिफळात नाहीं, तर क्लेश व दु:खें यांमुळे जे परिणाम समोर येतांत त्यातही आहे जें त्या प्रतिफळाच्या आशेला बळकट बनवितांत. संकटानें धीर उत्पन्न होतो, आणि धीर ही जाणीव उत्पन्न करतो कीं आपला विश्वास खरा आणि अस्सल आहे, आणि यामुळें आपली ही आशा कीं आपण खरोखर ख्रिस्तास प्राप्त करूं आणखी बळकट होते.

तर मग, आपण प्रतिफळाच्या वैभवावर अथवा क्लेशाच्या शुद्ध करणाऱ्या परिणामांवर लक्ष केंद्रित करीत असलो तरी, छळवणूक होत असतां येणाऱ्या क्लेशांतहि आपला आनंद टिकून राहावा हा देवाचा उद्देश आहे.

1 नवम्बर : एक निस्तारक-कुटुम्बी

Alethia4India
Alethia4India
1 नवम्बर : एक निस्तारक-कुटुम्बी
Loading
/

“मैं तो तेरी दासी रूत हूँ; तू अपनी दासी को अपनी चद्दर ओढ़ा दे, क्योंकि तू हमारी भूमि छुड़ाने वाला कुटुम्बी है।” रूत 3:9

यह एक सत्य सब कुछ बदल देता है: आपके पास एक निस्तारक-कुटुम्बी है।

रूत के दूसरे अध्याय का अन्त नाओमी के इस रहस्योद्‌घाटन के साथ होता है कि बोअज़ एक दूर का रिश्तेदार और “एक कुटुम्बी” है (रूत 2:20)। रूत के घटनाक्रम से बहुत पहले परमेश्वर ने ऐसी प्रथाएँ स्थापित की थीं, जो न केवल रूत पर बल्कि पूरे इस्राएल पर और उद्धार के इतिहास में परमेश्वर के सभी लोगों पर प्रभाव डालने वाली थीं।

हमें पुराने नियम की दो महत्त्वपूर्ण प्रथाओं को समझने की आवश्यकता है, ताकि हम इस घटनाक्रम की पृष्ठभूमि और इसके आनन्द की सराहना कर सकें। ये दो प्रथाएँ परिवार की विधवा का पुनर्विवाह और गोएल हैं। परिवार की विधवा के पुनर्विवाह की प्रथा इस्राएलियों की पुनर्विवाह परम्परा को नियन्त्रित करती थी, ताकि यदि किसी पुरुष की मृत्यु हो जाए, तो उसका नाम और वंश उसकी मृत्यु के साथ समाप्त न हो जाए या अन्य लोगों की इच्छाओं पर निर्भर न रहे (व्यवस्थाविवरण 25:5-10)। दूसरी ओर, गोएल एक इब्रानी क्रिया है जिसका अर्थ है “पुनः प्राप्त करना या छुड़ाना” और सामान्यतः इसका अनुवाद “निस्तारक-कुटुम्बी” के रूप में किया जाता है। मूसा का व्यवस्था-विधान लैव्यव्यवस्था 25 में इस जिम्मेदारी को स्पष्ट रूप से परिभाषित करता है, जहाँ एक रिश्तेदार को यह अधिकार और दायित्व दिया जाता है कि वह कठिनाई में पड़े अपने परिवार के सदस्य की देखभाल और सहायता करे। निस्तारक-कुटुम्बी को अपने रिश्तेदार की भूमि को सुरक्षित करने और उसका सहारा बनने के लिए सभी आवश्यक प्रयास करने होते थे।

बोअज़ ने इन दोनों परम्पराओं का स्वेच्छा से पालन किया और कठिन परिस्थिति में पड़ी हुई बेसहारा नाओमी व रूत की सहायता की। बोअज़ न केवल यीशु के पूर्वजों में से एक था, बल्कि इस कृत्य के द्वारा उसने हमारे निस्तारक-कुटुम्बी के रूप में मसीह के आने की भविष्यवाणी भी की।

जैसे रूत ने पूर्णतः असहाय अवस्था में बोअज़ की दया पर निर्भर होकर स्वयं को उसके चरणों में डाल दिया, वैसे ही हम भी मसीह की करुणा की खोज में स्वयं को मसीह के चरणों में डालते हैं। और जैसे बोअज़ ने रूत के साथ व्यवहार किया, वैसे ही मसीह हर उस पापी के साथ व्यवहार करता है जो पश्चाताप के साथ उसके पास आता है। वह उन्हें वाचा के लहू से ढक देता है, जिसके द्वारा वह हमें अपनी छत्रछाया में शान्ति, सुरक्षा और सन्तोष प्रदान करता है (भजन 91:4)। वह हमारे दुखों में हमें शान्ति देता है, हमारे भय को दूर करता है और हमारे आँसुओं को पोंछता है। रूत एक निर्धन परदेशी के रूप में बोअज़ के पास आई और उसकी आशिषों से समृद्ध हो गई। हम आत्मिक निर्धनता में यीशु के पास आते हैं और उसके साथ उसके उत्तराधिकारी बन जाते हैं (रोमियों 8:17)। जैसे बोअज़ ने रूत को लेकर उसे अपनी दुल्हन बना लिया, वैसे ही मसीह हमें लेकर अपनी दुल्हन बना लेता है (प्रकाशितवाक्य 19:7-8)।

बाइबल में ऐसे अनेक उदाहरण मिलते हैं, जहाँ परमेश्वर अपने लोगों की आवश्यकताओं में उनकी देखभाल और रक्षा करता है, इससे पहले कि वे स्वयं अपनी आवश्यकताओं को समझें। इस्राएल में रूत के लिए और इतिहास भर में परमेश्वर के सभी लोगों के लिए परमेश्वर के उद्धार योजना न केवल निस्तारक-कुटुम्बी की भूमिका की स्थापना के समय से आई थी, बल्कि सृष्टि के प्रारम्भ से ही तैयार की गई थी (इफिसियों 1:3-7)।

आज निश्चिन्त रहें क्योंकि यीशु अपनी कलीसिया का दूल्हा और निस्तारक-कुटुम्बी है। निश्चिन्त रहें क्योंकि उसने आपके लिए आवश्यक सभी देखभाल और प्रबन्ध करने का, तथा आपको सुरक्षित रूप से प्रतिज्ञा किए हुए शाश्वत देश में पहुँचाने का दायित्व उठाया है। निश्चिन्त रहें क्योंकि चाहे कोई भी आन्तरिक या बाहरी संकट आपको घेर ले, आप उसकी छत्रछाया में सुरक्षित हैं।

भजन 57

◊ पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: 2 शमूएल 19–20; 2 यूहन्ना

1 November : आमच्याठायीं ख्रिस्ताचे क्लेश

Alethia4India
Alethia4India
1 November : आमच्याठायीं ख्रिस्ताचे क्लेश
Loading
/

तुमच्यासाठीं जी माझी दुःखे त्यांमध्यें मी आनंद करतो आणि ख्रिस्ताच्या क्लेशांतलें जे उरलें आहे ते मी आपल्या देहानें, त्याचे शरीर जी मंडळी तिच्यासाठीं भरून काढत आहे. (कलस्सै 1:24)

ख्रिस्तानें पापी लोकांसाठीं क्लेश व मरण सोसून जगासाठीं प्रेमार्पण तयार केलें आहे. ते एक सिद्ध-साध्य बलिदान आहे. त्याद्वारें त्यानें त्याच्या सर्व लोकांच्या सर्व पातकांसाठीं पूर्ण खंडणी भरलीं. हे दान इतके उत्तम आहें कीं त्यांत कांहींही जोडता येऊ शकत नाहीं. त्यात कसलीही उणीव नाहीं – फक्त एक गोष्ट सोडून, स्वतः ख्रिस्ताद्वारें जगातील राष्ट्रांसमक्ष वैयक्तिक प्रस्तुती.

ही उणीव भरून काढण्यासाठीं परमेश्वराचा उपाय हा कीं तो ख्रिस्ताच्या लोकांना (पौलासारखे लोक) जगासमोर ख्रिस्ताच्या क्लेशांचे वैयक्तिक प्रस्तुतीकरण करण्यासाठीं पाचारण करतो. हे क्लेश भोगून, आपण “ख्रिस्ताच्या क्लेशांत जी उणीव आहे ती भरून काढतो.” देवानें त्यां क्लेशांना ज्यां उद्देशाने नेमिलें होते तो उद्देश आपण पूर्ण करतो, म्हणजेच, ज्यां लोकांना ते देवाच्या दृष्टीनें किती असीम मौल्यवान आहेत हे समजत नाहीं अशा लोकांसमक्ष ख्रिस्ताच्या क्लेशांचे वैयक्तिक सादरीकरण.

परंतु कलस्सै. 1:24 बाबत सर्वात अद्भुत गोष्ट म्हणजें याचे प्रदर्शन कीं पौल ख्रिस्ताच्या क्लेशांत असलेलीं उणीव कशी भरून काढतो.

तो म्हणतो कीं तो आपल्या स्वतःच्या क्लेशानें ख्रिस्ताचे क्लेश भरून काढतो. तर मग, याचा अर्थ हा आहे कीं, पौल ज्यांना ख्रिस्तासाठीं जिंकण्याचा प्रयत्न करत आहे त्यांच्यासाठीं तो स्वतः दुःख सोसून ख्रिस्ताचे क्लेश प्रदर्शित करतो. म्हणजें त्याच्या क्लेशात त्यांना ख्रिस्ताचे क्लेश दिसलें पाहिजेत.

याचा थक्क करणारा अंतिम निष्कर्ष हा : ख्रिस्ताचे क्लेश हें त्याच्या लोकांच्या क्लेशांद्वारें जगापुढे मांडावे हा देवाचा हेतू आहे.

ख्रिस्ताचे शरीर जी मंडळी तिच्यासाठीं परमेश्वराचा हेतू खरोखर हा आहे कीं त्यानें अनुभवलेंल्या कांहीं क्लेशांचा अनुभव तिनें  सुद्धा घ्यावा यासाठीं कीं जेव्हां आपण जीवनाचा मार्ग म्हणून वधस्तंभाची घोषणा करूं, तेव्हां लोकांनी आपल्यामध्यें वधस्तंभाच्या खुणा पाहाव्यांत आणि आम्हांद्वारें त्यांस वधस्तंभाच्या प्रीतिची जाणीव व्हावीं.

31 अक्तूबर : प्रतीक्षा कक्ष से बाहर

Alethia4India
Alethia4India
31 अक्तूबर : प्रतीक्षा कक्ष से बाहर
Loading
/

“तब [रूत] चुपचाप गई, और [बोअज़ के] पाँव उघाड़ के लेट गई। आधी रात को वह पुरुष चौंक पड़ा, और आगे की ओर झुककर क्या पाया, कि उसके पाँवों के पास कोई स्त्री लेटी है!” रूत 3:7-8

मसीही जीवन आरामदायक क्षेत्र में नहीं जीया जाता।

रूत 3 में हम पाते हैं कि रूत ने बड़ा जोखिम उठाया जब वह बोअज़ के पास यह अनुरोध करने गई कि वह उसे अपनी पत्नी के रूप में अपनाए। वह, एक अकेली स्त्री, आधी रात को एक खलिहान में गई जहाँ केवल पुरुष थे, जो अभी-अभी फसल की कटनी के पूरा होने का उत्सव मना कर हटे थे। जब बोअज़ सो गया, तो वह अन्धेरे की आड़ में उसके पास गई और उसके पाँवों पर से चादर हटाई। यदि उसने कोई गलती की होती या पकड़ी गई होती, तो कहना मुश्किल है कि उन पुरुषों ने उसके साथ क्या किया होता या लोग उसकी मंशा के बारे में क्या कहते।

ये घटनाएँ हमारी 21वीं सदी की दृष्टि से अजीब लगती हैं, लेकिन रूत के असामान्य कार्य परमेश्वर की देखभाल और सुरक्षा में उसके सच्चे विश्वास को दर्शाते हैं। परमेश्वर ने अपने व्यवस्था-विधान में यह निर्धारित किया था कि बोअज़ एक निस्तारक-कुटुम्बी के रूप में—एक रक्षक और पालक के रूप में—रूत की सहायता कर सकता है। परमेश्वर ने अपने प्रावधान के अनुसार रूत को बोअज़ के खेत में पहुँचाया, जहाँ उसने रूत पर अनुग्रह किया। रूत की कहानी बार-बार यह दिखाती है कि परमेश्वर कैसे अपने लोगों की भलाई और अपनी महिमा के लिए सभी अनापेक्षित परिस्थितियों पर प्रभुता करता है।

रूत की तरह, हमें भी कभी-कभी जीवन में ऐसे अवसरों का सामना करना पड़ता है, जब हम अपने अगले कदम से आगे कुछ नहीं देख सकते। हममें से अधिकांश लोग तब तक प्रतीक्षा कक्ष में रहना पसन्द करते हैं, जब तक कि सारी बातें स्पष्ट और ज्ञात न हो जाएँ। हम सुरक्षित महसूस करना चाहते हैं और साथ ही चाहते हैं कि सब कुछ हमारे नियन्त्रण में रहे। लेकिन यदि हम तब तक कभी आगे नहीं बढ़ते जब तक हम ऐसा महसूस न करें, तो हमारा जीवन आध्यात्मिक प्रगति की बहुत कम गवाही देगा और परमेश्वर के अद्‌भुत कार्यों का बहुत कम साक्षी होगा। गलत दिशा में जाने का डर हमें आगे बढ़ने से पूरी तरह रोक देता है।

जब हम अपने अगले कदम से आगे नहीं देख सकते या जीवन में अनिश्चित समय आता है—और ऐसा समय आएगा!—तो हमें परमेश्वर पर विश्वास करना होगा और उसके वचन की सच्चाई के आधार पर कार्य करना होगा और उसके आत्मा की अगुवाई में भरोसा करना होगा। रूत की योजना न तो सुरक्षित थी और न ही निश्चित, लेकिन उसने आगे बढ़ने का निर्णय लिया क्योंकि वह उस परमेश्वर पर भरोसा करती थी, जिसने बार-बार अपनी विश्वासयोग्यता प्रमाणित की थी।

क्या आपको इस प्रकार सोचना आरम्भ करने की आवश्यकता है? क्या आपको अपने आराम क्षेत्र की सीमाओं से ऊपर और आगे देखना की आवश्यकता है, जहाँ परमेश्वर आपको बुला रहा है? यदि रूत विश्वास और आज्ञाकारिता से प्रेरित थी, तो आप किससे प्रेरित होते हैं? इस क्षण आपके जीवन में ऐसा क्या है, जो विश्वास को दर्शाता है? हो सकता है कि आपको कोई निर्णय लेना हो, कहीं जाना हो, कोई प्रयास करना हो, या कोई बातचीत करनी हो, जिसके सभी परिणाम आपको ज्ञात न हों, और आप केवल इतना कह सकते हैं, “मुझे बिल्कुल नहीं पता कि यह कैसे होगा, लेकिन यही वह है जिसके लिए परमेश्वर मुझे बुला रहा है।”

इन परिस्थितियों में परमेश्वर का वचन आपको बुद्धि का उपयोग करने और फिर विश्वास में एक-एक कदम करके आगे बढ़ने के लिए बुलाता है, उस पर भरोसा करते हुए जिसने आपके लिए प्राण दिए और जिसने यह प्रतिज्ञा की है, “मैं जगत के अन्त तक सदा तुम्हारे संग हूँ” (मत्ती 28:20)। अपने जीवन को अपने आराम क्षेत्र की सुरक्षा में नहीं, बल्कि परमेश्वर के सम्प्रभु हाथों में सौंप दें।

रूत 3

पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: 2 शमूएल 16–18; 1 यूहन्ना 5 ◊

31 October : दुःखाचे धर्म-विद्यालय

Alethia4India
Alethia4India
31 October : दुःखाचे धर्म-विद्यालय
Loading
/

 “माझी कृपा तुला पुरेशी आहे; कारण अशक्तपणातच माझी शक्ती पूर्णतेस येते.” (2 करिंथ 12:9)

ख्रिस्ती म्हणून आम्हांवर जी सर्व नाना प्रकारची संकटें व दुःखें येतांत त्यांमागे देवाचा सार्वत्रिक उद्देश हा आहे : देवामध्यें प्रगतीशील समाधान आणि स्वतःवर आणि जगावर ऱ्हासशील अवलंबन. “आयुष्यातील वास्तविक कठीण धडे मीं अगदी सहज आणि अनुकूल काळांतच शिकलो आहें” असे कोणी म्हटलेंलें मी कधीच ऐकले नाहीं.

उलट मी सशक्त पवित्र जनांना असे म्हणताना ऐकलें आहे कीं, “देवाच्या प्रीतिची खोली काय आहे ती जाणून घेण्यात आणि त्याच्याबरोबरचा माझा खोलवर सहवास यांत मी केलेंलीं प्रत्येक वैशिष्ट्यपूर्ण प्रगती ही दुःखांच्या माध्यमातूनच झालीं आहे.”

सर्वात मौल्यवान मोती म्हणजें ख्रिस्ताचा गौरव पाहणें.

अशाप्रकारे, पौल मोठ्या कळकळीने सांगतो कीं जेव्हां आपल्यावर दुःखें येतांत, तेव्हां ख्रिस्ताची पुरेशी जी कृपा ती पूर्णतेस येऊन तिचा गौरव वाढतो. जर आपण आपल्या सर्व संकटांत त्याच्यावर विसंबून राहतो, आणि आमचा जो “आशेचा हर्ष”  त्यांस तोच बळकट करतो, तर तो कृपा आणि सामर्थ्य यांचा संतोषकारक पुरवठा करणारा देव आहे हे प्रदर्शित केलें जाते.

जर आपण त्याला बळकटपणें धरून राहतो तर, “जेव्हा ह्या जगातील सर्व आशा सोडून जातांत,” तेव्हां आपण दाखवून देतो कीं आपण गमावलेल्या सर्व जगिक गोष्टींपेक्षा आपल्याला तो अधिक हवा हवासा आहे.

ख्रिस्ताने दुःख सहन करित असलेल्या ह्या प्रेषिताला म्हटलें, “माझी कृपा तुला पुरेशी आहे; कारण अशक्तपणातच माझी शक्ती पूर्णतेस येते.” म्हणून ख्रिस्ताच्या सामर्थ्याची छाया माझ्यावर राहावी म्हणून मी विशेषेकरून आपल्या अशक्तपणाची प्रौढी फार आनंदाने मिरवीन. ख्रिस्तासाठीं दुर्बलता, अपमान, अडचणी, पाठलाग, संकटे ह्यांत मला संतोष आहे; कारण जेव्हा मी अशक्त तेव्हाच मी सशक्त आहे” (2 करिंथ 12:9-10).

अशाप्रकारे देवानें दु:ख हे ख्रिस्ती विश्वासनार्यांनी स्वतःवर अवलंबून न राहता केवळ कृपेवर अवलंबून राहावें म्हणून केवळ नव्हें, तर त्या कृपेवर जोर द्यावा आणि तिला तेजस्वी स्वरूप द्यावें ह्या हेतूनें देखील त्यानें ते योजिलें आहे. विश्वास आम्हांमध्यें हीच कृति घडवून आणतो : तो ख्रिस्ताच्या भावी कृपेला उंचवितो.

देवामध्यें असलेल्या आपल्या जीवनाच्या खोल गोष्टींचा शोध आपल्याला दुःखातच लागतो आणि त्यांचा गौरव करतो.