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29 जनवरी : न्याय की तृप्ति हो चुकी

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29 जनवरी : न्याय की तृप्ति हो चुकी
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“क्योंकि बैरी होने की दशा में उसके पुत्र की मृत्यु के द्वारा हमारा मेल परमेश्वर के साथ हुआ, तो फिर मेल हो जाने पर उसके जीवन के कारण हम उद्धार क्यों न पाएँगे?”  रोमियों 5:10

परमेश्वर कोई दयालु दादा जी या जगत के सांता क्लॉज़ नहीं है, जो केवल उपहार देता है और जिसे किसी अन्य बात से कोई लेना-देना नहीं है। कदापि नहीं, वह पवित्र है और वह धर्मी है। इसलिए मनुष्य अपने पाप के कारण परमेश्वर की उपस्थिति से निकाले हुए लोग हैं। मानवता और हमारे सृष्टिकर्ता के बीच शत्रुता व्याप्त है। यह ऐसा सन्देश नहीं है, जिसे आप आमतौर पर सुनते हों और यह निश्चित रूप से बहुत सुहावना सन्देश भी नहीं है। किन्तु परमेश्वर उस शत्रुता को अनदेखा नहीं करता। न उसने कभी ऐसा किया है, और न ही वह कभी ऐसा करेगा। पाप के प्रति परमेश्वर के दृष्टिकोण के बारे में पवित्रशास्त्र बहुत स्पष्ट है। निस्सन्देह यह स्पष्ट करते हुए कि पाप हमें परमेश्वर से अलग कर देता है, पौलुस मनुष्यों को परमेश्वर के शत्रुओं के रूप में वर्णित करता है। पौलुस की भाषा भी भजनकार के शब्दों को प्रतिध्वनित करती है, जो परमेश्वर के बारे में कहता है कि “तुझे सब अनर्थकारियों से घृणा है” (भजन 5:5)। यह एक ऐसा सन्देश है, जो न तो पढ़ने में सुखद है और न ही पहली बार देखने पर समझने में सरल है।

तो फिर हमारी आशा कहाँ रही? हम परमेश्वर से मेल-मिलाप कैसे कर सकेंगे? ऐसा कैसे हो सकता है कि परमेश्वर पाप को तो उसके योग्य दण्ड दे और फिर भी पापियों को क्षमा कर दे?

हे हमारे परमेश्वर की प्रेमपूर्ण बुद्धि! जब सब कुछ पाप और शर्म से भरा था,

तब दूसरा आदम लड़ने और बचाने के लिए आ गया। [1]

यीशु ने क्रूस पर अपनी मृत्यु के द्वारा परमेश्वर के न्याय की तृप्ति कर दी है। पहले उसने परमेश्वर की व्यवस्था का पूरी तरह से पालन करने के हमारे दायित्व को और फिर इसमें विफल होने पर हमारे ऊपर पड़ने वाले बोझ को स्वयं अपने ऊपर धारण करने का निर्णय लिया। फिर उसने अपने पापरहित जीवन के द्वारा हमारे दायित्व को पूरा किया और क्रूस पर अपनी बलिदानी मृत्यु के द्वारा हमारे बोझ को निरस्त कर दिया। हमारे पापी अस्तित्व के प्रति परमेश्वर की घृणा के कारण जब परमेश्वर से हमारा अलगाव हुआ, तो उसने हमें त्यागा नहीं। इसके विपरीत, परमेश्वर आया और अपने पुत्र के माध्यम से हमारे साथ मेल-मिलाप किया। यदि यह सबसे अविश्वसनीय समाचार की तरह नहीं लगता है, तो हमने अपने पाप की गम्भीरता, या उसके न्याय की वास्तविकता, या हमारे उद्धार की परिमाण में से किसी एक बात को ठीक से नहीं समझा है।

हममें से वे लोग, जिन्हें मसीही बने हुए कुछ समय बीत चुका है, इसे अच्छी तरह जाने लेने के बाद चाहे इसका तिरस्कार न करें, तौभी आत्म-सन्तुष्टि के शिकार अवश्य हो सकते हैं। परन्तु मसीह की मृत्यु हमारे विश्वास का केवल प्रवेश बिन्दु ही नहीं है; यही हमारा विश्वास है। इसलिए आज उस दूसरे आदम, अर्थात सिद्ध मनुष्य को देखने के लिए ठहरें, जो वहाँ सफल हुआ जहाँ पहला आदम असफल हुआ था और जिसने शैतान को हराकर पतन के प्रभावों को उलट दिया है। यही सुसमाचार है। आपके पापों को क्षमा कर दिया गया है। आपको बचा लिया गया है। जहाँ आप पहले शत्रु थे, अब वहीं आप एक मित्र हैं। मसीह अब आपका भरोसा, आपकी शान्ति और आपका जीवन है।

मसीह में होने की वास्तविकता कोई सहज बात नहीं है; यह एक अद्‌भुत आश्वस्ति है। जब हम पाप के सामने शक्तिहीन थे, तब मसीह के सामर्थ्य ने हमें स्वतन्त्र किया। जब हम इतना बड़ा ऋण नहीं चुका सके, तब वह आप ही उसे लिए हुए क्रूस पर चढ़ गया (1 पतरस 2:24)। अब आप स्वर्गीय स्थानों में उसके साथ बैठे हैं। आज आपकी सबसे बड़ी सफलता भी आपको उससे ऊपर नहीं उठा सकेगी, जितना उसने आपको पहले ही उठा दिया है; न ही आपका सबसे बड़ा संघर्ष या असफलता आपको वहाँ से नीचे गिरा सकती है।

 कुलुस्सियों 1:15-23

29 जानेवारी : आम्हांला परत वळविलें

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29 जानेवारी : आम्हांला परत वळविलें
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हे परमेश्वरा, तू आम्हांला तुझ्याकडे परत वळव, म्हणजे आम्हीं वळू. (विलाप 5:21, माझे भाषांतर)

जोपर्यंत देव स्वतः आपल्या लोकांना त्यांचे पाप व अविश्वासामुळें उद्भवणाऱ्या धर्मत्यागापासून आपणांकडे परत वळवित नाहीं तोपर्यंत देवाच्या लोकांसाठीं कोणतीही आशा नाहीं.

विलापगीताचे पुस्तक हे बायबलमधील असे पुस्तक आहे जें सर्वात उदासीपूर्ण अशा विचारांनी भरलेलें पुस्तक आहे. देवानें स्वत: त्याच्या डोळ्याच्या बाहुलीला, म्हणजे यरुशलेमेला ओसाड केलें होते.

  • परमेश्वराने आपला क्रोध पूर्ण प्रकट केला आहे; त्यानें आपल्या संतप्त क्रोधाचा वर्षाव केला आहे त्यानें सीयोनेत अग्नी पेटवला आहे, त्या अग्नीने तिचे पाये भस्म केले आहेत. (विलाप 4:11)
  • दृष्टीस रम्य असे सर्व त्यानें मारून टाकले आहेत. (विलाप 2:4)
  • तिच्या बहुत अपराधांमुळे परमेश्वराने तिला पिडले आहे. (विलाप 1:5)

तर मग पुस्तकाचा शेवट कसा होतो?

यां पुस्तकाचा शेवट फक्त एकाच आशेनें होतो:

हे परमेश्वरा, तू आम्हांला तुझ्याकडे परत वळव, म्हणजे आम्हीं वळू. (विलाप 5:21)

माझ्यासाठीं हींच एकमेव आशा आहे – आणि तुमच्यासाठीं सुद्धा हींच एकमेव आशा आहे!

येशू पेत्राला म्हणाला, “शिमोना, शिमोना, पाहा, तुम्हांला गव्हासारखे चाळावे म्हणून सैतानाने मागणी केली; परंतु तुझा विश्वास ढळू नये म्हणून तुझ्यासाठी मी विनंती केली आहे; आणि तू वळलास म्हणजे तुझ्या भावांना स्थिर कर.” (लूक 22:31-32).

‘जर  तू वळलास तरच’  असें तो म्हणत नाहीं. पण तू वळलास म्हणजे. कारण मी तुझ्यासाठीं विनंती केलीं आहे, कीं तू परत वळावे. आणि जेव्हा तू वळतोस तेव्हा ही कृती माझ्या सार्वभौम कृपाचे कार्य असेल जी तुला धर्मत्यागाच्या कचाट्यातून परत घेऊन येईल.

ख्रिस्ती बंधू, हे तुमच्याबाबतींत सत्य आहे. विश्वासात टिकून राहण्यासाठीं हींच तुमची एकमेव आशा आहे. ह्याची प्रौढी मिरवा.

जो देवाच्या उजवीकडे आहे आणि जो आपल्यासाठी मध्यस्थीही करत आहे तो ख्रिस्त येशू आहे. (रोमकरांस 8:34)

तोच आम्हांला स्वतःकडे परत वळविल. म्हणून, “तुम्हांला पतनापासून राखण्यास जो समर्थ आहे…….अशा आपल्या उद्धारक एकाच ज्ञानी देवाला गौरव, महिमा, पराक्रम व अधिकार युगारंभापूर्वी, आता व युगानुयुग आहेत” (यहूदा 1:24-25). आमेन!

28 जनवरी : एक नाम से कहीं अधिक

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28 जनवरी : एक नाम से कहीं अधिक
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“परमेश्वर ने मूसा से कहा, ‘मैं जो हूँ सो हूँ।’ फिर उसने कहा, ‘तू इस्राएलियों से यह कहना, “जिसका नाम मैं हूँ है उसी ने मुझे तुम्हारे पास भेजा है।”’”  निर्गमन 3:14

कुछ संस्कृतियों में नामों के पीछे के अर्थ बहुत मायने नहीं रखते। कोई नाम हम इसलिए चुन लेते हैं, क्योंकि हमें उसका उच्चारण अच्छा लगता है, या क्योंकि वह हमारे परिवार के लिए अनमोल होता है। तथापि अन्य संस्कृतियों में नाम अपने आप में बहुत महत्त्व रखता है। उस नाम का अर्थ उस व्यक्ति के बारे में, जिसे वह नाम दिया गया है या उसे वह नाम देने वाले लोगों की आशा के बारे में कुछ स्थापित कर सकता है।

जब मूसा का जलती हुई झाड़ी में परमेश्वर से सामना हुआ, तो उसने पूछा, “जब मैं इस्राएलियों के पास जाकर उनसे कहूँ, ‘तुम्हारे पितरों के परमेश्वर ने मुझे तुम्हारे पास भेजा है,’ तब यदि वे मुझ से पूछें, ‘उसका क्या नाम है?’ तब मैं उनको क्या बताऊँ?”” (निर्गमन 3:13)। तब परमेश्वर ने मूसा को जो नाम बताया, वह है यहोवा (जिसका अनुवाद है “मैं जो हूँ सो हूँ”)। इसमें चार अक्षर हैं जो व्यंजन हैं और इसमें कोई स्वर नहीं है। यदि हम इसका सही उच्चारण करने का प्रयास करें, तो हम पाएँगे कि यह लगभग असम्भव है। यदि आप चाहें तो यह कह सकते हैं कि यह एक अवर्णनीय नाम है।

इस तरह उत्तर देने के द्वारा परमेश्वर क्या कर रहा था? मूसा इस्राएल के लोगों को और फिरौन को एक अधिकार वाला नाम देने का अनुरोध कर रहा था और परमेश्वर ने उसे वह नाम दिया जिसका उच्चारण ही नहीं किया जा सकता। ऐसा लगता है कि मानो परमेश्वर कह रहा था कि ऐसा कोई नाम नहीं है जो मेरे अस्तित्व को पूरी तरह से व्यक्त कर सके। इसलिए उनसे कहो कि मैं जो हूँ सो हूँने तुम्हें भेजा है। फिरौन से कहो कि वह देखे कि मैं अपने लोगों के लिए क्या करता हूँ। तब वह जान जाएगा कि मैं कौन हूँ।

बाइबल न केवल परमेश्वर के उद्धार के कार्य की कहानी है, परन्तु इससे बढ़कर वह परमेश्वर के चरित्र के अनावरण की भी कहानी है। हममें से बहुत से लोग अपनी बाइबल पढ़ने के बाद प्रयुक्ति से सम्बन्धित महत्त्वपूर्ण प्रश्न पूछने में निपुण हो चुके हैं, जैसे “यह कैसे सम्बन्धित है और कैसे लागू होता है? मेरे लिए इसका क्या अर्थ है?” ये बातें व्यर्थ या गलत नहीं हैं, किन्तु ये वे प्रमुख प्रश्न नहीं हैं जो पूछे जाने चाहिए। परमेश्वर कहानी का नायक और पुस्तक का प्रसंग है, और इसलिए प्रत्येक खण्ड से हमारा पहला प्रश्न यह होना चाहिए, “यह मुझे परमेश्वर के बारे में क्या बताता है?” बाइबल परमेश्वर के व्यवहार, चरित्र और महिमा को स्थापित करने के लिए लिखी गई थी।

हममें से बहुत से लोग ऐसा मानते हैं कि हमें प्रत्येक रविवार को कलीसिया से जो कुछ चाहिए वह है आमदनी, सम्बन्धों तथा किसी भी अन्य समस्याओं को हल करने के लिए कुछ किस्से या प्रेरणादायक सूचियाँ। मसीहियत के इतिहास में आज का युग ऐसा समय है, जिसमें विश्वासियों के लिए “कैसे करें” शीर्षक वाली इतनी अधिक पुस्तकें लिखी गई हैं। फिर भी, क्या हम वास्तव में अच्छा जीवन जी पा रहे हैं? ऐसा लगता है जैसे हम सब कुछ करना जानते हैं, परन्तु हम यह नहीं जानते कि परमेश्वर कौन है!

परमेश्वर ने मूसा को जो करने का बुलावा दिया था, उसे पूरा करने के लिए मूसा को यह समझना आवश्यक था कि परमेश्वर कौन था (और है)। उसे हमारे समान यह जानने की आवश्यकता थी कि परमेश्वर केवल एक नाम से कहीं अधिक है।

जब हम बाइबल को पढ़ते हैं और पूछते हैं कि “मैं परमेश्वर के बारे में क्या जान सकता हूँ?” तब हमारा जीवन बदल जाता है। जैसे-जैसे हम यह देखते जाते हैं कि परमेश्वर ने क्या किया है और अधिकता से समझने लगते हैं कि वह कौन है, तो हम उसके प्रति भय-युक्त प्रेम में और उसके लिए प्रेम में बढ़ने लगते हैं। और तभी हम अपने जीवन में उसके बुलावे को पूरा करते हुए उसकी इच्छा के अनुसार जीने में सक्षम होने पाएँगे। हम अपने अवर्णनीय रूप से विस्मयकारी परमेश्वर की महिमा की गहराई को पूर्ण रूप से कभी नहीं समझ पाएँगे, परन्तु हम अवश्य  अनन्त काल तक उसे अधिकाधिक देखते जाएँगे। और जबकि हम उसका वचन पढ़ ही रहे हैं, तो उसका आरम्भ आज से ही हो सकता है।

निर्गमन 3:1-22

28 जानेवारी : पश्चात्ताप कसा करावा

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28 जानेवारी : पश्चात्ताप कसा करावा
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जर आपण आपली पापें पदरी घेतलीं, तर तो विश्वसनीय व न्यायी आहे म्हणून आपल्या पापांची क्षमा करील, व आपल्याला सर्व अनीतीपासून शुद्ध करील. (1 योहान 1:9)

तुमच्या मनाची ही अंधुक, दुर्दैवी भावना कीं तुम्हीं एक अपूर्ण व्यक्ती आहां खरे पाहता पापाची खात्री पटविणारी भावना नाहीं. स्वतःविषयीं वाईट भावना जोपासणें म्हणजे पश्चात्ताप करणें असें होत नाहीं.

आज सकाळी मी प्रार्थना करूं लागलो, आणि लगेच मीं स्वतःला या जगाच्या निर्माणकर्त्याबरोबर संभाषण करण्यांस अयोग्य समजूं लागलो. आणि अर्थातच, ती स्वतःला अयोग्य समजण्याची एक अंधुक, दुर्दैवी भावना होती. आणि मी माझी ती अगोग्यता कबूलही केलीं. पण आता यापुढें काय?

जोपर्यन्त मी माझ्या पापांविषयीं योग्य आणि स्पष्ट वास्तविकता लक्षांत घेतली नाहीं, तोपर्यंत खरेंच कांहीहि बदललें नाहीं. मनाच्या अशा दुर्दैवी भावना योग्यच आहेत जर त्यां मला एखाद्या अशा विशिष्ट पापाविषयीं दोषी ठरवितांत जे मीं माझ्या सवयींमुळें सज्ञानाने वारंवार करतो. पण खरें पाहता, मी एक पापी मनुष्य आहे ह्या अस्पष्ट भावना सहसा फारशा लाभाच्या ठरत नाहीं.

मी अयोग्य आहे ही अंधुक व दुर्दैवी भावना केवळ तेव्हांच योग्य ठरते जेव्हां मी स्वत:कडे आज्ञा न पाळणारा मनुष्य म्हणून पाहतो. अशी खात्री पटल्यावर तुम्हीं तुमची पापें कबूल करून पश्चात्ताप करू शकता आणि देवाला क्षमा मागू शकता आणि ज्यां शुभवर्तमानावर तुम्हीं विश्वास ठेविला आहे त्याचे स्मरण करून तुम्हीं तुमची पापें जणूं नाहीशी करूं शकता.

मग मी त्यां सर्व आज्ञा ज्यां मीं वारंवार मोडतो, स्मरण करूं लागलो. तेव्हा ज्यां आज्ञा मी तोडल्याचे माझ्या लक्ष्यांत येते  त्यां ह्यां :

  • तू आपला देव परमेश्वर ह्याच्यावर पूर्ण अंतःकरणाने, पूर्ण जिवाने व पूर्ण मनाने प्रीति कर. म्हणजे 95% नाहीं, तर 100%. (मत्तय 22:37)
  • आपल्या शेजार्‍यावर स्वतःसारखी प्रीति कर. म्हणजे ज्या ज्या चांगल्या गोष्टीं तुमच्याकडे असाव्यांत अशी तुम्हीं आतुरतेने उत्कंठा करता त्यां त्यां वस्तु तुमच्या शेजार्यांकडेहि असाव्यांत अशी तितक्यांच आतुरतेणें उत्कंठा बाळगा. (मत्तय 22:39)
  • जे काही तुम्हीं कराल ते कुरकुर व वादविवाद न करता करा; – मग ते आंतरिक असों वा बाह्य (फिलिप्पैकर 2:14)
  • त्याच्यावर तुम्हीं ‘आपली’ सर्व ‘चिंता टाका’- म्हणजे यापुढे तुम्हीं त्यांच्या ओझ्याने भारावून जाणार नाहीं. (1 पेत्र 5:7)
  • तुमच्या मुखातून जे चांगले तेच मात्र निघो, ह्यासाठी की ऐकणार्‍यांना कृपादान प्राप्त व्हावे — विशेषत: तुमच्या जवळच्या लोकांना. (इफिस 4:29)
  • वेळेचा सदुपयोग करा. म्हणजे वेळ वाया घालवू नका, किंवा दिरंगाई करू नका. (इफिस 5:16)

हाय हाय! मीं खूप पवित्र आहों अशी फुशारकी मारणें कोठे! माझा ढोंगीपणा तर उघड झाला आहे.

माझी ही अवस्था तर त्यां अंधुक, दुर्दैवी भावनांपेक्षाहि अति वाईट आहे. अहाहा, पण आता मला माझा शत्रू स्पष्टपणे दिसतोय. माझी पापें विशिष्ट आहेत. ती आता अस्पष्ट धुक्यातुन उघड झाली आहेत. ती अगदी माझ्या समोर आहेंत. मी ह्या अपराध भावनेवर कुरकुर करत बसत नाहीं. त्या ऐवजी, मी ख्रिस्तानें मला आज्ञापिलेल्या गोष्टींचे पालन न केल्याबद्दल त्याला क्षमा मागतो.

माझे हृदय भग्न झालें व मी माझ्याच पापावर क्रोधाविष्ट झालों आहे. मला ते जिवे मारायचे आहे, नाहीं नाहीं, मी आत्महत्या करणार असें नाहीं. मी आत्मघातकीं नाहीं. तर मी पापाचा द्वेष करणारा आणि पाप-घातकी असा आहे. (“पृथ्वीवरील तुमचे अवयव म्हणजे जारकर्म, अमंगळपणा, कामवासना, कुवासना व लोभ…..हे जिवे मारा,” कलस्सै 3:5; “शरीराची कर्मे ठार मारा,” रोमकरांस 8:13.) मला जिवंत राहावयाचे आहे. म्हणूनच मी आत्म-रक्षक मारेकरी आहे — माझ्या स्वतःच्या पापाचा मारेकरी!

मी पापाबरोबर माझ्या ह्या संघर्षात असतांना, माझ्या कानावर हें अभिवचन येते, “जर आपण आपली पापे पदरी घेतली, तर तो विश्वसनीय व न्यायी आहे म्हणून आपल्या पापांची क्षमा करील, व आपल्याला सर्व अनीतीपासून शुद्ध करील” (1 योहान 1:9). मनांत शांती उदय पावते.

आता प्रार्थना करणे पुन्हा शक्य होते, आणि प्रार्थना करणे योग्य आहे आणि सामर्थ्याने भरलेली असें जाणवते.

27 जनवरी : वह कुचले हुए नरकटों के लिए आया था

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27 जनवरी : वह कुचले हुए नरकटों के लिए आया था
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“कुचले हुए नरकट को वह न तोड़ेगा और न टिमटिमाती बत्ती को बुझाएगा; वह सच्चाई से न्याय चुकाएगा।”  यशायाह 42:3

प्राचीन काल के बड़े राजनेता शासन करने के लिए अपनी शक्ति पर आश्रित रहते थे। (बहुत से लोग आज भी लोग ऐसा करते हैं।) फारस के राजा कुस्रू महान को इस प्रकार वर्णित किया जाता था जैसे कुम्हार गीली मिट्टी को लताड़ता है, वैसे ही वह हाकिमों को कीच के समान लताड़ देगा (यशायाह 41:25 देखें)। फिर भी उसी समय में यशायाह ने उस आने वाले सेवक के बारे में भविष्यद्वाणी की, जो उस समय के हाकिमों के बिल्कुल विपरीत होगा।

वह सेवक, अर्थात यीशु भला, संवेदनशील और दयालु है। जिन लोगों को दूसरे लोग त्याग देना चाहते हैं और ठुकरा देना चाहते हैं, वह उन्हें अपनाने के लिए इच्छुक और सक्षम है। यह कितना अधिक आशा-दायक वचन है!

कुचले हुए नरकट के चित्रण में हम यीशु की हमारे प्रति संवेदनशीलता के महत्त्व को देख सकते हैं। आप कुचले हुए नरकट के सहारे टिक नहीं सकते, और न ही आप उससे संगीत बजा सकते हैं। फिर भी यीशु उन लोगों को उठाता है, जिन्हें अन्य लोग एक ओर कर देते हैं और उनके जीवन में और उनके जीवनों के द्वारा एक मधुर धुन बजाता है। हो सकता है कि आज आप अपने आप को बुरी तरह से दबा हुआ, दूसरों के व्यवहार से टूटा हुआ या अतीत में की गई गलतियों से आहत महसूस कर रहे हों। हो सकता है कि आप लगभग यह विश्वास करने लगे हों कि आप टूटे हुए और बेकार हैं। परन्तु आपके लिए एक महिमामय समाचार यह है कि वह सेवक कुचले हुए नरकटों को उठाता है, और वह ऐसा बड़े ध्यान से करता है।

यीशु सुलगती हुई बत्तियों को भी अपनाता है। वह उन्हें बुझाता नहीं है; परन्तु इसके विपरीत वह टिमटिमाते हुए टुकड़े को लेता है और उसे चमकती हुई ज्योति में बदल देता है। हो सकता है कि आपको यह विश्वास दिला दिया गया हो कि आपके अच्छे दिन अब बीत चुके हैं; कि आप एक बुझती हुई पुरानी मोमबत्ती हैं, केवल एक टिमटिमाती और बुझती हुई लौ हैं। आप अपने आप से यह कहने लगते हैं कि यदि तुम अभी तक इसका हल नहीं निकाल सके हो, तो शायद तुम्हारे लिए कोई आशा नहीं है। परन्तु एक बार फिर शुभ समाचार यह है कि सुलगती हुई बत्तियाँ इस सेवक में आशा पाती हैं, जो हमें फिर से प्रज्ज्वलित करने आया है।

यीशु उन लोगों में असाधारण रुचि रखता है जिनका कहीं कोई नाम नहीं, अर्थात उन कुचले हुए नरकटों और सुलगती हुई बत्तियों में। वह उन्हें छुटकारा देता है और संसार में प्रकाश लाने और अपने नाम की स्तुति के लिए उनका उपयोग करता है। वास्तविकता तो यह है कि किसी न किसी तरह से हम सभी कुचले हुए नरकट और टिमटिमाती बत्तियाँ ही हैं। क्या हम अपनी दीन-हीन स्थिति को पहचानने के लिए तैयार हैं ताकि हम उस सेवक की भलाई और दयालुता को जान सकें? अन्ततः . . .

वह कभी भी धुआँ देते हुए रेशे को नहीं बुझाता, परन्तु उसे आग की लपटों में बदल देता है;

वह कुचले हुए नरकट को कभी नहीं तोड़ता, न ही सबसे निकृष्ट नाम का तिरस्कार करता है। [1]
लूका 7:11-17

27 जानेवारी : त्याला तुमची गरज माहीत आहे

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27 जानेवारी : त्याला तुमची गरज माहीत आहे
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ह्यास्तव ‘काय खावे? काय प्यावे? काय पांघरावे?’ असे म्हणत चिंता करत बसू नका. कारण ह्या सर्व गोष्टी मिळवण्याची धडपड परराष्ट्रीय लोक करत असतात. तुम्हांला ह्या सर्वांची गरज आहे हे तुमचा स्वर्गीय पिता जाणून आहे.” (मत्तय  6:31-32)

आपल्या शिष्यांनी चिंतामुक्त असावें अशी येशूची इच्छा आहे. मत्तय 6:25-34 मध्ये, तो आपलीं चिंता दूर करण्याच्या उद्देशाने तयार केलेंलें किमान सात तर्क देतो. त्यापैकीं एक तर्क देतांना तो खाणे, पिणे व वस्त्र यांचा उल्लेख करतो आणि लगेच म्हणतो, “तुम्हांला ह्या सर्वांची गरज आहे हे तुमचा स्वर्गीय पिता जाणून आहे” (मत्तय 6:32).

येशूला खचितच असे म्हणायचे होते कीं देवाला आमच्या गरजा ठाऊक असणें  ही गोष्ट त्या गरजा पूर्ण करण्याच्या त्याच्या इच्छेशी अनुकूल आहे. आमचा स्वर्गीय पिता आहे असें तो जोर देऊन म्हणतो. आणि हा पिता आमच्या ऐहिक पित्यापेक्षा श्रेष्ठ आहे.

मला पाच लेकरं आहेत. मला त्यांच्या गरजा पूर्ण करणं आवडतं. परंतु मला त्यांच्या गरजांची असलेली जाणीव ही देवाला आमच्या गरजांची असलेल्यां जाणीवेपेक्षा कमीतकमी तीन प्रकारे उणी पडते.

सर्व प्रथम, आता ह्या क्षणी मला ठाऊक नाहीं कीं माझी मुलें कुठे आहेत. मी केवळ अंदाजाने सांगू शकतो. ते कदाचित आपापल्या घरी असतील किंवा ऑफिस मध्यें असतील किंवा शाळेत जात असतील, तें सर्व निरोगी आणि सुरक्षित आहेत. पण जर त्यांना हृदयविकाराचा झटका आला असेल, तर तें कुठेतरी रस्त्यावर पडलेलें सुद्धा असूं शकतात.

दुसरे, कोणत्या वेळी ते काय विचार करतात हें मला ठाऊक नाहीं. मी कधी कधी केवळ एक अंदाज लावू शकतो. पण कदाचित त्यांना कुठल्यातरी गोष्टीची भीती वाटत असेल, किंवा त्यांच्यावर दुखाचा डोंगर कोसळला असेल, किंवा त्यांना राग आलेला असेल किंवा त्यांना कुठल्यातरी गोष्टीची इच्छा किंवा तिचा लोभ असू शकतो, किंवा ते आनंदी असतील किंवा एखाद्या गोष्टीची आशा करत असतील. मी त्यांच्या मनांत काय चाललय ते पाहू शकत नाहीं. त्यांना तर स्वतःच्या अंत:करानातील गोष्टीं देखील पूर्णपणे ठाऊक नसतील.

तिसरे, मला त्यांचे भविष्य ठाऊक नाहीं. आज तें मला एकदम निरोगी आणि ठणठणीत दिसत आहेत. पण उद्या मात्र त्यांच्यावर दुःखाचा मोठा डोंगर कोसळू शकतो.

याचा अर्थ असा कीं मला त्यांच्याविषयीं असलेली जाणीव त्यांना स्वतःची काळजी न करण्याचे मोठे निमित्त देऊं शकत नाहीं. त्यांच्या जीवनांत या क्षणी काहीं तरी घडामोडी होत असतील किंवा उद्या घडून येतील ज्यांविषयीं आज मला तिळमात्रहि कल्पना नाहीं. परंतु जेव्हा हींच बाब त्यांच्या स्वर्गातील पित्याच्या बाबतींत येते, तेव्हा दृश्य पूर्णपणे वेगळे आहे. “तुमचा स्वर्गीय पिता!” त्याला आपल्याबद्दल सर्व ठाऊक आहे, म्हणजे आपण कुठे आहों, आणि उद्या कुठे असणार, आपलं मन कसं आहे आणि बाहेरून आपण कसे वागतो, तें सर्वकांही तो जाणून आहे. त्याला आपली प्रत्येक गरज ठाऊक आहे.

याशिवाय, त्याला आपल्या गरजा पूर्ण करावयांची नेहमीच मोठी उत्कंठा लागलेली असते. मत्तय 6:30 मधील विशेषेकरून”  या शब्दाची आठवण ठेवा “जे रानातले गवत आज आहे व उद्या भट्टीत पडते त्याला जर देव असा पोशाख घालतो, तर, अहो तुम्हीं अल्पविश्वासी, तो विशेषेकरून  तुम्हांला पोशाख घालणार नाही काय?”

या व्यतिरिक्त, जे करण्याची त्याला उत्कंठा लागलेली आहे ते करण्यांस तो पूर्णपणे समर्थ देखील आहे (तो एकांच वेळी जगभरातील कोट्यवधी पक्ष्यांना खाऊं घालतो, मत्तय 6:26).

यास्तव, येशू आमच्या सर्व गरजा पूर्ण करतो ह्या त्याच्या वचनावर मजबरोबर विश्वास ठेवा, “तुम्हांला ह्या सर्वांची गरज आहे हे तुमचा स्वर्गीय पिता जाणून आहे” असें जेव्हा येशू म्हणतो तेव्हा तो हेंच आवाहन करत आहे.

26 जानेवारी : देणाऱ्याला गौरव मिळतो

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26 जानेवारी : देणाऱ्याला गौरव मिळतो
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ह्याकरता तर आम्हीं तुमच्यासाठी सर्वदा अशी प्रार्थना करतो की, आपल्या देवाने तुम्हांला झालेल्या ह्या पाचारणाला योग्य असे मानावे आणि चांगुलपणाचा प्रत्येक मनोदय व विश्वासाचे कार्य सामर्थ्याने पूर्ण करावे; ह्यासाठी की, आपला देव व प्रभू येशू ख्रिस्त ह्यांच्या कृपेने आपला प्रभू येशू ह्याच्या नावाला तुमच्या ठायी व तुम्हांला त्याच्या ठायी गौरव मिळावा. (2 थेस्सलनीकाकर 1:11-12)

देव त्याच्या कृपेच्याद्वारें  त्याच्या गौरवाची  स्तुति करून घेण्याची योजना आखतो ही अत्यंत चांगलीं बातमी आहे.

नक्कीच, जेव्हां देव आपल्या क्रोधाचे सामर्थ्य व्यक्त करतो तेव्हां देखील त्याचा गौरव होतो (रोमकरांस 9:22), परंतु नवा करार (आणि जुना करारहि, उदाहरणार्थ, यशया 30:18) पुन्हा पुन्हा सांगतो की आपल्याला देवाची कृपा अनुभवाने जाणून घेणे अगत्याचे आहे, ह्यासाठी की देवाला आपल्या ठायी गौरव  मिळावा.

2 थेस्सलनीकाकर 1:11-12 मध्यें पौलाने केलेल्या प्रार्थनेंत हे प्रत्यक्षांत कसे घडून येते यावर विचार करा.

पौल प्रार्थना करतो कीं देवानें चांगुलपणाचा आमचा प्रत्येक मनोदय पूर्ण करावा.

कशा प्रकारे? तो अशी प्रार्थना करतो कीं तो मनोदय “[देवाच्या] सामर्थ्यानें” पूर्ण करण्यांत यावा. म्हणजे, ते “विश्वासाची [कार्ये]” असावी.

का? ह्यासाठी की प्रभू येशू ह्याच्या नावाला आमच्याठायी गौरव मिळावा.

म्हणजे देणाऱ्याला गौरव मिळतो. सामर्थ्य देवानें दिलें, म्हणून गौरव देखील देवालाच मिळतो. आमचा  विश्वास आहे; तो  सामर्थ्य देतो. आमचे साहाय्य करण्यांत येतें; त्याला गौरव मिळतो. हेंच तें कृपेचें कार्य आहे ज्यामुळें आपली अंतकरणनें नम्र राहतांत व ज्यामुळें आम्हीं आनंदी राहतो व त्याला सर्वोपरी ठेऊन त्याचे गौरव करतो.

मग पुढे पौल म्हणतो कीं ख्रिस्ताचे हें गौरव “आपला देव व प्रभू येशू ख्रिस्त ह्यांच्या कृपेने” आहे.

चांगुलपणाचा आपला प्रत्येक मनोदय व विश्वासाचे कार्य करण्यासाठीं आपल्याला देवाने सामर्थ्य द्यावे या पौलाच्या प्रार्थनेंला देवाचे उत्तर म्हणजे आम्हांवर होणारी कृपा. तुम्हीं जे कांही चांगले करण्याचा मनोदय  (किंवा संकल्प) करता तो सिद्धीस न्यावयांस तुम्हांला सक्षम करण्यासाठी देवाच्या ज्या सामर्थ्याची गरज लागते ती गरज पूर्ण केलीं जाणे म्हणजेच कृपा.

नवीन करारानुसार ही कृपा अशा प्रकारे पुन्हा पुन्हा कार्य करते. देव तुम्हांला आपल्या कृपेद्वारे सामर्थ्य देईल असा विश्वास ठेवा आणि जेव्हा आपल्याला असें साहाय्य पुरविले जातें तेव्हा त्याला गौरव मिळतो.

आम्हांला साहाय्य पुरविले जातें. त्याला गौरव मिळतो.

म्हणूनच ख्रिस्ती जीवन, हे केवळ ख्रिस्ती परिवर्तन नव्हें, तर हें एक शुभवर्तमान देखील आहे.

25 जानेवारी : विलंबित झालेल्यां सुटका

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25 जानेवारी : विलंबित झालेल्यां सुटका
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सर्व दरवाजे लगेच उघडले व सर्वांची बंधने तुटली. (प्रेषित 16:26)

या युगांत देव त्याच्यां लोकांना निरनिराळ्या संकटांतून सोडवितो, पण सर्वच सर्व संकटांतून नाहीं. हे जाणून घेणें मनाला सांत्वन देणारें आहे, कारण त्यांशिवाय आपण आपल्यांवर येत असलेल्यां संकटांचा असा निष्कर्ष काढून बसणार कीं जणूं त्याला आपला विसर पडला आहे किंवा आपल्याला नाकारलें आहे.

तर मग, आपण स्वतःला या गोष्टीची स्पष्ट आठवण करून देऊन उत्तेजन प्राप्त करूयां कीं प्रेषितांची कृत्ये 16:19-24 मध्यें पौल आणि सीला यांची सुटका तर केलीं गेलीं नव्हतीं, तरी 25-26 यां वचनांमध्यें त्यांची सुटका करण्यांत आलीं.

प्रथमत:, सुटका करण्यांत आलीं नाहीं:

  • “पौल व सीला ह्यांना धरून पेठेत अंमलदाराकडे ओढून नेले.” (वचन 19)
  • “अधिकार्‍यांनी त्यांची वस्त्रे फाडून काढली.” (वचन 22)
  • त्यांनी “पुष्कळ फटकें” मारलें. (वचन 23)
  • बंदिशाळेच्या नायकानें “त्यांना आतल्या बंदिखान्यांत घालून त्यांचे पाय खोड्यांत अडकवलें.” (वचन 24)

पण नंतर, सुटका करण्यांत आलीं: मध्यरात्रीच्या सुमारास पौल व सीला हे प्रार्थना करत असता व गाणी गाऊन देवाची स्तुती करत असता बंदिवान त्यांचे ऐकत होते.

तेव्हा एकाएकी असा मोठा भूमिकंप झाला की बंदिशाळेचे पाये डगमगले; सर्व दरवाजे लगेच उघडले व सर्वांची बंधने तुटली. (वचन 25-26)

देव विलंब न करता हस्तक्षेप करू शकला असता. पण त्यानें हस्तक्षेप केला नाहीं. त्यामागची कारणें तोंच जाणों. पण त्यानें पौल  व सीला यांच्यावर प्रीति केलीं.

तुमच्यासाठीं प्रश्न हा: जर तुम्हीं तुमचे जीवन पौलाला सुरुवातीला झालेलें दुःख आणि त्यानंतर त्याची झालेलीं सुटका या कायमस्वरूपी होणाऱ्या घडामोडींना लक्ष्यांत ठेऊन रचलें असेल तर मग तुम्हीं कोणत्या टप्प्यांत आहां? तुम्हीं बंदिस्त आणि फटके खात असलेल्यां टप्प्यांत आहां, कीं तुमच्या बंदिवासाचे सर्व दरवाजे अचानक उघडले गेलें व बंधने तुटली गेलीं अशा टप्प्यांत आहां?

हें दोन्हींहि टप्पे असें आहेत ज्यांत देव तुमची काळजी घेत आहेच. त्यानें तुम्हाला सोडून दिलें नाहीं वा तुम्हाला टाकून दिलें नाहीं (इब्री 13:5).

जर तुम्हीं बेडींत अडकलेंल्या टप्प्यांत असाल तर निराश होऊ नका. गाणी गा. बंधनें तुटणारच आहेत. मुक्तता निश्चित आहे, पण ती कधी आणि कशी होईल हे तुम्हांला ठाऊक नाहीं. ती मुक्तता मरणाद्वारें देखील होवूं शकते. “मरेपर्यंत तू विश्वासू राहा, म्हणजे मी तुला जीवनाचा मुकुट देईन” (प्रकटीकरण 2:10).

24 जानेवारी : तुम्हीं इतरांसाठीं प्रयोजन करतां, तेव्हां तुमच्यासाठींहि प्रयोजन केलें जातें

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24 जानेवारी : तुम्हीं इतरांसाठीं प्रयोजन करतां, तेव्हां तुमच्यासाठींहि प्रयोजन केलें जातें
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येशू त्यांना म्हणाला, “तुमच्याजवळ भाकरी नाहींत ह्याविषयीं चर्चा का करितां? तुम्हीं अजून ध्यानांत आणीत नाहीं व समजतहि नाहीं काय? तुमचें अंतःकरण कठीण झालें आहे काय? (मार्क 8:17)

येशूनें 5,000 आणि 4,000 जनसंख्या असलेल्यां लोकांना केवळ कांही भाकरी आणि मासें यांतून पोट भरून खाऊ घातल्यानंतर, शिष्य स्वतःसाठीं पुरेशा भाकरी न घेतांच नावेंत बसलें.

जेव्हां तें बिनभाकरीच्या आपल्या दैनावस्थेवर आपसांत चर्चा करूं लागले, येशू त्यांना म्हणाला, “तुमच्याजवळ भाकरी नाहींत ह्याविषयीं चर्चा का करितां? तुम्हीं अजून ध्यानांत आणीत नाहीं व समजतहि नाहीं काय?” (मार्क 8:17). त्यांना काय समजलें नव्हतें?

त्यांना उरलेंल्या भाकरीचा अर्थ समजला नव्हतां, म्हणजे असें कीं जेव्हां ते इतरांची काळजी घेतांत तेव्हां येशू त्यांची देखील काळजी घेईल. येशू त्यांना विचारतो,

“मी पाच हजार लोकांना पाच भाकरी मोडून वाटून दिल्या तेव्हां तुम्हीं तुकड्यांच्या किती टोपल्या भरून घेतल्या?” तें त्याला म्हणालें, “बारा.” “तसेच चार हजारांसाठीं  सात भाकरी मोडल्या तेव्हां तुम्हीं किती पाट्या तुकडे भरून घेतलें?” ते म्हणालें, “सात.” तेव्हां तो त्यांना म्हणाला, “अजून तुम्हांला समजत नाही काय?” (मार्क 8:19-21)

तें कोणती गोष्ट समजत नव्हतें? उरलेंल्या भाकरीचा अर्थ.

उरलेंल्या भाकरी सेवा करणाऱ्यांसाठीं होत्यां. खरं तर, जेव्हां येशूनें पहिल्यांदा 5000 लोकांना जेवूं घातलें तेव्हां भाकरी वाटणारे बारा जन होतें आणि बारा टोपल्या भाकरी उरल्या होत्यां (मार्क 6:43) — म्हणजे भाकरी वाटणाऱ्या प्रत्येकासाठीं एक संपूर्ण टोपलीं. दुसऱ्यांदा, म्हणजे जेव्हां येशूनें 4000 लोकांना जेवूं घातलें तेव्हां सात टोपल्या उरल्या होत्यां – सात, म्हणजे विपुलतेची पूर्णता दर्शविणारी  संख्या.

त्यांना काय समजलें नव्हतें? कीं येशू त्यांची काळजी घेईल. तुम्हीं येशूला कमी लेखू शकत नाहीं. जेव्हां तुम्हीं तुमचें जीवन इतरांसाठीं खर्च करतां तेव्हां तुमच्याहि गरजा पूर्ण केल्यां जातील. “माझा देव आपल्या संपत्त्यनुरूप तुमचीं सर्व गरज ख्रिस्त येशूच्या ठायीं गौरवाच्या द्वारें पुरवील” (फिलिप्पैकरांस 4:19).

23 जानेवारी : सरळ देवाकडे जा

त्या दिवशी तुम्हीं माझ्या नावानें मागाल. आणि मी तुमच्यासाठीं पित्याजवळ विनंती करीन, असें मीं तुम्हांला म्हणत नाहीं; कारण पिता स्वतः तुमच्यावर प्रीतिरितो, कारण तुम्हीं माझ्यावर प्रीति केलीं आहे आणि मीं पित्यापासून आलो असा विश्वास धरला आहें.” (योहान 16:2627)

देवाच्या पुत्राच्या मध्यस्थीच्या बाबतीत अतिशयोक्ती करूं नका.

येशू इथें म्हणतो, “मी तुमच्यासाठीं पित्याजवळ विनंती करीन, असें मी तुम्हांला म्हणत नाहीं.” दुसऱ्या शब्दांत सांगायचे तर, मी तुमच्या आणि पित्यामध्यें स्वतःला आणणार नाहीं, कीं जणूं तुम्हीं त्याच्याकडे सरळ जाऊं शकत नाहीं. का? “कारण पिता स्वतः तुमच्यावर प्रीति करितो.”

हें जरा थक्क करणारे आहे. सर्वशक्तिमान परमेश्वर आपण सरळ त्याच्या उपस्थितीत गेल्यांस तो त्याच्या आपल्याला स्वीकारणार नाहीं असें समजू नका हेंच येशू आपल्याला बजावून सांगत आहे. जेव्हां मी “सरळ” म्हणतों, तेव्हां माझ्या बोलण्याचा उद्देश तोंच आहे जें येशूला म्हणायचे होते, “मी तुमच्या विनंत्या तुमच्या वतीने देवाकडे घेऊन जाणार नाहीं. तुम्हीं आपल्या विनंत्या स्वतःच त्याच्याकडे थेट घेऊन जाऊं शकता. तो तुमच्यावर प्रीति करितो. तुम्हीं त्याच्याकडे यावें अशी त्याची इच्छा आहे. तो तुमच्यावर कोपलेला नाहीं.”

येशूच्या रक्तावांचून कोणीहि पापी मनुष्य पित्याकडे जाऊं नाहीं हें सत्य निर्विवाद आहे (इब्री 10:19-20). तो आता आपल्यासाठीं मध्यस्थी करितो (रोमकरांस 8:34; इब्री 7:25). तो आता पित्याजवळ आपला कैवारी आहे (1 योहान 2:1). तो आता देवाच्या राजासनासमोर आपला प्रमुख याजक आहे (इब्री 4:15-16). त्यानें म्हटलें, “माझ्या द्वारें आल्यावाचून पित्याकडे कोणी येत नाही” (योहान 14:6).

होय, हे पूर्णपणे खरे आहे. परंतु येशू आपण त्याच्या मध्यस्थीच्या बाबतीत अतिशयोक्ती करूं नये म्हणून आपलें संरक्षण करत आहे. “मी तुमच्यासाठीं पित्याजवळ विनंती करीन, असें मी तुम्हांला म्हणत नाहीं; कारण पिता स्वतः तुमच्यावर प्रीति करितो.” येशू तिथें आहे. त्यानें आपल्या विरुद्ध असलेल्या पित्याच्या क्रोधाला आपल्यापासून दूर केलें आहे या सत्याची तो नेहमी आणि सदैव जिवंत अशी साक्ष देत आहे.

परंतु तो तिथें आपल्या वतीनें बोलण्यासाठीं आपला वक्ता म्हणून नाहीं, किंवा तो तिथें आपल्याला पित्यापासून दूर ठेवावें, किंवा पित्याचे अंतःकरण आपल्यासाठीं मोकळे नाहीं, किंवा त्याचा आपल्याकडे कल नाहीं असें सुचविण्यासाठीं नाहीं – म्हणून तो म्हणतो, “कारण पिता स्वतः तुमच्यावर प्रीति करितो.”

तर मग या. धैर्यानें या (इब्री 4:16). आशेनें या. तो तुम्हांला आनंदाचे हास्य देईल या आशेनें या. भीतीनें नव्हे तर आनंदानें थरथरत या.

येशू म्हणतो, “मी देवाकडे जाण्याचा मार्ग तयार केला आहे. आता मी मार्गात येणार नाहीं.” देवाच्या उपस्थितींत सरळ या.