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11 अगस्त : सदाकाल का एक सिंहासन

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11 अगस्त : सदाकाल का एक सिंहासन
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“वरन् तेरा घराना और तेरा राज्य मेरे सामने सदा अटल बना रहेगा; तेरी गद्दी सदैव बनी रहेगी।” 2 शमूएल 7:16

परमेश्वर ने दाऊद के साथ वाचा बाँधी, यह प्रतिज्ञा करते हुए कि उसका राज्य सदा बना रहेगा। और फिर भी दाऊद के पुत्र सुलैमान के राज्य के बाद उसका राज्य विभाजित हो गया, और कुछ सौ वर्षों बाद ही उत्तरी राज्य और दक्षिणी राज्य दोनों नष्ट हो गए (2 राजाओं 17 और 25)।

जो लोग उसके बाद आई बन्धुवाई की पीढ़ियों में रहते थे, उनके लिए दाऊद से की गई परमेश्वर की प्रतिज्ञा एक परीकथा सी प्रतीत होती होगी। उनके अनुभव में किसी महान इस्राएली राज्य या राजा के उदय का कोई प्रमाण नहीं था। भजन 89, जो इसी समय में लिखा गया था, परमेश्वर की विश्वासयोग्यता से आरम्भ होता है परन्तु लोगों की विपत्तियों पर समाप्त होता है: “हे प्रभु, तेरी प्राचीनकाल की करुणा कहाँ रही, जिसके विषय में तू ने अपनी सच्चाई की शपथ दाऊद से खाई थी? हे प्रभु, अपने दासों की नामधराई की सुधि ले; मैं तो सब सामर्थी जातियों का बोझ लिए रहता हूँ” (भजन 89:49-50)। उस दुख और निराशा के सन्दर्भ में भविष्यद्वक्ताओं ने लोगों को स्मरण दिलाते हुए कहा, ठहरो! यद्यपि ऐसा प्रतीत नहीं होता कि परमेश्वर की प्रतिज्ञा अब भी प्रभाव में है, फिर भी आप निश्चय जानो कि वह है, क्योंकि उसकी वाचा की प्रेममय करुणा चिरस्थाई है। आगे और भी बहुत कुछ होना बाकी है। उन्होंने भविष्य के विषय में कहा:

क्योंकि हमारे लिए एक बालक उत्पन्न हुआ,
हमें एक पुत्र दिया गया है;
और प्रभुता उसके काँधे पर होगी,
और उसका नाम
अद्‌भुत युक्ति करने वाला पराक्रमी परमेश्‍वर,
अनन्तकाल का पिता, और शान्ति का राजकुमार रखा जाएगा।
उसकी प्रभुता सर्वदा बढ़ती रहेगी,
और उसकी शान्ति का अन्त न होगा,
इसलिए वह उसको दाऊद की राजगद्दी पर
इस समय से लेकर सर्वदा के लिए
न्याय और धर्म के द्वारा
स्थिर किए और सम्भाले रहेगा।
सेनाओं के यहोवा की धुन के द्वारा यह हो जाएगा। (यशायाह 9:6-7)

भविष्यद्वक्ताओं ने कहा, अभी भी एक और स्थान, एक और नाम, एक और विश्राम, एक और राज्य, और एक और सिंहासन आने वाला है। परमेश्वर की प्रजा की असफलताओं का यह अर्थ नहीं था कि परमेश्वर ने अपनी प्रतिज्ञा को भुला दिया है। यह सब यीशु में पूरा होना था।

इतिहास अपने आप को दोहराता है। चाहे बीमारी, उत्पीड़न, राजनीति या शोक के कारण हो, हम कभी-कभी अपने आप को उसी भ्रम की स्थिति में पाएँगे जिसकी वाणी भजन 89 देता है। ऐसे समय में (जो वास्तव में यीशु के लौटने से पहले का सारा समय है), हमें भविष्यद्वाणी की आवाज़ों की आवश्यकता होती है जो हमें परमेश्वर की वाचा की विश्वासयोग्यता स्मरण दिलाएँ—कि हमारा प्रभु अभी भी और सदा के लिए अपने सिंहासन पर राज्य करता है। इसलिए आज हियाव रखें। आपकी असफलताओं का अर्थ यह नहीं है कि परमेश्वर ने अपनी प्रतिज्ञा को भुला दिया है। आगे और भी बहुत कुछ होना बाकी है।

भजन 89
◊ पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: भजन 81– 83; 1 पतरस 1

11 August : कृपेचे भिन्न काळ

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11 August : कृपेचे भिन्न काळ
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ह्याकरता तर आम्हीं तुमच्यासाठीं सर्वदा अशी प्रार्थना करतो कीं, आपल्या देवानें तुम्हांला झालेंल्या ह्या पाचारणाला योग्य असे मानावे आणि चांगुलपणाचा प्रत्येक मनोदय व विश्वासाचे कार्य सामर्थ्याने पूर्ण करावे; ह्यासाठीं कीं, आपला देव व प्रभू येशू ख्रिस्त ह्यांच्या कृपेने आपला प्रभू येशू ह्याच्या नावाला तुमच्या ठायीं व तुम्हांला त्याच्या ठायीं गौरव मिळावा. (2 थेस्सलनीका 1:11-12)

कृपा ही देवाची केवळ अशी प्रवृत्ती नाहीं कीं आपण पात्र नसतांनाहि तो आपलें कल्याण करतो – आपण तिला “आमच्या प्रतिकूलतेंत पात्र नसतांनाहि आम्हांसाठीं देवाची अनुकूलता” असे म्हणतो; तर देवाची कृपा ही देवाकडून येणारे सामर्थ्य देखील आहे जे आपल्या जीवनात कार्य करते आणि आपल्यामध्यें आणि आपल्यासाठीं चांगल्या गोष्टी घडवते – आणि ह्या कृपेस देखील आपण पात्र नसतो.

पौलाने म्हटले कीं आपल्यात चांगुलपणाचा प्रत्येक मनोदय हा देवाच्या “सामर्थ्याने” पूर्ण होतो (वचन 11). आणि मग तो वचन 12 च्या शेवटी असे म्हणतो, “आपला देव व प्रभू येशू ख्रिस्त ह्यांच्या कृपेने.”  हे सामर्थ्य जे आमच्यांत ख्रिस्ताला उंचविणारी आज्ञाधारकता निर्माण करण्यासाठीं आमच्या जीवनात प्रत्यक्षात कार्य करते, देवाच्या कृपेने घडून येणारे परिश्रम आहे.

आपण हे 1 करिंथ 15:10 मध्यें देखील पाहू शकता:

तरी जो काहीं मी आहे तो देवाच्या कृपेने आहे आणि माझ्यावर त्याची जी कृपा झाली आहे ती व्यर्थ झाली नाहीं; परंतु ह्या सर्वांपेक्षा मी अतिशय श्रम केलें, ते मी केलें असे नाहीं, तर माझ्याबरोबर असणार्‍या देवाच्या कृपेने केलें.

तर मग, कृपा ही एक सक्रिय, सदैव उपस्थित, जीवन बदलून टाकणारी, आज्ञाधारक शक्ती आहे.

म्हणून, ही कृपा, जी वेळोवेळी देवाकडून तुमच्याकडें सामर्थ्याने वाहत येते, ती गतकालीन व भावी अशी दोन्ही स्वरुपाची आहे. ज्याअर्थी तिच्याद्वारे आपल्यासाठीं किंवा आपल्या अंतकरणात पूर्वी काहींतरी घडवून आणिले गेलें, म्हणून ती गतकालीन कृपा म्हटली जाते. आणि ज्याअर्थी आता त्यांच कृपेद्वारे आपल्यासाठीं किंवा आपल्या अंतकरणात वर्तमान समयी काहींतरी घडवून आणिले जात आहे म्हणून, तिला भावी कृपा म्हटले जाते – आतापासून पुढे पाच सेकंद आणि आतापासून पुढे पाच दशलक्ष वर्षे, दोनहि.

देवाची कृपा ही कृपेच्या अक्षय झऱ्यातून वाहणाऱ्या वर्तमानाच्या धबधब्यावरून सतत झिरपत असते जी आमच्यावर भूतकाळात झालेंल्या कृपेच्या सतत वाढत जाणाऱ्या जलाशयातून भविष्याकडून आमच्याकडें वाहत येत आहे. पुढच्या पाच मिनिटांत, तुम्हांला भविष्याकडून येणारी सांभाळ करणारी कृपा प्राप्त होईल — तुमचा यावर विश्वास आहे; तसेच भूतकाळात झालेंल्या कृपेच्या जलाशयाकडून आणखी पाच मिनिटांची कृपा तुमच्या खाती जमा होईल – यासाठीं तुम्हीं देवाचे आभार मानता.

10 अगस्त : परिवार में सब

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10 अगस्त : परिवार में सब
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“लुदिया नामक थुआथीरा नगर की बैंजनी कपड़े बेचने वाली एक भक्त स्त्री सुन रही थी। प्रभु ने उसका मन खोला कि वह पौलुस की बातों पर चित्त लगाए। जब उसने अपने घराने समेत बपतिस्मा लिया, तो उसने हम से विनती की, ‘यदि तुम मुझे प्रभु की विश्वासिनी समझते हो, तो चलकर मेरे घर में रहो,’ और वह हमें मनाकर ले गई।” प्रेरितों 16:14-15

जब परमेश्वर किसी को छुड़ाता है, तो वह उसे न केवल अपने साथ सम्बन्ध में लाता है, परन्तु उन सब के साथ भी जो प्रभु का नाम लेते हैं। वह यह कैसे करता है? प्रेरितों के काम 16 हमें लुदिया के रूप में इसका एक उदाहरण देता है।

लुदिया एक सम्मानित स्त्री प्रतीत होती है। “एक भक्त स्त्री” होने के कारण उसमें कुछ धार्मिक रुचि थी, और “बैंजनी कपड़े बेचने वाली” होने के कारण वह निश्चय ही एक चतुर व्यवसायी थी। उसका जीवन शायद जैसा था वैसा ही ठीक लगता था। और फिर भी जब उसने सुसमाचार सुना, तो वह केवल धार्मिक रुचि से आगे बढ़कर यीशु मसीह के साथ एक सच्चे सम्बन्ध में आ गई, जिसके परिणामस्वरूप उसने अपने नए आत्मिक परिवार के लिए प्रेमपूर्वक अपने साधनों का उपयोग किया।

उसका जीवन बदल देने वाला क्षण यह था: “प्रभु ने उसका मन खोला कि वह पौलुस की बातों पर चित्त लगाए।” बस यही! यही पूरी प्रक्रिया है: प्रभु ने उसका मन विश्वास करने के लिए खोला, और उसने विश्वास किया। उसी क्षण लुदिया परमेश्वर के परिवार में सम्मिलित हो गई। और इससे भी बढ़कर, उसने तुरन्त ही मसीह में अपने भाइयों और बहनों की सेवा के लिए अपने घर को खोल दिया।

लुदिया की कहानी हमें स्मरण दिलाती है कि जो बात एक व्यक्ति के मन फिराव के बुलावे से आरम्भ होती है, उसे सदा परमेश्वर के परिवार में सहभागिता की ओर बढ़ना चाहिए। रोमियों 8:15-16 बताता है कि हम में से प्रत्येक को विश्वास के द्वारा उसके पास आने पर परमेश्वर द्वारा गोद लिया जाता है, परन्तु यह भी कहता है कि साथ मिलकर “हम परमेश्वर की सन्तान हैं।” आपस में हमारा सम्बन्ध इस तथ्य पर आधारित है कि हमारा यीशु के साथ सम्बन्ध है, और यीशु के साथ हमारा सम्बन्ध हमें एक-दूसरे के साथ सम्बन्ध में स्थापित करता है।

जैसे एक भौतिक परिवार में होता है, वैसे ही हम अपने आत्मिक बहनों या भाइयों को चुन नहीं सकते। (यदि हम ईमानदार हों, तो शायद हम में से कुछ को वापस करके फिर से प्रयास करना चाहेंगे—हालाँकि, निस्सन्देह, वे भी हमारे विषय में यही कह सकते हैं!) आपकी कलीसिया के अन्य सदस्य परमेश्वर की सम्प्रभु इच्छा के अनुसार वैसे ही हैं जैसे वे हैं। हमारे भेदों पर ध्यान देना आसान है, परन्तु परमेश्वर के परिवार का सबसे महत्त्वपूर्ण पक्ष वह नहीं है जो हमें एक-दूसरे से अलग करता है, बल्कि वह है जो हम साझा करते हैं: कि परमेश्वर ने हमारे हृदयों को सुसमाचार ग्रहण करने के लिए खोला है और अब हमें एक साथ उसकी आराधना करने और उसका अनुसरण करने के लिए बुलाता है।

यदि प्रभु ने आपका हृदय खोला है, तो आप एक नए परिवार के सदस्य हैं। यह किसी भी प्रकार से पूर्ण परिवार नहीं है, और झगड़े तथा असहमतियाँ हो सकती हैं। परन्तु यीशु फिर भी आपको आपके भाइयों और बहनों से प्रेम करने के लिए बुलाता है, चाहे आपकी असहमतियाँ कितनी ही क्यों न हों। आखिरकार, वह उनसे इतना प्रेम करता है कि उनके लिए मरा। इसलिए वह आपको बुलाता है कि जो आप हैं और जो आपके पास है, उसे इस परिवार की सेवा में लगा दें। आप अपना समय, अपना घर, और अपने साधनों का उपयोग इस प्रकार कैसे करेंगे कि आपसी प्रेम आपकी कलीसिया में दिन-प्रतिदिन अधिक स्पष्ट पारिवारिक पहचान बनता जाए?

1 यूहन्ना 3:11-18
पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: भजन 79– 80; प्रेरितों 28 ◊

10 August : हे देवा, माझ्यावर कृपा कर

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10 August : हे देवा, माझ्यावर कृपा कर
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हे देवा, तू आपल्या वात्सल्याला अनुसरून माझ्यावर कृपा कर; तू आपल्या विपुल करुणेंला अनुसरून माझे अपराध काढून टाक. (स्तोत्र 51:1)

तीनदा : “कृपा कर,” ” आपल्या वात्सल्याला अनुसरून,” आणि ” आपल्या विपुल करुणेंला अनुसरून.”

निर्गम 34:6-7 मध्यें देवानें हे अभिवचन दिलें होते:

“परमेश्वर, परमेश्वर, दयाळू व कृपाळू देव, मंदक्रोध, दयेचा व सत्याचा सागर, हजारो जणांवर1 दया करणारा, अन्याय, अपराध व पाप ह्यांची क्षमा करणारा, (पण अपराधी जनांची) मुळीच गय न करणारा, असा तो वडिलांच्या दुष्टाईबद्दल पुत्रपौत्रांचा तिसर्‍या व चौथ्या पिढीपर्यंतही समाचार घेतो.”

दाविदाला ठाऊक होते कीं काहीं अपराधी असे आहेंत कीं त्यांना क्षमा केलीं जाणार नाहीं. त्याचप्रमाणें, त्याला हेही ठाऊक होते कीं काहीं अपराधी असे आहेंत कीं ज्यांच्या तारणासाठीं केलेंल्या काहीं गूढ कार्यामुळें त्यांचे अपराध गणिले जाणार नाहींत, तर त्यांना क्षमा केलीं जाईल. स्तोत्र 51 मध्यें तो देवाच्या कृपेच्या यांच रहस्याला दृढ धरून ठेवत आहे.

“हे देवा, तू आपल्या वात्सल्याला अनुसरून माझ्यावर कृपा कर; तू आपल्या विपुल करुणेंला अनुसरून माझे अपराध काढून टाक.” दाविदाला या मुक्तीच्या रहस्याचे जितके गूढ ठाऊक होते, त्यापेक्षा अधिक आता आपल्याला या मुक्तीच्या रहस्याचे गूढ ठाऊक आहे. आम्हीं ख्रिस्ताला ओळखतो. तरी त्या करुणेंला मात्र आपण त्याच्याप्रमाणेंच दृढ धरून ठेवतो.

आपल्या असहाय स्थितींत एक निर्णायक गोष्ट जी तो करतो ती म्हणजें देवाची करुणा व प्रीति ह्यांकडें वळणें. आज याचा अर्थ आपल्या असहाय स्थितींत ख्रिस्ताकडें वळणें असा होतो, ज्याने त्याच्या स्वतःच्या रक्ताने आपल्याला आवश्यक असलेली सर्व करुणा प्राप्त करून घेतलीं.

9 अगस्त : अपने उद्धार को सिद्ध करो

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9 अगस्त : अपने उद्धार को सिद्ध करो
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“इसलिए हे मेरे प्रियो, जिस प्रकार तुम सदा से आज्ञा मानते आए हो, वैसे ही अब भी न केवल मेरे साथ रहते हुए पर विशेष करके अब मेरे दूर रहने पर भी डरते और काँपते हुए अपने-अपने उद्धार का कार्य पूरा करते जाओ।” फिलिप्पियों 2:12

हर माता-पिता जानता है कि जब एक बच्चे को कोई उपहार दिया जाता है जिसमें विस्तृत निर्देश होते हैं, तब क्या होता है। बच्चा वहाँ बैठकर पन्नों को घूरता है, यह समझने की कोशिश करता है कि इसे कैसे जोड़ा जाए। उस समय उपहार उसे प्राप्त हो गया है; अब उसे यह पता लगाना है कि इसका क्या करना है।

जब हम यीशु मसीह में विश्वास पाते हैं, तब हम उद्धार को एक उपहार के रूप में प्राप्त करते हैं—और फिर हम अपना शेष जीवन परमेश्वर के वचन द्वारा यह सीखने में बिताते हैं कि इसे कैसे उपयोग करना है: नई सृष्टि के रूप में कैसे जीना है। कभी-कभी हम चाहते हैं कि यह एक त्वरित परिवर्तन हो, जिसमें सब कुछ तुरन्त स्पष्ट हो जाए। परन्तु परमेश्वर ने इसे इस प्रकार नहीं रचा है। बल्कि, मसीही जीवन एक आनन्दपूर्ण—और कभी-कभी दुखद—खोज की यात्रा है।

और इसलिए पौलुस हमें आदेश देता है कि हम अपने उद्धार “का कार्य पूरा करते” जाएँ। वह यह नहीं कह रहा कि हमें अपने उद्धार के लिए कार्य करना है। वह उन अच्छे कर्मों के विषय में नहीं सोच रहा जिन्हें हमें उद्धार को प्राप्त करने या बनाए रखने के लिए करना है, बल्कि यह है कि हम उस उद्धार के प्रति कैसे उत्तर दें जो मसीह में पहले से ही हमारा हो चुका है। वह यह नहीं बता रहा कि उद्धार कैसे प्राप्त करें, बल्कि यह कि उद्धार प्राप्त व्यक्ति के रूप में कैसा जीवन जीएँ। एक बार जब हम इसे समझ लेते हैं, तब हम पौलुस की आज्ञा पर कार्य करने की स्थिति में हो जाते हैं।

अपने उद्धार को सिद्ध करने का आह्वान, सततता का आह्वान है। जिस प्रकार हमने अपने मसीही जीवन के आरम्भ में प्रभु के नाम को उद्धार के लिए पुकारा था, उसी प्रकार हमें निरन्तर उसके नाम को पुकारते रहना है। यह हमारे जीवन में बहुत ही सामान्य, व्यवहारिक रूपों में प्रकट होता है। हम प्रार्थना में परमेश्वर के सम्मुख आते रहते हैं। हम उपासना के लिए साथी विश्वासियों के साथ इकट्ठा होते रहते हैं। हम उसके वचन से सुनते रहते हैं। हम उसके अनुग्रह में चलने का प्रयास करते रहते हैं, पाप को मारते रहते हैं और आत्मिक फल में बढ़ते रहते हैं। हम मसीही जीवन में परिश्रम करते रहते हैं, क्योंकि हम जानते हैं कि कोई भी विश्वासपूर्ण व्यक्ति आकस्मिक रूप से परिपक्व नहीं होता।

यह सामान्य है कि अपने आप को मसीही कहने वाले कई लोग छः दिन अपने मन अनुसार जीवन जीते हैं और रविवार को कलीसिया जाकर स्वयं को बेहतर महसूस करते हैं; या अधिकतर क्षेत्रों में आज्ञाकारी जीवन जीते हैं, परन्तु एक या दो क्षेत्र अपने लिए रखते हैं और उन्हें यीशु के आधिपत्य में नहीं डालते। यह मसीही जीवन नहीं है। परमेश्वर का अनुग्रह हमें यह करने की स्वतन्त्रता देने के लिए नहीं है कि हम जैसा चाहें वैसे जीएँ, बल्कि यह ईश्वर सद्‌गुणपूर्ण सतत जीवन को प्रोत्साहित करता है। अनुग्रह हमें आज्ञाकारिता से मुक्त नहीं करता; बल्कि यह हमारी आज्ञाकारिता को सम्भव बनाता है। और इसलिए, इसी अनुग्रह के द्वारा, और मसीह में परमेश्वर द्वारा दिए गए उद्धार के उपहार के उत्तर में, हम अपने उद्धार का कार्य पूरा करते जाते हैं—हमारे अनन्त आनन्द और उसकी शाश्वत महिमा के लिए। आज, आपको अपने उद्धार के लिए कार्य करने की आवश्यकता नहीं है—मसीह का पूर्ण कार्य पहले ही इसे आपके लिए सुनिश्चित कर चुका है। परन्तु आज, आपसे यह आह्वान है कि आप अपने उद्धार का कार्य पूरा करते जाएँ, ताकि यह आपको अधिकाधिक आकार दे।

कुलुस्सियों 2:6-7
◊ पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: भजन 77–78; प्रेरितों 27:27-44

8 अगस्त : सच्ची उपासना का स्रोत

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8 अगस्त : सच्ची उपासना का स्रोत
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“उसने कहा, ‘हे प्रभु, मैं विश्‍वास करता हूँ।’ और उसे दण्डवत् किया।” यूहन्ना 9:38

जब यीशु ने उसे पहली बार पाया, तब यूहन्ना अध्याय नौ का वह अन्धा भिखारी असहाय और निराश था। फिर वह परमेश्वर के अलौकिक हस्तक्षेप का विषय बना, और उसकी दृष्टि लौटा दी गई। परिणामस्वरूप, उसका जीवन एक ओर सुधर गया, और दूसरी ओर कठिन भी हो गया; क्योंकि अपनी दृष्टि लौटाए जाने के कारण ही उसे अपने माता-पिता का सहारा न मिला, फरीसियों द्वारा प्रश्नों की आग में झोंका गया, अपने विश्वास के लिए अपमानित किया गया, और अन्ततः आराधनालय से बाहर निकाल दिया गया। परन्तु जब यीशु ने उसे खोजकर उससे बातें कीं, तब जो कुछ उसने खोया था, वह सब उसके सामने तुच्छ हो गया, क्योंकि उसने उस जन को प्राप्त कर लिया था जो सब योग्यताओं से बढ़कर है; और इसलिए वह अपने उद्धारकर्ता के चरणों में गिरकर भक्ति से उसकी उपासना करने लगा।

यूहन्ना अध्याय नौ का प्रारम्भ एक ऐसे मनुष्य से होता है जो निराशा और असहायता में खोया हुआ है; परन्तु इस अध्याय का अन्त उस मनुष्य पर होता है जो अब और सदा-सर्वदा के लिए वैसा ही रहेगा: मसीह, उद्धारकर्ता, और राजाओं के राजा का उपासक।

वास्तव में यह मनुष्य उस कथन की पूर्ति है जो इससे पहले यीशु ने कुएँ के पास उस सामरी स्त्री से कहा था। यीशु ने उससे कहा था, “वह समय आता है, वरन् अब भी है, जिसमें सच्चे भक्त पिता की आराधना आत्मा और सच्चाई से करेंगे, क्योंकि पिता अपने लिए ऐसे ही आराधकों को ढूँढ़ता है” (यूहन्ना 4:23)। वह अन्धा भिखारी यीशु द्वारा खोजा गया, उसकी दृष्टि बहाल हुई, उसका मन सिखाया गया, और उसका जीवन रूपान्तरित किया गया। और जो कुछ उसे दिया गया, उसके साथ वह क्या बना? एक उपासक!

उपासना का अभाव, विश्वास के अभाव का परिणाम होता है। उस अन्धे भिखारी ने कहा, “हे प्रभु, मैं विश्वास करता हूँ,” और फिर उसने उपासना की। यदि आप उपासक नहीं हैं, तो आप कठिन प्रयास करके स्वयं को उपासक नहीं बना सकते। बल्कि जाँच करें कि आप वास्तव में विश्वास करते हैं या नहीं! यदि आप इस बात पर विश्वास में आ चुके हैं कि पिता ने मसीह के दुख-भोग को उन सब के लिए प्रायश्चित्त-बलिदान के रूप में स्वीकार किया है जो उस पर भरोसा रखते हैं, तब आप समझ जाएँगे कि यह मनुष्य क्यों यीशु के सम्मुख गिर पड़ा। यहाँ हम उपासना की किसी शैली या गीत गाने की गुणवत्ता की बात नहीं कर रहे; यदि आप मसीह में हैं, तो उपासना एक स्वाभाविक प्रतिक्रिया है, और स्तुति आपके जीवन के हर पक्ष में एक वास्तविकता बन जाती है।

जो पुरुष और स्त्रियाँ स्वयं को मसीह के चरणों में डाल देते हैं, वे ऐसा इसलिए करते हैं क्योंकि वे जानते हैं कि यीशु कौन है, वह क्यों आया, और उसने उनके लिए क्या किया है। मसीह की महिमामय स्तुति हमारे विषय में और उन गीतों के विषय में नहीं है, जिन्हें हम गाना चाहते हैं; यह परमेश्वर के विषय में है, और उसके नाम को महिमा देने के विषय में है।

क्या परमेश्वर के प्रति आपका प्रेम ठण्डा पड़ गया है? क्या स्तुति और उपासना आपके लिए आनन्द की अपेक्षा एक बोझ बन गई है? जब ऐसे भाव उत्पन्न हों, तो एकमात्र उपाय है—अपनी दृष्टि को फिर से मसीह पर स्थिर करें। उसके क्रूस पर किए गए पूर्ण कार्य को अपने मन में ताज़ा स्मरण करें; तब उस अन्धे भिखारी की भाँति आप भी मसीह की उपासना में उमड़ पड़ेंगे।

मरकुस 10:46-52
पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: भजन 74–76; प्रेरितों 27:1-26 ◊

8 August : सर्व सृष्टीचा अधिपती

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8 August : सर्व सृष्टीचा अधिपती
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पदरात चिठ्ठ्या टाकतांत, पण त्यांचा निर्णय सर्वस्वी परमेश्वराकडून होतो. (नीतिसूत्रे 16:33)

आधुनिक भाषेत आपण ते ह्या शब्दांत मांडू शकतो, “फासा तर टेबलावर टाकला जातो, पण प्रत्येक बाजी व तिचा शेवट सर्वस्वी परमेश्वराकडून होतो.”

दुसऱ्या शब्दांत सांगायचे झाल्यांस, ह्या जगांत घडणारी अशी कोणतीही लहानांत लहान घटना नाहीं ज्यामागे देवाचा हेतूं नसावा वा जी तो स्वतः घडवून आणत नाहीं. “दोन चिमण्या दमडीला विकतांत कीं नाहीं? तथापि तुमच्या पित्याच्या आज्ञेवाचून त्यांतून एकही भूमीवर पडणार नाहीं. तुमच्या डोक्यावरील सर्व केसदेखील मोजलेलें आहेत” (मत्तय 10:29-30).

तुमच्या शहरातील प्रत्येक फास, हजारो जंगलात भूमीवर पडणारी प्रत्येक लहानात लहान चिमणी – हे सर्व देवाच्या आज्ञेनुसार आहेंत.

योनाच्या पुस्तकात आपण वाचतो कीं परमेश्वर एका प्रचंड माशाला आज्ञा देतो कीं त्यानें एका पुरुषाला गिळंकृत करावें (1:17), तो एका झाडाला सावली द्यावयांस उगविण्याची आज्ञा देतो (4:6), व मग तो एका किड्याला ते झाड सुकविण्याची आज्ञा देतो (4:7).

मासे व किडे यांची सृष्टीच काय, तर तो याहीपेक्षा मोठ-मोठी कृत्यें आज्ञा देऊन करतो, जसे कीं आकाशातील तारे हें देवाच्या आज्ञेनुसार बाहेर येतांत व ते सर्व आपापल्या ठिकाणी स्थिर राहतांत.

आपलें डोळे वर करून पाहा; ह्यांना कोणी उत्पन्न केलें? तो त्यांच्या सैन्याची मोजणी करून त्यांना बाहेर आणतो; तो त्या सर्वांना नावांनी हाक मारतो, तो महासमर्थ व प्रबळ सत्ताधीश आहे; म्हणून त्यांपैकीं कोणी उणा पडत नाहीं. (यशया 40:26)

तर मग, या जगात घडणाऱ्या नैसर्गिक घटना किती विशेषकरून त्याच्या आज्ञेप्रमाणें घडून येत असतील– मग ते हवामान असो, विपत्ती असोत वा रोगराई, मनुष्याचे अपंगत्व असो वा मरण.

आपली व्यवस्था तो अंमलात आणतो;

सर्व तारे त्याच्या आज्ञेने गतिमान

सूर्य आपल्या कक्षेत त्याची आज्ञा पाळून चमकतो;

टेकड्या व पर्वत,

नद्या व झरे,

महासागराच्या खोलीही

त्याचे परमेश्वरत्व जाहिर करतांत.

(“ज्यांत काहीं जीवन आहे, ते सर्व,” कॅथरीन डेव्हिस)

यास्तव, ज्याअर्थी आपल्याला हे ठाऊक आहे कीं कोणतीही नैसर्गिक घटना देवाचे ज्ञान व त्याच्या सत्संकल्पानुसार असून त्यां त्याच्या आज्ञेच्या बाहेर नाहींत,  तर आपण परम आदराने भयभीत होऊन शांत राहू या.

7 अगस्त : महिमा का भार

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7 अगस्त : महिमा का भार
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“ज्योंही उसने परमेश्‍वर के सन्दूक का नाम लिया त्योंही एली फाटक के पास कुर्सी पर से पछाड़ खाकर गिर पड़ा; और बूढ़ा और भारी होने के कारण उसकी गर्दन टूट गई, और वह मर गया। उसने तो इस्राएलियों का न्याय चालीस वर्ष तक किया था।” 1 शमूएल 4:18

बाइबल में बहुत अधिक स्थान ऐसे नहीं हैं जहाँ किसी के भार का उल्लेख किया गया हो! अतः यह वचन हमें उसके महत्त्व पर ठहरकर विचार करने को बाध्य करता है। ऐसा प्रतीत हो सकता है कि एली के भारी होने का उल्लेख केवल उसकी मृत्यु की भौतिक परिस्थिति को समझाने के लिए है; परन्तु यह उससे अधिक गहरा है।

इससे पहले, 1 शमूएल 2:12-17 में, लेखक बताता है कि एली के पुत्रों की एक प्रथा थी कि वे बलिदान के लिए प्रस्तुत माँस में अपना तीन नोक वाला काँटा डालकर, उस माँस में से अपने और अपने परिवार के लिए भाग निकाल लेते थे—उस माँस में से जो केवल परमेश्वर का था। वे उस तम्बू का—जिसे परमेश्वर ने अपनी प्रजा के बीच अपने वास के लिए ठहराया था—तिरस्कार करते थे, और यह ठहराते थे कि उनके अपने सांसारिक आकर्षण और स्वार्थपूर्ण अभिलाषाएँ परमेश्वर की महिमा से बढ़कर हैं। एक प्रकार से कहा जाए, तो परमेश्वर की महिमा को लूटकर एली के पेट के चारों ओर बाँध दिया गया था (पद 29)। उसका मोटापा शीलो में याजकों द्वारा किए जा रहे और बढ़ाए जा रहे उस पाप का बाहरी चित्र था।

यह बात मूल इब्रानी भाषा में और भी स्पष्ट है, जहाँ “भारी” के लिए प्रयुक्त शब्द काबेद है। यही शब्द काबोद का क्रियात्मक रूप है, जिसका अर्थ “महिमा” है। लेखक यहाँ शब्द-खेल का प्रयोग करता है, यह दिखाने के लिए कि जब मनुष्य—अपने आप से और अपने महत्त्व से चिपटे हुए—परमेश्वर की महिमा को हड़पने का प्रयास करते हैं, तब वे व्यवहार में यह मान लेते हैं कि परमेश्वर हल्का है और उसे वे अपनी इच्छा के अनुसार चला सकते हैं। और इस प्रकार स्वयं को भारी समझते हुए वे हर बात में प्रधानता पाना चाहते हैं।

किन्तु अन्ततः एली के जीवन का सूर्य अस्त हुआ—या कहें कि घटनाएँ एली पर टूट पड़ीं—और वह एक दुखदायी मौत मर गया। वह अब बाइबल में उन कई व्यक्तियों में से एक है, विशेषकर याजकीय या पासबानीय कार्यक्षेत्र में, जो पौलुस के इन वचनों में निहित चेतावनी का प्रत्यक्ष उदाहरण हैं: “इसलिए जो समझता है, ‘मैं स्थिर हूँ,’ वह चौकस रहे कि कहीं गिर न पड़े” (1 कुरिन्थियों 10:12)।

यह बुद्धि केवल उन व्यक्तियों के लिए नहीं है जो स्वयं को अजेय समझते हैं—यद्यपि यह उनके लिए निश्चित ही है। यह परमेश्वर की समस्त सभा के लिए भी एक प्रखर चेतावनी है। आइए हम इस विचार से भी घृणा करें कि कहीं हमारी कलीसियाओं में हम परमेश्वर की योग्य महिमा में से कुछ लेकर अपनी सेवा करवाने, अपने को सुख देने, या अपने को बढ़ाने में न लगा दें। इस रविवार जब आप अपनी कलीसिया की ओर जाएँ, तो स्मरण रखें कि आप वहाँ सर्वप्रथम और सर्वोपरि अपने महान, पारलौकिक, महिमामय प्रभु की महिमा करने और उसकी प्रजा को उत्साहित करने के लिए जा रहे हैं—न कि अपने लिए।

1 इतिहास 16:8-34
◊ पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: भजन 72–73; प्रेरितों 26

7 August : निर्मितीचा उद्देश्य

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7 August : निर्मितीचा उद्देश्य
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देवानें आपल्या प्रतिरूपाचा मनुष्य निर्माण केला; देवाचे प्रतिरूप असा तो निर्माण केला. नर व नारी अशी ती निर्माण केलीं. (उत्पत्ति 1:27)

देवानें मनुष्यांना यासाठीं आपल्या प्रतिरूपाचे निर्माण केलें कीं हे संपूर्ण जग देवाचे प्रतिबिंब दाखविणाऱ्या परिवर्तकांनी भरून जावें. म्हणजें देवाच्या प्रतिरूपांनी भरून जावें. देवाच्या सात अब्ज प्रतिरूपांनी भरून जावें. हेतू हा कीं कोणीही निर्मितीचा उद्देश्य पूर्ण करण्यांस चुकू नये.

कोणीही मनुष्य (जोपर्यंत काहींना पाषाणरूपी अंतकरणामुळें आंधळे करून सोडून दिलें जात नाहीं) मानव-अस्तित्वाचा उद्देश्य समजण्यांस चुकू शकत नाहीं, म्हणजें देव — त्याला ओळखणें, त्याजवर प्रीति करणें, व तो कसा आहे हे त्याच्या प्रतिरूपावरून दाखवून देणें. यशया 6:3 मध्यें देवाचे दूत जल्लोष करतांत, “पवित्र, पवित्र, पवित्र, सेनाधीश परमेश्वर! त्याच्या गौरवाने सर्व पृथ्वी भरून गेली आहे!” पृथ्वी अशा कोट्यवधी मनुष्यांनी भरलेली आहे ज्यांना देवाच्या प्रतिरूपाचा निर्माण करण्यांत आलें होते. गौरवाने सुशोभित.

पण फक्त मानवच नाहीं, तर निसर्गहि! आपल्या वास्तव्यासाठीं असे चित्तथरारक जग अस्तित्वांत का आहे? हे इतके अफाट विश्व कशासाठीं?

एकदा माझ्या असें वाचण्यांत आलें कीं मानवांनी जितके शब्द आजवर बोललें असतील त्यापेक्षा असंख्य तारे व ग्रह या विश्वात आहेत. इतके का आहेत? हे विश्व इतके अफाट का आहे? इतके तेजस्वी का आहे? आणि ते एकमेकांपासून इतक्या अकल्पनीय अंतरावर का आहेंत? बायबल याविषयी निर्विवादपणें स्पष्ट उत्तर देते: “आकाश देवाचा महिमा वर्णिते” (स्तोत्र 19:1).

जर कोणी असा प्रश्न विचारला कीं, “पृथ्वी हाच जर एकमेव लोकवस्ती असलेला ग्रह आहे आणि ताऱ्यांमध्यें केवळ मनुष्य हाच एकमेव बुद्धिमान प्राणी आहे, तर एवढे मोठे आणि रिकामे विश्व का?” उत्तर आहे: विषयवस्तु आपण स्वतः नाहीं. देव मुख्य विषयवस्तु आहे. यावर अधिक जोर देऊन भाष्य केलें जाऊ शकत नाहीं. तो सर्वांत गौरवी आहे. महापराक्रमी आहे. तो सर्वत्र आहे. सर्व आकाशगंगा एकत्रित करण्यांत आल्या तरी त्याचे तेज अद्वितीय आहे. कोणी एका ज्ञानी मनुष्यानें असे म्हटलें, कीं विश्व हे शेंगदाणासारखे आहे जे देव खिशात घेऊन फिरतो.

देवानें आपल्याला यासाठीं निर्माण केलें कीं आपण त्याला ओळखावें, त्याच्यावर प्रीति करावीं व त्याचे वैभव दाखवून द्यावें. मग त्यानें आपल्याला तो कसा आहे याविषयीचा संकेत दिला : म्हणजें हे विश्व.

6 अगस्त : वह मनोभाव जो एकता उत्पन्न करता है

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6 अगस्त : वह मनोभाव जो एकता उत्पन्न करता है
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“जैसा मसीह यीशु का स्वभाव था वैसा ही तुम्हारा भी स्वभाव हो; जिसने परमेश्‍वर के स्वरूप में होकर भी परमेश्‍वर के तुल्य होने को अपने वश में रखने की वस्तु न समझा। वरन् अपने आप को ऐसा शून्य कर दिया, और दास का स्वरूप धारण किया, और मनुष्य की समानता में हो गया। और मनुष्य के रूप में प्रगट होकर अपने आप को दीन किया, और यहाँ तक आज्ञाकारी रहा कि मृत्यु, हाँ, क्रूस की मृत्यु भी सह ली।” फिलिप्पियों 2:5-8

कलीसिया विभिन्न पृष्ठभूमि, व्यक्तित्वों और अनुभवों वाले लोगों का एक समूह है—या कम से कम होना चाहिए। परन्तु फिर भी, हम “सब मसीह यीशु में एक” हैं (गलातियों 3:28)। यदि यह सत्य केवल एक नारा न होकर अनुभव का पक्ष बने, तो यह अत्यन्त आवश्यक है कि बाइबल इस विषय में जो कहती है उस पर हम ध्यान दें, कि कौन-सा मनोभाव एकता उत्पन्न करता है। मूल रूप से, पौलुस दिखाता है कि एकता उस समय उत्पन्न होती है, जब हम अपना ध्यान परमेश्वर के पुत्र की दीनता पर केन्द्रित करते हैं।

पौलुस हमें उस थियोलॉजिकल नींव की ओर ले जाता है जो दीनता उत्पन्न करती है, यह बताकर कि यीशु ने अपने आप को कैसे दीन किया: “जैसा मसीह यीशु का स्वभाव था वैसा ही तुम्हारा भी स्वभाव हो; जिसने परमेश्‍वर के स्वरूप में होकर भी . . .।” यीशु अनन्तकाल से पूर्ण परमेश्वर है। कभी ऐसा समय नहीं हुआ जब वह परमेश्वर नहीं था। यहाँ से आरम्भ करके, पौलुस मसीह की दीनता का विस्तार स्पष्ट करता है। यद्यपि यीशु पूर्ण परमेश्वर है, तौभी उसने “परमेश्‍वर के तुल्य होने को अपने वश में रखने की वस्तु न समझा।” “स्वर्ग का सर्वोच्च स्थान उसका सार्वभौम अधिकार है,” परन्तु अपनी चिरस्थाई महिमा के ऊपर उसने एक और प्राथमिकता रखी—अपनी स्वेच्छा से और जानबूझकर उन विशेषाधिकारों को त्याग देना जो परमेश्वर के तुल्य होने के कारण उसके थे। केवल इतना ही नहीं, यीशु ने और अधिक दीन होकर अपने आप को “शून्य” बनाया। उसने यह अपने ईश्वरत्व को घटाकर नहीं, वरन् मानवता को जोड़कर किया—उसने “दास का स्वरूप धारण किया, और मनुष्य की समानता में हो गया।” वह पृथ्वी पर उतना ही दास बन गया जितना वह स्वर्ग में अधिपति था।

परन्तु तब भी उसकी दीनता पूर्ण नहीं हुई थी। उसने अपने आप को इतना दीन किया और “यहाँ तक आज्ञाकारी रहा कि मृत्यु, हाँ, क्रूस की मृत्यु भी सह ली।” उसने शिशु के रूप में जन्म लेने, मनुष्य के रूप में जीवन बिताने, तिरस्कृत होकर दुख उठाने, और अपराधी के समान मरने का चयन किया। उसने स्वर्गदूतों की आराधना को त्याग कर मनुष्यों की घृणा को स्वीकार किया। क्या आप देख सकते हैं कि सम्पूर्ण विश्व के धर्मों में यह कितना अद्वितीय है? ऐसा कहीं और नहीं है!

पहली दृष्टि में ये बातें केवल दूरस्थ सिद्धान्त प्रतीत हो सकती हैं, परन्तु वास्तव में यह दीनता हमारी कलीसिया के भीतर के दैनिक व्यवहार और मनोभावों को रूपान्तरित करती है। जब हम यह अद्‌भुत और अगम्य सत्य देखते हैं कि समस्त सृष्टि का सृष्टिकर्ता इस संसार में उतरा, हमारे समान मानवता को ग्रहण किया, हमारे साथ चला, हमारे धूल भरे मार्ग को छूआ—और उसने यह सब हमारे लिए किया—तब हम समझ पाते हैं कि हमें अपने सहविश्वासियों को कैसे देखना चाहिए। परमेश्वर का वचन हमें आदेश देता है, “जैसा मसीह यीशु का स्वभाव था वैसा ही तुम्हारा भी स्वभाव हो।” आप दूसरों की आवश्यकताओं पर कैसे ध्यान देंगे? आप उन्हें अपने से अधिक कैसे मानेंगे? यह मनोभाव आपकी प्रार्थनाओं और आपके दिन के व्यवहार को कैसे दिशा देगा?

याकूब 2:1-5
पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: भजन 70–71; प्रेरितों 25 ◊