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17 मार्च : प्रार्थना के द्वारा छुटकारा

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17 मार्च : प्रार्थना के द्वारा छुटकारा
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“मैं जानता हूँ कि तुम्हारी विनती के द्वारा, और यीशु मसीह की आत्मा के दान के द्वारा, इसका प्रतिफल मेरा उद्धार होगा।”  फिलिप्पियों 1:19

क्या आपके जीवन में ऐसे लोग हैं, जिनके लिए आप इसलिए प्रार्थना नहीं करते क्योंकि आपको लगता है कि उन्हें इसकी आवश्यकता नहीं है? हमारे सीमित मानवीय दृष्टिकोण में यह सहज बात हो सकती है कि हम उन लोगों को अनदेखा कर दें, जो बाहर से पूरी तरह व्यवस्थित दिखते हैं। किन्तु सच्चाई यह है कि हम सभी को दूसरों की प्रार्थनाओं की आवश्यकता होती है और हमें उन प्रार्थनाओं से लाभ भी होता है।

जब प्रेरित पौलुस जेल में था, तो उसने फिलिप्पियों की कलीसिया को लिखा और कहा कि वह जानता है कि उसका छुटकारा न केवल पवित्र आत्मा की सहायता से होगा, परन्तु परमेश्वर के लोगों की प्रार्थनाओं के द्वारा भी होगा। चाहे उसका तात्पर्य अपनी तात्कालिक कठिनाइयों से छुटकारा हो या उसे मसीह की उपस्थिति में ले जाने वाला अन्तिम उद्धार, पौलुस चाहता था कि फिलिप्पी में उसके मसीही मित्र यह जानें कि सेवाकार्य में बने रहने के लिए वह दूसरों की प्रार्थनाओं पर निर्भर था।

ऐसा उसने केवल इस मण्डली को ही नहीं कहा था। जब पौलुस ने रोम के मसीहियों को लिखा तब भी उसने यही बात कही थी, “हे भाइयो, हमारे प्रभु यीशु मसीह के और पवित्र आत्मा के प्रेम का स्मरण दिला कर मैं तुम से विनती करता हूँ कि मेरे लिए परमेश्‍वर से प्रार्थना करने में मेरे साथ मिलकर लौलीन रहो कि मैं . . . बचा रहूँ” (रोमियों 15:30-31)। वह चाहता था कि वे साथ मिलकर संघर्ष करें और ताजगी से भरे रहें। वह चाहता था कि उसकी सेवा संतों के लिए सहायक हो। वह चाहता था कि उसे उद्धार मिले। और उसने उनसे कहा कि यह सब उनकी प्रार्थनाओं के माध्यम से ही पूरा किया जा सकता है! जैसा कि प्रसिद्ध अंग्रेज प्रचारक सी.एच. स्पर्जन ने कहा था कि प्रार्थना वह रस्सी है जो परमेश्वर की उपस्थिति में लगी घंटियाँ बजाती है।[1] परमेश्वर के प्रावधान में यह उसकी पद्धति, उसकी योजना और उसकी शक्ति को खोल देती है।

परमेश्वर को पुकारो, यही वह बात है जो पौलुस हमें करने के लिए प्रेरित कर रहा है। यदि हम परमेश्वर के आत्मा को एक ऐसे तरीके से कार्य करते देखना चाहते हैं जिसे केवल अलौकिक कहा जा सकता है, तो हमें पहले गम्भीरता से, दीनता से और निरन्तर प्रार्थना करने के लिए तैयार होना होगा। पौलुस के शब्द हमें बताते हैं कि जब हम अन्य संतों के साथ मिलकर काम करते हैं, तो हम उनकी निर्बलताओं में उनकी सहायता कर सकते हैं। हम उनको साहस प्रदान किए जाने की प्रार्थना कर सकते हैं। हम उनके उद्धार में एक भूमिका निभा सकते हैं।

आप किसे जानते हैं, जिसे आपकी प्रार्थनाओं की आवश्यकता है? क्या आप लगन के साथ, साहसिक रूप से और हठ के साथ उनके लिए प्रार्थना करेंगे? और आप किसे जानते हैं जो बाहर से ऐसा नहीं दिखता कि उसे आपकी प्रार्थनाओं की आवश्यकता है? वास्तविकता यह है कि उन्हें भी इसकी आवश्यकता है! क्या आप उनके लिए भी इसी प्रकार प्रार्थना करेंगे?      

 फिलिप्पियों 1:3-11

17  March : प्रार्थनेचा प्रमुख उद्गार

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17  March : प्रार्थनेचा प्रमुख उद्गार
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“देवाची वचनें कितीही असोत, त्याच्या ठायी होय हे आहे; म्हणून आम्हीं देवाच्या गौरवाला त्याच्या द्वारें आमेन म्हणतो.” ( 2 करिंथकरास पत्र 1:20 )

प्रार्थना ही देवाच्या अभिवचनाला, म्हणजे भविष्यातील त्याच्या खात्रीदायक कृपेला दिलेला प्रतिसाद आहे.

प्रार्थना ही देवाच्या खात्यातून त्यानें आपल्यां करिता जमवलेली भविष्यातील कृपा काढून घेणे हे आहे.

प्रार्थना म्हणजे असा अंधविश्वास नाहीं कीं, कदाचित चांगले हेतु असलेला एक देव असू शकतो. प्रार्थना देवाच्या अभिवचनांवर विश्वास ठेवते, आणि देवाच्या भविष्यातील कृपेच्या खात्याकडें दररोज जाते आणि गरजेच्या वेळी लागणारी कृपा काढून घेते.

ह्या महान वचनातील दोन भागांमध्यें जो दुवा आहे तो लक्ष्यांत घ्या. “म्हणून” या शब्दाकडें लक्ष द्या.

“देवाची वचनें कितीही असोत, त्याच्या ठायी होय हे आहे. म्हणून (यास्तव)  आपण देवाच्या गौरवाला त्याच्या द्वारें आमेन म्हणतो.”

आपल्यां ते लक्ष्यांत आले याची खात्री करण्याकरिता ह्या दोन भागांकडें पाहूया : आपण प्रार्थना करतो तेव्हां आपण देवाला ख्रिस्ता द्वारें आमेन म्हणतो, कारण देवानें ख्रिस्तामधील त्याच्या सर्व अभिवचनांना खात्रीपूर्वक आमेन  म्हंटले आहे. प्रार्थना ही देवाकडें केलेलीं भरवशाची विनवणी आहे कीं त्यानें ख्रिस्तामध्यें भविष्यासाठीं देऊ केलेल्यां अभिवचनांनी आपल्यांला आशीर्वादित करावे. प्रार्थना आपल्यां भविष्यातील कृपेवरील विश्वासाला सर्व गोष्टींच्या पायाशी जोडते, जो येशू ख्रिस्त आहे.   

हि गोष्ट आपल्यांला आपल्यां शेवटच्या मुद्दयाकडें आणते : “आमेन” हा प्रार्थनेतील एक संपूर्ण आणि मोलवान शब्द आहे. याचा अर्थ असा होत नाहीं कीं , “होय, मी ही प्रार्थना केलीं आहे.” याचा प्रामुख्याने अर्थ असा आहे कीं, “होय, देवानें ही सर्व अभिवचनें देऊ केलीं आहेत.”

आमेन म्हणजे, “होय, प्रभू तू हे करू शकतोस.” “होय, प्रभू तू सामर्थ्यशाली आहेस.  होय, प्रभू तू ज्ञानी आहेस. होय, प्रभू तू दयाळू आहेस. होय, प्रभू भविष्यातील सर्व कृपा तुझ्याकडून येते आणि त्याची खात्री ख्रिस्ता द्वारें आम्हांला प्राप्त झाली आहे.”

“आमेन” हा सादर केलेंल्यां प्रार्थनेच्या आशेचा उद्गार आहे, आणि साहाय्यासाठीं केलेंल्यां प्रार्थनेच्या भरवश्याची खात्री आहे.

16 मार्च : व्याकुल मन के लिए शान्ति

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16 मार्च : व्याकुल मन के लिए शान्ति
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“जिनकी [तुम्हारी] रक्षा परमेश्‍वर की सामर्थ्य से विश्वास के द्वारा उस उद्धार के लिए, जो आने वाले समय में प्रगट होने वाली है, की जाती है। इस कारण तुम मगन होते हो, यद्यपि अवश्य है कि अभी कुछ दिन के लिए नाना प्रकार की परीक्षाओं के कारण दुख में हो।”  1 पतरस 1:5-6

दुख के बारे में हमें दो बातें स्वीकार करने की आवश्यकता है, पहली कि दुख वास्तव में होता है,  और दूसरी कि यह कष्ट देता है।  कष्ट हर किसी के जीवन की वह वास्तविकता है, जो कभी न कभी अवश्य ही आता है। ऐसा कष्ट कई रूपों में आता है, जिसमें मानसिक कष्ट सबसे बड़ा है।

संगी विश्वासियों को दुख के बारे में लिखते समय पतरस ने कहा कि दुख अनेक और विभिन्न तरीके से आ सकता है। पतरस के पहले पाठकों को जो विशिष्ट दुख था, वह मानसिक पीड़ा थी जो कठिनाइयों को सहते रहने से आती है, किन्तु पतरस भली-भाँति जानता था कि ऐसी कई प्रकार की परीक्षाएँ होती हैं, जो हमारे मनों को परेशान करती हैं और हमारी आत्माओं को कुचल देती हैं।

सुसमाचार के कारण पतरस अपने लेख का समापन निराशा और हताशा की स्थिति में नहीं करता। इसके विपरीत, वह हमें ऐसी प्रतिज्ञाएँ देता है, जिन पर हम विश्वास कर सकते हैं।

सबसे पहले, पतरस हमें याद दिलाता है कि हमारी परीक्षाएँ केवल “कुछ दिन” के लिए हैं। अब, “कुछ दिन” को अनन्त काल के प्रकाश में समझने की आवश्यकता है। यहाँ तक कि जीवन भर का समय भी सदा काल की तुलना में “कुछ दिन” ही है! इस प्रकार, इस जीवन में कष्ट का एक लम्बा समय भी परमेश्वर की व्यवस्था में और उसकी सन्तानों के लिए उसकी योजना और उद्देश्य के सन्दर्भ में “कुछ दिन” है। इसका अर्थ यह नहीं है कि इस तरह के कष्ट का समय थोड़ा महसूस होगा,  विशेषकर जब हम कष्ट के मध्य में हों। कई लोगों के लिए कष्ट का अर्थ यह होता है कि एक मिनट भी एक दिन जैसा लगता है, एक दिन एक साल जैसा लगता है, और एक साल कभी न समाप्त होने वाला समय लगता है। किन्तु हम इस प्रतिज्ञा से लिपटे रह सकते हैं और हमें रहना भी चाहिए कि हमारी वर्तमान विपत्ति अनन्त काल के लिए हमारा अन्त नहीं है। हो सकता है कि आज आपका जीवन दुख से भरा हो, परन्तु एक दिन, “उस अन्तिम समय में,” आप उद्धार से भर जाएँगे।

दूसरी बात, हम हियाव के साथ कह सकते हैं कि दुख के प्रत्येक क्षण में परमेश्वर उपस्थित होता है। तरसुस के शाऊल के हृदय परिवर्तन के वृतान्त में हम पाते हैं कि यीशु अपने लोगों के दुख के साथ घनिष्ठता से जुड़ा हुआ है। वह कहता है, “हे शाऊल, हे शाऊल, तू मुझे  क्यों सताता है?” (प्रेरितों 9:4, अतिरिक्त महत्त्व जोड़ा गया)। जब यीशु स्वर्ग में था तो वह “मुझे” कैसे कह सकता था? इसका कारण यह था कि आत्मा के माध्यम से मसीह अपने लोगों के साथ उपस्थित था। वह उनके साथ पूर्ण एकता में खड़ा था। जब वे घाटियों से होते हुए अपने अन्तिम उद्धार के दिन की ओर बढ़ रहे थे, उस समय उसका आत्मा उनकी रक्षा करते हुए उनके साथ था। वह हमारे लिए भी ऐसा ही करता है।

आपके पास प्रभु यीशु के रूप में एक महान महायाजक है, जो आपकी निर्बलताओं में आपके साथ दुखी होने में पूरी तरह सक्षम है (इब्रानियों 4:15)। जब इस झूठ पर विश्वास करने का प्रलोभन आपके सामने आए कि परमेश्वर ने आपको छोड़ दिया है या फिर यह कि कोई नहीं समझ सकता कि आप कैसा महसूस कर रहे हैं या आप क्या झेल रहे हैं, तो आप इस बात में हियाव रख सकते हैं कि “हमारे दिल की कोई धड़कन या कोई पीड़ा ऐसी नहीं है, जिसे वह ऊपर बैठा महसूस नहीं कर सकता।”[1] और आप इस बात में भी हियाव रख सकते हैं कि एक दिन सारा दुख पीछे रह जाएगा और आगे केवल महिमा होगी। यह एक ऐसी सच्चाई है, जिसमें आप आज आनन्दित हो सकते हैं, चाहे आज कुछ भी हो।       

1 पतरस 1:3-9

16 March : येशू महान कामगिरी पूर्ण करणार

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16 March : येशू महान कामगिरी पूर्ण करणार
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“सर्व राष्ट्रांना साक्षीसाठीं म्हणून राज्याची ही सुवार्ता सर्व जगात गाजवली जाईल, तेव्हां शेवट होईल.” (मत्तय 24 : 14 )

मला सुवार्ताप्रसाराविषयीं येशूच्या ह्या अभिवचनापेक्षा इतर कोणतेच शब्द प्रेरणादायी वाटत नाहींत.

तो असे म्हणत नाहीं कीं : ही सुवार्ता गाजवली पाहिजे. 

असे म्हणत नाहीं कीं : ही सुवार्ता कदाचित गाजवली जाईल.

पण तो म्हणतो : ही सुवार्ता गाजवली जाईल.

ही महान कामगिरी नाहीं किंवा महान आज्ञा नाहीं. तर ही महान निश्चितता आहे, महान भरवसा आहे.

कोणी अश्याप्रकारे बोलायचे धाडस कसे काय करू शकते? त्याला कसे ठाऊक आहे कीं असेच होईल? त्याला कशी खात्री असू शकते कीं मंडळी सुवार्ता कार्यात अपयशी ठरणार नाहीं?

उत्तर : सुवार्ताप्रसार कार्याची कृपा ही पुनरुज्जीवनाच्या कृपेप्रमाणेच आहे, कोणी त्याचा प्रतिकार करू शकत नाहीं. ख्रिस्त वैश्विक घोषणेचे वचन देऊ शकतो कारण तो सार्वभौम आहे. त्याला भविष्यातील सुवार्ता कार्याच्या यशाबद्दल ठाऊक आहे कारण तोच भविष्य ठरवतो. सर्व राष्ट्रे ऐकतील!

“राष्ट्र” म्हणजे आधुनिक “देश” नव्हे. जुन्या करारात जेव्हां इतर राष्ट्रांचा उल्लेख केला जातो, तेव्हां तें वांशिक लोक गटांबद्दल बोलले गेले आहे, जसे कीं यबुसी, हित्ती, अमोरी, मवाबी, कनानी आणि पलिष्टी. “राष्ट्र” म्हणजे स्वत:ची विशिष्ट भाषा आणि संस्कृती असणारे विविध वंशाचे लोक. ( स्तोत्र 117:1 ) : “सर्व राष्ट्रांनो परमेश्वराचे स्तवन करा, अहो सर्व लोकांनो, त्याचें स्तवन करा.” राष्ट्र म्हणजे लोक – विविध लोक गट, जसे कीं आपण त्यांना संबोधतो.

देवाचा सार्वभौम पुत्र आणि मंडळीचा प्रभू या नात्यानें, येशूनें हा दैवी उद्देश हाती घेतला आणि संपूर्ण खात्रीने तो बोलला कीं, “सर्व राष्ट्रांना साक्षीसाठीं म्हणून राज्याची ही सुवार्ता सर्व जगात गाजवली जाईल, तेव्हां शेवट होईल” ( मत्तय 24 : 14 ).

जगाच्या सुवार्ताप्रसाराचे कार्य यशस्वी होणार याबद्दल खात्री दिली गेली आहे. ते अपयशी ठरू शकत नाहीं. मग हे रास्त नाहीं का, कीं आपण मोठ्या विश्वासाने प्रार्थना करू व मोठ्या भरवश्याने गुंतवणूक करू आणि यशाच्या खात्रीने  पुढे वाटचाल करू ?

15 मार्च : परमेश्वर की अनन्त योजना

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15 मार्च : परमेश्वर की अनन्त योजना
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“हमारे प्रभु यीशु मसीह के परमेश्‍वर और पिता का धन्यवाद हो कि उसने हमें मसीह में स्वर्गीय स्थानों में सब प्रकार की आत्मिक आशीष दी है। जैसा उसने हमें जगत की उत्पत्ति से पहले उसमें चुन लिया कि हम उसके निकट प्रेम में पवित्र और निर्दोष हों।”  इफिसियों 1:3-4

बाइबल इस बात का कोई सीधा उत्तर नहीं देती कि परमेश्वर ने अदन की वाटिका में पतन क्यों होने दिया। वह केवल इतना बताती है कि परमेश्वर सब कुछ पर नियन्त्रण रखता है, यहाँ तक कि उस घटना पर भी।

तथापि इफिसियों को लिखे पौलुस के पत्र में हमें परमेश्वर की अनन्त योजना की एक झलक दी गई है। हम देखते हैं कि परमेश्वर हमारे संसार के अस्तित्व में आने से पहले ही काम कर रहा था और पतन की घटना ने उसे चौंका नहीं दिया था। जब आदम और हव्वा के विद्रोह के परिणामस्वरूप राज्य भ्रष्ट हो गया, तो परमेश्वर पहले से जानता था कि ऐसा होगा। आदम और हव्वा के बनाए जाने से पहले, उनकी अनाज्ञाकारिता से पहले, परमेश्वर उद्धार की योजना बना चुका था।

जब हम परमेश्वर के उद्धार के कार्य के बारे में सोचते हैं जो अन्ततः क्रूस पर पूर्ण हुआ, तो हमें इसे केवल एक संकट के समय में प्रदान किए गए समाधान के रूप में नहीं देखना चाहिए। इसके विपरीत, हमें क्रूस को परमेश्वर की अनन्त मंशा से जुड़ा हुआ देखना चाहिए, जिसने अनन्त काल से निश्चय किया हुआ था कि वह यीशु के माध्यम से अपने लिए एक प्रजा को बुलावा देगा और पतन के कारण जो कुछ भ्रष्ट हो चुका है उसे पुनः स्थापित करेगा।

इस योजना में परमेश्वर का उद्देश्य “उसकी इच्छा के भले अभिप्राय के अनुसार” था और है तथा यह “उसके अनुग्रह की महिमा की स्तुति” के लिए है (इफिसियों 1:5-6)। परमेश्वर की अनन्त योजना में प्रेरणा केवल मनुष्यों को प्रसन्न करने की इच्छा नहीं थी—यद्यपि मनुष्य इस कारण से अन्ततः प्रसन्न हो जाते हैं—परन्तु यह प्रेरणा उसके नाम के लिए उसकी चिन्ता थी। उसने निश्चय किया था कि सब कुछ उसके पुत्र प्रभु यीशु के चरणों के अधीन और नियन्त्रण में लाया जाए, जैसा कि होना भी चाहिए। इस प्रकार, छुटकारे की परमेश्वर की अनन्त योजना हमारे बारे में नहीं परन्तु उसके बारे में है। यह हमें प्रभावित अवश्य करती है। यह हमें बदल अवश्य देती है। किन्तु यह सब परमेश्वर के बारे में है। जब तक सुसमाचार हमें उसकी स्तुति करने और उसके लिए जीने के लिए प्रेरित नहीं करता, तब तक हमने इसे ठीक से नहीं समझा है।

परमेश्वर इस संसार का केन्द्र है। पतन के बाद से मनुष्यों ने परमेश्वर के अधिकार को स्वीकार करने से इनकार किया है और साथ ही उसे उसके उपयुक्त स्थान से हटाने का भरसक प्रयास किया है, जिसके परिणाम विनाशकारी हुए हैं। इस वर्तमान जीवन का कोई भी भाग ऐसा नहीं है जो मृत्यु की धूल से ढका न हो, क्योंकि मनुष्य ने यह निर्धारित कर लिया है कि वह इस तथ्य को पसन्द नहीं करता कि परमेश्वर केन्द्र में है।

क्या आप अपने जीवन को पुनः व्यवस्थित करेंगे और इसके प्रत्येक पहलू की देखरेख करने के परमेश्वर के अधिकार को मान्यता देंगे? क्या आप अपनी बढ़ाई के लिए नहीं, परन्तु उसकी स्तुति के लिए और अपने उद्देश्यों के लिए नहीं, परन्तु उसके उद्देश्य के लिए जीने का चुनाव करेंगे? विरोधाभास यह है कि जब आप अपनी नहीं परन्तु उसकी महिमा खोजेंगे, तब आप उस आनन्द का अनुभव करेंगे जो उसके पुत्र को अपने जीवन का केन्द्र मानकर जीने से आता है, जिसकी योजना परमेश्वर ने आपके लिए और समस्त सृष्टि के लिए अनन्त काल से बनाई थी।      

इफिसियों 1:3-14

15 March : ख्रिस्ताकारिता विध्वंसक

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15 March : ख्रिस्ताकारिता विध्वंसक
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मग तो (येशू) पलीकडें गदरेकरांच्या देशात गेल्यांवर दोन भूतग्रस्त कबरांतून निघून येत असताना त्याला भेटले, तेव्हां पाहा, ते ओरडून म्हणाले, ” हे देवाच्या पुत्रा, तू मध्यें का पडतोस ? नेमलेल्यां समयापूर्वी तू आम्हांला पीडण्यास येथे आला आहेस काय ?” मत्तय 8:29

दुरात्मे इथे एक रहस्य शिकत आहेत. त्यांना ठाऊक आहे कीं त्यांचा नाश होणार आहे. त्यांना ठाऊक आहे कीं देवाचा पुत्र हा विजयी होईल. पण त्यांना हे ठाऊक नव्हते कीं त्यांच्या अंतिम पराभवाच्या आधीच ख्रिस्त प्रकट होणार होता.

ख्रिस्त लढाई करिता त्याच्या सैन्य दलाचे पुढारीपण करण्यासाठीं शेवटच्या युद्धा पर्येंत थांबणार नाहीं. त्यानें सैतानाच्या प्रदेशामध्यें विध्वंसक शक्तीला दाखल केलें आहे. त्यानें जीवन वाचवण्यासाठीं त्याच्या “बचाव पथकाला” प्रशिक्षण दिले आहे. ख्रिस्ताने शेवटच्या विजयापूर्वी, विजयी होण्याकारिता अनेक रणनीती आखल्यां आहेत.

त्यामुळे आता युद्धनीती अशी आहे कीं – ज्याअर्थी आता सैतानाचा नाश ठरलेलाच आहे, व हे त्याला पण ठाऊकहि आहे, त्याअर्थी जेव्हां पण तो आपल्यांला त्याचा मागे जाण्यासाठीं मोहात टाकू पाहतो तेव्हां आपण त्याला ह्या गोष्टीची आठवण करून द्यायची आहे. आपण त्याचावर हसून म्हणायचे, “तुझे डोके ठिकाणावर आहे का, तू हरला आहेस आता तुला कोण साथ देणार?”

मंडळी ही “ ह्या युगाच्या दैवतापासून” मुक्त केलीं गेली आहे ( 2 करिंथ 4:4). आपण गनिमी काव्यातले सैनिक आणि योद्धे आहोंत. आपण आज्ञा मोडण्यार्‍या राज्याचा “अंतरिक्षातील अधिपतीच्या” विरुद्ध बंडखोरी करणारे असे सैनिक आहोंत (2 इफिस 2:2).

हे सुरक्षित नाहीं. पण हे थरारक आहे. खूप लोकांचा जीव यात गेला आहे. सैतानाचे दूत त्याच्या विरुद्ध कारवाया करणारांच्या सतत शोधात असतात. जे जीव जाईपर्यन्त लढा देतात ख्रिस्ताने त्यांना पुनरुत्थानाची खात्री दिली आहे. पण त्यानें शत्रूंच्या प्रदेशामध्यें शांती, जगाकडून स्विकृती किंवा समृद्धीची खात्री दिली नाहीं.

पुष्कळांनी आपल्यां सेनापतिच्या आज्ञा पाळत त्यांच्या जीवाचे बलिदान दिले आहे. आणि मी यापेक्षा चांगल्यां जीवनाचा विचार देखील करू शकत नाहीं – आणि मरणाचा देखील नाहीं!

14 मार्च : आदर्श प्रतिबद्धता

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“नून का पुत्र यहोशू और यपुन्ने का पुत्र कालेब, जो देश के भेद लेने वालों में से थे, अपने-अपने वस्त्र फाड़कर, इस्राएलियों की सारी मण्डली से कहने लगे, “जिस देश का भेद लेने को हम इधर-उधर घूम कर आए हैं, वह अत्यन्त उत्तम देश है। यदि यहोवा हम से प्रसन्न हो, तो हम को उस देश में, जिसमें दूध और मधु की धाराएँ बहती हैं, पहुँचाकर उसे हमें दे देगा।”  गिनती 14:6-8

3 मई 1953 को सिंगापुर से लन्दन जा रहा एक विमान भारत के कोलकाता से 22 मील उत्तर-पश्चिम में दुर्घटनाग्रस्त हो गया, जिसमें कोई भी जीवित नहीं बचा। फ्रेड मिशेल, जो दस साल पहले चाइना इनलैंड मिशन के निदेशक बने थे, उस विमान में यात्रा कर रहे थे। उनकी जीवनी में फ्रेड को “एक साधारण व्यक्ति के रूप में वर्णित किया गया था, जो एक गाँव से थे और उनके माता-पिता श्रमिक वर्ग के थे। उन्होंने अपना अधिकांश जीवन प्रान्तों में रहते हुए एक रसायनज्ञ के रूप में बिताया और वे परमेश्वर के साथ चलते थे।”[1]

जब तक यपुन्ने का पुत्र कालेब एक भेदी न बना था, जिसे मूसा ने उस देश का भेद लेने के लिए नियुक्त किया था, जिसे देने की प्रतिज्ञा परमेश्वर ने अपने लोगों से की थी, तब तक ऐसा कुछ भी नहीं था जो यह संकेत दे कि वह विशेष रूप से महत्त्वपूर्ण या प्रतिष्ठित था। परन्तु ऐसा लगता है कि निश्चित रूप से उन साधारण अनुभवों में उसकी नीरस जीवन-यात्रा में परमेश्वर ने उस चरित्र को गढ़ा और विकसित किया जो गिनती 14 में प्रकट होता है।

संकट हमारे चरित्र को उजागर कर देता है। जब इस्राएली भेदिए कनान देश का भेद लेकर वापस आए तो उन्होंने वर्णन करते हुए कहा कि उसके नगर गढ़ वाले हैं, और “उन लोगों पर चढ़ने की शक्ति हममें नहीं है; क्योंकि वे हमसे बलवान हैं . . . हम अपनी दृष्टि में उनके सामने टिड्डे के समान दिखाई पड़ते थे” (गिनती 13:31, 33)। और लोग परमेश्वर पर आरोप लगाने लगे कि उसने उन्हें ऐसे देश में भेजा है, जहाँ वे मर जाएँगे (गिनती 14:3)।

कालेब की परमेश्वर के लिए प्रतिबद्धता स्पष्ट दिखाई पड़ती है। वह इतने लोगों की सामान्य राय के विरुद्ध खड़ा होने के लिए तैयार था। जब अन्य भेदियों ने प्रतिज्ञा के देश में प्रवेश न करने का सुझाव दिया तो उसने उनका विरोध किया। जब सभी लोग परमेश्वर के प्रति विद्रोह कर रहे थे तो उसने उनका साथ नहीं दिया। वह और उसका विश्वासयोग्य मित्र यहोशू ही थे, जिन्होंने परमेश्वर के प्रति साहसी आज्ञाकारिता का सुझाव दिया।

कालेब को निश्चय था कि परमेश्वर के सामर्थ्य से सब कुछ सम्भव है। उसने दूसरे भेदियों की कही गई बातों की सच्चाई को नकारा नहीं, परन्तु उसने केवल इसे एक अलग दृष्टिकोण से देखा। वह न तो अपनी क्षमता पर और न ही इस्राएलियों की क्षमता पर, किन्तु परमेश्वर के सामर्थ्य और उसके चरित्र की विश्वसनीयता पर भरोसा कर रहा था। वह एक ऐसा व्यक्ति था, जो भय के मध्य में भी विश्वास कर रहा था। वह जानता था कि जिस टिड्डे को परमेश्वर से सहायता प्राप्त हो, वह टिड्डा भी बड़े काम कर सकता है।

यद्यपि हमें लग सकता है कि हमारा जीवन नीरस है, फिर भी हम नीरसता में भी सदैव परमेश्वर को खोज सकते हैं। दैनिक जीवन के साधारण क्षणों में वह हमारे चरित्र को गढ़ेगा कि हम भी प्रत्येक परिस्थिति में साहसी व्यक्ति बन सकें। परमेश्वर अपनी योजनाओं को पूरी करने के लिए बहुत महान लोगों को नहीं ढूँढ रहा है। वह ऐसे साधारण लोगों को ढूँढ रहा है जो उस पर भरोसा करें, विश्वास में आगे कदम बढ़ाएँ और साहसपूर्वक आज्ञा मानने के लिए तैयार हों। आज आपको वैसा व्यक्ति बनने से कोई नहीं सकता।       

गिनती 13:25 – 14:25

14 March : विजय निश्चित आहे

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14 March : विजय निश्चित आहे
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“यास्तव आडदांड लोक तुझे गौरव करितील, बलात्कारी लोकांची शहरे तुझे भय धरितील.”  – (यशया 25:3)

यशया तो दिवस पाहत आहे जेव्हां सर्व राष्ट्रे – सर्व लोक गटांचे प्रतीनिधीं – इस्राएलचा देव याव्हे व त्याचा मसीहा, ज्याला आपण येशू म्हणून ओळखतो, यांच्या बरोबर त्यांचे शत्रुत्व असणार नाहीं.

ते या पुढे बआल किंवा निबो किंवा मोलेख किंवा अल्लाह किंवा बुद्ध किंवा काल्पनिक आदर्श जग निर्माण करण्या करिता असलेले सामाजिक कार्यक्रम किंवा आर्थिक विकास किंवा पूर्वजांची किंवा निसर्गाची भक्ति करणार नाहींत. या ऐवजी ते विश्वासाने देवाच्या पर्वतावर मेजवानीकरिता येतील.

आणि त्यांच्या दु:खाचा पडदा काढून टाकींलेला असेल आणि मरण नाहींसे झालेलें असेल आणि देवाच्या लोकांची निंदा काढून टाकली गेलेली असेल आणि त्यांचे अश्रु कायमचे पुसून टाकलेले असतील.

यशया 25:3 मधील द्रुष्टांत समजून घेण्याकरिता त्याची ही पार्श्वभूमी समजणे गरजेचे आहे. “यास्तव आडदांड लोक तुझे गौरव करितील, बलात्कारी लोकांची शहरे तुझे भय धरितील.” दुसर्‍या शब्दात, देव हा “आडदांड” लोकांपेक्षा अधिक सामर्थ्यशाली आहे, आणि तो इतका बलवान आणि कृपाळू आहे कीं शेवटी तो निर्दयी अशा राष्ट्रांना देखील त्याची भक्ति करायला भाग पाडील.

यशया जे चित्र दाखवत आहे त्यात, सर्व राष्ट्रे देवाची भक्ती करित त्याचाकडें वळाली आहेत, जे त्याचें लोक झाले आहेत त्या सर्व लोकांकरिता मोठी मेजवानी ठेवली आहे, राष्ट्रांमधून सर्व यातना, दु:ख आणि अपमान नाहींसा केला गेला आहे, आणि शेवटी मरण कायमचे नाहींसे केलें गेले आहे. 

हा विजय निश्चित आहे, कारण देवच  हे सर्व करीत आहे. त्यामुळे आपण याची खात्री बाळगू शकतो.

जगात सुवार्ता प्रसाराकरिता खर्च केलें गेलेले एकही जीवन व्यर्थ ठरणार नाहीं, देवाच्या राज्याच्यावाढीसाठीं केलेंली एकही प्रार्थना किंवा खर्च केलेंला एक रुपया किंवा एक संदेश किंवा उत्तेजनासाठीं लिहिलेले एक पत्र किंवा अंधारात प्रकाशणारा एक लहानसा दिवा देखील व्यर्थ ठरणार नाहीं. विजय हा निश्चत आहे.

13 मार्च : सब प्रकार के धीरज सहित

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13 मार्च : सब प्रकार के धीरज सहित
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“प्रेरित के लक्षण भी तुम्हारे बीच सब प्रकार के धीरज सहित चिह्नों, और अद्‌भुत कामों, और सामर्थ्य के कामों से दिखाए गए।”  2 कुरिन्थियों 12:12

जब हम मसीह के पुनरुत्थान और स्वर्गारोहण के तुरन्त बाद के समय के बारे में सोचते हैं, उस समय के बारे में जब प्रेरितों ने सेवाकार्य में उन्नति की और कलीसिया का जन्म हुआ, तो वे “चिह्न, अद्‌भुत काम, और सामर्थ्य के काम” जो किए गए थे, उनकी कल्पना करके यह आशा करना एक सामान्य बात है कि काश हम उन्हें देखने के लिए वहाँ होते तो हमारा विश्वास दृढ़ होता और उनके द्वारा हमारे सेवाकार्य में बढ़ोत्तरी होती।

निस्सन्देह, उस समय की अलौकिक घटनाओं की गुणवत्ता और मात्रा दोनों ही विशेष और अद्वितीय थीं। प्रेरितों को उस रीति से अलौकिक वरदान दिया गया था, जो आज के समय के मसीही लोगों को नहीं दिया गया है। यह ध्यान रखना महत्त्वपूर्ण है कि तब भी आरम्भिक कलीसिया ने इन अनुभवों को अपने विश्वास का मापदण्ड नहीं बनाया। हम केवल उन चमत्कारों पर ध्यान केन्द्रित करके उनके सन्दर्भ को नहीं भूल सकते कि वे लोग जो परमेश्वर के आत्मा से भरे गए थे तुरन्त परमेश्वर के वचन को समझने और उद्‌घोषित करने में लौलीन हो गए थे, जिससे वे अपने पूरे जीवन भर “सब प्रकार का धीरज,” जिसे “बड़ा धीरज” भी कहा जा सकता है, रखने के लिए सशक्त बनाए गए थे। कलीसिया के निर्माण का श्रेय प्रेरितों के चमत्कारों का उतना नहीं दिया जाना चाहिए, जितना उन प्रेरितों की विश्वासयोग्य, साहसिक सहनशीलता को दिया जाना चाहिए।

पौलुस चाहता था कि उसके सेवाकार्य का केन्द्र-बिन्दु न तो उन अनेक चमत्कारों पर हो, जो उसके द्वारा हुए थे और न ही उन बड़ी परीक्षाओं पर हो जो, जिनका उसने सामना किया था। बल्कि वह तो यह चाहता था कि उसके सेवाकार्य का केन्द्र-बिन्दु उस दृढ़ विश्वास पर हो, जो परमेश्वर ने उसे दिया था और उस सत्य पर हो, जिसका उसने प्रचार किया था। पौलुस के सेवाकार्य को देखकर, उसके बोझ को देखकर और उसके हृदय की पुकार को सुनकर हमारे लिए यह देखना सरल हो जाता है कि परमेश्वर ने उसके माध्यम से जो चिह्न और चमत्कार किए थे, वे मसीही दिखावे के दिखावटी प्रदर्शन नहीं थे। अपितु वे पीड़ा और विपत्ति से उत्पन्न हुए थे, वे एक ऐसे जीवन में किए गए जो सहे जाने से परे था और उन्होंने उस सन्देश की सच्चाई को रेखांकित कर दिया जिसका प्रचार किया जा रहा था।

इस सन्दर्भ को जानने के बाद पौलुस के अनुयायियों ने यह नहीं पूछा होगा कि उसने ऐसे चमत्कार कैसे किए थे, बल्कि यह कि वह इतना दृढ़ विश्वास कैसे प्रदर्शित कर सका। वह कष्ट सहते हुए “सब प्रकार के धीरज” के साथ आगे कैसे बढ़ सका? केवल यीशु मसीह में उसके विश्वास और परमेश्वर के वचन के उसके ज्ञान से वह ऐसा करने में सक्षम हो सका था।

हमें मसीही जीवन में धैर्य-युक्त सहनशीलता के साथ परीक्षाओं का सामना करने और चुनौतियों का सामना करने में कौन सी बात सक्षम बनाती है? क्या वे चमत्कार हैं? चिह्न हैं? अद्‌भुत काम हैं? कदापि नहीं। यद्यपि परमेश्वर की विशेष कृपा किसी विशिष्ट क्षण पर हमारी सहायता कर सकती है, तौभी मूल मसीही सैद्धान्तिक शिक्षा की एक ठोस, अनुभवात्मक समझ ही वह बात है जो निस्सन्देह हमारे मार्ग के लिए उस समय पर उजियाला ठहरेगी जब बाकी सब अन्धकारमय लग रहा होगा (भजन संहिता 119:105)। वही समझ हमारे विश्वास की गहरी जड़ है और हमारी आत्माओं के लिए लंगर भी वही है (इब्रानियों 6:19)। जब परमेश्वर की सच्चाई हमारे हृदय और मन में बस जाती है, तब ही हम विश्वास के साथ कह सकते हैं, “हे प्रभु के संतो, उसके उत्तम वचन में तुम्हारे विश्वास की नींव कितनी दृढ़ है!”[1] क्या है वह जो आपको बनाए रखेगा? ऊपरी अनुभव ऐसा नहीं कर सकेंगे, परन्तु केवल आन्तरिक विश्वास ही यह कर सकेगा। आपके भीतर होने वाला आत्मा का काम सर्वदा परमेश्वर द्वारा आपके आस-पास किए जाने वाले किसी भी काम से बड़ा चमत्कार होगा। प्रभु करे कि जब लोग आपकी ओर देखें, तो वे केवल उन अद्‌भुत कामों को ही न देखें जो वह आपके में जीवन करता है, बल्कि परीक्षाओं के मध्य आपके सब प्रकार के धीरज को और उसके वचन के सत्य के प्रति आपके आज्ञापालन को भी देखने पाएँ।       

याकूब 5:7-11

13 March : येशू हा देवाचा आमेन आहे

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13 March : येशू हा देवाचा आमेन आहे
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“देवाची वचनें कितीही असोत, त्याच्या ठायी होय हे आहे; म्हणून आम्हीं देवाच्या गौरवाला त्याच्या द्वारें आमेन म्हणतो. ( 2 करिंथकरास पत्र 1:20 )”

प्रार्थना ही अशी गोष्ट आहे जिथे आपल्यां जीवनातला भूतकाळ व आपला भविष्यकाळ सातत्यानें जुळत असतो. मी इथे ह्या गोष्टीचा उल्लेख करतो कारण पौल ह्या वचनात प्रार्थनेला, देवाच्या “होय” सोबत एका विलक्षण रीतीने जोडत आहे.

2 करिंथकरास पत्र 1:20 मध्यें तो म्हणतो, “देवाची वचनें कितीही असोत, त्याच्या ठायी होय हे आहे; म्हणून आम्हीं देवाच्या गौरवाला त्याच्या द्वारें आमेन म्हणतो.” ह्याचा अर्थ सुलभपणे समजून घेऊया.

इथे तो म्हणत आहे कीं “यास्तव, ख्रिस्तामुळे, आपण प्रार्थनेमध्यें देवाला आमेन हे दाखवण्यासाठीं म्हणतो कीं आपण देवाच्या ज्यां भावी कृपेसाठीं प्रार्थना करितो व जिचसाठीं त्याच्यावर अवलंबून राहतो तेव्हां सर्व गौरव त्यालाच दिलें जाईल.”

जर तुम्हांला कधी हा प्रश्न पडत असेल कीं ख्रिस्ती लोक प्रार्थनेनंतर आमेन का म्हणतात किंवा ही प्रथा कुठून आली, तर त्याचें उत्तर हे आहे कीं. आमेन हा शब्द कोणते ही भाषांतर न करता हिब्रू मधून ग्रीक मध्यें घेतला गेला आहे, अगदी जसा तो कोणत्या ही भाषांतराशिवाय इंग्रजीमध्यें व इतर भाषांमध्यें घेतला गेला आहे.

हिब्रू मध्यें, हे एक खात्रीपूर्वक सांगितलेले अनुमोदन आहे ( नहेम्या 5:22, नहेम्या 5:13; 8:6) – हे एक औपचारिक, आस्थापूर्वक “मी मान्य करतो” किंवा “मी जे बोललो त्या बद्दल मला खात्री आहे” किंवा “हे सत्य आहे” असं म्हणणे. सोप्या शब्दात सांगायचे झाले तर, “आमेन” म्हणजे देवा संदर्भात केलेंले विधान आस्थेने “होय’ असे मानणे.

आता 2 करिंथकरास पत्र 1:20 या वचनातील दोन भागामधील संबंध पाहूया. यातील पहिल्यां भागामध्यें लिहले आहे  कीं “देवाची वचनें कितीही असोत, त्याच्या ठायी होय हे आहे” व दुसर्‍या भागामध्यें लिहिले आहे, “म्हणून आम्हीं देवाच्या गौरवाला त्याच्या द्वारें आमेन म्हणतो.”

जेव्हां आपल्यांला हे समजते कीं “आमेन” आणी “होय” याचा अर्थ सारखाच आहे, तेव्हां हे वचन असे होईल : येशू ख्रिस्तामध्यें, त्याच्या अभिवचनांद्वारें देव आपल्यांला होय असे म्हणतो; आणि ख्रिस्ता मध्यें आपण प्रार्थनेद्वारें देवाला होय असे म्हणतो.