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2 दिसम्बर : सृष्टिकर्ता को जानना

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2 दिसम्बर : सृष्टिकर्ता को जानना
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“सच्‍ची ज्योति जो हर एक मनुष्य को प्रकाशित करती है, जगत में आने वाली थी। वह जगत में था, और जगत उसके द्वारा उत्पन्न हुआ, और जगत ने उसे नहीं पहचाना।” यूहन्ना 1:9-10

यद्यपि चारों सुसमाचार प्रभु यीशु मसीह के जीवन का विवरण देने के लिए भिन्न-भिन्न दृष्टिकोण अपनाते हैं, फिर भी उनका उद्देश्य एक ही है: जैसा कि यूहन्ना लिखता है, “तुम विश्वास करो कि यीशु ही परमेश्वर का पुत्र मसीह है, और विश्वास करके उसके नाम से जीवन पाओ” (यूहन्ना 20:31)। ये वचन उसके सुसमाचार के अन्त के निकट आते हैं और यह उसके आरम्भिक पाठकों को यह स्मरण दिलाने के लिए लिखे गए थे कि परमेश्वर ने अनुग्रहपूर्वक पहल की, ताकि हम उसे जानें और उससे प्रेम करें।

यद्यपि यीशु उस संसार का सृष्टिकर्ता था जिसमें वह आया, फिर भी संसार ने उसे नहीं पहचाना। वह स्वर्ग से मनुष्य के रूप में पृथ्वी पर उतरा, नगरों की गलियों में चला-फिरा, और हमारे बीच वास किया, ताकि हम उसके साथ ज्योति में जीएँ और अनन्तकाल के लिए अन्धकार में न पड़े रहें। परन्तु आज भी, जैसे दो हज़ार वर्ष पूर्व था, बहुत से लोग इस संसार में मसीह द्वारा प्रदान किए गए जीवन के महानतम वरदान को नहीं समझते, और इस कारण वे उस अनन्त जीवन को भी खो देते हैं, जिसे मसीह ने हमें देने के लिए जन्म लिया, क्योंकि वे उसे नहीं जानते।

प्रेरित पौलुस ने अपनी प्रभावशाली पुस्तक रोमियों में लिखा कि परमेश्वर के “अदृश्य गुण, अर्थात् उसकी सनातन सामर्थ्य और परमेश्वरत्व, जगत की सृष्टि के समय से उसके कामों के द्वारा देखने में आते हैं” (रोमियों 1:20)। अर्थात्, सामान्य अनुग्रह के कारण सृष्टि में इतना प्रमाण विद्यमान है कि मनुष्य कम से कम एक सच्चे परमेश्वर के अस्तित्व को स्वीकार कर सके। इसलिए मनुष्य “निरुत्तर हैं” (रोमियों 1:20)।

किन्तु इस सन्दर्भ में भी पौलुस आगे कहता है कि “परमेश्वर को जानने पर भी उन्होंने परमेश्वर के योग्य बड़ाई और धन्यवाद न किया, परन्तु व्यर्थ विचार करने लगे, यहाँ तक कि उनका निर्बुद्धि मन अन्धकारमय हो गया” (रोमियों 1:21)। वे परमेश्वर के अस्तित्व से अवगत थे, परन्तु उन्होंने उस सत्य को दबा दिया, और प्रभु और उद्धारकर्ता के रूप में उसे जानने से इनकार कर दिया।

यह हमारे लिए एक विनम्रतापूर्ण चेतावनी है। यदि हम परमेश्वर को उसका यथोचित सम्मान और महिमा नहीं देते, तो हम इस तथ्य को भूलने का जोखिम उठाते हैं कि वह आज भी प्रेमपूर्वक और अनुग्रह से हमारी खोज करता है।

पश्चिमी संसार में प्रभु यीशु का वचन, सत्य और कथा सदियों से उपलब्ध हैं—फिर भी, यहाँ के लोग यह पहचाने बिना अपना जीवन जीते रहते हैं कि यीशु वास्तव में कौन है। विश्वासी भी इस दशा से बचे हुए नहीं है; वे ऐसे जीवन जीते हैं जिनमें रविवार की आराधना या सुबह की भक्ति को छोड़कर और कहीं कोई चिह्न नहीं दिखता कि वे प्रभु और उद्धारकर्ता यीशु को जानते हैं। कल्पना करें कि यदि हम हर क्षण यह स्मरण रखते कि वही हमारे भीतर का प्रकाश और नया जीवन है, कि वही हमें अनन्तकाल परमेश्वर के साथ बिताने के योग्य बनाता है, कि वही हमारा महान प्रभु और दीन उद्धारकर्ता है और उसे जानना सबसे मूल्यवान है, तो इससे हमारे जीवन में कितना अधिक अन्तर आ जाता।

1 कुरिन्थियों 1:18-31

पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: 2 इतिहास 28–29; लूका 10:1-24 ◊

1 दिसम्बर : आदि में वचन था

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1 दिसम्बर : आदि में वचन था
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“आदि में वचन था, और वचन परमेश्‍वर के साथ था, और वचन परमेश्‍वर था। यही आदि में परमेश्‍वर के साथ था।” यूहन्ना 1:1-2

हमारे मन में यीशु मसीह की जो तस्वीरें बनी हुई हैं, वे बाइबल की थियोलॉजी के बजाय कलात्मक कल्पनाओं पर आधारित हैं। बाइबल में मसीह का शारीरिक वर्णन नहीं मिलता, सिवाय इसके कि वह “डील–डौल में . . . बढ़ता गया” (लूका 2:52)। इसलिए यह हमारे लिए अत्यन्त अनुपयोगी है कि हम उसकी कल्पना सुनहरे बालों और चमकीली नीली आँखों वाले व्यक्ति के रूप में करें, जैसा कि पश्चिमी संस्कृति में प्रचलित है। इस प्रकार की कल्पना न केवल यह भूल जाती है कि यीशु एक मध्य-पूर्वी यहूदी था, बल्कि यह हमें यूहन्ना के सुसमाचार में जिस अद्‌भुत रीति से यीशु का परिचय दिया गया है, उसे समझने और उसका आनन्द लेने से भी वंचित कर देती है।

यूहन्ना अपने सुसमाचार के पहले ही पद से मसीह की शाश्वतता, व्यक्तित्व और दिव्यता को प्रकट करता है। हम समय के आरम्भ को जितना भी पीछे लेकर जाएँ, या समय की उत्पत्ति के बारे में हमारे मन में जो भी विचार हो, वहाँ हम परमेश्वर के पुत्र को उसके देहधारण के पहले के रूप में पाएँगे। उसे सृजा नहीं गया था, क्योंकि वह स्वयं सृष्टिकर्ता है। चरनी में पड़ा शिशु वही था जिसने आकाश में तारों को रखा था—यहाँ तक कि वही तारा भी, जिसने पूरब से ज्योतिषियों को उसकी आराधना करने के लिए मार्ग दिखाया था।

अपनी शाश्वतता में यह वचन, अर्थात यीशु, पिता और पवित्र आत्मा से भिन्न है, भिन्न व्यक्ति है लेकिन सार-तत्व में नहीं। वह “परमेश्वर के साथ था,” फिर भी वह “परमेश्वर था।” यह भले ही रहस्यमयी लगे, लेकिन यूहन्ना किसी अमूर्त विचार की बात नहीं कर रहा था; वह उस व्यक्ति का वर्णन कर रहा था, जिससे वह मिला था, जिसे उसने स्वयं देखा, सुना और छूआ था। मंच अब तैयार है, ताकि प्रेरित यूहन्ना के साथ पाठक भी कह सकें, “यह जीवन प्रगट हुआ, और हमने उसे देखा” (1 यूहन्ना 1:2), क्योंकि यही जीवित परमेश्वर के वचन का सामर्थ्य है।

जब यूहन्ना इस सच्चाई को दृढ़ता से स्थापित करता है कि मसीह न केवल परमेश्वर के साथ था, बल्कि वह स्वयं परमेश्वर था, तो वह चाहता है कि हम उसके पूरे सुसमाचार को यीशु की दिव्यता को ध्यान में रखकर पढ़ें। जब हम हर पन्ना पलटें, यीशु के वचन पढ़ें और उसके कार्यों को देखें, तो हमें यह समझना चाहिए कि ये स्वयं परमेश्वर के वचन और कार्य हैं।

यदि यीशु मात्र एक भला मनुष्य था, तो यूहन्ना के सुसमाचार में जो कुछ भी लिखा है, वह वास्तव में ईश-निन्दा है। परन्तु वह केवल मनुष्य नहीं था। वह सम्पूर्ण सृष्टि के परमेश्वर के साथ एक था, है, और सदा रहेगा। हमें यूहन्ना के आरम्भिक पदों को समझने की आवश्यकता है, ताकि हम यीशु को सही रूप में जान सकें और हम ब्रूस मिल्ने के शब्दों में कह सकें: “हम उसकी आराधना बिना रुके करें, उसकी आज्ञा बिना झिझक मानें, उससे बिना किसी शर्त के प्रेम करें, और उसकी सेवा बिना रुके करते रहें।”[1]

यदि आज आपको प्रभु की आराधना करने, उसकी आज्ञा मानने, उससे प्रेम करने या उसकी सेवा करने में कठिनाई हो रही है, तो उत्तर यही है: उसकी ओर देखें। क्योंकि जितना अधिक हम यह समझेंगे कि चरनी में पड़ा वचन वही था जो आदि से परमेश्वर के साथ था और परमेश्वर था, उतना ही सहज रूप से हमारे मसीही कर्तव्य आनन्द में बदलते जाएँगे।

यूहन्ना 1:1-18

◊ पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: 2 इतिहास 25–27; लूका 9:37- 62


[1] द मैसेज ऑफ जॉन, द बाइबल स्पीक्स टूडे (आई.वी.पी. अकैडेमिक, 2020), पृ. 21.

30 नवम्बर : परमेश्वर हमारी पुकार सुनता है

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30 नवम्बर : परमेश्वर हमारी पुकार सुनता है
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“इस्राएली कठिन सेवा के कारण लम्बी-लम्बी साँस लेकर आहें भरने लगे, और पुकार उठे … परमेश्‍वर ने उनका कराहना सुनकर अपनी वाचा को … स्मरण किया।निर्गमन 2:23-24

भोजन की प्रतिज्ञा ने याकूब और उसके परिवार को अपने अकालग्रस्त देश को छोड़ने और मिस्र जाकर यूसुफ के साथ बसने के लिए प्रेरित किया। कुछ समय तक सब कुछ बहुत अच्छा था। लेकिन परिस्थितियाँ तब बिगड़ने लगीं जब मिस्र में एक नया राजा सत्ता में आया। उसे इस्राएलियों की बढ़ती संख्या और प्रभाव अच्छा नहीं लगा, इसलिए उसने उन्हें कठोर दासता में झोंक दिया। उनका जीवन आँसुओं और कड़वाहट से भर गया।

परमेश्वर की प्रजा के पास अब भी उसकी प्रतिज्ञाएँ थी, लेकिन वे प्रतिज्ञाएँ अब खोखली सी लगने लगी थीं। जब वे स्वतन्त्र थे और भरपेट खाते थे, तब परमेश्वर पर भरोसा करना आसान था। लेकिन जब वे गुलामी में थे, तब यह भरोसा बहुत कठिन हो गया। वर्षों की लम्बी पीड़ा में कुछ लोगों ने अवश्य सोचा होगा: मुझे लगता है परमेश्वर अपनी प्रतिज्ञाओं को भूल गया है। मुझे अब बिल्कुल भरोसा नहीं कि वह सचमुच वही करेगा जो उसने कहा था। फिर भी, इसके बावजूद, उन्होंने परमेश्वर को पुकारा और छुटकारे की तीव्र पुकार लगाई।

परमेश्वर ने उन्हें नहीं भुलाया था—और उसका उत्तर आया। परमेश्वर ने उनकी आहें सुनीं; उसने उनकी कराह को सुना और प्रतिक्रिया में उसने छुटकारे की एक योजना आरम्भ की। परमेश्वर उन्हें उनके दुख में छोड़ने वाला नहीं था। वह उन्हें दासता से छुड़ाने के लिए अपनी योजना को पूरा करने जा रहा था। उसने “अपनी वाचा को स्मरण किया”—इसका यह अर्थ नहीं कि वह अब्राहम से की गई प्रतिज्ञा को भूल गया था, बल्कि यह कि अब, एकदम सही समय पर (हालाँकि शायद उस समय नहीं जब उसकी प्रजा चाहती थी), उसने अपने लोगों से की गई वाचा को पूरा करने की दिशा में कार्य किया।

यही वह सच्चाई है जो आज परमेश्वर की प्रजा को याद दिलाए जाने की आवश्यकता है, ठीक वैसे ही जैसे तब थी: परमेश्वर हमारी कराह को सुनता है, वह हमारे हालात को जानता है, और वह कार्य करेगा। उसकी एक भी प्रतिज्ञा असफल नहीं होगी। वास्तव में, जब हमारे दुखों में हमारे शब्द समाप्त हो जाते हैं, तब हम यह पाते हैं कि पवित्र आत्मा स्वयं हमारे लिए कराहते हुए प्रार्थना करता है (रोमियों 8:26-27)। यही है परमेश्वर की हमारे लिए चिन्ता की गहराई और उसके अपने लोगों के लिए अनन्त भलाई करने की प्रतिबद्धता।

जब आपकी आत्मा की पुकारें अनसुनी लगने लगें—जब आप सोचने लगें कि क्या कोई सच में परवाह करता है—तो याद करें कि परमेश्वर ने स्वयं को मिस्र में और सर्वोत्तम रूप से अपने पुत्र में कैसे प्रकट किया है:

मैं क्यों उदास हो जाऊँ,

क्यों अंधेरे मुझे घेरें,

क्यों मेरा हृदय अकेला हो

और स्वर्ग व घर की लालसा करे,

जब यीशु ही मेरा भाग है?

वह मेरा सदा का मित्र है।

उसकी दृष्टि गौरैया पर है,

और मैं जानता हूँ—वह मुझ पर भी दृष्टि रखता है।[1]

छुटकारे के लिए पुकारते रहें। परमेश्वर सुनता है, परवाह करता है, और आपके लिए कार्य करता है।

  मरकुस 5:21-43

पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: 2 इतिहास 23–24; लूका 9:18-36 ◊


[1] सिविल्ला डी. मार्टिन, “हिज़ आई इज़ ऑन द स्पैरो” (1905)

29 नवम्बर : एकता में आराधना

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29 नवम्बर : एकता में आराधना
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“हे भाइयो, मैं तुम से हमारे प्रभु यीशु मसीह के नाम से विनती करता हूँ कि तुम सब एक ही बात कहो, और तुम में फूट न हो, परन्तु एक ही मन और एक ही मत होकर मिले रहो।” 1 कुरिन्थियों 1:10

सुसमाचार में एकता रखने वाली कलीसिया एक स्वस्थ कलीसिया होती है। और विभाजन से बढ़कर और कुछ नहीं है जो कलीसिया को इतनी तेजी से नष्ट करता है।

परमेश्वर की प्रजा के साथ हमेशा से ऐसा ही होता रहा है। जब-जब वे एकता में रहे हैं, उन्होंने अपना सर्वोत्तम समय देखा है। उदाहरण के लिए, जब इस्राएली लोग बेबीलोन की बँधुआई से लौटे, तो नहेम्याह 8 में लिखा है कि वे “एक मन होकर” एकत्र हुए ताकि याजक एज्रा द्वारा व्यवस्था की पुस्तक का सार्वजनिक पाठ सुन सकें (नहेम्याह 8:1)। उस समय लगभग 5,000 पुरुष और स्त्रियाँ जल फाटक के सामने के चौक में एकता और आपसी समर्पण की भावना से इकट्ठा हुए थे। उनका ध्यान केवल इस पर नहीं था कि “मुझे इस उपदेश से क्या मिल रहा है,” बल्कि इस पर भी था कि “मैं अपने साथियों के लिए क्या ला रहा हूँ, जो मेरे साथ आराधना करने आए हैं।”

परमेश्वर की प्रजा को आराधना में इसी भावना से आना चाहिए यदि हमें अपने बीच सच्ची एकता चाहिए।

जब हम वास्तव में मसीह के साथ चल रहे होते हैं, तो हम उन लोगों के साथ सामूहिक आराधना करने की लालसा रखते हैं जो मसीह से प्रेम करते हैं। हालाँकि हमारी प्रेरणा कभी-कभी क्षीण हो सकती है, फिर भी पवित्र आत्मा की सहायता से हम भजनकार की आराधना की भावना को अपना कर कह सकते हैं: “जब लोगों ने मुझ से कहा, ‘आओ, हम यहोवा के भवन को चलें,’ तब मैं आनन्दित हुआ!” (भजन 122:1)। सामूहिक कलीसिया की आराधना केवल एक कार्यक्रम नहीं है, जिसमें हम भाग लें या उसे बर्दाश्त करें; यह हमारे राजा के प्रति हमारी साझी निष्ठा की घोषणा है और परमेश्वर की प्रजा द्वारा प्राप्त गहन एकता की सामर्थी याद दिलाती है।

हमारी कलीसियाओं में हम हमेशा एकमत नहीं होते और नहीं होंगे—हमारी अपनी व्यक्तिगत पसन्द-नापसन्द और मान्यताएँ होती हैं। लेकिन परमेश्वर के परिवार में सदस्यता का मूल किसी बात पर स्पष्ट एकता में होना चाहिए—जैसे बाइबल की अधिकारिता, यीशु की केन्द्रीयता और प्रधानता, सुसमाचार प्रचार की अनिवार्यता, और प्रार्थना व आराधना की अपने दैनिक जीवन में प्राथमिकता। यही साझे विश्वास परमेश्वर की प्रजा को एकता में एकत्र होने की शक्ति देते हैं।

इसलिए, यद्यपि मंच से हास्य, सुन्दर संगीत, और परिवारों के लिए अर्थपूर्ण कार्यक्रम प्रभु की ओर से उपहार हो सकते हैं, तौभी वे हमारी प्राथमिकता नहीं होनी चाहिए। इसके बजाय, हमें एकता में मिलकर आराधना करने की इच्छा रखते हुए अपने सह-विश्वासियों के लिए प्रार्थना में लगे रहना चाहिए, यह मांगते हुए कि परमेश्वर के वचन के सत्य को सुनने की हमारी स्वयं की इच्छा आत्मिक जागृति का कारण बने। क्योंकि जब कोई मण्डली प्रार्थनापूर्वक अपेक्षा करती है, तो परमेश्वर निश्चय ही वही करेगा जो उसने अपने वचन के माध्यम से करने का प्रतिज्ञा की है।

कलीसिया के प्रति “पहले मैं” वाला दृष्टिकोण रखना और तुरन्त आलोचना करना बहुत आसान होता है—आसान, लेकिन घातक होता है। अगले रविवार को सुनिश्चित करें कि आप वहाँ केवल अपने लिए नहीं बल्कि दूसरों के लिए भी हों। आप अपने गीतों और वचनों में ऐसी भावना रखें जो साझी एकता को बनाए और मजबूत करे।

नहेम्याह 8:1-12

◊ पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: 2 इतिहास 21–22; लूका 9:1-17

28 नवम्बर : सुख का मार्ग

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28 नवम्बर : सुख का मार्ग
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“क्या ही धन्य है वह जिसका अपराध क्षमा किया गया, और जिसका पाप ढाँपा गया हो।” भजन 32:1

कुछ वर्षों पहले, BBC ने दुनिया के लगभग 65 देशों में एक सर्वेक्षण किया और यह बताया कि कौन से देश सबसे अधिक सुखी और सबसे कम सुखी थे। जब लोगों से पूछा गया कि उनके आनन्द का स्रोत क्या है, तो कोई स्पष्ट सहमति नहीं मिली। सुख की राह कठिन और भ्रमित करने वाली थी।[1]

अंग्रेजी की ESV बाइबल में भजन 32 का आरम्भ “धन्य” शब्द से होता है, लेकिन इस शब्द का शायद अधिक प्रभावशाली और उपयुक्त अनुवाद “सुखी” हो सकता है। वास्तव में, जो इब्रानी शब्द यहाँ प्रयुक्त हुआ है, उस शब्द का अक्सर यूनानी में अनुवाद “सुखी” के तौर पर किया जाता है—चाहे वह सेप्टुआजिण्ट (पुराने नियम का यूनानी अनुवाद) हो या नया नियम। यही शब्द यीशु के पहाड़ी उपदेश के आरम्भ में भी प्रयुक्त हुआ, जहाँ उसने अपने अनुयायियों से कहा: “धन्य [अर्थात सुखी] हैं वे, जो मन के दीन हैं, क्योंकि स्वर्ग का राज्य उन्हीं का है” (मत्ती 5:3)।

हममें से बहुत से लोग चाहते हैं कि हम जितने सुखी अभी हैं, उससे अधिक सुखी हों। लेकिन कैसे? कुछ लोग सोचते हैं कि यदि वे अधिक घूमेंगे-फिरेंगे, तो उन्हें सन्तोष मिलेगा। कुछ लोग बड़े स्तर पर सोचते हैं—जैसे कि यदि वे अपने क्षेत्र में न्याय स्थापित कर दें तो वे अधिक सुखी होंगे। अन्य लोग मानते हैं कि सृष्टि की सुन्दरता को सराहने या आध्यात्मिकता को खोजने में सुख मिलता है। फिर भी बार-बार हमें यह सच्चाई झकझोरती है कि कुछ न कुछ है जो हमारी कोशिशों को बर्बाद कर देता है और हमारे सारे सपनों पर धूल की परत चढ़ा देता है। इन सब बातों से मिलने वाला सुख नाज़ुक होता है; वह आसानी से टूट सकता है और स्थायी नहीं रहता। सुख की तलाश या उसे थामे रहने का प्रयास स्वयं एक बोझ बन जाता है।

स्थायी सुख की हमारी खोज व्यर्थ ही रहती है, जब तक हम उस स्थान पर नहीं देखते जहाँ भजनकार ने इसे मूल रूप से पाया—हमारे सृष्टिकर्ता परमेश्वर के साथ एक सम्बन्ध में, जिसका आरम्भ क्षमा से होता है। शायद हम वहाँ देखने की सोच भी न पाएँ, क्योंकि यह विरोधाभासी लगता है कि पहले अपने पापों की गम्भीरता और क्षमा की आवश्यकता को समझकर हमें सुख कैसे मिलेगा। लेकिन इब्रानी भाषा में “क्षमा किया गया” शब्द का अर्थ ही होता है “उठा लिया गया” या “हटा दिया गया।” जिस शान्ति और सुख की हम लालसा करते हैं, वह तभी आता है जब पाप का बोझ उठा लिया जाता है। और फिर हम जीवन के सभी उपहारों का आनन्द लेने के लिए स्वतन्त्र हो जाते हैं, बिना किसी वस्तु या व्यक्ति से यह अपेक्षा किए कि वे हमारे परम सुख का स्रोत बनें।

यह सच्चाई संत ऑगस्टीन के अनुभव में भी दिखाई देती है। उन्होंने अपने जीवन का पहला हिस्सा भोग-विलास में बिताया। फिर जब उन्होंने बाइबल पढ़ी और परमेश्वर के वचन में उससे मुलाकात की, तो उन्होंने जीवन की धुंध से बाहर आकर लिखा: “हे परमेश्वर, हमारा हृदय तब तक अशान्त रहता है, जब तक वह तुझ में विश्राम नहीं पाता।”[2] क्या आपका विश्वास भी वैसा है, जैसा ऑगस्टीन का था? उनके इस कथन का आधार इस भजन के पहले पद में ही मिल जाता है। आपको पाप और दुख के बोझ तले जीवन जीने की ज़रूरत नहीं है, क्योंकि परमेश्वर ने आपको यीशु मसीह के माध्यम से क्षमा और अपने साथ एक सम्बन्ध का निमन्त्रण दे दिया है। आपको उस तरह से सुख की खोज करने की आवश्यकता नहीं है, जैसे यह संसार करता है। जब आपका बोझ उठा लिया जाता है, और जब आप जानते हैं कि परमेश्वर आपके सबसे बुरे पक्ष को जानता है और फिर भी आपसे प्रेम करता है—तब आप एक असाधारण और स्थायी सुख का अनुभव करते हैं।

  भजन 32

पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: 2 इतिहास 19–20; लूका 8:26-56 ◊


[1] माइकल बोण्ड, “द परसुट ऑफ हैपीनेस,” न्यू साईंटिस्ट, अक्तूबर 4, 2003, https://www.newscientist.com/article/mg18024155-100-the-pursuit-of-happiness/ अप्रैल 13, 2021 को इस वैबसाइट पर देखा गया।

[2] कनफेशंस 1.1.

27 नवम्बर : उसकी दया से

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27 नवम्बर : उसकी दया से
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“अतः यह न तो चाहने वाले की, न दौड़ने वाले की परन्तु दया करने वाले परमेश्‍वर की बात है।” रोमियों 9:16

परमेश्वर मनुष्य द्वारा बनाए गए रीति-रिवाजों से बँधा नहीं है, और न ही वह हमारी अपेक्षाओं के अनुसार चलने के लिए बाध्य है।

शायद यह सच्चाई एसाव और याकूब के जीवन में सबसे स्पष्ट रूप से दिखाई देती है। एसाव इसहाक का पहला बेटा था, और इसहाक के पिता अब्राहम को परमेश्वर ने स्वयं के वचन और आशिषों का वाहक बनने के लिए चुना था, जिससे वह एक अपने लिए एक प्रजा बनाए और संसार में आशीष लाए (उत्पत्ति 12:1-3)। परम्परा के अनुसार वारिस होने के नाते एसाव को इसहाक की आशीष और विरासत मिलनी चाहिए थी, वैसे ही जैसे इसहाक को अपने पिता अब्राहम से मिली थी।

परन्तु इसके बजाय, परमेश्वर ने एसाव के छोटे जुड़वाँ भाई याकूब को चुना, जिसे यह सब कुछ प्राप्त हुआ।

याकूब केवल छोटा ही नहीं था, बल्कि उसका स्वभाव भी अच्छा नहीं था, जिसके नाम का मूल रूप से अर्थ था, “धोखेबाज।” यह अविश्वसनीय लगता है कि उसे चुना गया—फिर भी वाचा की रेखा याकूब से होकर ही आगे बढ़नी थी। उसके वंशज आगे चलकर इस्राएल, परमेश्वर की प्रजा, कहलाए।

कभी-कभी मैं इस बात से संघर्ष करता हूँ कि परमेश्वर ने याकूब को क्यों चुना। यह अनुचित प्रतीत होता है! फिर भी बाइबल बताती है कि याकूब को, जो एक अनापेक्षित विकल्प था, परमेश्वर ने पहले से ही चुन लिया था ताकि वह अपनी प्रतिज्ञाओं को एसाव की बजाय याकूब के माध्यम से पूरा करे: “. . . और अभी तक न तो बालक जन्मे थे, और न उन्होंने कुछ भला या बुरा किया था; इसलिए कि परमेश्‍वर की मनसा जो उसके चुन लेने के अनुसार है, कर्मों के कारण नहीं परन्तु बुलाने वाले के कारण है, बनी रहे” (रोमियों 9:11)। याकूब को चुनकर, परमेश्वर ने अपने अनादिकालीन उद्देश्य को पूरा किया। साथ ही उसने एक सिद्धान्त भी सिखाया: परमेश्वर योग्यता के आधार पर चयन नहीं करता। हममें से कोई भी उसके योग्य नहीं है।

यहीं पर हम कभी-कभी सोचने में उलझ जाते हैं। हम याकूब को देखते हैं और सोचते हैं कि उसे क्यों चुना गया, जबकि हमें वास्तव में परमेश्वर को देखना चाहिए और उसकी अनुग्रहपूर्ण प्रकृति पर आश्चर्य करना चाहिए। वह कहता है, “मैं जिस किसी पर दया करना चाहूँ उस पर दया करूँगा, और जिस किसी पर कृपा करना चाहूँ उसी पर कृपा करूँगा” (रोमियों 9:15)। और परमेश्वर हमें भी, जो अयोग्य हैं, दया से बुलाता है।

जब हम यह पूरी तरह से समझ जाते हैं कि परमेश्वर की सन्तान बनने से पहले हम कितने गहरे संकट में थे—हमारा विद्रोह, जो न्याय, क्रोध और मृत्यु का योग्य था—तब हम परमेश्वर के प्रेम और दया की महानता को समझना आरम्भ करते हैं। हम यह पूछना बन्द कर देते हैं कि परमेश्वर कुछ लोगों पर दया क्यों नहीं करता; और यह सोचने लगते हैं कि वह किसी पर भी दया क्यों करता है। यह एक गहरी कृतज्ञता का विषय बन जाता है कि उसने हमें अपनी सन्तान और वारिस बना लिया है।

आपने राजा की कृपा पाने के लिए कुछ भी नहीं किया। आपने अपने विद्रोह के लिए कोई भरपाई नहीं की। केवल एक ही आधार है जिस पर आपको उसके परिवार में अपनाया गया: उसकी दया, जो स्वतन्त्र रूप से दी गई और कभी अर्जित नहीं की जा सकती। जैसे एक भजन के लेखक ने कहा है, “यीशु ने सब मूल्य चुका दिया।”[1] यह सत्य आपको अच्छे दिनों में विनम्र बनाए रखेगा और जब आप पाप कर बैठते हैं, तो आशा देगा; उद्धार कभी आपकी योग्यता पर नहीं, बल्कि हमेशा केवल उसकी दया पर निर्भर है।

रोमियों 9:1-18

◊ पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: 2 इतिहास 17–18; लूका 8:1-25


[1] एल्विना एम. हॉल, “जीज़स पेड इट ऑल” (1865).

26 नवम्बर : दान क्यों दें?

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26 नवम्बर : दान क्यों दें?
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“तुम हर बात में सब प्रकार की उदारता के लिए जो हमारे द्वारा परमेश्‍वर का धन्यवाद करवाती है, धनवान किए जाओ।” 2 कुरिन्थियों 9:11

परमेश्वर कोई स्वर्गिक मनोरंजन-विरोधी नहीं है। वह हमें ऐसा निराशाजनक जीवन जीने को नहीं कहता, जिसमें हमें बैठकर झूठी प्रसन्नता का दिखावा करना पड़े। इसके विपरीत, वह हमें सब कुछ भरपूरी से प्रदान करता है। हमें उसकी दी हुई आशिषों के लिए माफी माँगने की ज़रूरत नहीं है; लेकिन हमें उन्हें दूसरों के साथ बाँटना अवश्य है।

परमेश्वर हमें हमारी आवश्यकताओं के लिए जो कुछ भी देता है (और अक्सर उससे भी अधिक देता है), तो उसमें उसका उद्देश्य यही है कि हम दूसरों को भी दें। जब हम “धनवान किए” जाते हैं, तो पौलुस कहता है कि यह “सब प्रकार की उदारता के लिए होता है, जो हमारे द्वारा परमेश्‍वर का धन्यवाद करवाती है।” हमने जो कुछ परमेश्वर से उपहार स्वरूप पाया है, उसे हमें दूसरों को भी परमेश्वर के उपहार स्वरूप देना है। याकूब इस विचार को चुनौतीपूर्ण रूप में आगे बढ़ाता है जब वह पूछता है: “यदि कोई कहे कि मुझे विश्वास है पर वह कर्म न करता हो, तो इससे क्या लाभ?” (याकूब 2:14)। उत्तर स्पष्ट है: ऐसे विश्वास का कोई लाभ नहीं है! जब हम जरूरतमंदों की मदद करने की अपनी ज़िम्मेदारी को निभाते हैं, तब हम न केवल परमेश्वर की स्तुति को प्रेरित करते हैं, बल्कि अपने विश्वास की वास्तविकता का प्रमाण भी देते हैं।

परमेश्वर हमें संसाधनों के साथ-साथ वह अनुग्रह भी देता है जिसकी जरूरत हमें सच्ची उदारता दिखाने के लिए होती है—यहाँ तक कि स्वयं का त्याग करने के लिए भी, ताकि औरों को आशीष मिल सके (2 कुरिन्थियों 8:1-3)। वही परमेश्वर है जो “सब प्रकार का अनुग्रह तुम्हें बहुतायत से दे सकता है जिस से हर बात में और हर समय, सब कुछ, जो तुम्हें आवश्यक हो, तुम्हारे पास रहे; और हर एक भले काम के लिए तुम्हारे पास बहुत कुछ हो” (2 कुरिन्थियों 9:8)।

एक उदार मन हमें स्वार्थ से और अधिक धन इकट्ठा करने की इच्छा से बचाता है। परमेश्वर की आशीष का आनन्द कोई मजबूत आर्थिक नींव रखने में नहीं है, जिससे हम किसी शानदार जगह पर रिटायर हो सकें, बड़ी विरासत छोड़ सकें, या बचत खाते में सुकून पा सकें। बल्कि हमें जो सम्पत्ति अभी दी गई है, उसे दूसरों के साथ साझा करने के लिए बुलाया गया है, ताकि जब दूसरे उसमें सहभागी हों, तो वे परम दाता परमेश्वर में सच्चा सन्तोष पाएँ।

यदि हम ईमानदारी से कहें, तो अक्सर हम इसलिए उदारता से नहीं देते, क्योंकि हमें डर होता है कि दान दे देने के बाद कहीं परमेश्वर हमें अकेला और खाली न छोड़ दे। लेकिन पवित्रशास्त्र हमें आश्वस्त करता है कि वही परमेश्वर, जिसने हमारे बचपन में हमारी देखभाल की, वह बुढ़ापे में भी हमारी आवश्यकता पूरी करेगा (यशायाह 46:4 देखें)।

सच्चा आनन्द तब पाया जाता है जब हम अपने स्वामित्व के बन्धनों से मुक्त हो जाते हैं। यह हमारा सौभाग्य और उत्तरदायित्व है कि हम भले कामों में धनवान हों और दूसरों के साथ बाँटने में तत्पर हों, चाहे हमें बहुत कुछ मिला हो या थोड़ा ही। परमेश्वर से यह अनुग्रह माँगें कि आप बिना संकोच और खुशी-खुशी दे सकें, और यह कभी न भूलें: आप परमेश्वर से अधिक नहीं दे सकते।

1 कुरिन्थियों 9:6-15

पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: 2 इतिहास 15–16; लूका 7:24-50 ◊

25 नवम्बर : सत्य को जीना

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25 नवम्बर : सत्य को जीना
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“तुम ये बातें जानते हो, और यदि उन पर चलो तो धन्य हो।” यूहन्ना 13:17

क्या आपको कभी ऐसा समय याद आता है जब कोई अजनबी अचानक आपके पास आया हो और आपसे पूछा हो कि आप यीशु मसीह और मसीही विश्वास के बारे में क्या मानते हैं? शायद आपके ऐसे अनुभव बहुत कम या बिल्कुल नहीं हुए होंगे। निश्चय ही, हमें ऐसे अवसरों के लिए तैयार रहना चाहिए; प्रेरित पतरस हमें बताता है कि हमें उस आशा का कारण बताने के लिए तैयार रहना चाहिए जो हमारे भीतर है (1 पतरस 3:15)। लेकिन हमारे विश्वास को समझाने के अवसर अक्सर अजनबियों से हुई आकस्मिक मुलाकातों से नहीं, बल्कि हमारे दैनिक जीवन के उस तरीके से उत्पन्न होते हैं, जिसे हम अपने परिचितों के सामने प्रतिदिन जीते हैं।

हम कैसे जीते हैं और क्या मानते हैं, यह हमारे मसीह से जुड़े होने को प्रतिबिम्बित करना चाहिए। इसी कारण पतरस कहता है कि मसीही “[परमेश्‍वर की] निज प्रजा” हैं (1 पतरस 2:9)। यीशु से हमारा सम्बन्ध व्यापक और सम्पूर्ण है। इसका अर्थ यह है कि हमें अब अपनी इच्छानुसार कुछ भी मानने की स्वतन्त्रता नहीं है; अब हम विवाह, लैंगिकता, धन-सम्पत्ति, या किसी भी अन्य विषय में अपने विचार नहीं बना सकते। अब हमारे विचार हमारे मसीह और गुरु, यीशु, के विचारों को प्रतिबिम्बित करने चाहिएँ। परन्तु यीशु केवल इतना नहीं चाहता कि उसके शिष्य सत्य को केवल जानें, वह यह भी चाहता है कि वे सत्य को जीएँ: “तुम ये बातें जानते हो, और यदि उन पर चलो तो धन्य हो।” अतः विश्वास का परिणाम कार्य में प्रकट होना चाहिए। इसका अर्थ यह भी है कि अब हमें अपनी इच्छानुसार आचरण करने की स्वतन्त्रता नहीं है। हमारा व्यवहार हमारे बलिदानी उद्धारकर्ता यीशु के समान होना चाहिए।

आज की बहुत-सी आधुनिक धार्मिक और धर्मनिरपेक्ष मान्यताएँ आपकी जीवनशैली से कुछ नहीं माँगतीं; वे आपको अपनी इच्छा से जीने की पूरी आज़ादी देती हैं। (वास्तव में, कई विचारधाराएँ इसी सिद्धान्त को प्राथमिकता देती हैं: “जो तुम्हें ठीक लगे वही करो।”) लेकिन मसीही शिष्यता का बुलावा बिल्कुल भिन्न है, क्योंकि इसके केन्द्र में यह बुलावा है: एक ऐसे राजा का अनुसरण करना जो आप स्वयं नहीं हैं। मसीही जीवन का बुलावा केवल सुसमाचार पर विश्वास करने का नहीं, बल्कि यह भी है कि “तुम्हारा चाल–चलन मसीह के सुसमाचार के योग्य हो” (फिलिप्पियों 1:27)। हम सभी इसमें पीछे रह जाते हैं। क्या आपके जीवन में कोई ऐसा व्यक्ति है जो आपको यह पहचानने में मदद करता है—और जिसकी आप भी मदद कर सकते हैं—कि आपके व्यवहार के कौन-कौन से क्षेत्र अभी भी सुसमाचार के योग्य नहीं हैं? मसीह में एक भाई या बहन के साथ साझेदारी करें, परमेश्वर के वचन का प्रकाश एक-दूसरे पर डालें, और सत्य को जीवन में लाने का प्रयास करें!

इस संसार में परमेश्वर के सुसमाचार को पहुँचाने का परमेश्वर द्वारा निर्धारित प्राथमिक साधन कलीसिया है। आप इसका हिस्सा हैं। लेकिन यदि आप स्वयं सुसमाचार के अनुसार नहीं जीते, तो दूसरों से यह अपेक्षा मत करें कि वे आपसे सुसमाचार के बारे में पूछेंगे—और उससे भी कम यह कि वे पश्चाताप करें और विश्वास करें:

आप एक सुसमाचार लिख रहे हैं,

हर दिन एक अध्याय,

अपने कामों के द्वारा,

अपनी बातों के द्वारा।

आप जो लिखते हैं उसे लोग पढ़ते हैं,

चाहे यह बिना विश्वास के हो, या सच्चा हो।

आपके अनुसार सुसमाचार क्या है?[1]

यूहन्ना 13:31-35

◊ पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: 2 इतिहास 13–14; लूका 7:1-23


[1] सामान्यतः इसका श्रेय पॉल गिलबर्ट को दिया जाता है।

24 नवम्बर : आओ, धन्यवाद करने वाले लोगो

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24 नवम्बर : आओ, धन्यवाद करने वाले लोगो
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हर बात में धन्यवाद करो … शान्ति का परमेश्‍वर आप ही तुम्हें पूरी रीति से पवित्र करे; और तुम्हारी आत्मा और प्राण और देह हमारे प्रभु यीशु मसीह के आने तक पूरे-पूरे और निर्दोष सुरक्षित रहें। तुम्हारा बुलाने वाला सच्चा है, और वह ऐसा ही करेगा।” 1 थिस्सलुनीकियों 5:18, 23-24

धन्यवाद देना हमेशा आसान नहीं होता, भले ही अमेरिका एक राष्ट्र के रूप में इसके लिए विशेष अवकाश निर्धारित करता है। इस अवकाश के दौरान हममें से कई लोग जीवन की ऐसी परिस्थितियों से अवगत होते हैं, जो धन्यवाद की भावना उत्पन्न नहीं करतीं। कुछ लोग अपने सबसे अकेले दिनों का सामना कर रहे होते हैं, तो कुछ लोग किसी प्रियजन के सुसमाचार से भटक जाने के भारी बोझ से दबे होते हैं। कुछ लोग इस मौसम में किसी असफलता के कारण बहुत निराश होते हैं—जैसे नौकरी का छूटना, किसी सम्बन्ध का टूटना, या एक और पदोन्नति चूक जाना। कभी-कभी हम खुद को पूरी तरह से फँसा हुआ पाते हैं, निराशा से बाहर निकलने में असमर्थ होते हैं, और कृतज्ञता से उतना ही दूर महसूस करते हैं जितना पूरब से पश्चिम दूर है।

जब हम ऐसी परिस्थितियों का सामना करते हैं और पढ़ते हैं, “हर बात में धन्यवाद करो,” तो हम अक्सर सोचते हैं कि इसका पालन कैसे करें। फिर भी, बाइबल कभी भी किसी आज्ञा को सहायता के बिना नहीं देती।

इस प्रश्न का उत्तर कि हम निरन्तर धन्यवाद कैसे दे सकते हैं, परमेश्वर के हमारे अन्दर पवित्रीकरण के कार्य में छिपा है। “पवित्रीकरण” का अर्थ है “परमेश्वर के लिए अलग किया जाना।” जब प्रभु यीशु मसीह हमारे जीवन में शासन करने आता है, तो पवित्र आत्मा हमारे अन्दर प्रवेश करता है ताकि आत्मिक विकास के लिए आवश्यक निरन्तर शुद्धिकरण कर सके। यही परमेश्वर का कार्य है जो हमें वह बनने की शक्ति देता है जो यीशु हमसे चाहता है: “क्योंकि परमेश्‍वर ही है जिसने अपनी सुइच्छा निमित्त तुम्हारे मन में इच्छा और काम, दोनों बातों के करने का प्रभाव डाला है” (फिलिप्पियों 2:13)।

जब हम मसीह में बने रहते हैं—“उसी में जड़ पकड़ते और बढ़ते” जाते हैं (कुलुस्सियों 2:7)—अपना बाइबल का अध्ययन करते हैं, प्रार्थना करना सीखते हैं, परमेश्वर के लोगों के साथ संगति रखते हैं, और दूसरों को उसके बारे में बताते हैं—तो हमें याद दिलाया जाता है कि वह हमारे लिए क्या है और उसने हमारे लिए और हमारे भीतर क्या-क्या किया है। हम भजनकार के साथ गाना सीखते हैं: “हे परमेश्‍वर, हम तेरा धन्यवाद करते, हम तेरे नाम का धन्यवाद करते हैं; क्योंकि तेरा नाम प्रगट हुआ है, तेरे आश्चर्यकर्मों का वर्णन हो रहा है” (भजन 75:1)।

हमारे अपने पछतावों और निराशाओं के बावजूद, जब हम उसके अद्‌भुत कामों—उसका क्रूस, उसका पुनरुत्थान, उसका स्वर्गारोहण, और उसके पवित्र आत्मा के द्वारा हमारे अन्दर किया गया कार्य जो हमें विश्वास में लाता है और विश्वास में बनाए रखता है—को याद करते हैं, तो हम कृतज्ञता से भर सकते हैं।

हमारी परीक्षाएँ कठिन और उदास हो सकती हैं। हो सकता है हम हर क्षण में आभारी न महसूस करें। यह ठीक है, क्योंकि बात यह नहीं है कि हम क्या महसूस कर रहे हैं—मुद्दा यह है कि परमेश्वर हमें आभारी बनने का सामर्थ्य देता है। वही हमें पौलुस की शिक्षाओं को पूरा करने की शक्ति प्रदान करता है।

यदि आप इस समय अपने जीवन में कृतज्ञता की कमी महसूस कर रहे हैं, तो कम से कम एक क्षण के लिए अपनी परिस्थितियों से ध्यान हटाएँ और परमेश्वर के प्रेम के उपहार पर मनन करें। जब आप मसीह में बने रहते हैं और परमेश्वर के आत्मा को उसका पवित्रीकरण का कार्य जारी रखने देते हैं, तो वह आपको भीतर से जागृत करेगा, ताकि आँसुओं, पीड़ा और निराशा के बावजूद, जब वह पुकारे, “आओ, हे कृतज्ञ जनो, आओ,”[1] तो आप उसका उत्तर दे सकें।

  भजन 149

पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: 2 इतिहास 10–12; लूका 6:27-49 ◊


[1] हेनरी एलफर्ड, “कम, ये थैंकफुल पीपल, कम” (1844).

23 नवम्बर : पीड़ा का सवाल

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23 नवम्बर : पीड़ा का सवाल
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“भूमि तेरे कारण शापित है। तू उसकी उपज जीवन भर दुख के साथ खाया करेगा।” उत्पत्ति 3:17

कोई भी व्यक्ति पीड़ा से अछूता नहीं है। चाहे वह किसी प्रियजन की मृत्यु हो, कोई दर्दनाक निदान, कार्यस्थल पर संघर्ष, टूटा हुआ रिश्ता, या कोई अन्य कष्टदायक परिस्थिति—परीक्षाएँ केवल किसी एक व्यक्ति तक सीमित नहीं होतीं। पूरे पवित्रशास्त्र में हमें पीड़ा के अनेक उदाहरण मिलते हैं।

जैसे-जैसे हम जीवन जीते हैं और बाइबल पढ़ते हैं, यह बात निर्विवाद रूप से स्पष्ट हो जाती है कि पीड़ा मानव अस्तित्व का एक स्वाभाविक हिस्सा है।

जब हम इस सच्चाई को स्वीकार कर लेते हैं, तब एक सबसे महत्त्वपूर्ण प्रश्न हमारे मन में उठता है: “क्यों?” लोग पीड़ा क्यों सहते हैं? सभी विश्वदृष्टियाँ और धर्म इस प्रश्न का उत्तर देने का प्रयास करते हैं: “दर्द केवल एक भ्रान्ति है।” “कोई परमेश्वर नहीं है; दर्द व्यर्थ है।” “दर्द परमेश्वर के नियन्त्रण से बाहर है।” “दर्द वर्तमान या पूर्व जीवन के कर्मों का फल है।” इन सभी उत्तरों में एक बात समान है: ये कोई आशा नहीं देते। लेकिन परमेश्वर स्वयं हमें एक बेहतर उत्तर देता है।

हालाँकि परमेश्वर शैतान को धोखा देने से, या आदम और हव्वा को धोखा खाने से, या यहाँ तक कि पीड़ा को पूरी तरह रोक सकता था। फिर भी परमेश्वर ने पीड़ा का उपयोग करने का मार्ग चुना, ताकि मनुष्य प्रेमपूर्वक आज्ञाकारिता और उद्धारकर्ता की आवश्यकता का अर्थ सीख सके। यह हमारी स्वतन्त्रता ही है, जो इस पाठ को सीखने को सम्भव बनाती है। परमेश्वर ने हमें रोबोट की तरह नहीं बनाया; वह चाहता था कि हम स्वेच्छा और प्रेम से उसकी सेवा-उपासना करें, न कि मजबूरी या डर से। दुख की बात यह है कि उसी स्वतन्त्रता में मानवता ने परमेश्वर से अलग जीवन चुन लिया, जिसके भयानक परिणाम हुए। और जब भी हम पाप करते हैं, हम दिखाते हैं कि हम आदम और हव्वा से अलग नहीं हैं।

परमेश्वर जानता था कि पुरुषों और महिलाओं को इस सच्चाई का सामना करना होगा कि उसके विरुद्ध विद्रोह करना मूर्खता है। इसी कारण उसने आदम और हव्वा को जीवन के वृक्ष से दूर कर दिया (उत्पत्ति 3:22–24)। इसी कारण यह संसार और हमारे शरीर भी अब वैसे काम नहीं करते, जैसा इन्हें बनाया गया था (उत्पत्ति 3:16–19)। जैसे कोई विद्रोही बच्चा अपनी गलती समझ कर स्वेच्छा से घर लौट आता है और अपने परिवार की अधिक सराहना करता है, वैसे ही हम भी परमेश्वर के प्रेम की लालसा करते हुए उसके पास लौट सकते हैं। परमेश्वर ने पाप को उसकी समस्त भयानकता के साथ संसार में आने की अनुमति दी, ताकि हम अपने चुनावों के परिणामों को महसूस कर सकें और जब वह बुराई से भरी इस दुनिया में अपने प्रेम की सुन्दरता प्रकट करता है, तब हम उसे और भी अधिक प्रेम करना सीखें।

सी.एस. लुईस ने इस प्रकार कहा: “परमेश्वर हमारे सुख में फुसफुसाता है, हमारी अन्तरात्मा में बोलता है, परन्तु हमारे दर्द में चिल्लाता है। यह एक बहरे संसार को जगाने के लिए उसका मेगाफोन है।”[1]

परमेश्वर बुराई का रचयिता नहीं है, लेकिन वह बुराई पर सम्प्रभु हैं। इसलिए हमें यह आशा है: एक दिन वह सारी बुराई को समाप्त कर देगा। फिलहाल, वह सब कुछ वैसा ही रहने देता है, ताकि हमारी परीक्षाओं के बीच हम उस दुखी सेवक को थामे रहें जो हमारा उद्धारकर्ता है। इस पतित संसार के जीवन में आपके निराशा भरे अनुभव आपको यह सोचने पर मजबूर न करें कि परमेश्वर मौजूद नहीं हैं या उसे कोई परवाह नहीं है। बल्कि ये अनुभव बार-बार आपको आपके उद्धारकर्ता की ओर लौटाएँ—जो यह प्रतिज्ञा करता है कि वह एक दिन हर बुराई का अन्त करेगा और आपके सामने एक ऐसा अनन्त भविष्य रखेगा जिसमें सब कुछ ठीक होगा।

  लूका 15:11-32

◊ पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: 2 इतिहास 7–9; लूका 6:1-26


[1] द प्रोब्लम ऑफ पेन (हार्पर कोलिंस, 2001), पृ. 91.