2 दिसम्बर : सृष्टिकर्ता को जानना

Alethia4India
Alethia4India
2 दिसम्बर : सृष्टिकर्ता को जानना
Loading
/

“सच्‍ची ज्योति जो हर एक मनुष्य को प्रकाशित करती है, जगत में आने वाली थी। वह जगत में था, और जगत उसके द्वारा उत्पन्न हुआ, और जगत ने उसे नहीं पहचाना।” यूहन्ना 1:9-10

यद्यपि चारों सुसमाचार प्रभु यीशु मसीह के जीवन का विवरण देने के लिए भिन्न-भिन्न दृष्टिकोण अपनाते हैं, फिर भी उनका उद्देश्य एक ही है: जैसा कि यूहन्ना लिखता है, “तुम विश्वास करो कि यीशु ही परमेश्वर का पुत्र मसीह है, और विश्वास करके उसके नाम से जीवन पाओ” (यूहन्ना 20:31)। ये वचन उसके सुसमाचार के अन्त के निकट आते हैं और यह उसके आरम्भिक पाठकों को यह स्मरण दिलाने के लिए लिखे गए थे कि परमेश्वर ने अनुग्रहपूर्वक पहल की, ताकि हम उसे जानें और उससे प्रेम करें।

यद्यपि यीशु उस संसार का सृष्टिकर्ता था जिसमें वह आया, फिर भी संसार ने उसे नहीं पहचाना। वह स्वर्ग से मनुष्य के रूप में पृथ्वी पर उतरा, नगरों की गलियों में चला-फिरा, और हमारे बीच वास किया, ताकि हम उसके साथ ज्योति में जीएँ और अनन्तकाल के लिए अन्धकार में न पड़े रहें। परन्तु आज भी, जैसे दो हज़ार वर्ष पूर्व था, बहुत से लोग इस संसार में मसीह द्वारा प्रदान किए गए जीवन के महानतम वरदान को नहीं समझते, और इस कारण वे उस अनन्त जीवन को भी खो देते हैं, जिसे मसीह ने हमें देने के लिए जन्म लिया, क्योंकि वे उसे नहीं जानते।

प्रेरित पौलुस ने अपनी प्रभावशाली पुस्तक रोमियों में लिखा कि परमेश्वर के “अदृश्य गुण, अर्थात् उसकी सनातन सामर्थ्य और परमेश्वरत्व, जगत की सृष्टि के समय से उसके कामों के द्वारा देखने में आते हैं” (रोमियों 1:20)। अर्थात्, सामान्य अनुग्रह के कारण सृष्टि में इतना प्रमाण विद्यमान है कि मनुष्य कम से कम एक सच्चे परमेश्वर के अस्तित्व को स्वीकार कर सके। इसलिए मनुष्य “निरुत्तर हैं” (रोमियों 1:20)।

किन्तु इस सन्दर्भ में भी पौलुस आगे कहता है कि “परमेश्वर को जानने पर भी उन्होंने परमेश्वर के योग्य बड़ाई और धन्यवाद न किया, परन्तु व्यर्थ विचार करने लगे, यहाँ तक कि उनका निर्बुद्धि मन अन्धकारमय हो गया” (रोमियों 1:21)। वे परमेश्वर के अस्तित्व से अवगत थे, परन्तु उन्होंने उस सत्य को दबा दिया, और प्रभु और उद्धारकर्ता के रूप में उसे जानने से इनकार कर दिया।

यह हमारे लिए एक विनम्रतापूर्ण चेतावनी है। यदि हम परमेश्वर को उसका यथोचित सम्मान और महिमा नहीं देते, तो हम इस तथ्य को भूलने का जोखिम उठाते हैं कि वह आज भी प्रेमपूर्वक और अनुग्रह से हमारी खोज करता है।

पश्चिमी संसार में प्रभु यीशु का वचन, सत्य और कथा सदियों से उपलब्ध हैं—फिर भी, यहाँ के लोग यह पहचाने बिना अपना जीवन जीते रहते हैं कि यीशु वास्तव में कौन है। विश्वासी भी इस दशा से बचे हुए नहीं है; वे ऐसे जीवन जीते हैं जिनमें रविवार की आराधना या सुबह की भक्ति को छोड़कर और कहीं कोई चिह्न नहीं दिखता कि वे प्रभु और उद्धारकर्ता यीशु को जानते हैं। कल्पना करें कि यदि हम हर क्षण यह स्मरण रखते कि वही हमारे भीतर का प्रकाश और नया जीवन है, कि वही हमें अनन्तकाल परमेश्वर के साथ बिताने के योग्य बनाता है, कि वही हमारा महान प्रभु और दीन उद्धारकर्ता है और उसे जानना सबसे मूल्यवान है, तो इससे हमारे जीवन में कितना अधिक अन्तर आ जाता।

1 कुरिन्थियों 1:18-31

पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: 2 इतिहास 28–29; लूका 10:1-24 ◊

Leave A Comment

Your email address will not be published. Required fields are marked *