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3 जनवरी : प्रत्येक प्रतिज्ञा की पूर्ति

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3 जनवरी : प्रत्येक प्रतिज्ञा की पूर्ति
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“अब्राहम की सन्तान, दाऊद की सन्तान, यीशु मसीह की वंशावली।”  मत्ती 1:1

हो सकता है कि नए नियम का आरम्भ हमें पहली बार देखने पर प्रेरणादायक न लगे। वास्तव में, यदि कोई पहली बार बाइबल पढ़ रहा हो और मलाकी की पुस्तक के अन्त तक पहुँच गया हो, जो कि आगे आने वाले की ओर प्रत्याशा से संकेत करती है, तो अगली पुस्तक का आरम्भ उनके इस उत्साह को डगमगा सकता है, जो वंशावली से होता है। हो सकता है कि वे (और हम भी!) मत्ती को छोड़ किसी दूसरे सुसमाचार से आरम्भ करने के लिए प्रलोभित हो जाएँ।

तथापि इस बात को स्मरण रखें कि पुराने नियम में परमेश्वर ने अपने लोगों से जो प्रतिज्ञाएँ की थीं, वे सभी अपने पूरे होने की प्रतीक्षा कर रही थीं। जब हम नए नियम को पढ़ते हैं, तब हमें आभास होता है कि वास्तव में वह इससे अधिक उपयुक्त रीति से आरम्भ नहीं हो सकता था क्योंकि मत्ती की वह वंशावली अब्राहम से लेकर दाऊद तक और अन्ततः यीशु तक की एक रेखा खींचती है, जो इन सभी प्रतिज्ञाओं की पूर्ति करता है।

इसी प्रकार मरकुस भी अपने पूरे सुसमाचार में हमें उन भविष्यद्वक्ताओं की ओर वापस लेकर जाता है, जिन्होंने उस आने वाले की ओर संकेत दिया था। मरकुस इस असाधारण वास्तविकता के लिए परिवेश तैयार करने के लिए पुराने नियम का उपयोग करता है, जब वह अगले वाक्य को “जैसा यशायाह भविष्यद्वक्ता की पुस्तक में लिखा है . . .” (मरकुस 1:2) से आरम्भ करता है। और जब वह यीशु के कहे पहले शब्दों को इस प्रकार दर्ज करता है कि “समय पूरा हुआ है, और परमेश्वर का राज्य निकट आ गया है” (पद 15)। यीशु के चेलों को वह देखने का सौभाग्य मिला, जिसे भविष्यद्वक्ता और राजा देखने की लालसा करते थे (लूका 10:24 देखें)—एक ऐसा सौभाग्य जो आज भी परमेश्वर के वचन के ज्ञानवर्धक कार्य के माध्यम से जारी है।

नया नियम हमें यह दिखाता है कि जिस साधन के द्वारा परमेश्वर की प्रतिज्ञाएँ पूरी होती हैं, उसे दो शब्दों में अभिव्यक्त किया जा सकता है। वे शब्द हैं यीशु मसीह।  परमेश्वर ने इस्राएल से उन शब्दों और श्रेणियों का उपयोग करके अपनी प्रतिज्ञाएँ कीं जिन्हें वे समझ सकते थे, अर्थात राष्ट्र  और मन्दिर  जैसे शब्द। मसीह के आगमन ने सुसमाचार के प्रकाश में पुराने नियम की इन अवधारणाओं को दोबारा से परिभाषित किया। हम पाते हैं कि पुराने नियम की सभी भविष्यद्वाणियाँ मसीह में, अर्थात मसीह के व्यक्तित्व द्वारा और मसीह के व्यक्तित्व में पूरी होती हैं। इस कारण इस्राएल के राज्य में किसी नए मन्दिर की खोज करने के विपरीत हम उसके पुत्र प्रभु यीशु के द्वारा परमेश्वर से मिलते हैं; उसके आत्मा के द्वारा हममें से प्रत्येक में उसके वास करने का आनन्द उठाते हैं; और हमारे जीवन को अभी और सदा के लिए बदल देने के लिए मसीह के राज्य की वास्तविकता को देखते हैं।

परमेश्वर के पुत्र का आगमन पुराने नियम की श्रेणियों की सीमाओं को तोड़ देता है। यह परमेश्वर के लोगों के लिए बेचैनी उत्पन्न करने के लिए नहीं, अपितु रोमांच से भर देने के लिए है! मसीह परमेश्वर की सभी प्रतिज्ञाओं की पूर्ण पूर्ति है। वह परमेश्वर के सभी भव्य आश्वासनों की वास्तविकता है। तो अब यह देखने के लिए और प्रतीक्षा न करें कि परमेश्वर अपनी प्रत्येक प्रतिज्ञा को कैसे पूरा करेगा। अब हम जानते हैं कि इनमें से प्रत्येक प्रतिज्ञा मसीह के द्वारा तृप्त हुई थी, हुई है और सदा होती रहेगी। उसने आपके साथ रहने, आपके लिए और आपके द्वारा कार्य करने और आपको पूर्णता के एक अनन्त राज्य में लाने की प्रतिज्ञा की है। ऐसे समय अवश्य आते हैं, जब उन प्रतिज्ञाओं को थामे रखना कठिन होता है। जब वे समय आते हैं तो हम अब्राहम और दाऊद की वंशावली से उत्पन्न हुए उस व्यक्ति की ओर फिर से देखते हैं, जो आत्मा के द्वारा गर्भ में आया, जो यह घोषणा करने में सक्षम था कि “समय पूरा हुआ है, और परमेश्वर का राज्य निकट आ गया है” और जो क्रूस पर लटका और कब्र से निकल आया, जिससे कि परमेश्वर की सभी प्रतिज्ञाएँ उसमें “हाँ” बन जाएँ।      मत्ती 1:1-18.

2 जनवरी: अपने परमेश्वर को देखो

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2 जनवरी: अपने परमेश्वर को देखो
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“हे सिय्योन को शुभ समाचार सुनाने वाली, ऊँचे पहाड़ पर चढ़ जा; हे यरूशलेम को शुभ समाचार सुनाने वाली, बहुत ऊँचे शब्द से सुना, ऊँचे शब्द से सुना, मत डर; यहूदा के नगरों से कह, ‘अपने परमेश्वर को देखो!’”  यशायाह 40:9

भविष्यद्वक्ता यशायाह के जीवनकाल में परमेश्वर के लोगों को एक पराए देश में बन्दी बना लिया गया था। वे निराश हो चुके थे, यहाँ तक कि प्रभु की स्तुति के गीत भी नहीं गा पा रहे थे (भजन संहिता 137:1-4 देखें)। फिर भी जब वे बँधुआई की उस स्थिति में थे, तब परमेश्वर अपने लोगों के पास शान्ति प्रदान करने वाले शब्दों के साथ आया (यशायाह 40:1), वह शान्ति जो केवल उसकी प्रतिज्ञा के पूरे होने में ही मिलती है: कि यहोवा का तेज प्रगट होगा और ऐसा केवल इस्राएल के लिए नहीं परन्तु सम्पूर्ण मानवजाति के लिए होगा।

यह शुभ समाचार ऐसा नहीं था कि इस बारे में चुप रहा जा सके। अवश्य था कि परमेश्वर के लोग विजयी जयघोष करते और अपनी आशा की महिमा से एक-दूसरे को मोहित कर देते। इसका वर्णन एक बार इस प्रकार भी किया गया था कि “जो लोग अन्धियारे में चल रहे थे” उन्होंने “बड़ा उजियाला देखा” (यशायाह 9:2)।

इस पतित संसार के अन्धकार और स्वर्ग के उजियाले के बीच का अन्तर एक अनोखा चित्रण है, जो यशायाह की पूरी पुस्तक में और निस्सन्देह पूरी बाइबल में दिखाई देता है। अन्धकार वह परिणाम है जो परमेश्वर के लिए उदासीनता होने, उसके विरुद्ध विद्रोह करने और उसके कहे अनुसार कार्य करने की अनिच्छा के होने से आता है। केवल एक ही ऐसा सन्देश है जो ऐसे अन्धकार में उजियाला लेकर आता है, जो हृदय और मन को तरोताजा कर देता है, और वह यह है “अपने परमेश्वर को देखो!”

यह सन्देश आज भी परमेश्वर के लोगों के लिए उतना ही प्रासंगिक है जितना कि यशायाह के समय में था। प्रायः अन्धकार बहुत अधिक लगता है और कभी-कभी उजियाला बहुत धुँधला दिखाई देता है। फिर भी, प्रायः इन अनिश्चित समयों में आशा का सन्देश भी प्रकट होता है। परमेश्वर ने प्रतिज्ञा की है कि “तब यहोवा का तेज प्रगट होगा और सब प्राणी उसको एक संग देखेंगे; क्योंकि यहोवा ने आप ही ऐसा कहा है” (यशायाह 40:5)। अन्ततः परमेश्वर ने इस प्रतिज्ञा को पूरा किया, जब उसने देह धारण किया और हमारे बीच में अपनी उपस्थिति ठहराई।

जब यूहन्ना ने अपना सुसमाचार लिखा, तो उसने उसी दृश्य को देखा जिसकी ओर यशायाह ने देख रहा था, और कहा कि “और वचन देहधारी हुआ; और अनुग्रह और सच्चाई से परिपूर्ण होकर हमारे बीच में डेरा किया, और हमने उसकी ऐसी महिमा देखी, जैसी पिता के एकलौते की महिमा” (यूहन्ना 1:14)। वह जगत की ज्योति था—वह  स्वयं—और “ज्योति अन्धकार में चमकती है, और अन्धकार ने उसे ग्रहण न किया” (पद 5)। यशायाह उसका वर्णन कर रहा था जो आने वाला था। परन्तु हम यूहन्ना की तरह उस पूरे किए गए कार्य पर विचार करने में सक्षम हैं कि यही वह महिमा है, जिसकी प्रतिज्ञा की गई थी और जो अब प्रकाशित हुई है।

हमारे अन्धकार को मिटाकर और उद्धार को लेकर परमेश्वर हमारे पास आया है। आप अपने परमेश्वर को पहले चरनी में, फिर क्रूस पर, फिर कब्र से बाहर निकलते हुए और अब ऊँचे स्थान पर राज्य करते हुए देख सकते हैं। अन्धकार को देख पाना कठिन नहीं है, किन्तु फिर भी हमें ज्योति की ओर देखना चाहिए क्योंकि वहाँ हमें आशा मिलती है, जो भय को दूर करती है और वह शुभ समाचार मिलता है, जो इस योग्य है कि उसे सबको सुनाया जाए। इसलिए आज अपने परमेश्वर को देखें!

1 जनवरी: सृष्टि का राजा

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1 जनवरी: सृष्टि का राजा
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“आदि में परमेश्वर ने आकाश और पृथ्वी की सृष्टि की।” उत्पत्ति 1:1

ऐसा कोई समय नहीं था जब परमेश्वर अस्तित्व में नहीं था। समय से पहले, कुछ भी होने से पहले, परमेश्वर था। और चूंकि उसका गुण अपरिवर्तनीय है, इसलिए वह सदा से त्रिएकता, अर्थात, परमेश्वर पिता, परमेश्वर पुत्र और परमेश्वर पवित्र आत्मा में होकर सदा से ही अस्तित्व में रहा है।

बाइबल पढ़ते समय हम पाते हैं कि त्रिएकता का प्रत्येक सदस्य सृष्टि के सृजन में सम्मिलित था: परमेश्वर पिता ने पहल की, परमेश्वर आत्मा को सबके ऊपर “मण्डराते हुए” वर्णित किया गया है, और जो कुछ भी उत्पन्न हुआ उस सब के सृजन का कर्ता परमेश्वर पुत्र था (उत्पत्ति 1:2-3; यूहन्ना 1:3)।

“सभी वस्तुएँ उज्ज्वल और सुन्दर, सभी प्राणी बड़े और छोटे” इन सब को हमें विस्मय में डाल देना चाहिए; ये सभी परमेश्वर की आज्ञा से रचे गए थे। और वह न केवल इन सभी का सृष्टिकर्ता है; वरन वह उन सब का प्रभु भी है जो उसने बनाया है। सारी प्रकृति उसके हाथों में है, उसके नियन्त्रण में है। जब हम लहरों को किनारे से टकराते हुए देखते हैं, तो यह जानना बहुत ही प्रोत्साहक होता है कि उनमें से प्रत्येक, परमेश्वर के सम्प्रभु प्रभुत्व के परिणामस्वरूप वहाँ है। वह अपनी सृष्टि से दूर कहीं चला नहीं गया है, न ही वह कभी जाएगा।

यह याद रखना महत्त्वपूर्ण है कि परमेश्वर सर्वोपरि भी है। वह सबसे ऊपर, सबसे परे, और उसने जो कुछ भी बनाया है उस सबसे अलग, अपने सिंहासन पर विराजमान है। यही बात मसीहियत को सर्वेश्वरवाद से अलग करती है, अर्थात इस सोच से कि प्राकृतिक संसार परमेश्वर की अभिव्यक्ति है और इसलिए सब कुछ किसी न किसी तरह उसका एक भाग है। इस आस्था के अनुसार, हम किसी मक्खी को मारने या चींटी पर पैर रखने का दुस्साहस कदापि न करेंगे क्योंकि वे कीड़े दिव्य हैं। इसी प्रकार, हम पेड़ नहीं काटेंगे, न ही माँस खाएँगे, क्योंकि ये भी “परमेश्वर के अंग” हैं। इस तरह की शिक्षाएँ गलत और भ्रमित करने वाली होती हैं और मूर्तिपूजा की ओर ले जाती हैं। पवित्रशास्त्र बार-बार यह स्पष्ट करता है कि लोग “सृजनहार को छोड़कर सृष्टि” की उपासना करना पसन्द करेंगे (रोमियों 1:25)। जब हम किसी अच्छी चित्रकारी को देखते हैं, तो हम उस चित्रकारी की प्रशंसा करते हैं और उसका आनन्द लेते हैं, और फिर हम चित्रकार की प्रशंसा करते हैं, और यह उचित भी है। सम्पूर्ण सृष्टि परमेश्वर का चित्र-फलक है, और यह सब “उसके अनदेखे गुण, अर्थात उसकी सनातन सामर्थ्य और परमेश्वरत्व” (पद 20) का वर्णन करता है।

केवल परमेश्वर की ही आराधना की जानी चाहिए, क्योंकि सृष्टि उसके सामर्थ्य से और उसकी महिमा के लिए ही अस्तित्व में है। उसके अस्तित्व का कोई आरम्भ या अन्त नहीं है, और वह सदा तक राज्य करेगा। वही राजा है। आज उसकी बढ़ाई उसी रीति से करें, जिसके योग्य केवल वही है। टहलते समय या खिड़की से बाहर देखते हुए, जैसे-जैसे आप उसकी बनाई हुई वस्तुओं में उसकी सुन्दरता को देखते जाएँ, उसकी स्तुति करते जाएँ। उसकी स्तुति करें, जब वह अपने सम्प्रभु हाथ से आपको थामे हुए सृष्टि पर राज्य करता है।