12 जनवरी : सामर्थ्य और पवित्रता

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12 जनवरी : सामर्थ्य और पवित्रता
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“छः दिन के बाद यीशु ने पतरस और याकूब और उसके भाई यूहन्ना को साथ लिया, और उन्हें एकान्त में किसी ऊँचे पहाड़ पर ले गया। वहाँ उनके सामने उसका रूपान्तर हुआ, और उसका मुँह सूर्य के समान चमका और उसका वस्त्र ज्योति के समान उजला हो गया।”  मत्ती 17:1-2

जैसा कि जॉन लेनन और पॉल मैक्कार्टनी ने एक बार व्यक्त किया था कि ऐसी जगहें हैं जिन्हें हम जीवन भर याद रखेंगे।[1] निश्चित रूप से पतरस, याकूब और यूहन्ना के लिए यह पहाड़, जहाँ उन्होंने मसीह का रूपान्तर देखा था, ऐसा ही स्थान रहा होगा। निश्चित रूप से पतरस इसे कभी नहीं भूला (2 पतरस 1:17-18)।

रूपान्तर में क्या-क्या हुआ था? सबसे पहले, यीशु का रूप बदल गया। उसका चेहरा “चमक उठा।” स्पष्ट रूप से यह साफ होने के कारण नहीं था, अपितु अलौकिक परिवर्तन के कारण ऐसा हुआ था। उसके चेहरे पर एक उज्ज्वल तेज था, जिसे मत्ती “सूर्य के सामान” वर्णित करता है। उसके कपड़े ज्योति के सामान उजले हो गए थे, इतने उजले जितने आपने या मैंने कभी न देखे होंगे, जो स्वर्ग की अतुलनीय शुद्धता को दर्शाता है।

पुराने नियम में परमेश्वर का वर्णन करने के तरीकों में से एक यह है कि वह “उजियाले को चादर के समान ओढ़े रहता है” (भजन संहिता 104:2)। और यीशु पहाड़ की चोटी पर ऐसा ही दिख रहा था। ऐसा कौन करता है? केवल परमेश्वर! यह कोई संयोग नहीं था, परन्तु यह एक संकेत था कि रूपान्तर केवल परमेश्वर की ओर से एक प्रकाशन ही नहीं था अपितु स्वयं परमेश्वर का एक प्रकाशन था। इस दृश्य में मसीह ने अपने आप को अभूतपूर्व रीति से परमेश्वर के रूप में प्रकट किया था। पवित्रशास्त्र हमें बताता है कि यीशु “उसकी महिमा का प्रकाश” है (इब्रानियों 1:3)। फिर भी जब वह हमारी दुनिया में आया तो मसीह की दीन मानवता में परमेश्वर की महिमा पर्दे में ढँकी हुई थी। रूपान्तर वह काम था जिसे जॉन कैल्विन ने “उसकी महिमा का एक अस्थायी प्रदर्शन” कहा था।[2] यह पर्दे को थोड़ा-सा हटाने जैसा था, मानो पहाड़ की छोटी पर और इन तीन चेलों के मनों में एक छोटी-सी झलक। परमेश्वर पतरस, याकूब और यूहन्ना के लिए यह सम्भव बना रहा था कि वे उस वस्तु का स्वाद चख लें, जिसे वे अभी तक पूरी तरह से समझ नहीं पाए थे, किन्तु भविष्य में अनन्त काल तक उसका आनन्द लेंगे।

पवित्रशास्त्र में जब कभी परमेश्वर की महिमा का प्रदर्शन हुआ है, तो लोग प्रायः अपने मुँह के बल गिर जाया करते हैं। ये चेले कुछ अलग नहीं थे, वे भी अत्यन्त डरे हुए थे। किन्तु यीशु ने उनसे दया के साथ कहा, “उठो, डरो मत” (मत्ती 17:7)।

क्या आप और मैं मसीह के पास उसकी सिद्ध पवित्रता और पारलौकिकता के प्रति इस प्रकार भय-युक्त प्रेम के साथ आते हैं? या क्या ऐसी सम्भावना है कि परमेश्वर के बारे में हमारा दृष्टिकोण कभी-कभी बहुत छोटा होता है? उसके समक्ष इस प्रकार आएँ कि आप उसके सामर्थ्य और उसकी पवित्रता पर विचार करते हुए अपने आप को मुँह के बल गिरे हुए पाएँ। फिर उसकी दया में उसे यह कहते हुए सुनें, उठो। तुम्हें डरने की आवश्यकता नहीं है।  आज और प्रति दिन, भय-युक्त प्रेम और आनन्द में जीने का यही तरीका है, जब तक कि आप स्वयं हमारे महिमामय प्रभु को न देख लें।

 मत्ती 17:1-9

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