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21 जून : सच्चा मसीही प्रेम

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21 जून : सच्चा मसीही प्रेम
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प्रेम निष्कपट हो। रोमियों 12:9

फिल्म शानदार तरीके से यह दिखा सकती है कि एक पात्र जो कहता है और उसके दिमाग में जो सच में चल रहा होता है, उसके बीच कितना विरोधाभास हो सकता है। यह आमतौर पर उनकी आँखों के करीब से लिए गए शॉट में देखा जा सकता है: उसका मुँह कहता है, “वाह, मिस्टर जेनकिंस, आपको फिर से देखकर बहुत अच्छा लग रहा है!” लेकिन फिर उसकी अभिव्यक्ति से दर्शक यह समझ जाते हैं कि वह सच में ऐसा नहीं सोच रही है। वह सच में यह कहना चाहती है, “मिस्टर जेनकिंस, यदि मैं आपसे मुलाकात करने से बच सकती, तो मैं जरूर ऐसा करती—लेकिन अब मुझे यहाँ आपके साथ बात करनी पड़ रही है।”

जो मुँह कहता है, जरूरी नहीं कि वह सच हो। जब लोगों बिना सोचे-समझे किसी से कहा, “मैं तुमसे प्यार करता हूँ,” तो इससे बहुत से दिल टूटे हैं और जीवन बर्बाद हुए हैं। पवित्रशास्त्र के अनुसार सच्चा मसीही प्रेम हमेशा वास्तविक होता है। पौलुस सतहीपन और धोखे के खतरे का सामना करते हुए विश्वासियों को ईमानदारी से प्रेम करने के लिए प्रोत्साहित करता है—अर्थात ऐसे दिल से प्रेम, जो हमारे शब्दों से मेल खाता हो। हम इस ढोंग के दमन से मुक्त हो जाते हैं कि हमें हर किसी को पसन्द करना है और इस सोच से मुक्त हो जाते हैं कि हर कोई हमें पसन्द करे; और तब हम मसीह में पराक्रमी रूप से सक्षम हो जाते हैं कि हम उन लोगों से भी प्रेम करें जिनके हम पहले पास भी नहीं रहना चाहते थे।

डब्ल्यू. ई. वाईन कहते हैं कि वास्तव में मसीही प्रेम “हमेशा प्राकृतिक प्रवृत्तियों के साथ नहीं चलता, और न ही यह केवल उन्हीं पर खर्च होता है जिनके साथ कोई सम्बन्ध पाया जाता है।”[1] दूसरे शब्दों में, यह प्राकृतिक नहीं है। जो प्राकृतिक है वह यह है कि हम केवल उन्हीं से प्रेम करें जिन्हें हम प्रेम के योग्य समझते हैं—जो हमारे जैसे हों, हमारी सोच के दायरे में फिट बैठते हों, और हमारी अपेक्षाओं को पूरा करते हों। लेकिन वास्तविक प्रेम पारम्परिक नहीं होता। यह जाति, शिक्षा और सामाजिक स्थिति की सीमाओं को पार करता है। यह मनुष्यों द्वारा निर्धारित सभी सीमाओं को पार करता है।

यह रोमियों 5:8 वाला प्रेम है: “परमेश्‍वर हम पर अपने प्रेम की भलाई इस रीति से प्रगट करता है कि जब हम पापी ही थे तभी मसीह हमारे लिए मरा।” सच्चा प्रेम केवल परमेश्वर के अनुग्रह के परिणामस्वरूप ही आ सकता है। यह हमारे लिए यीशु के बलिदान का प्रतिबिम्ब है। जब परमेश्वर का प्रेम एक विश्वासी के जीवन को आकार देता है, तो हमारे शब्द और कर्म उस प्रेम से ओत-प्रोत हो जाते हैं।

पौलुस की आशा थी कि जब लोग रोम में आरम्भिक कलीसिया को देखेंगे, तो वे कहेंगे, “इन लोगों का आपस में प्रेम करने का तरीका कुछ अलग है।” अन्य मसीहियों के साथ आपके रिश्ते में परमेश्वर की पुकार आज भी वही है। सतही, कमजोर या नकली प्रेम से सन्तुष्ट न हों। अपने दिल को ठण्डा न होने दें, भले ही आप सभी सही बातें कह रहे हों। अपना प्रेम वास्तविक बनाएँ रखें—उस व्यक्ति पर अपनी दृष्टि लगाए रख कर जिसने आपसे मृत्यु तक प्रेम किया, इसके बावजूद कि आप पापी हैं। प्रार्थना करें कि आपका प्रेम अलग और गहरा हो, ताकि आप उस व्यक्ति की ओर इशारा कर सकें, जो सारे असली प्रेम का स्रोत है।

यूहन्ना 15:12-17 पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: यिर्मयाह 43–45; मत्ती 27:51- 66 ◊


[1] वाईनज़ एक्स्पोज़िटरी डिक्शनरी ऑफ ओल्ड ऐण्ड न्यू टेस्टामेण्ट वर्ड्स (थॉमस नेल्सन, 1997), एस.वी. “लव”

20 जून : ऊपर से मिले वरदान

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20 जून : ऊपर से मिले वरदान
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“वैसा ही हम जो बहुत हैं, मसीह में एक देह होकर आपस में एक दूसरे के अंग हैं। जबकि उस अनुग्रह के अनुसार जो हमें दिया गया है, हमें भिन्न–भिन्न वरदान मिले हैं, तो जिसको भविष्यद्वाणी का दान मिला हो, वह विश्‍वास के परिमाण के अनुसार भविष्यद्वाणी करे।” रोमियों 12:5-6

आत्मिक वरदान औजार हैं, खिलौने नहीं। इन्हें खेलने के लिए या दूसरों को हमारी ओर आकर्षित करने के लिए नहीं नहीं दिया गया है, बल्कि इन्हें परमेश्वर द्वारा हमारे माध्यम से उसके उद्देश्यों और उसकी महिमा के लिए उपयोग में लाया जाना चाहिए।

हमें जो भी वरदान मिले हैं—चाहे वह बोलने से सम्बन्धित क्षमताएँ हों या सेवा करने से—उन्हें कलीसिया की भलाई के लिए दिया गया है। परमेश्वर इन वरदानों को इस उद्देश्य से देता है कि जब हम उन्हें उसकी इच्छानुसार उपयोग करें, तो मसीह की देह समग्र रूप से मजबूत हो। ये वरदान किसी व्यक्ति के स्वार्थों को पूरा करने के लिए और महानता का प्रदर्शन करने के लिए नहीं दिए गए हैं, बल्कि इसलिए दिए गए हैं ताकि परमेश्वर के सभी लोगों की एकता, सामंजस्य, और प्रगति को सुदृढ़ किया जा सके। यही कारण है कि हमारे पास भिन्न-भिन्न वरदान होते हैं: ताकि हम एक-दूसरे की सेवा करना और एक-दूसरे पर निर्भर रहना सीख सकें।

फिर भी, परमेश्वर के वरदान केवल तब ही सामंजस्य और भलाई को बढ़ावा दे सकते हैं, जब उन्हें सच्ची विनम्रता के साथ प्रयोग किया जाता है। हर स्थानीय कलीसिया की देह उस सीमा तक ही बढ़ सकती है, जिस सीमा तक “हर एक अंग के ठीक–ठीक कार्य” करता है (इफिसियों 4:16)। अपने पाठकों को उनके वरदानों का उपयोग करने के लिए प्रेरित करने से पहले ही पौलुस ने अपने आत्मिक वरदानों पर प्रवचन का आरम्भ विनम्रता से किया था, और सबसे विनती की थी कि “जैसा समझना चाहिए उससे बढ़कर कोई भी अपने आप को न समझे; पर . . . सुबुद्धि के साथ अपने को समझे” (रोमियों 12:3)।

विनम्रता के बिना आत्मिक वरदान अराजकता की ओर ले जा सकते हैं। हम उचित निर्देश और निगरानी के बिना किशोरों को पावर टूल्स नहीं देंगे, न ही उन्हें तीव्र गति से चलने वाली आरी देने की सोचेंगे—अन्यथा इससे अराजकता फैल सकती है! इसी तरह, आत्मिक वरदानों का उपयोग उनके सही उद्देश्य और सही तरीके से किया जाना चाहिए ताकि हंगामा न हो। इसलिए पौलुस कुरिन्थियों की कलीसिया को—जो वरदानों से भरी हुई थी, लेकिन उन्हें उपयोग में लाने के लिए अनिवार्य बुद्धि की कमी से जूझ रही थी—बताता है कि जबकि आत्मिक वरदानों की इच्छा रखना और उन्हें लेकर खुश होना अच्छा है, तौभी उनका उपयोग करने का एक “उत्तम मार्ग” यह है कि हम उन्हें धैर्यपूर्वक, दयालुता से और विनम्रता—अर्थात प्रेम के साथ उपयोग किया जाए (1 कुरिन्थियों 12:31 – 13:7)।

हमें यह याद रखना चाहिए कि वरदान केवल वरदान ही होते हैं। उनका स्रोत परमेश्वर है; उन्हें अपनी सम्पत्ति मानकर घमण्ड करना मूर्खता है, इसलिए हमारे पास कोई बहाना नहीं है कि हम उन्हें अपने लाभ के लिए उपयोग करें। लेकिन यदि हम उन्हें उपयोग करते समय विनम्रता का अभ्यास करते हैं और एक-दूसरे के साथ सामंजस्य में जीने की कोशिश करते हैं, तो हम परमेश्वर के कार्य का फल अपने और दूसरों के जीवन में देखेंगे। परमेश्वर ने आपको किस तरह के वरदान दिए हैं? उनमें आनन्दित हों। वह आपको इन वरदानों का उपयोग आपकी कलीसिया की भलाई और अपने पुत्र की महिमा के लिए किस प्रकार करने के लिए बुला रहा है? जाएँ और ऐसा ही करें।

इफिसियों  4:1-16

◊ पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: यिर्मयाह 40–42; मत्ती 27:27-50

19 जून : हम एक देह हैं

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19 जून : हम एक देह हैं
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“क्योंकि जैसे हमारी एक देह में बहुत से अंग हैं, और सब अंगों का एक ही सा काम नहीं; वैसा ही हम जो बहुत हैं, मसीह में एक देह होकर आपस में एक दूसरे के अंग हैं।” रोमियों 12:4-5

आपने कभी-कभी लोगों को आपसे यह पूछते सुना होगा, “क्या आप यहाँ के सदस्य हैं?” यह सवाल आमतौर पर किसी कंट्री क्लब, जिम, या इसी तरह के किसी स्थान से सम्बन्धित होता है। वे जानना चाहते हैं, “क्या आप इस स्थान की सदस्य-सूची में शामिल हैं? क्या यहाँ के लोग आपको जानते हैं और स्वीकार करते हैं, और क्या वे आपको तब याद करेंगे जब आप मौजूद नहीं होंगे?”

कलीसिया का वर्णन करने के लिए पौलुस अक्सर शरीर के उदाहरण का उपयोग करता है। इसके अर्थ को समझने के लिए हमें अपनी कल्पना का विस्तार करने की आवश्यकता नहीं है। हम सभी के पास एक शरीर है, जो विभिन्न हिस्सों से बना हुआ है, और प्रत्येक भाग का एक विशेष कार्य होता है। सभी भाग दिखाई नहीं देते, लेकिन सभी महत्त्वपूर्ण हैं। यदि कोई भाग काम नहीं कर रहा या मौजूद नहीं है, तो इसका असर बाकी सब पर पड़ता है। किसी के पूरे शरीर की प्रभावशीलता इस पर निर्भर करती है कि यह सिर द्वारा नियन्त्रित हो रहा है या नहीं। यह सत्य मसीह की देह अर्थात स्थानीय कलीसिया पर भी लागू होता है: आत्मिक शरीर तभी सही तरीके से काम करता है, जब वह यीशु के नेतृत्व में एकजुट होकर काम करता है। जब ऐसा होता है, तो हम . . .

एकता के साथ काम करते हैं, क्योंकि हम एक-दूसरे से अलग-थलग नहीं रहते।

बहुलता के साथ काम करते हैं, क्योंकि हम विभिन्न प्रकार के हिस्सों से बने हैं।

विविधता के साथ काम करते हैं, क्योंकि शरीर के कार्य स्वाभाविक रूप से विविध होते हैं।

सुगमता के साथ काम करते हैं, जिसे हम तब महसूस करते हैं जब सब कुछ एकजुट होकर काम करता है।

पहचान के साथ काम करते हैं, यह दर्शाते हुए कि हममें से प्रत्येक जन अकेला रहकर स्वयं को पूर्ण रूप से नहीं जान सकता।

दूसरे शब्दों में, जब आप एक व्यक्ति के रूप में मसीह की देह की प्रकृति को समझते हैं, तो आप बेहतर तरीके से समझ पाते हैं कि आप कौन हैं और आप कहाँ फिट बैठते हैं। मसीह की देह के एक सदस्य के रूप में आप कहीं न कहीं अवश्य शामिल हैं। जब परमेश्वर के अनुग्रह ने हमें बदल दिया है, तो हमें यह एहसास होना चाहिए कि हमारे लिए यह ध्यान रखना अधिक महत्त्वपूर्ण हो जाता है कि हमें एक-दूसरे के साथ सम्बन्ध में बुलाया गया है—एक समुदाय में बुलाया गया है। हम उन वरदानों में विविध हैं जो हमें दिए गए हैं; हममें से कोई भी अकेले रहकर शरीर नहीं बना सकता, बल्कि हम एकसाथ जुटकर ही शरीर बनते हैं। हममें से प्रत्येक एक-दूसरे के लिए हैं। इसलिए हम कलीसिया में इस उद्देश्य से एकत्रित होते हैं कि हम अपने आप को एक-दूसरे के लिए और अन्ततः हमारे प्रभु के लिए अर्पित कर सकें। हम मसीह की देह में हमारे उपस्थित रहने, हमारे गीतों, हमारे प्रार्थनाओं और हमारी संगति के माध्यम से योगदान देते हैं। जैसा कि आइसक वॉट्स ने लिखा:

मेरी जीभ अपनी प्रतिज्ञाएँ दोहराती है,

इस पवित्र घर को शान्ति मिले!”

क्योंकि यहाँ मेरे मित्र और परिवारजन रहते हैं। [1]

कलीसिया सिर्फ एक ऐसा स्थान नहीं है, जहाँ आप आकर बैठ जाते हैं। यह एक देह है। यह आपका परिवार है। आपको अपनी कलीसिया की आवश्यकता है; और आपकी कलीसिया को आपकी आवश्यकता है। जितना अधिक आप अपनी कलीसिया के प्रति प्रतिबद्ध होंगे, उतना ही अधिक आप इससे आशीषित होंगे; क्योंकि हमारे जीवन में इससे बेहतर और कुछ नहीं हो सकता कि परमेश्वर अपने लोगों को एक साथ लाता है, क्योंकि एकजुटता ही वह स्थान है जहाँ हम सबको होना चाहिए।

  1 कुरिन्थियों 12:12-27

पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: यिर्मयाह 37–39; मत्ती 27:1-26 ◊


[1] आइसक वॉट्स, “हाओ प्लीज़्ड ऐण्ड ब्लेस्ट वाज़ आई” (1719).

18 जून : स्वयं के प्रति सही दृष्टिकोण रखना

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18 जून : स्वयं के प्रति सही दृष्टिकोण रखना
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“क्योंकि मैं उस अनुग्रह के कारण जो मुझ को मिला है, तुम में से हर एक से कहता हूँ कि जैसा समझना चाहिए उससे बढ़कर कोई भी अपने आप को न समझे; पर जैसा परमेश्‍वर ने हर एक को विश्‍वास परिमाण के अनुसार बाँट दिया है, वैसा ही सुबुद्धि के साथ अपने को समझे।” रोमियों 12:3

कोई भी व्यक्ति आत्म-प्रशंसा के पाप से बचा हुआ नहीं है। इसके प्रमाण के लिए बस किसी भी किंडरगार्टन क्लासरूम में चले जाइए। इस छोटे से समूह में, जल्दी ही कोई न कोई अपने सबसे ऊँचे ब्लॉक टावर बनाने या सबसे बेहतरीन पारिवारिक चित्र बनाने की बातें करने लगेगा—दूसरे शब्दों में, अपने आप को उससे अधिक समझना जितना वह वास्तव में है।

हमेशा दूसरों से अपनी तुलना करना एक सांसारिक सोच का तरीका है। अपने आप का अतिरंजित मूल्यांकन एक भयंकर समस्या है—यह दूसरों को नीचा दिखाता है और परमेश्वर के सामने हमारे स्थान को नजरअंदाज करता है। हालाँकि इसका उत्तर आत्म-अपमान में नहीं है, जो आत्म-प्रशंसा के विपरीत है और उसी के समान गलत भी है। यह आत्म-हीनता भी अहंकार का ही उत्पाद है, क्योंकि यह तुलना से उत्पन्न होती है। यह भी आत्म-केन्द्रित ही होती है।

मसीही लोगों का आत्म का दृष्टिकोण परमेश्वर द्वारा नवीनीकरण किए गए मन में आधारित होना चाहिए (रोमियों 12:2)। इस दृष्टिकोण के साथ, हम अपने मूल्य और पहचान को परमेश्वर की कृपा और अनुग्रह में पाते हैं। हमारा महत्त्व, पहचान, मूल्य, और भूमिका इस पर आधारित होते हैं कि परमेश्वर कौन है और उसने हमारे लिए क्या किया है, न कि इस पर कि हम कौन हैं या हमने उसके लिए क्या किया है।

हम इस सही दृष्टिकोण को उस समय याद करते हैं, जब हम इस गीत की ये पंक्तियाँ गाते हैं, “जब मैं अद्‌भुत क्रूस को देखता हूँ, जिस पर महिमा का राजकुमार मरा।”[1] क्रूस को देखने का अर्थ सुसमाचार पर ध्यान केन्द्रित करना है—इस सत्य पर कि कोई और हमारे स्थान पर मरा और हमारे दण्ड को सहा। ऐसा करते हुए हम समझ जाते हैं कि “मेरे सबसे बड़े लाभ को मैं हानि मानता हूँ, और अपने सारे घमण्ड का तिरस्कार करता हूँ।” क्रूस हमें एक साथ ऊँचा और नीचा करता है, और यह हमें जीवन में आगे बढ़ने के प्रयास करने की जरूरत से मुक्त करता है और हमें यह पहचानने में सक्षम बनाता है कि परमेश्वर ने हमें किस प्रकार के वरदान दिए हैं। हम “सुबुद्धि के साथ” अपना आत्म-मूल्यांकन करें।

इसलिए कलीसिया का दृष्टिकोण संसार से स्पष्ट रूप से अलग होना चाहिए कि हम अपने आप को और एक-दूसरे को कैसे देखते हैं। जब हम सुसमाचार से एकजुट होकर एक साथ आते हैं, तो हमारे अस्तित्व से सम्बन्धित बाकी सब कुछ, हालाँकि वह अप्रासंगिक नहीं है, अपने प्राथमिक महत्त्व को खो देता है, और हम अपने वरदानों का उपयोग अपनी प्रशंसा के लिए नहीं बल्कि दूसरों की सेवा के लिए करते हैं।

क्रूस को देखिए, जहाँ आपका उद्धारक आपके पापों के लिए लहूलुहान हुआ और मरा, क्योंकि वह आपसे प्रेम करता है। आपके पास गर्व करने के लिए कोई स्थान नहीं है। दूसरों से अपनी तुलना करने की कोई आवश्यकता नहीं है। इसके बजाय, जो कुछ उसने आपको दिया है, उसका उपयोग आप दूसरों की निस्वार्थ, आनन्दमयी सेवा में कर सकते हैं।

  1 कुरिन्थियों 4:1-7

◊ पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: यिर्मयाह 34–36; मत्ती 26:47-75


[1] आइसक वॉट्स, “वैन आई सर्वे द वण्ड्रस क्रॉस” (1707).

17 जून : नया मन

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17 जून : नया मन
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“इस संसार के सदृश न बनो; परन्तु तुम्हारे मन के नए हो जाने से तुम्हारा चाल–चलन भी बदलता जाए, जिससे तुम परमेश्‍वर की भली, और भावती, और सिद्ध इच्छा अनुभव से मालूम करते रहो।” रोमियों 12:2

एयरपोर्ट कण्ट्रोल टावर एक आकर्षक जगह होती हैं। इतनी छोटी सी जगह में इतनी बड़ी क्षमता और शक्ति समाहित होती है। इन टावरों से दिए गए निर्देशों से गड़बड़ी रोकी जाती है और सुरक्षा सुनिश्चित की जाती है। यदि इन टावरों में कुछ गलत होता है, तो इसका असर उनकी दीवारों के बाहर महसूस होता है और यह अक्सर बड़ी मुश्किल का कारण बनता है।

इसी तरह, हम यह कह सकते हैं कि हमारे मन हमारे शरीरों के कण्ट्रोल टावर होते हैं। हम जो कुछ भी अपने शरीर के साथ करते हैं, वह सीधे तौर पर हमारे मन में हो रही गतिविधियों से जुड़ा होता है। हमारे मन में हम सम्भावनाओं पर विचार करने, निर्णय लेने, अपनी भावनाओं का मूल्यांकन करने, और अपनी रुचियों को आकार देने की क्षमता रखते हैं। इसलिए यह कोई अचम्भे की बात नहीं है जब पौलुस कहता है कि परमेश्वर की दया के प्रत्युत्तर में “अपने शरीरों को जीवित, और पवित्र, और परमेश्‍वर को भावता हुआ बलिदान करके” (रोमियों 12:1) अर्पित करने में हमारा मन महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है।

एक मसीही होने का अर्थ है एक ऐसी मानसिकता अपनाना जो पूरी तरह से बदली हुई हो, जो शुद्ध विचारों और पवित्र आचरण में भरी होती है, जो मसीह के बिना जीवन में नहीं देखी जाती। जैसे पौलुस रोमियों की पत्री में पहले लिखता है, “शारीरिक व्यक्ति शरीर की बातों पर मन लगाते हैं; परन्तु आध्यात्मिक आत्मा की बातों पर मन लगाते हैं” (रोमियों 8:5)। दृष्टिकोण में यह बदलाव पवित्र आत्मा की शक्ति से आता है, क्योंकि वह हमें परमेश्वर के वचन के सत्य में निर्देशित करता है।

यह परिवर्तन एक प्रक्रिया है। प्रत्येक दिन हम यीशु मसीह के स्वरूप में ढल रहे हैं। हमारे मन—वास्तव में हमारा पूरा जीवन—नया हो रहा है। हम अभी न तो पूरी तरह से वह हैं जो हमें होना चाहिए, और न ही वह जो हम बनने वाले हैं—लेकिन हम अब वह नहीं हैं जो हम पहले थे। और जब हमारे मन परमेश्वर के आत्मा और परमेश्वर के वचन के अधिकार में होते हैं, तो बाकी सब कुछ वैसे ही होता है जैसे वह चाहता है। हम जान जाते हैं कि परमेश्वर का तरीका सर्वोत्तम है और हम खुशी से उसमें चलने के लिए तैयार रहते हैं। हम हर कदम उठाने से पहले सोचते हैं। हम इस संसार के रूप के आकार में ढलने से इनकार करते हैं, यह सीखते हुए कि किस प्रकार हमें ऐसी एक मानसिकता बेची जा रही है जो परमेश्वर के वचन के सत्य पर नहीं, बल्कि झूठ पर आधारित है।

इसलिए विश्वास रखें कि परमेश्वर के वचन की शक्ति आपके मन को नया बनाएगी और पवित्र आत्मा से कहें कि वह इसे आपके भीतर पूरा करे। देखें कि कैसे संसार आपको अपने में ढलने के लिए बुला रहा है, और इन अवसरों को देखें कि कैसे आप अपने मन को ईश्वरीय ज्ञान से रूपान्तरित कर सकते हैं। और ऐसा इसलिए न करें क्योंकि आपको करना ही पड़ेगा, बल्कि इसलिए करें क्योंकि यह आपका आनन्द है, क्योंकि आप जानते हैं कि “धन्य है वह मनुष्य जो बुद्धि पाए, और वह मनुष्य जो समझ प्राप्त करे, क्योंकि बुद्धि की प्राप्ति चाँदी की प्राप्ति से बड़ी, और उसका लाभ चोखे सोने के लाभ से भी उत्तम है . . . उसके मार्ग आनन्ददायक हैं, और उसके सब मार्ग कुशल के हैं” (नीतिवचन 3:13-14, 17)।

नीतिवचन 3:1-18 पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: यिर्मयाह 32–33; मत्ती 26:26-46 ◊

16 जून : प्रतिबद्धता के लिए बुलावा

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16 जून : प्रतिबद्धता के लिए बुलावा
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“इसलिए हे भाइयो, मैं तुम से परमेश्‍वर की दया स्मरण दिला कर विनती करता हूँ कि अपने शरीरों को जीवित, और पवित्र, और परमेश्‍वर को भावता हुआ बलिदान करके चढ़ाओ। यही तुम्हारी आत्मिक सेवा है।” रोमियों 12:1

जब सैलवेशन आर्मी मिशन के संस्थापक विलियम बूथ से उनके जीवन के प्रभाव को समझाने के लिए पूछा गया, तो उन्होंने एक प्रभावशाली वाक्य में उत्तर दिया: “यीशु मसीह ने मुझ पर पूरा अधिकार कर लिया है।”

इस उत्तर में कोई घमण्ड या अहंकार नहीं था। यह तो केवल वह एकमात्र तरीका था, जिससे बूथ यह समझा सकते थे कि वह एक सामान्य व्यक्ति थे, जिनके पास सीमित संसाधन थे, लेकिन फिर भी कैसे वह असाधारण तरीके से कैसे इस्तेमाल हुए और उस विशेष समय में उनका प्रभाव इतना अधिक क्यों था।

इसका क्या अर्थ है कि यीशु मसीह ने आप पर पूरा अधिकार कर लिया है?

रोमियों की पुस्तक के पहले ग्यारह अध्यायों में परमेश्वर द्वारा क्रूस पर पूर्ण की विजय के माध्यम से आई पाप से मुक्ति की खुशी मनाने के बाद रोमियों 12 के आरम्भ में पौलुस यीशु मसीह पर विश्वास करने वाले सभी लोगों को बुलावा देता है कि वे अपने शरीर, मन और आत्मा को पूरी तरह से प्रभु यीशु मसीह को समर्पित कर दें। यहाँ पर “विनती” के लिए उसने जिस शब्द का इस्तेमाल किया है, वह यूनानी के शब्द लॉजिकोस से आया है, जिससे हमें “तर्कसंगत” शब्द मिलता है। दूसरे शब्दों में, उसका यह प्रोत्साहन भावनाओं या छल पर आधारित नहीं है। बल्कि पौलुस अपने पाठकों से एक तर्कपूर्ण और तीव्र अपील कर रहा है, जो केवल परमेश्वर की कृपा की शक्ति पर आधारित है।

हमारी मानवता का कोई भी आयाम ऐसा नहीं है, जो परमेश्वर के प्रति हमारे विद्रोह से प्रभावित न हुआ हो। फिर भी, अपनी कृपा के कारण परमेश्वर अपने लोगों के पाप उनके खिलाफ नहीं गिनता और उसने हमें उस दण्ड से बचा लिया है, जो हमें मिलना चाहिए था। इसके बजाय, उसने हमारे पापों को अपने प्रिय पुत्र पर डाल दिया।

यदि हम इस विनती में से “परमेश्वर की दया” वाले हिस्से को नजरअंदाज करते हैं, तो हम तुरन्त गलत दिशा में चल पड़ते हैं। यह उन विनती उन लोगों से की गई है, जिन्होंने परमेश्वर का अनुग्रह प्राप्त किया है, ताकि वे अपने जीवन को पूरी तरह से परमेश्वर को समर्पित करें—इसलिए नहीं कि वे स्वीकार किए जाएँ, बल्कि इसलिए कि वे स्वीकार किए जा चुके हैं। यह विनती उन लोगों के लिए है, जो अनुग्रह के द्वारा मुक्त हो चुके हैं, ताकि वे वह सब बन सकें जो परमेश्वर उनके लिए चाहता है और पूरी तरह से उसे समर्पित हो सकें।

परमेश्वर हमसे हमारी सम्पत्ति या धन देने के लिए नहीं कहता। वह हमसे इससे भी अधिक की मांग करता है: हमारे अपने आप को। जो हम हैं, जो हम सोचते हैं, जो हम महसूस करते हैं, जो हम काम करते हैं, और जो हम जानते हैं—इसे उस परमेश्वर के लिए अर्पित करना जो हमारे लिए अपना पुत्र दे चुका है, यह उसकी कृपा का एकमात्र तर्कसंगत प्रत्युत्तर है। जब हम अपने आप को पूरी तरह से परमेश्वर को सौंपते हैं, तो हमारी सभी क्षमताएँ, फिर चाहे वे जितनी भी सीमित क्यों न हों, उसकी महिमा और उद्देश्यों के लिए उपयोग की जा सकती हैं। मसीही जीवन में कोई आधे-अधूरे उपाय या पीछे हटने का विकल्प नहीं है। यह एक पूरी तरह से समर्पित जीवन है।

इससे बढ़कर शानदार प्रतिबद्धता और कोई नहीं हो सकती, जो कहती है, “मैं पूरी तरह से समर्पित हूँ।” यदि आप पूरी तरह से समर्पित हो जाते हैं, तो जो कुछ भी आप में और आपके माध्यम से होगा, उसकी कोई सीमा नहीं होगी। क्या आप वह व्यक्ति होंगे जो कह सकता है, “यीशु मसीह ने मुझ पर पूरा अधिकार कर लिया है?”

फिलिप्पियों 1:19-30

◊ पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: यिर्मयाह 30–31; मत्ती 26:1-25

15 जून : मनुष्य का नगर

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15 जून : मनुष्य का नगर
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“हे मेरे लोगो, उस में से निकल आओ कि तुम उसके पापों में भागी न हो, और उसकी विपत्तियों में से कोई तुम पर आ न पड़े। क्योंकि उसके पापों का ढेर स्वर्ग तक पहुँच गया है, और उसके अधर्म परमेश्‍वर को स्मरण आए हैं।” प्रकाशितवाक्य 18:4-5

हमें आश्चर्यचकित या चिन्तित नहीं होना चाहिए जब विश्वासियों को लगातार विरोध का सामना करना पड़ता है। मनुष्यजाति का स्वाभाविक रुख परमेश्वर के प्रति गर्वपूर्ण विरोध होता है और इसी कारण उसके लोगों का विरोध भी होता है। मनुष्य अपने गर्व की अस्थिर नींव पर “एक शहर बनाता है” (प्रकाशितवाक्य की चित्रात्मक भाषा का उपयोग करते हुए) और एक ऐसी जीवनशैली बनाता है, जो परमेश्वर के मार्गों के खिलाफ होती है। मनुष्यजाति यह काम पतन के समय से ही करती आ रही है। पहली परमेश्वर-विरोधी निर्माण परियोजना शिनार के मैदान में हुई थी, जिसे बेबीलोन कहा गया है (उत्पत्ति 11:1-9)—यह वही बेबीलोन है, जहाँ आगे चलकर परमेश्वर के लोग निर्वासित हुए थे।

इसलिए प्रकाशितवाक्य 18 में मनुष्य के शहर को, जो परमेश्वर के खिलाफ बना हुआ है, बेबीलोन कहा गया है; और फिर बेबीलोन को एक वेश्या के रूप में व्यक्त किया गया है, जो लोगों को आत्मिक व्यभिचार के लिए ललचाती है। मोहक और आकर्षक, मनुष्य का शहर लोगों को परमेश्वर से दूर करने में प्रभावी है। यह “वह बड़ा नगर है जो पृथ्वी के राजाओं पर राज्य करता है” (17:18), और इसका प्रभाव महत्त्वपूर्ण और विनाशकारी है।

तो फिर, परमेश्वर के शहर के नागरिकों को इस सांसारिक प्रतिस्पर्धी को कैसे प्रत्युत्तर देना चाहिए? हमें इस संसार में रहना है, लेकिन इस संसार का नहीं होना है। दूसरे शब्दों में, हमें नमक होना है, जिसमें एक विशिष्ट स्वाद और संरक्षित करने की क्षमता होती है; और हमें प्रकाश होना है, जो अंधकार में छिपी हरेक वस्तु को उजागर करता है, लेकिन जो दूसरों का सुरक्षा की ओर मार्गदर्शन भी करता है (मत्ती 5:13-16)।

हमें इस तनाव में जीना है कि हम इस संसार के सदस्य हैं लेकिन यहाँ के नहीं हैं: यहाँ रहते हुए भी हमें उनसे अलग रहना है जिनके दिल और दिमाग परमेश्वर के खिलाफ हैं। मनुष्य के शहर के पाप विश्वासियों के जीवन का हिस्सा नहीं बनने चाहिएँ, जैसा कि यूहन्ना ने कहा, कहीं ऐसा न हो कि “उसकी विपत्तियों में से कोई तुम पर आ पड़े।” यदि हम बेबीलोन के मोह में फंसते हैं, तो हम यह सिद्ध करते हैं कि हमारी पहचान कभी भी परमेश्वर के राज्य के नागरिक की थी ही नहीं।

जो मसीह का अनुसरण करते हैं, उन्हें बाइबल के सत्य के प्रति प्रतिबद्ध होना चाहिए। मसीहत केवल नैतिक नियमों से कहीं अधिक है। यह जीवन जीने के ढांचे या किसी के जीवन को सुधारने के तरीका से कहीं अधिक है। उसमें क्रूस कहाँ है? मसीहत अन्य सभी धर्मों से अलग है, क्योंकि हम यीशु की क्रूस पर मृत्यु को अपने परमेश्वर से मेल-मिलाप का साधन मानते हैं। हम अपने पापों में मरे हुए थे, परमेश्वर के क्रोध और न्याय के पात्र थे—लेकिन उसने हमें मसीह के पूर्ण जीवन, बलिदानी मृत्यु और विजयी पुनरुत्थान के द्वारा मुक्ति दी।

अभी के लिए, संसार वैसे ही चल रहा है, जैसे पहले चलता था। लेकिन एक दिन मसीह लौटेगा और हर झूठे भविष्यवक्ता, बेबीलोन के हर नागरिक, और यहाँ तक कि शैतान को भी शान्त कर देगा। हम देख सकते हैं कि कलीसिया दबाव में है, इसका मजाक उड़ाया जाता है, इसके खिलाफ कानून बनाए जाते हैं और इसे उत्पीड़ित किया जाता है। संसार इसे कमजोर समझेगा, इतिहास के गलत छोर पर और सम्मान या स्वीकृति के योग्य नहीं मानेगा। लेकिन हम इस विजयी घोषणा में आशा रखते हैं: न तो बेबीलोन के द्वार और न ही नरक के द्वार इस पर प्रबल होंगे, क्योंकि मसीह अपनी कलीसिया को बनाएगा और इसे सुरक्षित रखेगा (मत्ती 16:18)।

इसलिए अभी के लिए जब आप बेबीलोन में रहते हैं, तो इसके पापों में से कौन से पाप आपको सबसे आकर्षक लगते हैं? आप किस प्रकार इस तरह का जीवन जीने के लिए सबसे अधिक प्रलोभित होते हैं कि यह शहर ही सब कुछ है? और आपको अपने आस-पास के लोगों के लिए नमक और प्रकाश बनने के लिए कौन से अवसर मिले हैं? सुनिश्चित करें कि आप मनुष्य के शहर का विरोध करें और दूसरों को परमेश्वर के शहर में आमन्त्रित करें।

प्रकाशितवाक्य 18:1 – 19:10

पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: यिर्मयाह 27–29; मत्ती 25:31-46 ◊

14 जून : शोक की वास्तविकता

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14 जून : शोक की वास्तविकता
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“जब यीशु ने उसको और उन यहूदियों को जो उसके साथ आए थे, रोते हुए देखा, तो आत्मा में बहुत ही उदास और व्याकुल हुआ, और कहा, ‘तुम ने उसे कहाँ रखा है?’ उन्होंने उससे कहा, ‘हे प्रभु, चलकर देख ले।’ यीशु रोया।” यूहन्ना 11:33-35

शोक “किसी हानि को कारण जीवन को हिला देने वाला दुख है। शोक जीवन को चिथड़े-चिथड़े कर देता है; यह एक व्यक्ति को ऊपर से नीचे तक हिला देता है। यह उसे निढाल कर देता है; वह जड़ों से उखड़ने लगता है। शोक वास्तव में जीवन को पूरी तरह से नष्ट कर देने वाली हानि है।”[1] आप शायद इस अनुभव को बहुत अच्छी तरह से जानते हैं। मुझे याद है जब यह पहली बार मेरे जीवन में आया था, उस समय मैं किशोर था और मेरी माँ का निधन हो गया था। कुछ भी पहले जैसा नहीं रहा था।

आपको विश्वासी के रूप में जीवन जीने के दौरान जल्दी ही यह पता चल जाएगा कि विश्वास हमारे जीवन में दुख और उसके भय को आने से रोकता नहीं है। पौलुस ने अपने मित्र इपफ्रुदीतुस के मृत्यु के निकट अनुभव के बारे में लिखा: “निश्चय ही वह बीमार तो हो गया था यहाँ तक कि मरने पर था, परन्तु परमेश्‍वर ने उस पर दया की, और केवल उस ही पर नहीं पर मुझ पर भी कि मुझे शोक पर शोक न हो” (फिलिप्पियों 2:27)। इपफ्रुदीतुस को खो देने के विचार ने पौलुस का दिल तोड़ दिया था। वह जानता था कि मृत्यु अन्त नहीं है, लेकिन वह यह भी जानता था कि हानि का अनुभव करने में या यहाँ तक कि उसके सम्भावित होने में वास्तविक शोक होता है।

शोक में से गुजरना कठिन होता है क्योंकि कुछ खो चुका होता है, और कुछ खुशियाँ अब कभी वापस नहीं आ सकतीं। लेकिन हम यह भी जानते हैं कि शोक एक वास्तविकता है जिस पर पवित्रशास्त्र स्पष्ट रूप से बोलता है—एक ऐसी वास्तविकता जो एक दिन एक बड़े आनन्द में बदल दी जाएगी। और हम भी जानते हैं कि शोक वह वास्तविकता है जिसके साथ हमारा उद्धारकर्ता व्यक्तिगत रूप से परिचित है। जब यीशु अपने मित्र लाजर की कब्र के पास खड़ा था, तो उसने—अर्थात त्रिएकता के दूसरे व्यक्ति ने—वहाँ इकट्ठा हुए लोगों के साथ शोक व्यक्त किया। हालाँकि वह लाजर को मरे हुओं में से जीवित करने वाला था, फिर भी उसने आँसू बहाए क्योंकि वह वास्तव में शोकित था। इस दृश्य में रहस्य यह है कि यीशु हमारी मानवता के साथ इस तरह से एक हो गया था कि उसने अपने प्रिय मित्र के खो जाने पर सच में आँसू बहाए।

हालाँकि बाइबल हमें मसीह की मृत्यु और कब्र पर विजय की वास्तविकता से परिचित कराती है, लेकिन यह हमें किसी तरह के चमकदार, हृदयहीन विजयवाद की ओर नहीं बुलाती। बल्कि, जैसा कि ऐलेक मोट्यर लिखते हैं, “आँसू विश्वासियों के लिए उपयुक्त हैं—वास्तव में उन्हें और अधिक बहाने चाहिएँ, क्योंकि मसीह हर भावना के प्रति, चाहे वह खुशी हो या शोक, उन लोगों से अधिक संवेदनशील होते हैं जिन्होंने परमेश्वर की कोमल और जीवनदायक कृपा को कभी महसूस नहीं किया।”[2]

यह तथ्य कि हमारे प्रियजन, जो मसीह में सो गए हैं, अब उसके साथ हैं, हानि और अकेलेपन के दुख को हल्का तो करता है, लेकिन इसे पूरी तरह से हटा नहीं सकता। हम उस दिन का इंतजार कर रहे हैं, जब ऐसा दुख पूरी तरह समाप्त हो जाएगा। जब तक वह दिन नहीं आता, तब तक हम यह जानकर सान्त्वना पा सकते हैं कि यीशु “दुखी पुरुष था, रोग से उसकी जान पहिचान थी” (यशायाह 53:3), क्योंकि हम उसे अपने आदर्श के रूप में देखते हैं, जब हम यह देखते हैं कि वह “पुनरुत्थान और जीवन” (यूहन्ना 11:25) है, और हम उसे अपनी अनन्तता के लिए देखते हैं। यह जानने से ही हमारे दिलों में दुख और आशा को साथ-साथ रहने की शक्ति मिलती है।

  यूहन्ना 14:1-7

◊ पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: यिर्मयाह 25–26; मत्ती 25:1-30


[1] जेय ई. ऐडम्स, शेफर्डिंग गॉड्स फ्लॉक: ए हैण्डबुक ऑन पास्टरल मिनिस्ट्री, काऊँसलिंग, ऐण्ड लीडरशिप (ज़ोनडेरवन, 1975), पृ. 136.

[2] जे. ऐलेक मोट्यर, द मैसेज ऑफ फिलिपियंस, द बाइबल स्पीक्स टुडे (आई.वी.पी. अकेडेमिक्स, 1984), पृ. 90.

13 जून : मेरे दिन तेरे हाथ में हैं

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13 जून : मेरे दिन तेरे हाथ में हैं
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“परन्तु हे यहोवा, मैं ने तो तुझी पर भरोसा रखा है, मैं ने कहा, ‘तू मेरा परमेश्‍वर है।’ मेरे दिन तेरे हाथ में हैं; तू मुझे मेरे शत्रुओं और मेरे सताने वालों के हाथ से छुड़ा। अपने दास पर अपने मुँह का प्रकाश चमका; अपनी करुणा से मेरा उद्धार कर।!” भजन 31:14-16

हममें से अधिकांश लोग भावनाओं और अनुभवों का मिश्रण होते हैं। अच्छे, बुरे और कष्टकारी अनुभव नियमित रूप से हम पर आते रहते हैं। मुख्य मुद्दा यह है कि हम इन भावनाओं और अनुभवों के साथ क्या करते हैं। एक विश्वासी के रूप में हमारा संसार को देखने का तरीका कैसा होता है? “मेरे दिन तेरे हाथ में हैं,” छः शब्दों का यह पुष्टिकरण मसीहियों को याद दिलाता है कि कठिनाइयों और आपदाओं के बावजूद, हम सर्वशक्तिमान परमेश्वर की देखभाल में हैं।

भजन 31 के प्रारम्भिक पदों में यह स्पष्ट होता है कि दाऊद पीड़ा में है। जैसे-जैसे हम पढ़ते हैं, हम पाते हैं कि वह कुछ पी पदों बाद वह आश्वासन की स्थिति में है, लेकिन फिर तुरन्त ही एक बार फिर से वह दुखी हो जाता है। मसीही विश्वास की यात्रा में पीड़ा और आनन्द का यह चक्र एक असामान्य अनुभव नहीं है। दरअसल, विश्वास के पथ पर निराशा और असुविधा का बार-बार आना एक आम बात है।

अपनी पुस्तक द हाईडिंग प्लेस में, कोरी टेन बूम अपनी पहली रेल यात्रा का इंतजार करने की एक कहानी बताती हैं। हालाँकि उनकी यात्रा कई सप्ताहों बाद थी, फिर भी वह बार-बार अपने पिता से पूछती रहती थी कि क्या उन्होंने टिकट खरीद लिया है। वह हर बार कहते थे कि उन्होंने टिकट खरीद लिया है। उन्हें समझ में आ गया कि उनकी समस्या अपने पिता पर विश्वास की कमी थी; उन्हें विश्वास नहीं था कि वह सब कुछ सम्भाल लेंगे। वह डरती थीं कि कहीं उनके पिता टिकट खो न दें और यात्रा के दिन उनके पास टिकट न हो। इस पाठ में उन्होंने सीखा कि परमेश्वर हमें यात्रा का टिकट यात्रा के दिन देता है, न कि उससे पहले।[1] और जाहिर है कि वह इसे हमसे कहीं अधिक सुरक्षित रखने में सक्षम है।

हमारे अपने दुखों, निराशाओं, प्रियजनों के खोने और व्यक्तिगत असफलताओं के सफर में हम यह सीख सकते हैं कि यह वास्तव में सच है। इसलिए हमें परमेश्वर पर विश्वास करना चाहिए। जिस दिन हम समय से अनन्तकाल तक की यात्रा करेंगे, यदि हम मसीह को जानते हैं, तो हम जानते हैं कि वह हमें टिकट अवश्य देगा। यदि वह दिन आज है, तो टिकट रास्ते में है। यदि नहीं, तो हम क्यों जागते रहें और अपनी भावनाओं को हमें नियन्त्रित करने दें और अपनी चिन्ताओं को अपने ऊपर हावी होने दें?

हम मनमानी, अवैयक्तिक शक्तियों की दया पर नहीं पल रहे हैं; हम अपने प्रेमी परमेश्वर के हाथों में सुरक्षित हैं। वह हमसे कहता है,हे सभी थके-माँदे और बोझ तले दबे हुए लोगो, मेरे पास आओ। अपनी सारी चिन्ताओं, डर, आतंक, मानसिक तनाव और दिल के दुखों के साथ मेरे पास आओ। मेरा जुआ अपने ऊपर ले लो। मेरे प्रेमी शासन के तहत जीवन बिताओ, क्योंकि मेरा जुआ हल्का है और मेरा बोझ सरल है, और तुम अपनी आत्माओं के लिए विश्राम पाओगे, हमेशा का विश्राम (मत्ती 11:28-30 देखें)।

यह आपकी सुरक्षा है। आपका समय—चाहे छोटा हो या बड़ा, चाहे धनी हो या गरीब, चाहे दुखी हो या सुखी—परमेश्वर के हाथ में हैं। वह आपको हर दिन अच्छे काम करने के लिए देगा, और फिर आपके अन्तिम दिन पर, वह आपको सुरक्षित रूप से उस स्थान पर ले आएगा जहाँ आपके दिन अनन्तकाल तक लम्बे, असाधारण रूप से समृद्ध और अनमोल रूप से खुशहाल होंगे।

  भजन 31

पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: यिर्मयाह 22–24; मत्ती 24:29-51 ◊


[1] द हाईडिंग प्लेस (1971), अध्या. 2.

12 जून : पिता की इच्छा

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12 जून : पिता की इच्छा
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“तब मैं ने कहा, देख, मैं आ गया हूँ, पवित्रशास्त्र में मेरे विषय में लिखा हुआ है, ताकि हे परमेश्‍वर, तेरी इच्छा पूरी करूँ’।” इब्रानियों 10:7

जब माता-पिता और दादा-दादी या नाना-नानी अपने परिवार के नए सदस्य को देख कर प्रसन्न होते हैं, तो वे अक्सर यह उम्मीदें और योजनाएँ साझा करते हैं कि यह छोटी लड़की बड़ी होकर क्या हासिल करेगी या यह छोटा लड़का बड़ा होकर क्या बनेगा। हालाँकि, यह बड़ा हैरानीजनक होगा यदि छोटे बच्चे अपने जीवन की योजनाओं और उद्देश्यों की घोषणा स्वयं करने लगें। फिर भी, यह वह एक और तरीका है जिसमें मसीह अद्वितीय है: उसने इस संसार में प्रवेश किया, तो कहा, “‘देख, मैं आ गया हूँ . . .  ताकि हे परमेश्‍वर, तेरी इच्छा पूरी करूँ’।”

जब यीशु बारह वर्ष का था, उसके माता-पिता ने उसे मन्दिर में धार्मिक नेताओं और शिक्षकों से बातचीत करते पाया। मरियम और यूसुफ उसे तीन दिन तक ढूँढते रहे, बिना यह सोचे कि वह उन्हें वहाँ मिलेगा, और वे उसे वहाँ देखकर हैरान हो गए; लेकिन यीशु ने उत्तर दिया, “क्या तुम नहीं जानते थे कि मुझे अपने पिता के भवन में होना अवश्य है?” (लूका 2:49)। उसने अपने आरम्भिक दिनों से अपने स्पष्ट उद्देश्य को समझ लिया था।

परमेश्वर की वह इच्छा क्या थी, जिसे मसीह पूरा करने के लिए संसार में आया था? बाइबल हमें बताती है कि जब परमेश्वर ने यीशु को भेजा, तो उसने अपने लोगों के लिए उसे भेज दिया जो सम्पूर्ण व्यवस्था-विधान की माँगों को पूर्ण समर्पण के साथ पूरा करेगा और फिर पाप की सजा सहकर मनुष्यों को उसकी गुलामी से मुक्त करेगा। उद्धारकर्ता के आने की योजना अनन्तकाल से बनाई गई थी और इसकी प्रतिज्ञा पूरे पुराने नियम में अर्थात “पवित्रशास्त्र” में की गई थी। यीशु—जिसने एक बालक के रूप में एक चरनी में जन्म लिया—हमारे उद्धार की पूर्ति है।

अपने जीवन के हर क्षण में, चाहे जब शैतान द्वारा उसकी परीक्षा हुई हो या गतसमनी के बगीचे में उसने दुख का सामना किया हो, यीशु अपने उद्देश्य को जानता था और याद रखता था। उसे पता था कि वह अपने पिता की इच्छा के अनुसार यहाँ आया था। हालाँकि उसने प्रार्थना की उसके दुख का प्याला टल जाए, लेकिन फिर भी उसने पिता के प्रति पूर्ण आज्ञाकारिता में समर्पण किया। जैसा कि किसी भी मनुष्य के साथ हो सकता था, उसे भी अपने पिता की इच्छा से दूर हटने के प्रलोभन का सामना हुआ, फिर भी उसने प्रार्थना की, “तौभी जैसा मैं चाहता हूँ वैसा नहीं, परन्तु जैसा तू चाहता है वैसा ही हो” (मत्ती 26:39-46)।

यीशु अपने आगमन के कारण के बारे में अस्पष्ट नहीं था—और क्योंकि उसने अपने पिता की इच्छा के अनुसार जीवन जिया, इसलिए हम उसके साथ अनन्तकाल तक रहेंगे और उसकी ओर से किए गए हर कार्य पर आनन्दित होते हुए।

न मेरे हाथों का श्रम

तेरे कानून की माँग पूरी कर सकता है;

यदि मैं अपना सारा बल लगा देता,

यदि मेरे आँसू हमेशा बहते रहते,

तौभी पाप के लिए प्रायश्चित नहीं हो पाता;

तू ही बचा सकता है, और केवल तू ही।[1]

आज, आप और मैं परमेश्वर की इच्छा पूरी करने के लिए जी सकते हैं, इस डर में रहते हुए नहीं कि यदि हम आज्ञा का पालन नहीं कर पाए तो हमें सजा मिलेगी, बल्कि इस विश्वास के साथ कि हम पहले ही मसीह में आशीर्वाद पा चुके हैं। क्योंकि उसने हमेशा आज्ञा का पालन किया, इसलिए हम ऐसा करने में हमारी असफलता के लिए माफ किए गए हैं और खुशी से अपने पिता की इच्छा का पालन करने के लिए मुक्त किए गए हैं—इसलिए नहीं कि हमें करना ही होगा, बल्कि इसलिए कि हम इसे करना चाहते हैं।

रोमियों 5:12-21

◊ पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: यिर्मयाह 20–21; मत्ती 24:1-28


[1] औगुस्तुस टोपलेडी, “रॉक ऑफ एजिस” (1776).