ArchivesTruth For Life

7 अक्तूबर : एक प्रतिष्ठित जीवन

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7 अक्तूबर : एक प्रतिष्ठित जीवन
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“जब यह देखा गया कि दानिय्येल में उत्तम आत्मा रहती है, तब उसको उन अध्यक्षों और अधिपतियों से अधिक प्रतिष्ठा मिली; वरन् राजा यह भी सोचता था कि उसको सारे राज्य के ऊपर ठहराए। तब अध्यक्ष और अधिपति राजकार्य के विषय में दानिय्येल के विरुद्ध दोष ढूँढ़ने लगे; परन्तु वह विश्वासयोग्य था, और उसके काम में कोई भूल या दोष न निकला, और वे ऐसा कोई अपराध या दोष न पा सके।” दानिय्येल 6:3-4

बन्दी बनाकर बेबीलोन ले जाए जाने के बाद दानिय्येल को उत्कृष्ट इस्राएली युवकों के एक विशेष समूह का हिस्सा बनाया गया, जिन्हें राजा नबूकदनेस्सर के दरबार में कार्यभार सौंपे गए थे। हालाँकि उसे निर्वासन में ले जाया गया था, उसका नाम बदल दिया गया था और वह अपने परिवार तथा परिचितों से दूर था, फिर भी दानिय्येल ने अपने दिल में यह ठान लिया था कि वह राजा के खाने और पीने से स्वयं को अपवित्र नहीं करेगा (दानिय्येल 1:12-16)। वह अपने समय की नैतिक गिरावट के बीच एक साहसी व्यक्ति के रूप में खड़ा हुआ और अपनी सत्यनिष्ठा पर अडिग रहा।

दानिय्येल ने जिस सरकार में काम किया, उसमें अपने जीवन की गुणवत्ता से उसने स्वयं को अलग किया। अब तक उसकी निष्ठा निर्विवाद प्रमाणित हुई थी। वह निरन्तरता वाला व्यक्ति था, जिसे उसने कई साम्राज्यों के दौरान प्रदर्शित किया। उसके पास कठिनाइयों का सामना करने और उन्हें पार करने की असाधारण क्षमता थी, और साथ ही परमेश्वर द्वारा दी गई बुद्धिमत्ता थी, जिसने उसे ऐसा परामर्श देने में सक्षम बनाया, जिसने मानव इतिहास की दिशा बदल डाली।

हालाँकि दानिय्येल जिन सरकारी पदों पर कार्यरत था, वे भ्रष्टाचार से प्रभावित हो सकते थे, तौभी उसने सभी प्रकार की बेईमानी को न कहकर खुद को अलग किया। वह न तो लापरवाह था और न ही अनैतिक, और न ही उसके सार्वजनिक कार्यों और निजी जीवन के बीच कोई अन्तर था। वह अपने साथियों की नजरों में निर्दोष था। यहाँ तक कि उसके विरोधी भी, जो उसकी विशिष्टता से जलते थे और उसे नापसन्द करते थे, उसके खिलाफ कोई आरोप नहीं लगा सके।

ईर्ष्या से भरे हुए, इन अधिकारियों ने अन्ततः दानिय्येल के खिलाफ साजिश रचने का निर्णय लिया। वे उसके परमेश्वर के प्रति उसकी अडिग प्रतिबद्धता को या इस तथ्य को पसन्द नहीं करते थे कि वह अधिकार वाले एक पर नियुक्त था। वे यह नहीं सहन कर सके कि वह अपने जीवन से परमेश्वर की शक्ति और पवित्रता के प्रति एक अडिग विश्वास को प्रदर्शित करता था। पवित्र जीवन अक्सर इस प्रकार के तिरस्कार को लाता है। दानिय्येल को इसलिए नहीं फँसाया गया था क्योंकि वह बुरा व्यक्ति था, बल्कि इसलिए क्योंकि वह सत्य के लिए खड़ा था। वह उन बातों से प्यार करता था जो परमेश्वर को प्रिय है, और उसे अपने जीवन में उतारता था।

क्या आपके जीवन में भी इसी तरह का विश्वास पाया जाता है? क्या आपके कर्म आपके परमेश्वर के बारे में सत्य को प्रकट करते हैं? क्या आप सत्यनिष्ठा के प्रति एक जुनून को पोषित करने के लिए तैयार हैं? क्या आप परमेश्वर के आदेशों का पालन करने के बारे में अधिक चिन्तित हैं, बजाय इसके कि लोग आपके बारे में क्या सोचते हैं? यीशु ने अपने अनुयायियों को चेतावनी दी थी कि वे उसके कारण निन्दित होंगे और उसके लिए पीड़ा सहेंगे (मत्ती 5:11), जब वे ऐसा जीवन जीएँगे, जो उनके पिता की महिमा और प्रशंसा करेगा (पद 14-16)। दानिय्येल के समान समर्पण के साथ जीवन जीएँ; इस बात में स्पष्ट रहें कि आप उन बातों से प्यार करें जो परमेश्वर को प्रिय हैं, और फिर उन्हें अपनी जीवन में उतारें।

1 पतरस 2:9-17

पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: यहेजकेल 42–44; यूहन्ना 19:1-22 ◊

6 अक्तूबर : पवित्रशास्त्र की सैद्धान्तिक शिक्षा

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6 अक्तूबर : पवित्रशास्त्र की सैद्धान्तिक शिक्षा
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“पवित्रशास्त्र . . . तुझे मसीह पर विश्‍वास करने से उद्धार प्राप्त करने के लिए बुद्धिमान बना सकता है। सम्पूर्ण पवित्रशास्त्र परमेश्‍वर की प्रेरणा से रचा गया है और उपदेश, और समझाने, और सुधारने, और धार्मिकता की शिक्षा के लिए लाभदायक है, ताकि परमेश्‍वर का जन सिद्ध बने, और हर एक भले काम के लिए तत्पर हो जाए।” 2 तीमुथियुस 3:15-17

पवित्रशास्त्र का अधिकार, पर्याप्तता, अचूकता और निष्कपटता परमेश्वर और उसकी कलीसिया के निरन्तर कार्य के लिए अत्यन्त महत्त्वपूर्ण सिद्धान्त हैं। जब तक हम सुसमाचार के दिव्य स्रोत के प्रति आश्वस्त नहीं होते, तब तक हम इसे खोए हुए और पीड़ित संसार तक नहीं ले जा सकते। जैसा कि जे. सी. राइल ने लिखा है, यदि मसीहियों के पास बाइबल एक “दिव्य पुस्तक के रूप में नहीं है, जिस पर वे अपनी सैद्धान्तिक शिक्षा और आचरण का आधार बना सकें, तो उनके पास न तो वर्तमान शान्ति या आशा के लिए कोई ठोस आधार होगा और न ही मानवजाति का ध्यान आकर्षित करने का कोई अधिकार होगा।”[1]

पौलुस ने इसी विषय पर तीमुथियुस को याद दिलाया कि “सम्पूर्ण पवित्रशास्त्र परमेश्वर की प्रेरणा से रचा गया है।” दूसरे शब्दों में, बाइबल कोई मानव निर्मित ग्रंथ नहीं है, जिसमें दिव्यता का समावेश किया गया हो; बल्कि यह एक दिव्य उपहार है जिसे परमेश्वर ने मनुष्यों के माध्यम से दिया है। इसकी प्रत्येक पुस्तक, अध्याय, वाक्य और शब्द मूल रूप से परमेश्वर की प्रेरणा से दिए गए हैं।

अन्य मसीही सैद्धान्तिक शिक्षाओं के समान पवित्रशास्त्र की सैद्धान्तिक शिक्षा को समझना भी एक चुनौती हो सकता है। लेकिन किसी बात को समझने में आने वाली कठिनाई उसकी सच्चाई को कम नहीं करती। इसके अलावा, जब पवित्रशास्त्र के सिद्धान्त की बात आती है, तो कई बातें ऐसी होती हैं जिन्हें हम वस्तुनिष्ठ रूप से देख सकते हैं। उदाहरण के लिए, यह स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है कि बाइबल पूर्ण रूप से एक संगठित और सामंजस्यपूर्ण रचना है। यह तीस से अधिक लेखकों द्वारा लगभग पन्द्रह सौ वर्षों की अवधि में लिखी गई थी, फिर भी वे सभी लेखक एक ही कहानी बताते हैं—इस संसार का वर्णन करना, इसके सृष्टिकर्ता के चरित्र को उजागर करना, मानव हृदय की समस्या को दर्शाना, और परमेश्वर के मेमने के बलिदान के माध्यम से उद्धार के अद्‌भुत मार्ग की ओर संकेत करना—और उत्पत्ति से लेकर प्रकाशितवाक्य तक एक ही कहानी को बताया गया है!

बाइबल समय, संस्कृति, लिंग और बुद्धिमत्ता की सीमाओं को पार कर जाती है। कुछ पुस्तकें किसी विशेष व्यक्ति, युग या स्थान के लिए उपयुक्त हो सकती हैं, लेकिन कोई अन्य पुस्तक ऐसी नहीं है, जो हर दिन और हर युग की चुनौतियों का सामना इतनी पूर्णता से कर सके और जीवन के मूलभूत प्रश्नों का उत्तर दे सके। परमेश्वर के वचन की गहराइयों को सबसे महान बुद्धिजीवी भी पूरी तरह से नहीं समझ सकते, और फिर भी छोटे बच्चे तक इसे पढ़कर इसके सत्य को जान सकते हैं और अपने जीवन को परिवर्तित कर सकते हैं।

पवित्रशास्त्र का अधिकार, पर्याप्तता, अचूकता और निष्कपटता ही वह आधार हैं, जिन पर हमें खड़े रहना है; और इस कार्य को करने के लिए हमारे पास दिव्य सहायता भी उपलब्ध है। जिस पवित्र आत्मा ने परमेश्वर के वचन को प्रेरित किया, वही पवित्र आत्मा उस वचन को प्रकाशित भी करता है और हमें यह विश्वास दिलाता है कि यह परमेश्वर का दिया हुआ वचन है, जिससे हम उसमें विश्वास करें जो देहधारी वचन है। जब आत्मा यह कार्य आपके भीतर करता है, तब आपका विश्वास केवल एक बौद्धिक स्वीकृति तक सीमित नहीं रहता, बल्कि यह आपको परमेश्वर के वचन को और अधिक जानने और समझने की भूख से भर देता है—उसके लिए जो न केवल इसका लेखक है बल्कि इसका केन्द्र भी है।

  भजन 12

◊ पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: यहेजकेल 40–41; यूहन्ना 18:19-40


[1] बाइबल इंस्पिरेशन: इट्स रियैलिटी एण्ड नेचर (विलियम हण्ट, 1877), पृ. 6.

5 अक्तूबर : आत्मा से भरी निडरता

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5 अक्तूबर : आत्मा से भरी निडरता
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परन्तु यदि तू चढ़ाई करते डरता हो, तो अपने सेवक फूरा को संग लेकर छावनी के पास जाकर सुन, कि वे क्या कह रहे हैं; उसके बाद तुझे उस छावनी पर चढ़ाई करने का साहस होगा।” न्यायियों 7:10-11

डर में पीछे हटना हमेशा आसान होता है, जबकि विश्वास में आगे बढ़ना कठिन। पीछे हटना आसान तो है, लेकिन कभी भी बेहतर नहीं है।

गिदोन डर के बारे में और उसकी वजह से होने वाली हिचकिचाहट के बारे में बहुत कुछ जानता था। जब परमेश्वर के दूत ने उसे इस्राएल का नेतृत्व करने के लिए बुलाया, तब उसने संकोच किया (न्यायियों 6:13, 15)। जब इस्राएल के शत्रु उससे युद्ध करने के लिए इकट्ठा हुए, तब भी उसने संकोच किया (पद 36-40)। और ऐसा प्रतीत होता है कि युद्ध से ठीक पहले, जिसमें परमेश्वर ने उसे विजय का आश्वासन दिया था, वह फिर से संकोच कर रहा था (7:9-10)। इसी डर और संकोच के बीच परमेश्वर ने उससे बात की। ध्यान दें कि गिदोन के डर को देखकर भी परमेश्वर अनुग्रह और धैर्य से उससे बात करता है, “परन्तु यदि तू चढ़ाई करते डरता हो . . .” और उसे अपने सेवक के साथ शत्रु शिविर में जाने के लिए प्रोत्साहित करता है। यह गिदोन के भय को ध्यानपूर्वक सम्बोधित करने का एक संवेदनशील तरीका है। परमेश्वर ने यह स्वीकार किया कि मानवीय दृष्टिकोण से गिदोन के पास डरने के ठोस कारण थे! वह एक ऐसे शत्रु के खिलाफ युद्ध में जा रहा था, जिसकी सेना उसके सैनिकों की तुलना में हजारों में अधिक थी। लेकिन परमेश्वर ने उसे उसके डर के लिए डाँटा नहीं, बल्कि उसे आत्मविश्वास से भरने का कारण दिया।

गिदोन की तरह हमें भी प्रभु के ऐसे ही दयालु शब्दों की जरूरत है। हम अक्सर यह भूल जाते हैं कि हम अपनी सारी चिन्ताएँ उस पर डाल सकते हैं (1 पतरस 5:7)। हम अपने सारे बोझ और भय उसके चरणों में रख सकते हैं। हमें यह अनुमति दी गई है कि हम उसके पास जाकर कहें कि हमें नहीं पता कि हमें क्या करना चाहिए। और उसका उत्तर हमेशा अनुग्रह और करुणा से भरा होता है।

जो बात इस कहानी को और भी सुन्दर बनाती है, वह है गिदोन की परमेश्वर की कोमल प्रेरणा के प्रति प्रतिक्रिया। जब वह अपने सेवक के साथ छिपकर शत्रु शिविर में जाता है, तो वह दो सैनिकों को एक स्वप्न के बारे में चर्चा करते हुए सुनता है, जिसमें एक सैनिक इसकी व्याख्या इस प्रकार करता है कि वे “गिदोन की तलवार” से हार जाएँगे क्योंकि “उसी के हाथ में परमेश्वर ने मिद्यान को सारी छावनी समेत कर दिया है” (न्यायियों 7:14)। जब गिदोन यह सुनता है और महसूस करता है कि परमेश्वर ने सचमुच उसके लिए पहले से ही वह कार्य कर दिया है जो वह स्वयं कभी नहीं कर सकता था, तो वह क्या करता है? “उसने आराधना की” (पद 15)। इस प्रतिक्रिया में बहुत गहराई है। असम्भव परिस्थितियों का सामना करते हुए, लेकिन परमेश्वर की प्रतिज्ञा में आश्वस्त होकर, यह भयभीत, कमजोर और अप्रत्याशित अगुवा परमेश्वर की स्तुति में अपना हृदय उण्डेल देता है और फिर परमेश्वर से मिले साहस से अपनी सेना को एकत्र करता है। उसकी निडरता एक गुप्त, निजी क्षण से आई थी, जो उसने परमेश्वर के साथ बिताया था।

यह महत्त्वपूर्ण है कि हम उस अन्तर को समझें जो मनुष्यों द्वारा संचालित योजनाओं और आत्मा से भरी वास्तविक निडरता के बीच है। मानवीय योजनाएँ केवल एक मानवीय प्रयास होती हैं और जल्दी ही बिखर सकती हैं; लेकिन आत्मा से मिलने वाली निडरता केवल तब पाई जाती है, जब हम परमेश्वर के सामने दीन होते हैं, अपनी अपर्याप्तता को स्वीकार करते हैं, और उसके सामर्थ्य को याद रखते हैं। यही वह ठोस स्थान है जिस पर हम खड़े हो सकते हैं। डर का समाधान स्वयं को महान मान लेना नहीं है, जैसा कि बहुत से लोग दावा करते हैं। इसका समाधान यह है कि हम परमेश्वर को महान मानें और उसकी शक्ति पर विश्वास करें, जो हमें एक पवित्र और विनम्र निडरता प्रदान कर सकता है।

आप इस समय किससे डर रहे हैं? किस बात को लेकर आप संकोच कर रहे हैं, जबकि परमेश्वर आपको आज्ञाकारिता में आगे बढ़ने के लिए बुला रहा है? अपने भय को परमेश्वर के पास लाएँ। उससे प्रार्थना करें कि वह आपको वह सामर्थ्य दिखाए जो आप में नहीं है। फिर उस पर भरोसा करें, उसकी आराधना करें, और उसकी आज्ञा का पालन करें।

यहोशू 1:1-11

पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: यहेजकेल 37–39; यूहन्ना 18:1-18 ◊

4 अक्तूबर : अस्थिर चट्टान

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4 अक्तूबर : अस्थिर चट्टान
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“भोजन करने के बाद यीशु ने शमौन पतरस से कहा, ‘हे शमौन, यूहन्ना के पुत्र, क्या तू इन से बढ़कर मुझ से प्रेम रखता है?’ उसने उससे कहा, ‘हाँ, प्रभु; तू तो जानता है कि मैं तुझ से प्रीति रखता हूँ।’ उसने उससे कहा, ‘मेरे मेमनों को चरा।’” यूहन्ना 21:15

यूहन्ना 21 में यीशु का झील के तट पर प्रकट होना उसके पुनरुत्थान के बाद का घटनाक्रम था, और इस प्रकार यह क्रूस पर उसकी मृत्यु और उससे जुड़े सभी घटनाक्रमों के बाद हुआ था—जिसमें पतरस का कायरता से मसीह को पहचानने से इनकार करना भी शामिल था। हम निश्चित रूप से मान सकते हैं कि पतरस ने अपनी इस विश्वासघाती असफलता के लिए गहरा पश्चाताप और शर्मिन्दगी महसूस की होगी। हम कल्पना कर सकते हैं कि वह अन्य चेलों से कह रहा होगा, मुझे एक मौका मिला था, और मैंने उसे गँवा दिया। मैंने उससे विश्वासघात किया। मैं, जिसने खुद को एक नायक समझा था, अब यहाँ एक सबसे बड़े कायर के रूप में खड़ा हूँ। इसलिए जब यीशु ने पतरस से बात की, तो निश्चय ही पतरस सोच रहा होगा, अब वह मुझसे क्या कहेगा? क्या अब भी मेरा उसके लोगों में कोई स्थान है?

यीशु ने पतरस की असफलता को नजरअंदाज नहीं किया; उसने उसे स्वीकार किया। भोजन के बाद यीशु ने पतरस को उसके पुराने नाम “शमौन” से सम्बोधित किया, जिसका अर्थ है “सुनना।” अपने सेवाकार्य की आरम्भ में यीशु ने उसका नाम बदलकर “पतरस” रखा था, जिसका अर्थ है “पत्थर” (यूहन्ना 1:42)। यह नाम परिवर्तन उस बदलाव को दर्शाता था, जो पतरस के स्वभाव और बुलाहट में आने वाला था: वह डगमगाने वाला व्यक्ति था, लेकिन भविष्य में वह एक दृढ़ चट्टान की तरह स्थिर होने वाला था। झील के तट पर यीशु ने पतरस को उसकी अस्थिरता की याद दिलाई। पतरस के स्थिर बनने से पहले उसे यह समझना जरूरी था कि उसके आचरण ने न तो एक मजबूत विश्वास को दर्शाया था और न ही मसीह के प्रेम में दृढ़ निडरता दर्शाई थी।

हम भी पतरस की तरह कभी-कभी अपनी असफलताओं, पतन, और अविश्वास के कारण हतोत्साहित महसूस कर सकते हैं। हमें अपने “असन्तुलित विश्वास” की पीड़ा महसूस होगी; और हमें उस महान चिकित्सक की जरूरत होगी जो हमारे प्रेम को फिर से सही स्थान पर रखे—कभी-कभी पीड़ादायक तरीके से, लेकिन हमेशा पुनर्स्थापना के लिए। ध्यान दें कि यीशु यहाँ पतरस के दिल, उसके प्रेम और उसकी भक्ति की ही चिन्ता कर रहा था। हाँ, यह सच है कि अन्य गुण आवश्यक और उपयोगी हैं, लेकिन मसीह के प्रति हमारा प्रेम अनिवार्य है। हमारा प्रेम कहाँ टिका है? क्या वह अस्थिर रेत पर आधारित है या एक दृढ़ चट्टान पर?

फिर भी, जब मसीह हमारे प्रेम को पुनर्स्थापित करता है, तब भी वह हमें अपने राज्य का सेवाकार्य सौंपता है। यीशु ने अभी भी पतरस को अपनी कलीसिया के निर्माण के लिए चुना। यह कितना आश्चर्यजनक है कि यीशु ने अपने “मेमनों” की देखभाल उस चेले को सौंपी, जिसने (यहूदा को छोड़कर) उसे सबसे अधिक चोट पहुँचाई थी और जिसके शब्दों और कार्यों में सबसे अधिक अन्तर था। लेकिन यह हमारे लिए भी कितना उत्साहजनक है कि यीशु ने ऐसा किया! क्योंकि यदि वह पतरस जैसे व्यक्ति को उपयोग करने के लिए तैयार था, तो वह मुझ जैसे और आपके जैसे व्यक्ति को भी उपयोग कर सकता है।

यीशु ने पतरस को बहुत बड़ी ज़िम्मेदारी दी, लेकिन यह ज़िम्मेदारी पतरस के लिए एक परीक्षा भी थी। मसीह के प्रति प्रेम की परीक्षा यह है कि हमारा जीवन आज्ञाकारिता और कर्म को कैसे प्रदर्शित करता है। प्रेरितों की पुस्तक हमें दिखाती है कि कैसे पतरस ने परमेश्वर के आत्मा के सामर्थ्य से इस परीक्षा का उत्तर दिया।

डगमगाती चट्टान, अर्थात पतरस की कहानी हमें यह याद दिलाती है कि हमारा परमेश्वर अनुग्रह देने वाला और दूसरा अवसर देने वाला परमेश्वर है। हमारी कमजोरियाँ हमें यह दिखाती हैं कि हमें एक ऐसी शक्ति की आवश्यकता है जो हमारी अपनी नहीं है, बल्कि उस महान शाश्वत चट्टान, अर्थात मसीह में पाई जाती है। इसलिए यह जानते हुए कि वही सामर्थ्य हमारे लिए हमारे उद्धारकर्ता की ओर से उपलब्ध है—जो हमारे लिए मरा, और जिसने हमें अपनी सेवा के लिए बुलाया है—आप निश्चिन्त होकर अपने दिन में आगे बढ़ सकते हैं और प्रेमपूर्वक उसकी आज्ञा का पालन कर सकते हैं।

प्रेरितों 5:17-42

◊ पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: यहेजकेल 35–36; यूहन्ना 17

3 अक्तूबर : परमेश्वर के वचन के प्रति समर्पित

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3 अक्तूबर : परमेश्वर के वचन के प्रति समर्पित
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“‘हम तो प्रार्थना में और वचन की सेवा में लगे रहेंगे।’ यह बात सारी मण्डली को अच्छी लगी।” प्रेरितों 6:4-5

यद्यपि पिन्तेकुस्त के दिन पवित्र आत्मा से परिपूर्ण घटनाएँ और उसके परिणामस्वरूप हुआ सेवाकार्य असाधारण थे, तौभी प्रेरितों और उनके अनुयायियों ने यह कहना आरम्भ नहीं कर दिया कि अब परमेश्वर का आत्मा मुझे सिखाता है; इसलिए मुझे किसी और की सुनने की आवश्यकता नहीं है। इसके विपरीत, जब वे पवित्र आत्मा से भर गए, तो वे परमेश्वर के वचन के अधिकारपूर्ण प्रचार और शिक्षा को पूरी तत्परता से सुनने लगे। यह हमें एक महत्त्वपूर्ण शिक्षा देता है: परमेश्वर का आत्मा सदैव परमेश्वर के लोगों को उसके वचन के प्रति समर्पित होने के लिए प्रेरित करता है।

इसी कारण प्रेरितों की पुस्तक प्रचार की केन्द्रीयता से भरी हुई है। प्रेरितों ने पहचाना कि परमेश्वर द्वारा अपने लोगों को अपने पुत्र की छवि में नया बनाने का सर्वोच्च साधन उसका वचन है, और उसका आत्मा उसके वचन के माध्यम से कार्य करता है। प्रेरितों 6 में हम यह देखते हैं कि प्रेरितों ने उन लोगों को किस प्रकार प्राथमिकता और संरक्षण दिया, जिन्हें शिक्षा देने के लिए बुलाया और तैयार किया गया था। प्रेरितों ने यह गम्भीर जिम्मेदारी समझी कि उन्हें परमेश्वर के वचन को लोगों के सामने प्रस्तुत करने के लिए सेवक बनाए जाने का सौभाग्य मिला है।

पुराने नियम की पुस्तकें भविष्यवक्ताओं के “वचनों” का उल्लेख करती हैं; इस शब्द का अनुवाद “भारी भविष्यवाणी” भी किया जा सकता है (उदाहरण के लिए, यशायाह 13:1 देखें)। यह हृदय और मन पर पड़े उस भार को दर्शाता है, जो परमेश्वर के सत्य को लोगों तक पहुँचाने की महान जिम्मेदारी के कारण उत्पन्न होता है। उन्नीसवीं शताब्दी में सी. एच. स्पर्जन ने इस भार को स्वीकार करते हुए यह घोषणा की थी कि उनका पुलपिट इंग्लैंड के राजा के सिंहासन से अधिक प्रभावशाली है, क्योंकि वह वहाँ परमेश्वर के सिंहासन से मिले सन्देश को लेकर खड़े होते थे और मसीही सैद्धान्तिक शिक्षा के सत्य का प्रचार करते थे।

हमें उन लोगों के लिए प्रार्थना करनी चाहिए और उनकी रक्षा करनी चाहिए, जिन्हें पवित्रशास्त्र की सच्चाइयों को सिखाने के लिए बुलाया गया है—चाहे वे किसी मण्डली को सिखाते हों, छोटे बच्चों को सिखाते हों, या किसी अन्य सन्दर्भ में सिखाते हों। यह कोई छोटी बात नहीं है कि कोई व्यक्ति नियमित रूप से एक पवित्र परमेश्वर और उसके लोगों के बीच खड़ा होकर उसके वचन की घोषणा करे। यह एक भारी उत्तरदायित्व होने के साथ-साथ एक अद्‌भुत विशेषाधिकार भी है।

जैसे हमें अपने शिक्षकों और प्रचारकों के लिए प्रार्थना करनी चाहिए, वैसे ही हमें स्वयं भी विनम्र और उत्सुक होकर परमेश्वर के वचन की अधिकारपूर्ण शिक्षा को सुनने और सीखने के लिए तत्पर रहना चाहिए। प्रारम्भिक कलीसिया ने इस समर्पण का उदाहरण स्थापित किया, जब उन्होंने प्रेरितों की शिक्षा के प्रति स्वयं को समर्पित किया (प्रेरितों 2:42)। आज भी हमें उसी प्रकार समर्पित रहना चाहिए; हमें उस शिक्षा के प्रति प्रतिबद्ध होना चाहिए, जो प्रेरितों को प्रकट किए गए नए नियम के सत्यों पर आधारित है और जो पुराने नियम की सैद्धान्तिक शिक्षा की नींव पर निर्मित है।

हमें अपना समय व्यर्थ की चीज़ों में नहीं लगाना चाहिए—जैसे ऐसे टीवी कार्यक्रम देखने में जो केवल हमारे विचारों की पुष्टि करें, ऐसी पुस्तकें या वीडियो गेम में जो हमें वास्तविकता से दूर ले जाएँ। इसके बजाय, हमें परमेश्वर के वचन पर ध्यान केन्द्रित करना चाहिए। उसे ही अपना आत्मिक भोजन बनाएँ और आप पाएँगे कि प्रतिदिन परमेश्वर का आत्मा आपको उसकी सच्चाइयों और आनन्द में और भी गहराई तक ले जाता है।

भजन 119:81-96

पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: यहेजकेल 33–34; यूहन्ना 16 ◊

2 अक्तूबर : पुनर्स्थापना की प्रतिज्ञा

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2 अक्तूबर : पुनर्स्थापना की प्रतिज्ञा
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“उसने अपनी इच्छा का भेद उस भले अभिप्राय के अनुसार हमें बताया, जिसे उसने अपने आप में ठान लिया था कि समयों के पूरे होने का ऐसा प्रबन्ध हो कि जो कुछ स्वर्ग में है और जो कुछ पृथ्वी पर है, सब कुछ वह मसीह में एकत्र करे।” इफिसियों 1:9-10

अपने निबन्ध “ऑन फेयरी स्टोरीज़” में जे. आर. आर. टोल्किन उन कारणों के बारे में लिखते हैं, जिनकी वजह से लोग परीकथाओं की ओर आकर्षित होते हैं। ऐसी कहानियाँ अक्सर हमारे दैनिक समाचारों के विपरीत होती हैं: जहाँ वास्तविक जीवन में युद्ध, आर्थिक अस्थिरता, महामारी और दिल टूटने की घटनाएँ होती हैं, वहीं परीकथाएँ सुखद अन्त प्रस्तुत करती हैं, जो मानव हृदय की गहरी इच्छाओं को प्रतिबिम्बित करता है। टोल्किन सुझाव देते हैं कि इन इच्छाओं की जड़ में यह तड़प है कि मसीह इस संसार को सही करे—सभी चीज़ों को एक साथ लाए, सब कुछ पुनर्स्थापित करे, और संसार को उतना ही सुन्दर बनाए, जितना यह आदम के विद्रोह से पहले था। क्या आप भी नहीं चाहते कि परमेश्वर सब कुछ ठीक कर दे? क्या आप भी उस सुखद अन्त की लालसा नहीं रखते?

पवित्रशास्त्र में, और हमारे जीवन में भी, हमें बार-बार याद दिलाया जाता है कि हम अभी वहाँ तक नहीं पहुँचे हैं। हम एक पतित संसार में रहते हैं, जहाँ अलगाव, निराशा और विघटन व्याप्त है। पहले आदम ने पाप किया, और मृत्यु और अराजकता उसका परिणाम बनी। लेकिन फिर दूसरा आदम आया ताकि वह पहले आदम द्वारा किए गए काम को सुधार कर सब कुछ पुनर्स्थापित कर सके और वह पूरा कर सके जो कोई और नहीं कर सकता था। परमेश्वर सब कुछ ठीक करेगा। वास्तव में, उसने इसका आरम्भ कर भी दिया है।

पहली शताब्दी की कलीसियाओं को लिखे अपने पत्रों में पौलुस ने उनकी कठिनाइयों को पहचाना और उन्हें कम करके नहीं आँका; लेकिन उसने हमेशा अपने पाठकों को यह याद दिलाया कि एक दिन ऐसा आएगा “जब दुख समाप्त होंगे और पीड़ाएँ मिट जाएँगी,” और हमारी सभी इच्छाएँ पूरी हो जाएँगी।[1] उसने उन्हें प्रोत्साहित किया कि वे अपनी आँखें परम लक्ष्य पर टिकाए रखें, ताकि वे अपने तत्कालीन संघर्षों का सामना कर सकें।

जो उन्हें तब चाहिए था, वही हमें अब चाहिए। यदि आप केवल उन परिस्थितियों पर ध्यान केन्द्रित करेंगे, जो आपके सामने हैं और परमेश्वर के पुनर्स्थापना की प्रतिज्ञा को अपनी दृष्टि में नहीं लाएँगे, तो आप वास्तव में अपने सामने आने वाली समस्याओं से नहीं निपट पाएँगे। वे आपके नियन्त्रण से बाहर लगने लगेंगी। वे आपको निराश कर देंगी। वे आपकी आशा और आनन्द को छीन लेंगी। चाहे समस्याएँ वैश्विक हों, राष्ट्रीय हों, या व्यक्तिगत, सबसे अच्छा तरीका यही है कि आप परमेश्वर के वचन पर ध्यान केन्द्रित करें और याद रखें कि परमेश्वर का वचन परमेश्वर की योजना के बारे में क्या कहता है। एक सुखद अन्त होगा। एक समय आएगा जब सब कुछ एक सिद्ध राजा के अधीन एकजुट होगा।

वह क्या है जो आज आपको परेशान कर रहा है? समय के मामलों को पवित्र आत्मा की सहायता के द्वारा एक शाश्वत दृष्टिकोण से देखें और आप उसकी सिद्ध योजना में सुरक्षा प्राप्त करेंगे। आप इस संसार की पूरी कहानी के सभी विवरण अभी नहीं जान सकते, लेकिन आप यह ज़रूर जान सकते हैं कि जो लोग मसीह पर विश्वास रखते हैं, उनके लिए अन्तिम दृश्य एक ऐसा सुखद अन्त लाएगा जिससे अनन्तता का आरम्भ होगा—और यह कोई परीकथा नहीं है।

  यशायाह 65:17-25

◊ पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: यहेजकेल 30–32; यूहन्ना 15


[1] स्टूअर्ट टाऊण्ट, “देयर इज़ ए होप” (2007).

1 अक्तूबर : शरीर और आत्मा

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1 अक्तूबर : शरीर और आत्मा
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“जब मैं चुप रहा तब दिन भर कराहते-कराहते मेरी हड्डियाँ पिघल गईं। क्योंकि रात दिन मैं तेरे हाथ के नीचे दबा रहा; और मेरी तरावट धूप काल की सी झुर्राहट बनती गई।” भजन 32:3-4

जो लोग मनोविज्ञान, मनोरोग और सामाजिक सेवाओं के क्षेत्रों में काम करते हैं, वे अक्सर इस तथ्य का सामना करते हैं कि किसी व्यक्ति के हृदय और मन में जो कुछ हो रहा है, उसका गहरा प्रभाव उसके शरीर में भी दिखाई देता है। परमेश्वर का वचन इस सम्बन्ध पर प्रकाश डालता है और फिर और भी गहराई तक जाता है, क्योंकि यह हमें बताता है कि हमारे शरीर की स्थिति और हमारी आत्मा की स्थिति के बीच एक सम्बन्ध है।

भजन 32 में, दाऊद परमेश्वर से बहुत व्यक्तिगत रूप से बात करता है और उस बोझ को स्वीकार करता है, जिसे उसने तब अनुभव किया जब वह अन्धकार में छिपा रहा और बतशेबा के साथ किए गए अपने पाप और उसके पति ऊरिय्याह की हत्या को स्वीकार करने से इनकार करता रहा (2 शमूएल 11 देखें)। दाऊद के माध्यम से पवित्र आत्मा हमें सिखाता है कि एक व्याकुल विवेक, पश्चाताप की कमी और हमारे शारीरिक स्वास्थ्य के बीच एक सम्बन्ध है। जो लोग दाऊद के निकट थे, शायद वे यह नहीं जान सके थे कि उसकी आत्मा के भीतर क्या चल रहा था, लेकिन वे उसके शरीर में हो रहे परिवर्तनों को नज़रअंदाज़ नहीं कर सकते थे।

जो विवरण वह देता है, वह अन्य स्थानों पर दिए गए उसके विवरण को और अधिक स्पष्ट करता है: “मेरा हृदय धड़कता है, मेरा बल घटता जाता है; और मेरी आँखों की ज्योति भी मुझ से जाती रही। मेरे मित्र और मेरे संगी मेरी विपत्ति में अलग हो गए, और मेरे कुटुम्बी भी दूर जा खड़े हुए” (भजन 38:10-11)। यह बहुत ही विनाशकारी चित्र प्रस्तुत करता है।

दाऊद ने अपनी स्थिति को पहचाना कि यह एक दण्ड था। बाइबल स्पष्ट रूप से बताती है कि वासना, अतिरेक और परमेश्वर की आज्ञाओं की अवहेलना के स्वाभाविक परिणाम निकलते हैं (रोमियों 1:24-25 देखें)—और इन सभी में दाऊद दोषी था। दुर्बलता, वज़न घटना, अनिद्रा, अस्वीकृति की भावना, उदासी, चिन्ता और निराशा अक्सर उन लोगों को सताती है, जो अपने पाप को परमेश्वर से छिपाने और स्वयं इन्हें स्वीकार न करने का प्रयास करते हैं।

जिस बात ने दाऊद को पुनः स्थापित किया, वह कोई स्वास्थ्य सुधार योजना या जल्दी सोने जाना नहीं था, बल्कि उसके पाप की जड़ से निपटना था: “जब मैंने अपना पाप तुझ पर प्रगट किया . . . तब तूने मेरे अधर्म और पाप को क्षमा कर दिया” (भजन 32:5)। परमेश्वर ने अपनी शक्ति से दाऊद को तब तक दबाए रखा, जब तक कि उसने अपने पाप को परमेश्वर के हाथों में सौंपकर उससे समाधान नहीं माँगा। यह हमारे लिए आशीष है कि परमेश्वर हमें हमारे पाप को भूलने नहीं देता—जब हमें अपनी आत्मिक बीमारी के कारण शारीरिक भारीपन का अनुभव होता है। यह हमें वह करने के लिए प्रेरित करने का उसका तरीका है, जिसकी हमें सबसे अधिक आवश्यकता है, अर्थात अपने पाप को स्वीकार करना और उसकी क्षमा माँगना।

क्या आप कोई पाप छिपा रहे हैं? उसे छिपाएँ नहीं; उसे स्वीकार करें। जब दाऊद ने परमेश्वर की क्षमा माँगी, तो उसे अपने कष्टों से मुक्तिदायक राहत मिली। आप भी उसी आनन्द का अनुभव कर सकते हैं, क्योंकि परमेश्वर के वचन की प्रतिज्ञा है कि “यदि हम अपने पापों को मान लें, तो वह हमारे पापों को क्षमा करने और हमें सब अधर्म से शुद्ध करने में विश्वासयोग्य और धर्मी है” (1 यूहन्ना 1:9)।

भजन 51

पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: यहेजकेल 27–29; यूहन्ना 14 ◊

30 सितम्बर : एक मन, एक उद्देश्य, एक आत्मा

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30 सितम्बर : एक मन, एक उद्देश्य, एक आत्मा
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“मेरा यह आनन्द पूरा करो कि एक मन रहो, और एक ही प्रेम, एक ही चित्त, और एक ही मनसा रखो। विरोध या झूठी बड़ाई के लिए कुछ न करो, पर दीनता से एक दूसरे को अपने से अच्छा समझो।” फिलिप्पियों 2:2-3

हालाँकि यह निश्चित रूप से लाभदायक है कि कलीसिया के सदस्य सेवाकार्यों में पहल करें, फिर भी विश्वासियों की एक स्वस्थ मण्डली व्यक्तिगत विचारों और योजनाओं द्वारा नहीं चलती। यदि कलीसिया को वास्तव में मसीह की अधीनता में रहना है, तो पहले हमारे मन सुसमाचार में एकजुट होने चाहिएँ। यदि यह एकता नहीं है, तो हम अपने स्वार्थी और प्रतिस्पर्धात्मक इच्छाओं और योजनाओं द्वारा ही संचालित होंगे।

बाइबल हमारे मन के विषय में बहुत कुछ कहती है, क्योंकि जैसा हम सोचते हैं, वैसे ही हम बनते हैं। जब हम अपने मन को सही सोच के लिए प्रशिक्षित करते हैं, तब हम ठीक से प्रेम करना और एक आत्मा तथा एक उद्देश्य में साथ मिलकर सेवा करना सीखते हैं। हमारे मानसिक संघर्ष का एक भाग हमारी पुरानी, स्वार्थी, मानवीय प्रकृति में फँसा हुआ होता है। हमारी सबसे बड़ी ठोकरों में से एक घृणा नहीं बल्कि आत्म-प्रेम होता है: हम घमण्ड की प्रवृत्ति रखते हैं, जो हमारे प्रभु के स्वभाव के पूर्णतः विपरीत है, और हमारी नम्रता की कमी हमारे आस-पास के लोगों के साथ सामंजस्य के अनुभव में बाधा बनती है। यहाँ तक कि हमारे अच्छे कार्य भी अक्सर दूषित उद्देश्यों से भरे होते हैं।

यदि हमें मसीह में एक होना है, तो हम अपने ही तरीके पर अड़े नहीं रह सकते। इसके विपरीत, हमें “एक दूसरे को अपने से अच्छा समझना” सीखना होगा। इसका अर्थ है कि हम अपने से पहले दूसरों की अच्छाइयों को याद करें, कि हम पहले यह सोचें कि दूसरों के लिए क्या अच्छा होगा बजाय इसके कि हमारे लिए क्या सुविधाजनक होगा, और यह कि हम दूसरों के जीवन और संघर्षों में भाग लेने को तैयार हों बजाय इसके कि उनसे दूर खड़े रहें। सच्ची नम्रता कभी सबसे आगे वाली सीट नहीं लेती या हर बात का आरम्भ “मैं” से नहीं करती। वास्तव में यह “वह शून्यता है जो परमेश्वर को उसका सामर्थ्य दिखाने के लिए स्थान देती है।”[1] पौलुस हमें बताता है कि यह वह गुण है, जो स्वयं यीशु मसीह में था: “हम में से हर एक अपने पड़ोसी को उसकी भलाई के लिए प्रसन्न करे कि उसकी उन्नति हो। क्योंकि मसीह ने अपने आप को प्रसन्न नहीं किया” (रोमियों 15:2-3)।

जब हम पहले अपने बारे में सोचते हैं, तब परमेश्वर के वचन को लागू करना कठिन हो जाता है—बल्कि असम्भव हो जाता है। लेकिन जब हम दूसरों को पहले रखना सीखते हैं, तब हम उनके हितों की चिन्ता करने के लिए अधिक तत्पर हो जाते हैं। और ऐसा करके हम मसीह की देह में वास्तव में एक हो सकते हैं। आप निश्चित ही कुछ ऐसे लोगों को जानते होंगे जिनके जीवन में यह आत्मिक नम्रता दिखाई देती है। उनके लिए अभी परमेश्वर का धन्यवाद करें और यह प्रार्थना करें कि आप देख सकें कि कैसे आप उनके उदाहरण का और सबसे बढ़कर, स्वयं मसीह के उदाहरण का अनुसरण कर सकते हैं। उसने आपकी ज़रूरतों को अपनी सुविधा से भी अधिक—यहाँ तक कि अपने जीवन से भी अधिक महत्त्वपूर्ण समझा। पौलुस की हम सबके लिए यह चुनौती है: “जैसा मसीह यीशु का स्वभाव था वैसा ही तुम्हारा भी स्वभाव हो” (फिलिप्पियों 2:5)।

  यूहन्ना 3:22-36

◊ पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: यहेजकेल 24–26; यूहन्ना 13:21-38


[1] एण्ड्रू मुरे, ह्युमिलिटी: दि ब्यूटी ऑफ होलीनेस, द्वितीय संस्करण (1896), पृ. 50.

29 सितम्बर : हमारा सहानुभूतिपूर्ण चरवाहा

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29 सितम्बर : हमारा सहानुभूतिपूर्ण चरवाहा
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उसे देख कर प्रभु को तरस आया, और उससे कहा, ‘मत रो।’ तब उसने पास आकर अर्थी को छूआ, और उठाने वाले ठहर गए। तब उसने कहा, ‘हे जवान, मैं तुझ से कहता हूँ, उठ!’” लूका 7:13-14

परमेश्वर के राज्य का आगमन संसार की शक्तियों और अधिकारियों पर किसी शानदार या नाटकीय विजय से नहीं हुआ, बल्कि उससे कहीं अधिक रूपान्तरणकारी कारक अर्थात इसके राजा की महान करुणा के द्वारा हुआ।

यीशु के जीवन-वृतान्तों में सुसमाचार लेखक हमें बार-बार ऐसे प्रसंगों से परिचित कराते हैं, जो मसीह की अनुपम करुणा को दर्शाते हैं। इन घटनाओं में मसीह का सामर्थ्य उस समय प्रकट होता है, जब वह अपनी करुणा प्रदर्शित करता है। उदाहरण के लिए, अपने सुसमाचार के सातवें अध्याय में लूका एक शोकाकुल विधवा के प्रति यीशु की सहानुभूति को दर्शाता है—एक ऐसी प्रतिक्रिया जो उसकी महानता के बारे में किसी भी सन्देह को दूर कर देती है।

लूका के वृतान्त के इस भाग में वर्णित स्त्री सचमुच संकट में थी। उसका पति पहले ही मर चुका था, और अब उसका पुत्र भी चल बसा था। प्राचीन मध्य-पूर्वी समाज में इसका अर्थ था कि वह किसी भी प्रकार की सुरक्षा या आजीविका के सहारे से वंचित हो गई थी। अब वह दुख, अकेलेपन, और अस्थिरता से भरे जीवन का और साथ ही अपने वंश के अन्त का भी सामना कर रही थी।

लेकिन फिर यीशु इस स्त्री के जीवन की चरम परिस्थिति में आया और “उसे देख कर प्रभु को तरस आया, और उससे कहा, ‘मत रो।’”

इस कोमल चरवाहे के हृदय में करुणा जगाने के लिए केवल इतना ही काफ़ी था कि उसने इस शोक-सन्तप्त स्त्री को देखा। यहाँ पर प्रयुक्त शब्द “तरस” शाब्दिक रूप से दर्शाता है कि “उसकी अन्तड़ियाँ हिल उठीं”—हमारे शब्दों में कहें तो “उसका पेट मरोड़ खा उठा।” जब यीशु—जिसके द्वारा और जिसके लिए सब कुछ रचा गया—इस टूटे हुए संसार में दुख और शोक को देखता है, तो वह इसे गहराई से अनुभव करता है। वह एक ऐसा राजा है, जो अपनी प्रजा की दिल से चिन्ता करता है।

और भी अधिक सुन्दर बात यह है कि यीशु के पास इस विधवा की आवश्यकता को पूरा करने का सामर्थ्य था और उसने वह किया जो केवल वही कर सकता था: मरे हुए को जीवन देना। उसने केवल एक मरे हुए पुत्र को उसकी शोकग्रस्त माँ को लौटा कर उसका दुख ही दूर नहीं किया, बल्कि उससे कहीं अधिक महत्त्वपूर्ण यह था कि यीशु ने भीड़ (और हम सब) के सामने स्वयं को अपनी सम्पूर्ण शक्ति, दयालुता, और अधिकार के साथ—यहाँ तक कि मृत्यु पर भी अधिकार के साथ प्रकट किया।

ऐसे दृश्य हमें दिखाते हैं कि यीशु केवल बीमारी और मृत्यु—जो मानवजाति के सबसे बड़े शत्रु हैं—के बारे में केवल टिप्पणी ही नहीं करता, या केवल उनके लिए रोता ही नहीं है, बल्कि वह उन्हें पराजित भी करता है। वह शोकाकुलों की पुकार को सुनता है और उन्हें सान्त्वना देता है—केवल सांसारिक और अस्थाई रूप में नहीं, बल्कि एक अन्तिम, परिपूर्ण और अनन्त तरीके से, जब वह विश्वास करने वाले सब लोगों को स्वयं को उद्धार के साधन के रूप में प्रदान करता है।

आपका राजा न केवल अनन्त रूप से सामर्थी है; वह अनन्त रूप से करुणामय भी है। और उसमें मौजूद ये दोनों गुण पर्याप्त हैं कि वह आपको इस संसार के हर दुख और शोक से पार ले जाए—जब तक कि आप उसके सामने खड़े न हो जाएँ, और वह आपकी आँखों से हर आँसू पोंछ न दे।

लूका 7:1-17

पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: यहेजकेल 22–23; यूहन्ना 13:1-20 ◊

28 सितम्बर : असली विश्वास का प्रमाण

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28 सितम्बर : असली विश्वास का प्रमाण
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“जब तुम मेरा कहना नहीं मानते तो क्यों मुझे ‘हे प्रभु, हे प्रभु,’ कहते हो? जो कोई मेरे पास आता है और मेरी बातें सुनकर उन्हें मानता है, मैं तुम्हें बताता हूँ कि वह किसके समान है : वह उस मनुष्य के समान है, जिसने घर बनाते समय भूमि गहरी खोदकर चट्टान पर नींव डाली।” लूका 6:46-48

यीशु चाहता है कि हमारे मुख की बातें और जीवन का व्यवहार एक-दूसरे के अनुरूप हों। इसलिए वह अपने “मैदानी उपदेश” के अन्त में एक बहुत ही टटोलने वाला प्रश्न पूछता है: “जब तुम मेरा कहना नहीं मानते तो क्यों मुझे ‘हे प्रभु, हे प्रभु,’ कहते हो?” यीशु ने देखा कि लोग जो कह रहे थे और जो कर रहे थे, उसमें गहरा विरोधाभास था। इसलिए उसने उन्हें एक गहन आत्मिक मूल्यांकन का बुलावा दिया—जो बुलावा वह आज हमें भी देता है। जैसा वह उनके लिए चाहता था, वैसा ही वह हमारे लिए भी चाहता है कि हमारे मुख से निकलने वाली यीशु में विश्वास की घोषणा के साथ-साथ हमारे जीवन में उसके प्रति नैतिक आज्ञापालन भी दिखे।

यीशु ने यह नहीं सिखाया कि स्वर्ग के राज्य में प्रवेश आज्ञाकारिता के अच्छे कामों के द्वारा होता है। उद्धार केवल परमेश्वर के अनुग्रह से, केवल विश्वास के द्वारा, और बिना किसी अन्य चीज़ के मिलता है (इफिसियों 2:8)। हम मसीह के पास केवल एक ही चीज़ लेकर आते हैं—हमारा पाप, जिससे हमें क्षमा की आवश्यकता है। तो फिर यीशु क्या सिखा रहा है? बहुत सीधी बात: केवल उन्हीं लोगों ने सच में यीशु की बात को सुना है और सुसमाचार से परिवर्तित हुए हैं, जो उसकी आज्ञा मानते हैं—अर्थात जो अपने विश्वास को अपने कर्मों के द्वारा व्यक्त करते हैं। जैसा सुधारवादियों ने कहा था: “उद्धार अकेले विश्वास से होता है, लेकिन उद्धार देने वाला वह विश्वास अकेला नहीं होता।” प्रेरित यूहन्ना भी यीशु की बात को दोहराते हुए अपनी पहली चिट्ठी में लिखता है: “यदि हम कहें कि उसके साथ हमारी सहभागिता है और फिर अन्धकार में चलें, तो हम झूठे हैं और सत्य पर नहीं चलते” (1 यूहन्ना 1:6)। बाइबल हमें बार-बार दिखाती है कि हम यीशु की बातों को जैसे सुनते हैं और उनका पालन करते हैं, उसका महत्त्व अनन्तकाल तक जाता है, क्योंकि यह हमारे विश्वास की सच्ची अवस्था और वास्तविकता को प्रकट करता है।

किसी भी मात्रा में धार्मिक कर्मकाण्ड या आध्यात्मिक बातें हमारे गुप्त व्यवहार को परमेश्वर से छिपा नहीं सकते। प्रेरित पौलुस बहुत स्पष्ट रूप से कहता है: “जो कोई प्रभु का नाम लेता है, वह अधर्म से बचा रहे” (2 तीमुथियुस 2:19)। हम इस आदेश की मांग की गम्भीरता को कम करने का प्रयास न करें। यही असली विश्वास का प्रमाण है।

यद्यपि कोई भी मनुष्य सिद्ध जीवन नहीं जीता, तौभी हम सभी को एक बदला हुआ जीवन जीने के लिए बुलाया गया है। हम अब मसीह के प्रभुत्व के अधीन हैं। उसका आत्मा हममें वास करता है। क्या हम पूरी तरह सफल होंगे? नहीं। लेकिन हम भिन्न होंगे, और हमारे जीवन में यह निरन्तर दिखेगा कि हम “मूरतों से परमेश्‍वर की ओर फिरे हैं, ताकि जीवते और सच्चे परमेश्‍वर की सेवा करें” (1 थिस्सलुनीकियों 1:9)। इसलिए अपने जीवन पर विचार करें। क्या आप यीशु को “प्रभु” कहते हैं? बहुत अच्छा! लेकिन सबसे महत्त्वपूर्ण बात यह है: क्या आप अपने जीवन में कोई ऐसा प्रमाण दिखा सकते हैं—उन बातों में जो आप नहीं करते, उन कामों में जो आप करते हैं, उन प्रलोभनों में जिनसे आप लड़ते हैं, उन गुणों में जिन्हें आप पाने का प्रयास करते हैं, और उस क्षमा में जिसे आप पश्चात्ताप पूर्वक मांगते हैं—कि यीशु वास्तव में आपका प्रभु है?

याकूब 2:14-26

◊ पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: यहेजकेल 20–21; यूहन्ना 12:27-50