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18 दिसम्बर : इसकी सुनो

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18 दिसम्बर : इसकी सुनो
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“पतरस ने यीशु से कहा, ‘हे रब्बी, हमारा यहाँ रहना अच्छा है : इसलिए हम तीन मण्डप बनाएँ; एक तेरे लिए, एक मूसा के लिए, और एक एलिय्याह के लिए।’ क्योंकि वह न जानता था कि क्या उत्तर दे, इसलिए कि वे बहुत डर गए थे। तब एक बादल ने उन्हें छा लिया, और उस बादल में से यह शब्द निकला, “यह मेरा प्रिय पुत्र है, इसकी सुनो।’” मरकुस 9:5-7

पतरस के लिए यीशु के रूपान्तरण से पहले के दिन भावनाओं के उतार-चढ़ाव से भरे थे। एक क्षण वह घोषणा कर रहा था, “तू जीवते परमेश्वर का पुत्र मसीह है” (मत्ती 16:16), और अगले ही क्षण यीशु उसे डाँटते हुए कह रहा था, “हे शैतान, मेरे सामने से दूर हो! तू मेरे लिए ठोकर का कारण है; क्योंकि तू परमेश्‍वर की बातों पर नहीं, परन्तु मनुष्यों की बातों पर मन लगाता है” (पद 23)। पतरस उस ऊँचाई तक उठ चुका था जहाँ उसने उस पुरुष की सच्ची पहचान प्रकट की थी, जिसने उसे मनुष्यों का मछुआरा बनने के लिए बुलाया था; परन्तु फिर वह ऐसी गहराई तक गिर पड़ा कि जीवते परमेश्वर के पुत्र ने उसे यह कहकर ताड़ना दी कि वह दुष्ट से प्रेरित हो रहा है और पुत्र के कार्य में बाधा बन रहा है। लेकिन वह इससे भी नीचे गिरने वाला था और फिर उससे भी ऊँचा उठने वाला था (मत्ती 26:69-75; प्रेरितों 4:5-20)। यदि मेरे समान आपका मसीही जीवन भी उतार-चढ़ाव से भरा हुआ लगता है, तो पतरस का उदाहरण आपके लिए एक उत्साहजनक प्रेरणा हो सकता है।

मत्ती 17 में, पतरस अचानक खुद को एक पहाड़ पर रूपान्तरित और तेजोमय यीशु के साथ पाता है, जो मूसा और एलिय्याह के साथ बातचीत कर रहा था। स्वाभाविक रूप से, पतरस “न जानता था कि क्या उत्तर दे” क्योंकि वह और उसके दो साथी “बहुत डर गए थे” (मरकुस 9:6)। वह नहीं जानता था कि वह क्या कह रहा है (लूका 9:33)—लेकिन फिर भी वह बोल पड़ा!

उस महिमा की एक झलक ने पतरस को स्तब्ध कर दिया। वह प्रभु और पुराने नियम के इन दो महान भविष्यवक्ताओं के लिए झोंपड़ियाँ बनाने का सुझाव दे ही रहा था कि अचानक, जैसे यीशु के बपतिस्मा के समय हुआ था, स्वर्ग से एक स्वर आया जिसने उसे यह बताया कि इस दर्शन पर सही प्रतिक्रिया क्या होनी चाहिए: बस, पतरस! अब यीशु की सुनने का समय है। यह मेरा प्रिय पुत्र है, जिससे मैं प्रेम करता हूँ; इसकी सुनो।

यह परमेश्वर की लगातार पुकार है—हर समय, हर स्थान पर, हर व्यक्ति के लिए। परमेश्वर का वचन आज भी पवित्रशास्त्र के माध्यम से उतना ही जीवित और प्रभावी है, जितना तब था जब पतरस ने उसे रूपान्तरण पर्वत पर सुना था। जब हम बाइबल पढ़ते हैं और पवित्र आत्मा हमारे हृदयों में कार्य करता है, तो हमें वैसे ही स्वर्गिक वैभव की झलक और महिमा की अनुभूति मिल सकती है, जैसी पतरस, याकूब और यूहन्ना को मिली थी।

हम, पतरस की तरह, अपने मसीही जीवन को “कभी गहराइयों में डूबा हुआ . . . और कभी ऊँचाइयों को छूता हुआ पाते हैं।”[1] लेकिन जब परमेश्वर का अटल और शाश्वत वचन हमारे जीवन में प्रवेश करता है, तो वह हमें यीशु की ओर मोड़ता है—उस प्रिय पुत्र की ओर जो सदा पिता को प्रिय था और जो स्वयं को हमारे लिए प्रकट करता है। प्रश्न यह है: क्या हम उसकी सुनेंगे?

2 पतरस 1:16-21

पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: यहोशू 22–24; लूका 18:18-43 ◊


[1] ओक्टेवियस विनस्लो, सोल-डेप्थ्स ऐण्ड सोल-हाईट्स (बैनर ऑफ ट्रुथ, 2006), पृ. 1.

17 दिसम्बर : आवश्यक परीक्षाएँ

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17 दिसम्बर : आवश्यक परीक्षाएँ
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“हम क्लेशों में भी घमण्ड करें, यह जानकर कि क्लेश से धीरज . . . उत्पन्न होता है।” रोमियों 5:3

जीवन के किसी भी क्षेत्र में सही दृष्टिकोण अत्यन्त महत्त्वपूर्ण होता है। कला के क्षेत्र में, यह कलाकार को एक ऐसी छवि बनाने में सहायता करता है कि उसके द्वारा बनाया गया प्याला इतना वास्तविक लगता है कि मानो उसे अभी पानी से भर दिया जाए, या उसके द्वारा बनानी गई कुर्सी इतनी वास्तविक लगती है कि वह हवा में झूलती हुई नहीं बल्कि जमीन पर टिकी हुई प्रतीत होती है। इसी प्रकार, जीवन की परीक्षाओं में भी सही प्रतिक्रिया देने के लिए सही दृष्टिकोण आवश्यक है। यदि हम इनका सही अर्थ नहीं समझते, तो हम इनका सामना भी सही तरीके से नहीं कर सकते।

परीक्षाएँ हमारे विश्वास को परखने का साधन हैं जिनके द्वारा यह परखा जाता है कि क्या हम केवल यीशु में भरोसा रखते हैं या नहीं। ये यह भी निर्धारित करने में सहायता करती हैं कि हमारा विश्वास सच्चा है या दिखावटी? जब जीवन सुचारू रूप से चलता है, तो आत्मविश्वास महसूस करना आसान होता है। लेकिन जब समस्याएँ सिर उठाती हैं—जब परिवार बिखरने लगता है, जब शरीर या मन कमजोर हो जाता है, जब हमारी आशाएँ टूट जाती हैं—तब हमें पता चलता है कि हमारा विश्वास कितना दृढ़ है। और जब परीक्षाओं में हमारा विश्वास सच्चा सिद्ध होता है, तो हमें आनन्द होता है, क्योंकि ऐसा विश्वास “आग से ताए हुए नाशवान सोने से भी कहीं अधिक बहुमूल्य है” (1 पतरस 1:7)।

कठिनाइयाँ हमारे विश्वास की वृद्धि को परखने में भी सहायता करती हैं—कि हम बढ़ रहे हैं या रुक गए हैं। निराशाएँ और आँसू अक्सर हमें आत्मिक रूप से आगे बढ़ाते हैं, क्योंकि तब हम परमेश्वर के वचन को उन तरीकों से लागू करने लगते हैं, जिनकी हमने पहले कल्पना भी नहीं की थी। हम मसीह के अतुलनीय मूल्य को उन तरीकों से समझने लगते हैं, जिन्हें हम पहले कदाचित नहीं समझते थे। एक लेखक ने लिखा है, “कष्टों की आँधी मिथ्या विश्वास, कपट और सन्देह की भूसी को उड़ा देती है, और केवल वही बचता है जो सच्चा और शुद्ध चरित्र होता है।”[1]

परीक्षाएँ हमें सहनशीलता विकसित करने में भी सहायता करती हैं। मसीही जीवन कुछ सौ मीटर की दौड़ नहीं, बल्कि जीवनभर चलने वाली मैराथन है। मैराथन धावकों को कई कठिन मीलों से गुजरना पड़ता है, जहाँ वे थकान और पीड़ा महसूस करते हैं, लेकिन वे दौड़ जारी रखते हैं। उन्हें आश्चर्य नहीं होता कि यह कठिन क्यों है; वे पहले से जानते हैं कि ऐसा होगा। लेकिन वे यह भी जानते हैं कि इन कष्टों के पार ही विजय का मुकुट है। इसी तरह, जीवन में हमें मिलने वाली परीक्षाएँ हमें आत्मिक रूप से मजबूत बनाती हैं, ताकि हम अपनी दौड़ अच्छी तरह पूरी कर सकें।

यदि आप किसी ऐसे मसीही को देखें, जिसकी आँखें कोमल और हृदय दयालु है, तो आपको लगभग निश्चित रूप से यह पता चलेगा कि उन्होंने यह विनम्रता और करुणा कठिन परीक्षाओं के माध्यम से प्राप्त की है। हम अक्सर बिना परिश्रम के अच्छे परिणाम चाहते हैं, लेकिन ऐसा कभी नहीं होता। परमेश्वर आमतौर पर हमारे विश्वास को दुखों की मिट्टी में ही उगने देता है।

प्रश्न यह है: “क्या मैं इस पर विश्वास करता हूँ?” यदि आपका उत्तर हाँ है, तो यह आपके दृष्टिकोण और जीवन की कठिनाइयों के प्रति आपकी प्रतिक्रिया को पूरी तरह बदल देगा। परीक्षाएँ अब भी आपको पीड़ा, भय और अनिश्चितता से भर सकती हैं, लेकिन साथ ही, आप उन्हें आनन्द के साथ स्वीकार कर पाएँगे, यह जानते हुए कि वे आपके आत्मिक धैर्य को विकसित कर रही हैं और आपको अन्त तक पहुँचने की शक्ति दे रही हैं।

1 पतरस 1:3-9

◊ पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: यहोशू 19–21; लूका 18:1-17


[1] जेम्स बी. ऐडमसन, दि एपिस्टल ऑफ जेम्स, द न्यू इण्टरनैशनल कॉमैण्ट्री ऑन द न्यू टेस्टामेण्ट (अर्डमंस, 1976), पृ. 54.

16 दिसम्बर : दया वहाँ महान थी

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16 दिसम्बर : दया वहाँ महान थी
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“क्योंकि हम भी पहले निर्बुद्धि, और आज्ञा न मानने वाले, और भ्रम में पड़े हुए और विभिन्न प्रकार की अभिलाषाओं और सुख-विलास के दासत्व में थे, और बैर भाव, और डाह करने में जीवन व्यतीत करते थे, और घृणित थे, और एक दूसरे से बैर रखते थे। पर जब हमारे उद्धारकर्ता परमेश्‍वर की कृपा और मनुष्यों पर उसका प्रेम प्रगट हुआ, तो उसने हमारा उद्धार किया; और यह धर्म के कामों के कारण नहीं, जो हम ने आप किए, पर अपनी दया के अनुसार नए जन्म के स्नान और पवित्र आत्मा के हमें नया बनाने के द्वारा हुआ।” तीतुस 3:3-5

यदि आपके घर में आग नहीं लगी है, तो आपको अग्निशमन दल की जरूरत नहीं है; उसी प्रकार, यदि आप पूरी तरह स्वस्थ हैं, तो कोई डॉक्टर आपको बेवजह ड्रिप नहीं लगाएगा। यह निरर्थक होगा! इसी तरह, जब तक हमें वास्तव में यह एहसास नहीं होता कि हमें क्षमा की आवश्यकता है, तब तक परमेश्वर के अनुग्रह और दया की कहानी हमारे लिए कोई विशेष अर्थ नहीं रखती। हमें यह अप्रासंगिक लगती है।

कई बार हम यह गलती कर बैठते हैं कि दूसरों की स्थिति देखकर तो हम महसूस करते हैं कि उन्हें क्षमा की बहुत अधिक आवश्यकता है, लेकिन वहीं हम क्षमा की अपनी जरूरत को अनदेखा कर देते हैं। हम मन ही मन सोचते हैं (चाहे हम इसे स्वीकार न करें), “धन्यवाद परमेश्वर, मैं उनके जैसा नहीं हूँ।” लेकिन परमेश्वर के अनुग्रह से, हमें जल्दी ही यह एहसास होता है कि हम भी कभी-कभी कठोर हो जाते हैं, हम भी ऐसी बातें बोल देते हैं और ऐसे काम कर देते हैं जो नहीं करने चाहिएँ, या हम वे काम करने में चूक जाते हैं, जो हमें करने चाहिएँ। जब हम इस अपराध-बोध को महसूस करते हैं, तब हमें अपने लिए क्षमा की आवश्यकता समझ में आती है, और जब हमें वे लोग क्षमा करते हैं, जिनका हमने अपमान किया था, तो हम कृतज्ञता से भर जाते हैं।

क्षमा का आनन्द प्राप्त करने से पहले हमें अपने पाप की वास्तविकता को स्वीकार करना आवश्यक है। सबसे पहले, हमें स्वयं को सही दृष्टिकोण से देखना होगा: हम स्वभाव से खोई हुई भेड़ें हैं, परमेश्वर के विरुद्ध विद्रोही हैं, और खाली पात्र हैं जिन्हें भरने की आवश्यकता है। हमें यह स्वीकार करना होगा कि चाहे हम मसीही जीवन में कितना भी आगे क्यों न बढ़ जाएँ, और चाहे परमेश्वर का आत्मा हमें कितना भी बदल दे, हम कभी भी अनुग्रह की आवश्यकता से परे नहीं हो सकते, क्योंकि हम अपनी पापमय प्रकृति से कभी पूरी तरह मुक्त नहीं होते। जब तक हमें यह एहसास नहीं होता कि हमारे पापों के लिए हमारा क्या परिणाम होना चाहिए था, तब तक हम इस अद्‌भुत सत्य के आगे नहीं झुकते कि एक सिद्ध उद्धारकर्ता ने हमारे स्थान पर प्राण दिए और हमारे समस्त ऋण को चुका दिया ताकि हम परमेश्वर की पूर्ण क्षमा प्राप्त कर सकें।

हमारी सबसे बड़ी आवश्यकता है कि हम निरन्तर विश्वास और पश्चाताप के साथ मसीह की ओर मुड़ते रहें। हम चाहे मसीही जीवन में कहीं भी हों, हम सभी को प्रार्थना करनी चाहिए कि परमेश्वर हमें स्वयं के बारे में और हमारे उद्धारकर्ता के बारे में सत्य प्रकट करे। फिर, जैसे-जैसे हम यह समझते जाएँगे कि हम वास्तव में क्या पाने के योग्य थे, वैसे-वैसे हम अपने उद्धारकर्ता से और अधिक प्रेम करने लगेंगे। हम परमेश्वर के प्रेम और यीशु के कार्यों से विस्मित होते रहेंगे।

अतः अभी एक क्षण रुकें। परमेश्वर से प्रार्थना करें, “मुझे मेरा वास्तविक स्वरूप दिखा,” और अपने पापों पर विचार करें। फिर प्रार्थना करें, “मुझे मेरा उद्धारकर्ता दिखा,” और उसकी दया और अनुग्रह की वास्तविकता में आनन्दित हों। तब उसकी करुणा और दया आपके हृदय को पूरी तरह भर देगी, और आप आनन्दपूर्वक इस गीत को गा पाएँगे:

दया वहाँ महान थी, और अनुग्रह भरपूर था;

क्षमा वहाँ मुझ पर अपार थी;

वहाँ मेरे बोझिल हृदय को स्वतन्त्रता मिली

कलवरी पर।[1]

इफिसियों  2:1-10


[1] विलियम आर. न्यूएल, “ऐट कैलवरी” (1895).

15 दिसम्बर : धर्मी क्यों दुख उठाते हैं

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15 दिसम्बर : धर्मी क्यों दुख उठाते हैं
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“उससे पहले कि मैं दुखित हुआ,मैं भटकता था;परन्तु अब मैं तेरे वचन को मानता हूँ . . . मुझे जो दुख हुआ वह मेरे लिए भला ही हुआ है, जिससे मैं तेरी विधियों को सीख सकूँ।” भजन 119:67, 71

जब हम अपने जीवन में या दूसरों के जीवन में दुखों का सामना करते हैं, तो अक्सर यह प्रश्न उठता है: हम जो परमेश्वर में विश्वास रखते हैं, हमें अब भी कष्ट क्यों सहने पड़ते हैं?

क्या परमेश्वर हमसे प्रेम नहीं करता? हमारे दुखों में उसकी क्या योजना हो सकती है?

जब बाइबल पीड़ा और कष्ट के विषय में बात करती है, तो वह इस सत्य को स्थापित करती है कि परमेश्वर भला और सर्वशक्तिमान है तथा उसकी एक शाश्वत योजना है—वह एक ऐसी प्रजा को रच रहा है जो पूरी तरह उसकी अपनी हो, उन्हें अपने पुत्र के स्वरूप में ढाल रहा है और उन्हें महिमा तक सुरक्षित पहुँचा रहा है (तीतुस 2:14; रोमियों 8:29; 2 तीमुथियुस 4:18)। इस उद्देश्य की पूर्ति के लिए जो भी आवश्यक होगा, परमेश्वर वह करेगा—भले ही उसमें अस्थायी दुखों की अनुमति क्यों न शामिल हो।

यहाँ कुछ कारण दिए गए हैं कि दुख किस प्रकार हमें लाभ पहुँचा सकता है:

  • दुख सामान्यता लाता है। अधिकांश पीड़ा केवल इस असिद्ध, पतित संसार में जीने की वास्तविकता है। हम सभी को पीड़ा, बीमारी और शोक का अनुभव होता है। धर्मी और अधर्मी दोनों ही सूर्य की रोशनी देखते हैं और वर्षा का अनुभव करते हैं (मत्ती 5:45)। उसी प्रकार, दोनों ही अपने-अपने जीवन में दुखों का सामना करते हैं।
  • दुख सुधारात्मक होता है। जिस प्रकार एक पिता अपने बच्चों को अनुशासित करता है ताकि वे सही कार्य करना सीखें, उसी प्रकार परमेश्वर कभी-कभी हमें सही मार्ग पर वापस लाने के लिए दुखों का उपयोग करता है (इब्रानियों 12:5-13)।
  • दुख रचनात्मक होता है। यह केवल हमें सुधारने के लिए नहीं, बल्कि हमारे चरित्र को भी मजबूत करने के लिए कार्य करता है (याकूब 1:2-5)। क्या आपने कभी किसी को देखकर सोचा है, “यह व्यक्ति इतना आशावान कैसे हो सकता है? वह मेरे टूटे हुए मन की इतनी गहराई से समझ कैसे रखता है?” यह सम्भवतः इसलिए है क्योंकि उन्होंने दुखों का सामना किया, उनसे सीखा, और इसके द्वारा दूसरों की परवाह करना जाना।
  • दुख महिमामय होता है। परमेश्वर हमेशा दुखों के माध्यम से अपनी महिमा प्रकट करता है, चाहे वह वर्षों, दशकों, या पीढ़ियों बाद ही क्यों न हो। यूहन्ना 9 में जन्म से अन्धे व्यक्ति के साथ ऐसा ही हुआ था—परमेश्वर ने उसकी पीड़ा का उपयोग अपने सामर्थ्य के एक अद्‌भुत प्रमाण के रूप में किया। कई बार हम अपने कष्टों के पीछे कारण नहीं समझ पाते, लेकिन जीवन के किसी मोड़ पर हमें यह एहसास हो सकता है, “ओह, इसलिए मुझे यह कष्ट सहना पड़ा—ताकि इस क्षण में परमेश्वर की महिमा प्रकट हो।
  • दुख लौकिक होता है। हालाँकि हर दुख किसी महान आध्यात्मिक युद्ध का हिस्सा नहीं होता, फिर भी कुछ दुख निश्चित रूप से ऐसे होते हैं। अय्यूब इसका सबसे गहन उदाहरण है—परमेश्वर ने उसे शैतान के सामने यह दिखाने के लिए चुना कि एक व्यक्ति परमेश्वर से केवल इसलिए प्रेम कर सकता है कि वह कौन है, न कि इसलिए कि वह उससे क्या प्राप्त कर सकता है (अय्यूब 1)।

सत्य यह है कि अपने जीवन में हम दुखों से नहीं बच सकते। लेकिन हमें दुखों में निराश होने की आवश्यकता नहीं है। हम परमेश्वर की महान योजनाओं को स्मरण कर सकते हैं। अन्त में, हमें यह नहीं पूछना चाहिए, “क्यों?” बल्कि हमें यह पूछना चाहिए, “क्या मैं…?” क्या मैं परमेश्वर की प्रतिज्ञाओं पर विश्वास करूँगा? क्या मैं उसकी योजना को अपनाऊँगा? क्या मैं उस पर भरोसा रखूँगा?

अय्यूब 1

◊ पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: यहोशू 13–15; लूका 17:1-19

14 दिसम्बर : योग्य उद्धारकर्ता

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14 दिसम्बर : योग्य उद्धारकर्ता
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“जब समय पूरा हुआ, तो परमेश्‍वर ने अपने पुत्र को भेजा जो स्त्री से जन्मा, और व्यवस्था के अधीन उत्पन्न हुआ, ताकि व्यवस्था के अधीनों को मोल लेकर छुड़ा ले, और हम को लेपालक होने का पद मिले।” गलातियों 4:4-5

किसी संस्कृति की मान्यताओं का एक अच्छा नमूना प्राप्त करने का सबसे सरल तरीका है—बच्चों से बात करना। उदाहरण के लिए, एक बार जब एक ब्रिटिश बच्चे से पूछा गया कि यीशु कौन था, तो उसने उत्तर दिया, “वह वही था जो अमीरों को लूटकर गरीबों में बाँटता था!” (ऐसा प्रतीत होता है कि उसने यीशु और उनके शिष्यों को रॉबिन हुड और उनके साथियों से मिला दिया था!) इसी तरह, जब किसी अन्य बच्चे से पूछा गया, “एक मसीही कौन होता है?” तो उसने उत्तर दिया, “क्या वे वही लोग नहीं हैं जो अपनी सब्जियाँ खुद उगाते हैं?”

वर्ष के इस समय में, जब कई लोग ग्यारह महीनों तक परमेश्वर के बारे में अधिक नहीं सोचते, वे स्वयं को यीशु के जन्म के कारणों पर विचार करते हुए पाते हैं। हमारे कई मित्र, सहकर्मी और परिवारजन शायद यही कहेंगे कि यीशु एक रहस्यमयी व्यक्ति है। ये प्रतिक्रियाएँ हमें यह याद दिलाने के लिए पर्याप्त हैं कि मसीही विश्वास का सन्देश हमारे पड़ोसियों के लिए उतना स्पष्ट नहीं है जितना शायद हम सोचते हैं। यदि हमें दूसरों से यह सन्देश साझा करना है, तो पहले यह हमारे अपने हृदय में स्पष्ट और मूल्यवान होना चाहिए।

यीशु अन्य धार्मिक, ऐतिहासिक और मानवता के महान व्यक्तियों से अलग है, क्योंकि केवल वही इस संसार का उद्धारकर्ता बनने के योग्य है। प्रेरित पौलुस ने उसके आगमन को कोई आकस्मिक हस्तक्षेप नहीं माना, बल्कि इसे एक दिव्य नियुक्ति बताया। जब पौलुस कहता है, “परमेश्वर ने अपने पुत्र को भेजा,” तो इसका अर्थ यह है कि यीशु को उसकी पूर्व विद्यमान अवस्था से भेजा गया था। यीशु का जीवन तब आरम्भ नहीं हुआ जब वह बैतलहम में “एक स्त्री से जन्मा”—बल्कि वह तो समय के आरम्भ से पहले से विद्यमान था (यूहन्ना 1:1-3)। अपने परमेश्वरत्व को छोड़े बिना, उसने मानव रूप धारण किया, “व्यवस्था के अधीन जन्मा,” पिता के प्रति पूर्ण और सिद्ध आज्ञाकारिता को पूरा किया—जो सम्पूर्ण मानव इतिहास में केवल वही कर सका।

यदि परमेश्वर हमें बचाने वाला है, तो उद्धारकर्ता को स्वयं परमेश्वर होना चाहिए। यदि मनुष्य ने पाप किया है और उसे ही दण्ड भुगतना चाहिए, तो उद्धारकर्ता को मनुष्य भी होना चाहिए। और यदि वह मनुष्य जो पाप का दण्ड वहन करता है, स्वयं निष्पाप होना चाहिए, तो यीशु मसीह के अलावा और कौन इन योग्यताओं को पूरा करता है? केवल वही परमेश्वर के उद्धार की योजना को पूरा करने के लिए अनोखे रूप से योग्य है।

कोई और अच्छा न था,

जो पाप की कीमत चुका सके;

केवल उसी ने स्वर्ग का द्वार खोला,

और हमें भीतर आने दिया।[1]

यीशु कौन है? वह परमेश्वर का पुत्र है, जो मनुष्य के रूप में जन्मा। वह सिद्ध व्यवस्था-पालक है, जिसने उन लोगों को स्वतन्त्र करने के लिए अपने प्राण दिए जो व्यवस्था का पालन नहीं कर सके। फिर एक मसीही कौन है? वह व्यक्ति जो पाप के दण्ड से मुक्त किया गया है और परमेश्वर के परिवार में अपना लिया गया है। यह वह सन्देश है जिसे हमें प्रतिदिन स्वयं को स्मरण दिलाना चाहिए और यह प्रार्थना करनी चाहिए कि हमें इसे किसी और के साथ साझा करने का अवसर मिले। क्योंकि यह संसार का सबसे चौंकाने वाला और सबसे महिमामय सन्देश है।

गलातियों 3:23 – 4:7

पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: यहोशू 10–12; लूका 16 ◊


[1] सेसिल फ्रांसिस एलेक्ज़ेण्डर, “देयर इज़ ए ग्रीन हिल फार अवे” (1848).

13 दिसम्बर : बहुतों की छुड़ौती

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13 दिसम्बर : बहुतों की छुड़ौती
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“क्योंकि मनुष्य का पुत्र इसलिए नहीं आया कि उसकी सेवा टहल की जाए, पर इसलिए आया कि आप सेवा टहल करे, और बहुतों की छुड़ौती के लिए अपना प्राण दे।” मरकुस 10:45

मुझे बिल भरना अच्छा लगता है। शायद मुझे बिलों का आकार या उनकी बारम्बारता पसन्द न हो, परन्तु जब वे पूर्ण रूप से चुका दिए जाते हैं, तो वह अद्‌भुत अनुभूति होती है। पुराने समय में जब बिल आमतौर पर दफ्तर में जाकर भरे जाते थे, तो मुझे विशेष सन्तोष होता था जब मैं अपना बिल भुगतान के साथ काउण्टर पर देता और वह वापस PAID की मुहर के साथ लौटता था।

इन पदों में इस छोटे से वाक्य के माध्यम से यीशु अपनी मृत्यु की ओर संकेत करता है: “बहुतों की छुड़ौती के लिए।” पुराने नियम के कुछ उदाहरण यीशु द्वारा “छुड़ौती” शब्द के उपयोग का सन्दर्भ प्रदान करते हैं।

यहूदी व्यवस्था-विधान के अनुसार, यदि किसी मनुष्य का बैल किसी को मार डालता था, तो बैल और उसका स्वामी दोनों मृत्यु-दण्ड के अधिकारी होते थे। परन्तु यदि स्वामी पर छुड़ौती का दण्ड लगाया जाता, तो वह उस धनराशि को देकर अपने प्राणों को छुड़ा सकता था (निर्गमन 21:29–30)। अर्थात्, बैल का स्वामी एक निश्चित मूल्य देकर अपने जीवन को वापिस खरीद सकता था। यही बात उस स्थिति में भी लागू होती थी जब किसी परिजन को दासत्व से मुक्त कराना होता या किसी खेत या सम्पत्ति को बन्धक से छुड़ाना होता (लैव्यव्यवस्था 25 देखें)। इन सभी उदाहरणों में छुड़ौती का अर्थ होता था एक निर्णायक और मूल्यवान हस्तक्षेप, जो किसी को बन्धन से मुक्ति दिलाता था।

पुराने नियम की ये सभी परिस्थितियाँ भौतिक समस्याएँ थीं। किन्तु यीशु जिस बात की ओर संकेत कर रहा था, वह नैतिक संकट था। हम पाप के अधीन हैं और हमने परमेश्वर को ठेस पहुँचाई है। यीशु ने स्पष्ट किया कि केवल उसका निर्णायक हस्तक्षेप—हमारे जीवन के लिए दिया गया यह अनमोल मूल्य—ही हमें स्वतन्त्र कर सकता है और सम्पूर्ण बना सकता है। जैसा कि भजन का लेखक कहता है: “उसने मेरे पाप और दुख अपने ऊपर ले लिए, उन्हें अपना ही बना लिया।”[1]

मसीह हमारी छुड़ौती है। उसने “जो हमारे लिए शापित बना, हमें मोल लेकर व्यवस्था के शाप से छुड़ाया” (गलातियों 3:13), ताकि जब हम उस पर विश्वास करें, तो बन्धन से मुक्त हो सकें। अपनी मृत्यु के द्वारा, यीशु ने उन सभी पर लगाए गए न्याय को पूर्ण रूप से चुकता कर दिया जो उस पर विश्वास करते हैं। जब उसने पुकारा, “पूरा हुआ” (यूहन्ना 19:30), तो उसने यूनानी शब्द टेटेलेस्टाई कहा, जो उस समय के बिलों पर यह दिखाने के लिए लिखा जाता था कि वह पूरा चुकता हो गया है। अपने पुत्र के पुनरुत्थान में पिता ने उस भुगतान की रसीद प्रदान की। वह ऋण, जो हमारे विरुद्ध न्यायपूर्वक खड़ा था और जो हमारे सामर्थ्य से बाहर था, अब स्पष्ट रूप से मुहरबन्द है: “चुका दिया गया है।”

कई बार शत्रु हमें दोष देगा, और हमारा अपना हृदय हमें दोषी ठहराएगा: “क्या तुम वास्तव में क्षमा किए गए हो? यह पाप तो बहुत अधिक है! क्या वास्तव में परमेश्वर तुमसे प्रेम करता है? क्या वास्तव में तुम्हारे लिए अनन्त महिमा में कोई स्थान है?” जब आप ऐसी फुसफुसाहटें सुने, तो स्मरण करें कि मसीह न्याय के सिंहासन तक गया और आपके विरुद्ध खड़ा पूरा लेखा-जोखा चुकता कर दिया। पिता ने उसे मृतकों में से जीवित किया; इसलिए आप इस सत्य में पूर्ण सुरक्षा पा सकते हैं कि वह अब कभी भी उस भुगतान की पुनः माँग नहीं करेगा। आपका खाता हमेशा के लिए चुकता कर दिया गया है। आपकी छुड़ौती दे दी गई है।

  कुलुस्सियों 2:8-15

◊ पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: यहोशू 7–9; लूका 15:11-32


[1] चार्ल्स एच. गेब्रिएल, “माई सेवियर्ज़ लव” (1905).

12 दिसम्बर : परम न्याय

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12 दिसम्बर : परम न्याय
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“यदि भला काम करके दुख उठाते हो और धीरज धरते हो, तो यह परमेश्‍वर को भाता है। और तुम इसी के लिए बुलाए भी गए हो, क्योंकि मसीह भी तुम्हारे लिए दुख उठाकर तुम्हें एक आदर्श दे गया है कि तुम भी उसके पद–चिह्नों पर चलो।” 1 पतरस 2:20-21

सी.एच. स्पर्जन ने एक बार लन्दन में अपने मण्डली से कहा, “मेरे प्रिय मित्र, यदि आप यह नियम बना लें कि कोई भी आपको अपमानित करे या आपके साथ अनादर से पेश आए और आप उसे बिना बदला दिए नहीं छोड़ेंगे, तो आपको प्रतिदिन भोर को परमेश्वर से प्रार्थना करने की आवश्यकता नहीं कि वह आपको उस संकल्प को निभाने में सहायता करे।”[1] उनका भाव यह था: अपने सम्मान की रक्षा करना और जिन्होंने हमें चोट पहुँचाई है उनसे बदला लेना हमारे स्वभाव का हिस्सा है। परन्तु दुख सहना और न्याय का कार्य परमेश्वर पर छोड़ना हमारे प्राकृतिक स्वभाव के विरुद्ध है।

वास्तव में, न्याय करना एक ऐसी ज़िम्मेदारी है, जिसके लिए हम पूर्णतः अयोग्य हैं। जब हम प्रतिघात करते हैं, तो हमें यह नहीं पता होता कि कितनी तीव्रता से करना है; और जब कोई हमें कठोर शब्द कहता है, तो हम अक्सर उससे कहीं अधिक कटुता से उत्तर देते हैं। भीतर-ही-भीतर हम यह सोचते हैं कि हम घृणा को घृणा से हरा देंगे, परन्तु ऐसा करके तो हम बुराई को और बढ़ा देते हैं। निश्चित रूप से, बुराई का दण्ड मिलना चाहिए—और वह मिलेगा भी। परन्तु यह दण्ड देना हमारा काम नहीं है।

केवल परमेश्वर ही न्याय करने और दण्ड देने में सिद्ध और सम्पूर्ण है। वही हर अन्याय को ठीक करेगा। एक सिंहासन है जो इस संसार के किसी भी न्याय-आसन से ऊँचा है, और एक दिन उसी सिंहासन पर सभी भ्रष्ट निर्णय, गलत न्याय और मानव न्याय की विफलताएँ ठीक की जाएँगी।

यह सच्चाई हमें प्रतिशोध की आड़ लेने की अनुमति नहीं देती। हमें अपने शत्रुओं के लिए कुछ और नहीं, केवल उनका उद्धार ही चाहना चाहिए। जिन्होंने हमारा तिरस्कार किया है, हमारे विरुद्ध कार्य किया है, या हमें नीचा दिखाया है—उनके प्रति हमारी जिम्मेदारी स्पष्ट है: हमें उनके लिए आशीष की कामना करनी है और उनके लिए प्रार्थना करनी है (मत्ती 5:44; लूका 6:28)।

यीशु हमारा आदर्श है: “वह गाली सुनकर गाली नहीं देता था, और दुख उठाकर किसी को भी धमकी नहीं देता था, पर अपने आप को सच्चे न्यायी के हाथ में सौंपता था” (1 पतरस 2:23)। आपके साथ उससे अधिक अन्याय नहीं होगा जितना यीशु के साथ हुआ, इसलिए हर परिस्थिति में आपको वैसा ही प्रत्युत्तर देना है जैसा उसने दिया।

आपको किस परिस्थितियों में और किन लोगों के साथ अधिक कठोरता से प्रतिघात करने का प्रलोभन होता है, बजाय इसके कि आप बुराई का प्रत्युत्तर भलाई से दें? उन लोगों के साथ भलाई करने में परमेश्वर को प्रसन्न करने के लिए तीन बातें आपकी सहायता करेंगी।

पहला, अपनी दृष्टि यीशु पर स्थिर रखें। जब आप मसीह को क्रूस पर यह कहते देखते हैं, “हे पिता, इन्हें क्षमा कर, क्योंकि ये जानते नहीं कि क्या कर रहे हैं” (लूका 23:34), तो उसके बाद प्रतिशोध की भावना को बनाए रखना अत्यन्त कठिन हो जाता है।

दूसरा, परमेश्वर के अनुग्रह पर विस्मित हो जाएँ। इस बात को याद रखें कि आप स्वाभाविक रूप में कौन थे और अनुग्रह से आप क्या बन गए हैं। जो व्यक्ति सचमुच परमेश्वर के अनुग्रह से विस्मित होता है, वह दूसरों के लिए बुरा नहीं चाहता।

तीसरा, अनन्तकाल पर और परमेश्वर के ऊँचे सिंहासन पर ध्यान केन्द्रित करें। आपकी वर्तमान स्थिति सम्पूर्ण चित्र नहीं है। आपको इस संसार में ही न्याय देखने की आवश्यकता नहीं है। इसलिए परमेश्वर से यह प्रार्थना करें कि वह आपको भलाई करने और सहनशील बने रहने में सहायता दे, चाहे आपके साथ बुराई ही क्यों न हो रही हो। वह आपको वही करने में सहायता देने को तत्पर है, जो उसके वचन के अनुसार सही है।

तीतुस 2:11-14; 3:1-7

पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: यहोशू 4– 6; लूका 15:1-10 ◊


[1] “ओवरकम इवल विद गुड,” द मैट्रोपोलिटन टैबरनैकल पुलपिट 22, क्रं. 1317, पृ. 556.

11 दिसम्बर : परमेश्वर के वचन में बढ़ना

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11 दिसम्बर : परमेश्वर के वचन में बढ़ना
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“मन फिराओ, और तुम में से हर एक अपने-अपने पापों की क्षमा के लिए यीशु मसीह के नाम से बपतिस्मा ले; तो तुम पवित्र आत्मा का दान पाओगे।” प्रेरितों 2:38

यदि आप कुछ समय से मसीही हैं, तो आपने यह अवश्य अनुभव किया होगा कि परमेश्वर के वचन का अध्ययन करना—चाहे व्यक्तिगत रूप से हो या रविवार को कलीसिया में—कई बार केवल एक औपचारिकता बन सकता है। सुसमाचार इतना सरल प्रतीत होता है कि हम उसे नजरअन्दाज करने के खतरे में पड़ जाते हैं—परन्तु हमारी निर्बलता में हमें बार-बार उसके सत्य के प्रचार को सुनने की आवश्यकता होती है। आज भी हमें वही सुसमाचार सुनने की आवश्यकता है, जो हमने उस पहले दिन सुना था जब हमने विश्वास किया था। हम अपने मसीही जीवन को “सत्य के वचन . . . [हमारे] उद्धार के सुसमाचार” (इफिसियों 1:13) से अलग नहीं कर सकते, क्योंकि परमेश्वर ने इन दोनों को एक-दूसरे से जोड़ा है। परमेश्वर का आत्मा, परमेश्वर के वचन के द्वारा, परमेश्वर की प्रजा को स्थिर रखता है।

इसीलिए पतरस ने जब पिन्तेकुस्त के दिन पवित्र आत्मा पाया, तो सबसे पहला कार्य यह किया कि खड़ा होकर एक लम्बा उपदेश दिया; और जैसे-जैसे लोगों ने परमेश्वर का वचन सुना और उस पर ध्यान दिया, वे व्यक्तिगत रूप से और सामूहिक रूप से बढ़ते गए (प्रेरितों 2)। इसके विपरीत, जब परमेश्वर का वचन नहीं सुनाया जाता, तो कलीसिया नहीं बढ़ती। क्यों? क्योंकि आत्मा तब कार्य करता है जब वचन सुना जाता है, और वचन तब सुना जाता है जब आत्मा कार्य करता है। प्रेरितों 2 का उपदेश बाइबल में केवल इसलिए नहीं दिया गया है कि वह दिखाए कि उन लोगों ने विश्वास कैसे किया, बल्कि इसलिए भी दिया गया है कि यह आपके विश्वास को भी मजबूत करे और आपको उत्साहित करे।

जब आत्मा कार्य करता है, तो वचन को सुनने का परिणाम यह होता है: जब पतरस ने उस दिन प्रचार किया, तो सुनने वालों के “हृदय छिद गए, और वे पतरस और शेष प्रेरितों से पूछने लगे, ‘हे भाइयो, हम क्या करें?’” (प्रेरितों 2:37)। अर्थात् उनके हृदय में पाप-बोध उत्पन्न हुआ। पतरस ने उत्तर दिया, “मन फिराओ, और तुम में से हर एक अपने-अपने पापों की क्षमा के लिए यीशु मसीह के नाम से बपतिस्मा ले; तो तुम पवित्र आत्मा का दान पाओगे” (पद 38)। और उन्होंने वैसा ही किया। अतः वहाँ समर्पण भी था। अन्ततः, नए विश्वासी प्रेरितों की शिक्षा को सुनने, रोटी तोड़ने और प्रार्थना करने के लिए एकत्र हुए (पद 42)। अतः वहाँ संगति भी थी। पाप-बोध, समर्पण, और संगति—और यह सब एक आत्मा-प्रेरित उपदेश से प्रारम्भ हुआ!

हमारे विश्वास में वृद्धि में मन और हृदय दोनों की भूमिका है। हमारी यह ज़िम्मेदारी है कि हम स्वयं को बाइबल आधारित शिक्षा के अधीन रखें, और व्यक्तिगत रूप से परमेश्वर के वचन का अध्ययन करें, यह प्रार्थना करते हुए कि परमेश्वर का आत्मा हमें बाइबल के पृष्ठों में मसीह को दिखाए और हमें उससे और अधिक प्रेम करना सिखाए। यदि आप इस समय पवित्रशास्त्र पढ़ने या अपने मसीही जीवन में केवल औपचारिकता निभा रहे हैं, तो उस प्रारम्भिक स्थान पर लौट आएँ जहाँ से आपने आरम्भ किया था। परमेश्वर के वचन में सुसमाचार को पढ़ें। अपने में पाप-बोध को आने दें और अपने उद्धारकर्ता पर भरोसा करने तथा उसकी सेवा करने का नया संकल्प लें। उन विश्वासियों की संगति में पूरी तरह सम्मिलित हो जाएँ जिन्हें परमेश्वर ने आपके आत्मिक लाभ के लिए आपको दिया है। और परमेश्वर से यह प्रार्थना करें कि वह अपने आत्मा के द्वारा आप में कार्य करे, ताकि वह प्रतिबद्धता और उत्साह जो यरूशलेम की उस कलीसिया में था, आपके जीवन का भी अनुभव बन जाए।

प्रेरितों 2:22-41

◊ पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: यहोशू 1–3; लूका 14:25-35

10 दिसम्बर : भले काम करने में साहस न छोड़ें

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10 दिसम्बर : भले काम करने में साहस न छोड़ें
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“हम भले काम करने में साहस न छोड़ें, क्योंकि यदि हम ढीले न हों तो ठीक समय पर कटनी काटेंगे।” गलातियों 6:9

यदि आप मेरी तरह हैं, तो आप निश्चित ही अपने विद्यालय के जीवन में कुछ ऐसे विषयों को याद कर सकते हैं, जिन्हें पढ़ते समय आप निराशा से अपनी पुस्तकों को देखते थे। शायद आपको ऐसा लगा हो कि शिक्षक ने आपको “निराशाजनक” मान लिया है। ऐसा वातावरण सीखने के लिए बहुत कठिन होता है। जॉन कैल्विन ने भी इसी प्रकार की बात कही थी: “सत्य की ओर ध्यान देने से हमें सबसे अधिक कोई बात यदि दूर कर सकती है, तो वह यह है कि हमें निराशाजनक और आशाहीन समझा जाए।”[1]

मसीही जीवन में भी हमें कई बार ऐसे ही निराशाजनक अनुभव होता है—जब हम “हम भले काम करने में साहस” छोड़ने लगते हैं। हो सकता है कि हमने परमेश्वर के लोगों की आवश्यकताओं को पूरा करने के कई प्रयास आरम्भ तो किए हों, परन्तु फिर हमने उन्हें त्याग दिया—क्योंकि हम या तो उनके प्रभाव से हताश हो गए, या फिर अपने ही पापों से जूझने और पवित्रता में बढ़ने की असफलता से थक गए। परन्तु हमें दृढ़ रहना है!

जब हम प्रभु की आज्ञाओं का पालन करने में परिश्रम करते हैं, परमेश्वर हमें बदलने और बढ़ाने के लिए हमारे भीतर कार्य करता है (फिलिप्पियों 2:12-13)। और प्रेरित यूहन्ना ने अपने समय के विश्वासियों को मसीह में उनके विश्वास का आश्वासन देते हुए कहा: “हम जानते हैं कि हम मृत्यु से पार होकर जीवन में पहुँचे हैं; क्योंकि हम भाइयों से प्रेम रखते हैं” (1 यूहन्ना 3:14, अतिरिक्त बल दिया गया है)। हममें से कितने लोग इस वाक्य को इस प्रकार पूरा करते? फिर भी स्वयं प्रभु यीशु ने कहा: “यदि आपस में प्रेम रखोगे, तो इसी से सब जानेंगे कि तुम मेरे चेले हो” (यूहन्ना 13:35)।

इसलिए हार मत मानें। जब प्रेरित पौलुस ने थिस्सलुनीकियों को लिखा, तो उसने उनके अद्‌भुत उदाहरण की सराहना की: “हम तुम्हारे विश्‍वास के काम, प्रेम के परिश्रम, और हमारे प्रभु यीशु मसीह में आशा की धीरता को लगातार स्मरण करते हैं।” (1 थिस्सलुनीकियों 1:3)। जो बात थिस्सलुनीके की कलीसिया के लिए सत्य थी, वह हमारे लिए भी सत्य हो सकती है। उनकी तरह हमारा विश्वास भी व्यावहारिक, स्पष्ट और दृढ़ बना रह सकता है। वे केवल क्षणिक उत्साह से भरे लोग नहीं थे; उन्होंने निरन्तर मसीही भलाई के कार्य किए।

भलाई करना थका देने वाला काम है, परन्तु हमें इससे थक नहीं जाना है। क्योंकि एक दिन, महिमा का राजा धर्मियों से कहेगा: “तुमने जो मेरे इन छोटे से छोटे भाइयों में से किसी एक के साथ किया, वह मेरे ही साथ किया” (मत्ती 25:40)। जब तक वह दिन न आ जाए, तब तक हमें यह विशेषाधिकार मिला है कि हम प्रभु यीशु मसीह की सेवा और आज्ञाकारिता में अटल आशा के साथ लगे रहें। इसलिए सोचें कि आप भटके हुए लोगों, परदेशियों, बन्द कैदियों, विधवाओं, और दरिद्रों के प्रति मसीही दया के कौन से ठोस कार्य कर रहे हैं? क्या यह समय है कि “हम भले काम करने” में उसकी सेवा करने और आरम्भ करने, या पुनः आरम्भ करने के लिए परमेश्वर का सामर्थ्य और उद्देश्य माँगें?”

प्रेरितों 6:1-7

पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: हाग्गै; लूका 14:1-24 ◊


[1] कॉमैण्ट्रीज़ ऑन दि अपिस्टल ऑफ पॉल टू द हिब्रूज़, अनुवादक जॉन ओवेन, इब्रानियों 6:9.

9 दिसम्बर : एक भीतरी मामला

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9 दिसम्बर : एक भीतरी मामला
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“प्रत्येक व्यक्ति अपनी ही अभिलाषा से खिंचकर और फँसकर परीक्षा में पड़ता है। फिर अभिलाषा गर्भवती होकर पाप को जनती है और पाप जब बढ़ जाता है तो मृत्यु को उत्पन्न करता है।” याकूब 1:14-15

हर पाप भीतर से ही जन्म लेता है।

हम परमेश्वर के स्वरूप में रचे गए प्राणी हैं, और हमारे भीतर अनेक प्रकार की इच्छाएँ हैं—जो स्वयं में बुरी नहीं हैं। परन्तु पतन के कारण हमारी हर लालसा में बुराई की अद्‌भुत सम्भावना छिपी है। परमेश्वर द्वारा दी गई इच्छाएँ भी विकृत होकर दुष्टता के लिए उपयोग की जा सकती हैं।

हम बुराई की अपनी प्रवृत्ति के दोष को शैतान, अपने मित्रों, वंशानुगत प्रवृत्तियों, या वातावरण पर डालने में माहिर हैं। परन्तु पवित्रशास्त्र कहता है कि हम अपनी ही लालसाओं द्वारा प्रलोभन में पड़ते हैं। परमेश्वर की अवज्ञा करने और विकृत या दुष्ट इच्छाओं को पूरा करने की लालसा हमारे भीतर से ही उत्पन्न होती है।

शैतान हमें लुभा सकता है, परन्तु परमेश्वर की अवज्ञा का निर्णय करना हमारा कार्य होता है। प्रभु यीशु ने यह अत्यन्त स्पष्ट रूप से कहा: “जो मनुष्य में से निकलता है, वही मनुष्य को अशुद्ध करता है।” (मरकुस 7:20) हर प्रलोभन हमारे सामने तब आता है, जब हम अपनी ही लालसा से खिंच कर बहकाए जाते हैं। और जब हम प्रलोभन के सामने झुक जाते हैं, तो वह अन्त में मृत्यु को जन्म देता है।

प्रलोभन की आकर्षक शक्ति मछलियों की मूर्खता में स्पष्ट दिखती है। वे चारा देखती हैं—जो चमकता है, लुभाता है—और वे उस पर झपट पड़ती हैं . . . और काँटे में फँस जाती हैं! यदि चारा पर्याप्त आकर्षक हो, तो मछली उस काँटे को अनदेखा नहीं कर सकती।

क्या हम वास्तव में मछलियों से अधिक समझदार हैं? जब चारा मनभावन दिखता है, तो हम स्वयं को समझाने लगते हैं कि शायद उसमें काँटा नहीं है। परन्तु काँटा होता है। “पाप जब बढ़ जाता है तो मृत्यु को उत्पन्न करता है।” पाप का मार्ग न्याय की ओर ले जाता है, और यह मार्ग हमारे जीवन पर ऐसे चिह्न छोड़ जाता है, जिन्हें समय कभी नहीं मिटा सकता—हालाँकि अपनी दया में परमेश्वर उन अनुभवों का भी छुटकारा कर सकता है।

जब तक हम इस पृथ्वी पर जीवित हैं, हम कभी प्रलोभन से मुक्त नहीं होंगे। उत्पत्ति में, परमेश्वर ने कैन को चेतावनी दी, “पाप द्वार पर छिपा रहता है; और उसकी लालसा तेरी ओर होगी, और तुझे उस पर प्रभुता करनी है।” (उत्पत्ति 4:7)। यह एक अत्यन्त सटीक चित्रण है: पाप सदा हमारे भीतर छिपा रहता है, और हम पर झपटने के अवसर की प्रतीक्षा करता रहता है।

इसलिए संकल्प लें कि आप पाप के हर बढ़ते कदम का प्रतिकार करेंगे। यह प्रतिदिन की लड़ाई है। आज यह ठान लें कि ऐसी किसी भी वस्तु के लिए आप अपनी आँखों को भटकने नहीं देंगे, मन को विचार नहीं करने देंगे, या हृदय को आकर्षित नहीं होने देंगे, जो आपको मसीह से दूर करती है। कैसे? अपनी इच्छाओं से प्रश्न करना सीखें: “क्या यह एक ईश्वरीय इच्छा है जिसे मुझे पोषित करना चाहिए, या एक पापपूर्ण लालसा है जिससे मुझे लड़ना चाहिए?” और परमेश्वर के पूरे अस्त्र-शस्त्र पहनना सीखें: “विश्‍वास की ढाल लेकर स्थिर रहो जिससे तुम उस दुष्‍ट के सब जलते हुए तीरों को बुझा सको” (इफिसियों 6:16)। क्योंकि अपने उद्धारकर्ता और प्रभु यीशु मसीह पर विश्वास के द्वारा ही आपको स्थिर खड़े रहने का सामर्थ्य मिलता है—और जब आप गिरते हैं, तब क्षमा भी मिलती है।

1 कुरिन्थियों 10:1-13

◊ पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: एस्तेर 9–10; लूका 13:22-35