20 जून : ऊपर से मिले वरदान

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20 जून : ऊपर से मिले वरदान
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“वैसा ही हम जो बहुत हैं, मसीह में एक देह होकर आपस में एक दूसरे के अंग हैं। जबकि उस अनुग्रह के अनुसार जो हमें दिया गया है, हमें भिन्न–भिन्न वरदान मिले हैं, तो जिसको भविष्यद्वाणी का दान मिला हो, वह विश्‍वास के परिमाण के अनुसार भविष्यद्वाणी करे।” रोमियों 12:5-6

आत्मिक वरदान औजार हैं, खिलौने नहीं। इन्हें खेलने के लिए या दूसरों को हमारी ओर आकर्षित करने के लिए नहीं नहीं दिया गया है, बल्कि इन्हें परमेश्वर द्वारा हमारे माध्यम से उसके उद्देश्यों और उसकी महिमा के लिए उपयोग में लाया जाना चाहिए।

हमें जो भी वरदान मिले हैं—चाहे वह बोलने से सम्बन्धित क्षमताएँ हों या सेवा करने से—उन्हें कलीसिया की भलाई के लिए दिया गया है। परमेश्वर इन वरदानों को इस उद्देश्य से देता है कि जब हम उन्हें उसकी इच्छानुसार उपयोग करें, तो मसीह की देह समग्र रूप से मजबूत हो। ये वरदान किसी व्यक्ति के स्वार्थों को पूरा करने के लिए और महानता का प्रदर्शन करने के लिए नहीं दिए गए हैं, बल्कि इसलिए दिए गए हैं ताकि परमेश्वर के सभी लोगों की एकता, सामंजस्य, और प्रगति को सुदृढ़ किया जा सके। यही कारण है कि हमारे पास भिन्न-भिन्न वरदान होते हैं: ताकि हम एक-दूसरे की सेवा करना और एक-दूसरे पर निर्भर रहना सीख सकें।

फिर भी, परमेश्वर के वरदान केवल तब ही सामंजस्य और भलाई को बढ़ावा दे सकते हैं, जब उन्हें सच्ची विनम्रता के साथ प्रयोग किया जाता है। हर स्थानीय कलीसिया की देह उस सीमा तक ही बढ़ सकती है, जिस सीमा तक “हर एक अंग के ठीक–ठीक कार्य” करता है (इफिसियों 4:16)। अपने पाठकों को उनके वरदानों का उपयोग करने के लिए प्रेरित करने से पहले ही पौलुस ने अपने आत्मिक वरदानों पर प्रवचन का आरम्भ विनम्रता से किया था, और सबसे विनती की थी कि “जैसा समझना चाहिए उससे बढ़कर कोई भी अपने आप को न समझे; पर . . . सुबुद्धि के साथ अपने को समझे” (रोमियों 12:3)।

विनम्रता के बिना आत्मिक वरदान अराजकता की ओर ले जा सकते हैं। हम उचित निर्देश और निगरानी के बिना किशोरों को पावर टूल्स नहीं देंगे, न ही उन्हें तीव्र गति से चलने वाली आरी देने की सोचेंगे—अन्यथा इससे अराजकता फैल सकती है! इसी तरह, आत्मिक वरदानों का उपयोग उनके सही उद्देश्य और सही तरीके से किया जाना चाहिए ताकि हंगामा न हो। इसलिए पौलुस कुरिन्थियों की कलीसिया को—जो वरदानों से भरी हुई थी, लेकिन उन्हें उपयोग में लाने के लिए अनिवार्य बुद्धि की कमी से जूझ रही थी—बताता है कि जबकि आत्मिक वरदानों की इच्छा रखना और उन्हें लेकर खुश होना अच्छा है, तौभी उनका उपयोग करने का एक “उत्तम मार्ग” यह है कि हम उन्हें धैर्यपूर्वक, दयालुता से और विनम्रता—अर्थात प्रेम के साथ उपयोग किया जाए (1 कुरिन्थियों 12:31 – 13:7)।

हमें यह याद रखना चाहिए कि वरदान केवल वरदान ही होते हैं। उनका स्रोत परमेश्वर है; उन्हें अपनी सम्पत्ति मानकर घमण्ड करना मूर्खता है, इसलिए हमारे पास कोई बहाना नहीं है कि हम उन्हें अपने लाभ के लिए उपयोग करें। लेकिन यदि हम उन्हें उपयोग करते समय विनम्रता का अभ्यास करते हैं और एक-दूसरे के साथ सामंजस्य में जीने की कोशिश करते हैं, तो हम परमेश्वर के कार्य का फल अपने और दूसरों के जीवन में देखेंगे। परमेश्वर ने आपको किस तरह के वरदान दिए हैं? उनमें आनन्दित हों। वह आपको इन वरदानों का उपयोग आपकी कलीसिया की भलाई और अपने पुत्र की महिमा के लिए किस प्रकार करने के लिए बुला रहा है? जाएँ और ऐसा ही करें।

इफिसियों  4:1-16

◊ पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: यिर्मयाह 40–42; मत्ती 27:27-50

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