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21 सितम्बर : उत्पीड़न का आशीर्वाद

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21 सितम्बर : उत्पीड़न का आशीर्वाद
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“धन्य हो तुम जब मनुष्य के पुत्र के कारण लोग तुम से बैर करेंगे, और तुम्हें निकाल देंगे, और तुम्हारी निन्दा करेंगे, और तुम्हारा नाम बुरा जानकर काट देंगे। उस दिन आनन्दित होकर उछलना, क्योंकि देखो, तुम्हारे लिए स्वर्ग में बड़ा प्रतिफल है; उनके बाप–दादे भविष्यद्वक्‍ताओं के साथ भी वैसा ही किया करते थे।” लूका 6:22-23

यह एक ऐसी सच्चाई है, जो हममें से लगभग सभी को सहज रूप से स्पष्ट लगती है कि यह अत्यन्त महत्वपूर्ण है कि लोग हमें पसन्द करें। इसलिए यह बात हमें हैरान कर देती है जब हम यह सुनते हैं कि यीशु ने स्पष्ट रूप से यह सिखाया कि जब लोग “मनुष्य के पुत्र के कारण” हमें तिरस्कृत करें, बहिष्कृत करें, और अपमानित करें, तब हम धन्य हैं।

यह विरोध और निन्दा केवल इसलिए होती है क्योंकि हमारा सम्बन्ध यीशु मसीह से है। वास्तव में, यीशु ने यह स्पष्ट किया कि जो भी उसका अनुसरण करेगा, उसे यह संसार अस्वीकार करेगा। यह सत्य उसने अन्य स्थानों पर भी सिखाया है। उदाहरण के लिए, जब उसने अपने क्रूस पर चढ़ाए जाने से एक रात पहले अपने चेलों को याद दिलाया कि यदि संसार तुम से बैर रखता है, तो यह जान लो कि उसने तुमसे पहले मुझसे बैर रखा है, और यदि उन्होंने मेरे साथ ऐसा किया, तो वे तुम्हारे साथ भी ऐसा करेंगे (यूहन्ना 15:18-20)।

हो सकता है आपने खुद भी इस प्रकार के सताव का अनुभव किया हो—शायद स्कूल में आपने बाइबल का पक्ष लिया और फिर अचानक आप अपने दोस्तों से अलग कर दिए गए। या किसी दोस्त को यीशु के बारे में समझाने के कारण आपको उनके समूह से निकाल दिया गया, या कार्यस्थल पर पदोन्नति से वंचित कर दिया गया क्योंकि आपने मसीह की साक्षी दी कि वह कौन था, उसकी मृत्यु कैसे हुई, और इन सब के क्या मायने हैं। शायद आपके परिवार के ही किसी सदस्य ने आपके विश्वास के कारण आपको ठुकरा दिया। जब आप मसीह के लिए खड़े होते हैं, तो धीरे-धीरे लेकिन स्पष्ट रूप से लोगों की नाराजगी, नफरत और उपेक्षा सामने आने लगती है। यह आसान नहीं होता। अपमानित या अकेला महसूस करना कोई सुखद अनुभव नहीं है, विशेषकर जब आप परमेश्वर की आज्ञाकारिता में जी रहे हों। अस्वीकृति का दर्द वास्तविक होता है। तो ऐसे में हम कैसे आशीष और सान्त्वना पा सकते हैं?

हमें यीशु की कही हुई इस सच्चाई को थामे रहना है: जब संसार की नफ़रत हमारे प्रति केवल इस कारण प्रकट होती है कि हम “मनुष्य के पुत्र,” अर्थात यीशु मसीह के प्रति विश्वासयोग्य हैं—तो इसका अर्थ यह नहीं कि कुछ गलत हुआ है। बल्कि वहीं पर हमें पता चलता है कि आशीष क्या होती है। और यह इस बात का स्पष्ट प्रमाण है कि हमारा विश्वास वास्तविक है और हमारा प्रभु से जीवित सम्बन्ध है। इसके अतिरिक्त, यीशु ने यह भी प्रतिज्ञा की है कि यदि हम मनुष्यों के सामने उसका अंगीकार करेंगे, तो वह भी इसके विषय में अपने स्वर्गिक पिता के सामने हमारा अंगीकार करेगा। (मत्ती 10:32)

जो व्यक्ति पवित्र जीवन जीता है—जो साहस के साथ परमेश्वर के वचन को बोलता और मानता है और जो यह दिखाने का प्रयास नहीं करता कि वह एक साथ आज्ञाकारी और लोकप्रिय बना रह सकता है—वह एक दिन अनिवार्य रूप से इस संसार के पापपूर्ण मार्ग से टकराएगा और विरोध झेलेगा। अब प्रश्न यह है: क्या आप किसी को मसीह के बारे में बताने, या मसीह के लिए जीवन जीने के कारण अस्वीकृति का जोखिम उठाने को तैयार हैं? हतोत्साहित न हों! जब लोग आपके विरुद्ध झूठ बोलें, आपको नापसन्द करें, या तिरस्कार करें—केवल इस कारण कि आप सुसमाचार पर विश्वास रखते हैं—तो प्रसन्न हों, क्योंकि जैसा यीशु ने कहा: “देखो, तुम्हारे लिए स्वर्ग में बड़ा प्रतिफल है।” यह संसार जो कुछ भी देता है, वह उस प्रतिफल के सामने कुछ भी नहीं है।

दानिय्येल 3 पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: यहेजकेल 3–4; यूहन्ना 9:1-23 ◊

20 सितम्बर : स्वीकार करना कि हम दीन हैं

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20 सितम्बर : स्वीकार करना कि हम दीन हैं
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“तब उसने अपने चेलों की ओर देखकर कहा, ‘धन्य हो तुम जो दीन हो, क्योंकि परमेश्‍वर का राज्य तुम्हारा है।’” लूका 6:20

यीशु उस वस्तु को महत्त्व देता है जिसे संसार तुच्छ समझता है, और जिसे संसार सराहता है, उसे यीशु अस्वीकार करता है।

यही है धन्य-वचनों की सबसे बड़ी चुनौती, और विशेष रूप से तब जब यीशु धन-सम्पत्ति के विषय में सिखाता है। हम एक ऐसे संसार में जीते हैं जो हमें लगातार यह कहता है कि हम अपनी पहचान विशेष रूप से वित्तीय सफलता और भौतिक सुख-सुविधाओं में खोजें। आराम और सुविधा इस उपभोक्तावादी संस्कृति का राजा है—और यह संस्कृति वह जल है, जिसमें हम सब तैर रहे हैं।

इसलिए यीशु के इस उपदेश के आरम्भिक शब्द हमें चुनौती देते हैं: “धन्य हो तुम जो दीन हो।” वह क्या कहना चाह रहा है? क्या वह सिखा रहा है कि दीन-दरिद्रता उद्धार की कुंजी है? बिल्कुल नहीं! बल्कि वह यह समझा रहा है कि जो व्यक्ति अपनी आत्मिक दरिद्रता को पहचान लेता है, वही परमेश्वर के राज्य में प्रवेश करता है।

कुछ लोग दावा करते हैं कि यीशु का अर्थ यह है कि यदि आप दरिद्र हैं, तो आपको अत्यन्त प्रसन्न होना चाहिए क्योंकि आप स्वर्ग के राज्य में स्वाभाविक रूप से ही प्रवेश कर जाते हैं। लेकिन इस प्रकार की दरिद्रता परमेश्वर के राज्य में प्रवेश की कुंजी नहीं है और न ही धन-सम्पत्ति किसी के बाहर रह जाने का मुख्य कारण है। वास्तविकता तो यह है कि दरिद्र और धनवान—दोनों को ही जब यह अहसास होता है कि उन्हें उनके पापों के लिए क्षमा की आवश्यकता है और जब वे यीशु मसीह पर विश्वास करते हैं, तभी वे परमेश्वर के राज्य में प्रवेश पाते हैं। यदि ऐसा न होता, तो फिलिप्पी में रहने वाली एक समृद्ध व्यापारी स्त्री लुदिया कभी सुसमाचार की सच्चाई को न समझ पाती (प्रेरितों 16:11-15)। नहीं, आवश्यक यह है कि हम मसीह के बिना अपनी आत्मिक दरिद्रता को पहचानें।

हालाँकि यह समझना भी आवश्यक है कि वित्तीय दरिद्रता आत्मिक आशीष का माध्यम बन सकती है। दरिद्रता अक्सर मनुष्यों को परमेश्वर पर सम्पूर्ण निर्भरता की ओर ले जाती है—न केवल भौतिक आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए, बल्कि आत्मिक आशिषों के लिए भी। यही कारण है कि दरिद्र वर्ग में सुसमाचार को लेकर अधिक सकारात्मक और विनम्र प्रतिक्रिया देखने को मिलती है, जबकि भौतिक समृद्धि हमारी गहरी आत्मिक आवश्यकता को, अर्थात् परमेश्वर के राज्य में प्रवेश पाने की आवश्यकता को ढँक सकती है। धन अक्सर गर्व के पनपने की भूमि बन जाता है, जहाँ हृदय यह भूल जाता है कि चाहे धनवान हो या दरिद्र, “वह घास के फूल की तरह जाता रहेगा” (याकूब 1:10)।

जैसा कि जॉन कैल्विन ने कहा: “वही व्यक्ति आत्मा में दरिद्र होता है, जो अपने आप को पूरी तरह शून्य समझता है और केवल परमेश्वर की दया पर निर्भर रहता है।” दरिद्रता के साथ कठिनाइयाँ आती हैं, लेकिन क्या आपने कभी यह सोचा है कि धन के साथ भी परीक्षाएँ आती है—जैसे कि अहंकार, आत्मनिर्भरता और आत्मिक सुस्ती की परीक्षा?

तो क्या हम अपनी आत्मिक दरिद्रता को स्वीकार करने के लिए तैयार हैं? या क्या हम अपनी सांसारिक समृद्धि में पूर्णतः आत्म-निर्भर और आत्म-सन्तुष्ट हो गए हैं? इन प्रश्नों का सच्चा उत्तर जानने का एक तरीका यह है: क्या आपका हृदय नीतिवचन में आगूर की इस प्रार्थना को दोहरा सकता है—“मुझे न तो निर्धन कर और न धनी बना” (नीतिवचन 30:8)?

लूका 6:20-36

◊ पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: यहेजकेल 1–2; यूहन्ना 8:30-59

19 सितम्बर : दिल से किया गया बलिदान

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19 सितम्बर : दिल से किया गया बलिदान
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विश्‍वास ही से हाबिल ने कैन से उत्तम बलिदान परमेश्‍वर के लिए चढ़ाया, और उसी के द्वारा उसके धर्मी होने की गवाही भी दी गई, क्योंकि परमेश्‍वर ने उसकी भेंटों के विषय में गवाही दी।” इब्रानियों 11:4

वह क्या है जो हमारे कार्यों को परमेश्वर के लिए सराहनीय बनाता है?

उत्पत्ति 4 में इस संसार में सबसे पहले जन्मे दो पुत्रों—कैन और हाबिल—की कहानी बताई गई है: “कुछ दिनों के पश्चात कैन यहोवा के पास भूमि की उपज में से कुछ भेंट ले आया, और हाबिल भी अपनी भेड़–बकरियों के कई एक पहलौठे बच्चे भेंट चढ़ाने ले आया और उनकी चर्बी भेंट चढ़ाई; तब यहोवा ने हाबिल और उसकी भेंट को तो ग्रहण किया, परन्तु कैन और उसकी भेंट को उसने ग्रहण न किया” (उत्पत्ति 4:3-5)। इसी बलिदान का उल्लेख इब्रानियों का लेखक करता है जब वह हाबिल और उसके विश्वास के बारे में हमें बताता है।

सबसे पहले वह यह कहता है कि “विश्वास से” ही हाबिल ने अपने भाई से उत्तम बलिदान चढ़ाया। और इसी बलिदान के कारण हाबिल “धर्मी ठहराया गया।” यदि हम यह अनुमान लगाते रहेंगे कि क्यों परमेश्वर ने हाबिल की भेंट को स्वीकार किया और कैन की भेंट को नहीं, तो हम खो जाएँगे। लेकिन हमें उन तथ्यों पर ध्यान देना चाहिए जो स्पष्ट रूप से बताए गए हैं—और जो जानकारी हमें दी गई है, उसका केन्द्र में यह तथ्य सुस्पष्ट रीति से बताया गया है: परमेश्वर हमारे कार्यों को इसलिए स्वीकार नहीं करता कि वे बाहरी रूप से कितने बड़े या प्रभावशाली हैं, बल्कि इसलिए क्योंकि वे एक आज्ञाकारी और समर्पित हृदय की सच्ची अभिव्यक्ति होते हैं।

हाबिल की भेंट इसलिए स्वीकार नहीं की गई थी क्योंकि वह पशु की बलि थी, जबकि कैन की भेंट पौधों की उपज थी। अन्तर भेंटों में नहीं, बल्कि भेंट चढ़ाने वालों में था। जॉन कैल्विन इस पर टिप्पणी करते हैं कि हाबिल की भेंट को इसलिए ग्रहण किया गया क्योंकि वह “विश्वास के द्वारा पवित्र की गई” थी।[1]

यह सिद्धान्त वही है, जो परमेश्वर ने अपने भविष्यद्वक्ताओं के द्वारा भी स्पष्ट किया है। उदाहरण के लिए, वह यशायाह में कहता है: “व्यर्थ अन्नबलि फिर मत लाओ; धूप से मुझे घृणा है। नए चाँद और विश्रामदिन का मनाना, और सभाओं का प्रचार करना, यह मुझे बुरा लगता है। महासभा के साथ ही साथ अनर्थ काम करना मुझसे सहा नहीं जाता” (यशायाह 1:13)। यह ऐसा है मानो परमेश्वर कह रहा हो: मुझे बछड़ों, बकरों और मेमनों की मिमियाहट में कोई रुचि नहीं है। मैं बलिदान से अधिक आज्ञाकारिता की लालसा करता हूँ (1 शमूएल 15:22 देखें)। यदि तुम इन कार्यों पर इस आशा से निर्भर हो कि वे तुम्हें मेरे लिए ग्रहणयोग्य बना देंगे, तो मैं तुम्हें यह स्पष्ट कर देना चाहता हूँ कि ऐसा कभी नहीं होगा।

“विश्वास बिना उसे प्रसन्न करना अनहोना है” (इब्रानियों 11:6)। हमारे अच्छे कार्य परमेश्वर के सामने स्वीकृति पाने का माध्यम नहीं हैं, बल्कि वे उस स्वीकृति का फल हैं जो हमें विश्वास के द्वारा मिलती है। वे हमारी ओर से परमेश्वर के प्रेम का प्रत्युत्तर हैं, न कि उसके प्रेम को पाने का साधन। यदि आपके कार्य—हाबिल के समान—परमेश्वर की महिमा और प्रसन्नता के कारण बनते हैं, तो यह केवल इसलिए होगा क्योंकि वे आपके प्रेम, समर्पण और व्यक्तिगत विश्वास की बाहरी अभिव्यक्ति हैं। इसलिए आज, परमेश्वर की आज्ञाओं का पालन इस उद्देश्य से न करें कि आप उसके द्वारा स्वीकृत किए जाएँ या उसकी स्वीकृति बनाए रखें। वह स्वीकृति तो विश्वास के द्वारा पहले ही मिल चुकी है। साथ ही, इस कारण लापरवाही भी न बरतें कि आप पहले से ही स्वीकृत हैं। बल्कि, उसके प्रेम में अपनी स्थिति का आनन्द लें—और यही आनन्द आपकी आज्ञाकारिता के पीछे की प्रेरणा बने।

  यशायाह 1:10-20

पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: आमोस 7–9; यूहन्ना 8:1-29 ◊


[1] कॉमैणट्रीज़ ऑन दि एपिस्ट्ल ऑफ पॉल दि अपोस्ट्ल टू द हिब्रूज़, अनुवादक जॉन ओवेन (कैल्विन ट्रांसलेशन सोसायटी, 1853), पृ. 267.

18 सितम्बर : अब और सदा के लिए

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18 सितम्बर : अब और सदा के लिए
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“फिर मैंने नए आकाश और नयी पृथ्वी को देखा, क्योंकि पहला आकाश और पहली पृथ्वी जाती रही थी, और समुद्र भी न रहा।” प्रकाशितवाक्य 21:1

यीशु मसीह की वापसी के बारे में हम क्या जानते हैं? बाइबल हमें कुछ बातें बताती है, जो सीधी और स्पष्ट हैं। हम जानते हैं कि यीशु व्यक्तिगत रूप से, शारीरिक रूप से, दृश्यमान रूप से और महिमामय रूप से लौटेगा। हम यह भी जानते हैं कि उसके पुनः प्रकट होने का समय गुप्त होगा, यह अचानक होगा, और यह उन लोगों के बीच विभाजन लाएगा जो उसकी प्रतीक्षा कर रहे हैं और जो उसे अस्वीकार कर रहे हैं।

इसके अलावा, जैसा कि पहले शताब्दी में कष्ट सहने वाले संतों को प्रकाशितवाक्य की पुस्तक में बताया गया था, वही आज हमें भी बताया जा रहा है: हमें इस संसार की समस्याओं से घबराना नहीं चाहिए, क्योंकि सब कुछ यीशु के नियन्त्रण में है। मसीह का राज्य तब पूर्ण रूप से स्थापित हो जाएगा, जब उसका राज्य सम्पूर्ण और स्थाई रूप में आएगा और उसकी वापसी एक नए स्वर्ग और नई पृथ्वी का आरम्भ करेगी।

यह विचार कि स्वर्ग पृथ्वी पर आ सकता है—कि एक दिन “नया यरूशलेम स्वर्ग से परमेश्‍वर के पास से” उतरेगा (प्रकाशितवाक्य 21:2)—यह विचार आधुनिक संसार के कई दृष्टिकोणों में, विशेषकर पश्चिमी संस्कृति में, अपूर्ण रूप से झलकता है। हमारी संस्कृति स्वाभाविक रूप से आत्मविश्वासी है, इसलिए यह थोड़ी सी और शिक्षा, थोड़े से और सामाजिक कल्याण और दूसरों के प्रति थोड़ी सी और संवेदनशीलता के जरिए इस संसार को सुधारने का प्रयास करती है। लेकिन मनुष्य द्वारा बनाई गई कोई भी योजना उस वास्तविक पुनर्स्थापना को नहीं ला सकती, जिसकी हमारे संसार को ज़रूरत है। मानवीय प्रयास चीज़ों को बेहतर बना सकते हैं, परन्तु उन्हें सिद्ध नहीं कर सकते। स्वर्ग तब तक पृथ्वी पर नहीं आएगा, जब तक मसीह स्वयं वापिस नहीं आता। सृष्टि इस समय पाप की पकड़ में जकड़ी हुई है, और अन्त में केवल परमेश्वर ही इसे पूरी तरह सुधार सकता है— और वह ऐसा अवश्य करेगा—जब उसकी प्रजा मेमने के सामने दण्डवत करेगी और उसकी स्तुति करेगी।

फिलहाल, आप और मैं एक परदेशी भूमि में निर्वासितों के समान जी रहे हैं। हम ऐसे संसार में रह रहे हैं, जो मसीह का विरोधी है, उसके वचन का विरोधी है और उस जीवन का विरोधी है जो उसकी आज्ञाकारिता में जीया जाता है। विश्वासियों के रूप में हमारे लिए यह प्रलोभन आता है कि हम भाग जाएँ और छिप जाएँ—एक छोटी-सी “पवित्र मण्डली” बनाकर संसार से खुद को अलग कर लें और उसकी चिन्ता न करें। लेकिन जैसा कि यिर्मयाह ने बेबीलोन में निर्वासित लोगों से कहा था कि वे उस नगर की भलाई की खोज करें जिसमें वे रह रहे हैं (यिर्मयाह 29:7), उसी प्रकार हमें भी उस संसार की भलाई की खोज करनी है, जिसमें हम रह रहे हैं। इसका अर्थ यह है कि हम इस संसार में तो रहें, परन्तु इसके जैसे न बनें—ऐसा जीवन जीएँ और ऐसे वचन बोलें जो एक भिन्न स्थान की ओर इशारा करते हैं।

मसीह की—जो कि क्रूस पर मरा, मरे हुओं में से जी उठा, अब राज्य कर रहा है और एक दिन लौटकर आएगा—विजयी कहानी में आनन्दित होना ही हमें यह साहस देता है कि हम इस संसार से आगे देख सकें। उसकी वापसी की आशा और उसकी उपस्थिति में अनन्त जीवन की आशा ही वह उत्तम प्रेरणा है, जो हमें लगातार पवित्र जीवन जीने और उसके नाम में उत्साह के साथ सुसमाचार प्रचार के लिए प्रेरित करती है। अब विश्वास की दृष्टि से उसके लौटने की आशा करें—और फिर आज उठकर अपने आस-पास के लोगों की भलाई के लिए जीवन जीएँ।

1 कुरिन्थियों 15:50-58

◊ पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: आमोस 4– 6; यूहन्ना 7:28-53

17 सितम्बर : कोई और नहीं है

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17 सितम्बर : कोई और नहीं है
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“मेरी ओर फिरो और उद्धार पाओ! क्योंकि मैं ही परमेश्‍वर हूँ और दूसरा कोई और नहीं है।” यशायाह 45:22

हर दिन, जैसे ही भोर होता है, भारत में गंगा के किनारे पूजा करने के लिए भीड़ उमड़ पड़ती है और सूर्योदय का स्वागत करती है। कई लोग अपने प्रियजनों की अस्थियाँ पानी में प्रवाहित करते हैं, ताकि वे अपनी शाश्वत सुख-शान्ति प्राप्त कर सकें। भारत के करोड़ों हिन्दुओं की तरह ये पुरुष और महिलाएँ मानते हैं कि “भगवान” हर चीज़ में विद्यमान है।

हालाँकि हम लोग ऐसी पूजा के दृश्यों और स्वरों से बहुत दूर हैं, लेकिन एक अन्य भाव में हम इसके कहीं ज़्यादा क़रीब हैं, जिसे हम स्वीकार नहीं करना चाहते।

हमारी अपनी संस्कृति में देखें तो आप पाएँगे कि मूर्तिपूजा और उसकी सूक्ष्मताएँ अब भी उतनी ही प्रचलित हैं, जितनी पहले थीं। यह धारणा में पाई जाती है कि इसका कोई महत्त्व नहीं है कि आप क्या मानते हैं, क्योंकि दुनिया के सारे बड़े धर्म “मूल बातों पर सहमत हैं।” मसीहत के भ्रष्ट और विकृत रूपों की भरमार पाई जाती है, क्योंकि हम अपने अनुसार बनाए गए एक “ईश्वर” की पूजा करने में माहिर हैं—एक ऐसा ईश्वर जो संयोगवश हमारी इच्छाओं के अनुकूल होता है और हमारे निर्णयों से सहमत रहता है। इसी तरह, सतही प्रकार के ‘सर्वेश्वरवाद’ (Panentheism) की झलक हमें आलीशान स्पा और योगा कक्षाओं में मिल सकती है, क्योंकि हम अपने आप को और अपने शरीर को भी एक देवता मानने में बड़े कुशल हैं।

असल में, हमारे पास सैकड़ों प्रतिस्थापित देवता हैं—ऐसी मूर्तियाँ जो हमें स्वतन्त्रता का वादा करती हैं, लेकिन वास्तव में हमें तुच्छ और बन्धक बना देती हैं। यदि आप सेक्स की पूजा करते हैं, तो यह आपकी प्रेम करने या प्रेम प्राप्त करने की क्षमता को नष्ट कर देगा। शराब की पूजा करें, तो यह आपको जकड़ लेगी। पैसे की पूजा करें, तो यह आपको निगल जाएगा। अपने परिवार की पूजा करें और आप (या वे) अधूरी उम्मीदों के बोझ तले टूट जाएँगे। किसी भी प्रतिस्थापित देवता की पूजा करें और आप पाएँगे कि वह सन्तुष्टि नहीं दे सकता।

जब हम मूर्तिपूजा में धीरे-धीरे और गहराई से उलझते जाते हैं, तो इसके परिणामस्वरूप बाइबल में हमारा विश्वास कम होता जाता है—उस बाइबल में जो परमेश्वर का अचूक वचन है। जब ऐसा होता है, तो यीशु नासरी के विशेष और अनन्य दावों की सीधी घोषणा के लिए कोई स्थान नहीं रह जाता—कि वह त्रिएक परमेश्वरत्व का दूसरा व्यक्ति है, सृष्टिकर्ता है, पुनरुत्थित प्रभु है, स्वर्गारोहित राजा है, और—एक दिन—लौटने वाला मसीह है। इसलिए यह परमेश्वर की कृपा का कार्य है—भले ही एक विचलित कर देने वाला कार्य हो—कि वह अपने वचन में कहता है: मैं सब लोगों को, हर जगह, यह आज्ञा देता हूँ कि वे पश्चाताप करें, अपनी निरर्थक मूर्तियों से मुड़ें, और मेरी—सृष्टिकर्ता, पालनहार, शासक, पिता और न्यायी की—उपासना करें (प्रेरितों 17:30 देखें)।

आपके हृदय की उस निरन्तर इच्छा का इलाज क्या है, जो बार-बार उन मूर्तियों की ओर झुकती है जो प्रभु का अपमान करती हैं और उद्धार नहीं कर सकतीं? उत्तर बहुत सरल है: “हे पृथ्वी के दूर-दूर के देश के रहने वालो, तुम मेरी ओर फिरो और उद्धार पाओ! क्योंकि मैं ही परमेश्‍वर हूँ और दूसरा कोई और नहीं है।” उन मूर्तियों की पहचान करें जिनकी उपासना करने की ओर आपका मन झुकता है—और फिर उन्हें उस सृष्टिकर्ता और सम्पूर्ण सृष्टि के पालनहार के सामने रखकर देखें। वह परमेश्वर है, वे नहीं हैं। वह उद्धार कर सकता है, वे नहीं कर सकते। फिर से उनसे मुड़ें, और उसकी ओर लौट आएँ।

यशायाह 45:18-25

पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: आमोस 1–3; यूहन्ना 7:1-27 ◊

16 सितम्बर : अनन्त लाभ

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16 सितम्बर : अनन्त लाभ
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“यह नहीं कि मैं दान चाहता हूँ परन्तु मैं ऐसा फल चाहता हूँ जो तुम्हारे लाभ के लिए बढ़ता जाए। मेरे पास सब कुछ है, वरन् बहुतायत से भी है; जो वस्तुएँ तुम ने इपफ्रुदीतुस के हाथ से भेजी थीं उन्हें पाकर मैं तृप्त हो गया हूँ, वह तो सुखदायक सुगन्ध, ग्रहण करने योग्य बलिदान है, जो परमेश्‍वर को भाता है।” फिलिप्पियों 4:17-18

फिलिप्पी की कलीसिया को पत्र लिखते हुए पौलुस ने यह कहने के लिए कि “आपकी वित्तीय सहायता के लिए धन्यवाद,” जिस तरीके का उपयोग किया, वह एकदम अनोखा था: वह कहता है कि उनकी उदारता ने उसे इस कारण से प्रसन्न नहीं किया कि उनका उपहार उसके लिए क्या मायने रखता था, बल्कि इसलिए कि वह उनके लिए अर्थात उपहार देने वालों के लिए क्या मायने रखता है। वह उन्हें बताता है कि उनका दान उनके स्वयं के लिए अधिक लाभकारी होगा, न कि उसके अपने लिए अर्थात प्राप्त करने वाले के लिए!

पौलुस की खुशी उनकी उदारता को लेकर इस आश्वासन से उत्पन्न हुई कि उनके लिए यह अनन्तकाल के लिए लाभकारी होगा। उसका यह विश्वास यीशु की शिक्षा पर आधारित था। उदाहरण के लिए, लूका के सुसमाचार में पतरस ने यीशु से कहा था, “देख, हम तो घर-बार छोड़कर तेरे पीछे हो लिए हैं” (लूका 18:28)। हम ठीक-ठीक नहीं जानते कि पतरस ने यह बात किस उद्देश्य से कही थी, लेकिन हम यीशु का उत्तर अवश्य जानते है: उसने कहा, “ऐसा कोई नहीं जिसने परमेश्‍वर के राज्य के लिए घर, या पत्नी, या भाइयों, या माता–पिता, या बाल–बच्चों को छोड़ दिया हो; और इस समय कई गुणा अधिक न पाए और आने वाले युग में अनन्त जीवन” (लूका 18:29-30)। यीशु यह कह रहा था कि पतरस और अन्य चेलों ने यह सब छोड़ा नहीं था, बल्कि अपने भविष्य के लिए निवेश किया था।

बाइबल वर्तमान समय और अनन्तकाल की निकटता—दोनों के बारे में पूर्णतः स्पष्ट है। हम अक्सर ऐसे जीने लग जाते हैं जैसे अनन्तकाल का हमारे देने, सोचने और जीने के तरीके पर कोई असर ही नहीं होता। लेकिन सच्चाई यह है कि अनन्तकाल हममें से हर एक के लिए बस एक श्वास की दूरी पर हो सकता है और इस क्षणभंगुर जीवन की तुलना में कहीं अधिक लम्बा है। इसलिए यह उपयुक्त है कि हम इस दृष्टिकोण से दें कि उसका प्रतिफल हमें अनन्त जीवन में समृद्ध रूप से मिलेगा।

हमारे द्वारा खुले हाथों से देने की क्षमता और अनन्तता को ध्यान में रखते हुए देने की प्रेरणा, परमेश्वर की स्वयं की उदारता में निहित है, जो सबसे महान दाता है। शायद सबसे बड़ी गलती जो हम देने में कर सकते हैं वह यह है कि हम कुछ भी न दें। हमें यह सोचने का प्रलोभन हो सकता है कि हम देने का सामर्थ्य नहीं रखते—लेकिन सच्चाई यह है कि हम न देने का जोखिम नहीं उठा सकते! जैसे यीशु हमें स्नेहपूर्वक वचन देता है, “दिया करो, तो तुम्हें भी दिया जाएगा। लोग पूरा नाप दबा दबाकर और हिला हिलाकर और उभरता हुआ तुम्हारी गोद में डालेंगे, क्योंकि जिस नाप से तुम नापते हो, उसी से तुम्हारे लिए भी नापा जाएगा” (लूका 6:38)।

इसलिए अपनी निवेशों पर विचार करें—रिटायरमेंट की योजनाओं, शेयर बाजार, या कॉलेज फंड में नहीं, बल्कि उस प्रकार के भुगतान में जो अनन्त जीवन में “आपके खाते में बढ़ता जाएगा।” सुसमाचार के लिए देने में महान लाभ है। आने वाले जीवन को अपने आज के खर्चों पर निर्णायक प्रभाव डालने दें और आप पाएँगे कि आप उदारता से और खुशी से देने वाले बन गए हैं।

2 कुरिन्थियों 8:1-15

◊ पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: विलापगीत 3–5; यूहन्ना 6:52-71

15 सितम्बर : कमजोरी का लाभ

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15 सितम्बर : कमजोरी का लाभ
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“यह जो बड़ी भीड़ हम पर चढ़ाई कर रही है, उसके सामने हमारा तो बस नहीं चलता और हमें कुछ सूझता नहीं कि क्या करना चाहिए? परन्तु हमारी आँखें तेरी ओर लगी हैं।” 2 इतिहास 20:12

अपनी अक्षमताओं को देखने के लिए हमें ज्यादा मेहनत नहीं करनी पड़ती—विशेषकर जब हम परमेश्वर के लिए जीने और उसकी सेवा करने की बात करें। जब जीवन की परिस्थितियाँ हम पर दबाव डालती हैं, तो हम अपने सामने खड़ी चुनौती की तीव्रता से महसूस करते हैं और जल्दी ही अपने आप को उससे पीछे हटते हुए पाते हैं। हम लोगों से यह सुनते-सुनते थक जाते हैं कि हम क्या कर सकते हैं, जबकि हमें यह पता होता है कि हम वह नहीं कर सकते; लेकिन हम एक ऐसे संसार में अपनी कमजोरी का सामना करने के लिए तैयार नहीं होते, जो हमें मजबूत और आत्मविश्वासी होने के लिए कहता रहता है। यदि आप स्वयं को इस स्थिति में पाते हैं, तो हिम्मत रखें। आप अकेले नहीं हैं।

यहूदा का राजा यहोशापात एक असाधारण व्यक्ति था, जिसने ऐसे बदलाव लागू किए जिन्होंने परमेश्वर के लोगों को परमेश्वर के व्यवस्था-विधान को फिर से खोजने में मदद की (2 इतिहास 19)। उसने उन्हें परमेश्वर के वचन को समझने और पालन करने के महत्त्व की याद दिलाई, ताकि वे परमेश्वर की सेवा विश्वासपूर्वक, पूरे दिल से और साहसिक रूप से कर सकें।

फिर भी, यहोशापात डर से अछूता नहीं था। जब यहूदा के शत्रुओं ने उसके देश को धमकी दी, तो वह अपनी जनता की अक्षमता और अपने शत्रुओं की श्रेष्ठता से भली-भाँति परिचित था। लेकिन उसे यह भी पता था कि अक्षमता का सही उत्तर पूरी तरह से परमेश्वर पर निर्भर होना था। जब उसने अपनी शक्ति की कमी और अनिश्चितता का सामना किया, तो उसने अपनी दृष्टि को ऊपर की ओर रखा और प्रार्थना की, “हमें कुछ सूझता नहीं कि क्या करना चाहिए, परन्तु हमारी आँखें तेरी ओर लगी हैं।”

जब शत्रु हमें यह कहकर चुप कराना चाहता है कि हम डरपोक हैं या पूरी तरह से बेकार हैं, तो हम उसके झूठ का सामना परमेश्वर के वचन के सत्य से कर सकते हैं और अपने आप से कह सकते हैं, “मुझे इस बात का भरोसा है कि जिसने तुममें अच्छा काम आरम्भ किया है, वही उसे यीशु मसीह के दिन तक पूरा करेगा” (फिलिप्पियों 1:6)। जब हम महसूस करते हैं कि हम प्रलोभन के खिलाफ लड़ाई में शक्तिहीन हैं, तो हम परमेश्वर के वचन के सत्य पर विश्राम कर सकते हैं और स्वयं से कह सकते हैं, “परमेश्‍वर सच्चा है और वह तुम्हें सामर्थ्य से बाहर परीक्षा में न पड़ने देगा, वरन् परीक्षा के साथ निकास भी करेगा कि तुम सह सको” (1 कुरिन्थियों 10:13)। जब हमें लगता है कि हमें अकेला छोड़ दिया गया है, तो हम आश्वस्त हो सकते हैं कि “उसने आप ही कहा है, ‘मैं तुझे कभी न छोड़ूँगा, और न कभी तुझे त्यागूँगा’” (इब्रानियों 13:5)।

जब हम अपनी कमजोरी को स्वीकार करते हैं, तो हमारा सामर्थी उद्धारकर्ता उसे हमारे भले और उसकी महिमा के लिए इस्तेमाल करेगा। जब हमें यह नहीं पता होता कि क्या करें, हम अपनी आँखें उस पर रख सकते हैं और उससे मार्गदर्शन और छुटकारे के लिए प्रार्थना कर सकते हैं, जैसे उसने यहोशापात और सम्पूर्ण यहूदा के लिए किया था (2 इतिहास 20:14-17, 22-25)।

जैसा कि बाइबल में परमेश्वर की सेवा करने वाले पुरुषों और महिलाओं के साथ हुआ, वैसे ही आज भी परमेश्वर अप्रत्याशित, संकोची और हिचकिचाने वाले लोगों को इस्तेमाल करना पसन्द करता है। जिस बात ने इन व्यक्तियों को अन्य सभी से अलग किया, वह उनकी ताकत, क्षमता या आत्मविश्वास नहीं था, बल्कि यह था कि वे अपनी कमजोरियों से हार नहीं गए थे; इसके बजाय, उन्होंने अपनी कमजोरियों को अपनाया और परमेश्वर की शक्ति पर निर्भर होकर उन्हें पार किया।

क्या आप भी ऐसा करेंगे?

1 इतिहास 20

पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: विलापगीत 1–2; यूहन्ना 6:22-51 ◊

14 सितम्बर : सेवा में साझेदारी

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“भाई अपुल्लोस से मैं ने बहुत विनती की है कि तुम्हारे पास भाइयों के साथ जाए।” 1 कुरिन्थियों 16:12

मसीह की देह एक व्यक्ति के अकेले काम करने की जगह नहीं है, विशेषकर सेवाकार्य के काम में। मसीही जीवन एक टीम का खेल है, कोई प्रतियोगिता नहीं। प्रेरित पौलुस आरम्भिक कलीसियाओं को लिखे अपने पत्रों में हमें इस बारे में बार-बार याद दिलाता है।

कुरिन्थियों की कलीसिया के आरम्भ में ही पौलुस जान गया था कि इस तरह के संघर्षों से खतरा हो सकता है और कुछ लोग अपुल्लोस की देखभाल को उसकी स्वयं की देखभाल से अधिक पसन्द करते थे (1 कुरिन्थियों 3:3-7)। यदि पौलुस अपने स्वयं के हितों का ध्यान रखता और अपनी प्रतिष्ठा को बढ़ाने और कलीसिया को अपनी ओर खींचने के लिए काम करता, तो वह यह सुनिश्चित करता कि अपुल्लोस कभी कुरिन्थुस वापस नहीं लौटता। लेकिन हम पढ़ते हैं कि उसने ऐसा नहीं किया। बल्कि उसने इसके विपरीत किया। वह केवल यही चाहता था कि परमेश्वर का लोग सेवा प्राप्त करें। वह जानता था कि सेवाकार्य एक साझा प्रयास होना चाहिए।

परमेश्वर ने प्रारम्भिक कलीसिया में सेवाकार्य की टीम को अद्‌भुत तरीकों से तैयार किया। उदाहरण के लिए, तीमुथियुस को लें। पौलुस ने कुरिन्थियों से कहा, “यदि तीमुथियुस आ जाए, तो देखना कि वह तुम्हारे यहाँ निडर रहे; क्योंकि वह मेरे समान प्रभु का काम करता है। इसलिए कोई उसे तुच्छ न जाने, परन्तु उसे कुशल से इस ओर पहुँचा देना कि मेरे पास आ जाए; क्योंकि मैं उसकी बाट जोह रहा हूँ कि वह भाइयों के साथ आए” (1 कुरिन्थियों 16:10-11)। कई लोगों के लिए, तीमुथियुस सेवा के लिए अपर्याप्त प्रतीत हो सकता था: वह स्वभाव से संकोची था (शायद यही कारण था कि पौलुस ने कलीसिया को उसका अच्छे से स्वागत करने की याद दिलाई), शारीरिक रूप से कमजोर था (उसे अपने पेट के लिए थोड़ा दाखरस पीने के लिए जाना जाता था), और अधिकांश साथियों से उम्र में छोटा था (1 तीमुथियुस 4:12; 5:23)। लेकिन पौलुस जानता था कि परमेश्वर ने तीमुथियुस को एक कार्य सौंपा था, और वह उसे पूरा करने में उसकी मदद करना चाहता था।

कई अन्य पुरुषों और महिलाओं, जैसे फीबे, प्रिस्का, अक्विला, फूरतूनातुस और अखइकुस, ने भी पौलुस के साथ सेवाकार्य में सहभागिता की। इनमें से कोई भी एक जैसा नहीं दिखता था और न ही एक जैसा व्यवहार करता था। उनके वरदान भी एक जैसे नहीं थे। लेकिन फिर भी, वे सभी सेवाकार्य के काम में महत्त्वपूर्ण थे। यह बात आज की कलीसिया की देह के बारे में भी सच है: हम सभी को प्रभु द्वारा विभिन्न कार्यों की जिम्मेदारी दी गई है। इसलिए यह महत्त्वपूर्ण है कि हम केवल उन्हीं लोगों के साथ सेवा करने की प्रवृत्ति से बचें, जो हमारे जैसे हैं या जिनसे हम प्रभावित होते हैं। हमें यह नहीं कहना चाहिए, “मुझे तो केवल उसी का प्रचार पसन्द है,” “मैं केवल उसी की बात मान सकता हूँ,” या “मैं बस उसे पसन्द नहीं करता।” इसके बजाय, हमें परमेश्वर के सभी सेवकों के लिए आभारी होना चाहिए।

हममें से अधिकांश लोग अपने जीवन ऐसे जीएँगे कि कोई भी हमें हमारे तत्काल प्रभाव क्षेत्र के बाहर नहीं जान पाएगा। लेकिन हमारे कब्र के शिलालेख पर यह लिखना काफी हो सकता है, “यहाँ वह व्यक्ति विश्राम कर रहा है, जो दूसरों की मदद करने के लिए जाना जाता था।” क्या आप विश्वास करते हैं कि “यीशु के पास एक ऐसा कार्य है, जो केवल आप ही कर सकते हैं”?[1] जब परमेश्वर अपना हाथ आप पर रखता है और आपको एक कार्य सौंपता है, तो क्या आप उसे गम्भीरता से लेते हैं, भले ही वह महत्त्वहीन सा लगे? हमें एक साथ एक समुदाय के रूप में उसके राज्य के लिए एक एकीकृत टीम बनकर उसकी सेवा करनी है। आज अपना किरदार निभाने और दूसरों को उनका किरदार निभाने के लिए प्रोत्साहित करने में, आपको आनन्द और सन्तोष की अनुभूति होगी।

1 कुरिन्थियों 3:1-23

◊ पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: न्यायियों 19–21; यूहन्ना 6:1-21


[1] एल्सी डंकन येल, “देयर्ज़ ए वर्क फॉर जीज़स” (1912).

13 सितम्बर : कब तक? क्यों?

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13 सितम्बर : कब तक? क्यों?
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हे यहोवा, मैं कब तक तेरी दोहाई देता रहूँगा, और तू न सुनेगा? मैं कब तक तेरे सम्मुख “उपद्रव”, “उपद्रव”, चिल्लाता रहूँगा? क्या तू उद्धार नहीं करेगा? तू मुझे अनर्थ काम क्यों दिखाता है? क्या कारण है कि तू उत्पात को देखता ही रहता है?” हबक्कूक 1:2-3

हम यह मानने के प्रलोभन में आ सकते हैं कि हम पुराने नियम में वर्णित परिस्थितियों से बहुत दूर हैं। लेकिन जब हम इन पदों में हबक्कूक की शिकायत को पढ़ते हैं, तो हम यह पहचान सकते हैं कि हालाँकि हम काल और स्थान में दूर हैं, फिर भी हम उस परिस्थिति से बहुत दूर नहीं हैं जिसमें वह स्वयं था।

हबक्कूक ने परमेश्वर के लोगों के बीच के मुद्दों का वर्णन किया। वे उन चीजों से भटक चुके थे जिन्हें परमेश्वर ने उनके लिए निर्धारित किया था, और कोई अन्त दिखाई नहीं दे रहा था। और इससे भी बुरी बात यह थी कि परमेश्वर हस्तक्षेप करता प्रतीत नहीं हो रहा था। हबक्कूक की दृष्टि में यह समस्या दोहरी थी: परमेश्वर का समय (तू कब तक गलत को सहन करता रहेगा?) और परमेश्वर की सहिष्णुता (तू इसको सहन क्यों करता है?)। ये प्रश्न आज भी कई विचारशील विश्वासियों के होंठों पर होते हैं जब वे कलीसिया को देखते हैं: “यह कब तक चलेगा? ऐसा क्यों है कि अच्छा, नैतिक, सर्वशक्तिमान परमेश्वर, जिसकी हम सेवा करते हैं, उन लोगों के बीच आध्यात्मिक और नैतिक पतन को सहन करता है, जो स्वयं को उसके अनुयायी कहते हैं?”

क्या आप कभी इन प्रश्नों से जूझे हैं? आप अकेले नहीं हैं; यह कोई नया मुद्दा नहीं है। परमेश्वर के विश्वासयोग्य लोग इतिहास भर में इससे जूझते रहे हैं। यहाँ दो अवलोकन हैं जो हमें हमारे जीवन के “कब तक” वाले प्रश्नों के साथ संघर्ष करते समय सहायक हो सकते हैं।

पहला, हम आभारी हो सकते हैं कि परमेश्वर हमारी समय-सीमा में हमारी प्रार्थनाओं का उत्तर देने के लिए इतना कठोर नहीं हैं। परमेश्वर की देरी हमेशा उद्देश्यपूर्ण होती है। उसका दृष्टिकोण हमारी कल्पना से कहीं अधिक व्यापक है। वह इसलिए देरी कर सकता है, ताकि वह हमारे स्वार्थ से या हमारे जीवन के किसी अवज्ञा के क्षेत्र से निपट सके, हमें उस पर विश्वास करना सिखा सके, या हमें हमारे स्वयं से बचा सके। यही कारण है कि बाइबल हमें अक्सर प्रभु की प्रतीक्षा करने के लिए कहती है। हमारी निराशाएँ, विफलताएँ, और भ्रम परमेश्वर के शाश्वत उद्देश्य की समग्र सुरक्षा में लाए जा सकते हैं।

दूसरा, हम भविष्यद्वक्ता के उदाहरण का पालन कर सकते हैं और परमेश्वर से सहायता की मांग कर सकते हैं। हबक्कूक ने अपनी शिकायत को उसी स्थान पर रखा जहाँ हमें अपनी शिकायतें रखनी चाहिएँ: अर्थात प्रभु के पास। उसने पहचान लिया कि भजनकार क्या कहता है: “मुझे सहायता यहोवा की ओर से मिलती है, जो आकाश और पृथ्वी का कर्ता है” (भजन 121:2)। बहुत से धार्मिक विश्वासी भजनों के माध्यम से अपने भ्रम और प्रश्नों को परमेश्वर के पास लेकर आए। इससे हमें भी ऐसा ही करने की अनुमति मिलती है। जब हम “कब तक?” और “क्यों?” कहकर पुकारते हैं, तो वह हमारी व्यथा को समझता है। उसका अन्तिम उत्तर हमें यीशु और उसकी विजय में दिया गया है। वह अंधेरी रात के बाद सुबह की किरण लाने में आनन्दित होता है। इसलिए जब आप अपने दिल को या जीवन को, या कलीसिया को देखते हैं, और यह पूछने के लिए प्रेरित होते हैं, “हे यहोवा, मैं कब तक तेरी दोहाई देता रहूँगा?” तो आप इस प्रकार के शब्दों में सान्त्वना पा सकते हैं:

परमेश्वर अभी भी सिंहासन पर है,

और वह अपने लोगों को याद रखेगा;

हालाँकि संकट हमें दबाते हैं और बोझ हमें कष्ट देते हैं,

वह हमें कभी अकेला नहीं छोड़ेगा।[1]

भजन 121

पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: न्यायियों 16–18; यूहन्ना 5:25-47 ◊


[1] किट्टी एल. सफ्फील्ड, “गॉड इज़ स्टिल ऑन द थ्रोन” (1929).

12 सितम्बर : हमें उसने जन्म दिया है

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12 सितम्बर : हमें उसने जन्म दिया है
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उसने अपनी ही इच्छा से हमें सत्य के वचन के द्वारा उत्पन्न किया।” याकूब 1:18

प्रसिद्ध टेलीविजन मेजबान जॉनी कार्सन ने एक बार एक खिझे हुए किशोर और एक निराश पिता के बीच एक बातचीत का वर्णन किया, जब वे एक-दूसरे से लड़ रहे थे। जब किशोर दरवाजा बन्द करने और बाहर जाने ही वाला था कि वह चिल्लाया, “मैंने दुनिया में जन्म लेने के लिए नहीं कहा था!” इसके जवाब में पिता ने भी चिल्लाते हुए कहा, “और यदि तुमने कहा भी होता, तो मैं कह देता ‘नहीं’!”

हममें से किसी ने भी जन्म लेने के लिए नहीं कहा। और वास्तव में, हममें से किसी ने भी नया जन्म लेने के लिए भी नहीं कहा। याकूब इस विनम्र सत्य की ओर इशारा करता है कि हमारा आध्यात्मिक जन्म वह नहीं था जिसे हमने परमेश्वर से करने को कहा। परमेश्वर की भलाई के कारण मसीह में हमारा नया जन्म उसका चुनाव था, और न तो हमारी विवशता का इस पर कोई प्रभाव पड़ा और न ही हमारी दिखावटी भलाई ने इसमें कोई योगदान दिया। उसने अपनी स्वतन्त्र, सर्वोच्च इच्छा के अनुसार ही कार्य किया। जैसा यीशु ने कहा, “हवा जिधर चाहती है उधर चलती है और तू उसका शब्द सुनता है, परन्तु नहीं जानता कि वह कहाँ से आती और किधर को जाती है? जो कोई आत्मा से जन्मा है वह ऐसा ही है” (यूहन्ना 3:8)।

आत्मा के कार्य के बिना, जो हमें मसीह के दर्शन कराता है, हमारे मूर्ख हृदय अंधे रहते हैं, और पाप हमारी नैतिकता की समझ पर मृत्यु-तुल्य प्रभाव डालता है। स्वभाव से हम पाप के शिकंजे में खोए हुए हैं, हमें अपनी स्थिति का समाधान जानने की बहुत आवश्यकता होती है, लेकिन हम यह भी नहीं देख पाते कि हमारी स्थिति वास्तव में है क्या। लेकिन भले ही हम अनुग्रह के द्वारा विश्वास से परमेश्वर के परिवार के सदस्य बन चुके हैं, तौभी हम कभी-कभी यह मानने के लिए प्रवृत्त होते हैं कि हमारा उद्धार उस काम का परिणाम है जो हमने किया है—कि हमने एक चुनाव किया, और हमें पाप से मुँह मोड़ने और बालकों जैसा विश्वास रखकर परमेश्वर की ओर मुड़ने का चुनाव करते रहना है। सत्य यह है कि परमेश्वर ने “अपनी ही इच्छा से हमें . . . उत्पन्न किया,” और जब हमने यह सुना, तब उसने हमें “सत्य के वचन” का प्रत्युत्तर देने के लिए सक्षम किया। जब हम इन टुकड़ों को आपस में जोड़ते हैं, तो हमें पता चलता है कि हम जो उसे चुनते हैं, वह केवल इसलिए सम्भव है क्योंकि उसने हमें पहले चुना।

जैसा कि एलेक मोट्यर ने कहा, “हमारे नए जन्म में हमारा किसी प्रकार का साधन या योगदानकर्ता बनना उतना ही असम्भव है, जितना कि हमारा प्राकृतिक जन्म लेने में होना। प्रारम्भिक चयन से लेकर पूरा होने तक, सारा काम उसका है . . . और जब तक उसकी इच्छा नहीं बदलती, उसका शब्द नहीं बदलता, या उसका सत्य गलत साबित नहीं होता, तब तक मेरा उद्धार खतरे में नहीं पड़ सकता और न ही खो सकता है।”[1]

यह जानकर कैसी सुरक्षा, शान्ति और आराम मिलता है कि यीशु मसीह के माध्यम से परमेश्वर की भलाई न केवल आपको पश्चात्ताप और विश्वास की ओर ले आई, बल्कि आपको विश्वास में बनाए भी रखेगी! यदि आपका विश्वास और उद्धार आप पर निर्भर होते, तो वे कभी सुरक्षित नहीं होते और आप हमेशा चिन्तित रहते। लेकिन यह उस पर निर्भर है और “न अदल बदल के कारण उस पर छाया पड़ती है” (याकूब 1:17)। आपने जन्म लेने के लिए नहीं कहा; उसने यह इच्छा की। इसलिए आप निश्चिन्त हो सकते हैं कि आप उसके बच्चे हैं—अब, कल, हर दिन और सदा के लिए।

  यहेजकेल 36

◊ पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: न्यायियों 13–15; यूहन्ना 5:1-24


[1] द मैसेज ऑफ एक्लेज़िआस्टेस: द बाइबल स्पीक्स टूडे (आई.वी.पी. अकेडेमिक, 1985), पृ. 60.