“हे परमेश्वर तेरे तम्बू में कौन रहेगा? तेरे पवित्र पर्वत पर कौन बसने पाएगा? वह जो खराई से चलता और धर्म के काम करता है, और हृदय से सच बोलता है।” भजन संहिता 15:1-2
“तेरे पवित्र पर्वत पर कौन बसने पाएगा?” दाऊद द्वारा इस भजन के पहले पद में पूछा गया प्रश्न अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है। हमें ऐसा प्रतीत हो सकता है कि यह केवल प्राचीन इस्राएल की आराधना से जुड़ा प्रश्न है, परन्तु वास्तव में यह हमें स्वर्ग के द्वार तक ले जाता है और पूछता है, इन फाटकों में कौन प्रवेश करने पाएगा?
यद्यपि इसका उत्तर भजन 15 के शेष भाग में समझाया गया है, इसका सामान्य आशय हमें पूरे पवित्रशास्त्र में मिलता है। इब्रानियों का लेखक अपने पाठकों को यह सलाह देता है कि वे “उस पवित्रता के खोजी हो जिसके बिना कोई प्रभु को कदापि न देखेगा” (इब्रानियों 12:14)। इसी प्रकार प्रभु यीशु ने सिखाया कि “सकेत है वह फाटक और कठिन है वह मार्ग जो जीवन को पहुँचाता है; और थोड़े हैं जो उसे पाते हैं” (मत्ती 7:14)। अतः जो लोग प्रभु के पवित्र पर्वत पर खड़े होंगे और अनन्तकाल तक उसकी उपस्थिति का आनन्द लेंगे, वे वही हैं जो सकेत मार्ग से होकर वहाँ पहुँचते हैं और पवित्रता का यत्न करते हैं।
दुखद सत्य यह है कि बहुत से लोग यह मान लेते हैं कि वे परमेश्वर के पवित्र पर्वत पर इसलिए बसेंगे क्योंकि उन्होंने कभी एक प्रार्थना की थी, किसी सभा में आगे आए थे, या किसी कलीसिया के सदस्य हैं। यह सोचना एक घोर भूल है कि ये कार्य अपने आप में अनन्त जीवन के योग्य बना देंगे, यदि उनके साथ ऐसा जीवन न हो जो मसीह को प्रभु के रूप में जानने का कोई प्रमाण न दे। चार्ल्स स्पर्जन ने एक बार प्रचार करते हुए कहा, “यदि कोई मनुष्य मन-परिवर्तन से पहले के जीवन से भिन्न जीवन नहीं जी रहा . . . तो उसके मन फिराव को फिर से मन फिराव की आवश्यकता है, और उसका मन-परिवर्तन केवल एक कल्पना है।”[1]
तो फिर, यहोवा के पर्वत पर कौन बसने पाएगा? वही जो “खराई से चलता है,” ऐसे ढंग से जो किसी अविश्वासी के जीवन जैसा न हो, और जिसका जीवन यह वास्तविकता प्रकट करता है कि परमेश्वर ने उसे बचाया है। वही जिसकी बातचीत निन्दा से चिह्नित नहीं, परन्तु जो “हृदय से सच बोलता है।” यह ऐसा व्यक्ति है जो केवल सही बात ही नहीं कहता, बल्कि सच्ची बात कहता है, और जो वह कहता है और जो वह जीता है, उसके बीच कोई अन्तर नहीं होता।
भजन 15 को पढ़ने और अपने आप को ईमानदारी से देखने का संयोजन सम्भवतः हमें बहुत हतोत्साहित कर दे। केवल प्रभु यीशु ही इस भजन में वर्णित पवित्रता को पूर्णता में धारण करता है; केवल वही अपने पिता के पवित्र पर्वत पर बसने के योग्य है, और केवल इस कारण से कि उसने अपने लोगों के पापों के लिए मरने को चुना और उन्हें अपनी सिद्धता से ढाँप दिया, हमें उसके साथ वहाँ रहने के लिए आमन्त्रित किया गया है। फिर भी यह अच्छा और उचित है कि हम परमेश्वर के वचन के प्रकाश को अपने हृदयों पर चमकने दें और वहाँ जो कुछ है उसे प्रकट होने दें, क्योंकि इससे हम मन फिराव और अपने उद्धारकर्ता के प्रति कृतज्ञता की ओर बढ़ेंगे। और जो जानते हैं कि वे उसके कारण वहाँ खड़े होंगे, वे उसके समान बनने का प्रयत्न करेंगे। अपने चाल-चलन और अपने शब्दों पर विचार करें, और प्रार्थना करें कि आप निरन्तर मसीह की प्रतिमा के अनुरूप बनते जाएँ, जब तक कि आप उसके साथ परमेश्वर के पवित्र पर्वत पर बस न जाएँ।
भजन संहिता 15
◊ पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: भजन 120–122; 2 कुरिन्थियों 6
[1] “व्हाट इज़ इट टू विन अ सोल?,” द स्वॉर्ड एण्ड द ट्रॉवेल (दिसम्बर 1879), पृ. 561.