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25 March : सर्वकाळासाठीं तृप्त

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25 March : सर्वकाळासाठीं तृप्त
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मीच जीवनाची भाकर आहे; जो माझ्याकडें येतो त्याला कधीही भूक लागणार नाहीं आणि जो माझ्यावर विश्वास ठेवतो त्याला कधीही तहान लागणार नाहीं.” (योहान 6:35)

हे वचन या वस्तुस्थितीकडें अंगुलीनिर्देश करते कीं येशूमध्यें विश्वास करणे येशू जे काहीं आहे त्यामधून खाणे आणि पीणे होय. ते असे म्हणणे आहे कीं आमच्या आत्म्याची तहाण येशूनें तृप्त होते, म्हणजे यापुठे मला आणखी तहाण लागत नाहीं.

तृप्तीच्या ज्या शोधांत आम्हीं  होतो तो त्याचा शेवट आहे. त्या पलीकडें काहींही नाहीं, आणि काहींही उत्तम नाहीं.

जेव्हां आम्हीं येशूवर तसा विश्वास ठेवतो जसा योहानाचा हेतू होता, तेव्हां येशूचे सान्निध्य आणि अभिवचन इतके संतुष्टिदायक बनते कीं पापाचे भुरळ पाडणारे सुख आमच्यावर प्रभूत्व करू शकत नाहीं (पहा रोम. 6:14). याच कारणामुळे ख्रिस्तामधील असा विश्वास पापाचे सामर्थ्य रद्द करतो आणि आज्ञाधारकपणास समर्थ बनवितो.

योहान 4:14 याच दिशेकडें अंगुलीनिर्देश करते: “परंतु मी देईन ते पाणी जो कोणी पिईल त्याला कधीही तहान लागणार नाहीं; जे पाणी मी त्याला देईन ते त्याच्यामध्यें सार्वकालिक जीवनासाठीं उपळत्या पाण्याचा झरा होईल.” योहान 6:35 नुसार, या ठिकाणी तारणदायी विश्वासाचे साम्य विषयी पाणी पिण्याबारोबर करण्यांत आलें आहे जे आत्म्याची खोल तहान तृप्त करते, आणि तृप्ती जणू ओसंडून वाहणाऱ्या झऱ्यासारखी सुपीक बनते.

योहान 7:37-38 देखील यांचविषयीं आहे: “येशू उभा राहून मोठ्याने म्हणाला, “कोणी तान्हेला असला तर त्यानें माझ्याकडें यावे आणि प्यावे. जो माझ्यावर विश्वास ठेवतो त्याच्यातून शास्त्रात सांगितल्यांप्रमाणे, जिवंत पाण्याच्या नद्या वाहतील.”

विश्वासाद्वारें, ख्रिस्त आमच्याठायी संतोषकारक जीवनाचा एक अक्षय झरा बनतो जो सदाकाळ टिकतो आणि आम्हास स्वर्गात घेऊन जातो, आणि वाटेत आम्हांला इतर समाधानांच्या पातकीं भ्रमांपासून सोडवितो. हे तो आमच्याकडें त्याचा आत्मा पाठवून करतो (योहान 7:38-39).

24 मार्च : पक्षपात की मूर्खता

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24 मार्च : पक्षपात की मूर्खता
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“इस्राएल अपने सब पुत्रों से बढ़ के यूसुफ से प्रीति रखता था, क्योंकि वह उसके बुढ़ापे का पुत्र था : और उसने उसके लिए एक रंगबिरंगा अंगरखा बनवाया। परन्तु जब उसके भाइयों ने देखा कि हमारा पिता हम सब भाइयों से अधिक उसी से प्रीति रखता है, तब वे उससे बैर करने लगे और उसके साथ ठीक से बात भी नहीं करते थे।”  उत्पत्ति 37:3-4

सम्बन्धों में पक्षपाती होना मूर्खता है।

हम पुराने नियम में परमेश्वर के लोगों की सम्पूर्ण कहानी में इसे देख सकते हैं, किन्तु ऐसा लगता है कि यह यूसुफ के जीवन में सबसे अधिक दिखाई देता है, क्योंकि वह अपने पिता याकूब की विशेष रुचि का पात्र था। यूसुफ राहेल का, जिससे याकूब ने आजीवन अत्यन्त प्रीति रखी और “[याकूब के] बुढ़ापे का पुत्र” था। इसलिए याकूब, जिसका नाम परमेश्वर ने इस्राएल रखा था, इस पुत्र से दूसरों से अधिक प्रीति रखता था। पक्षपात की इस जड़ के कारण इस परिवार में बहुत बुरा फल उत्पन्न हुआ।

याकूब ने एक उपहार के द्वारा अपना पक्षपात व्यक्त किया, वह एक “रंगबिरंगा अंगरखा” था जिसे उसने स्वयं बनाया था। यह स्पष्ट रूप से पक्षपात का एक प्रतीक था, जिसे पहनना यूसुफ को बहुत पसन्द था। इस विवादास्पद अंगरखे ने यूसुफ के भाइयों में अत्यन्त शत्रुता को भड़का दिया। उनकी शत्रुता से द्वेष और हत्या की मंशा उत्पन्न हो गई। उन्होंने अन्ततः अपने भाई को गुलाम के तौर पर बेचने और फिर उसकी मृत्यु हो जाने का स्वांग तक रच डाला।

यदि उपहार में दिया गया अंगरखा ऐसी प्रतिक्रिया को भड़का सकता है, तो निश्चित रूप से समस्या उस अंगरखे से कहीं अधिक बड़ी थी। निश्चय ही गुप्त रूप से पाप कहीं भीतर दृढ़ता से स्थापित रहा होगा। और यही बात हम यूसुफ के भाइयों के साथ भी पाते हैं। उनकी प्रमुख समस्या यह नहीं थी कि वह अंगरखा बहुत मूल्यवान था, किन्तु यह थी कि वह यूसुफ को उनसे अलग श्रेणी में स्थापित कर रहा था। उसे यह उपहार देकर याकूब ने यूसुफ को उसके भाई-बहनों से ऊपर उठा दिया था और यह बात उन्हें चुभती थी। जब किसी एक को प्रिय चुना जाता है, तो यह सदैव स्वाभाविक रूप से यह संकेत करता है कि दूसरा अप्रिय है, जो प्रिय के रूप में चुने गए व्यक्ति में अहंकार और घमण्ड दोनों को जन्म देता है और जो नहीं चुने गए हैं, उनमें क्रोध और कड़वाहट को जन्म देता है। आपने अपने आस-पास या अपने जीवन में भी प्रिय होने या उस प्रतिष्ठा के लिए अनदेखा किए जाने के विनाशकारी प्रभावों को देखा होगा।

याकूब को उस समस्या के बारे में अधिक भले ढंग से समझना चाहिए था, क्योंकि उसने स्वयं अतीत में अनुचित पक्षपात का अनुभव किया था, उसकी अपनी माँ ने उसे उसके भाई एसाव से अधिक प्रिय जाना था और इसके कारण अराजकता फैल गई थी। यूसुफ के अपने भाइयों के साथ सम्बन्धों के समान एसाव के साथ उसका सम्बन्ध कई वर्षों तक बिगड़ा रहा था।

तौभी हमें याकूब या उसके पुत्रों की मानसिकता और कार्यों से अपने आप को दूर करने में शीघ्रता नहीं करनी चाहिए, जैसे कि हम कभी भी कुछ ऐसा करने के दोषी नहीं हो सकते। हम सभी को सम्बन्धों में पक्षपात करने की मूर्खता और इसके साथ प्रायः जन्म लेने वाले रोष से सावधान रहना चाहिए। पक्षपात एक सामान्य और समझने योग्य भूल है, किन्तु इसकी छाया गहरी, काली और विनाशकारी होती है।

याकूब की मूर्खता के बारे में आलोचना करने के विपरीत, आइए हम उससे सीखें। प्रत्येक सम्बन्ध परमेश्वर की ओर से एक अनूठा वरदान होता है। जिस भी मात्रा में हम अपने आस-पास के लोगों के प्रति पक्षपात दिखाते हैं, चाहे वह किसी भी कारण से हो, तो हमें जान लेना चाहिए कि यह सम्बन्धों को तोड़ देगा और नष्ट कर देगा। परन्तु यदि हम प्रत्येक मित्र, पारिवारिक सदस्य और पड़ोसी को प्रत्यक्ष प्रेम और स्नेह के साथ संजोते हैं, तो हम परमेश्वर को आदर देते हैं और उन लोगों के हृदयों को प्रोत्साहित करते हैं जिन्हें उसने हमारे आस-पास रखा है।       

उत्पत्ति 37

24 March सेवाकार्य आणि मनुष्याची भिती

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24 March सेवाकार्य आणि मनुष्याची भिती
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त्यांना तू भिऊ नकोस; तुझा बचाव करण्यास मी तुझ्याबरोबर आहे, असे परमेश्वर म्हणतो. (यिर्मया 1:8)

प्रभूची सेवा करण्यात एक मोठे अडखळण, विशेषेकरून तरुणांमध्यें, म्हणजे नाकारले जाण्याची आणि विरोधाची भीती आहे.

ज्याप्रकारे आपण वागतो किंवा बोलतो हे काहीं लोकांना कसे आवडणार नाहीं याविषयी सर्व प्रकारचे विचार मनात प्रवेश करतात. लोक असहमत होऊ शकतात किंवा अडखळू शकतात. माझ्याकडून एखादी चूक होऊ शकते आणि त्यामुळे माझी टीका केलीं जाऊ शकते.

मनुष्याची भीती ही सेवाकार्यात एक मोठे अडखळण आहे.

म्हणून देव म्हणतो, भिऊ नकोस, कारण मी तुझ्याबरोबर असेन आणि मी तुला सोडवीन. देवाचे सान्निध्य आणि स्वीकृती मनुष्यांच्या सर्व प्रशंसापेक्षा अधिक मूल्यवान आहे. आणि देव म्हणतो कीं, तुमच्या सर्व संकटांत आणि संकटांतून मी तुम्हांला सोडवीन. शेवटी तुम्हीं विजयी व्हाल. तुम्हीं महाविजयी व्हाल.

आणि हेच अभिवचन आज ख्रिस्त येशूमध्यें आम्हा सर्वांना देण्यात आले आहेः

  • त्यानें (देवानें) स्वतः म्हटलें आहे, “मी तुला सोडून जाणार नाहीं व तुला टाकणार नाहीं.” म्हणून आपण धैर्याने म्हणतो “प्रभू मला साहाय्य करणारा आहे, मी भिणार नाहीं; मनुष्य माझे काय करणार?” (इब्री 13:5–6).
  • “देव आपल्यांला अनुकूल असल्यांस आपल्यांला प्रतिकूल कोण?” (रोमकरांस 8:31).

म्हणून देव तरुण यिर्मयाला म्हणाला, आणि देव आज तरुणांना म्हणतो ज्यांना तो त्याची सेवा करण्यासाठीं पाचारण करीत आहे – आणि आमच्यापैकीं सर्वांनाच “मी बाळ आहे असे म्हणू नकोस“ किंवा मी खूप म्हातारा आहे, किंवा मी आणखी काहीं आहे (यिर्मया 1:7). का?

  • कारण तुमचे जीवन देवाच्या अढळ, सार्वभौम हेतूंमध्यें मुळावलेले आहे. तुम्हांला निवडले गेले आहे आणि वेगळे करण्यात आले आहे
  • तुमच्या स्वतःचा नव्हे तर देवाचा अधिकार तुमच्या सेवेमागे आणि तुमच्या बोलण्यामागे आहे.
  • आणि कारण तुमच्या सर्व परीक्षांत तुम्हास सोडविण्यासाठीं स्वतः देव तुमच्यासोबत असेल.

23 मार्च : हर एक अच्छा और उत्तम वरदान

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23 मार्च : हर एक अच्छा और उत्तम वरदान
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“क्योंकि हर एक अच्छा वरदान और हर एक उत्तम दान ऊपर ही से है, और ज्योतियों के पिता की ओर से मिलता है, जिसमें न तो कोई परिवर्तन हो सकता है, और न अदल बदल के कारण उस पर छाया पड़ती है।”  याकूब 1:17

क्या आप कभी उपहार खरीदने गए हैं और आपको पता ही नहीं था कि उस व्यक्ति को किस वस्तु की आवश्यकता है या उसे क्या चाहिए? आपको नहीं पता था कि कौन से नाप का या रंग का स्वेटर खरीदना है या बच्चे का खिलौना उसकी आयु के अनुसार उपयुक्त है या नहीं, इसलिए अन्ततः आपने हार मान ली हो और कहा, “मैं कुछ तो खरीद ही लेता हूँ! वे इसे वैसे भी वापस ले लेंगे। कौन इतनी चिन्ता करे?”

उपहार देना सदैव उतना सरल या आनन्ददायक नहीं होता जितना होना चाहिए। सच तो यह है कि हममें से सबसे उत्तम लोग भी हर बार उत्तम उपहार नहीं दे सकते क्योंकि हममें कमियाँ हैं। हमारे पास उचित उपहार देने के लिए ज्ञान और समझ की कमी होती है, और कभी-कभी संसाधनों या इच्छा-शक्ति की भी कमी होती है। इस बात में हम परमेश्वर से पूरी तरह से अलग हैं, क्योंकि परमेश्वर उत्तम वरदान देने वाला है, और केवल  उत्तम वरदान ही देता है। वह स्वभाव से ही भला है और उदारता से भरपूर है। वह बदले में कुछ भी उम्मीद किए बिना देता है और वह प्राप्त करने वाले व्यक्तियों की योग्यता के आधार पर अपनी भलाई को सीमित नहीं करता। और उसके द्वारा दिए गए किसी भी वरदान को कभी भी वापस करने की आवश्यकता नहीं होती।

न केवल परमेश्वर उत्तम रीति से उदार है, अपितु उस उदारता में कभी बदलाव नहीं आता। यहाँ तक ​​कि संसार के सबसे भले माता-पिताओं के पास भी सही समय पर और सही तरीके से जाना पड़ता है, क्योंकि वे सदैव एक समान नहीं होते। बच्चे सीखते हैं कि वे अपने समय को कैसे चुनें। जब मेरे पिता बिजली कम्पनी के साथ बात करने के लिए फोन पर प्रतीक्षा कर रहे होते थे, तब एक किशोर के रूप में मुझे उनके हाव-भाव समझना सरल लगता था और सोचा करता था, “मुझे नहीं लगता कि मेरी कार के लिए दो नए टायर माँगने का अभी सही समय है।”

यद्यपि हमारे स्वर्गिक पिता के साथ हमें यह सोचने की आवश्यकता नहीं है कि उसके पास जाना ठीक है या नहीं। वह न तो अस्थिर स्वभाव का है और न ही जल्दी क्रोध करने वाला। हम हियाव रख सकते हैं कि वह सर्वदा उचित रीति से कार्य करेगा। हम उसे किसी भी बात में अनजान, असमर्थ, अनुपलब्ध या अनिच्छुक नहीं पाएँगे। मसीह के द्वारा वह हमारे हृदय की प्रार्थनाओं और हमारी प्रतिदिन की चिन्ताओं के लिए उपलब्ध और प्रतिक्रियाशील है।

हम परमेश्वर के बच्चे हैं, और हमारे लिए अपने प्रेम को व्यक्त करने के तरीकों में से एक है हमारे लिए उसके उत्तम वरदान। इसलिए उसके प्रत्येक बच्चे में पाया जाने वाला एक गुण कृतज्ञता होना चाहिए। यदि हम अपने पिता के चरित्र को जानते हैं तो हम आभारी होने के अतिरिक्त और क्या हो सकते हैं, तब भी जब उसके वरदान वे न हों जिन्हें हमने स्वयं चुना हो? इसलिए ध्यान से अपनी आशिषों को प्रतिदिन गिना करें। याद रखें कि सभी भली वस्तुएँ उसी की देन हैं। और उससे यह कहा करें:

महान है तेरी विश्वासयोग्यता, हे परमेश्वर मेरे पिता,

न किसी परिवर्तन के कारण तुझ पर छाया पड़ती है…

जो कुछ भी मुझे चाहिए था, तेरे हाथ ने दिया—

महान है तेरी विश्वासयोग्यता, प्रभु, मेरे लिए!  [1]       

भजन संहिता 103

23 March अज्ञान अभक्तीची हमी देते

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23 March अज्ञान अभक्तीची हमी देते
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ज्यानें तुम्हाआम्हांला आपल्यां गौरवासाठीं व सात्त्विकते-साठीं पाचारण केलें त्याच्या ओळखीच्या द्वारें, त्याच्या ईश्वरी सामर्थ्याने, जीवनास व सुभक्तीस आवश्यक असलेल्यां सर्व गोष्टी आपल्यांला दिल्यां आहेत. (2 पेत्र 1:3)

पवित्र शास्त्र ज्यां सामर्थ्याचे श्रेय ज्ञानाला देते ते पाहून मी चकित होतो.

परत एकदा वाचा 2 पेत्र 1:3 : ज्यानें तुम्हाआम्हांला आपल्यां गौरवासाठीं व सात्त्विकते-साठीं पाचारण केलें त्याच्या (देवाच्या) ओळखीच्या द्वारें, त्याच्या ईश्वरी सामर्थ्याने, जीवनास व सुभक्तीस आवश्यक असलेल्यां सर्व गोष्टी आपल्यांला दिल्यां आहेत.

अक्षरशः, जीवन जगण्यासाठीं आणि भक्तीमान होण्यासाठीं देवाकडून जे सामर्थ्य उपलब्ध आहे ते सर्व ज्ञानाद्वारें उपलब्ध आहे! अद्भुत! शास्त्रवचनांतील सिद्धांत आणि शिकवणीवर आपण किती जोर द्यायला पाहिजे! हा साधारण विषय नाहीं, हा जीवन व सुभक्तीचा गंभीर विषय आहे.

विषय हा नाहीं कीं ज्ञानामुळे सुभक्तीमानतेची हमी प्राप्त होते. तसे नाहीं. पण असे दिसून येते कीं अज्ञान अभक्तीची हमी देते. कारण, पेत्र म्हणतो, सात्त्विकतेकडें नेणारे ईश्वरी सामर्थ्य देवाच्या ओळखीच्या द्वारें  म्हणजेच ज्ञानाद्वारें  दिले जाते.

येथे तीन अर्थ, एक ताकींद, व एक उत्तेजन आहे.

1. वाचा! वाचा! वाचा! पण ईश्वरविज्ञानाच्या बाह्य फेणावर आपला वेळ वाया न घालविण्याविषयी सावध असा. “ज्यानें तुम्हाआम्हांला आपल्यां गौरवासाठीं व सात्त्विकते-साठीं पाचारण केलें” त्याच्याविषयी समृद्ध सिद्धांत विषयक पुस्तके वाचा.

2. मनन करा! मनन करा! शांतचित्त व्हां. तुम्हीं बायबल वाचता तेव्हां त्याच्या अर्थ काय, याविषयी विचार करण्यात वेळ घालवा. प्रश्न विचारा. मनन नमूद करण्यासाठीं जवळ एक दैनंदिनी ठेवा. पेचांत टाकणाऱ्या गोष्टींद्वारें स्वतःचे मन नम्रपणे विव्हळ होऊ द्या. सत्याच्या वृक्षावरील वरवर पाहता दिसणाऱ्या दोन परस्पर विरोधी शाखांचे एकत्रित करणारे मूळ पाहण्याचा प्रयत्न करण्याद्वारें सखोल अंतर्दृष्टी प्राप्त होते.

3. चर्चा करा. चर्चा करा. एका लहान गटाचा भाग बना जो सत्याची उत्कटपणे पर्वा करतो. असा गट नाहीं ज्याला फक्त बोलून समस्या उत्पन्न करणे आवडते. पण असा गट ज्याचा असा विश्वास आहे कीं बायबलच्या प्रश्नांची उत्तरे  बायबल मध्येंच आहेत आणि ती शोधून काढता येतात.

ताकींद : “ज्ञानाच्या अभावी माझ्या लोकांचा नाश झाला आहे” (होशे 4:6).“मी त्यांच्याविषयी साक्ष देतो कीं, त्यांना देवाविषयी आस्था आहे, परंतु ती यथार्थ ज्ञानाला अनुसरून नाहीं” (रोमकरांस10:2). म्हणून अज्ञानाच्या घातक परिणामांविषयी सावध असा.

उत्तेजन : “चला, आपण परमेश्वरास ओळखू; परमेश्वराचे ज्ञान मिळवण्यास झटू” (होशे 6:3).

22 मार्च : ऐश्वर्य-पूर्ण आत्मसमर्पण

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22 मार्च : ऐश्वर्य-पूर्ण आत्मसमर्पण
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“तब यहूदा सैनिकों के एक दल को और प्रधान याजकों और फरीसियों की ओर से प्यादों को लेकर, दीपकों और मशालों और हथियारों को लिए हुए वहाँ आया। तब यीशु, उन सब बातों को जो उस पर आने वाली थीं जानकर, निकला और उनसे कहा, ‘किसे ढूँढ़ते हो?’ उन्होंने उसको उत्तर दिया, ‘यीशु नासरी को।’ यीशु ने उनसे कहा, ‘मैं हूँ।’ उसका पकड़वाने वाला यहूदा भी उनके साथ खड़ा था। उसके यह कहते ही, ‘मैं हूँ,’ वे पीछे हटकर भूमि पर गिर पड़े।”  यूहन्ना 18:3-6

सुसमाचार के सभी लेखकों ने यीशु के जीवन की समान घटनाओं को वर्णित किया है, परन्तु उनमें से प्रत्येक घटनाक्रम यीशु की पहचान के विशेष विवरण और पहलुओं पर प्रकाश डालता है। यूहन्ना का एक उद्देश्य यह था कि वह यीशु की श्रेष्ठता को और उन सभी परिस्थितियों पर उसकी विजय प्राप्ति को स्थापित करे जो उसका अनादर करने और उसे अपमानित करने के लिए निर्धारित की गई थीं। गतसमनी के बगीचे में यीशु को बन्दी बना लिए जाने पर विचार करें। उसने अपनी इच्छा से किन्तु अधिकारपूर्वक आत्मसमर्पण किया और संसार के उद्धारकर्ता के रूप में अपनी महिमा को प्रकट किया। एक समय ऐसा था जब लोग यीशु पर एक राजा का मुकुट थोपना चाहते थे, परन्तु वह पीछे हट गया था क्योंकि वह जानता था कि सांसारिक राजपद उसके लिए नहीं था (यूहन्ना 6:15)। यहाँ जब सैनिक उस पर एक क्रूस थोपने आए, तो वह जानता था कि आगे क्या-क्या आने वाला था। वे निश्चित रूप से यह उम्मीद कर रहे थे कि इस कुख्यात गलीली बढ़ई को ढूँढने के लिए दूर-दूर तक जाना पड़ेगा। इसके विपरीत, यहाँ वह स्वेच्छा से आत्मसमर्पण कर रहा था, उसकी वाणी में ऐश्वर्य था, उसकी आँखों में एक भाव था और जिस प्रकार उसने अपने आप को प्रस्तुत किया था, उस उपस्थिति ने उस क्षण की गम्भीरता को बढ़ा दिया था। इसमें कोई आश्चर्य नहीं कि वे “पीछे हटकर भूमि पर गिर पड़े।”

जब यीशु ने उन लोगों के सामने आत्मसमर्पण किया जो उसे ईश-निन्दक और अपराधी मानते थे, तो उसने अपनी पहचान का इनकार नहीं किया। सच यह है कि उसने ऐसी भाषा का उपयोग किया जो उसकी दिव्य पहचान और अधिकार को व्यक्त करती थी। यीशु ने “मैं हूँ” वाक्यांश का प्रयोग न केवल सैनिकों को यह बताने के लिए किया कि वही नासरत का यीशु था, अपितु इस वाक्यांश से उसने अपनी पहचान उस परमेश्वर के रूप में भी दिखाई जो मूसा के सामने जलती झाड़ी में प्रकट हुआ था (निर्गमन 3:14)। यह वही वाक्यांश था जिसके कारण कुछ महीनों पहले उसको लगभग पथराव किए जाने की स्थिति पर पहुँचा दिया था (यूहन्ना 8:58-59), क्योंकि यह एक स्पष्ट दावा था कि वह स्वयं सर्व-विद्यमान, जीवित परमेश्वर था।

अब यहाँ यह परमेश्वर है, जो आगे बढ़कर अपने मित्रों को विरोध करने से रोक रहा है और अपने शत्रुओं को अपनी हत्या कर देने की अनुमति दे रहा है। क्यों? जब मसीह बगीचे में सामने आया तो वह न केवल अपने चेलों की रक्षा कर रहा था अपितु अपने लोगों के लिए प्रावधान भी कर रहा था। वह पापी मनुष्यों के बदले में सामने आया, उस सब की पूर्ति के रूप में जिसकी लम्बे समय से आशा की जा रही थी। वह जानता था कि वह किस ओर कदम बढ़ा रहा था, और वह यह था, “मसीह ने भी, अर्थात् अधर्मियों के लिए धर्मी ने, पापों के कारण एक बार दुख उठाया, ताकि हमें परमेश्‍वर के पास पहुँचाए” (1 पतरस 3:18)।

अपने आत्मसमर्पण और दिव्य अधिकार के संयोजन में मसीह ने क्रूस की ओर अगला कदम बढ़ाया, जहाँ उसके बलिदान ने हमारे उद्धार को जीत लिया। वह क्रूस से भागा नहीं, बल्कि दृढ़ता से उसकी ओर बढ़ा। और उसने यह आपके लिए किया।

यह बहुत ही अद्भुत बात है,

लगभग इतनी अद्भुत कि यह हो भी सके,

कि परमेश्वर का अपना पुत्र स्वर्ग से आए,

और मेरे जैसे बच्चे को बचाने के लिए मर जाए। [1]    
यूहन्ना 18:1-14

22 March : सैतानाचे कँडीचे दुकान

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22 March : सैतानाचे कँडीचे दुकान
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म्हणून आपल्यांसाठीं ख्रिस्ताने देहाने दुःख सोसले तसेच तुम्हींही तेच मनोवृत्तिरूपी शस्त्र धारण करा; कारण ज्यानें देहाने दुःख सोसले आहे तो पापापासून निवृत्त झाला आहे. (1 पेत्र 4:1)

प्राथमिक दृष्ट्या हे वचन आपल्यांला पेचांत टाकते. ख्रिस्ताला पापापासून निवृत्त व्हावें लागले का?  नाहीं! “त्यानें पाप केलें नाहीं” (1 पेत्र 2:22).

मग अचानक उमजते. जेव्हां आम्हीं स्वतःला या विचाराचे मनोवृत्तिरूपी शस्त्र धारणकरतो कीं ख्रिस्ताने आमच्यासाठीं दुःख सहन केलें, तेव्हां आम्हांला कळून येते कीं आम्हीं त्याच्यासोबत मेलो. “त्यानें स्वतः तुमची आमची पापे’ स्वदेही ‘वाहून’ खांबावर ‘नेली’, ह्यासाठीं कीं, आपण पापाला मेलेले होऊन सदाचरणासाठीं जगावे.” जेव्हां आम्हीं त्याच्यासोबत मरतो, तेव्हां आम्हीं पापापासून निवृत्त होतो.

हे अगदी रोमकरांस 6 प्रमाणें आहे : हे आपल्यांला ठाऊक आहे कीं, हे पापाच्या अधीन असलेले शरीर नष्ट होऊन आपण ह्यापुढे पापाचे दास्य करू नये, म्हणून आपल्यांतील जुना मनुष्य त्याच्याबरोबर वधस्तंभावर खिळला गेला. कारण जो कोणी मेला तो पापाच्या दोषापासून मुक्त होऊन नीतिमान ठरला आहे….. तसे तुम्हींही ख्रिस्त येशू आपला प्रभू ह्याच्याद्वारें स्वत:स पापाला मेलेले खरे, पण देवाप्रीत्यर्थ जिवंत झालेले, असे माना” (रोमकरांस 6:6–7, 11).

पेत्र म्हणतो, “तुम्हींही तेच मनोवृत्तिरूपी शस्त्र धारण करा!”

पौल म्हणतो, “स्वत:स पापाला मेलेले असे माना!”

पापाविरूद्ध आमचे जे युद्ध आहे त्यासाठीं आमचे शस्त्र म्हणजे हीच ‘मनोवृत्ति’– ‘असेच मानने.’

जेव्हां सैतानाच्या परीक्षा येतात – वासनेची, चोरी करण्याची, खोटे बोलण्याची, लोभ धरण्याची, हेवा करण्याची, सूड घेण्याची, अपमान करण्याची, घाबरुन जाण्याची – तेव्हां हेच मनोवृत्तिरूपी शस्त्र धारण करा: जेव्हां प्रभूने मला पापापासून मुक्त करण्यासाठीं दुःख सहन केलें आणि तो मेला, तेव्हां मीहि पापास मेलो!

जेव्हां सैतान तुम्हांला म्हणतो, तू वासनेच्या सुखाचा नकार का करतोस? जी भानगड तू खोटे बोलून टाळू शकतोस त्या भानगडीत का पडतो? तू धाडस करून त्या हानिरहित सुखविलासाचा आनंद का घेत नाहीं? तुला जी दुखापद झाली त्याबद्दल सूड घेऊन न्याय मिळविण्याचा प्रयत्न का करित नाहींस?

त्याला असे उत्तर द्या : देवाच्या पुत्राने मला पाप करण्यापासून सोडविण्यासाठीं दुःख सहन केलें (खरोखर दुःख सोसले!). त्यानें मला आणखी कष्टी बनविण्यासाठीं दुःख सोसले असें मी मानत नाहीं. म्हणून, जे विकत घेण्यासाठीं तो मेला ते पापाच्या सुखापेक्षा अधिक मौल्यवान असले पाहिजे. मी त्याच्यावर विश्वास ठेवतो, म्हणून माझा तो दुर्बळपणा ज्यामुळे मी तुझ्या परीक्षेला बळी पडत असें तो आता कोमजून ठार झाला आहे. हे सैताना, चालता हो! तुझ्या कॅन्डीच्या दुकानाजवळून जातांना आता माझ्या तोंडाला पाणी सुटत नाहीं.

21 मार्च : ये देरी क्यों?

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21 मार्च : ये देरी क्यों?
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“पूर्व युग में परमेश्‍वर ने बापदादों से थोड़ा-थोड़ा करके और भाँति–भाँति से भविष्यद्वक्ताओं के द्वारा बातें कर, इन अन्तिम दिनों में हमसे पुत्र के द्वारा बातें कीं, जिसे उसने सारी वस्तुओं का वारिस ठहराया और उसी के द्वारा उसने सारी सृष्टि की रचना की है।”  इब्रानियों 1:1-2

जिस समय में हम जी रहे हैं उसका वर्णन करने के कई तरीके हैं, जैसे कि 21वीं सदी, या आधुनिकता के बाद का समय, या वैश्वीकरण का युग, या फिर प्रौद्योगिकी युग। परन्तु मूल रूप से और बुनियादी रीति से हम “अन्तिम दिनों” में जी रहे हैं। इसके बारे में जानकारी के आधार पर यह वाक्यांश बहुत अनोखा या रोमांचक लग सकता है। सचमुच “अन्तिम दिनों” के विचार के बारे में बहुत भ्रान्ति हो सकती है।

नया नियम इस वाक्यांश का उपयोग केवल यीशु के प्रथम और द्वितीय आगमन के बीच के समय का वर्णन करने के लिए करता है। यीशु आ चुका है,  और यीशु आने वाला है,  और हम उद्धार के इतिहास में उन दो महान पड़ावों के मध्य में जी रहे हैं। उसका पहला आगमन उसके राज्य को पृथ्वी पर लाया और उसने “अन्तिम दिनों” को वर्तमान वास्तविकता के रूप में प्रारम्भ किया। उसका जीवन, मृत्यु, पुनरुत्थान और स्वर्गारोहण सभी परमेश्वर के आत्मा के कार्य करने को दिखाते हैं और यदि परमेश्वर का आत्मा कार्य कर रहा है, तो यीशु यह सिखाता है, “परमेश्वर का राज्य तुम्हारे पास आ पहुँचा है” (मत्ती 12:28)। इसलिए जब यीशु एक भीड़ को “परमेश्वर के राज्य में प्रवेश करने” (मरकुस 10:15; लूका 18:17) के लिए निमन्त्रण देता है, तो वह भविष्य के किसी राज्य में प्रवेश करने की बात नहीं कर रहा है बल्कि एक वर्तमान वास्तविकता की बात कर रहा है, अर्थात् यीशु के वर्तमान शासन और राज्य की बात कर रहा है।

तो राज्य अभी इसी समय में  है। परन्तु राज्य उस आने वाले समय में  भी है, कुछ ऐसा जिसे हम भविष्य में पूर्ण रूप से देखेंगे, जब प्रभु यीशु का आगमन होगा। अपने द्वितीय आगमन पर यीशु अपने राज्य को पूरी तरह से स्थापित करेगा। उस समय वह अपने विश्वासियों को प्रसन्नता से ग्रहण करते हुए उनसे कहेगा, “उस राज्य के अधिकारी हो जाओ, जो जगत के आदि से तुम्हारे लिए तैयार किया गया है” (मत्ती 25:34) और “पृथ्वी यहोवा के ज्ञान से ऐसी भर जाएगी जैसा जल समुद्र में भरा रहता है” (यशायाह 11:9)। वह राज्य जो पहले अपने राजा के साथ आया था, वह भविष्य में अपनी सम्पूर्णता और महिमा में पूरी तरह से आ जाएगा।

अतः हम मसीही लोग इस बीच के समय में जी रहे हैं, जिसे “अन्तिम दिन” कहा जाता है। जो लोग मसीह में हैं वे अब नई सृष्टि हैं, किन्तु उन्हें अभी तक उस नई सृष्टि के सभी लाभ और आशिषें प्राप्त नहीं हुई हैं। तब तक के लिए विश्वासी लोग पाप से भरे इस पतित संसार में इस वर्तमान युग में रहते हैं और उस आने वाले युग की आकांक्षा करते हैं।

फिर क्यों ऐसा है कि मसीह के प्रथम और द्वितीय आगमन के बीच का समय इतना लम्बा लगता है? ये देरी क्यों? इसका कारण यह है कि परमेश्वर ने सोच-समझकर यीशु के आगमन को विलम्बित कर रखा है, जिससे कि अधिक से अधिक लोगों को उसके द्वारा बोले गए वचनों को सुनने, मन फिराने और विश्वास करने का अवसर मिले (2 पतरस 3:9)। अन्तिम दिन वे दिन हैं जब राज्य में प्रवेश करने का अवसर उपलब्ध है, इससे पहले कि द्वार बन्द कर दिया जाएगा।

चूंकि हम यह जानते हैं कि हम किस युग में रह रहे हैं और किसके आगमन से इसका समापन हो जाएगा, तो फिर “[हमें] कैसे मनुष्य होना चाहिए?” (2 पतरस 3:11)। पवित्रशास्त्र हमें बताता है, “यत्न करो कि तुम शान्ति से उसके सामने निष्कलंक और निर्दोष ठहरो, और हमारे प्रभु के धीरज को उद्धार समझो” (2 पतरस 3:14-15)। दूसरे शब्दों में, यदि “अन्तिम दिन” आज समाप्त हो जाएँ और प्रभु यीशु अपनी महिमा में लौट आए, तो यह सुनिश्चित करें कि आप ऐसा जीवन जी रहे हों जो उसे प्रसन्न करता हो और ऐसे शब्दों को बोलने के तरीके खोज रहे हों जो उसकी उद्‌घोषणा करते हों।       लूका 17:20-37

21 March : देवाचे सर्वोत्तम अभिवचन

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21 March : देवाचे सर्वोत्तम अभिवचन
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ज्यानें आपल्यां स्वतःच्या पुत्रास राखून न ठेवता त्याला आपल्यां सर्वांकरता समर्पण केलें, तो त्याच्याबरोबर आपल्यांला सर्वकाहीं कसे देणार नाहीं? (रोम 8:32)

देवाच्या भविष्यातील कृपेचे सर्वात दूरगामी अभिवचन रोम 8:32 मध्यें आढळून येते. माझ्यासाठीं हे पवित्रशास्त्रातील सर्वात मौल्यवान वचन आहे. काहीं अंशी याचे कारण हे आहे कीं त्यात दिलेलें अभिवचन इतके सर्वसमावेशक आहे कीं ते माझ्या जीवनाच्या आणि सेवेच्या प्रत्येक वळणावर खरोखर माझ्या मदतीसाठीं तत्पर उभे असते. माझ्या जीवनात अशी परिस्थिती कधीही राहिलेली नाहीं आणि पुढेहि असणार नाहीं जेथे हे अभिवचन अप्रासंगिक ठरले किंवा ठरेल.

स्वतःहून हे सर्व-समावेशक अभिवचन कदाचित या वचनास सर्वात मौल्यवान ठरविणार नाहीं. स्तोत्र 84:11 सारखी इतर दूरगामी वचनें आहेत : “जे सात्त्विकपणे चालतात त्यांना उत्तम ते दिल्यांवाचून तो राहणार नाहीं.” आणि 1 करिंथ 3:21-23 : ”म्हणून माणसांविषयी कोणी अभिमान बाळगू नये. कारण सर्वकाहीं तुमचे आहे; पौल असो, अपुल्लोस असो, अथवा केफा असो, जग असो, जीवन असो, अथवा मरण असो, वर्तमानकाळच्या गोष्टी असोत अथवा भविष्यकाळच्या गोष्टी असोत, सर्वकाहीं तुमचे आहे; आणि तुम्हीं ख्रिस्ताचे आहात आणि ख्रिस्त देवाचा आहे.“ या अभिवचनांचा ठळक दिसून येणारा भरमसाटपणा आणि विस्तार याविषयी अतिरेकपणे बोलणे कठीण आहे.

पण जे वास्तव रोमकरांस 8:32 ला या उच्च दर्जांत मांडते तो एक असा तर्क आहे जो या अभिवचनास महत्व देतो आणि त्यास इतका मजबूत व अटळ ठरवितो जितका कीं देवाच्या अतिशय प्रशंसनीय पुत्रासाठीं देवाची प्रीति.

रोम 8:32 मध्यें एक पाया आणि आश्वासन आहे जे इतके मजबूत आहे आणि इतके खंबीर आहे आणि इतके सुरक्षित आहे कीं हे अभिवचन कधी तोडले जाईल याची मुळीच शक्यता नाहीं. याच कारणस्तव मोठ्या संकटाच्या समयी ते सदैव-उपस्थित बळ ठरते. इतर कोणतीही गोष्ट मोडकळीस येते, इतर कोणतीही गोष्ट निराश करते, इतर कोणतीही गोष्ट अपयशी ठरते, पण भविष्यातील कृपेचे हे सर्व समावेशक अभिवचन कधीही अपयशी ठरू शकत नाहीं. 

“ज्यानें आपल्यां स्वतःच्या पुत्रास राखून न ठेवता त्याला आपल्यां सर्वांकरता समर्पण केलें, तो…” हाच तो पाया आहे. स्वर्गाचा तर्क म्हणतो कीं जर हे खरे असेल, तर मग देव त्या लोकांस ज्यांस त्यानें आपला पुत्र दिला, निश्चितच सर्वकाहीं देईल!

20 मार्च : कृपापूर्वक आभार

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20 मार्च : कृपापूर्वक आभार
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“उसकी महिमा की शक्ति के अनुसार सब प्रकार की सामर्थ्य से बलवन्त होते जाओ, यहाँ तक कि आनन्द के साथ हर प्रकार से धीरज और सहनशीलता दिखा सको, और पिता का धन्यवाद करते रहो, जिसने हमें इस योग्य बनाया कि ज्योति में पवित्र लोगों के साथ मीरास में सहभागी हों।”  कुलुस्सियों 1:11-12

लगभग हर व्यक्ति एक अच्छा उपहार पसन्द करता है। परिवार, आज़ादी, छुट्टी, एक गर्म बिछौना और एक ताजगी से भरा पेय, ये सभी हृदय में आभार उत्पन्न कर देते हैं और हम सभी स्वाभाविक रूप से उनके लिए कम से कम कुछ मात्रा में आभार व्यक्त करने में सक्षम होते हैं। “धन्यवाद” ऐसा शब्द है, जिसे हम बचपन में ही सीख जाते हैं।

अमेरिका के प्रसिद्ध जागृति-प्रचारक जॉनथन एडवर्ड्स ने “स्वाभाविक आभार” और “कृपापूर्वक आभार” के बीच अन्तर स्पष्ट करने में सहायक रीति से काम किया।[1] जो वस्तुएँ हमको दी जाती हैं और उनके साथ जो लाभ मिलते हैं, उनके द्वारा स्वाभाविक आभार का आरम्भ होता है। स्वाभाविक आभार कोई भी व्यक्ति व्यक्त कर सकता है। परन्तु कृपापूर्वक आभार बहुत अलग होता है, और केवल परमेश्वर की सन्तानें ही इसका अनुभव कर सकती हैं और इसे व्यक्त कर सकती हैं। कृपापूर्वक आभार परमेश्वर के द्वारा दिए गए किसी भी उपहार या सुख पर ध्यान दिए बिना उसके चरित्र, भलाई, प्रेम, सामर्थ्य और उत्कृष्टता को पहचानता है। वह जानता है कि हमारे पास परमेश्वर के प्रति आभारी होने का कारण है, फिर चाहे हमारा दिन अच्छा हो या बुरा, चाहे हमारे पास काम हो या न हो, चाहे दैनिक समाचार उत्साहजनक हों या पूरी तरह से निराशाजनक, चाहे हम पूरी तरह स्वस्थ हों या किसी घातक बीमारी का सामना कर रहे हों। ऐसा आभार केवल अनुग्रह से ही पाया जाता है, और यह किसी व्यक्ति के जीवन में पवित्र आत्मा का सच्चा चिह्न होता है। कृपापूर्वक आभार हमें इस जागरूकता के साथ सभी बातों का सामना करने में सक्षम बनाता है कि परमेश्वर हमारे जीवन और परिस्थितियों में गहन रूप से जुड़ा हुआ है, क्योंकि उसने हमें अपने प्रेम के विशेष पात्र बनाया है।

जब चेचक के टीके के कारण जॉनथन एडवर्ड्स की मृत्यु हो गई, तो उनकी पत्नी साराह ने अपनी बेटी को लिखा, “मैं क्या कहूँ? एक पवित्र और भले परमेश्वर ने हमें एक काले बादल से ढक दिया है।” इसमें जो सच्चाई है, उसको देखिए। इसमें खुशी या सन्तुष्टि का कोई ऊपरी अप्रिय दिखावा नहीं है। उनके पति की मृत्यु संयोगवश नहीं हुई थी, बल्कि यह उनके परिवार के विरुद्ध निर्णय लेने की परमेश्वर की सम्प्रभुता थी, जिसने जॉनथन को उसके अनन्त पुरस्कार के लिए घर लाने का सही समय निर्धारित किया था। और इसलिए साराह ने आगे लिखा, “किन्तु मेरा परमेश्वर जीवित है; और मेरा हृदय उसके पास है . . . हम सभी परमेश्वर को सौंप दिए गए हैं: और मैं वहीं हूँ, और वहीं रहना पसन्द करती हूँ।”[2]

दुख के समय में हम कभी भी स्वाभाविक आभार के द्वारा ऐसे शब्द नहीं बोल पाएँगे, जो हमें किसी को खो देने के समय सहायता नहीं कर सकते। ऐसी सोच केवल कृपापूर्वक आभार से ही प्रवाहित हो सकती है। हो सकता है कि आप इस समय कठिन या दिल तोड़ देने वाली परिस्थितियों का सामना कर रहे हों; और यदि आप अभी ऐसी परिस्थिति में नहीं हैं, तो कभी न कभी वह दिन अवश्य आएगा क्योंकि हम एक पतित संसार में जी रहे हैं। किन्तु उन क्षणों में आप परमेश्वर के प्रेम से लिपटे रह सकते हैं और परमेश्वर की भलाई पर भरोसा करने को चुन सकते हैं, जो सबसे स्पष्ट रीति से क्रूस पर व्यक्त हुई है। तब सबसे बुरे समय में भी आप उसकी उपस्थिति के आनन्द को जान पाएँगे और आपके पास सदैव उसे धन्यवाद देने का कारण होगा। यह कह सकने में बल, गरिमा और आराधना है, “यहोवा ने दिया और यहोवा ही ने लिया; यहोवा का नाम धन्य है” (अय्यूब 1:21)।       

रोमियों 11:33-36