ArchivesAlethia4India

4 June : देवाला ज्यां गोष्टीचा अभिमान वाटतो

Alethia4India
Alethia4India
4 June : देवाला ज्यां गोष्टीचा अभिमान वाटतो
Loading
/

पण आता ते अधिक चांगल्या देशाची म्हणजें स्वर्गीय देशाची उत्कंठा धरतात; ह्यामुळें आपणाला त्यांचा देव म्हणवून घ्यायला देवाला त्यांची लाज वाटत नाहीं; कारण त्यानें त्यांच्यासाठीं नगर तयार केलें आहे. (इब्री 11:16)

देव जे अब्राहाम, इसहाक व याकोबाबद्दल बोलला ते त्यानें माझ्या बद्दल देखील बोलावे असें मला खूप वाटते, कीं “मला तुमचा देव म्हणवून घ्यायलालाज वाटत नाहीं “

हे जरी जोखमीचे वाटत असलें तरी, याचा अर्थ असा नाहीं आहे का, कीं देवाला तो माझा देव असण्याबद्दल खरेच “गर्व” वाटत असावा? सुदैवानें ही अद्भुत शक्यता (इब्री 11:16 मध्यें) त्याच्या कारणांनी वेढलेंली आहे : एक आधी आणि एक नंतर.

पहिलं कारण म्हणजें : “आपणाला त्यांचा देव म्हणवून घ्यायला देवाला त्यांची लाज वाटत नाहीं; कारण त्यानें त्यांच्यासाठीं नगर तयार केलें आहे.”

त्याला आपला देव म्हणून घेण्यास लाज वाटत नाहीं याचे पहिलें कारण जे तो देतो ते हे कीं त्यानें त्यांच्यासाठीं काहीं तरी केलें आहे. त्यानी त्यांच्यासाठीं एक नगर बनवलें आहे – स्वर्गीय नगर जे “देवानें योजलेलें व बांधलेलें आहे ” (इब्री 11:10). यास्तव त्याला त्यांचा देव म्हणवून घेण्यास लाज वाटत नाहीं याचे पहिलें कारण हे कीं त्यानें त्यांच्यासाठीं कार्य केलें आहे. ना कीं आपण त्याच्यासाठीं काहींतरी केलें आहे.

आता, तो पुढे काय कारण देतो ते पहा. ते अश्या प्रकारे आहे : “पण ते अधिक चांगल्या देशाची म्हणजें स्वर्गीय देशाची उत्कंठा धरतात. त्यामुळें देवाला त्यांचा देव म्हणवून घ्यायला लाज वाटत नाहीं.”

“ह्यामुळें” निर्देशित करते कीं, आताच कारण दिलें गेलें आहे कीं का देवाला आमचा देव म्हणवून घेण्यास लाज वाटत नाहीं. याचे कारण आहे कीं ते उत्कंठा धरतात. ते चांगल्या देशाची इच्छा करतात – म्हणजेंच ते आता ज्या भौतिक राष्ट्रात राहत आहेत त्यापेक्षा जास्त चांगल्या देशाची ते उत्कंठा धरतात, स्वर्गीय शहर जेथे देव आहे.

जेव्हां आपण हे जग आपल्यांला जे देईल त्यापेक्षा, त्या स्वर्गीय नगराची उत्कंठा धरतो – जे देवाचे निवासस्थान आहे – तेव्हां देवाला आपला देव म्हणवून घेण्यास लाज वाटत नाहीं. देव आपल्यांला जे काहीं देऊ करणार आहे त्या अभिवचनांना आपण जेव्हां महत्व देतो तेव्हां, देवाला आपला गर्व वाटतो. ही चांगली बातमी आहे.

म्हणून, एका चांगल्या देशाकडें तुमची नजर वळवा, जे नगर देवानें आपल्यांकरिता बनवलें आहे, आणि पूर्ण अंत:करणनें त्याची उत्कंठा धरा. देवाला तुमचा देव म्हणवून घेण्यास लाज वाटणार नाहीं.

3 जून : विरासत छोड़कर जाना

Alethia4India
Alethia4India
3 जून : विरासत छोड़कर जाना
Loading
/

“पर तू सब बातों में सावधान रह, दुख उठा, सुसमाचार प्रचार का काम कर, और अपनी सेवा को पूरा कर।” 2 तीमुथियुस 4:5

हममें से प्रत्येक व्यक्ति एक विरासत छोड़ रहा है। हर दिन, हम अपने जीवन के चित्र में कुछ नया जोड़ रहे हैं, और अन्ततः जो कुछ हम पीछे छोड़ेंगे—हमारे निर्णय, हमारे योगदान, हमारी प्राथमिकताएँ—वे कुछ समय तक दूसरों के विचारों और चिन्तन में रहेंगे।

पौलुस द्वारा तीमुथियुस को लिखी दूसरी पत्री के अन्त में हमें एक वृद्ध व्यक्ति के शब्द मिलते हैं, जिसका जीवन समाप्ति की ओर बढ़ रहा था: वह कहता है, “अब मैं अर्घ के समान उण्डेला जाता हूँ, और मेरे कूच का समय आ पहुँचा है।” (2 तीमुथियुस 4:6)। इस सन्दर्भ में, वह तीमुथियुस को अपने उत्तरदायित्व को गम्भीरता से लेने, अपनी विरासत पर विचार करने, और उन अनेक लोगों द्वारा छोड़ी गई अच्छी और बुरी विरासतों पर ध्यान देने के लिए प्रेरित करता है, जिनसे पौलुस का सामना हुआ था।

पत्र के पहले अध्याय में, पौलुस तीमुथियुस को यह याद दिलाता है कि “आसिया वाले सब मुझ से फिर गए हैं, जिनमें फूगिलुस और हिरमुगिनेस हैं” (2 तीमुथियुस 1:15)। इन व्यक्तियों का बाइबल में केवल एक बार उल्लेख हुआ है और वह भी इस तथ्य को दर्ज करने के लिए कि उन्होंने जरूरत के समय पौलुस को छोड़ दिया। पौलुस तीमुथियुस को हुमिनयुस और फिलेतुस जैसे लोगों से भी सावधान रहने के लिए कहता है, जिनका “वचन सड़े घाव की तरह फैलता जाएगा।” और जिन्होंने “सत्य से भटक” कर गलत शिक्षा दी, और वह सिकन्दर ठठेरे का भी उल्लेख करता है, जिसने पौलुस के साथ “बहुत बुराइयाँ की” (2:17-18; 4:14)। जब हम इन व्यक्तियों द्वारा छोड़ी गई विरासत को देखते हैं, तो हमें त्याग, झूठी शिक्षा, और सुसमाचार के विरोध की विरासत दिखाई देती है।

लेकिन पौलुस का यह पत्र उन लोगों का भी उल्लेख करता है, जिन्होंने एक प्रेरणादायक और उपयोगी विरासत छोड़ी। उदाहरण के लिए, लोइस और यूनीके ने एक सच्चे विश्वास का प्रदर्शन किया, और पौलुस को पूरा भरोसा था कि वही विश्वास अब युवा पास्टर तीमुथियुस में भी है (2 तीमुथियुस 1:5)। इसी तरह, वह तीमुथियुस को उनेसिफुरुस को याद रखने के लिए कहता है, जिसने “बहुत बार मेरे जी को ठंडा किया और मेरी जंजीरों से लज्जित न हुआ। पर जब वह रोम में आया, तो बड़े यत्न से ढूँढ़कर मुझ से भेंट की” (पद 16-17)। उनेसिफुरुस ने विश्वास, साहस और दृढ़ निश्चय की विरासत छोड़ी। यदि उसने किसी स्थान पर रहने का वादा किया, तो वह वहाँ अवश्य होता था। वह ऐसा व्यक्ति था जिस पर पौलुस पूरी तरह भरोसा कर सकता था।

हम सभी एक विरासत छोड़ रहे हैं। जब हम किसी कमरे से बाहर निकलते हैं, तो या तो हम मसीह की सुगन्ध छोड़ते हैं, जो हर जगह उसकी पहचान फैलाती है (2 कुरिन्थियों 2:15-16), या हम आत्म-प्रचार की अप्रिय गन्ध या अर्थहीन उपस्थिति की शून्यता छोड़ जाते हैं। विश्वासयोग्यता, भक्ति, दयालुता, कोमलता, ईमानदारी, सत्यनिष्ठा, प्रेम, और शान्ति की विरासत वह विरासत है, जिसे स्नेह के साथ याद किया जाएगा। लेकिन सबसे महत्त्वपूर्ण बात यह है कि यह विरासत लोगों का ध्यान उस व्यक्ति की ओर ले जाएगी, जिसका जीवन सबसे अधिक मायने रखता है—अर्थात प्रभु यीशु की ओर।

एक विरासत, प्रतिदिन लिए गए उन छोटे-छोटे निर्णयों से बनती है, जो मसीह के लिए फर्क पैदा करने के लिए किए जाते हैं: उससे प्रेम करने, अपने पड़ोसी से प्रेम करने, शान्ति की खोज करने और उसके बारे में बात करने के निर्णय। आज, आप अपनी विरासत का एक छोटा—या शायद बहुत महत्त्वपूर्ण—हिस्से का निर्माण करेंगे। इसलिए वह कार्य करें जो परमेश्वर ने आपके लिए तैयार किया है, और उसके लिए एक फर्क पैदा करें। आखिरकार, क्या पता कि हम अपनी विरासत में आखिरी योगदान देकर कूच कर जाएँ।

तीतुस 2:2-14

पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: होशे 9–11; मत्ती 19 ◊

3 June :अशक्य गोष्टींसाठीं विश्वास

Alethia4India
Alethia4India
3 June :अशक्य गोष्टींसाठीं विश्वास
Loading
/

परंतु देवाच्या अभिवचनाकडें पाहून तो अविश्वासामुळें डळमळला नाहीं, तर विश्वासानें सबळ होऊन त्यानें देवाचा गौरव केला; ‘आणि देव आपण दिलेलें अभिवचन पूर्ण करण्यासही समर्थ आहे अशी त्याची पक्की खातरी होती. ( रोम 4:20-21).

विश्वास भविष्यातील देवाच्या कृपेचा गौरव करितो हे मानण्याकरिता पौलाकडें विशेष कारण होते. सरळ शब्दात सांगायचे झालें तर, याचे कारण म्हणजें देवाला गौरव देणारा विश्वास हा भविष्यातील अभिवचनांविषयीं देवाचा विश्वासूपणा आणि त्याचे सामर्थ्य आणि त्याचे ज्ञान यांत असणारी खात्री आहे.

अब्राहामानें देवाच्या अभिवचनांना कसा प्रतिसाद दिला याचे उदाहरण देऊन पौल हे स्पष्ट करतो : कीं तो अनेक राष्ट्रांचा पिता होणार जरी तो वयस्कर झाला होता आणि त्याची पत्नी वांझ होती तरीही. ‘“तशी तुझी संतती होईल,” ह्या वचनाप्रमाणें त्यानें ‘बहुत राष्ट्रांचा बाप’ व्हावे म्हणून आशेला जागा नसताही त्यानें आशेनें विश्वास ठेवला. (रोम 4:18) म्हणजेंच देवाच्या अभिवचनांत असलेंल्या भविष्यातील कृपेवर त्याचा विश्वास होता, जरी सर्व भौतिक पुरावे प्रतिकूल असलें तरी.

तथापि विश्वासानें दुर्बळ न होता, आपलें निर्जीव झालेलें शरीर (तो सुमारे शंभर वर्षांचा होता) व सारा हिच्या गर्भाशयाचे निर्जीवपण ही त्यानें लक्षात घेतली; आणि देव आपण दिलेलें अभिवचन पूर्ण करण्यासही समर्थ आहे अशी त्याची पक्की खातरी होती. परंतु देवाच्या अभिवचनाकडें पाहून तो अविश्वासामुळें डळमळला नाहीं, तर विश्वासानें सबळ होऊन त्यानें देवाचा गौरव केला; ‘आणि देव आपण दिलेलें अभिवचन पूर्ण करण्यासही समर्थ आहे अशी त्याची पक्की खातरी होती.  ( रोम 4:19-20)

अब्राहामाचा विश्वास देवाच्या या अभिवचनांवर होता कीं देव त्याला अनेक राष्ट्रांचा पिता बनविल. हा विश्वास देवाला गौरवणारा विश्वास होता कारण त्याद्वारें देवाच्या सर्वसमर्थ, अलौकिक संसाधंनें जे तो सर्व अभिवचनें पूर्ण करण्यासाठीं पुरवणार होता त्याच्यावर लक्ष केंद्रीत करणारा होता.

अब्राहाम हा वयस्कर झाला होता आणि सारा वांझ होती. इतकेच नाहीं तर : तुम्हीं एक किंवा दोन मुलां द्वारें “अनेक राष्ट्र” कशी बनवू शकता, ज्या बद्दल देवानें अब्राहमाला वचन दिलें होते? हे सर्व अशक्यप्राय होते.

त्यामुळें, अब्राहामाचा विश्वास देवाचा गौरव करणारा विश्वास होता, कीं देव जे मनुष्याला अशक्य ते शक्य करूं शकतो आणि तो ते करणार. आपल्यांला देखील अश्याप्रकारे विश्वास ठेवण्यास बोलावलें आहे. आपण जे आपल्यांसाठीं करूं शकत नाहीं ते देव आपल्यांसाठीं करील.  

2 जून : क्या वह फल पाएगा?

Alethia4India
Alethia4India
2 जून : क्या वह फल पाएगा?
Loading
/

“वह दूर से अंजीर का एक हरा पेड़ देखकर निकट गया कि क्या जाने उसमें कुछ पाए : पर पत्तों को छोड़ कुछ न पाया; क्योंकि फल का समय न था। इस पर उसने उससे कहा, ‘अब से कोई तेरा फल कभी न खाए!’ और उसके चेले सुन रहे थे।” मरकुस 11:13-14

यहाँ एक घटना प्रस्तुत की गई है जो “कठिनाइयों से भरी हुई है।”[1]

यीशु द्वारा अंजीर के पेड़ को श्राप देना चौंकाने वाली बात है क्योंकि यह विनाश का चमत्कार था। मरकुस के सुसमाचार में अब तक हमने यीशु को केवल रूपान्तरण या पुनर्स्थापना के चमत्कार करते हुए देखा था। चूंकि यह यीशु के अन्य कार्यों से पूरी तरह विपरीत था, इसलिए हमें इसके महत्त्व को गहराई से समझने की आवश्यकता है।

पुराने नियम में, दाखलता और अंजीर के पेड़ का उपयोग अक्सर इस्राएलियों की परमेश्वर के सामने स्थिति को दर्शाने के लिए रूपक के तौर पर किया गया है। जब दाखलता या अंजीर का पेड़ अच्छा फल उत्पन्न करता था, तो सब कुछ सही माना जाता था; लेकिन जब कोई फल नहीं होता था या बुरा फल उत्पन्न होता था, तो इसका अर्थ था कि परमेश्वर के लोग भटक गए हैं।

जब यीशु ने उस समय की धार्मिक गतिविधियों की ऊपरी चमक के पीछे के पूरे खालीपन को देखा, तो नबी मीका के ये शब्द उसके मन में आए होंगे: “हाय मुझ पर! क्योंकि मैं उस जन के समान हो गया हूँ जो धूपकाल के फल तोड़ने पर, या रही हुई दाख बीनने के समय के अन्त में आ जाए, मुझे तो पक्की अंजीरों की लालसा थी, परन्तु खाने के लिये कोई गुच्छा नहीं रहा।” (मीका 7:1)।

इसलिए, यीशु द्वारा अंजीर के पेड़ को श्राप देना कोई आकस्मिक घटना नहीं थी। यह एक भविष्यवाणी के तौर पर प्रतीकवाद से भरी हुई दृष्टान्त क्रिया थी। इस दृश्य के माध्यम से यीशु ने यह दिखाया कि यरूशलेम पर शीघ्र ही न्याय आने वाला था। यीशु धार्मिक जीवन का केन्द्र माने जाने वाले नगर में प्रार्थना और आत्मिक फलवन्तता की खोज में आया था, लेकिन वहाँ कुछ भी नहीं पाया। वह बाँझ अंजीर का पेड़ एक धार्मिक व्यवस्था का प्रतीक था, जो दिखावे के लिए परमेश्वर को सन्तुष्ट करने और आत्मा की भूख को तृप्त करने का दावा करता था, लेकिन जब लोग ऐसे धर्म की अधीनता में आते थे, तो उनकी सन्तुष्टि के लिए उसमें कुछ भी नहीं होता था—और परमेश्वर-पुत्र के इस दिव्य कार्य से यह स्पष्ट हो गया कि परमेश्वर इससे प्रसन्न नहीं था।

क्या भविष्यवाणी के तौर पर आई यह चेतावनी हमारे लिए भी कोई महत्त्व रखती है, जबकि हम अंजीर के पेड़ों और मन्दिरों से बहुत दूर हैं? हाँ! अच्छा फल उत्पन्न करने की चुनौती हमारे लिए भी बनी हुई है। लेकिन हमें इस बात से भी सावधान रहना चाहिए कि धार्मिक कर्मकाण्ड को निभाने या नियमों का पालन करने से आने वाली आत्म-धार्मिकता को हम सच्चे आत्मिक फल न समझ बैठें। परमेश्वर के लोग जीवन्त सम्बन्ध का स्थान खोखले कर्मकाण्ड को दे देने के खतरे में हमेशा रहते हैं। इस सूखे अंजीर के पेड़ की चेतावनी को मानने का सही तरीका क्या है? यीशु हमें बताता है: “जो डाली मुझमें है और नहीं फलती, [मेरा पिता] उसे वह काट डालता है . . . मैं दाखलता हूँ, तुम डालियाँ हो। जो मुझमें बना रहता है और मैं उसमें, वह बहुत फल फलता है, क्योंकि मुझसे अलग होकर तुम कुछ भी नहीं कर सकते” (यूहन्ना 15:2, 5)। दूसरे शब्दों में, समाधान यह नहीं है कि हम बेहतर करने का प्रयास करें, बल्कि यह है कि हम यीशु को और अधिक जानें और उसमें बने रहें।

क्या इस अंजीर के पेड़ के विवरण का कोई भी हिस्सा हमारे जीवन में भी सत्य है? जब यीशु आएगा और हमारी जाँच करेगा, तो क्या वह हमारे जीवन में फल पाएगा? क्या वह विश्वास पाएगा? अपने आप को यीशु से, जो सच्ची दाखलता है, जुड़ा रखें, और उसका आत्मा आपके जीवन में वही फल उत्पन्न करेगा जिसकी वह खोज कर रहा है।

  यूहन्ना 15:1-11

◊ पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: होशे 5–8; मत्ती 18:21-35


[1] सी. ई. बी. क्रैनफील्ड, द गॉस्पल अकोर्डिंग टू मार्क, केम्ब्रिज ग्रीक टेस्टामेण्ट कॉमैण्ट्री, सम्पादक सी.एफ.डी. मूल (1959; पुनः मुद्रित केम्ब्रिज यूनिवर्सिटी प्रेस, 2000), पृ. 354.

2 June : अब्राहामाचे वंशज कोण?

Alethia4India
Alethia4India
2 June : अब्राहामाचे वंशज कोण?
Loading
/

“तुझ्या द्वारें पृथ्वीवरील सर्व कुळे आशीर्वादित होतील.” (उत्पत्ती 12:3)

जे तुम्हीं ख्रिस्तामध्यें आशा ठेवता आणि आज्ञाधारकपणें त्याला अनुसरता, ते तुम्हीं अब्राहामाचे वंशज आहात आणि त्याच्या कराराच्या अभिवचनांचे वारस आहात.

उत्पत्ती 17:4, मध्यें देव अब्राहामाला म्हणाला, ‘“पाहा, तुझ्याशी माझा करार हा : तू राष्ट्रसमूहाचा जनक होशील.” पण उत्पत्तीच्या पुस्तकांतून हे स्पष्ट होते कीं अब्राहाम हा पृथ्वीवरील सर्व कुळांचा जनक झाला तो ते शारीरिकरित्या किंवा राजकींयरित्या नाहीं. म्हणूनच देवाच्या ह्या अभिवचनाचा अर्थ असा असण्याची शक्यता आहे कीं, अनेक राष्ट्रे, जरी ते देहानुसार अब्राहामाच्या रक्ताचे नसलें तरी ते कोणत्या तरी प्रकारे त्याचे पुत्र म्हणून आशीर्वादीत होतील.

उत्पत्ती 12:3 मध्यें देव जे अब्राहामाला बोलला, “तुझ्या द्वारें पृथ्वीवरील सर्व कुळे आशीर्वादित होतील” तेव्हां हांच त्याचा अर्थ होता यांत काहींच शंका नाहीं. सुरुवातीपासूनच देवाचा मानस होता कीं येशू ख्रिस्ताचा जन्म अब्राहामाच्या वंशात व्हावा आणि जे सर्व ख्रिस्तामध्यें विश्वास ठेवतात त्यांनी अब्राहामाला दिलेल्यां आशीर्वादांचे वारस व्हावे. गलती 3:29 मध्यें पौल म्हणतो, ‘आणि तुम्हीं जर ख्रिस्ताचे आहात तर अब्राहामाचे संतान आणि अभिवचनानुसार वारस आहां.’

4,000 हजार वर्षापूर्वी जेव्हां देव अब्राहामाला बोलला, ‘“पाहा, तुझ्याशी माझा करार हा : तू राष्ट्रसमूहाचा जनक होशील” तेव्हां देवानें त्या द्वारें आपल्यांकरिता मार्ग मोकळा केला, आपण परराष्ट्रीय असलो तरी आपण अब्राहामाची संतान बनू शकतो आणि देवाच्या अभिवचनांचे वारस बनू शकू. आपल्यांला इतकेच करायचे आहे कीं आपल्यांला अब्राहामा सारखाच विश्वास ठेवायचा आहे- म्हणजें देवाच्या अभिवचनांवर भाव ठेवायचा आहे, तो इतका कीं, जर या आज्ञाधारकपणात आपल्यांला प्रिय असणार्‍या गोष्टी देखील बलिदान करण्याची तयारी ठेवावी लागेल जसे अब्राहामानें इसाकाला.

आपण अब्राहामाच्या अभिवचनांचे वारीस कोणतेही कर्म केल्यां द्वारें होऊ शकत नाहीं, तर देव स्वतः आपल्यां करिता कार्य करतो या गोष्टीची खात्री ठेवून आपण वारीस होऊ शकतो. “[ अब्राहाम ] परंतु देवाच्या अभिवचनाकडें पाहून तो अविश्वासामुळें डळमळला नाहीं, तर विश्वासानें सबळ होऊन त्यानें देवाचा गौरव केला; ‘आणि देव आपण दिलेलें अभिवचन पूर्ण करण्यासही समर्थ आहे अशी त्याची पक्की खातरी होती.’ ( रोम 4:20-21). यामुळेंच अब्राहाम देवाची आज्ञा पाळू शकला जरी आज्ञापालन व्यर्थ वाटत असलें तरी. देव अशक्य ते शक्य करूं शकतो यावर त्यानें भरवसा ठेवला – जसे कीं त्याच्या मुलाला मरणातून पुन्हा जीवंत करणें.

देवाच्या अभिवचनांमध्यें विश्वास ठेवणें – किंवा आज आपण म्हणू शकतो कीं, ख्रिस्तावर विश्वास ठेवणें, जो देवाच्या अभिवचनाची पूर्तता आहे – त्याच्यावर विश्वास ठेवणें हा अब्राहामाची संतान  होण्याचा मार्ग आहे; आज्ञापालन या गोष्टीचा पुरावा आहे कीं आपला विश्वास हा खरा आहे ( उत्पत्ती 22:12-19). म्हणून येशू योहान 8:39 मध्यें म्हणतो, “जर तुम्हीं अब्राहामाची मुलें आहात तर अब्राहामाची कृत्ये करा.”

अब्राहामाची संतान ही सर्व राष्ट्रातील ती लोकं आहेत ज्यांनी त्यांची आशा येशू ख्रिस्तामध्यें ठेवली आहे, आणि त्यामुळें जशी अब्राहामानें मोरीया पर्वतावर आशा ठेवली, त्याप्रमाणें त्यांचा सर्वात मोलवान जगीक ठेवा देखील त्यांच्या आज्ञाधारकतेला रोखू शकत नाहीं.

जे तुम्हीं येशू ख्रिस्तामध्यें आशा ठेवता आणि विश्वासाचे आज्ञापालन करून त्याला अनुसरता, ते तुम्हीं अब्राहामाचे वंशज आहात आणि त्याच्या कराराच्या अभिवचनाचे वारस आहात.

1 जून : नबी का बोझ

Alethia4India
Alethia4India
1 जून : नबी का बोझ
Loading
/

“भारी वचन जिसको हबक्कूक नबी ने दर्शन में पाया।” हबक्कूक 1:1

सच्चे भविष्यवक्ताओं का महत्त्व कभी इस बात में नहीं था कि वे कौन थे, बल्कि उस सन्देश में था जो वे सुनाते थे। हमारे लिए भी यही सच होना चाहिए।

उदाहरण के लिए, हबक्कूक को ही लें। उसकी जीवनी सम्बन्धी जानकारी लगभग न के बराबर है। हम उसके बारे में जो कुछ भी जानते हैं, वह केवल उस भविष्यवाणी की पुस्तक से मिलता है जो उसके नाम से जानी जाती है, और वह भी हमें बहुत कम जानकारी देती है। आपको हबक्कूक का उल्लेख पुराने नियम में कहीं और नहीं मिलेगा। हालाँकि, यह चुप्पी अपने आप में महत्त्वपूर्ण है। हबक्कूक की पहचान उसके व्यक्तित्व में नहीं, बल्कि उसके बुलावे और उसके सन्देश में थी।

हमें यह दृष्टिकोण पूरी बाइबल में भविष्यवाणी से सम्बन्धित घटनाओं में मिलता है। कुछ भविष्यवक्ताओं के बारे में हमें अधिक जानकारी मिलती है, तो कुछ के बारे में बहुत कम। लेकिन जो कुछ भी हमें उनके बारे में बताया गया है, वह असाधारण या प्रभावशाली नहीं है। उदाहरण के लिए, परमेश्वर द्वारा आमोस को बुलावा दिए जाने से पहले वह केवल “गाय–बैलों का चरवाहा, और गूलर के वृक्षों का छाँटने वाला था” (आमोस 7:14)। इसी तरह, जब यूहन्ना बपतिस्मा देने वाले से पूछा गया कि वह कौन है, तो उसने गवाही दी, मैं जंगल में पुकारने वाले की आवाज़ हूँ। मैं कुछ समय के लिए जलती और चमकती हुई जोत हूँ, लेकिन यीशु संसार की ज्योति हैं। मैं केवल मसीह की ओर इशारा करने वाली अंगुली हूँ; वह बढ़ता जाए और मैं घटता जाऊँ (यूहन्ना 1:23; 5:35; 3:30 देखें)।

हबक्कूक की पुस्तक के पहले पद में जिस शब्द का अनुवाद “भारी वचन” किया गया है, उसका अनुवाद कभी-कभी “बोझ” भी किया जाता है। यह बोझ क्या था? यह वही बोझ था जिसे भविष्यवक्ता ने परमेश्वर से मिली समझ के अनुसार कुछ परिस्थितियों को देखकर महसूस किया—ऐसी परिस्थितियों को जिन्हें दूसरे भी देख रहे थे, लेकिन समझ नहीं पा रहे थे। यह परमेश्वर की बुद्धि और योजनाओं को उन लोगों के सामने प्रस्तुत करने का बोझ भी था, जो उसे सुन रहे थे।

आज के समय में, जब लोग व्यक्तित्व और योग्यताओं पर अधिक ध्यान देते हैं, वहीं हमारा मुख्य ध्यान सुसमाचार प्रचार, शिक्षण, और साझा करने में इसके सन्देश पर होना चाहिए। हर प्रवचन, हर शिक्षण और हर सुसमाचार वार्तालाप घास की तरह मुरझा जाता है, लेकिन इसकी एकमात्र सच्ची कीमत तब सामने आती है जब परमेश्वर के अटल सत्य और विश्वसनीयता की जड़ें सुनने वाले के हृदय में जम जाती हैं। जैसा कि डेविड वेल्स लिखते हैं, “प्रचार—और परमेश्वर के वचन में से परमेश्वर के किसी भी सत्य का संवाद—कोई साधारण बातचीत या दिलचस्प विचारों की चर्चा नहीं है. . . नहीं! यह परमेश्वर की वाणी है! जब प्रचारक का मन पवित्रशास्त्र के पदों पर केन्द्रित होता है और उसका हृदय परमेश्वर की उपस्थिति में होता है, तब उसके मुख से निकलने वाले शब्दों में से स्वयं परमेश्वर बोल रहा होता है।”[1]

चाहे हमें प्रचार करने, सिखाने, या अपने पड़ोसी के साथ परमेश्वर का वचन साझा करने के लिए बुलाया गया हो, इस सन्देश में हमारे लिए एक महत्त्वपूर्ण शिक्षा है: हमारे भीतर सच्ची नम्रता होनी चाहिए, जो हमारे जीवन में परमेश्वर के जबरदस्त बुलावे की समझ में से उत्पन्न होती है। साथ ही, हमें इसमें उत्साह भी होना चाहिए, क्योंकि इस जीवन में इससे अधिक मूल्यवान कार्य और क्या हो सकता है? यह सन्देश हमसे बहुत बड़ा है, और लोगों के जीवन में इसके प्रभाव अनन्त काल तक बने रहेंगे। आज, सन्देशवाहक की अपनी योग्यताओं और क्षमताओं की चिन्ता न करें; बल्कि इस बात की चिन्ता करें कि परमेश्वर का सन्देश सही तरीके से साझा हो, चाहे वह किसी भी रूप में हो और किसी भी व्यक्ति के साथ हो।

  रोमियों 10:11-17 पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: होशे 1–4; मत्ती 18:1-20 ◊


[1] द करेज टू बी प्रोटेस्टेण्ट: ट्रुथ-लवर्स, मार्केटर्स ऐण्ड इमर्जेण्ट्स इन द पोस्टमोडर्न वर्ल्ड (आई.वी.पी., 2008), पृ. 230.

1 June : देवाच्या कृपेला उंचवणारा विश्वास

Alethia4India
Alethia4India
1 June : देवाच्या कृपेला उंचवणारा विश्वास
Loading
/

मी देवाची कृपा व्यर्थ करत नाहीं. (गलती 2:22)

मी लहानपणी समुद्रकिनारी असताना एका मोठ्या लाटेमुळें पाय सटकून पडलो, तेव्हां मला वाटलें कीं मी क्षणातच समुद्रात ओढला जाणार आहे.

ती खूप भीतीदायक गोष्ट होती. मी माझा तोल सावरू लागलो आणि पाहू लागलो कीं उभे कसे राहता येईल. पण लाटेचा जोर इतका शक्तिशाली होता कीं मी पोहू देखील शकत नव्हतो, आणि मी माझें पाय जमिनीवर ठेवू शकत नव्हतो. शिवाय, मी चांगला पोहू पण शकत नव्हतो.

मी भीतीच्या त्या अवस्थेंत असतांना मला एकच विचार आला : कोणी माझी मदत करील का? पण पाण्याच्या आतून मी कुणाला हाक पण मारू शकत नव्हतो.

जेव्हां माझ्या वडिलांनी माझ्या हाताला मजबुतीनें पकडलें, तो माझ्या जीवनातला सर्वात मधुर क्षण होता. मी त्यांच्या ताकती पुढे स्वता:ला पूर्णपणें आत्म-समर्पण केलें. मला उचलून धरण्याची त्यांची जी इच्छा होती तिचा मी आनंद घेऊ लागलो. मी त्यांचा प्रतिकार केला नाहीं.

माझ्या मनात हा विचार आला नाहीं कीं मी असें दाखवावे कीं स्थिति इतकीं पण वाईट नव्हती, आणि माझ्या वडीलांच्या हाताला मी पण माझी ताकत लावावी. मला इतकेच वाटत होते कीं, होय! मला तुमची गरज आहे! मी तुमचा आभारी आहे ! मला तुमचे सामर्थ्य आवडलें! मला तुमचा पुढाकार आवडला! मला तुमची पकड आवडली! तुम्हीं महान आहां!

आत्म-समर्पणाच्या त्या प्रीतिमध्यें कोणी आढ्यता मिरवू शकत नाहीं. आत्म-समर्पणाच्या त्या प्रीतिला मी “विश्वास” असें मानतो. आणि पाण्यात बुडत असताना मला ज्या साहाय्याची गरज होती, म्हणजें माझें वडील, ते देवाच्या भावी कृपेची प्रचिती होते, व हेच साहाय्य मला हवे होते. हाच तो विश्वास आहे जो कृपेला उंचवितो.

ख्रिस्ती जीवन कसे जगायचे याचा जेव्हां आपण विचार करतो तेव्हां ह्या विचाराला प्रथम स्थान दिलें गेलें पाहिजे कीं : मी देवाच्या कृपेला व्यर्थ न ठरवता तिला कसे उंचावू शकतो? याचे उत्तर पौल गलती 2:20:21 मध्यें देतो. “मी ख्रिस्ताबरोबर वधस्तंभावर खिळलेंला आहे; आणि ह्यापुढे मी जगतो असें नाहीं, तर ख्रिस्त माझ्या ठायी जगतो; आणि आता देहामध्यें जे माझें जीवित आहे ते देवाच्या पुत्रावरील विश्वासाच्या योगानें आहे; त्यानें माझ्यावर प्रीती केली व स्वत:ला माझ्याकरता दिलें. मी देवाची कृपा व्यर्थ करत नाहीं.”

त्याचे जीवन देवाची कृपा व्यर्थ करणारे का नव्हते? कारण तो देवाच्या पुत्रावर विश्वास ठेवणारे जीवन जगत होता. विश्वास सर्व लक्ष कृपेकडें निर्देशित करतो, ना कीं ती व्यर्थ करतो. 

11 मई : यह प्रभु का काम है

Alethia4India
Alethia4India
11 मई : यह प्रभु का काम है
Loading
/

“तब वह [नाओमी] मोआब के देश में यह सुनकर कि यहोवा ने अपनी प्रजा के लोगों की सुधि ले के उन्हें भोजन वस्तु दी है, उस देश से अपनी दोनों बहुओं समेत लौट जाने को चली।” रूत 1:6

बैतलहम बाइबल के इतिहास में एक प्रमुख नगर है। राजगद्दी सम्भालने से पहले दाऊद ने इसी नगर में अपनी भेड़ें चराईं थीं। एक हज़ार साल बाद, जब विभिन्न चरवाहे अपनी भेड़ों के झुण्डों की देखभाल कर रहे थे, तो इसी नगर में स्वर्गदूतों के एक दल ने यीशु मसीह के जन्म की घोषणा की।

हालाँकि इन दोनों महत्त्वपूर्ण घटनाओं से पहले न्यायाधीशों का काल था, जो हिंसा, सामाजिक और राजनीतिक अराजकता, और धार्मिक उथल-पुथल से भरा हुआ था। इस उथल-पुथल के दौरान, बैतलहम में अकाल पड़ा, जिससे यह नगर, जिसका नाम इब्रानी भाषा में “रोटी का घर” है, भूख और निराशा का एक घर बन गया।

इन निराशाजनक परिस्थितियों में, एलीमेलेक नाम का एक व्यक्ति भोजन की तलाश में अपनी पत्नी नाओमी और अपने दो बेटों को मोआब देश में ले गया। जबकि एलीमेलेक नाम का अर्थ “मेरा परमेश्वर राजा है” है, लेकिन इस्राएल के शत्रुओं के देश मोआब में जाने का उसका निर्णय यह सवाल उठाता है कि क्या वह वास्तव में परमेश्वर के प्रावधान पर विश्वास कर भी रहा था या नहीं, या उसकी आज्ञा का पालन करने के लिए प्रतिबद्ध था भी या नहीं।

मोआब भोजन की भूमि नहीं, बल्कि शोक का स्थान साबित हुआ। एलीमेलेक और उसके बेटों की मृत्यु हो गई, और नाओमी विधवा हो गई। हालाँकि, कुछ वर्षों बाद, नाओमी के दर्द के अंधकार में एक छोटी सी उम्मीद की किरण जागी; उसे यह समाचार मिला कि बैतलहम में भोजन लौट आया था। परमेश्वर ने अपने देश में अपनी प्रजा के लिए प्रावधान किया था।

हज़ारों साल बाद, हम इस सत्य को जल्दी से नजरअंदाज करने के लिए प्रलोभित हो सकते हैं: कि परमेश्वर अपनी प्रजा को वही प्रदान करता है, जिसकी उन्हें आवश्यकता होती है। शायद आप अपने उद्धार के बारे में यह तथ्य जानते हैं—लेकिन यह कितना आसान है कि हम उसके दैनिक प्रावधान के बारे में भूल जाएँ! क्या हमारे पास उन चीजों को देखने की दृष्टि है जो परमेश्वर हमारे दैनिक जीवन में हमें दे रहा है और हमारे लिए कर रहा है? क्या हर दिन के अन्त में उन कामों के लिए हमारे दिलों में धन्यवाद भरा हुआ होता है, जो उसने हमारे लिए किए हैं?

परमेश्वर के निरन्तर प्रावधान का एक व्यावहारिक उदाहरण वह भोजन है, जो हमें प्रतिदिन मिलता है। किराने की दुकान में यदि किसी को सबसे अधिक आभार और आश्चर्य के साथ देखना चाहिए, तो वह मसीही लोग हैं! आखिरकार, परमेश्वर ही तो है जो हमारी दुकानों और भण्डारगृहों को भोजन से भरता है। हम दुकान से अण्डे और दूध खरीदते हुए यह कह सकते हैं, “यह तो यहोवा की ओर से हुआ है, यह हमारी दृष्‍टि में अद्‌भुत है” (भजन 118:23)।

चाहे जीवन की घटनाएँ कितनी भी अंधकारमय और नाटकीय क्यों न दिखें, परमेश्वर अब भी अपनी प्रजा की चिन्ता करता है और अपनी योजनाओं को पूरा करता है, और वह अक्सर इसे अप्रत्याशित व्यक्तियों के माध्यम से और शान्त तरीकों से करता है। उसने नाओमी और उसके परिवार के माध्यम से महान कार्य करने का उद्देश्य रखा था—और यह बैतलहम में रोटी से शुरू हुआ। हमें भी अपनी आँखें खोलनी चाहिए ताकि हम देख सकें कि परमेश्वर द्वारा भोजन प्रदान करना हमारी सबसे बड़ी स्थाई आवश्यकता—हमारे उद्धारकर्ता, यीशु मसीह—के प्रावधान की ओर तथा हमारे उच्चतम बुलावे की ओर इशारा करता है: अर्थात हम उसकी महिमा के लिए “उन भले कामों के लिए सृजे गए जिन्हें परमेश्‍वर ने पहले से हमारे करने के लिये तैयार किया” (इफिसियों 2:10)।

प्रेरितों 17:24-31

10 मई : नियम एवं शर्तें

Alethia4India
Alethia4India
10 मई : नियम एवं शर्तें
Loading
/

“उसने भीड़ को अपने चेलों समेत पास बुलाकर उनसे कहा, “जो कोई मेरे पीछे आना चाहे, वह अपने आपे से इनकार करे और अपना क्रूस उठाकर, मेरे पीछे हो ले। क्योंकि जो कोई अपना प्राण बचाना चाहे वह उसे खोएगा, पर जो कोई मेरे और सुसमाचार के लिए अपना प्राण खोएगा, वह उसे बचाएगा।” मरकुस 8:34-35

ऑनलाइन कुछ भी करने से पहले हमें अक्सर उपयोग की शर्तों और नीतियों को सहमति देनी होती है। और जब हम “मैं सहमत हूँ” बॉक्स पर टिक करते हैं, तो क्रेडिट कार्ड कम्पनियाँ, सोशल मीडिया प्लेटफार्म और वेबसाइटें समय-समय पर हमें सूचित करती हैं कि उनकी कानूनी नीतियाँ बदल गई हैं—और यह कि सेवा का उपयोग जारी रखने के लिए हमें नई नीतियों को स्वीकार करना होगा।

ऐसी बदलती नीतियाँ अक्सर बार-बार होती हैं और सूक्ष्म होती हैं। इन्हें पहचानना या इन पर नज़र रखना लगभग असम्भव होता है। फिर भी, यह सौभाग्य की बात है कि मसीह के अनुयायी बनने की “शर्तें और नीतियाँ” कभी नहीं बदलतीं, और कभी नहीं बदलेंगी। उन्हें न तो हटाया जा सकता है और न ही हमारी पसन्द के अनुसार बदला जा सकता है, क्योंकि उन्हें परमेश्वर ने स्थापित किया है। इन पदों में, परमेश्वर के पुत्र ने अपने लोग बनने और अनन्त जीवन पाने के लिए “शर्तें और नीतियाँ” निर्धारित की हैं।

हम कभी-कभी ऐसा व्यवहार करते हैं मानो हमें प्रभु की आज्ञा का पालन करने के लिए खुद को मजबूर करना होगा। लेकिन सच्चाई इसके विपरीत है! बाइबल कहती है कि जैसे हम यीशु की पहल और अनुग्रह के उत्तर स्वरूप उस पर विश्वास करते हैं (इफिसियों 2:8), वैसे ही वही अनुग्रह हमें बनाए रखता है और हमें उसके पीछे चलने में सक्षम बनाता है (फिलिप्पियों 1:6)। वह हमारे विचारों, हमारी नैतिकता, हमारे व्यवहार और हमारे संसाधनों को आकार देता है, ताकि हम उसके नियन्त्रण के अधीन आ सकें, जिसे हमने अपनी महिमा माना है।

मसीह का अनुसरण करने की एक “शर्त” यह है कि अब हमारे जीवन का केन्द्र हम स्वयं नहीं हैं। हमारी व्यक्तिगत पहचान और लक्ष्य प्राथमिकता नहीं हैं। इसके बजाय, हमारा रूपान्तरण हो जाता है, ताकि मसीह के साथ हमारी एकता के माध्यम से बाहर के संसार के सामने हम दृश्य रूप में फल ला सकें। वह हमें आत्म-उपासना का पूर्ण रूप से खण्डन करने का बुलावा देता है।

स्वयं को नकारने के द्वारा हम अपने क्रूस को उठाते हैं और मसीह का अनुसरण करते हैं। दुर्भाग्य से, “अपना क्रूस उठाने” का रूपक अक्सर हल्का कर दिया जाता है; हमें याद रखना चाहिए कि क्रूस की मृत्यु वास्तव में मानवता द्वारा आविष्कार की गई सबसे क्रूर और भयंकर मृत्यु की विधियों में से एक थी। क्रूस उठाने के इस रूपक का उपयोग करके यीशु यह स्पष्ट कर रहा है कि शिष्यता का एक बड़ा मूल्य है।

लेकिन मसीह हमें ऐसा कुछ करने के लिए नहीं कह रहा है, जो उसने पहले न किया हो। वही क्रूस था, जिस पर उसने हमें एक मूल्य चुकाकर खरीदा (1 कुरिन्थियों 6:20)। इसलिए उसकी शिष्यता में चलना हमारे पुराने मनुष्यत्व की मृत्यु की ओर तथा अनन्त जीवन की ओर ले जाने वाला एक अभियान है। यह एक सैर नहीं है, बल्कि एक जीवित बलिदान है, क्योंकि हम अपने नहीं हैं। लेकिन आशा रखें, क्योंकि इस अभियान में भी एक सुन्दरता है। एक दिन, मानव-पुत्र शक्ति और महिमा में वापस आएगा, और हरेक टूटे हुए को अपने राज्य में पुनः स्थापित करेगा। तब तक, परमेश्वर के राज्य के लिए अपने जीवन को खोना एक अच्छा निवेश है, चाहे मूल्य कुछ भी हो।

1 पतरस 3:13 – 4:11

9 मई : पूरी सहानुभूति

Alethia4India
Alethia4India
9 मई : पूरी सहानुभूति
Loading
/

“इस कारण उसको चाहिए था, कि सब बातों में अपने भाइयों के समान बने; जिससे वह उन बातों में जो परमेश्‍वर से सम्बन्ध रखती हैं, एक दयालु और विश्वासयोग्य महायाजक बने ताकि लोगों के पापों के लिए प्रायश्चित करे। क्योंकि जब उसने परीक्षा की दशा में दुख उठाया, तो वह उनकी भी सहायता कर सकता है जिनकी परीक्षा होती है।” इब्रानियों 2:17-18

हममें से कई लोग इस बात से हतोत्साहित होते हैं कि हमें कितनी बार प्रलोभन का सामना करना पड़ता है। हम अपने जीवन में प्रलोभन के अपार आकर्षण से शर्मिन्दा हो सकते हैं। यह हम पर पूरी तरह से हावी हो सकता है। ऐसे क्षणों में यह याद रखना महत्त्वपूर्ण है कि प्रलोभन का अनुभव करना अपने आप में पाप नहीं है—क्योंकि मसीह ने भी, जो निष्पाप था, इसका सामना किया था। लेकिन क्योंकि उसने प्रलोभनों के आगे आत्मसमर्पण नहीं किया, जैसा कि हम अक्सर करते हैं, इसलिए धार्मिकता का पालन करने में वह हमारे लिए परम आदर्श है।

जब मसीह ने मानव स्वभाव को अपनाया, तो वह इसकी सीमाओं और परीक्षणों के अधीन हो गया। इसलिए, हालाँकि यीशु परमेश्वर का दिव्य पुत्र और हमारा महान महायाजक है, केवल एक सामान्य इंसान नहीं है, हम यह जानकर हिम्मत पा सकते हैं कि वह हमारे संघर्षों के साथ पूरी तरह से सहानुभूति रख सकता है।

आपके और मेरे सामने आने वाली परीक्षाओं के मध्य में मसीह की सहानुभूति पाप के अनुभव पर निर्भर नहीं है, बल्कि पाप के प्रलोभन के अनुभव पर निर्भर है, जिसे केवल वही पूरी तरह जान सकता है जो वास्तव में निष्पाप है। यीशु दूर रहकर सहानुभूति नहीं दिखाता; वह प्रलोभन का सामना करने की पीड़ा और चुनौती को गहराई से जानता है। उसने हमारी पृथ्वी पर की राहों पर चलकर इसे अनुभव किया है।

तो फिर, जब आप प्रलोभन का सामना करने के बारे में सबसे ज्यादा जागरूक होते हैं और अपनी कमजोरियों के बारे में सबसे ज्यादा जागरूक होते हैं, तब आप इस स्थान पर जा सकते हैं। 21वीं सदी के “महान प्रधान याजकों” की सांसारिक बुद्धि पर भरोसा मत करें, जो आपको बताएँगे कि प्रलोभन इच्छाओं को पूरा करने के लिए ही आते हैं, कि दोषी महसूस करना एक बीमारी है जिसे नकारा जाना चाहिए, और कि शर्म हमेशा अनावश्यक और हानिकारक होती है। इसके बजाय सच्चे महान महायाजक की ओर मुड़ें, जो आपको बताता है कि प्रलोभनों का प्रतिरोध किया जाना चाहिए और जो आपको ऐसा करने की शक्ति भी प्रदान करता है (1 कुरिन्थियों 10:13), और जो आपको यह भी आश्वस्त करता है कि जब आप प्रलोभनों में आत्मसमर्पण कर देते हैं, तो आपका दोष और शर्म उसके शरीर में सहन कर लिया गया है और क्रूस पर मिटा दिया गया।

प्रभु यीशु मसीह के साथ सम्बन्ध में सबसे सुन्दर बात यह है कि आप पूरे आत्मविश्वास के साथ उसके पास जा सकते हैं, जिसने आपके लिए अपने प्राण दे दिए ताकि आप अपने विश्वास को दृढ़ता से पकड़ सकें। आप नियमित रूप से, विनम्रता से, विश्वास के साथ सर्वशक्तिमान परमेश्वर की उपस्थिति में आ सकते हैं, जो आपको सहानुभूति देने वाले मसीह के माध्यम से आपका स्वागत करता है। और अन्ततः, अनन्त काल में ऐसा कुछ भी नहीं होगा जिसके लिए मसीह को आपके पक्ष में प्रार्थना करने की आवश्यकता होगी। आप बस परमेश्वर के सामने खड़े हो सकेंगे और इस बात के लिए उसकी वन्दना कर सकेंगे कि उसने अपनी सिद्ध उपस्थिति में प्रवेश करने का निमन्त्रण आपको दिया। तब तक, उससे प्रार्थना करें जो यह जानता है कि प्रलोभन का सामना करना और प्रतिरोध करना क्या होता है, ताकि वह प्रलोभनों से आपके युद्ध के समय और आज आपके द्वारा उसके आज्ञापालन के प्रयासों में वह आपके साथ हो।

इब्रानियों  2:5-18