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24 जुलाई : अधर्मी क्रोध

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24 जुलाई : अधर्मी क्रोध
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“अपनी पत्नी की ये बातें सुनकर कि तेरे दास ने मुझसे ऐसा-ऐसा काम किया, यूसुफ के स्वामी का कोप भड़का। और यूसुफ के स्वामी ने उसको पकड़कर बन्दीगृह में, जहाँ राजा के कैदी बन्द थे, डलवा दिया; अतः वह उस बन्दीगृह में रहा।” उत्पत्ति 39:19-20

पोतीपर लोगों को परखने में माहिर था। फिरौन के अधिकारी और गार्ड के कप्तान के रूप में उसके जीवन के अधिकांश समय में कई लोग उसकी अधीनता में रहे होंगे। उसके अनुभव ने उसे यह देखने में सक्षम बनाया कि यूसुफ में कुछ खास बात थी।

यूसुफ अन्य नौकरों जैसा नहीं था; वह सबसे अच्छा नौकर था। पोतीपर के सभी कार्य यूसुफ की देखरेख में समृद्ध हुए थे, और पोतीपर ने सब कुछ उसकी देखरेख में सौंप दिया था—सिर्फ अपनी पत्नी को छोड़कर बाकी सब कुछ।

इसलिए यह कोई आश्चर्य की बात नहीं है कि जब पोतीपर की पत्नी ने यूसुफ पर बलात्कार के प्रयास का आरोप लगाया, तो पोतीपर ने गुस्से और क्रोध में प्रतिक्रिया की। कोई भी सम्मानजनक पति इसी तरीके से प्रतिक्रिया करेगा। इस तरह की सुरक्षा बिल्कुल सही है और हमें पोतीपर से इसी प्रकार की प्रतिक्रिया की अपेक्षा करनी चाहिए।

पोतीपर की गलती उसकी प्रारम्भिक प्रतिक्रिया में नहीं थी, बल्कि यह थी कि उसने यूसुफ के खिलाफ निर्णय सुनाने में बहुत जल्दबाजी की थी। इस बारे में कोई उल्लेख नहीं है कि पोतीपर ने दी गई जानकारी की सही से जाँच की, और न ही उसने अपनी पत्नी के आरोप पर यूसुफ की ईमानदारी के सन्दर्भ में विचार किया। इसके बजाय, पोतीपर ने अपने क्रोध को अपने निर्णय से अधिक प्रभावी होने दिया। क्रोध ने पोतीपर को सत्य और तर्क के प्रति अंधा कर दिया।

साथ ही, पोतीपर अपनी पत्नी के अत्यधिक प्रभाव में भी था। बेशक, हम सभी अपने करीबी साथियों से प्रभावित होते हैं और कई बार यह सहायक भी होता है। लेकिन हमें परमेश्वर के अतिरिक्त अन्य किसी से भी अत्यधिक प्रभावित नहीं होना चाहिए। जब हम निर्णय लेने के समय इस प्रकार के प्रभाव को स्वीकार करते हैं, तो हम न केवल अपने आप को, बल्कि अपने आस-पास के सभी लोगों को भी खतरे में डाल देते हैं। इसके बजाय, हमें “सम्मति देने वालों की बहुतायत” में सुरक्षा और विजय प्राप्त करनी चाहिए (नीतिवचन 11:14; 24:6), जो हमें हर परिस्थिति में परमेश्वर के वचन की बुद्धि की ओर ले चलेंगे। निर्णय और उसके परिणाम जितने बड़े होंगे, हमें उतनी ही अधिक सलाह की और उतनी ही अधिक प्रार्थना की आवश्यकता पड़ेगी।

पोतीपर ने अपने गुस्से में एक निर्णय लिया—और वह निर्णय अन्यायपूर्ण था। अनियन्त्रित क्रोध मन को अंधा कर देता है। एक बार भड़क जाने पर इसे शान्त करना आसान नहीं होता है। लेकिन यहाँ तक कि उन परिस्थितियों में भी जहाँ अन्याय या पाप के प्रति सही प्रतिक्रिया क्रोध हो (और हम उस प्रभु का अनुसरण करते हैं जिसने उचित समय पर क्रोध किया—मरकुस 11:15-18 देखें), तौभी हमें गुस्से को अपनी भावनाओं प्रभावित करने और अपने निर्णयों को निर्देशित करने की अनुमति नहीं देनी चाहिए। जल्दी से परमेश्वर से पूछें कि क्या आपके जीवन में मौजूदा क्रोध का कोई स्रोत है, ताकि आप आवश्यकतानुसार पश्चाताप कर सकें, जब बुलाया जाए तो क्षमा कर सकें और बुद्धि और विश्वास के साथ आगे बढ़ सकें।

गलातियों  5:16-24

◊ पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: भजन 35–36; प्रेरितों 17:1-15

24 July : येशू आपली मेंढरे राखतो

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24 July : येशू आपली मेंढरे राखतो
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“शिमोना, शिमोना, पाहा, तुम्हांला गव्हासारखे चाळावे म्हणून सैतानाने मागणी केलीं; परंतु तुझा विश्वास ढळू नये म्हणून तुझ्यासाठीं मी विनंती केलीं आहे; आणि तू वळलास म्हणजें तुझ्या भावांना स्थिर कर.” (लूक 22:31-32)

वास्तविक पाहता, जरी पेत्र तीन वेळा येशूचा नकार केल्यामुळें वाईटरित्या अयशस्वी झाला, तरी येशूनें त्याच्यासाठीं विनंती करून त्याला पूर्णपणें नाश होण्यापासून वाचवले. तो मोठ्या दुःखाने रडला; त्यानंतर त्याला पुन:स्थापित करण्यांत आलें जे पेन्टेकॉस्टच्या दिवशी पेत्रानें दिलेंल्या उपदेशांत त्याचा आनंद व धैर्य यांमध्यें स्पष्ट दिसून आलें. आपला विश्वास ढळू नये म्हणून येशू आज देखील आपल्यासाठीं मध्यस्थी करत आहे. पौल हे रोमकरांस 8:34 मध्यें सांगतो.

येशूनें अभिवचन दिलें कीं तो आपल्या मेंढरांचे संरक्षण करील; त्यांचा कधीही नाश होणार नाहीं. “माझी मेंढरे माझी वाणी ऐकतांत; मी त्यांना ओळखतो व ती माझ्यामागे येतांत; मी त्यांना सार्वकालिक जीवन देतो; त्यांचा कधीही नाश होणार नाहीं आणि त्यांना माझ्या हातातून कोणी हिसकून घेणार नाहीं” (योहान 10:27-28).

याचे कारण हे कीं स्वतः देव आपल्या मेंढरांना विश्वासांत राखून ठेवतो. “ज्याने तुमच्या ठायीं चांगले काम आरंभले तो ते येशू ख्रिस्ताच्या दिवसापर्यंत सिद्धीस नेईल हा मला भरवसा आहे” (फिलिप्पै 1:6).

विश्वासाचे हे युद्ध लढत असतांना आपल्याला स्वबळावर सोडून दिलें जात नाहीं. “कारण इच्छा करणें व कृती करणें हे तुमच्या ठायीं आपल्या सत्संकल्पासाठीं साधून देणारा तो देव आहे” (फिलिप्पै 2:13).

आम्हांला देवाच्या वचनावर भरवसा आहे कीं, जर आपण त्याची संतती आहों, तर तो “देव आपल्या दृष्टीने जे आवडते ते आपणांमध्यें येशू ख्रिस्ताच्या द्वारे करील व तो आपल्या इच्छेप्रमाणें करण्यास आपल्याला प्रत्येक चांगल्या कामात सिद्ध करील” (इब्री 13:21).

विश्वास आणि आनंद यांत आपलें टिकून राहणें हे अखेरीस आणि निर्णायकपणें देवाच्याच हातांत आहे. होय, आपण लढले पाहिजे, पण हा लढा आपल्याठायीं साध्य करून देणारा तो देव आहे. आणि तो नक्कीच ते करेल, कारण रोमकरांस 8:30 मध्यें सांगितल्याप्रमाणें, “ज्यांना त्यानें नीतिमान ठरवले त्यांचा त्यानें गौरवही केला.” देवाच्या नीतिमान ठरविण्यांत आलेंल्यां लेकरांचे गौरव करणें तितकेच चांगले आहे.

ज्यांना त्यानें विश्वासात आणले आहे आणि नीतिमान ठरवले आहे त्यांपैकीं एकालाही तो गमावणार नाहीं.

23 जुलाई : परमेश्वर हमारी जरूरतें पूरी करेगा

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23 जुलाई : परमेश्वर हमारी जरूरतें पूरी करेगा
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“हम तुम्हारे बीच में अनुचित चाल न चले, और किसी की रोटी मुफ़्त में न खाई; पर परिश्रम और कष्ट से रात दिन काम धन्धा करते थे कि तुम में से किसी पर भार न हो।” 2 थिस्सलुनीकियों 3:7-8

परमेश्वर पर निर्भर रहना हमारे दैनिक के जीवन के लिए काम करने के संघर्ष से टकराता नहीं है। वास्तव में, काम और उसे करने की क्षमता परमेश्वर की ओर से दिए गए प्रावधान का हिस्सा हैं। यदि हमें इस पर सन्देह हो, तो हमें यह विचार करना चाहिए कि यीशु स्वयं भी काम करता था। भले ही वह स्वर्ग से आया था और सब कुछ उसका ही था, फिर भी उसने वर्षों तक बढ़ई का काम किया और इस तरह उसने उस पद्धति की पुष्टि की जिसे उत्पत्ति की पुस्तक में मनुष्यजाति के लिए स्थापित किया गया था (उत्पत्ति 2:15)।

इसी तरह, प्रेरितों ने विश्वास के अनुसार जीते हुए और कलीसिया के विस्तार के लिए पूरी तरह से समर्पित होकर “रात दिन” परिश्रम किया। उन्होंने आलस्य को अस्वीकार किया और किसी का भोजन बिना कीमत चुकाए नहीं खाया। सुसमाचार के प्रचारक के रूप में उनके पास प्रावधान के लिए सहायता माँगने का अधिकार था (1 तीमुथियुस 5:17-18); लेकिन फिर भी, उन्होंने अपनी जिम्मेदारी स्वयं उठाई और जो व्यवसाय वे जानते थे, उसे पूरा किया और सबके लिए “आदर्श” बने (2 थिस्सलुनीकियों 3:9)।

हमारे अपने श्रम के बीच हमें यह पहचानने की आवश्यकता है कि हम काम की आशीष को कम से कम दो तरीकों से हानि पहुँचा सकते हैं: आलस्य से या आवश्यकता से अधिक काम करके। नीतिवचन की चेतावनी हम सभी पर लागू होती है: “आलसी मनुष्य शीत के कारण हल नहीं जोतता; इसलिए कटनी के समय वह भीख माँगता, और कुछ नहीं पाता।” (नीतिवचन 20:4)। या फिर जैसा पौलुस ने कहा, हमें आलसी नहीं होना चाहिए। लेकिन हमें भजनकार के इन शब्दों पर भी उतनी ही सतर्कता से ध्यान देना चाहिए, “तुम जो सबेरे उठते और देर करके विश्राम करते और दुख भरी रोटी खाते हो, यह सब तुम्हारे लिये व्यर्थ ही है” (भजन 127:2)। हाँ, हमें अपने हाथों से काम करना है। लेकिन यदि हम परमेश्वर की महिमा के लिए काम नहीं कर रहे हैं, तो फिर हम बेमन होकर काम कर रहे हैं, और वह भी व्यर्थ ही होता है।

इसका सबसे स्पष्ट उदाहरण हमें तब मिलता है, जब हम सब्त के सिद्धान्त की अवहेलना करते हैं। जब हम छः दिन काम करने और एक दिन विश्राम करने के परमेश्वर के आदेश का सही रीति से पालन नहीं करते, तो हम दर्शाते हैं कि हम परमेश्वर के वचनों पर विश्वास नहीं करना चाहते और अपने दैनिक प्रावधान के लिए उस पर भरोसा नहीं करना चाहते (व्यवस्थाविवरण 5:12-15)। हम क्यों सोचते हैं कि हमें हर दिन, पूरा दिन काम करना चाहिए? इसका उत्तर यह है कि हम यह विश्वास करने में संघर्ष करते हैं कि परमेश्वर हमारी जरूरतों को पूरा करेगा। हमें अपनी सुरक्षा अपने काम में नहीं, बल्कि उस परमेश्वर में प्राप्त करनी चाहिए, जो हमें काम देता है और उसे करने के लिए संसाधन प्रदान करता है।

हमारी भौतिकवादी संस्कृति में यह आसान नहीं है कि हम विश्वासयोग्यता के साथ काम करें और परमेश्वर की ओर से हमें जो मिला है उससे सन्तुष्ट होना सीखें। एक पल के लिए अपने काम पर विचार करें, चाहे वह घर में हो, खेत में, कारखाने में, या दफ्तर में। आप किस तरीके से आलस्य की ओर प्रवृत्त होते हैं? और किस तरीके से आवश्यकता से अधिक काम करने की ओर प्रवृत्त होते हैं? आपके लिए कड़ी मेहनत करने और परमेश्वर पर विश्वास करने का क्या रूप होगा? भौतिकवाद से जकड़े संसार में, आपके काम में और परमेश्वर के प्रावधान में आपका सन्तोष परमेश्वर के दिव्य प्रेम का एक प्रभावशाली गवाह बनेगा, जो सच्ची सन्तुष्टि प्रदान करता है।

व्यवस्थाविवरण 5:1-3, 12-15

पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: भजन 33–34; प्रेरितों 16:22-40 ◊

23 July : पाप-वासनेचा प्रतिकार कसा करावा

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23 July : पाप-वासनेचा प्रतिकार कसा करावा
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मोशे प्रौढ झाल्यावर’ त्यानें आपणास फारोच्या कन्येचा पुत्र म्हणवण्याचे विश्वासाने नाकारले. पापाचे क्षणिक सुख भोगणें ह्यापेक्षा देवाच्या लोकांबरोबर दुःख सोसणें हे त्यानें पसंत करून घेतले. ‘ख्रिस्ताप्रीत्यर्थ विटंबना सोसणें’ ही मिसर देशातील धनसंपत्तीपेक्षा अधिक मोठी संपत्ती आहे असे त्यानें गणले; कारण त्याची दृष्टी प्रतिफळावर होती. (इब्री 11:24-26)

किंवा, सारांश रूपांत थोडक्यांत सांगायचे तर : “मोशे विश्वासाने. . . पापाचे क्षणिक सुख भोगणें ह्यापेक्षा. . . कारण त्याची दृष्टी प्रतिफळावर होती” (इब्री 11:24-26).

विश्वास हा “क्षणिक सुख भोगण्यांत” समाधानी राहत नाहीं. तो आनंदासाठीं व्याकुळ (कासावीस) झालेंला असतो, म्हणजें अशा आनंदासाठीं जो टिकून राहील. कायमचा. आणि देवाचे वचन म्हणते, “जीवनाचा मार्ग तू मला दाखवशील; तुझ्या सान्निध्यात पूर्णानंद आहे; तुझ्या उजव्या हातांत सौख्ये सदोदित आहेत.” (स्तोत्र 16:11). म्हणून, विश्वास पापाच्या फसव्या सुखांकडें पाहून आपल्या उद्दिष्टांपासून विचलित होत नाहीं. तो ज्या परम आनंदाच्या शोधात असतो तो मिळविण्यापासून तो इतक्या सहजासहजी हार मानणार नाहीं.

देवावरील विश्वासाची भूक भागवणें हीच देवाच्या वचनाची भूमिका आहे. आणि, असे करत असतांना, ते माझ्या मनाला वासनेच्या भ्रामक चवींपासून सोडवते.

सुरुवातीला, वासना मला फूस लावून अशी जाणीव करून देण्याचा प्रयत्न करते कीं जर मी शुद्धतेचा मार्ग स्वीकारला तर मी खरोखरच असे काहीं तरी गमावून बसीन जे मला मोठे सुख व समाधान देऊं शकते. पण मग मी आत्म्याची तलवार उचलतो आणि लढायला लागतो.

  • मी शास्त्रांत वाचतो कीं वासनेच्या आहारी जाण्यापेक्षा मी माझा डोळा उपटून टाकणें हे अधिक बरे आहे (मत्तय 5:29).
  • मी वाचतो कीं जर मी जे काहीं शुद्ध, जे काहीं प्रशंसनीय, जे काहीं श्रवणीय, जो काहीं सद्‍गुण, जी काहीं स्तुती, त्यांचे मनन केलें तर शांतिदाता देव मजबरोबर राहील (फिलिप्पै 4:8-9).
  • मी वाचतो कीं देहस्वभावाचे चिंतन हे मरण; पण आत्म्याचे चिंतन हे जीवन व शांती आहे (रोमकरांस 8:6).
  • मी वाचतो कीं दैहिक वासनां या माझ्या जिवात्म्याबरोबर युद्ध करतांत  (1 पेत्र 2:11), आणि धन व विषयसुख आत्म्याच्या जीवनाची वाढ खुंटवून टाकतांत (लूक 8:14).
  • पण सर्वात महत्त्वाचे म्हणजें, मी असे वाचतो कीं जे सात्त्विकपणें चालतांत त्यांना उत्तम ते दिल्यावाचून देव राहणार नाहीं (स्तोत्र 84:11), आणि जें अंतःकरणाचे शुद्ध ते देवाला पाहतील (मत्तय 5:8).

माझा विश्वास देवामध्यें असलेले जीवन व शांती यांत समाधानी असावा अशी प्रार्थना मी करत असताना, आत्म्याची तलवार वासनेच्या विषावर असलेले साखरेचे आवरण कोरून टाकते. मग मला दिसून येते कीं ते काय आहे. आणि मला फूस लावणारी त्याची मोहक शक्ती देवाच्या कृपेने धूळीस मिळते.

22 जुलाई : याद रखें, आपको प्रार्थना करनी है

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22 जुलाई : याद रखें, आपको प्रार्थना करनी है
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“जब वह घर में आया, तो उसके चेलों ने एकान्त में उस से पूछा, ‘हम उसे क्यों न निकाल सके?’ उसने उनसे कहा, ‘यह जाति बिना प्रार्थना किसी और उपाय से नहीं निकल सकती।’” मरकुस 9:28-29

मरकुस 6 में यीशु ने अपने शिष्यों को दो-दो करके भेजा था, ताकि वे पश्चाताप की आवश्यकता का प्रचार करें। उसने उन्हें न केवल विशेष निर्देश दिए, बल्कि “उन्हें अशुद्ध आत्माओं पर अधिकार दिया” (मरकुस 6:7)। इसके कारण उनके पास एक शानदार गवाही थी: उन्होंने “बहुत सी दुष्टात्माओं को निकाला, और बहुत से बीमारों पर तेल मलकर उन्हें चंगा किया।” (पद 13)।

उनके पहले के सेवाकार्य में सफलता को देखते हुए यह समझना आसान है कि शिष्य आश्चर्यचकित और भ्रमित क्यों हुए, जब वे एक लड़के में से अशुद्ध आत्मा को निकालने में असफल रहे। लेकिन फिर, यीशु ने आकर उन्हें समझाया (मरकुस 9:14-27)। जब चेलों ने यीशु से यह पूछा, “हम इसे क्यों नहीं निकाल सके?” तो शायद शिष्यों को उम्मीद थी कि यीशु उन्हें कोई विशेष गुप्त ज्ञान देगा। कभी-कभी हम भी यही मानते हैं, और यीशु के उत्तर को इस तरह से समझते हैं कि हमें एक विशेष क्षमता या सेवाकार्य की आवश्यकता है। लेकिन ऐसा नहीं है। यीशु बस अपने शिष्यों और हमें यह याद दिला रहा था: तुम इसलिए सफल नहीं हुए क्योंकि तुम एक महत्त्वपूर्ण बात भूल गए थे: तुमने प्रार्थना नहीं की।

अपनी सफलता के कारण शिष्य निश्चिन्त हो गए थे। वे भूल गए थे कि यह केवल परमेश्वर की अपार दया और शक्ति के कारण ही था कि वे कुछ कर पा रहे थे। वे अभी भी मसीह के साथ थे, फिर भी वे भूल गए थे। उन्हें याद दिलाए जाने की आवश्यकता थी।

कभी-कभी हमें भी याद दिलाए जाने की आवश्यकता होती है। यह मानना कि परमेश्वर की शक्ति अब बस हमारे पास है और हमारे नियन्त्रण में है, अविश्वास के समान है; यह परमेश्वर पर भरोसा करने के बजाय खुद पर भरोसा कर लेना है। इसके विपरीत, प्रार्थना हमारी इच्छा को परमेश्वर की इच्छा के अधीन ले आती है। तब हम स्वीकार कर लेते हैं कि आश्चर्यकर्म परमेश्वर करता है, हम नहीं। और जब तक हम परमेश्वर के अनुग्रह पर निर्भर नहीं रहते, तब तक हम किसी के हालात में हस्तक्षेप करने और एक शाश्वत परिवर्तन लाने में असमर्थ होते हैं।

इसके कई कारण हो सकते हैं कि हम प्रार्थना क्यों नहीं करते। हमें लगता है कि हमें इसकी आवश्यकता नहीं है। हम इसे करना ही नहीं चाहते। हम अपनी क्षमताओं का आवश्यकता से अधिक अनुमान लगाते हैं। हम परिकल्पानाओं में चले जाते हैं। जब हम सब कुछ अपने प्रयासों से करने की कोशिश करते हैं, तो हम अक्सर बुरी तरह से विफल हो जाते हैं।

तो अगली बार जब आप किसी बात को खुद से समझने की कोशिश करें, या यह मान लें कि परमेश्वर की शक्ति आपको इस बार भी पार करा देगी क्योंकि पिछली बार ऐसा हुआ था (और वह “अगली बार” शायद आज ही होगा!), तो याद करें कि शिष्य क्या भूल गए थे और यीशु ने उन्हें क्या याद दिलाया था: उससे प्रार्थना करें, जिसके पास सारी शक्ति है, जो हम पर अपनी दया उण्डेलता है, और जो सारी महिमा का हकदार है। क्योंकि जब आप प्रार्थना करते हैं और परमेश्वर को काम करते हुए देखते हैं, तो आप पाते हैं कि वह उससे भी कहीं अधिक करता है जितना आपने उससे मांगा था या कल्पना की थी (इफिसियों 3:20)।

मरकुस 9:14-29

◊ पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: भजन 31–32; प्रेरितों 16:1-21

22 July : स्वतःला उपदेश द्या

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22 July : स्वतःला उपदेश द्या
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हे माझ्या जिवा, तू का खिन्न झालास? तू आतल्या आत का तळमळत आहेस? देवाची आशा धर; तो माझा देव मला दर्शन देऊन माझा उद्धार करतो, म्हणून मी त्याचे पुनरपि गुणगान गाईन. (स्तोत्र 42:11)

आपण निराशावादी दृष्टिकोण व उदासीनता -म्हणजें खिन्न झालेंला जीव-  यांशी लढा द्यायला शिकण्याची गरज आहे. हा लढा भावी कृपेवरील विश्वासाचा लढा आहे. देव आणि त्यानें भविष्याविषयी जें अभिवचन दिलें आहे त्या सत्याचा आपण स्वतःला उपदेश देऊन हा लढा देत असतो.

स्तोत्रकर्ता स्तोत्र 42 मध्यें हेच करतो. स्तोत्रकर्ता त्याच्या खिन्न झालेंल्यां जीवाला उपदेश देतो. तो स्वतःला धमकावतो व  स्वतःशीच वाद घालतो. आणि त्याचा मुख्य युक्तिवाद म्हणजें भविष्यातील कृपा: “देवाची आशा धर! देव भविष्यात तुझ्या निमित्त दर्शन देऊन ज्यां प्रकारे तुझा उद्धार करणार आहे त्यावर विश्वास ठेव. हर्ष-नादाचा दिवस येत आहे. परमेश्वर स्वतः दर्शन देऊन तुला आवश्यक असलेले सर्व सहाय्य पुरवेल. तो सर्वकाळ आम्हांबरोबर राहील असे अभिवचन त्यानें दिलें आहे.”

मार्टिन लॉयड-जोन्स यांना खात्री होती कीं देवाच्या भावी कृपेविषयी स्वतःला सत्याचा उपदेश देण्याविषयीचा हा मुद्दा आध्यात्मिक नैराश्यावर मात करण्यासाठीं अत्यंत निकडीचा आहे. त्यांनी Spiritual Depression नावाचे जे उपयुक्त पुस्तक लिहिलें त्यांत ते पुढीलप्रमाणें असे लिहितांत,

तुमच्या कधी हे लक्षात आलें आहे का कीं तुमच्या जीवनातील दुःख हे मुख्यतः ह्यामुळें आहे कारण तुम्हीं स्वतःशी बोलण्याऐवजी स्वतःचे ऐकत असतां? उदाहरणार्थ, तुम्हीं सकाळी उठल्या उठल्या तुमच्या मनात जें विचार येतांत त्यांवर विचार करा. त्यांचा उगम तुमच्यातून झाला नाहीं, तरी ते तुमच्याशी बोलू लागतांत, ते कालचे अनुत्तरीत प्रश्न परत लक्ष्यांत आणतांत. कुणीतरी तुमच्याशी संवाद साधतोय. . . . तुमचा स्व: तुमच्याशी संवाद साधत आहे. आता स्तोत्र 42 मधील या पुरुषाने जे समाधान काढले ते म्हणजें असे कीं तो त्याच्या स्व:ला त्याच्याशी संवाद साधू देण्याऐवजी तो त्या स्व:शी बोलू लागतो. तो विचारतो “हे माझ्या जिवा, तू का खिन्न झालास?” त्याचा जीव त्याला खिन्न करत होता, चिरडत होता. म्हणून तो उठतो, आणि म्हणतो, “ हे माझ्या स्व:, जरा ऐक. मी तुझ्याशी जें बोलतो, तें ऐक.” (20–21)

नैराश्याविरुद्ध असलेला आपला लढा देवाच्या वचनांवर विश्वास ठेवण्याविषयीचा लढा आहे. आणि देवाच्या भावी कृपेवरचा विश्वास त्याचे वचन ऐकण्याने येतो. आणि म्हणून स्वतःला देवाच्या वचनातून उपदेश देणें हे या आध्यात्मिक युद्धाचा जीव कीं प्राण आहे.

21 जुलाई : दूध से ठोस आहार की ओर

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21 जुलाई : दूध से ठोस आहार की ओर
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“समय के विचार से तो तुम्हें गुरु हो जाना चाहिए था, तौभी यह आवश्यक हो गया है कि कोई तुम्हें परमेश्‍वर के वचनों की आदि शिक्षा फिर से सिखाए।” इब्रानियों 5:12

यदि आप अपने बेसमेंट में व्यायाम के लिए बहुत सारे उपकरण रखते हैं, लेकिन कभी वजन नहीं उठाते, न ही अपनी मांसपेशियों को प्रशिक्षित करते हैं और न ही अपने दिल की सेहत का ध्यान रखते हैं, तो वे सारे उपकरण बेकार होंगे। मांसपेशियाँ तभी बढ़ती हैं, जब उन्हें निरन्तर उपयोग में लाया जाता है। एक व्यक्तिगत प्रशिक्षक सहायक हो सकता है, लेकिन हमें खुद को प्रशिक्षित करने के लिए भी प्रतिबद्ध होना होगा। जब पौलुस ने तीमुथियुस से कहा, “भक्ति की साधना कर” (1 तीमुथियुस 4:7), तो वह प्रमुख रूप से यह कह रहा था कि कोई आदर्श व्यक्ति, नेता या मित्र उसके लिए परिश्रम नहीं कर सकता था।

जब हम अपनी मसीही यात्रा में बढ़ते हैं, तो हम बुनियादी सत्य सीखते हैं, जिन्हें हम धीरे-धीरे व्यवहार में लाते हैं और आध्यात्मिक विवेक में बढ़ते जाते हैं। यह प्रक्रिया हमें दूध से ठोस आहार की ओर (इब्रानियों 5:12-14), आध्यात्मिक शिशु से आध्यात्मिक परिपक्वता की ओर बढ़ने में मदद करती है, ताकि हम अन्ततः दूसरों को सिखाने में सक्षम हो सकें। यह परमेश्वर द्वारा स्थापित किया गया जीवन चक्र है, जिसका उद्देश्य उसके राज्य का विस्तार करना है।

एक और रूपक का उपयोग करते हुए, मसीही आस्था के बुनियादी सत्य महत्त्वपूर्ण हैं; हम मसीह के बारे में जो कुछ भी सीखते हैं, वह इन्हीं पर आधारित होता है। लेकिन हमेशा के लिए इन्हीं पर ध्यान केन्द्रित करना उत्पादक नहीं है। हमें मसीही जीवन में प्रगति करने में परिश्रम करना है, निरन्तर पवित्रता में बढ़ने का प्रयास करना है और यह प्रार्थना करनी है कि पवित्र आत्मा हमें उसकी प्रेरित वाणी में और गहराई से जाने में मदद करे।

परमेश्वर अपने बच्चों को अपने पुत्र के स्वरूप में जीवन से या उसके वचन के निर्देशन से अलग होकर रूपान्तरित नहीं करता। जब आप पवित्रशास्त्र में प्रशिक्षित होते हैं और उसे पकड़े रहते हैं, तब आप प्रगति करते हैं। क्या आपकी बाइबल प्रतिदिन अनुशासित उपयोग के संकेत दिखाती है? क्या आप योजनाबद्ध रीति से उन लोगों से सीखने का प्रयास करते हैं, इस यात्रा में आपसे आगे हैं, और क्या आप कठिन शिक्षाओं को समझने का प्रयास करते हैं, बजाय इसके कि उन्हें “विशेषज्ञों” के लिए छोड़ दें? और क्या आप इस उद्देश्य से पढ़ते, संघर्ष करते और ध्यान करते हैं कि मसीह से आपका प्रेम बढ़े और आपकी कलीसिया और समुदाय में दूसरों की सेवा करने की अपनी क्षमता बढ़े, बजाय इसके कि आप केवल अधिक ज्ञान प्राप्त करें? आपके बारे में कभी यह न कहा जाए कि आप अधिक वृद्धि नहीं कर सके और परमेश्वर के लोगों की मदद करने के लिए अधिक प्रयास नहीं कर सके। बढ़ने का प्रयास करें। इसके लिए परमेश्वर की मदद की आवश्यकता होगी—लेकिन जब हम उसे खोजते हैं, वह निश्चय ही हमारे प्रयासों को सम्मानित करेगा!

इब्रानियों 5:7 – 6:3

पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: भजन 29–30; प्रेरितों 15:22-41 ◊

21 July : निरुत्साहाचा सामना करण्यासाठींआदर्श

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21 July : निरुत्साहाचा सामना करण्यासाठींआदर्श
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माझा देह व माझे हृदय ही खचली; तरी देव सर्वकाळ माझ्या जिवाचा आधार व माझा वाटा आहे. (स्तोत्र 73:26)

जसा कीं मराठीत हा शास्त्रपाठ आहे, या वचनातील क्रियापद शब्दशः केवळ “खचली” असें आहे, “खचू शकते” असे नाहीं. परमेश्वराने पिडलेला आसाफ नावाचा हा स्तोत्रकर्ता म्हणतो, “माझा देह व माझे हृदय ही खचली आहेंत!” मी खिन्न झालों आहे! मी निराश झालों आहे! पण मग लगेचच तो त्याच्या निराशेविरुद्ध एक व्यापक अशा दृष्टिक्षेपांतून अति जोमानें ऐलान करतो : “तरी देव सर्वकाळ माझ्या जिवाचा आधार व माझा वाटा आहे.”

स्तोत्रकर्ता नैराश्याने वैतागून खचत नाहीं. तर तो पलटवार करून आपल्या अविश्वासाबरोबर लढा देतो.

थोडक्यात, तो असे म्हणत आहे, “मी स्वतःमध्यें खूप अशक्त आणि असहाय्य असा आहे आणि मी या गोष्टींशी स्पर्धा करू शकत नाहीं. माझा देह मरणासन्न झाला आहे आणि माझे हृदय जवळजवळ मृत झालें आहे. पण या औदासिनपणाचे कारण काहींही असो, मी नमणार नाहीं. मी स्वतःवर नव्हें, तर देवावर विश्वास ठेवीन. तोच माझें सामर्थ्य व माझा वाटा आहे.”

पवित्र शास्त्रांत औदासिनतेंत बुडलेल्या जीवांशी संघर्ष करणाऱ्या पवित्र जनांची बरीच उदाहरणें आहेत. स्तोत्र 19:7 म्हणते, “परमेश्वराचे नियमशास्त्र परिपूर्ण आहे, ते मनाचे पुनरुज्जीवन करते.” हे या गोष्टीची स्पष्ट कबुली देणें आहे कीं पवित्र जनांच्या जीवाला कधी-कधी पुनरुज्जीवनाची गरज असते. आणि जर असे पुनरुज्जीवन करणें आवश्यक असेल तर एका अर्थाने ते “मृत” असे होते. त्यांना असेच वाटायचे.

दाविद स्तोत्र 23:2-3 मध्यें तेच सांगतो, “तो मला संथ पाण्यावर नेतो. तो माझा जीव ताजातवाना करतो” “आपल्या [देवाच्या] मनासारखा मनुष्य” (1 शमुवेल 13:14) असलेला दाविद ह्याच्या जीवाला सुद्धा पुनरुज्जीवनाची गरज होती. त्याचा  जीव तहानेने जणू मृतप्राय झाला होता आणि खचून गेला होता, तरी देव त्याचा जीव संथ पाण्याजवळ घेऊन गेला व त्याला पुन्हा जीवन दिलें.

देवानें या सर्व साक्षी बायबलमध्यें देऊन ठेवल्यात, जेणेंकरून आपण ज्यां ज्यां वेळी नैराश्याने खचतो, आपण त्यांचा उपयोग अविश्वासाशी लढा देण्यांस करावा. आणि आपण अविश्वासाला उद्ध्वस्त करणाऱ्या अशा देवाच्या अभिवचनांवर विश्वास ठेऊन लढतो: “देव सर्वकाळ माझ्या जिवाचा आधार व माझा वाटा आहे.” आम्हीं त्या उपदेशाने स्वतःला उत्तेजन देतो. आणि आम्हीं तो सैतानाच्या तोंडावर मारतो, व त्या अभिवचनांवर विश्वास ठेवतो.

20 जुलाई : सच्चा तम्बू और मन्दिर

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20 जुलाई : सच्चा तम्बू और मन्दिर
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“इस पर यहूदियों ने उस से कहा, ‘तू जो यह करता है तो हमें कौन सा चिह्न दिखाता है?’ यीशु ने उनको उत्तर दिया, ‘इस मन्दिर को ढा दो, और मैं इसे तीन दिन में खड़ा कर दूँगा।’” यूहन्ना 2:18-19

कुछ लोग बाइबल को केवल दार्शनिक जानकारी और आध्यात्मिक टुकड़ों का मिश्रण समझते हैं। यह बात सत्य से बहुत दूर है, क्योंकि बाइबल में परमेश्वर की हमारे संसार में हस्तक्षेप की खुलती हुई कहानी है। परमेश्वर के राज्य का विषय हमें इस कहानी के सूत्र को समझने और उसका अनुसरण करने का एक उपयोगी तरीका प्रदान करता है।

और हर राज्य में राजा का एक निवास स्थान होता है।

पुराने नियम के अधिकांश भाग में तम्बू वह स्थान था, जहाँ परमेश्वर इस्राएल के मध्य में निवास करता था। हालाँकि तम्बू परमेश्वर के लोगों के बीच था, फिर भी यह उनके लिए खुला नहीं था। यहाँ तक कि मूसा भी उस समय उसमें प्रवेश नहीं कर सकता था, जब परमेश्वर की महिमा का बादल उस पर आकर ठहरता था (निर्गमन 40:34-35)। फिर जब यरूशलेम उस देश की राजधानी बन गया, तब तम्बू का स्थान एक स्थाई भवन अर्थात मन्दिर ने ले लिया। अब परमेश्वर, अपनी प्रजा का राजा, अपनी प्रजा के और उनके देश की राजधानी में निवास कर रहा था। लेकिन फिर भी परमेश्वर तक पहुँचने का रास्ता उस पर्दे द्वारा अवरुद्ध था, जो मन्दिर के परम पवित्र स्थान को शेष मन्दिर से अलग करता था (निर्गमन 26:31-34)।

और फिर “वचन देहधारी हुआ” और सचमुच “हमारे बीच में डेरा किया” (यूहन्ना 1:14)।

नए नियम को पढ़ते समय हम पाते हैं कि जैसे पुराने नियम में लोग तम्बू में परमेश्वर से मिलने की उम्मीद करते थे, वैसे अब हम एक व्यक्ति को देखते हैं—जो स्वयं परमेश्वर है, जिसने मानव शरीर में निवास किया और हमारे बीच जीवन यापन किया। यूहन्ना की भाषा विशेष रूप से यह सन्देश देती है कि यीशु में परमेश्वर ने शारीरिक रूप से अपने लोगों के बीच निवास किया और अब अपने आत्मा के द्वारा अपने लोगों में निवास करता है (यूहन्ना 14:16-18)। वह हमारे बीच है। दूसरे शब्दों में, यीशु ही असली तम्बू है।

यीशु इसी बात को समझाना चाहता था, जब उसने मन्दिर को शुद्ध किया था और वहाँ धन्धा करने वाले व्यापारियों और पैसे बदलने वालों को बाहर निकाल था, और उससे पूछा गया था कि वह इतना दुस्साहस का काम किस अधिकार से कर रहा था (यूहन्ना 2:13-16), तो उसने उत्तर दिया, “इस मन्दिर को ढा दो, और मैं इसे तीन दिन में खड़ा कर दूँगा।” यूहन्ना यह बताता है कि जब यीशु को क्रूस पर चढ़ाया गया, उसे दफन किया गया और वह मृतकों में से जी उठा, तब उनके शिष्य समझ गए कि “उसने अपनी देह के मन्दिर के विषय में कहा था” (पद 21)।

यीशु की मृत्यु के समय मन्दिर का पर्दा फट गया, यह संकेत देते हुए कि अब हम मसीह के द्वारा परमेश्वर की उपस्थिति में बिना किसी रुकावट के जा सकते हैं; लेकिन यह इस बात का संकेत भी था कि मन्दिर की अब कोई आवश्यकता नहीं थी, क्योंकि उसका उद्देश्य अब पूरा हो गया था। इसके कुछ दशकों बाद यरूशलेम का मन्दिर सचमुच ढा दिया गया।

यदि हम परमेश्वर से मिलना चाहते हैं, तो हमें यीशु के पास जाना होगा। अब हमें किसी विशेष भवन या विशेष प्रतीकों या मन्दिरों की आवश्यकता नहीं है। परमेश्वर अपने लोगों से मिलता है—जब हम एकत्र होते हैं और जब हम बिखरे होते हैं—किसी निर्धारित स्थान में नहीं बल्कि अपने पुत्र में, जो असली मन्दिर है। चाहे आज कोई भी दिन हो और आप जो भी कर रहे हों, आपको पवित्र परमेश्वर से साक्षात मिलने से कोई नहीं रोक सकता। आज राजा स्वयं आप में निवास करता है।

यूहन्ना 2:13-22

◊ पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: भजन 26–28; प्रेरितों 15:1-21

20 July : प्रत्येक गरजेसाठीं कृपा

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तू माझ्याकडें वळून माझ्यावर कृपा कर; आपल्या दासाला आपलें सामर्थ्य दे. (स्तोत्र 86:16)

आपल्यावर भविष्यात कृपा व्हावीं अशी सर्व प्रार्थनावीर स्तोत्रकर्ता खंड न पडू देता विनवणी करत असत. देवानें आपली प्रत्येक गरज पूर्ण करावीं अशी ते वारंवार प्रार्थना करतांत. आपण आपल्या प्रत्येक आणीबाणीच्या परिस्थितीसाठीं भविष्यातील कृपेवर दररोज कसे अवलंबून राहावें याचा ते सर्व मिळून आम्हाल्यासाठीं एक सुंदर कित्ता घालून देत आहेत  .

  • त्यांना मदतीची गरज असते तेव्हा ते कृपेसाठीं धावा करतांत : “हे परमेश्वरा, ऐक, माझ्यावर दया कर; हे परमेश्वरा, मला साहाय्य कर!” (स्तोत्र 30:10).
  • ते अशक्त असतांत तेव्हां : “तू माझ्याकडें वळून माझ्यावर कृपा कर; आपल्या दासाला आपलें सामर्थ्य दे” (स्तोत्र 86:16).
  • त्यांना रोग व आजार यांपासून बरे होण्याची गरज असते तेव्हां : “हे परमेश्वरा, मी गळून गेलो आहे म्हणून माझ्यावर दया कर; माझी हाडे ठणकत आहेत, हे परमेश्वरा, मला बरे कर” (स्तोत्र 6:2).
  • त्यांचे शत्रूं त्यांची पिळवणूक करतांत तेव्हां : “हे परमेश्वरा, माझ्यावर दया कर, मला मृत्युद्वारातून उठवणार्‍या, माझा द्वेष करणार्‍यांपासून मला झालेंली पीडा पाहा” (स्तोत्र 9:13).
  • ते एकाकीं पडलेले असतांत तेव्हां : “माझ्याकडें वळून मला प्रसन्न हो; कारण मी निराश्रित व दीन आहे” (स्तोत्र 25:16).
  • ते शोक करीत असतांत तेव्हां : “हे परमेश्वरा, माझ्यावर कृपा कर, कारण मी संकटात आहे; माझे नेत्र, माझा जीव, माझे शरीर ही दुःखाने क्षीण झाली आहेत” (स्तोत्र 31:9).
  • ते पापांत पडतांत तेव्हां: “हे परमेश्वरा, माझ्यावर कृपा कर; माझ्या जिवाला बरे कर; मी तुझ्याविरुद्ध पाप केलें आहे!” (स्तोत्र 41:4).
  • ते राष्ट्रांमध्यें देवाच्या नावाचा गौरव व्हावा म्हणून व्याकूळ होतांत तेव्हां : “देवानें आमच्यावर दया करावी व आम्हांला आशीर्वाद द्यावा. . . ह्यासाठीं कीं, पृथ्वीवर तुझा मार्ग कळावा, तू सिद्ध केलेंले तारण सर्व राष्ट्रांना विदित व्हावे” (स्तोत्र 67:1-2).

खचितच, प्रार्थना हा विषय पवित्रजनांचा आत्मा आणि भविष्यातील कृपेचे अभिवचन यांच्यातील विश्वासाची मजबूत साखळी आहे, यांत शंका नाहीं. आपण सेवेला प्रार्थनेद्वारे टिकून ठेवावें असे जर देवानें प्रयोजन केलेंलें असेल, तर मग सेवा ही भविष्यातील कृपेवरील विश्वासाने टिकून राहावी असे प्रयोजन केलेंलें असणें स्वाभाविक आहे.