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27 August : येशू आपल्या सर्व शत्रूंना तुडवील

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27 August : येशू आपल्या सर्व शत्रूंना तुडवील
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नंतर शेवट होईल, तेव्हा सर्व आधिपत्य, सर्व अधिकार व सामर्थ्य ही नष्ट केल्यावर तो देवपित्याला राज्य सोपवून देईल. (1 करिंथ 15:24)

ख्रिस्ताच्या राज्याची व्याप्ती किती आहे?

पुढील वचन, 1 करिंथ 15:25 सांगते, “कारण आपल्या ‘पायांखाली सर्व शत्रू ठेवीपर्यंत’ त्याला राज्य केलें पाहिजे.” येथें प्रयुक्त केलेंला शब्द “सर्व” त्याच्या राज्याची व्याप्ती सूचित करतो.

त्याचप्रमाणें वचन 24 मध्यें प्रयुक्त केलेंला शब्द “सर्व” देखील तेंच सूचित करतो : “नंतर शेवट होईल, तेव्हा सर्व आधिपत्य, सर्व अधिकार व सामर्थ्य ही नष्ट केल्यावर तो देवपित्याला राज्य सोपवून देईल.”

असा कोणताही रोग नाहीं, व्यसन नाहीं, महाकाय नाहीं, वाईट सवय नाहीं, दोष नाहीं, दुर्गुण नाहीं, दुर्बलता नाहीं, स्वभाव नाहीं, मन:स्थिती नाहीं, गर्व नाहीं, आत्म-दया नाहीं, कलह नाहीं, मत्सर नाहीं, विकृती नाहीं, लोभ नाहीं, आळशीपणा नाहीं कीं ज्यांवर ख्रिस्त आपल्या प्रतिष्ठेचा शत्रू म्हणून विजय मिळविणार नाहीं.

आणि या अभिवचनांत असलेले उत्तेजन असें कीं जेव्हा तुम्हीं तुमच्या विश्वासाच्या आणि तुमच्या पवित्रतेच्या शत्रूंशी युद्ध करण्यासाठीं सज्ज होता तेव्हा युद्ध लढणारे तुम्हीं एकटे नाहीं.

येशू ख्रिस्त हा वर्तमान समयी, या युगातच, त्याच्या सर्व शत्रूंना आपल्या पायाखाली ठेवत आहे. सर्व आधिपत्य, सर्व अधिकार व सामर्थ्य यांवर विजय मिळविला जाईल.

म्हणून, लक्षात ठेवा कीं ख्रिस्ताच्या राज्याचा प्रसार हा तुमच्या जीवनात आणि या विश्वात असलेल्या त्याच्या गौरवाच्या सर्वात लहान आणि सर्वात मोठ्या शत्रूपर्यंत पोहोचतो. सर्व शत्रूंचा पराभव केला जाईल.

26 अगस्त : धैर्यवान उद्धारकर्ता

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26 अगस्त : धैर्यवान उद्धारकर्ता
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“उन्होंने उसे जगाकर उससे कहा, ‘हे गुरु, क्या तुझे चिन्ता नहीं कि हम नष्ट हुए जाते हैं?’ तब उसने उठकर आँधी को डाँटा, और पानी से कहा, ‘शान्त रह, थम जा!’ और आँधी थम गई और बड़ा चैन हो गया; और उनसे कहा, ‘तुम क्यों डरते हो? क्या तुम्हें अब तक विश्‍वास नहीं?’” मरकुस 4:38-40

जब तूफ़ान आया और चेलों को भय ने घेर लिया, तब यीशु ने केवल शान्ति ही नहीं, बल्कि उनकी प्रतिक्रिया के प्रति अद्‌भुत धैर्य भी दिखाया।

उन्होंने यीशु पर यह आरोप लगाया कि उसे इस बात की चिन्ता नहीं थी कि वे नष्ट हो रहे हैं। लेकिन यीशु ने उन्हें नहीं, बल्कि हवा और लहरों को डाँटा। यह कितनी अद्‌भुत बात है! संसार में किसी भी शिक्षक के पास यीशु के चेलों से अधिक धीमी गति से सीखने वाले छात्र नहीं थे—परन्तु यह भी सच है कि न ही किसी अन्य शिक्षक में उसके समान धैर्य और क्षमा करने की क्षमता थी।

यीशु का धैर्य केवल इस घटना तक सीमित नहीं था; अपने पूरे सेवाकार्य के दौरान वह अपने चेलों की कमजोरियों और असफलताओं के प्रति लगातार धैर्यवान रहा। मरकुस 6 में केवल पाँच रोटियों और दो मछलियों से पाँच हज़ार लोगों को भोजन खिलाने के बाद जब चेलों ने उसे पानी पर चलते देखा, तब भी उन्होंने उस पर सन्देह किया। लेकिन यीशु ने प्रेमपूर्वक उत्तर दिया, “ढाढ़स बाँधो : मैं हूँ; डरो मत” (मरकुस 6:50)। आगे भी, जब उसने बार-बार अपनी मृत्यु की आवश्यकता और उद्देश्य के बारे में समझाया, तो चेलों ने उसे समझने या स्वीकार करने में कठिनाई महसूस की (मरकुस 8:31-33; 9:30-32; 10:32-34)। यहाँ तक कि पुनरुत्थान के बाद भी यीशु ने चेलों को इस बात के लिए नहीं डाँटा कि वे उसकी भविष्यवाणी के अनुसार उसके जी उठने से चकित हो गए थे। इसके विपरीत, उसने प्रेम और धैर्य के साथ उनसे गहरे प्रश्न पूछे और अपनी सच्ची पहचान को उनपर प्रकट किया।

हम चेलों में अपने कमज़ोर विश्वास को प्रतिबिम्बित होता हुआ देख सकते हैं। यदि हम उनके स्थान पर होते, तो शायद हम भी उसी तरह डरकर भाग-दौड़ कर रहे होते और अपने सन्देह तथा शिकायतें यीशु के सामने रख रहे होते। लेकिन आज भी, हमारे भय और सन्देह के बावजूद मसीह हमें धैर्यपूर्वक सम्भालता है। वह हमें हमारे एक क्षण के अविश्वास के कारण अस्वीकार नहीं करता। वह हमारी कायरता के कारण हमें त्याग नहीं देता। उसके समान कोई और शिक्षक है ही नहीं।

इसलिए जब हम मसीह के इस अद्वितीय धैर्य के भागीदार हुए हैं, तो हमें भी यही धैर्य दूसरों के प्रति दिखाना चाहिए। यदि आप माता-पिता, कोच, प्रबन्धक, सेवकाई नेता, शिक्षक, या केवल एक मित्र भी हैं, तो यीशु के उदाहरण को याद रखें। यदि हम चाहते हैं कि परमेश्वर हमारे डगमगाते विश्वास को सहन करे, तो हमें भी दूसरों के प्रति और यहाँ तक कि अपने स्वयं के प्रति भी ऐसा ही धैर्य रखना चाहिए।

सबसे बढ़कर, हमें केवल यीशु के उदाहरण का अनुसरण करने के लिए नहीं, बल्कि उसकी सिद्धता का आनन्द लेने के लिए बुलाया गया है। उसका धैर्य कभी असफल नहीं होगा। वह अपनी देखभाल में रहने वालों की कभी उपेक्षा नहीं करता और न ही उन्हें छोड़ता है। आपके पापों और आपके संघर्षों के कारण उसकी सहनशीलता का बाँध कभी नहीं टूटता। वह आज भी आपके साथ धैर्यवान रहेगा। वह आपका उद्धारकर्ता, आपका निस्तारक, आपका हमेशा धैर्यवान शिक्षक—आपका यीशु है।

निर्गमन 33:18 – 34:8

पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: भजन 119:89-176; 2 कुरिन्थियों 5 ◊

26 August : छाया आणि झरे

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26 August : छाया आणि झरे
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परमेश्वराचे वैभव चिरकाल राहो! परमेश्वराला आपल्या कृतींपासून आनंद होवो! तो पृथ्वीकडें पाहतो तेव्हा ती कापते; तो पर्वतांना स्पर्श करतो तेव्हा ते धुमसतांत. माझ्या जिवात जीव आहे तोपर्यंत मी परमेश्वराचे गुणगान गाईन; मी जिवंत आहे तोपर्यंत माझ्या देवाचे स्तोत्र गाईन. मी केलेंले त्याचे मनन त्याला गोड वाटो; परमेश्वराच्या ठायीं मला हर्ष होईल.. (स्तोत्र 104:31-34)

परमेश्वराला आपल्या कृतींपासून आनंद होतो कारण त्यां कृती आपल्याला त्यांच्या पलीकडें म्हणजें प्रत्यक्ष देवाकडें पाहण्याचा संकेत देतांत.

देवाची इच्छा ही आहे कीं आपण या सृष्टीत दिसून येणारी त्याची हस्तकृती पाहून थक्क व भयभीत व्हावें. पण आपण त्यां कृतींचे कौतुक करावें म्हणून नाहीं. त्याची इच्छा अशी आहे कीं आपण त्याच्या सृष्टीकडें पाहून असे म्हणावें : जर त्याचे फक्त अंगुलीकार्य (स्तोत्र 8:3) इतके शहाणपण आणि सामर्थ्य आणि भव्यता आणि वैभव आणि सौंदर्य यांनी परिपूर्ण आहे, तर हा परमेश्वर स्वतः कसा असावा!

ही अंगुलीकार्ये फक्त त्याच्या वैभवाची केवळ मागची बाजू आहेत, कीं जणू आपण ती काचातून खोल अंधकारांत पाहत आहों. मग या सर्वांचा जो निर्माणकर्ता, प्रत्यक्षात त्याचा महिमा पाहणें म्हणजें काय असेल! फक्त त्याच्या हस्तकृतीच नाहीं! अब्ज आकाशगंगा देखील मनुष्याच्या जिवाला संतुष्ट करू शकणार नाहींत. परमेश्वर आणि केवळ परमेश्वर हाच आमच्या आत्म्याची तहान तृप्त करू शकतो.

जोनाथन एडवर्ड्स यांनी ही गोष्ट पुढीलप्रमाणें अभिव्यक्त केलीं :

परमेश्वरापासून आनंद हे ते एकमेव सुख आहे जे आपल्या आत्म्यांची तहान तृप्त करू शकते. स्वर्गात जावून देवाचा पूर्ण आनंद घेणें हे येथें असलेल्यां सर्व-सुखांच्या निवासस्थानांपेक्षा अमर्यादपणें श्रेष्ठ आहे. . . . [ह्यां] फक्त छाया मात्र आहेत. पण देव हा वास्तविक रूप आहे. ह्यां गोष्टी केवळ विखुरलेला प्रकाश आहे; पण देव हा सूर्य आहे. हे फक्त झरे आहेत; पण देव हा महासागर आहे.

म्हणूनच स्तोत्र 104 ची शेवटची 31-34 ही वचनें प्रत्यक्षांत देवावर लक्ष केंद्रित करून या स्तोत्राचा समारोप करतांत. “माझ्या जिवात जीव आहे तोपर्यंत मी परमेश्वराचे गुणगान गाईन. . . परमेश्वराच्या ठायीं मला हर्ष होईल.” शेवटी ज्यां गोष्टीं आपली अंतःकरणें आश्चर्याने भरून टाकतील आणि आपल्या मुखांत सार्वकालिक स्तुती भरतील त्यां गोष्टीं हा समुद्र किंवा हे पर्वत किंवा दऱ्याखोरी किंवा पाण्याचे झरे किंवा ढग किंवा मोठमोठ्या आकाशगंगा नसतील, तर तो स्वतः देव असेल जो सर्वांमध्यें सर्वकाहीं पूर्ण करतो.

25 अगस्त : प्रतिशोध का त्याग

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25 अगस्त : प्रतिशोध का त्याग
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“हे प्रियो, बदला न लेना, परन्तु परमेश्‍वर के क्रोध को अवसर दो।” रोमियों 12:19

बदला लेना हमारी सबसे स्वाभाविक प्रवृत्तियों में से एक है। यह संसार का तरीका है, क्योंकि हम एक ऐसे संसार में रहते हैं जहाँ “बड़ी मछली छोटी मछली को निगल जाती है।” यदि कोई हमारे रास्ते में आता है, तो हम उसे हटाने की पूरी कोशिश करते हैं। यह विशेषकर तब एक स्वाभाविक प्रतिक्रिया होती है, जब हमारे साथ अन्याय होता है—परन्तु यह मसीही प्रतिक्रिया नहीं है। इसलिए हमें हमेशा इसके विरुद्ध सतर्क रहना चाहिए। भले ही हमने कल इसे टाल दिया हो, इसकी कोई निश्चितता नहीं है कि हम आज भी ऐसा कर पाएँगे।

शायद खेल का मैदान ऐसा स्थान है, जहाँ हम सबसे अधिक देखते हैं कि प्रतिशोध कितनी आसानी से हमारी योजनाओं और कार्यों का प्रेरक बन जाता है। यदि कोई विरोधी खिलाड़ी आपको फाउल करता है और रेफरी या अम्पायर इसे नहीं देखता या दण्डित नहीं करता, तो आप क्या करते हैं? हमारी सहज प्रवृत्ति होती है कि हम किसी तरह उससे बदला लें। हम योजना बनाते हैं, सही समय का इन्तज़ार करते हैं और फिर “हिसाब बराबर” कर देते हैं। और जिस तरह खेल के मैदान में यह होता है, वैसे ही हमारे जीवन में भी होता है—भले ही व्यवहार में न सही, परन्तु हमारी कल्पनाओं में ऐसा अवश्य होता है।

परन्तु फिर पवित्रशास्त्र हमारे इस स्वाभाविक स्वभाव को यह कहकर काट देता है: “बदला न लेना।”

पौलुस ने केवल इस सिद्धान्त को लिखा ही नहीं, बल्कि इसे अपने जीवन में जीकर भी दिखाया। वह एक ऐसे वातावरण में सेवा कर रहा था, जहाँ उसके पास प्रतिशोध लेने के पर्याप्त कारण थे—उसे बदनाम किया गया, पीटा गया, उपहास किया गया और कैद में डाला गया। जब सम्राट नीरो और उसकी सरकार मसीहियों को राजमहल के आँगन में जलती हुई मशालों में बदल रहे थे, तब भी सम्भवतः पौलुस जीवित था। वे मसीही विश्वासियों को खम्भों से बाँध देते थे, उन खम्भों को ज़मीन में गाड़ देते थे, और फिर उन्हें मोम से ढककर आग लगा देते थे—लेकिन उस समय भी आदेश यही था: “बदला न लेना।”

हम अक्सर ईश्वरीय न्याय, जो परमेश्वर का अधिकार है; आपराधिक न्याय, जो सरकार की परमेश्वर द्वारा ठहराई हुई ज़िम्मेदारी है (रोमियों 13:1-4); और व्यक्तिगत प्रतिशोध के अभ्यास के बीच अन्तर नहीं कर पाते, जिसके लिए बाइबल हमें कोई अधिकार नहीं देती। हमें सरकार से आपराधिक न्याय प्राप्त करने की अनुमति है, लेकिन हमें यह ध्यान में रखना है कि यह पूर्ण नहीं होगा और इसका उद्देश्य अन्तिम न्याय करना नहीं है। लेकिन सबसे बढ़कर, हमें स्वयं को परमेश्वर के दिव्य न्याय के हाथों सौंपना है, ठीक वैसे ही जैसे उसके पुत्र ने किया (1 पतरस 2:23)। हमें यह याद रखते हुए जीना चाहिए कि आज शायद अन्तिम न्याय का दिन नहीं है, और निश्चित रूप से आप और मैं न्यायाधीश नहीं हैं।

हमारी नागरिकता किसी भी सांसारिक राज्य से बढ़कर एक अनन्त राज्य में है। यदि अविश्वासी हमें यह प्रचार करते हुए देखते हैं कि मसीह सच्चा और न्यायी न्यायाधीश है, लेकिन फिर हमें खुद ही न्याय करते हुए पाते हैं, तो वे मसीह की ओर आकर्षित नहीं होंगे। हमारा व्यवहार उन लोगों को प्रभावित करेगा जो पाप के साथ संघर्ष कर रहे हैं। इसलिए ऐसा हो कि वे हमारे प्रेम से मसीह की ओर खिंचे चले आएँ, न कि हमारे प्रतिशोध के कारण उससे दूर हो जाएँ।

रोमियों 12:9-21

◊ पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: भजन 119:1- 88; 2 कुरिन्थियों 4

25 August : जेव्हा देवाची प्रीति सर्वात गोड असते

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25 August : जेव्हा देवाची प्रीति सर्वात गोड असते
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पतींनो, जशी ख्रिस्तानें मंडळीवर प्रीति केलीं तशी तुम्हींही आपापल्या पत्नीवर प्रीति करा; ख्रिस्तानें मंडळीवर प्रीति केलीं आणि स्वतःस तिच्यासाठीं समर्पण केलें, अशासाठीं कीं, तिला त्यानें वचनाद्वारे जलस्नानाने स्वच्छ करून पवित्र करावे. (इफिस 5:25-26)

देवानें तुमच्यावर कोणतीही अट न ठेवता प्रीति करावीं अशी जर तुम्हीं केवळ त्याच्याकडून अपेक्षा करत असाल, तर तुमची आशा मोठी तर आहे, पण खूप संकुचित मनाची.

देवाची अट-विरहित प्रीति त्याच्या प्रीतिचा एकमात्र गोड अनुभव नाहीं. सर्वात गोड अनुभव तो असतो जेव्हा त्याची प्रीति असे म्हणते, “मी तुला माझ्या पुत्राच्या प्रतिमेसारखे अशा रीतीने बनवले आहे कीं तुला पाहून व तुझ्या सहभागीतेत राहून मला आनंद होतो. तुझ्याठाई माझा आनंद आहे, कारण तू माझ्या गौरवाने इतका तेजस्वी झाला आहेस.”

हा अति गोड अनुभव आमच्यात परिवर्तन घडवून आणून आम्हांला असे लोक बनविण्याच्या दृष्टिने सशर्त आहे ज्यांच्या भावना आणि निवडी आणि कृती ह्या देवाला आनंद देतांत.

अटीविरहित प्रीति ही मनुष्यांत परिवर्तन घडवून आणणारा तो उगम आणि तो पाया आहे ज्यामुळें सशर्त प्रीतिचा गोडवा शक्य होतो. जर देवानें आपल्यावर अटीविरहित प्रीति केलीं नसती, तर त्यानें आपल्या कुरूप जीवनात प्रवेश केला नसता, आपल्याला विश्वासात आणले नसते, आपल्याला ख्रिस्ताशी जोडले नसते, आपल्याला त्याचा आत्मा देऊ केला नसता आणि आपल्याला अंशा-अंशाने येशूसारखे घडवले नसते.

पण जेव्हा देव कोणतीही अट न ठेवता आपली निवड करतो, आणि ख्रिस्तानें आपल्यासाठीं मरण सोसावे म्हणून त्याला पाठवतो, आणि आपल्याला नव्याने जन्म देतो, तेव्हा तो परिवर्तनाची एक न थांबणारी प्रक्रिया सुरु करतो जी आपल्याला अंशा-अंशाने तेजस्वी बनवत जाते. त्याला ज्या स्वरूपाचा मनुष्य आवडतो त्याशी आपल्याला समरूप करण्यासाठीं तो आपल्याला एक तेज देतो : त्याचे स्वतःचे तेज.

हे आपण इफिसकर 5:25-27 मध्यें पाहतो. “ख्रिस्तानें मंडळीवर प्रीति केलीं आणि स्वतःस तिच्यासाठीं समर्पण केलें (अटी-विरहित प्रीति), अशासाठीं कीं, तिला त्यानें…पवित्र करावे. . . आणि गौरवयुक्त मंडळी अशी ती स्वतःला सादर करावी” – म्हणजें ते स्वरूप ज्यांत त्याला आनंद होतो.

आपण अविश्वासात असलेलें पापी असताना देखील देवानें आपल्यावर त्याची अटी-विरहित कृपा केलीं हे ‘अद्भुत’ अवर्णनीय आहे. हे अद्भुत आहे याचे प्रमुख कारण म्हणजें हे कीं ही अटी-विरहित प्रीति आपल्याला त्याच्या गौरवशाली उपस्थितीच्या सार्वकालिक आनंदात घेऊन येते.

पण त्या आनंदाचा शिखर म्हणजें आपण केवळ त्याचे वैभव पाहतच नाहीं तर आपण त्या वैभवाला प्रतिबिंबित सुद्धा करतो. “प्रभू येशू ह्याच्या नावाला तुमच्या ठायीं व तुम्हांला त्याच्या ठायीं गौरव मिळावा” (2 थेस्सलनीकाकर 1:12).

24 अगस्त : पहचान और प्रतिक्रिया

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24 अगस्त : पहचान और प्रतिक्रिया
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“उसने उनसे कहा, ‘नाव की दाहिनी ओर जाल डालो तो पाओगे।’ अतः उन्होंने जाल डाला, और अब मछलियों की बहुतायत के कारण उसे खींच न सके। तब उस चेले ने जिससे यीशु प्रेम रखता था, पतरस से कहा, ‘यह तो प्रभु है!’ शमौन पतरस ने यह सुनकर कि वह प्रभु है, कमर में अंगरखा कस लिया, क्योंकि वह नंगा था, और झील में कूद पड़ा।” यूहन्ना 21:6-8

जब किनारे पर खड़े व्यक्ति ने मछुआरों से नाव के दूसरी ओर जाल डालने के लिए कहा—और जब उन मछुआरों ने देखा कि पूरी रात कुछ न पकड़ने के बाद अब उनके जाल मछलियों से भर गए हैं—तब वे पहचान गए कि यह कौन था जिसने उन्हें पुकारा था। इम्माऊस के मार्ग पर जा रहे उन व्यक्तियों के समान शायद ये भी किसी अलौकिक कारण से उसे पहचान नहीं पाए थे (लूका 24:16)। या शायद सुबह की हल्की धुंध या नाव और किनारे के बीच की दूरी के कारण वे अपने उद्धारकर्ता को पूरी तरह से पहचान नहीं पाए थे।

कारण चाहे जो भी रहा हो, जल्द ही यूहन्ना, “जिससे यीशु प्रेम रखता था,” समझ गया कि उनसे किसने बात की थी—और जैसे ही उसने यह बात पतरस को बताई, पतरस ने तुरन्त प्रतिक्रिया दी। यूहन्ना की पहचान और पतरस की प्रतिक्रिया एक सुन्दर सहभागिता को दर्शाती है, जो परमेश्वर की पूरक विविधता की योजना को प्रकट करती है। परमेश्वर इस संसार में से यूहन्ना जैसे चिन्तनशील लोगों और पतरस जैसे जोशीले लोगों को एक साथ लेकर आता है ताकि वे एक-दूसरे के बिना अधूरे न रहें।

यूहन्ना के सुसमाचार में हम देखते हैं कि वह एक गहरे विचारशील और स्थिर विश्वास वाला व्यक्ति था। जब वह और पतरस खाली कब्र में गए, तो उसने बड़ी सूझबूझ से सोचा कि कब्र के वस्त्र बिना शरीर के क्यों पड़े हैं और इस प्रकार उसने विश्वास किया (यूहन्ना 20:8)। इसी प्रकार, नाव में रहते हुए भी उसने अपने आस-पास की घटनाओं को जल्दबाजी में नहीं, बल्कि गहराई से समझने के बाद विश्वास किया। जब यूहन्ना को एहसास हुआ कि उनके सामने यीशु है, तो उसने तुरन्त इस बारे में पतरस को बताया।

पतरस ने यूहन्ना की इस पहचान को उसी जोशीले ढंग से स्वीकार किया, जैसा वह अक्सर करता था: उसने विश्वास से भरी, उत्साही, और तत्काल कार्रवाई की। कल्पना करें कि उसने पानी में छलाँग लगा दी, और आधा तैरते हुए, आधा चलते हुए, पूरी ताकत से किनारे की ओर बढ़ने लगा, ताकि अपने उद्धारकर्ता तक जल्द से जल्द पहुँचे। उसने नाव में से पानी में छलाँग लगाने में एक पल की भी झिझक नहीं दिखाई। उसका एकमात्र उद्देश्य था, प्रभु तक पहुँचना।

यदि सूझबूझ वाले चिन्तनशील यूहन्ना जैसे लोग यहाँ न हों, तो पतरस जैसे उत्साही लोग निरन्तर व्यस्त रहते हुए जल्द ही थककर चूर हो जाएँ। और यदि पतरस जैसे साहसी लोग न हों, तो यूहन्ना जैसे लोग अपनी गहरी सोच में उलझकर निष्क्रिय हो जाएँ। हमें मसीह की सेवा करने के लिए साथी और सहयोगी चाहिएँ। चाहे आप पतरस हों या यूहन्ना, या फिर आपके पास कोई और विशेष स्वभाव हो, परमेश्वर ने आपको जैसे बनाया है, वैसे ही अपने राज्य में एक विशेष उद्देश्य के लिए रखा है।

हममें से कई लोग बहुत अधिक समय यह सोचने में गवा देते हैं कि काश हम किसी और की तरह होते। और कुछ ऐसे होते हैं जिन्हें अपने स्वभाव और योग्यताओं की पूरी पहचान होती है, लेकिन वे उन्हें दूसरों की सेवा के लिए विनम्रता से उपयोग करने में असफल रहते हैं या उन लोगों के साथ धैर्य नहीं रख पाते जो उनसे भिन्न हैं।

यदि आप यह समझ लें कि आपका हर गुण परमेश्वर द्वारा दिया गया है और वह चाहता है कि आप इसे अपने स्वार्थ के लिए नहीं, बल्कि उसकी आज्ञा मानने, उसकी प्रजा के संग रहने, और उसके पुत्र की महिमा के लिए उपयोग करें—तो आप खुद को और अपने उद्देश्य को देखने के तरीके में क्या बदलाव लाएँगे?

1 कुरिन्थियों 12:12-27

पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: भजन 116–118; 2 कुरिन्थियों 3 ◊

24 August : निर्मिलेल्यां पदार्थांचा संदेश

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24 August : निर्मिलेल्यां पदार्थांचा संदेश
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स्वतःला शहाणें म्हणता म्हणता ते मूर्ख बनले; आणि अविनाशी देवाच्या गौरवाची, नाशवंत मनुष्य, पक्षी, चतुष्पाद पशू व सरपटणारे प्राणी ह्यांच्या प्रतिमांच्या रूपांशी त्यांनी अदलाबदल केलीं. (रोमकरांस 1:22-23)

जर एखाद्या मनुष्य त्याच्या वधूपेक्षा त्याच्या लग्नाच्या अंगठीवर जास्त प्रेम करत असेल तर हा एक मोठा मूर्खपणा ठरेल आणि मोठी शोकांतिका किंवा अति दुर्दैवी प्रसंग ठरेल. परंतु हा शास्त्रपाठ नेमके तेच घडल्याचे सांगत आहे.

मनुष्यजातिने देवाऐवजी निर्मिलेल्यां वस्तूंमध्यें दिसून येणारे त्याचे सर्वश्रेष्ठ सनातन सामर्थ्य व देवपण याच्या प्रतीबिम्बावर प्रीति केलीं आणि खरी प्रीति आणि सामर्थ्य आणि गौरव ह्याची जी अतुलनीय व मूळ प्रतिध्वनी आहे ती ऐकण्यापासून बहिरी झाली.

निर्मिलेल्यां पदार्थांचा संदेश असा आहे :

या संपूर्ण चित्तथरारक विश्वाच्या निर्मितीमागे एक असा महान परमेश्वर आहे जो वैभव आणि सामर्थ्य आणि औदार्य ह्यानें परिपूर्ण आहे; तुम्हीं त्याचे आहांत कारण त्यानें तुम्हांला बनवले आहे. बंडखोरीने भरलेले तुमचे जीवन कायम ठेवण्यासाठीं तो तुमच्याविषयी धीर धरतो. त्याच्याकडें फिरा आणि त्याजवर तुमची आशा ठेवा आणि त्यानें निर्मिलेल्यां पदार्थांवरून दिसून येणाऱ्या त्याच्या हस्तकलेवरच केवळ नव्हे तर प्रत्यक्षात त्याजमध्यें आपला आनंद शोधा.

स्तोत्र 19:1-2 सांगते त्याप्रमाणें, दिवस त्या संदेशाचा “संवाद” जे दिवसाचे आहेंत त्यां सर्वांसाठीं करतो, आणि दिवस तो संवाद आंधळे करणारा तेजस्वी सूर्य आणि निळे आकाश व  ढग आणि ज्ञात व अज्ञात असे असंख्य ग्रह आणि रंग आणि सर्व दृश्यमान गोष्टींची सुंदर रचना यांच्या द्वारे करतो. रात्र देखील त्याच संदेशाचे “ज्ञान” जें रात्रीचे आहेंत त्या सर्वांसाठीं ओतते, रात्र हे ज्ञान अथांग खोल शून्यता आणि उन्हाळ्यातील चंद्र आणि असंख्य तारे आणि विलक्षण ध्वनी आणि थंड वारा आणि उत्तरेकडील तारे यांद्वारे प्रकट करते.

दिवस व रात्र या एकाच गोष्टीचा संदेश देत आहेत : परमेश्वर वैभवशाली आहे! परमेश्वर वैभवशाली आहे!! परमेश्वर वैभवशाली आहे! निर्मिलेल्यां पदार्थांमध्यें आपलें परम समाधान शोधण्यापासून आपलें मन फिरवा आणि ह्या वैभवशाली परमेश्वरामध्यें हर्षानंद करा.

23 अगस्त : परमेश्वर काफी बड़ा है

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23 अगस्त : परमेश्वर काफी बड़ा है
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“पौलुस ने अरियुपगुस के बीच में खड़े होकर कहा, ‘हे एथेंस के लोगो . . . जिसे तुम बिना जाने पूजते हो, मैं तुम्हें उसका समाचार सुनाता हूँ।’” प्रेरितों 17:22-23

परमेश्वर की सैद्धान्तिक शिक्षा को समझे बिना हम यीशु के सुसमाचार का प्रचार नहीं कर सकते। जैसा कि जे.बी. फिलिप्स अपनी पुस्तक योर गॉड इज़ टू स्मॉल  में लिखते हैं, “आज बहुत से लोग आन्तरिक असन्तोष में और किसी विश्वास के बिना जी रहे हैं . . . वे अपने वयस्क मस्तिष्क से ऐसा परमेश्वर नहीं खोज पाए हैं जो जीवन को समझाने के लिए पर्याप्त रूप से बड़ा हो।”[1] इसलिए जब हम परमेश्वर के चरित्र, उसकी महानता और उसकी महिमा के बारे में बात करें, तो हमें प्रत्येक उपयुक्त शब्द का उपयोग करना चाहिए।

जब पौलुस ने सुसमाचार का प्रचार किया, तो उसने धार्मिक लोगों, आम जनता और बुद्धिजीवियों सभी के पास जाकर यह सन्देश दिया, क्योंकि वह जानता था कि परमेश्वर का शुभ समाचार सभी के लिए पर्याप्त है और हर किसी की चिन्ताओं का उत्तर है (प्रेरितों 17:24-31)। हम पौलुस के इस दृष्टिकोण से सीख सकते हैं, जिसमें उसने परमेश्वर के स्वभाव के पाँच महत्त्वपूर्ण पहलुओं को स्पष्ट किया:

परमेश्वर सृष्टिकर्ता है। इस संसार को उसी ने बनाया है, जबकि वह स्वयं अजन्मा और अजर-अमर है। वह अपनी सृष्टि से अलग और समय से परे है। वह मात्र एक शक्ति नहीं है—यहाँ तक कि सबसे बड़ी शक्ति भी नहीं—और न ही उसे किसी रूप में बाँधा या नियन्त्रित किया जा सकता है।

परमेश्वर पालनहार है। वही है जो जीवन और श्वास का दाता है। वह पालनहार परमेश्वर मनुष्यों के हाथों की सेवा पर निर्भर नहीं है, न ही उसे किसी प्रकार के पोषण की आवश्यकता है।

परमेश्वर शासक है। वह राष्ट्रों पर अधिकार रखते है। इतिहास, भूगोल, सरकारें—पूरी सृष्टि—सब उसके नियन्त्रण में है। कोई भी घटना हमारे परमेश्वर को चौंका नहीं सकती; वह मनुष्य के पापपूर्ण कार्यों तक को अपनी योजना में सम्मिलित कर सकता है। इसके अलावा, एक शासक के रूप में, उसने हर व्यक्ति को एक निश्चित स्थान और समय में रखा है, ताकि हम परमेश्वर को खोजें, उसे पाएँ और उसके पवित्र नाम की स्तुति करें।

परमेश्वर पिता है। मनुष्य उसके “वंशज” हैं (प्रेरितों 17:28), और इस अर्थ में कि उसने आदम से लेकर प्रत्येक मनुष्य को जीवन दिया है, वह हर मनुष्य का पिता है (लूका 3:38)। उसने हम सबको अपने स्वरूप में बनाया है। हम नैतिक प्राणी हैं, जिनमें सही और गलत का ज्ञान है और हम वास्तव में केवल तभी फल-फूल सकते हैं, जब हम उसके साथ सम्बन्ध में होते हैं।

परमेश्वर न्यायी है। उसे पूरी पृथ्वी पर अधिकार प्राप्त है। एक न्याय का दिन आएगा, जो निष्पक्ष और अन्तिम होगा, जब हर अन्याय का निपटारा किया जाएगा और हर बुराई को सुधारा जाएगा। वास्तव में, परमेश्वर पहले ही अपने पुत्र यीशु के द्वारा इस संसार में हस्तक्षेप कर चुका है, और यीशु के पुनरुत्थान के द्वारा उसने उसे न्यायाधीश के रूप में नियुक्त क दिया है। यह परमेश्वर की कृपा और धैर्य है कि उसने न्याय के दिन की घोषणा पहले से कर दी है, ताकि हम उस दिन से पहले पश्चाताप कर लें और उससे क्षमा प्राप्त करें।

परमेश्वर किसी की भी मात्र धार्मिक अभिरुचि के लिए ही पर्याप्त नहीं है—बल्कि वह उससे कहीं अधिक महान है। वह आपके और मेरे लिए, हमारी हर चिन्ता और दुख के लिए पर्याप्त रूप से बड़ा है। वह हर बौद्धिक जिज्ञासा को सन्तुष्ट करने और हर भावनात्मक अभिलाषा को पूरा करने के लिए पर्याप्त रूप से बड़ा है—और अन्ततः, वह जीवन जीने के लिए भी पर्याप्त रूप से बड़ा है। आप परमेश्वर को जितना अधिक सही रूप में जानेंगे, उतना ही अधिक खुशी से आप उसकी आज्ञा का पालन करेंगे और उसके विषय में आनन्द से भरकर आत्मविश्वास से बातें करेंगे।

  यशायाह 44:6-8

◊ पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: भजन 113–115; 2 कुरिन्थियों 2


[1] योर गॉड इज़ टू स्मॉल: ए गाईड फॉर बिलिवर्स ऐण्ड स्कैप्टिक्स अलाईक (टचस्टोन, 2004), पृ. 8.

23 August : देव मूर्तिपूजक नाहीं

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23 August : देव मूर्तिपूजक नाहीं
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आपल्या पवित्र जनांच्या ठायीं गौरव मिळावा म्हणून, आणि त्या दिवशी विश्वास ठेवणार्‍या सर्वांच्या ठायीं आश्‍चर्यपात्र व्हावे म्हणून तो येईल, कारण आम्हीं दिलेंल्या साक्षीवर तुम्हीं विश्वास ठेवला आहे. (2 थेस्सलनीका 1:10)

पौल म्हणतो कीं ख्रिस्त हा मुख्यता त्याला गौरव मिळावा म्हणून आणि आश्‍चर्यपात्र व्हावे म्हणून येत आहे. तो येत आहे त्यामागचे कारण हेच.

देव स्वतःचे गौरव करू पाहतो आणि त्याच्या लोकांकडून त्याची स्तुती व्हावी या शोधांत असतो हे शिक्षण ऐकून बरेच लोक अडखळतांत कारण आपण स्वतःचे गौरव करून घेणारे होऊं नये किंवा स्वतःची स्तुती करून घावयांस पाहूं नये असे बायबल आपल्याला शिक्षण देते. उदाहरणार्थ, बायबल सांगते कीं प्रेम “स्वार्थ पाहत नाहीं” (1 करिंथ 13:5).

देव इतका प्रेमळ असूनही त्याचवेळी पूर्णपणें “स्वतःचे” गौरव (स्वार्थ) व स्तुती करू पाहणारा आणि पूर्णपणें आपलाच आनंद शोधणारा कसा असू शकतो? जर देव स्वतःमध्येंच इतका पूर्णपणें गुंतलेला असेल तर मग तो आमच्या कल्याणार्थ कसा असू शकतो?

मी याचे उत्तर पुढीलप्रमाणें मांडतो : कारण वैभव व परम-स्वयंपूर्णता यांबाबतींत देव हाच एकमेव अद्वितीय आहे, म्हणून जर तो आमचे गौरव करणार असेल तर मग त्याला स्वत:मध्यें गौरवी असणें अगत्याचे आहे. दीन व नम्रपणाचे जें नियम मानव-प्राणी म्हणून आमच्यावर लागू होतांत तें आमचा निर्माणकर्ता म्हणून देवावर लागू होऊ शकत नाहींत.

सार्वकालिक आनंदाचा उगम म्हणून जर देव स्वतःपासूनच विभक्त झाला तर तो देव नाहीं. त्यासाठीं त्याला आपल्या स्वत:च्या अमर्याद वैभवाचे मूल्य नाकारावे लागेल. असे केल्यानें तो हे सूचित करेल कीं त्याच्या स्वतःच्या बाहेर असे काहींतरी आहे जें त्याच्यापेक्षा अधिक मौल्यवान आहे. अशाने तो मूर्तिपूजक ठरेल.

हे आमच्या कोणत्याही लाभाचे नाहीं. कारण आपला देवच जर अनीतिमान झाला आहे तर आपण कोठे जायचे? जें असीम मोलवान त्यालाच जर देवानें असीम महत्त्व देणें थांबविले तर आपण या विश्वात शुद्धतेचा खडक कोठे शोधावा? देव स्वतःविषयीचे जें अमर्याद मूल्य आणि सौंदर्याचे दावे करतो तें त्यानें स्वतःच जर नाकारले तर आपण कोणाची उपासना करावीं?

नाहीं, देवानें आपलें देवपण सोडून द्यावे अशी मागणी करून आपण देवाचे स्वतःचे गौरव करणें ह्याला आपल्या प्रीत्यर्थ प्रीति म्हणूं शकत नाहीं.

उलट, देव अद्वितीय प्रीति आहे हे आपण पाहावें कारण आपल्या पवित्र जनांच्या ठायीं त्याच्या नावाला गौरव मिळावा म्हणून तो अखंडपणें शोध करीत असतो. आपल्या ठायीं त्याच्या महानतेच्या गौरवाची स्तुती व्हावी हाच आपल्या परमानंदाचा आणि त्याच्या महानतेचा शिखर आहे.

22 अगस्त : अपने निम्नतर स्तर पर परमेश्वर को पाना

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22 अगस्त : अपने निम्नतर स्तर पर परमेश्वर को पाना
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“यूसुफ के स्वामी ने उसको पकड़कर बन्दीगृह में, जहाँ राजा के कैदी बन्द थे, डलवा दिया . . . पर यहोवा यूसुफ के संग-संग रहा और उस पर करुणा की, और बन्दीगृह के दारोगा के अनुग्रह की दृष्‍टि उस पर हुई।” उत्पत्ति 39:20-21

जब पोतीपर की पत्नी ने यूसुफ पर झूठा आरोप लगाया, तो एक बार फिर से वह अपने जीवन के निम्नतर स्तर पर पहुँच गया। इस बार उसे किसी गड्ढे में नहीं, बल्कि अन्धेरे कारागार में डाल दिया गया। उसका संसार पूरी तरह बिखर।

फिर भी, एक परमेश्वर-भक्त और सिद्धान्तों पर चलने वाले व्यक्ति के रूप में यूसुफ ने धैर्य बनाए रखा। उसने पोतीपर की पत्नी के प्रलोभन से भागने का निर्णय अपने धार्मिक विश्वास और शुद्धता के आधार पर लिया था। यूसुफ के लिए परमेश्वर का भय जेल के भय से कहीं बड़ा था। वह पोतीपर की पत्नी के साथ सम्बन्ध नहीं बना सकता था, क्योंकि ऐसा करना परमेश्वर के विरुद्ध पाप होता। यह तथ्य यूसुफ के लिए किसी भी आन्तरिक संघर्ष का अन्त था और निर्णय लेने के लिए पर्याप्त था।

ऐसा ही दृष्टिकोण हमें भी संकीर्ण मार्ग पर बनाए रखेगा। सच्ची निष्ठा व्यवहारिक सोच से नहीं, बल्कि सिद्धान्तों से आती है। यह जीवन के कोलाहल से दूर, एक शान्त स्थान पर निर्णय लेने की प्रक्रिया है। यह परिणामों की परवाह किए बिना आज्ञाकारिता है। यह परमेश्वर का जन बनने के लिए इतना दृढ़ निश्चय करना है कि जब पाप करने का दबाव सबसे अधिक हो या जब जीवन पूरी तरह से टूट जाए, तब भी हमें पता हो कि हमें कैसे प्रतिक्रिया देनी है।

जब यूसुफ ने अन्यायपूर्ण पीड़ा सही, तब परमेश्वर ने अपने प्रेम का प्रदर्शन किया और उसे जेल के अधिकारी की दृष्टि में अनुग्रह प्रदान किया। कहानी में कहीं भी ऐसा संकेत नहीं है कि यूसुफ ने परिस्थितियों को अपने पक्ष में करने की कोशिश की थी—और यदि वह किसी मित्र या सहायक की तलाश में भी होता, तो उसे कभी उम्मीद नहीं होती कि जेल का अधिकारी ही उसका सहायक बन जाएगा! लेकिन परमेश्वर की योजनाएँ कुछ और ही थीं। प्रभु की उपस्थिति उसके लोगों के साथ सबसे कठिन परिस्थितियों में भी बनी रहती है।

समय-समय पर हम सभी को ऐसा लगता है कि हम भी किसी “कारागार”—जीवन के एक नए निम्न स्तर पर में हैं, जहाँ हमें ठण्डे एकान्त ने जकड़ लिया हो। शायद आज आप भी वैसा ही महसूस कर रहे हों। हो सकता है कि आप भी यूसुफ की तरह झूठे आरोपों के शिकार हुए हों, या प्रभु के प्रति आपकी आज्ञाकारिता की कीमत चुका रहे हों, या फिर कोई और भारी बोझ आपकी आत्मा को थका रहा हो। लेकिन चाहे जो भी हो, प्रभु सब कुछ जानता है। वह कभी किसी चीज़ से चौंकता नहीं है, और वह आपसे अनन्त प्रेम करता है। उसका प्रेम अटल है और परिस्थितियों से नहीं बदलता। उसने आपसे इतना प्रेम किया कि उसने मृत्यु की काल-कोठरी और नरक की यातना को सह लिया ताकि आपको ऐसा कभी न करना पड़े। इस सच्चाई में शान्ति पाएँ कि जैसा भविष्यवक्ता जकर्याह ने कहा, “जो तुम को छूता है, वह [परमेश्वर की] आँख की पुतली ही को छूता है” (जकर्याह 2:8)।

लूका 8:22-39

पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: भजन 110–112; 2 कुरिन्थियों 1 ◊