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7 सितम्बर : परमेश्वर की प्रजा

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7 सितम्बर : परमेश्वर की प्रजा
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“यहूदी वह नहीं जो प्रगट में यहूदी है; और न वह खतना है जो प्रगट में है और देह में है। पर यहूदी वही है जो मन में है; और खतना वही है जो हृदय का और आत्मा में है, न कि लेख का।” रोमियों 2:28-29

हर राज्य के नागरिक होते हैं, और परमेश्वर का राज्य भी अलग नहीं है। फिर, परमेश्वर के राज्य में नागरिक कौन हैं? परमेश्वर की प्रजा कौन हैं?

परमेश्वर की प्रजा वे लोग हैं, जिन्होंने यीशु मसीह में अपना विश्वास रखा है। ये लोग परमेश्वर के राज्य का हिस्सा अपनी बुद्धि, शक्ति, या किसी अन्य बाहरी कारण से नहीं हैं, बल्कि केवल और केवल इसलिए हैं, क्योंकि परमेश्वर ने उनसे प्रेम किया और उन्हें अपने पुत्र में विश्वास का उपहार दिया। यीशु ने फरीसियों को डाँटे क्योंकि वे सोचते थे कि अपने वंश के कारण वे परमेश्वर के परिवार का सदस्य हैं: “यीशु ने उनसे कहा, ‘यदि तुम अब्राहम की सन्तान होते, तो अब्राहम के समान काम करते’” (यूहन्ना 8:39)। और अब्राहम ने क्या किया? उसने परमेश्वर की प्रतिज्ञाओं पर विश्वास किया; उसने “परमेश्वर पर विश्वास किया और यह उसके लिए धार्मिकता गिनी गई” (गलातियों 3:6)।

तो फिर, हम परमेश्वर के परिवार के पूर्ण सदस्य हमारे द्वारा किए गए किसी काम के कारण नहीं हैं, बल्कि परमेश्वर के आत्मा के कार्य से हैं, जो हमारे हृदयों को कायल करता है, हमें विश्वास करने के लिए प्रेरित करता है, और हमें पश्चाताप की ओर ले जाता है। हमें परमेश्वर की प्रजा में शामिल होने के लिए यहूदी कानून के आनुष्ठानिक नियमों का पालन करने या अब्राहम के शारीरिक वंशज होने की आवश्यकता नहीं है। रोमियों 2:29 में, पौलुस मूल रूप से यह पूछता है, अब्राहम की सन्तान कौन हैं? इसका उत्तर है: वही जो हृदय का खतना करवाता है।

जब हम इन सत्यों पर ध्यान करते हैं, तो हम यह सवाल कर सकते हैं कि क्या पौलुस को यहूदी होने का कोई लाभ लगता था। पौलुस ने यह स्पष्ट किया कि वास्तव में इसका एक अद्‌भुत लाभ था, क्योंकि यहूदियों ने परमेश्वर की प्रतिज्ञाओं को सबसे पहले प्राप्त किया, जिससे उन्हें मसीह में पूरे होने वाली भविष्यवाणियों को समझने का एक अद्वितीय अवसर मिला (रोमियों 3:1-2)। लेकिन इस समझ से कोई भी परमेश्वर के राज्य का नागरिक नहीं बनता। यह अवसर केवल उन लोगों के लिए खुला और आरक्षित है, जो उसके राजा के अधीन होते हैं। चाहे हम यहूदी हों या अन्यजाति—हमारी पृष्ठभूमि चाहे जो भी हो, हम चाहे जहाँ भी पैदा हुए हों, और चाहे जैसे भी पले-बढ़े हों— परमेश्वर मसीह में विश्वास करने वाले सभी लोगों को उद्धार प्रदान करता है। परमेश्वर के राज्य में हमारी नागरिकता जाति या बाहरी बातों से नहीं जुड़ी होती, बल्कि मसीह में विनम्र, बालक जैसे विश्वास से जुड़ी होती है।

संसार भर में लोग यह जानने के लिए संघर्ष करते हैं कि उनका सही स्थान कहाँ है और वे किसी कम्पनी, समाज, मित्र मण्डल, या यहाँ तक कि अपने परिवार में अपनी स्थिति बनाए रखने के लिए भी संघर्ष करते हैं। परमेश्वर आपसे संघर्ष करने या प्रयास करने को नहीं कहता, बल्कि केवल आनन्द लेने को कहता है। यदि आप यीशु में विश्वास करके परमेश्वर की प्रजा के लोग हैं, तो आप उसके नाम से उद्धार पाए हैं, आप लज्जा से मुक्त हो गए हैं, और आप उसकी प्रजा हैं। यहीं पर आपको आपका सही स्थान मिलता है, यहीं पर आपको अपना घर मिलता है।

इफिसियों 2:11-22

पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: न्यायियों 1–3; यूहन्ना 2 ◊

7 September : देवानें दिलेंलें विरोधक आणि देवानें दिलेंला विश्वास

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7 September : देवानें दिलेंलें विरोधक आणि देवानें दिलेंला विश्वास
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सांगायचे ते इतकेच कीं, ख्रिस्ताच्या सुवार्तेस शोभेल असे आचरण ठेवा……आणि विरोध करणार्‍या लोकांकडून कशाविषयीही भयभीत झाला नाहींत;….कारण त्याच्यावर विश्वास ठेवावा इतकेच केवळ नव्हे, तर ख्रिस्ताच्या वतीने त्याच्याकरता दुःखही सोसावे अशी कृपा तुमच्यावर झाली आहे. (फिलिप्पै 1:27-29)

पौलाने फिलिप्पैकरांना सांगितले कीं ख्रिस्ताच्या सुवार्तेस शोभेल असे आचरण ठेवणें म्हणजें आपल्या शत्रूंपुढे निर्भय असणें होय. त्यानंतर तो त्या निर्भयपणामागे असलेलें तर्कशुद्ध कारण सांगतो.

तर्कशुद्ध कारण हे आहे : देवानें तुम्हांला फक्त एक नाहीं तर दोन अशी कृपादानें दिलीं आहेत, विश्वास आणि दुःख. 29 वे वचन नेमके हेच सांगत आहे. “कारण त्याच्यावर विश्वास ठेवावा इतकेच केवळ नव्हे, तर ख्रिस्ताच्या वतीने त्याच्याकरता दुःखही सोसावे अशी कृपा तुमच्यावर झाली आहे.” तुम्हीं विश्वास ठेवावा असे कृपादान तुम्हांला देण्यांत आलें, आणि तुम्हीं दुःखही सोसावे हे कृपादान देखील तुम्हांला देण्यांत आलें.

या संदर्भात याचा अर्थ असा होतो : दुःखाचे प्रसंग येतांत तेव्हां तुमचा ‘विश्वास’ आणि तुमचे ‘दुःख’ ही दोन्ही देवाची कृपादानें आहेत. जेव्हा पॉल म्हणतो, विरोध करणार्‍या लोकांकडून कशाविषयीही भयभीत होऊं नका, तेव्हा त्यांनी भयभीत का होऊं नये यामागची त्याच्या मनात दोन कारणें होती :

1. पहिले कारण म्हणजें विरोधक हें देवाच्या हातांत आहेत. ते विरोध करतांत हे देवानें तुम्हांला दिलेंलें कृपादान आहे. विरोध हा त्याच्या अधिपत्याखाली होतो. हा 29 व्या वचनाचा पहिला मुद्दा आहे.

2. आणि भयभीत न होण्यामागचे दुसरे कारण म्हणजें तुमची निर्भयता, म्हणजेंच तुमचा विश्वास हा सुद्धा देवाच्या हातांत आहे. ते सुद्धा देवानें दिलेंलें कृपादानच आहे. हा 29 व्या वचनाचा दुसरा मुद्दा आहे.

त्यामुळें संकटे येतांत त्यावेळी निर्भय असण्यामागे असलेलें तर्कशुद्ध कारण हे दोन पदरी सत्य आहे : तुमची संकटे आणि संकटाच्या वेळी टिकाव धरणारा तुमचा विश्वास ही दोन्ही देवाची कृपादानें आहेत.

अशा जगण्याला “ख्रिस्ताच्या सुवार्तेस शोभेल असे आचरण” का म्हटले जाते? कारण सुवार्ता ही ह्या चांगल्या गोष्टींची बातमी आहे कीं ख्रिस्तानें आपल्या नव्या कराराच्या रक्ताद्वारे त्याच्या सर्व लोकांना विश्वासाचे कृपादान प्राप्त व्हावे आणि त्यांनी आपल्या वैऱ्यांवर प्रभूत्व करावें हे आपल्यात घडून येणारे देवाचे सार्वभौम कार्य साध्य केलें आहे – आणि हे सर्व त्यानें आपलें सार्वकालिक कल्याण व्हावे म्हणून केलें. हेच सुवार्तेने साध्य केलें आहे. म्हणून, सुवार्तेस शोभेल असे आचरण ठेऊन जगणें हे सुवार्तेचे सामर्थ्य आणि चांगुलपण प्रमाणित करते.

म्हणून, भयभीत होऊं नका. तुमचे विरोधक देवानें त्यांना जी सीमा ठरविली आहे त्यापलीकडें जास्त काहीं करू शकत नाहींत. आणि तो तुम्हांला आवश्यक असलेला सर्व विश्वास देईल. ही अभिवचनें रक्ताने विकत घेतलेली आहेत आणि त्यावर शिक्कामोर्तब करण्यांत आलें आहे. ही सुवार्तेची अभिवचनें आहेत.

6 सितम्बर : ईर्ष्या के परिणाम

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6 सितम्बर : ईर्ष्या के परिणाम
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“शान्त मन, तन का जीवन है, परन्तु मन के जलने से हड्डियाँ भी जल जाती हैं।” नीतिवचन 14:30

ईर्ष्या आत्मिक कैंसर के समान है, जो व्यक्ति को भीतर से नष्ट कर देती है।

ईर्ष्या के परिणाम गम्भीर होते हैं। राजा सुलैमान इस घातक रोग के बारे में हमें स्पष्ट शब्दों में सचेत करता है और इसके स्थान पर हमें स्वास्थ्य और शान्ति का जीवन अपनाने के लिए प्रेरित करता है।

ईर्ष्या हमें नुकसान पहुँचाती है। भले ही यह दूसरों को प्रत्यक्ष रूप से कोई हानि न पहुँचाए, लेकिन यह ईर्ष्या करने वाले व्यक्ति को भीतर से खोखला कर देती है। यह दूसरों के प्रति हमारे दृष्टिकोण को प्रभावित करती है। यह एक नकारात्मक तथा आलोचनात्मक दृष्टिकोण को जन्म देती है, जिससे हम अपने पड़ोसियों को अनुचित सन्देह और क्रोध की दृष्टि से देखने लगते हैं। यह हमें दूसरों की खुशी में सहभागी होने से रोकती है और हमारे सन्तोष को छीन लेती है, क्योंकि हमेशा कोई न कोई ऐसा होगा जिसके पास हमसे अधिक होगा और जिससे तुलना करके हम असन्तोष में घिर सकते हैं। ईर्ष्या हड्डियों को गला देती है।

ईर्ष्या अचानक और चुपचाप हमारे मन में घर कर सकती है। प्रेरित पतरस इसका एक उदाहरण है। क्रूस पर यीशु की मृत्यु से ठीक पहले उसने मसीह का तीन बार इनकार कर दिया और परिस्थितियों को और बिगाड़ दिया। यूहन्ना अपने सुसमाचार में बताता है कि पुनरुत्थान के बाद यीशु ने पतरस और अन्य चेलों के लिए समुद्र के किनारे नाश्ता तैयार किया और पतरस से बातचीत की। इस मुलाकात में यीशु ने पतरस के साथ अपने सम्बन्ध को पुनः स्थापित किया, उसे फिर से अपने पीछे चलने के लिए बुलाया, और उसे अपने लोगों की चरवाही करने की ज़िम्मेदारी सौंपी। यदि उससे एक दिन पहले पतरस से पूछा जाता कि उसके हृदय की सबसे बड़ी लालसा क्या है, तो वह यही होती। लेकिन जब यीशु ने कहा कि पतरस को भविष्य में उसके लिए अपना जीवन देना होगा, तो पतरस की क्या प्रतिक्रिया थी? उसने यूहन्ना की ओर देखकर पूछा, “हे प्रभु, इसका क्या हाल होगा?”

यीशु, जो ईर्ष्या के खतरों को भली-भाँति जानता था, उत्तर देता है, “यदि मैं चाहूँ कि वह मेरे आने तक ठहरा रहे, तो तुझे इससे क्या? तू मेरे पीछे हो ले!” (यूहन्ना 21:22)।

यह कितनी सरलता से हो जाता है कि जब हम आत्मिक उन्नति की ओर बढ़ रहे होते हैं, तब भी ईर्ष्या हमें जकड़ लेती है और हमें यह भुला देती है कि यीशु ने हमारे लिए क्या किया है और हमें क्या दिया है! तो फिर, इस आत्मिक बीमारी का कोई इलाज कैसे सम्भव है?

जो कार्य हम सबसे आखिर में करना चाहते हैं, वही हमें सबसे पहले करने की आवश्यकता है: ईर्ष्या को पाप के रूप में पहचानना और इसे परमेश्वर की उपस्थिति में अंगीकार करके प्रकाश में लाना। इसके बाद, हम प्रार्थना के द्वारा ईर्ष्या को हर क्षण में त्यागने का संकल्प लें, और पवित्र आत्मा से सहायता माँगें कि वह हमें स्मरण कराए कि मसीह में हमें कितना कुछ प्राप्त हुआ है। जब तक हमारे हृदय ईर्ष्या से नहीं, बल्कि आनन्द से भर न जाएँ, तब तक हमें सतत प्रयास करते रहना है। जो लोग अपनी आशिषों को गिनते हैं, वे दूसरों को मिली आशिषों के लिए परमेश्वर की स्तुति करने में अधिक सक्षम होते हैं। और एक शान्त चित्त जीवन प्रदान करता है।

अपनी ईर्ष्या को अनियन्त्रित रूप से आपको खोखला न करने दें। यह किस रूप में आपको जकड़े हुए है? इसे स्वीकार करें, इसके लिए प्रार्थना करें, और सुसमाचार के सत्य से इसका विरोध करें।

यूहन्ना 21:15-23

◊ पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: भजन 148–150; यूहन्ना 1:29-51

6 September : विद्यमान आणि सर्वसमर्थ अशी प्रीति

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6 September : विद्यमान आणि सर्वसमर्थ अशी प्रीति
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ख्रिस्ताच्या प्रीतिपासून आपल्याला कोण विभक्त करील? क्लेश, आपत्ती, छळणूक, उपासमार, नग्नता, संकट किंवा तलवार ही विभक्त करतील काय? (रोमकरांस 8:35)

रोमकरांस 8:35 मध्यें प्रकट तीन गोष्टींकडें लक्ष द्या.

  1. ख्रिस्त सांप्रतकाळी आम्हांवर प्रीति करतो.

एखादी स्त्री कदाचित् तिच्या हयात नसलेल्या पतीविषयी म्हणेंल: कोणतीही वस्तू मला त्याच्या प्रीतिपासून विभक्त करायला समर्थ होणार नाहीं. तिच्या या वक्तव्याचा अर्थ असा असू शकतो कीं तिच्या अंत:करणांत त्याच्या प्रीतिच्या आठवणी तिला आयुष्यभर गोडवा देणारी आणि शक्तिवर्धक अशा असतील. पण पौल इथे जें म्हणत आहे त्याचा अर्थ तो होत नाहीं.

रोमकरांस 8:34 मध्यें स्पष्टपणें असे म्हटले आहे कीं, “जो मेला इतकेच नाहीं, तर मेलेल्यांतून उठला आहे, जो देवाच्या उजवीकडें आहे आणि जो आपल्यासाठीं मध्यस्थीही करत आहे तो ख्रिस्त येशू आहे.” कोणतीही वस्तू आपल्याला ख्रिस्ताच्या प्रीतिपासून विभक्त करायला समर्थ होणार नाहीं असे पौल म्हणू शकतो याचे कारण हे कीं ख्रिस्त जिवंत आहे आणि आत्ताही तो आपल्यावर प्रीति करतो.

तो देवाच्या उजवीकडें आहे आणि म्हणून तो आम्हांसाठीं सर्व वस्तूंवर राज्य करत आहे. एवढेच नाहीं, तर तो आपल्यासाठीं मध्यस्थी देखील करत आहे, याचा अर्थ असा कीं त्यानें आमच्या मुक्तीसाठीं जे कार्य साध्य केलें ते आम्हांला क्षणोक्षणी तारून नेत आहे आणि सार्वकालिक असा जो आनंद त्यांत आपल्याला सुरक्षितपणें घेऊन येत आहे, याकडें तो पुरेपूर लक्ष्य देतोय. त्याची प्रीति फक्त आठवणी नाहींत. ही सर्वसमर्थ, देवाच्या जिवंत पुत्राची क्षणोक्षणी जिवंत असलेली एक क्रिया आहे, जी आपल्याला सार्वकालिक आनंद देते.

2. ख्रिस्ताची ही प्रीति आम्हांला विभक्त होण्यापासून वाचवण्यात प्रबळ आहे, आणि म्हणून ही प्रीति सर्वांवर असलेली सामान्य वैश्विक प्रीति नाहीं तर त्याच्या लोकांसाठीं असलेली विशिष्ट अशी वैयक्तिक प्रीति आहे – म्हणजें रोमकरांस 8:28 म्हणते त्याप्रमाणें, त्यांच्यावर असलेली प्रीति जे देवावर प्रीति करतांत आणि त्याच्या संकल्पाप्रमाणें बोलाविलेलें आहेत.

ही इफिस 5:25 मध्यें वर्णिलेली प्रीति आहे, “पतींनो, जशी ख्रिस्तानें मंडळीवर प्रीति केलीं तशी तुम्हींही आपापल्या पत्नीवर प्रीति करा; ख्रिस्तानें मंडळीवर प्रीति केलीं आणि स्वतःस तिच्यासाठीं समर्पण केलें.” ही ख्रिस्ताची आपल्या मंडळीवर, जी त्याची नवरी आहे, प्रीति आहे. ख्रिस्ताची सर्वांवर प्रीति आहे, आणि जी प्रीति त्याला आपल्या वधूसाठीं आहे ती विशेष, तारणदायी, राखणारी प्रीति आहे. जर तुमचा ख्रिस्तावर विश्वास असेल तर तुम्हीं त्या वधूचा भाग आहात हे आपल्याला ठाऊक आहे. जो कोणी – यांत अपवाद नाहींच – जो कोणी ख्रिस्तावर विश्वास ठेवतो तो हे म्हणू शकतो कीं, मी त्याच्या वधूचा, त्याच्या मंडळीचा भाग आहे; जें त्याचे बोलाविलेले आणि निवडलेलें आहेंत त्यांपैकीं एक आहे, म्हणजें त्यांपैकीं ज्यांची रोमकरांस 8:35 मध्यें सांगितल्याप्रमाणें, काहींही झालें तरी, युगानुयुग राखण केलीं जाते आणि ज्यांचे संरक्षण केलें जाते.

3. ही सर्वसमर्थ, प्रबळ, राखून ठेवणारी प्रीति आपल्याला या जीवनातील संकटांपासून वाचवत नाहीं, तर त्यां संकटांद्वारे आपल्याला सुरक्षितपणें देवासोबत सार्वकालिक आनंदात घेऊन येते.

आपण सर्वांना मरण येईल, परंतु ते मरण आपल्याला विभक्त करण्यांस समर्थ होणार नाहीं. म्हणून जेव्हा पौल वचन 35 मध्यें म्हणतो कीं “तलवार” आपल्याला ख्रिस्ताच्या प्रीतिप्रेमापासून विभक्त करण्यांस समर्थ होणार नाहीं, तेव्हा त्याचा अर्थ असा आहे : जरी आपण जिवे मारिलें गेलो तरी आपण ख्रिस्ताच्या प्रीतिप्रेमापासून विभक्त केलें जाणार नाहीं.

ह्याप्रमाणें वचन 35 चा सारांश असा आहे : येशू ख्रिस्त सांप्रतकाळी आपल्या लोकांवर अशा प्रीतिने प्रेम करतो जी सर्वसमर्थ, क्षणोक्षणी वर्तमान अशी आहे, जी आपल्याला नेहमीच संकटांतून सोडवत नाहीं, तर दुःख व मरण यांतूनही त्याच्या उपस्थितीत आम्हांला सार्वकालिक आनंद प्राप्त व्हावा म्हणून आम्हांला राखून ठेविते.

5 सितम्बर : पतियों के लिए एक सन्देश

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5 सितम्बर : पतियों के लिए एक सन्देश
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“हे पतियो, अपनी-अपनी पत्नी से प्रेम रखो जैसा मसीह ने भी कलीसिया से प्रेम करके अपने आप को उसके लिए दे दिया कि उसको वचन के द्वारा जल के स्नान से शुद्ध करके पवित्र बनाए।” इफिसियों 5:25-26

परमेश्वर के अनुग्रह से प्रत्येक मसीही विवाह केवल विवाह तक सीमित नहीं रहता।

मनुष्य के विवाह का उद्देश्य स्वयं विवाह से आगे संकेत करना है, उस परम विवाह की ओर जो स्वर्ग में ठहराया गया है—अर्थात जिसमें दूल्हा मसीह है और कलीसिया उसकी दुल्हन है। दूसरे शब्दों में, विवाह परमेश्वर की परम योजना को दर्शाने के लिए है, जिसके अन्तर्गत “जो कुछ स्वर्ग में है और जो कुछ पृथ्वी पर है, सब कुछ वह मसीह में एकत्र” करेगा (इफिसियों 1:10)। यही कारण है कि पौलुस पतियों के लिए विशेष निर्देश देता है, ताकि उनके विवाह उस मिलन को प्रकट कर सकें जिसे परमेश्वर ने ठहराया है।

विवाह में पति का मुख्य उद्देश्य केवल अपनी पत्नी की शारीरिक और भावनात्मक देखभाल करना नहीं है। हाँ, यह भी आवश्यक है, लेकिन उसका परम उद्देश्य यह होना चाहिए कि उसकी पत्नी यीशु से मिलने के लिए तैयार हो।

इसीलिए पौलुस यहाँ जिस “प्रेम” शब्द का उपयोग करता है, वह महत्त्वपूर्ण है। यूनानी भाषा में “अगापे” प्रेम आत्म-त्याग और आत्म-न्यूनता को व्यक्त करता है। यह प्रेम पाने के बारे में नहीं, बल्कि देने के बारे में है। यह इस बात पर केन्द्रित नहीं कि हमें क्या मिलना चाहिए, बल्कि इस पर कि हमें क्या देना है। यह स्वार्थी हितों की खोज नहीं, बल्कि अपनी पत्नी के वास्तविक हित के लिए स्वयं को समर्पित करने का प्रेम है, जिससे वह “पवित्र और निर्दोष हो” (इफिसियों 5:27)। यही कारण था कि मसीह ने अपने जीवन को अपनी कलीसिया के लिए दे दिया, और पति के रूप में यही प्रेम हमें अपनी पत्नियों के लिए रखना चाहिए।

लेकिन एक पति अपने दैनिक जीवन में इस प्रेम को कैसे व्यक्त कर सकता है? इसका एक व्यावहारिक तरीका यह है कि पति शारीरिक, भावनात्मक और आत्मिक रूप से अपनी पत्नी की उपेक्षा न करें—और यदि आपका पेशा, या सामाजिक या कलीसियाई जिम्मेदारियाँ किसी भी प्रकार की बाधा बनती हैं, तो आपको अपनी प्राथमिकताओं पर पुनर्विचार करना होगा। आपको अत्याचार का त्याग भी करना होगा, जिसमें न केवल गम्भीर पाप शामिल हैं, बल्कि इसमें अपनी पत्नी को नीचा दिखाना, उस पर हुक्म जमाना, उसे नज़रअन्दाज़ करना, या ऐसा व्यवहार करना जैसे वह आपसे विवाह करके बहुत सौभाग्यशाली है—ये सब भी शामिल हैं। और अन्त में, आपको यह भी सुनिश्चित करना होगा कि आप अपनी शादी को कभी भी हल्के में न लें, जो कि समय के साथ होना सम्भव हो सकता है।

फिर भी, ये व्यावहारिक सुझाव चाहे जितने भी सहायक हों, असली मापदण्ड और प्रेरणा का स्रोत क्रूस पर मसीह का अपनी कलीसिया के प्रति प्रेम है। यदि हम स्पष्ट रूप से नहीं देख पाते कि यीशु ने अपनी कलीसिया से कैसा प्रेम किया है, तो हमारी अच्छी इच्छाएँ भी असफल हो जाएँगी, और हमारी कमियाँ हमें तोड़ देंगी। इसलिए हमें मसीह की ओर देखना चाहिए, जिसे स्वयं किसी व्यक्ति या वस्तु की ज़रूरत नहीं थी, तौभी उसने अपने आपको दे दिया ताकि हम—जो ज़रूरतमन्द हैं, विद्रोही हैं, और खाली हैं—उसकी बाँहों में समा सकें, उसके हृदय में स्वागत पा सकें, उसके परिवार में शामिल हो सकें, और उसकी दुल्हन का हिस्सा माने जा सकें।

क्या आप यह सोचकर चकित होते हैं, “उसने मुझसे इतना प्रेम क्यों किया?” यदि हाँ, तो आप समझ सकते हैं कि पतियों के लिए यह आदेश कि “अपनी-अपनी पत्नी से प्रेम रखो जैसा मसीह ने भी कलीसिया से प्रेम करके अपने आप को उसके लिए दे दिया,” कितना ऊँचा है। यदि आप एक पति हैं, या भविष्य में बनना चाहते हैं, तो इसे प्रार्थना से आरम्भ करें—प्रार्थना करें कि पवित्र आत्मा आपको बाइबल आधारित सोचने, आज्ञाकारिता से जीने, और वास्तव में निःस्वार्थ प्रेम करने में सक्षम बनाए। और यदि आप एक पत्नी हैं, या भविष्य में बनने की आशा रखती हैं, तो आप यह प्रार्थना अपने पति के लिए भी करें, जिससे आपकी और उसकी प्रसन्नता सुनिश्चित हो, और सबसे बढ़कर, परमेश्वर को महिमा मिले।

इफिसियों 5:22-32

पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: भजन 146–147; यूहन्ना 1:1-28 ◊

5 September : ख्रिस्ताच्या प्रेमाचे ध्येय

“हे माझ्या पित्या, माझी अशी इच्छा आहे कीं, तू जे मला दिलें आहेत त्यांनीही जेथे मी आहे तेथे माझ्याजवळ असावे; ह्यासाठीं कीं, जो माझा गौरव तू मला दिला आहेस तो त्यांनी पाहावा” (योहान 17:24).

येशूवर विश्वास ठेवणारे देवाच्या दृष्टित मौल्यवान आहेत (आम्हीं त्याची वधू आहोत!). आणि तो आम्हांवर इतकीं प्रीति करतो कीं आमची जी मौल्यवानता आहे तिला तो आमच्यासाठीं भजनीय दैवत बनू देणार नाहीं.

अर्थातच, देवानें आपल्यासाठीं बरेच काहीं केलें आहे (तो आपल्याला दत्तक घेऊन त्याचे कुटुंबीय बनवतो!), परंतु तो असे करतो याचे कारण म्हणजें हे कीं आपण त्याच्या महानतेचा (गौरवाचा) आनंद घ्यावा म्हणून तो आधी आपल्याला आमच्या स्व:पणातून बाहेर काढतो.

आपापले परीक्षण करा. कल्पना करा, कीं जर येशू तुमच्यासोबत दिवस घालवण्यासाठीं येतो, तुमच्या शेजारी पलंगावर बसतो आणि म्हणतो, “माझं तुझ्यावर खरं प्रेम आहे,” तर आता ज्याअर्थी तुम्हीं त्याच्याबरोबर दिवस घालविला, तर उर्वरित दिवस तुम्हीं कशावर लक्ष केंद्रित करून घालवाल?

मला असे वाटते कीं अशी बरीच गीतें आणि प्रवचने आहेत जी आपल्याला चुकींचे उत्तर देऊन सोडतांत. त्यांचे उत्तर आमच्या अंत:करणांत अशी छाप सोडतांत कीं आमचा आनंद तेव्हां काठोकाठ भरतो जेव्हां आमच्यावर प्रीति केल्याची भावना आम्हांला वारंवार जाणवते. “तो माझ्यावर प्रेम करतो!” “तो माझ्यावर प्रेम करतो!” निश्चितच, हा आनंद खरा आहे यांत शंका नाहीं. पण हा आनंद काठोकाठ नाहीं, आणि हा त्या मागचा मुख्य हेतूही नाहीं.

जेव्हां आपण म्हणतो “मजवर प्रीति केलीं गेलीं” तेव्हां आपण काय म्हणत आहोत? आम्हांला काय म्हणायचे आहे? “मजवर प्रीति केलीं गेलीं” ह्याचे खरे औचित्य काय आहे?

दिवसभर येशूला निरक्षून आणि “अहाहा तू किती गौरवी आहेस!” “अहाहा! काय तुझे ते गौरव!” असे मोठ्याने उद्गार काढण्यात सर्वात मोठा, व ख्रिस्ताला उंचवणारा आनंद मिळणार नाहीं का?

  • तो सर्वात अवघड अशा प्रश्नाचे उत्तर देतो म्हणजें त्याचे शहाणपण गौरवी आहे.
  • तो घाणेंरड्या, रक्तस्त्राव होणाऱ्या फोडाला स्पर्श करतो, म्हणजें त्याचा कळवळा गौरवी आहे.
  • तो वैद्यकींय परीक्षकांच्या कार्यालयात जाऊन मृत झालेंल्या एका महिलेला उठवतो म्हणजें त्याचे सामर्थ्य गौरवी आहे.
  • तो दुपारच्या घडामोडींचे भाकींत करतो म्हणजें त्याचे पूर्वज्ञान गौरवी आहे.
  • भूकंपाच्या वेळी तो शांत झोप घेतो म्हणजें त्याची निर्भयता गौरवी आहे.
  • तो म्हणतो, “अब्राहामाचा जन्म झाला त्यापूर्वी मी आहे” (योहान 8:58), म्हणजें त्याची वचनें गौरवी आहेत.

आम्हीं दिवसभर त्याच्याबरोबर चालतो-फिरतो, आणि जे आम्हांला दिसते ते पाहून त्याच्या गौरवाने भारावून जातो.

त्याला आपल्यासाठीं जे काहीं करणें अगत्याचे आहे (ज्यात आमच्यासाठीं मरण सोसणें देखील आहे) ते तो आपल्यासाठीं करावयास आवेशी आहे जेणेंकरुन आपण त्याला पाहून आश्चर्य करावें आणि त्यानें आम्हांस भस्म करू नये, ही त्याची आपल्यासाठीं प्रीति नाहीं का? पापमुक्ती, प्रायश्चित्त, अपराधांची क्षमा, नीतिमान ठरविले जाणें, देवाबरोबर समेट – हे सर्व होणें अगत्याचे होते. ही सर्व प्रीतिची कार्य आहेत.

परंतु जी प्रीति त्या कृत्यांना प्रीतिचे स्वरूप देते त्या प्रीतिचे ध्येय हे कीं आपण त्याच्याबरोबर असावे आणि थक्क करणारे असे जे त्याचे गौरव ते आम्हीं पाहावे आणि चकित व्हावे. हे असे क्षण आहेत जेव्हां आपण स्वतःला विसरून जातो आणि देव त्याच्याद्वारे आम्हांबरोबर आहे हे पाहण्यांस समर्थ होतो.

म्हणून मी पाळकांना आणि शिक्षकांना विनंती करतो : ख्रिस्तानें त्याचे प्रीतिचे जे कार्य केलें तेंच त्याच्या प्रीतिचे ध्येय आहे हे मंडळीला आवर्जून सांगा आणि प्रीतिच्या बाबतींत त्यांच्या विचारसरणीत बदल घडवून आणा. जर पापमुक्ती, प्रायश्चित्त, अपराधांची क्षमा, नीतिमान ठरविले जाणें, देवाबरोबर समेट – हे सर्व आपल्याला स्वतः येशूमध्यें आनंद करण्याकडें घेऊन जात नसतील तर ही प्रीतिची कार्यें नाहींत.

तुमचा संदेश व शिक्षण यावर केंद्रित असू द्या. योहान 17:24 मध्यें येशूनें याचसाठींच प्रार्थना केलीं होती, “हे माझ्या पित्या, माझी अशी इच्छा आहे कीं, तू जे मला दिलें आहेत त्यांनीही जेथे मी आहे तेथे माझ्याजवळ असावे; ह्यासाठीं कीं, जो माझा गौरव…तो त्यांनी पाहावा.”

4 सितम्बर : विवाह के लिए परमेश्वर की योजना

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4 सितम्बर : विवाह के लिए परमेश्वर की योजना
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“इस कारण पुरुष अपने माता–पिता को छोड़कर अपनी पत्नी से मिला रहेगा, और वे एक ही तन बने रहेंगे। आदम और उसकी पत्नी दोनों नंगे थे, पर लजाते न थे।” उत्पत्ति 2:24-25

विवाह परमेश्वर द्वारा दिया गया एक उपहार है, जिसे हमने अपने पाप के कारण मलिन कर दिया है। ये बाइबल-पद एक पूर्ण विश्वास से भरे, पूर्ण रूप से निर्बोध, और प्रेम में पूर्णतः एकता से जुड़े हुए सम्बन्ध को दर्शाते हैं। दुर्भाग्यवश, पतित संसार में रहने का एक स्पष्ट प्रभाव यह है कि फिल्मों के अतिरिक्त वास्तविक जीवन में कोई भी विवाह केवल और हमेशा ऐसा नहीं होता। मानव पाप का सबसे बड़ा दुख यह है कि हमारी प्रवृत्ति ही यह है कि हम परमेश्वर द्वारा बनाई गई अच्छी चीज़ों को भ्रष्ट कर दें, जिससे विवाह की सुन्दरता और आनन्द, जैसा कि परमेश्वर ने उसे रचा था, नष्ट हो जाता है। लेकिन एक आशा है! विश्वासियों के लिए, परमेश्वर का आत्मा हमें विवाह को उसकी मूल योजना के अनुसार समझने में सहायता करता है।

सबसे पहले, हमें यह स्वीकार करना होगा कि मसीह के बिना, हम सभी परमेश्वर की योजना के विरुद्ध विद्रोह में जी रहे हैं। समस्या केवल यह नहीं कि हम विवाह के स्वरूप को लेकर भ्रमित हैं, बल्कि यह भी है कि हमारी पाप से भरी इच्छाएँ विवाह की हमारी थोड़ी सी समझ को भी पूरी तरह अस्वीकार कर देती हैं। आज के संसार में विवाह को अक्सर एक बन्धन, एक सीमा, या एक पुरानी परम्परा के रूप में देखा जाता है, जो अब किसी काम की नहीं। यदि हम विवाह को इसी दृष्टि से देखते हैं, तो इसका कारण यह है कि हमारी प्रवृत्ति यही कहने की है, “मुझे परमेश्वर की योजना पसन्द नहीं। मैं इसे अपनी तरह से करूँगा।”

लेकिन जब हम मसीह में होते हैं, तब परमेश्वर हमें विवाह को उसकी योजना के अनुसार देखने की बुद्धि और सामर्थ्य प्रदान करता है। चाहे कोई भी सरकार कुछ भी तय करे, पवित्रशास्त्र पूरी तरह स्पष्ट है कि विवाह केवल एक पुरुष और एक स्त्री के बीच ही हो सकता है और न तो एक पुरुष एक से अधिक पत्नी रख सकता है और न ही एक स्त्री एक से अधिक पति रख सकती है। यही विवाह का मूल स्वरूप है, क्योंकि यही वह योजना है जिसे परमेश्वर ने सृष्टि के आरम्भ से निर्धारित किया था (उत्पत्ति 2)। यीशु ने भी उत्पत्ति 2 में विवाह के वर्णन को प्रमाणित किया और कहा कि परमेश्वर की योजना आरम्भ से लेकर अभी तक कभी नहीं बदली (मत्ती 19:4-6)।

हमें बाइबल को आधुनिक समाज के अनुसार बदलने या उसमें संशोधन करने का प्रयास नहीं करना चाहिए। यद्यपि यह पतित संसार बाइबल-आधारित विवाह के स्वरूप को अस्वीकार कर सकता है, परन्तु यदि हम विश्वास करते हैं कि बाइबल परमेश्वर का वचन है, तो हम उसकी शिक्षाओं का पालन करेंगे—अपने स्वयं के जीवन में, और जब हम दूसरों के विवाह के बारे में बात करते हैं और उनके लिए प्रार्थना करते हैं।

विश्वासियों के रूप में, हमें यह पहचानना चाहिए कि हर संस्कृति और हर युग में विवाह के प्रति परमेश्वर का उद्देश्य यह है कि यह मसीह के प्रेम और उसके लोगों के प्रति उसकी प्रतिबद्धता को प्रतिबिम्बित करे (इफिसियों 5:22-25)। और हमें यह भी याद रखना चाहिए कि जो कुछ पाप के कारण नष्ट और विकृत हो गया है, उसे प्रभु यीशु पुनर्स्थापित करने और सुधारने आया था।

केवल मसीह में और मसीह के द्वारा ही हम विवाह को परमेश्वर की योजना और स्वरूप के अनुसार देख सकते हैं। जहाँ संसार कहता है कि हम अपनी मर्जी से जीएँगे, वहीं परमेश्वर हमें प्रेमपूर्वक आमन्त्रित करता है कि हम अपने हृदय को उसकी योजना के अधीन करें। कुछ लोगों के लिए इस क्षेत्र में परमेश्वर की आज्ञाओं का पालन करना एक बड़े व्यक्तिगत बलिदान की मांग कर सकता है। और हम सब के लिए, 21वीं सदी में, संसार के मार्ग का विरोध करने और परमेश्वर के मार्ग पर दृढ़ता से चलने के लिए साहस की आवश्यकता होगी। आपकी विशेष परिस्थिति और सन्दर्भ में, परमेश्वर द्वारा विवाह जैसे महान उपहार के लिए बनाई गई उसकी योजना को प्रतिबिम्बित करने वाले ढंग से सोचना, बोलना और कार्य करना आपके लिए क्या मायने रखेगा?

उत्पत्ति 2

◊ पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: भजन 143–145; 2 कुरिन्थियों 13

4 September : नव्या कराराविषयी नवे असे काय आहे

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4 September : नव्या कराराविषयी नवे असे काय आहे
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“त्या दिवसांनंतर मी इस्राएलच्या घराण्याशी हा करार करीन, असे परमेश्वर म्हणतो: मी माझा नियम त्यांच्यामध्यें ठेवीन आणि मी ते त्यांच्या हृदयावर लिहीन. आणि मी त्यांचा देव होईन आणि ते माझे लोक होतील.” (यिर्मया 31:33)

येशू आज्ञा आणि प्रीति यांमध्यें असलेली कोणतीही अजोड आडभिंत उद्ध्वस्त करून टाकतो.

तो म्हणतो, “माझ्यावर तुमची प्रीति असली तर तुम्हीं माझ्या आज्ञा पाळाल. . . . ज्याच्याजवळ माझ्या आज्ञा आहेत व जो त्या पाळतो तोच माझ्यावर प्रीति करणारा आहे; आणि जो माझ्यावर प्रीति करतो त्याच्यावर माझा पिता प्रीति करील” (योहान 14:15, 21). “जसा मी आपल्या पित्याच्या आज्ञा पाळून त्याच्या प्रीतित राहतो तसे तुम्हीं माझ्या आज्ञा पाळाल तर माझ्या प्रीतित राहाल” (योहान 15:10).

आज्ञा आणि आज्ञापालन या दृष्टीने विचार केला, तर ह्या दोन्हीं गोष्टी येशूला त्याच्या पित्याच्या प्रीतिचा आनंद घेण्यापासून थांबवू शकल्या नाहीं. म्हणून त्याला अशी अपेक्षा आहे कीं आपण जेव्हां त्याच्याकडें आज्ञा देणारा प्रभू म्हणून पाहतो तेव्हां त्याच्याबरोबरचे असलेले आपलेंही प्रीतिचे नाते धोक्यात येणार नाहींत.

हे लक्षात घेणें अत्यंत महत्त्वाचे आहे कारण येशू ख्रिस्ताद्वारे देवाबरोबर असलेले आपलें नव्या कराराचे नाते म्हणजें असा करार नाहीं जो आज्ञांविरहित असेल. देवानें मोशेच्या द्वारे देऊ केलेंला जुना करार आणि देवानें ख्रिस्ताद्वारे देऊ केलेंला नवा करार यातील मूलभूत फरक हा नाहीं कीं एका करारात आज्ञा होत्या आणि दुसऱ्या करारात आज्ञा नाहींत.

यां दोन करारातील मुख्य फरक पुढीलप्रमाणें आहे: (1) मशीहा, म्हणजें येशू प्रकट झाला आणि त्यानें नव्या कराराचे रक्त ओतले (मत्तय 26:28; इब्री 10:29) जेणेंकरून यापुढे त्यानें ह्या नव्या कराराचा मध्यस्थ व्हावे, जेणेंकरून सर्वांचे तारण व्हावे, करार पाळणारा विश्वास हा त्याच्यावर जाणीवपूर्वक विश्वास आहे; (2) त्यामुळें जुना करार “जीर्ण” झाला आहे (इब्री 8:13) आणि नव्या कराराचे म्हटलेले जें देवाचे लोक त्यांच्यावर यापुढे त्याचे आधिपत्य चालत नाहीं (2 करिंथ 3:7-18; रोम 7:4,6; गलती 3:19) ; आणि (3) वचनदत्त नवे हृदय आणि पवित्र आत्म्याचे समर्थ बनविणारे सामर्थ्य हे विश्वासाद्वारे देण्यांत आलेंले आहेंत.

जुन्या करारात, आम्हांला देवाची आज्ञा पाळण्यास समर्थ बनविणारे कृपेचे सामर्थ्य त्या पूर्णतेने ओतले गेलें नव्हते ज्या पूर्णतेने ते येशू प्रकट झाल्यापासून ओतण्यांत आलें आहे. “पण आजपर्यंत परमेश्वराने तुम्हांला समजायला मन, पाहायला डोळे व ऐकायला कान दिलें नाहींत.” (अनुवाद 29:4). नव्या कराराविषयी जे नवे आहे त्याच्या अर्थ असा होत नाहीं कीं त्या करारात कोणत्याही आज्ञा नाहींत, तर हे कीं देवानें जी अभिवचने दिली होती ती पूर्णत्वास आलीं आहेत! “मी माझा नियम त्यांच्यामध्यें ठेवीन आणि मी ते त्यांच्या हृदयावर लिहीन” (यिर्मया 31:33). “मी तुमच्या ठायीं माझा आत्मा घालीन आणि तुम्हीं माझ्या नियमांनी चालाल, माझे निर्णय पाळून त्यांप्रमाणें आचरण कराल असे मी करीन ” (यहेज्केल 36:27).

3 सितम्बर : पत्नियों के लिए एक सन्देश

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3 सितम्बर : पत्नियों के लिए एक सन्देश
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“हे पत्नियो, अपने-अपने पति के ऐसे अधीन रहो जैसे प्रभु के।” इफिसियों 5:22

“अधीनता” शब्द अक्सर तरह-तरह की नकारात्मक प्रतिक्रियाएँ उत्पन्न करता है। इसका एक कारण यह है, जैसा कि जॉन स्टॉट ने 40 साल पहले लिखा था, “आज के युग में अधिकार की अधीनता में आने का विचार पुराना हो चुका है। यह वर्तमान समय की स्वच्छन्दता और स्वतन्त्रता की मानसिकता से पूरी तरह मेल नहीं खाता।”[1] बीते दशकों में अधीनता की नकारात्मक छवि और भी गहरी हो गई है, जिसे विशेष रूप से विवाह के सन्दर्भ में देखा जा सकता है।

फिर भी यह तथ्य बना हुआ है कि यदि इसे सही रूप में समझा और लागू किया जाए, तो सम्बन्धों के केन्द्र में अधीनता ही होती है, जैसा कि परमेश्वर ने उन्हें स्थापित किया है। बच्चे अपने माता-पिता के अधीन होते हैं (इफिसियों 6:1), कलीसिया के सदस्य अपने अगुवों के अधीन होते हैं (इब्रानियों 13:17), और इसी प्रकार पत्नियाँ अपने पतियों के वैसे ही अधीन होती हैं, “जैसे प्रभु के” (इफिसियों 5:22)। हमारे जीवन में हमें जिन भूमिकाओं के लिए बुलाया गया है, उनके अनुसार दूसरों की अधीनता में आना हमारे सम्बन्धों का एक स्वाभाविक भाग है। इस दृष्टि से, एक पत्नी का अपने पति की अधीनता में आना विवाह के लिए परमेश्वर की दिव्य व्यवस्था को प्रतिबिम्बित करता है। लेकिन हमें इस शिक्षा को कैसे समझना चाहिए?

पहली बात, पत्नी को अपने पति की अधीनता में होने की आज्ञा का अर्थ यह नहीं कि वह अपने पति से कम मूल्यवान या हीन है। बाइबल स्पष्ट रूप से सिखाती है कि पुरुष और स्त्री दोनों समान सम्मान के योग्य हैं, क्योंकि दोनों ही परमेश्वर के स्वरूप में सृजे गए हैं (उत्पत्ति 1:27)। विश्वासियों के रूप में, हम छुटकारे में भी समान हैं—और यह समानता इस बात में प्रकट होती है कि हम परमेश्वर के अनुग्रह के संयुक्त उत्तराधिकारी हैं (1 पतरस 3:7)। परमेश्वर के सामने पुरुषों और स्त्रियों की स्थिति पूरी तरह से समान है।  भूमिका में अन्तर का अर्थ मूल्य में अन्तर नहीं होता।

दूसरी बात, पत्नियों को अपने-अपने पति के अधीन होने के लिए कहा गया है, न कि सभी पुरुषों के अधीन। पौलुस समाज में महिलाओं की स्थिति को लेकर कोई सामान्य आदेश नहीं दे रहा है, बल्कि वह परिवार में पत्नी की भूमिका के बारे में एक विशिष्ट निर्देश दे रहा है। इस सन्दर्भ में, पत्नी का प्रभु की अधीनता में आना उसके अपने पति की अधीनता में आने के द्वारा प्रकट होता है।

तीसरी बात, यह अधीनता अंधी और बिना शर्त आज्ञाकारिता नहीं है। पति अपनी पत्नियों को बलपूर्वक अधीनता के लिए बाध्य नहीं कर सकते, और न ही वे उनसे कोई भी ऐसी माँग कर सकते हैं जो प्रभु की इच्छा के विरुद्ध हो। इसका अर्थ यह भी नहीं है कि पत्नी को अपने पति के हर आदेश को बिना किसी प्रश्न के मानना होगा। इसके विपरीत, पति को “अपनी पत्नी से अपने समान प्रेम” रखना है, उसके लिए अपना जीवन देना है और उसे पवित्रता में अगुवाई करनी है (इफिसियों 5:33)। यदि आप पति हैं, तो आपके लिए यह समझना आवश्यक है कि यदि आप अपनी पत्नी को मसीह की आज्ञा मानने से रोकने या उससे दूर ले जाने का प्रयास करते हैं, तो उसे बाइबल के अनुसार आपका अनुसरण करने की कोई बाध्यता नहीं है।

यदि आप पत्नी हैं, तो बाइबल आपको अंधी और दासत्व जैसी आज्ञाकारिता के लिए नहीं बुलाती। बल्कि, आपकी अधीनता एक आनन्दमयी निष्ठा और अपने पति के नेतृत्व का अनुसरण करने की प्रतिबद्धता होनी चाहिए—एक पारस्परिक सहभागिता का हिस्सा, जो हर बात में परमेश्वर की महिमा को खोजती है। सम्पूर्ण हृदय से, बिना किसी अनिच्छा के की गई यह अधीनता केवल परमेश्वर की शक्ति से सम्भव है, ताकि आप अपने पति से “अपने जीवन के सारे दिनों में बुरा नहीं, वरन् भला ही व्यवहार” करें (नीतिवचन 31:12)।

बाइबल पर आधारित यह अधीनता निश्चित रूप से आज के संसार में लोकप्रिय नहीं है। यह अक्सर आसान भी नहीं होती। लेकिन परमेश्वर और उसके लोगों की दृष्टि में यह अत्यन्त सुन्दर है।

  नीतिवचन 31:10-31

पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: भजन 140–142; 2 कुरिन्थियों 12 ◊


[1] द मैसेज ऑफ इफिशियंस: द बाइबल स्पीक्स टूडे (आई.वी.पी. अकेडेमिक, 1979), पृ. 215.

3 September : परमेश्वराच्या “मी करीन” अभिव्यक्तीं

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3 September : परमेश्वराच्या "मी करीन" अभिव्यक्तीं
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“यरुशलेमेत माणसे व गुरेढोरे फार झाल्यामुळें भिंती नसलेल्या खेड्यांप्रमाणें तिच्यात वस्ती होईल. परमेश्वर म्हणतो, तिच्या सभोवार मी तिला अग्नीचा कोट होईन, व तिच्या ठायीं मी तेजोरूप होईन.” (जखऱ्या 2:4-5)

असे काहीं पहाटेचे प्रसंग आहेत जेव्हा मला बिछान्यावरून उठताच दुर्बळपणा जाणवतो. म्हणजें असहाय. असे का हे अनेकदा कळत नाहीं. धोका कसलाही नसतो. कसलीही कमजोरी नसते. असते ती केवळ एक अशी स्वरूप नसलेली भावना कीं काहींतरी वाईट होणार आहे आणि त्यासाठीं मीच जबाबदार असेल.

असे सहसा तेव्हां होते जेव्हां माझी बरीच टीका झालेंलीं असते. किंवा कदाचित तेव्हां जेव्हां माझ्याकडून बऱ्याच अपेक्षां केल्यां जातांत ज्यांच्या मुदती ठराविक आहेत आणि त्या पूर्ण करण्याच्या दृष्टीनें खूप मोठ्या आणि खूप जास्त वाटतांत.

जेव्हां मी अशा नियतकालिक पहाटे झालेंल्या प्रसंगावर विचार करतांना  सुमारे 50 वर्षांहून अधिक काळ मागे वळून पाहतो, तेव्हां मला या गोष्टीचे आश्चर्य वाटते कीं कशाप्रकारे प्रभु येशूनें माझ्या जीवनाचा व सेवेचा सांभाळ केला आहे. अशा तणावापासून दूर पळण्याच्या ज्यां परीक्षा माझ्यावर आल्या त्यां कधीही विजयी होऊं शकल्या नाहीं- आजवर तर नाहीं. हे अद्भुत आहे. यासाठीं मी माझ्या महान देवाची उपासना व गौरव करतो.

मला भीतीच्या अर्धांगवायूमध्यें बुडू देण्याऐवजी किंवा मला हिरव्या गवताच्या मृगजळात पळून जाऊ देण्याऐवजी, तो मला जागे करायचा कीं अशा वेळी मी त्याच्याकडें मदतीसाठीं धावा केला पाहिजे आणि नंतर तो मला आपल्या ठोस अभिवचनांची आठवण देऊन उत्तरही द्यायचा.

मी एक उदाहरण देतो. आणि हा प्रसंग नुकताच घडला. मी एका पहाटे उठलो तेव्हां मला भावनिकदृष्ट्या दुर्बळपणा जाणवत होता. असहाय. असुरक्षित. मी प्रार्थना केलीं: “प्रभु मला मदत कर. प्रार्थना कशी करावी हेही मला कळत नाहींये.”

एका तासानंतर मी जखऱ्याचे पुस्तक वाचू लागलो आणि ज्या मदतीसाठीं मी धावा केला होता तिचा शोध घेऊ लागलो. आणि मला ते सहाय्य या वचनांत पुरविण्यात आलें :-

“यरुशलेमेत माणसे व गुरेढोरे फार झाल्यामुळें भिंती नसलेल्या खेड्यांप्रमाणें तिच्यात वस्ती होईल. परमेश्वर म्हणतो, तिच्या सभोवार मी तिला अग्नीचा कोट होईन, व तिच्या ठायीं मी तेजोरूप होईन.” (जखऱ्या 2:4-5)

देवाच्या लोकांची अशी समृद्धी आणि वाढ होईल कीं यरुशलेमेला स्वतः भोवती यापुढे तटबंदी देखील उभारता येणार नाहीं. “माणसे व गुरेढोरे” इतके वाढतील कीं यरुशलेम भिंती नसलेल्या अनेक खेड्यांप्रमाणें होईल.

समृद्धी तर ठीक आहे, पण संरक्षणाचे काय?

वचन 5 मध्यें परमेश्वर याचे उत्तर देतो, “परमेश्वर म्हणतो, तिच्या सभोवार मी तिला अग्नीचा कोट होईन.” होय. बस इतके पुरे आहे. हेच ते अभिवचन आहे. परमेश्वराच्या “मी करीन” यां अभिव्यक्तीं. मला त्याचीच गरज आहे.

आणि जर ते यरुशलेमेच्या असुरक्षित खेड्यांच्या बाबतींत खरे आहे तर मग मी जो देवाचे मुल आहे, ते माझ्या बाबतींत देखील सत्य आहे. मी जुन्या करारातील ही अशी अभिवचनें देवाच्या लोकांवर या  पद्धतीनेच लागू करतो. सर्व अभिवचने मला ख्रिस्ताठायीं होय हेच आहेत (2 करिंथ 1:20). जे ख्रिस्तामध्यें आहेत त्यांच्यासाठीं प्रत्येक वचनानंतर “किती विशेषकरून” अशी घोषणा आहे. देव माझ्या सभोवार “अग्नीचा कोट” होईन. होय. तो होईल. तो झाला आहे. आणि तो पुढेही होईल. 

आणि हे अंशा-अंशाने अधिक चांगले होत जाते. संरक्षणाच्या त्या अग्नी-कोटातून तो म्हणतो, “तिच्या ठायीं मी तेजोरूप होईन.” देव आपलें संरक्षण करण्यासाठीं आपला केवळ अग्नी-कोट बनून तिथेच थांबत नाहीं; तर आपल्याला त्याच्या उपस्थितीचा सुखद आनंद द्यावा हा त्याचा अंतीम हेतू. मला देवाची “मी करीन” ह्या अभिव्यक्तीं खूप आवडतांत!