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12 सितम्बर : हमें उसने जन्म दिया है

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12 सितम्बर : हमें उसने जन्म दिया है
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उसने अपनी ही इच्छा से हमें सत्य के वचन के द्वारा उत्पन्न किया।” याकूब 1:18

प्रसिद्ध टेलीविजन मेजबान जॉनी कार्सन ने एक बार एक खिझे हुए किशोर और एक निराश पिता के बीच एक बातचीत का वर्णन किया, जब वे एक-दूसरे से लड़ रहे थे। जब किशोर दरवाजा बन्द करने और बाहर जाने ही वाला था कि वह चिल्लाया, “मैंने दुनिया में जन्म लेने के लिए नहीं कहा था!” इसके जवाब में पिता ने भी चिल्लाते हुए कहा, “और यदि तुमने कहा भी होता, तो मैं कह देता ‘नहीं’!”

हममें से किसी ने भी जन्म लेने के लिए नहीं कहा। और वास्तव में, हममें से किसी ने भी नया जन्म लेने के लिए भी नहीं कहा। याकूब इस विनम्र सत्य की ओर इशारा करता है कि हमारा आध्यात्मिक जन्म वह नहीं था जिसे हमने परमेश्वर से करने को कहा। परमेश्वर की भलाई के कारण मसीह में हमारा नया जन्म उसका चुनाव था, और न तो हमारी विवशता का इस पर कोई प्रभाव पड़ा और न ही हमारी दिखावटी भलाई ने इसमें कोई योगदान दिया। उसने अपनी स्वतन्त्र, सर्वोच्च इच्छा के अनुसार ही कार्य किया। जैसा यीशु ने कहा, “हवा जिधर चाहती है उधर चलती है और तू उसका शब्द सुनता है, परन्तु नहीं जानता कि वह कहाँ से आती और किधर को जाती है? जो कोई आत्मा से जन्मा है वह ऐसा ही है” (यूहन्ना 3:8)।

आत्मा के कार्य के बिना, जो हमें मसीह के दर्शन कराता है, हमारे मूर्ख हृदय अंधे रहते हैं, और पाप हमारी नैतिकता की समझ पर मृत्यु-तुल्य प्रभाव डालता है। स्वभाव से हम पाप के शिकंजे में खोए हुए हैं, हमें अपनी स्थिति का समाधान जानने की बहुत आवश्यकता होती है, लेकिन हम यह भी नहीं देख पाते कि हमारी स्थिति वास्तव में है क्या। लेकिन भले ही हम अनुग्रह के द्वारा विश्वास से परमेश्वर के परिवार के सदस्य बन चुके हैं, तौभी हम कभी-कभी यह मानने के लिए प्रवृत्त होते हैं कि हमारा उद्धार उस काम का परिणाम है जो हमने किया है—कि हमने एक चुनाव किया, और हमें पाप से मुँह मोड़ने और बालकों जैसा विश्वास रखकर परमेश्वर की ओर मुड़ने का चुनाव करते रहना है। सत्य यह है कि परमेश्वर ने “अपनी ही इच्छा से हमें . . . उत्पन्न किया,” और जब हमने यह सुना, तब उसने हमें “सत्य के वचन” का प्रत्युत्तर देने के लिए सक्षम किया। जब हम इन टुकड़ों को आपस में जोड़ते हैं, तो हमें पता चलता है कि हम जो उसे चुनते हैं, वह केवल इसलिए सम्भव है क्योंकि उसने हमें पहले चुना।

जैसा कि एलेक मोट्यर ने कहा, “हमारे नए जन्म में हमारा किसी प्रकार का साधन या योगदानकर्ता बनना उतना ही असम्भव है, जितना कि हमारा प्राकृतिक जन्म लेने में होना। प्रारम्भिक चयन से लेकर पूरा होने तक, सारा काम उसका है . . . और जब तक उसकी इच्छा नहीं बदलती, उसका शब्द नहीं बदलता, या उसका सत्य गलत साबित नहीं होता, तब तक मेरा उद्धार खतरे में नहीं पड़ सकता और न ही खो सकता है।”[1]

यह जानकर कैसी सुरक्षा, शान्ति और आराम मिलता है कि यीशु मसीह के माध्यम से परमेश्वर की भलाई न केवल आपको पश्चात्ताप और विश्वास की ओर ले आई, बल्कि आपको विश्वास में बनाए भी रखेगी! यदि आपका विश्वास और उद्धार आप पर निर्भर होते, तो वे कभी सुरक्षित नहीं होते और आप हमेशा चिन्तित रहते। लेकिन यह उस पर निर्भर है और “न अदल बदल के कारण उस पर छाया पड़ती है” (याकूब 1:17)। आपने जन्म लेने के लिए नहीं कहा; उसने यह इच्छा की। इसलिए आप निश्चिन्त हो सकते हैं कि आप उसके बच्चे हैं—अब, कल, हर दिन और सदा के लिए।

  यहेजकेल 36

◊ पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: न्यायियों 13–15; यूहन्ना 5:1-24


[1] द मैसेज ऑफ एक्लेज़िआस्टेस: द बाइबल स्पीक्स टूडे (आई.वी.पी. अकेडेमिक, 1985), पृ. 60.

12 September : चिंता न करण्याची 7 कारणें, भाग 2

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12 September : चिंता न करण्याची 7 कारणें, भाग 2
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“चिंता करून आपल्या आयुष्याची दोरी हातभर वाढवण्यास तुमच्यापैकीं कोण समर्थ आहे? तसेच वस्त्राविषयी का चिंता करत बसता? रानातील फुले पाहा, ती कशी वाढतांत? ती कष्ट करत नाहींत व सूत कातत नाहींत; तरी मी तुम्हांला सांगतो, शलमोनदेखील आपल्या सर्व वैभवात त्यांतल्या एकासारखाही सजला नव्हता. जे रानातले गवत आज आहे व उद्या भट्टीत पडते त्याला जर देव असा पोशाख घालतो, तर, अहो तुम्हीं अल्पविश्वासी, तो विशेषेकरून तुम्हांला पोशाख घालणार नाहीं काय?” (मत्तय 6:27-30)

मत्तय 6:25-34 मध्यें येशूनें योजिलेली अशी किमान सात अभिवचनें आहेंत, जी आम्हांला विश्वासासंबंधीचे जे सुयुद्ध ते लढण्यास आणि चिंतामुक्त होण्यास मोठे सहाय्य पुरवितांत. काल आपण अभिवचन क्र.1 आणि अभिवचन क्र.2 ही पहिली; आज आपण अभिववचन क्र.3 आणि अभिवचन क्र.4 ही पाहूं.

अभिवचन क्र.3: “चिंता करून आपल्या आयुष्याची दोरी हातभर वाढवण्यास तुमच्यापैकीं कोण समर्थ आहे?” (मत्तय 6:27)

हे स्वतःमध्यें एक विशिष्ठ प्रकारचे अभिवचन आहे — वास्तविकतेविषयी एक सामान्य ज्ञान देणारे अभिवचन जे तुम्हीं तुमच्या अनुभवातून शिकू शकता : चिंता करून तुमचा काहींही फायदा होणार नाहीं. हेंच ते अभिवचन आहे. हा मुख्य युक्तिवाद नाहीं, परंतु काहींवेळा आपल्याला स्वतःशी कठोरपणें वागावे लागते आणि हे मान्य करावें लागते, कीं “हे जिवा, तुझी ही कुरकुर पूर्णपणें निरुपयोगी आहे. ती तुला कसलीही खात्री देत नाहीं. तू केवळ तुझाच नाहीं तर इतर लोकांचाही दिवस वाया घालवत आहेंस. चिंता करणें सोड. ती सर्व देवावर टाक. आणि आपला नित्यक्रम सुरू ठेव.”

ज्यामुळें आपलें कल्याण होईल असे काहींही चिंता साध्य करत नाहीं. ह्याविषयीचे ते अभिवचन आहे. यावर विश्वास ठेवा. त्याप्रमाणें वागा.

अभिवचन क्र 4: “रानातील फुले पाहा, ती कशी वाढतांत? ती कष्ट करत नाहींत व सूत कातत नाहींत; तरी मी तुम्हांला सांगतो, शलमोनदेखील आपल्या सर्व वैभवात त्यांतल्या एकासारखाही सजला नव्हता. जे रानातले गवत आज आहे व उद्या भट्टीत पडते त्याला जर देव असा पोशाख घालतो, तर, अहो तुम्हीं अल्पविश्वासी, तो विशेषेकरून तुम्हांला पोशाख घालणार नाहीं काय?” (मत्तय 6:28-30)

देवाच्या दृष्टित तुमचे मूल्य हे रानातील फुलांपेक्षा अधिक आहे, कारण तुम्हीं सर्वकाळ जिवंत राहाल, आणि अशा प्रकारे त्याची प्रिय मुले म्हणून सर्वकाळ त्याची उपासना करू शकाल.

तरीसुद्धा, देवाकडें व्यवस्थापणाची उर्जा आणि खबरदारीचा असा भरभरून वाहणारा पुरवठा आहे, जो तो फक्त मोजके दिवस टिकणाऱ्या फुलांवर ओततो. म्हणून, तो नक्कीच तीच ऊर्जा आणि व्यवस्थापणाचे तेच कौशल्य यांचा उपयोग आपल्या त्या लेकरांची काळजी घेण्यासाठीं करावयांस समर्थ आहे जे सर्वकाळ जिवंत राहतील. आता प्रश्न हा आहे : आपण या अभिवचनावर विश्वास ठेऊन स्वतःला चिंतामुक्त करणार आहों का?

11 सितम्बर : परमेश्वर के प्रावधान की कहानियाँ

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11 सितम्बर : परमेश्वर के प्रावधान की कहानियाँ
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“यद्यपि तुम लोगों ने मेरे लिए बुराई का विचार किया था; परन्तु परमेश्‍वर ने उसी बात में भलाई का विचार किया, जिससे वह ऐसा करे, जैसा आज के दिन प्रगट है, कि बहुत से लोगों के प्राण बचे हैं।” उत्पत्ति 50:20

जो बच्चे अपने दादाओं से प्यार करते हैं, वे अक्सर उनकी कहानियाँ भी पसन्द करते हैं। यूसुफ के दादा इसहाक ने निश्चित रूप से उसके साथ बैठकर उसे परमेश्वर के प्रावधान की अनेक कहानियाँ सुनाई होंगी, ताकि वह अपने पोते के जीवन में सत्य बोले। आप और मैं केवल कल्पना कर सकते हैं कि यूसुफ ने इसहाक की कहानियों और शिक्षाओं को कितना संजोया होगा। लेकिन ऐसा प्रतीत होता है कि बीते समय में उनके परिवार को परमेश्वर की जो भलाई मिली, उसने यूसुफ को उनके सबसे दुखद क्षणों में भी स्थिर बनाए रखा, क्योंकि इस व्यक्ति की एक महत्त्वपूर्ण सच्चाई यह है कि वह हमेशा जानता था कि सारा नियन्त्रण परमेश्वर के हाथ में है। निश्चय ही यूसुफ यह कहना सीख रहा था, जैसा कि बाद में भजनकार ने गाया, “यदि मुझे विश्वास न होता कि जीवितों की पृथ्वी पर यहोवा की भलाई को देखूँगा, तो मैं मूर्छित हो जाता!” (भजन 27:13)।

वास्तव में, यूसुफ को परमेश्वर के प्रावधान का अनुभव प्राप्त करने के लिए एक के बाद एक अवसर मिले। 17 साल के किशोर के रूप में उसने देखा कि उसके भाइयों की घृणा के बीच भी परमेश्वर काम कर रहा था। रूबेन का यह सुझाव कि उन्हें यूसुफ को गड्ढे में डाल देना चाहिए, अन्ततः उसकी जान बचाने में मददगार साबित हुआ, लेकिन यह परमेश्वर का हस्तक्षेप था जिसने रूबेन को यह विचार दिया और यूसुफ के भाइयों को उसकी योजना के अनुसार करने के लिए प्रेरित किया।

कुछ समय बाद, एक इश्माएली कारवाँ ठीक समय पर वहाँ पहुँचा, जैसे कि कोई दिव्य नियुक्ति हो (जो कि थी भी!) वे अपने सामान्य तरीके से व्यापार कर रहे थे; वे यूसुफ को देखकर कह सकते थे, नहीं, हमें इसकी आवश्यकता नहीं है। फिर भी, परमेश्वर के प्रावधान ने यह निश्चित किया कि वे यूसुफ को खरीदें।

हर मामले में, परमेश्वर ने दूसरों के स्वार्थी हितों और इच्छाओं को यूसुफ की जान बचाने के लिए उपकरण के रूप में उपयोग किया, और अन्ततः कई अन्य लोगों की जानें बचाईं।

उत्पत्ति 50:20 का सत्य यूसुफ के जीवन का आधार है: हालाँकि उसके भाइयों ने बुराई की योजना बनाई, परन्तु परमेश्वर भलाई की योजना बना रहा था—और परमेश्वर का इरादा हमेशा विजयी होता है। यूसुफ का पार्थिव पिता चाहे पीछे कनान में छूट गया था, लेकिन उसका स्वर्गिक पिता उसके साथ मिस्र जा रहा था। चाहे उसका रास्ता उसके भाइयों की ईर्ष्या, पोतीपर की पत्नी की वासना, पोतीपर का क्रोध और पिलानेहार के स्वार्थ द्वारा बार-बार मोड़ा गया था, लेकिन सर्वोच्च रूप से यह उसके परमेश्वर द्वारा निर्देशित था, ताकि वह अपनी प्रजा का भला कर सके।

क्या यूसुफ के अनुसार हम भी परमेश्वर के बारे में इस सत्य को संजोते हैं? परमेश्वर अपने उद्देश्यों को पूरा करेगा, भले ही हमें यह न पता हो कि हम कहाँ जा रहे हैं या वह क्या कर रहा है। हर परिस्थिति में यही हमारी आशा है। जब परीक्षाएँ आती हैं, तब हमें उन्हें नकारना नहीं चाहिए, क्योंकि हम जानते हैं कि वे एक दयालु पिता के हाथ से आती हैं और वे किसी न किसी तरह से उसकी योजनाओं को पूरा करती हैं, ताकि वह अपनी प्रजा को बचा सके और उन्हें स्थिर बनाए रख सके। हम परमेश्वर की भलाई को अपने आध्यात्मिक परिवार के जीवन में देख सकते हैं, जो बीते समय में पवित्रशास्त्र और कलीसिया के इतिहास में देखने को मिलती है। आप यह निश्चित रूप से जान सकते हैं कि आपके सभी दिनों और सन्देहों, आपके सभी डर और असफलताओं, आपके सभी टूटे रिश्तों और अधूरे सपनों में, आप अपने स्वर्गिक पिता की देखभाल में बने रहते हैं।

उत्पत्ति 49:28 – 50:21

पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: न्यायियों 11–12; यूहन्ना 4:31-54 ◊

11 September : चिंता न करण्याची 7 कारणें, भाग 1

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11 September : चिंता न करण्याची 7 कारणें, भाग 1
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“ह्यास्तव मी तुम्हांला सांगतो कीं, आपल्या जिवाविषयी, म्हणजें आपण काय खावे व काय प्यावे; आणि आपल्या शरीराविषयी, म्हणजें आपण काय पांघरावे, ह्याची चिंता करत बसू नका. अन्नापेक्षा जीव आणि वस्त्रापेक्षा शरीर अधिक आहे कीं नाहीं? आकाशातील पाखरांकडें निरखून पाहा; ती पेरणी करत नाहींत, कापणी करत नाहींत कीं कोठारात साठवत नाहींत; तरी तुमचा स्वर्गीय पिता त्यांना खायला देतो; तुम्हीं त्यांच्यापेक्षा श्रेष्ठ आहात कीं नाहीं?” (मत्तय 6:25-26)

आपण येशूच्या डोंगरावरील प्रवचनाच्या या भागावर तीन दिवस मनन करणार आहों. मत्तय 6:25-34 मध्यें येशू विशेषतः अन्न आणि वस्त्रांविषयी आम्हांला असलेल्या चिंतेचा विषय हाताळत आहे. पण, खरे पाहता, हा विषय सर्व प्रकारच्या चिंतेंशी संबंधित आहे.

अमेरिकेतही, जरी तिथें व्यापक प्रमाणांत कल्याणकारी योजना राबविल्या जात असल्यां, तरी, अन्न वस्त्र व निवारा यांशी संबंधित मूलभूत गरजांसाठीं तीव्र चिंता असू शकतांत. त्यां ख्रिस्ती बांधवांचा तर विचारच नको जे अशा परिस्थितीत राहतांत जिथे अति दारिद्रयामुळें जीवन जगणें कठीण आहे. परंतु येशू 30 व्या वचनात म्हणतो कीं आपली चिंता खरे पाहता पित्यानें आपल्याला जी भावी कृपा पुरविण्याचे अभिवचन दिलें त्यावर असलेल्या आमच्या अल्प विश्वासामुळें उद्भवते : “अहो तुम्हीं अल्पविश्वासी.”

या वचनांत (25-34) किमान सात अशी अभिवचनें आहेत जीं येशूनें आम्हांला अविश्वासाविरुद्ध सुयुद्ध लढण्यास आणि चिंतामुक्त राहण्यास मदत करण्याच्या उद्देशाने योजिलेली आहेत. (आज आपण त्यांपैकीं पहिल्यां आणि दुसऱ्या अभिवचनाकडें पाहूं – आणि उर्वरित अभिवचनें येत्यां दोन दिवसांत.)

अभिवचन # 1: “ह्यास्तव मी तुम्हांला सांगतो कीं, आपल्या जिवाविषयी, म्हणजें आपण काय खावे व काय प्यावे; आणि आपल्या शरीराविषयी, म्हणजें आपण काय पांघरावे, ह्याची चिंता करत बसू नका. अन्नापेक्षा जीव आणि वस्त्रापेक्षा शरीर अधिक आहे कीं नाहीं?” (मत्तय 6:25)

ज्याअर्थी तुमचे शरीर आणि तुमचा जीव हे अन्न आणि वस्त्र यांचा पुरवठा करण्यापेक्षाही अति गुंतागुंतीनें बनविलेले आहे आणि गरज भागविण्याच्या दृष्टिने कठीण आहेंत आणि तरीही देवानें खरे पाहता तुमचे शरीर आणि तुमचा जीव दोन्ही निर्माण केलें आहे आणि तुम्हांला दिलेंत, मग त्याअर्थी तो नक्कीच तुम्हांला अन्न आणि वस्त्र यांचा पुरवठा करण्यास समर्थ आणि तत्पर आहे.

शिवाय, काहींही झालें तरी, एक दिवस येईल जेव्हां देव तुमची शरीरें मेलेल्यांतून उठवेल आणि तुमचा जीव आणि तुमची शरीरें ही स्वतः बरोबर सर्वकाळच्या सहवासासाठीं राखून ठेवील.

अभिवचन # 2: “आकाशातील पाखरांकडें निरखून पाहा; ती पेरणी करत नाहींत, कापणी करत नाहींत कीं कोठारात साठवत नाहींत; तरी तुमचा स्वर्गीय पिता त्यांना खायला देतो; तुम्हीं त्यांच्यापेक्षा श्रेष्ठ आहात कीं नाहीं?” (मत्तय 6:26)

जर देव पाखरांसारख्या अति क्षुल्लक जिवांना जें आपलें अन्न मिळविण्यासाठीं काहींही करू शकत नाहींत- जसे तुम्हीं शेती करतां – खायला देतो आणि तसे करावयांस तो समर्थही आहे, तर तो नक्कीच तुम्हांला तुमच्या गरजेच्या सर्व वस्तु पुरवील, कारण तुम्हीं त्यांच्यापेक्षा श्रेष्ठ आहां. तुमच्यात देवावर विश्वास ठेवून व त्याच्या आज्ञा पाळत व त्याचे आभार मानून देवाचे गौरव करण्याची अद्भुत क्षमता आहे जी पाखरांमध्यें नाहीं.

10 सितम्बर : हमारा महान महायाजक

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10 सितम्बर : हमारा महान महायाजक
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“इसलिए जब हमारा ऐसा बड़ा महायाजक है, जो स्वर्गों से होकर गया है, अर्थात् परमेश्‍वर का पुत्र यीशु, तो आओ, हम अपने अंगीकार को दृढ़ता से थामे रहें . . . इसलिए आओ, हम अनुग्रह के सिंहासन के निकट हियाव बाँधकर चलें कि हम पर दया हो, और वह अनुग्रह पाएँ जो आवश्यकता के समय हमारी सहायता करे।” इब्रानियों 4:14-16

पुराना नियम बार-बार यह बताता है कि इस्राइल के महायाजकों पर कितनी बड़ी जिम्मेदारी होती थी (उदाहरण के लिए, निर्गमन 29 और लैव्य. 16 देखें)। महायाजक के पद को हल्के में नहीं लिया जा सकता था। केवल वही परम पवित्र स्थान में प्रवेश कर सकता था, जो यहूदी मन्दिर का भीतरी कक्ष था। केवल वही “लोगों की भूल-चूक के लिए” रक्त बलि अर्पित कर सकता था (इब्रानियों 9:7)। हालाँकि वह स्वयं निष्पाप नहीं होता था, फिर भी वह अपने समुदाय के लिए परमेश्वर के सामने एक अभिभावक के रूप में कार्य करता था।

लेकिन जैसा कि इब्रानियों का लेखक हमें बताता है, एक महान महायाजक हुआ है—अर्थात यीशु—जिसने वह किया जो कोई अन्य याजक नहीं कर सका और जिसने उस जिम्मेदारी को उठाया जिसका भार कोई अन्य मनुष्य नहीं उठा सका।

यीशु ने यरूशलेम के मन्दिर में पर्दे के पीछे परम पवित्र स्थान में प्रवेश नहीं किया। इसके बजाय, परमेश्वर के पुत्र के रूप में वह स्वर्गों में से होकर गया, ताकि वह अब हमारे लिए पिता के सिंहासन के सामने प्रकट हो सके। हमें पृथ्वी पर उसकी शारीरिक अनुपस्थिति का शोक नहीं करना चाहिए, केवल इसलिए नहीं कि वह पवित्र आत्मा के माध्यम से हमारे साथ है, बल्कि इस कारण से भी कि उसकी शारीरिक अनुपस्थिति का अर्थ है कि वह अब भी हमारे लिए परमेश्वर पिता से सीधे बात कर रहा है (इब्रानियों 7:25)।

इसीलिए नए नियम में सेवाकार्य को उन याजकों के लिए अलग नहीं किया गया है, जो रक्त बलियाँ अर्पित करते हैं। जिन्हें परमेश्वर ने बुलाया है और जिन्हें अपने लोगों का मार्गदर्शन करने और शिक्षा देने की जिम्मेदारी दी है, उन्हें परमेश्वर के सामने अपने लोगों के लिए वैसे याजकों की तरह मध्यस्थी करने की आवश्यकता नहीं है, जैसे पुराने नियम के याजकों को थी। क्योंकि हमारे महान महायाजक ने पापों के लिए एक महान बलि अर्पित कर दी है, इसलिए अब किसी और मध्यस्थ की आवश्यकता नहीं है। वास्तव में, उसका याजक पद न तो स्वर्ग में और न ही पृथ्वी पर पाप के लिए किसी और बलि की आवश्यकता छोड़ता है। केवल वही हमारे लिए मर सकता था और हमारे लिए बोल सकता था, और केवल वही ऐसा कर चुका है।

मसीह के याजक पद की महानता इस तथ्य में निहित है कि उसने हमारे पापों के लिए एक बार और हमेशा के लिए स्वयं को बलि चढ़ा दिया। हमें और कुछ नहीं चाहिए, सिवाय इसके कि हम यह पहचानें कि “यह युगानुयुग रहता है, इस कारण उसका याजक पद अटल है” (इब्रानियों 7:24)। केवल यीशु ही हममें से उन लोगों को बचा सकता है, जो अपनी नहीं बल्कि उसकी योग्यताओं के आधार पर परमेश्वर के पास आते हैं। वह अपने लोगों के लिए मध्यस्थी करने के लिए हमेशा जीवित है। वह अभी, इस समय, आपके लिए यही कर रहा है। इसलिए आप आत्मविश्वास के साथ यह जानकर जी सकते हैं कि जब भी आप प्रार्थना करते हैं, आपको स्वर्ग के सिंहासन कक्ष में पहुँच प्राप्त होती है—और आपकी मृत्यु के बाद आपकी आत्मा को भी वहाँ प्रवेश मिलेगा। आज आपको बस इतना करना है कि आप अपने महान महायाजक में अपने विश्वास के अंगीकार को बनाए रखें, जिसने सारा आवश्यक कार्य पूरा कर दिया है।

इब्रानियों 7:23-28

◊ पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: न्यायियों 9–10; यूहन्ना 4:1-30

10 September : चिंतेशी सुयुद्ध कसे करावे

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10 September : चिंतेशी सुयुद्ध कसे करावे
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त्याच्यावर तुम्हीं ‘आपली’ सर्व ‘चिंता टाका’ कारण तो तुमची काळजी घेतो. (1 पेत्र 5:7)

स्तोत्र 56:3 म्हणते, “मला भीती वाटेल तेव्हा मी तुझ्यावर भरवसा टाकींन.”

लक्ष द्या: हे वचन “मला कधीही भीती वाटणार नाहीं” असे म्हणत नाहीं. भीती हल्ला करते आणि मग एक संघर्ष सुरू होतो. त्यामुळें खऱ्या विश्वासणाऱ्यांना कोणतीही चिंता नसते असे बायबल गृहीत धरत नाहीं. तर, जेव्हा चिंता प्रहार करतांत तेव्हा त्यांशी कसे सुयुद्ध करावे ते बायबल आपल्याला सांगते.

जसे कीं 1 पेत्र 5:7 म्हणते, “त्याच्यावर तुम्हीं ‘आपली’ सर्व ‘चिंता टाका’ कारण तो तुमची काळजी घेतो.” हे वचन असे म्हणत नाहीं कीं तुम्हांला कधीही चिंता वाटणार नाहीं. ते म्हणते, जेव्हा तुम्हांला चिंता वाटतील तेव्हा तुम्हीं त्यां सर्व देवावर टाका. तुम्हीं गाडी चालवत असतांना जर अचानक चिखल तुमच्या कारच्या समोरील काचेवर (विंडशील्डवर) उडून येतो आणि लगेच समोरचे दृश्य तात्पुरते अस्पष्ट होऊन जाते, आणि तुम्हीं चिंतेने हडबडू लागता, तेव्हा तुम्हीं त्वरित तुमचे वायपर चालू करता आणि कारचे विंडशील्ड वॉशर देखील सुरु करता, व चिखलाने माखलेली काच स्वच्छ करता.

म्हणून एखादी व्यक्ती जिला दररोज चिंतेच्या भावनांशी संघर्ष करावा लागतो तिला माझे उत्तर हेच आहे: चिंता ह्या सामान्य आहेत. कमीतकमी माझ्याबाबतींत तरी ते खरे आहे, विशेषकरून माझ्या किशोरवयीन काळापासूनच प्रश्न     आहे: आपण त्यांच्याशी कसे सुयुद्ध करतो?

या प्रश्नाचे उत्तर आहे : आपण अविश्वासाविरुद्ध लढा देत व भावी काळातील कृपेवर विश्वासाची धाव धावीत आपल्या चिंतेंशी सुयुद्ध करतो. आणि ज्या प्रकारे तुम्हीं हे “विश्वासासंबंधीचे सुयुद्ध” लढता (1 तीमथ्य 6:12; 2 तीमथ्य 4:7) ते म्हणजें भविष्यातील कृपेच्या देवाच्या अभिवचनांवर मनन करित व त्याच्या आत्म्याच्या सहाय्यासाठीं प्रार्थना करित.

विंडशील्ड वाइपर ही देवाची वचने आहेत जी अविश्वासाचा चिखल स्वच्छ करतांत आणि विंडशील्डवर आपण जे पाण्याचे फव्वारे मारतो ते पवित्र आत्म्याचे साहाय्य आहे. आपण पापापासून – त्यांत चिंतेचे देखील पाप आहे – मुक्तीचे सुयुद्ध “आत्म्याच्या द्वारे व सत्यावरच्या विश्वासात” लढतो (2 थेस्सलनीकाकर 2:13).

आत्म्याचे कार्य आणि सत्याचे वचन. ही दोन्ही मिळून मोठा विश्वास निर्माण करतांत. चिखल मऊ करणाऱ्या पवित्र आत्म्याच्या कार्याशिवाय, वचनाचे वाइपर केवळ विंडशील्डवरील अविश्वासाच्या आंधळ्या गुच्छांवर खरवडतांत.

दोन्ही आवश्यक आहेत : आत्मा व वचन. आपण देवाची वचने वाचतो आणि त्याच्या आत्म्याच्या सहाय्यासाठीं प्रार्थना करतो. आणि जसजसे विंडशील्ड स्वच्छ होत जाते, जेणेंकरून देवानें आपल्यासाठीं जे कल्याणाची योजना आखली आहे ती आपण पाहू शकू (यिर्मया 29:11), तसतसा आपला विश्वास बळकट होत जातो आणि चिंता ह्या नाहींश्या होऊं लागतांत.

9 सितम्बर : विनम्र सेवक

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9 सितम्बर : विनम्र सेवक
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“तुम मुझे गुरु और प्रभु कहते हो, और ठीक ही कहते हो, क्योंकि मैं वही हूँ। यदि मैं ने प्रभु और गुरु होकर तुम्हारे पाँव धोए, तो तुम्हें भी एक दूसरे के पाँव धोना चाहिए।यूहन्ना 13:13-14

एण्ड्रू मार्टिनेज गोल्फ के इतिहास के सबसे महान सहायकों में से एक थे, जो जॉनी मिलर, जॉन कुक और टॉम लेहमन जैसे महान खिलाड़ियों के साथ सहायक रहे। वह स्वयं भी एक प्रतिभाशाली खिलाड़ी थे। एक बात जो उन्हें गोल्फ खिलाड़ी का एक असाधारण सहायक बनाती थी, वह था उनका अपने बॉस के प्रति समर्पण, जो तब तुरन्त आरम्भ हो जाता जब वह प्रतीक्षा कक्ष में कदम रखते और सफेद वस्त्र पहनते। अपनी भूमिका में वह स्वयं को खो देते थे। वह अभी भी मार्टिनेज थे, लेकिन उनके पीछे का नाम अलग था; वह केवल किसी और की सेवा करने के लिए अस्तित्व में थे, भले ही उनके पास अपनी स्वयं की प्रतिभा और क्षमताएँ थीं।

यीशु ने अपनी मृत्यु से पहले की उस यादगार रात को अपने शिष्यों के पाँव धोए। इसका एक कारण यह था ताकि वह विनम्र सेवा का आदर्श प्रस्तुत कर सके, क्योंकि पाँव धोने का कार्य दास का था, न कि राजा का। हम सभी उसके आदर्श का अनुसरण करके लाभ उठा सकते हैं: सृष्टिकर्ता ने अपनी सृष्टि के पाँव धोए और ऐसा करते हुए उसने न केवल अपने झगड़ते शिष्यों की सेवा की बल्कि अपने विश्वासघाती शिष्य, यहूदा की भी सेवा की। यह विशिष्ट कार्य सामान्य अतिथि-सत्कार की इस परम्परा से कहीं अधिक था।

यीशु के कार्य हमारे लिए आदर्श थे (“तुम्हें भी एक दूसरे के पाँव धोना चाहिए”), लेकिन वे केवल आदर्श ही नहीं थे—और यदि हम इस घटना में केवल यीशु के विनम्र व्यवहार की नकल करने के बुलावे पर ध्यान केन्द्रित करते हैं, तो हम नैतिकतावाद के शिकार हो सकते हैं और मसीह के पूरे एवं महिमामयी उद्देश्य को खो सकते हैं। जब यीशु अपने शिष्यों के पाँव धो रहा था, तब भी वह यह जानता था कि भविष्य में क्या होने वाला था। वह पूरी तरह से जानता था कि एक बड़ी दुखभरी घड़ी—क्रूस पर उसकी मृत्यु—निकट थी। उसका कार्य यह दर्शाता है कि भविष्य हमेशा पिता के प्रेमपूर्ण हाथों में होता है। अपने शिष्यों के पाँव धोने से उसका उद्देश्य उनके पापों के धोने का प्रतीक प्रस्तुत करना था—और यह धुलाई उसके कटोरे के पानी से नहीं, बल्कि क्रूस पर बहने वाले उसके लहू से आने वाली थी। परमेश्वर का पुत्र अपनी विनम्रता में हमारे पापों के दाग से हमें शुद्ध करने का प्रस्ताव देता है, और उसकी विनम्रता को हमें अपनी विनम्रता से स्वीकार करना चाहिए और अपनी आवश्यकता को स्वीकार करते हुए उसे कहना चाहिए कि वह हमें भी धो दे।

जब हम यह समझ जाएँगे कि हमारे उद्धारकर्ता ने किस प्रकार हमारी सेवा की है, केवल तभी हम उसी प्रकार दूसरों की सेवा कर पाएँगे। पतरस, जो उस समय यह नहीं समझ पा रहा था कि यीशु क्या कर रहा है (यूहन्ना 13:6-8), एक दिन अपने प्रभु के सन्देश को समझने पर था। सालों बाद, वह अपने सह-विश्वासियों को यह कहकर प्रेरित करने वाला था, “परमेश्‍वर के बलवन्त हाथ के नीचे दीनता से रहो, जिससे वह तुम्हें उचित समय पर बढ़ाए” (1 पतरस 5:6)। उसे पता था कि मसीह का आदर्श केवल हमारा व्यवहार सुधारने के लिए नहीं था; बल्कि यह हमें विनम्र करने के लिए था और फिर हमें हमारी क्षमा का आश्वासन देने के लिए था।

आज किस प्रकार आपको दूसरों के पाँव धोने के लिए बुलाया गया हैं? आप अपने समय या आराम को किस प्रकार बलिदान कर सकते हैं ताकि आप उन लोगों की सेवा कर सकें जो आपके आस-पास हैं, और यह सेवा केवल विनम्र प्रेम से प्रेरित हो? और सबसे महत्त्वपूर्ण बात यह है कि आप दूसरों की सेवा किस प्रकार कर सकते हैं जो उन्हें सबसे बड़ी सेवा के कार्य की ओर ले जाए—अर्थात उस शुद्धता की ओर जो क्रूस पर बहा हुआ मसीह का लहू प्रदान करता है?

यूहन्ना 13:1-17

पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: न्यायियों 7– 8; यूहन्ना 3:16-36 ◊

9 September : कृपा ही विनामूल्य असावी हे आवश्यक आहे

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9 September : कृपा ही विनामूल्य असावी हे आवश्यक आहे
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तुला निराळेपण कोणी दिलें? आणि जे तुला दिलेंले नाहीं असे तुझ्याजवळ काय आहे? तुला दिलेंले असता, दिलेंले नाहीं असा अभिमान तू का बाळगतोस? (1 करिंथ 4:7)

तुम्हीं ज्या घरांत राहता त्या घराप्रमाणें तारणाचे चित्रण उभारा.

ते तुमचे संरक्षण करते. त्यात तुम्हीं आपल्या खाण्या-पिण्याच्या वस्तूंचा साठा ठेवता ज्यामुळें त्यां वस्तू टिकून राहतांत. ते कधीही कुजत नाहीं किंवा त्याचा चुराडाही होत नाहीं. त्याच्या खिडक्या अशा दिशेनें उघडतांत जिथून तुम्हांला अशा वैभवाचा कळस दिसून येतो जो पाहून तुम्हांला सार्वकालिक संतुष्टी मिळते.

देवानें ते खुद्द स्वतःचे आणि त्याचा प्रिय पुत्र याचे प्रचंड मोल देऊन ते बांधले आणि त्यानें ते तुम्हांला विनामूल्य आणि लखलखीत अशा अवस्थेत दिलें.

या घराच्या “खरेदी” कराराला “नवा करार” म्हणतांत. त्यां कराराच्या अटींमध्यें असे लिहिले आहे: “जर तुम्हीं हे घर भेटवस्तू स्वरूपात स्वीकार करतां आणि पिता व पुत्र जे या घरात तुमच्याबरोबर वस्ती करतील त्यांच्याठायीं आनंद करतां तर हे घर तुमचे होईल आणि सर्वकाळासाठीं तुमचेच राहील. तुम्हीं इतर देवतांना आश्रय देऊन देवाच्या घराला अपवित्र करणार नाहीं किंवा इतर वस्तूंकडें आपलें मन वळवणार नाहीं, तर या घरात देवाच्या सहवासात आपलें सर्व समाधान शोधणार.”

या कराराला हो म्हणणें, पण नंतर मात्र त्या घराचे मासिक हप्ते भरण्यासाठीं या आशेने बँकेतून कर्ज घेणें कीं तुम्हीं या घरासाठीं किंमत मोजाल, हे मूर्खपणाचे ठरणार नाहीं का?

तुम्हीं त्यां घराला भेटवस्तू म्हणून मिळालेले नाहीं तर खरेदी करून मिळविलेले घर म्हणून मानाल. देव यापुढे विनामूल्य उपकार करणारा राहणार नाहीं. आणि तुम्हीं स्वतःला अशा विचित्र मागण्यांचे गुलाम बनवून घ्याल ज्यां त्यानें तुमच्यावर टाकण्याचे स्वप्नही पाहिले नव्हते.

जर कृपा ही विनामूल्य व्हावयाची असेल – जो कृपेचा खरा अर्थ आहे – तर आपल्याला त्या कृपेची परतफेड करावी लागेल अशी वागणूक आपण तिला देऊ शकत नाहीं.

8 सितम्बर : सदा आनन्दित रहो

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8 सितम्बर : सदा आनन्दित रहो
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“प्रभु में सदा आनन्दित रहो; मैं फिर कहता हूँ, आनन्दित रहो।” फिलिप्पियों 4:4

हम सदा आनन्दित कैसे रह सकते हैं? क्या यह सम्भव है? या क्या हमें पौलुस के “प्रभु में सदा आनन्दित रहो” की चेतावनी को एक प्रकार के अतिशयोक्ति के रूप में समझना चाहिए, जिसे पौलुस ने कभी हमें हमारे मसीही जीवन में वास्तविक अनुभव करने का इरादा नहीं किया था? नहीं, हमें ऐसा नहीं करना चाहिए! पौलुस ने जो कहा, पूरी गम्भीरता से कहा। विश्वासियों के रूप में, हमें वास्तव में सदा आनन्दित रहना है।

इस अपील को लेकर हमें जिस कठिनाई का सामना करना पड़ता है, उसका एक कारण यह है कि हम आनन्द को उसी गलत तरीके से सोचते हैं जैसे हम प्रेम को सोचते हैं— अर्थात्, यह कि हम इसे अपनी इच्छा के दास के बजाय अपनी भावनाओं का उत्पाद मानते हैं। जब इसे इस तरह देखा जाता है, तो आनन्द हमारी परिस्थितियों और भावनाओं का उत्पाद बन जाता है; और उस दृष्टिकोण से हम केवल तभी आनन्दित हो सकते हैं, जब हम अच्छा महसूस कर रहे हों, जब सूरज चमक रहा हो, और जब सब कुछ हमारे तरीके से हो रहा हो।

लेकिन बाइबल जब हमें सदा आनन्दित रहने के लिए कहती है, तो वह पूरी गम्भीरता से ऐसा कहती है, यहाँ तक कि तब भी जब जीवन वैसा नहीं होता जैसा हम चाहते हैं, जब बादल घिर आते हैं, और जब हम उदास हो जाते हैं। इसलिए हमें आनन्द को समझने का प्रयास करना चाहिए।

हबक्कूक 3 में हम पढ़ते हैं कि भविष्यद्वक्ता आने वाली मुसीबत के दिन के बारे में सुनकर काँप उठा (3:16)। भावनाओं के सन्दर्भ में सब कुछ हबक्कूक को घबराहट की ओर ले जा रहा था। लेकिन उसने चिन्ता का शिकार होने के बजाय अपनी भावनाओं को अपने प्रदाता के बारे में जो वह जानता था, उसके अधीन कर दिया। सही सोच की शक्ति से हबक्कूक ने निष्कर्ष निकाला, “चाहे अंजीर के वृक्षों में फूल न लगें, और न दाखलताओं में फल लगें, जलपाई के वृक्ष से केवल धोखा पाया जाए और खेतों में अन्न न उपजे, भेड़शालाओं में भेड़–बकरियाँ न रहें, और न थानों में गाय बैल हों, तौभी मैं यहोवा के कारण आनन्दित और मगन रहूँगा” (पद 17-18, अतिरिक्त बल दिया गया)। वह यह दिखाता है कि सदा आनन्दित रहना सम्भव है—यहाँ तक कि गहरे संघर्ष और दर्द के बीच भी—जब हमारा आनन्द बाहरी कारकों पर निर्भर न होकर केवल परमेश्वर पर निर्भर करता है।

परमेश्वर का यह उद्देश्य रहा है कि हमारी सोच को उसके प्रकट किए हुए सत्य के द्वारा मार्गदर्शन और आकार मिले—जो उसने अपने वचन और सृष्टि के माध्यम से स्वयं के बारे में प्रकट किया है। 16वीं सदी के वैज्ञानिक जोहानस केपलर के शब्दों में, हमें “परमेश्वर के विचारों को उसकी पद्धति के अनुसार ही सोचना” चाहिए। जैसे-जैसे हम सही ढंग से सोचना सीखते हैं, वैसे-वैसे हम अपनी भावनाओं को सही सोच के अनुसार लाने में सक्षम होंगे।

जब आपका आनन्द परमेश्वर के अपरिवर्तनीय चरित्र में निहित होता है, तब आपका आनन्द आपके स्वयं की और आपकी परिस्थितियों की कैद से मुक्त हो जाता है। हाँ, आपका आनन्द आपके दिन की कठिनाइयों और निराशाओं से चुनौती प्राप्त कर सकता है, लेकिन वह पलट नहीं जाएगा। आज जब भी आपके आनन्द को चुनौती मिले, इन शब्दों को अपने होंठों पर लाएँ:

जो मैं तेरे बारे में जानता हूँ, मेरे प्रभु और परमेश्वर,

वह मेरी आत्मा को शान्ति से और मेरे होंठों को गीतों भर देता है;

तू मेरी सेहत है, मेरा आनन्द है, मेरी लाठी है, मेरी छड़ी है;

मैं तेरे आसरे खड़ा होकर अपनी निर्बलता में मजबूत होता हूँ।[1]

  भजन 20

◊ पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: न्यायियों 4– 6; यूहन्ना 3:1-15


[1] होराटियस बोनार, “नॉट व्हाट आई ऐम, ओ लोर्ड, बट व्हाट दाओ आर्ट” (1861).

8 September : देवाची परतफेड कशी करावी

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8 September : देवाची परतफेड कशी करावी
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परमेश्वराने माझ्यावर केलेंल्यां सर्व उपकाराची मी कशी परतफेड करू? मी तारणाचा प्याला उंचावून परमेश्वराच्या नावाने हाक मारीन. त्याच्या सर्व लोकांसमोर, मी परमेश्वरास केलेंले नवस पूर्ण करीन. (स्तोत्र 116:12-14)

“परमेश्वराने माझ्यावर केलेंल्या सर्व उपकाराची मी कशी परतफेड करू” ही भाषा मला अस्वस्थ करते. “उपकाराची परतफेड” हे शब्द इतक्या सहजपणें असे सूचित करत असल्यासारखे जाणवतांत कीं कृपा जणू अशी आहे जिला देव आपल्याकडें गहाण ठेवतो. ती खरोखर औदार्यपूर्ण तर आहे, परंतु तुम्हांला तिची परतफेड करावी लागेल.

पौलाने प्रेषितांची कृत्ये 17:25 मध्यें असे म्हटले आहे, कीं “माणसांच्या हातून त्याची सेवा घडावी असेही नाहीं; कारण जीवन, प्राण व सर्वकाहीं तो स्वतः सर्वांना देतो.” दुसऱ्या शब्दांत सांगायचे झालें तर, तुम्हीं देवाला असे काहींही देऊ शकत नाहीं किंवा देवासाठीं असे काहींही करू शकत नाहीं जे त्यानें तुम्हांला आधीच दिलें नाहीं आणि जे त्यानें तुमच्यासाठीं आधीच केलें नाहीं.

1 करिंथ 15:10 मध्यें तुम्हीं हीच गोष्ट पुन्हा पाहूं शकतां, “तरी जो काहीं मी आहे तो देवाच्या कृपेने आहे आणि माझ्यावर त्याची जी कृपा झाली आहे ती व्यर्थ झाली नाहीं; परंतु ह्या सर्वांपेक्षा मी अतिशय श्रम केलें, ते मी केलें असे नाहीं, तर माझ्याबरोबर असणार्‍या देवाच्या कृपेने केलें.” तर मग आपलें कोणतेही काम देवाची परतफेड कधीही करू शकत नाहीं, कारण ते काम देखील देवाचे एक कृपादानच आहे. आपण देवासाठीं करत असलेले प्रत्येक काम आपल्यावर त्याच्या कृपेचे ऋण अधिकच वाढवत जाते.

ह्याप्रमाणें स्तोत्र 116 मध्यें नवस पूर्ण करण्याच्या कृतीला जी गोष्ट कर्जाची परतफेड केलीं जात आहे असा गैरसमज होण्याच्या धोक्यांपासून मुक्त ठेवते ती म्हणजें ही कीं “नवस पूर्ण करणें” ही खरे पाहता एक सामान्य परतफेड नाहीं, तर प्राप्त करून घेण्याची आणखी एक कृती आहे जी देवाच्या वर्तमान समयी होत असलेल्या कृपेला उंचाविते. नवस पूर्ण करणें हे आपल्या साधनसंपत्तीला उंचावत नाहीं.

“परमेश्वराने माझ्यावर केलेंल्या सर्व उपकाराची मी कशी परतफेड करू” या स्तोत्रकर्त्याने स्वतःला केलेंल्या प्रश्नाचे उत्तर “मी तारणाचा प्याला उंचावून परमेश्वराच्या नावाने हाक मारीन” हे आहे. दुसऱ्या शब्दांत सांगायचे तर, माझा तारणाचा प्याला भरून वाहावा अशी मी देवाकडें हाक मारतो. परमेश्वराची परतफेड करणें म्हणजें परमेश्वराकडून अधिक प्राप्त करत जाणें कीं जेणेंकरून परमेश्वराच्या अक्षय चांगुलपणाचे गौरव अधिकाधिक होईल.

तारणाचा प्याला उंचावून धरणें हे परमेश्वराचे संतुष्टीदायक तारण हातांत घेणें आणि त्यातुन पिणें आणि त्याची अधिक अभिलाषा धरणें होय. आपण हे पुढील वाक्यप्रयोगामुळें समजतो: “मी . . . परमेश्वराच्या नावाने हाक मारीन.” मी अधिक साहाय्यासाठीं धावा करीन. परमेश्वराने दया करून माझ्या हाकेकडें आपलें कान लाविलें त्या उपकाराची मी कशी परतफेड करू? उत्तरः मी पुन्हा त्याला हाक मारीन. मी देवाचे या गोष्टीसाठीं स्तवन करीन व त्याचा सम्मान करीन कीं त्याला माझ्याकडून कधीच कोणत्याही वस्तूची, कींबहुंना माझी देखील गरज पडत नाहीं, तर उलट जेव्हा मला त्याची गरज असते (जी माझी नित्य गरज आहे) तेव्हा तो सर्व वेळी माझे कल्याणच करत असतो.

मग स्तोत्रकर्ता आपलें तिसरे वक्तव्य बोलतो, “मी परमेश्वरास केलेंले नवस पूर्ण करीन.” पण तो आपलें केलेंले नवस पूर्ण कसे करील? ते नवस तो तारणाचा प्याला उंचावून व परमेश्वराच्या नावाने हाक मारून पूर्ण करील. म्हणजेंच, आपल्याला कायमस्वरूपी कृपेवर कृपा मिळत जाईल- सर्व भरून काढणारी अशी पुरेशी कृपा – या अभिवचनावरील विश्वासाने ते नवस पूर्ण केलें जातील.