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2 सितम्बर : मसीह के प्रति श्रद्धा

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2 सितम्बर : मसीह के प्रति श्रद्धा
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“. . . मसीह के भय से एक दूसरे के अधीन रहो।” इफिसियों 5:20-21

लोग कई कारणों से एक-दूसरे के अधीन होते हैं—राजनीति, सामाजिक संरचनाओं, या यहाँ तक कि व्यवहारिकता के आधार पर। कभी-कभी दूसरों के अधीन होना बहुत आसान (और निश्चित रूप से सुखद) होता है, बजाय इसके कि असभ्य या टकरावपूर्ण प्रतीत होने का जोखिम उठाया जाए।

तौभी ये कारण मसीही अधीनता के प्रेरक कारक नहीं हैं। इसके बजाय, हमारी परस्पर अधीनता की विशिष्ट विशेषता यह होनी चाहिए कि इसे “मसीह के प्रति श्रद्धा” के कारण किया जाए। यीशु के सामने घुटने टेकने से हमें आत्म-केन्द्रित होने से बचने में मदद मिलती है। मसीह के प्रति श्रद्धा न केवल हमें स्वयं से दूर खींचती है, बल्कि यह हमें यीशु की ओर आकर्षित भी करती है। उसी में हम अधीनता के आह्वान को समझना सीखते हैं, क्योंकि यीशु ने स्वयं सिखाया, “जो तुम में प्रधान होना चाहे, वह तुम्हारा दास बने . . . जैसे कि मनुष्य का पुत्र; वह इसलिए नहीं आया कि उसकी सेवा टहल की जाए, परन्तु इसलिए आया कि आप सेवा टहल करे, और बहुतों की छुड़ौती के लिए अपने प्राण दे” (मत्ती 20:26, 28)। उसने न केवल ये बातें कहीं, बल्कि उन्हें अपने जीवन में पूरा भी किया।

उदाहरण के लिए, यूहन्ना 13 में यीशु द्वारा चेलों के पाँव धोने की घटना पर विचार करें। यूहन्ना लिखता है: “यीशु ने, यह जानकर कि पिता ने सब कुछ मेरे हाथ में कर दिया है और मैं परमेश्‍वर के पास से आया हूँ और परमेश्‍वर के पास जाता हूँ, भोजन पर से उठकर अपने ऊपरी कपड़े उतार दिए, और अँगोछा लेकर अपनी कमर बाँधी। तब बरतन में पानी भरकर चेलों के पाँव धोने और जिस अँगोछे से उसकी कमर बँधी थी उसी से पोंछने लगा” (यूहन्ना 13:3-5)।

यहाँ क्या हो रहा था? यही कि परमेश्वर पुत्र परमेश्वर पिता के अधीन हो रहा था। जो परमेश्वर से आया था और स्वयं परमेश्वर था, उसने स्वयं को विनम्र बनाया और “दास का स्वरूप धारण किया” (फिलिप्पियों 2:7)।

यीशु अपनी इच्छा पूरी करने नहीं, बल्कि अपने पिता की इच्छा पूरी करने आया था (यूहन्ना 6:38)। परिणामस्वरूप, उसने कठिनाइयाँ स्वीकार कीं। उसे अलग-थलग किया गया और दुर्व्यवहार सहना पड़ा। उसने द्वेष, गलतफहमियों और मृत्यु तक को झेला। यीशु तोड़ा गया ताकि हमारे टूटे हुए जीवन को पुनः स्थापित और परिवर्तित किया जा सके। वह अपने पिता की इच्छा के अधीन होकर क्रूस पर मरने के लिए आया था, ताकि वह उन सभी के लिए छुटकारे का प्रबन्ध करे, जो विनम्र होकर झुकते हैं और स्वीकार करते हैं, “यही वह उद्धारकर्ता है, जिसकी मुझे आवश्यकता है।”

जब हम मसीह को वैसे देखते हैं जैसा वह वास्तव में है, तो हम उसे आदर और श्रद्धा देने के लिए बाध्य हो जाते हैं। त्रिएक परमेश्वर के दूसरे व्यक्ति के अतिरिक्त और कौन है जिसे हम अधिक सम्मान और प्रेम दे सकते हैं, जिसने अपने पिता की आज्ञा का पालन करते हुए और अपने लोगों की भलाई के लिए स्वयं को मृत्यु तक अधीन कर दिया? जब हम मसीह की श्रद्धा करते हैं, तो हम उसी मनोभाव को अपनाने के लिए तैयार होते हैं जो मसीह का था—एक ऐसा मनोभाव जो प्रभुता प्राप्त करने की लालसा नहीं करता, अधिकार के लिए संघर्ष नहीं करता, या अपने अधिकारों पर अड़ा नहीं रहता, बल्कि ऐसा मनोभाव जो परमेश्वर की आज्ञा का पालन करता है और अपने भाइयों-बहनों के हितों को अपनी इच्छाओं से ऊपर रखता है।

कई कारण हो सकते हैं जिनके कारण हम किसी के अधीन होने या न होने का चुनाव करते हैं। लेकिन आपके बारे में यह बात सत्य हो: कि आप मसीह की श्रद्धा के कारण अपनी कलीसिया में दूसरों के अधीन हों—जो अपने पिता के अधीन हुआ और ऐसा करते हुए आपका उद्धारकर्ता बन गया।

फिलिप्पियों 2:17-30

◊ पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: भजन 137–139; 2 कुरिन्थियों 11:16-33

2 September : उद्ध्वस्त आणि आनंदित

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2 September : उद्ध्वस्त आणि आनंदित
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“कारण तू आपला देव परमेश्वर ह्याची पवित्र प्रजा आहेस, तू त्याची खास प्रजा व्हावेस म्हणून सार्‍या पृथ्वीवरील राष्ट्रांतून तुझा देव परमेश्वर ह्याने तुला निवडून घेतले आहे.” (अनुवाद 7:6)

कृपेचे सिद्धांत – कीं आमचे तारण हे केवळ देवाच्या सार्वभौम कृपेनेच होते ह्या कॅल्विनवादी शिकवणीसाठीं पारंपारिकरित्या उपयोगांत आणलेली जुनी प्युरिटन संज्ञा (TULIP) – ह्या झाडातील प्रत्येक फांदी जर संत ऑगस्टीन यांच्या आनंदाशी समतुल्य  अशा आनंदाच्या भरात (ज्याला “ख्रिस्ती विश्वासाचा परमानंद म्हणतांत”) डोलत असेल तर या कृपेच्या सिद्धांतांची अनुभूती काय असेल बरे?

  • सार्वत्रिक नैतिक अध:पात (Total depravity) म्हणजें केवळ स्वभावात असलेला वाईटपणा नव्हे, तर देवाचे वैभव पाहण्यापासून आंधळेपण आणि परम आनंद याविषयी मृतावस्था.
  • अटविरहित निवड (Unconditional election)  म्हणजें ख्रिस्तांत असलेला आपला परम आनंद, म्हणजें त्रिएक देव स्वतःमध्यें घेतो तो काठोकाठ आनंद, आपण अस्तित्वात येण्यापूर्वीच आपल्यासाठीं नियोजित करण्यात आला होता.
  • (लोकसंख्येच्या दृष्टिने) मर्यादित प्रायश्चित्त (Limited atonement)  हे या गोष्टीची खात्री आहे कीं देवामध्यें असलेला अविनाशी आनंद नव्या कराराच्या रक्ताद्वारे देवाच्या लोकांसाठीं निर्णायकपणें साध्य करण्यांत आला आहे.
  • अप्रतिकारक कृपा (Irresistible grace)  ही देवाच्या प्रीतिची वचनबद्धता आणि सामर्थ्य आहे ज्याद्वारे आपल्याला ह्या जगातील आत्मघातकीं सुखांना बिलगून राहण्यापासून व अविनाशी असा जो आनंद त्याच्या प्राप्तीसाठीं आपल्याला सार्वभौम सामर्थ्याने बंधमुक्त केलें जाते.
  • पवित्रजनांच्या विश्वासाची चिकाटी (Perseverance of the saints)  हे सर्वसमर्थ देवाचे कार्य आहे जे आपल्याला अति निकृष्ट दर्जाच्या आनंदाच्या कायमस्वरूपी बंधनात पडू देत नाहीं, तर आपल्याला त्याच्या सान्निध्यात विपुल आनंदाचा वारसा मिळावा म्हणून व आपल्याला त्याच्या उजवीकडें असलेले सार्वकालिक सुख प्राप्त व्हावें म्हणून आपल्याला सर्व संकटे व दु:खें यांमध्यें राखून ठेवते.

या पाच मुद्द्यांपैकीं, अटविरहित निवड हा मुद्दा माझ्या जिवाच्या बाबतींत सर्वात कठोर आणि अति गोड असे दोन न्यायनिवाडे देतो. ही निवड अटविरहित आहे हे सत्य माझा सर्व गर्विष्ठपणा उद्ध्वस्त करते (कठोर बाजू); आणि हे कीं ही निवड  मला त्याचे अनमोल धन बनवते (अति गोड बाजू).

यां बायबलसम्मत कृपेच्या सिद्धांतांची एक वैभवी बाजू ही आहे : जे सिद्धांत आमचा  गर्विष्ठपणा उद्ध्वस्त करतांत, तेंच खरे पाहता आपल्याला परम आनंदासाठीं सज्ज करतांत.

जर ही निवड कोणत्याही प्रकारे आमच्यातील सद्गुणांवर अवलंबून असती तर यां वचनाच्या प्रकाशांत जिथें देव म्हणतो कीं “कारण तू आपला देव परमेश्वर ह्याची पवित्र प्रजा आहेस, तू त्याची खास प्रजा व्हावेस म्हणून सार्‍या पृथ्वीवरील राष्ट्रांतून तुझा देव परमेश्वर ह्याने तुला निवडून घेतले आहे” (अनुवाद 7:6), आपण स्वतःला कसे श्रेष्ठ समजू शकतो? परंतु आढ्यता बाळगण्यापासून आपल्याला सुरक्षित ठेवण्यासाठीं, परमेश्वर आपल्याला शिकवतो कीं आपली निवड ही पूर्णपणें अट-विरहित आहे (अनुवाद 7:7-9). “त्यानें एक दयनीय जिवाला आपलें धन असे केलें” असे जे आपण एक भजन गातो अगदी त्याप्रमाणें.

कृपेने झालेंल्या ह्या निवडीची अटविरहित बाजूच आहे — ज्या पाठोपाठ ह्या तारणदायी कृपेचा इतर सर्व अनुक्रम येतो — जी आपल्याला कोणतीही आढ्यता न बाळगू देता अशा दानांचा आनंद घ्यावयांस समर्थ बनविते.

1 सितम्बर : उदारता से भरपूर

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1 सितम्बर : उदारता से भरपूर
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“फिर मूसा ने इस्राएलियों की सारी मण्डली से कहा, ‘जिस बात की आज्ञा यहोवा ने दी है वह यह है। तुम्हारे पास से यहोवा के लिए भेंट ली जाए, अर्थात् जितने अपनी इच्छा से देना चाहें वे यहोवा की भेंट करके ये वस्तुएँ ले आएँ।’” निर्गमन 35:4-5

परमेश्वर के लोग उसके अनुग्रह के प्रत्युत्तर में आभार से भरकर दान देते हैं।

या कम से कम, हमें ऐसा अवश्य करना चाहिए। लेकिन अक्सर हमारे दान देने के कारण बहुत अलग होते हैं। कई लोग दान देने को एक ऐसा कार्य मानते हैं, जिसे करना उनके लिए अनिवार्य है या कर्तव्य है। ऐसा वे शायद उनकी सामाजिक स्थिति या दूसरों की धारणा के कारण करते हैं। कुछ लोग अपराध-बोध की भावना से दान देते हैं और अपने बुरे कर्मों का प्रायश्चित करने का प्रयास करते हैं। अन्य लोग भय से दान देते हैं, यह सोचकर कि “मेरे लिए दान देना ही अच्छा है, नहीं तो परमेश्वर मुझे आशीर्वाद नहीं देगा।”

लेकिन बाइबल में दिया गया दान देने का सिद्धान्त इससे बहुत अलग है।

जब इस्राएली मरुभूमि में परमेश्वर के लिए पवित्र निवास स्थान स्वरूप तम्बू बनाने की तैयारी कर रहे थे, तो मूसा ने इस कार्य के लिए सामग्री का संग्रह आरम्भ किया। उसकी अपील जबरदस्ती या छलपूर्वक नहीं थी; उसने बस लोगों से कहा कि परमेश्वर उन सभी से प्राप्त करने को तैयार हैं जो स्वेच्छा से देना चाहते हैं, और हर उदार व्यक्ति ने भेंट चढ़ाई। उन्होंने न केवल अपनी सम्पत्ति में से दिया, बल्कि अपने कौशल और योग्यताओं के आधार पर भी दिया, जो परमेश्वर ने उन्हें दिए थे—चाहे वह निर्माण कार्य हो, कपड़ा बुनाई हो, कारीगरी हो या कला हो।

बहुतों ने दिया, और उन्होंने अत्यधिक दिया। परिणामस्वरूप, मूसा को दूसरा निर्देश देना पड़ा और पूरी छावनी में सन्देश भेजना पड़ा: “क्या पुरुष, क्या स्त्री, कोई पवित्रस्थान के लिए और भेंट न लाए” (निर्गमन 36:6)। उन्हें यह एहसास था कि परमेश्वर ने ही उन्हें सब कुछ दिया था। परमेश्वर की भलाई की विशालता से प्रेरित होकर वे उदारता से भर उठे—यहाँ तक कि मूसा को उन्हें रोकने के लिए कहना पड़ा!

परमेश्वर को किसी भी चीज़ की आवश्यकता नहीं है, फिर भी वह उन लोगों से प्राप्त करने के लिए तैयार रहता है, जो उसके अनुग्रह से उसके अनेक आशीर्वादों के भागीदार हैं। परमेश्वर अपने अनुग्रह को प्रतिशत में नहीं देता; वह उसे प्रचुर मात्रा में उण्डेलता है—और अपने हृदय की इसी उदारता से उसने यीशु के माध्यम से अपने लोगों को एक के बाद एक आशीर्वाद दिया है। जब हम, जो उसके अनुग्रह के प्राप्तकर्ता हैं, अपने समय, धन, प्रतिभा या किसी भी अन्य चीज़ को प्रचुरता और कृतज्ञता से देते हैं, तो परमेश्वर की महिमा होती है।

परमेश्वर हमेशा उदार हृदयों की इच्छा रखता है। उसके पास अपने पुत्र के कार्य के माध्यम से लोगों को बचाने की योजना है, और वह ऐसे अनुयायियों की लालसा रखता है जो दान देने के द्वारा सुसमाचार के कार्य में शामिल होने के लिए तैयार हों। यह केवल अनुग्रह ही है जो किसी व्यक्ति को बलिदानी रूप से और प्रसन्नतापूर्वक देने के लिए प्रेरित करता है। यदि आपका देना—चाहे वह आपका समय हो, आपकी प्रतिभा हो या आपका धन—सीमित या अनिच्छा से हो रहा है, तो इस बात पर मनन करें कि परमेश्वर ने आपको कितना अधिक दिया है, विशेष रूप से प्रभु यीशु में। उसके अनुग्रह से प्रेरित हों, और आप कृतज्ञता से भर जाएँगे, जो उदारता में परिवर्तित होगी, तथा परमेश्वर की महिमा और स्तुति लाएगी।

यूहन्ना 12:1-8

पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: भजन 135–136; 2 कुरिन्थियों 11:1-15 ◊

1 September : त्याला योग्य दिसते ते सर्व तो करतो

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1 September : त्याला योग्य दिसते ते सर्व तो करतो
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आमचा देव स्वर्गात आहे; त्याला योग्य दिसते ते सर्व तो करतो. (स्तोत्र 115:3)

हे वचन शिकवते कीं देव ज्या ज्यावेळी एखादे कार्य करतो, तो ते त्याला योग्य दिसते त्याप्रमाणें करतो.

देवाला ज्या गोष्टीचा तिटकारा वाटतो ती करण्यास तो बंधनकारक नाहीं. त्याच्यावर असला प्रसंग कधीही येत नाहीं जिथे त्याला एखाद्या गोष्टीचा एकमात्र तोडगा काढण्यासाठीं असे काहींतरी करणें भाग पडते जे त्याला योग्य दिसत नाहीं.

त्याच्या इच्छेस येईल ते तो करतो. आणि म्हणूनच, एका अर्थाने, तो जे काहीं करतो त्यापासून  त्याला आनंद होतो.

हे असे ज्ञान आहे कीं आपण देवासमोर नतमस्तक होऊन त्याच्या सार्वभौम स्वातंत्र्याची स्तुती करण्यास प्रवृत्त झालों पाहिजे – म्हणजें असे कीं, त्याला जे योग्य व संतुष्टीदायक आहे त्यावर अंमलबजावणी करून तो नेहमी आपल्या स्वतंत्र इच्छेनुसार  स्वत: च्या “सत्संकल्पाप्रमाणें” सर्वकाहीं करतो.

देव कधीच कुठल्याही परिस्थितीला बळी पडत नाहीं. त्याच्यावर अशी परिस्थिती कधीही उद्भवत नाहीं जी त्याला असे काहींतरी करण्यांस आवरून धरते ज्यामध्यें तो आनंद करू शकत नाहीं. त्याचा उपहास व्हायचा नाहीं. गुप्तपणें फासा मांडून त्याला अडकविले जाऊ शकत नाहीं, किंवा त्याच्या इच्छे विरुद्ध काहीं करण्यांस त्याच्यावर दबाव टाकला जाऊ शकत नाहीं.

देवासाठीं एका अर्थाने सर्वात कठीण जर एखादी गोष्ट असेल जी त्यानें इतिहासात एका समयी केलीं तर ती म्हणजें, जेव्हां त्यानें “आपल्या स्वतःच्या पुत्रास राखून” ठेविले नाहीं (रोम 8:32). देव स्वतंत्र होता आणि त्याला जे योग्य दिसायचे ते सर्व तो करत असे. पौल म्हणतो कीं ख्रिस्तानें मरण सोसून जेव्हां स्वतःला अर्पण केलें, ते त्यानें “देवाला सुवास मिळावा म्हणून स्वत:ला आपल्याकरता अर्पण व यज्ञ म्हणून दिलें” होते (इफिस 5:2). जगात घडलेले हे महापाप, आणि हे महामरण, व सर्वात कठीण अशी देवाची ही कृती, हे सर्व गोपनीय दृष्ट्या पित्याला जे योग्य दिसते त्याप्रमाणेंच झालें.

आणि कॅल्वरीच्या कृसाकडें जात असतांना, साक्षांत देवदूतांचे सैन्य त्याची सेवा करीत होते. “कोणी [माझा जीव]  माझ्यापासून घेत नाहीं, तर मी होऊनच तो देतो” (योहान 10:18) — त्याला जे योग्य दिसले — आणि इब्री 12:2 म्हणते त्याप्रमाणें हे सर्व त्यानें “जो आनंद त्याच्यापुढे होता” त्यासाठीं केलें. विश्व-इतिहासाची ही वेळ जिथे असें दिसत होते कीं जणू येशूला फासा मांडून अडकविले गेलें, त्या सर्व घटनाक्रमावर पूर्णपणें त्याचेच आधिपत्य होते आणि त्याला जे योग्य दिसलें तेच तो करत होता – म्हणजें आम्हां अनीतिमानांना नीतिमान ठरविण्यात देवाच्या नीतिमत्वाचे गौरव व्हावें म्हणून त्यानें मरण पत्करले.

तर, आपण भय व आदर मानूं. आणि “आमचा देव स्वर्गात आहे; त्याला योग्य दिसते ते सर्व तो करतो” यावर देवाच्या सार्वभौमत्वाविषयी आपल्या स्तुतीचाच नाहीं तर आम्हांसाठीं ख्रिस्ताच्या मृत्यूद्वारे जे तारण साध्य करणांत आलें त्याचा पाया देखील यावरच बांधलेला आहे, हे जाणून आपण थरथर कापूं:

31 अगस्त : हम धर्मी कैसे ठहराए जाते हैं?

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31 अगस्त : हम धर्मी कैसे ठहराए जाते हैं?
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“परन्तु जो जो बातें मेरे लाभ की थीं, उन्हीं को मैं ने मसीह के कारण हानि समझ लिया है . . . जिसके कारण मैं ने सब वस्तुओं की हानि उठाई, और उन्हें कूड़ा समझता हूँ, जिससे मैं मसीह को प्राप्त करूँ और उसमें पाया जाऊँ।” फिलिप्पियों 3:7-9

हमारे जीवन में यह प्रश्न प्रायः आम होता है कि हमें प्रवेश या स्वीकृति प्राप्त करने के लिए क्या करना होगा। “उस स्कूल में प्रवेश पाने के लिए मुझे क्या करना होगा? उस सामाजिक मण्डली का हिस्सा बनने के लिए मुझे क्या करना होगा? उच्च कार्यकारी स्थिति प्राप्त करने के लिए मुझे क्या करना होगा?” स्वाभाविक रूप से मनुष्य आत्मिक मामलों के बारे में भी यही सवाल पूछते हैं: “अनन्त जीवन का अधिकारी होने के लिए मैं क्या करूँ?” (लूका 18:18, अतिरिक्त बल दिया गया है)।

हम अक्सर अपनी गतिविधियों पर निर्भर रहते हैं, जैसे कलीसिया में उपस्थित होना, प्रार्थना करना, बाइबल पढ़ना। जब हम इन्हें करते हैं, तो हमें आत्मविश्वास महसूस होता है, और जब नहीं करते, तो हम खुद को दोषी महसूस करते हैं। हम परमेश्वर के विधान को एक सीढ़ी के रूप में देखते हैं, जिस पर चढ़कर हम उसकी स्वीकृति प्राप्त करते हैं।

इस वचन से पहले के पदों में पौलुस ने अपने जीवन के सभी भौतिक “लाभों” का उल्लेख किया है, जो उसने विरासत में प्राप्त किए थे और अपनी शिक्षा के आधार पर भी प्राप्त किए थे। उसका कुलीन वंश कभी सवालों के घेरे में नहीं आया था। पौलुस वास्तव में कहता है, यदि ये सभी चीजें परमेश्वर के पास स्वीकृति प्राप्त करने के लिए आवश्यक हैं, तो देखो, मुझे इनमें से सब कुछ प्राप्त था। क्या मैंने सभी आध्यात्मिक कर्तव्यों और धार्मिक दायित्वों को पूरा किया था? बिल्कुल किया था।

एक समय पर पौलुस को लगता था कि वह आध्यात्मिक दृष्टि से अत्यन्त धनी था और वह पवित्रता में उन्नति कर रहा था। फिर एक दिन सब कुछ बदल गया। यरूशलेम से दमिश्क तक की एक यात्रा में पौलुस ने यह जान लिया कि वह आध्यात्मिक रूप से निर्धन था—और वह पवित्रता की राह पर भी नहीं चल रहा था।

वह क्या था जिसने पौलुस को आशा दी? उसी यात्रा में उसकी मुलाकात क्रूस पर मरे और फिर मृतकों में से जी उठे यीशु से हो गई (प्रेरितों 9:1-19), और उसने धर्मी ठहराए जाने के सिद्धान्त की समझ प्राप्त की: कि परमेश्वर पापी मनुष्यों को अपने पुत्र के पूर्ण कार्य के आधार पर धर्मी घोषित करता है।

परमेश्वर का विधान कोई सीढ़ी नहीं है, बल्कि यह एक दर्पण जैसा है, जो हमें यह दिखाता है कि हम गलत हैं और खुद को सही नहीं कर सकते। पौलुस की तरह जो कुछ भी हमें पहले लाभ लगता था, वह अब एक हानि, एक विफलता के रूप में देखा जाता है।

आप कैसे जान सकते हैं कि मसीह आपको स्वीकार करता है? यह इस कारण नहीं कि आप उसके पास अपनी कोई धार्मिकता लेकर आते हैं; बल्कि इस कारण कि आपका पाप मसीह के खाते में स्थानान्तरित कर दिया गया, जिसने कभी पाप नहीं किया और आपके लिए पाप बन गया, ताकि आप उसकी पूर्ण धार्मिकता प्राप्त कर सकें (2 कुरिन्थियों 5:21)। आप परमेश्वर के साथ धर्मी ठहराए जाने में कुछ भी जोड़ या घटा नहीं सकते। धर्मी ठहराया जाना पूर्ण इसलिए हुआ है, क्योंकि परमेश्वर विश्वासियों को मसीह की धार्मिकता देता है, और यह अन्तिम है क्योंकि यह केवल उपहार के रूप में मिले परमेश्वर के पुत्र पर निर्भर करता है।

एक बार जब आप जान जाते हैं कि आप अनन्त जीवन में अपने प्रवेश को खो नहीं सकते, तो आप अपना सब कुछ—अपनी प्रतिष्ठा, सम्पत्ति, प्रसिद्धि, स्थिति, सम्पत्ति—उसकी खातिर त्यागने के लिए तैयार हो जाते हैं, जिसने आपको यह प्रवेश दिलाया है। जो कुछ भी आप पहले लाभ मानते थे, आप अब खुशी से उसे हानि मान सकते हैं। आप मसीह के लिए अपना जीवन खोने के लिए तैयार हैं, क्योंकि आप जानते हैं कि मसीह के द्वारा ही आपको सच्चा जीवन प्राप्त हुआ है। आप मसीह के लिए क्या त्यागने में संघर्ष करते हैं? अपने धर्मी ठहराए जाने को अपने समर्पित आज्ञाकारिता का प्रोत्साहन बनाएँ।

प्रेरितों 26:1-29

◊ पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: भजन 132–134; 2 कुरिन्थियों 10

31 August : सिंह आणि कोकरा

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31 August : सिंह आणि कोकरा
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“पाहा, हा माझा सेवक, ह्याला मी निवडले आहे; तो मला परमप्रिय आहे; त्याच्याविषयी माझा जीव संतुष्ट आहे; त्याच्यावर मी आपला आत्मा घालीन, तो परराष्ट्रीयांना न्याय कळवील. तो भांडणार नाहीं व ओरडणार नाहीं, व रस्त्यांवर त्याची वाणी कोणाला ऐकू येणार नाहीं. चेपलेला बोरू तो मोडणार नाहीं, व मिणमिणती वात तो विझवणार नाहीं; तो न्यायाला विजय देईल तोपर्यंत असे होईल, आणि परराष्ट्रीय त्याच्या नावाची आशा धरतील.” (मत्तय 12:18-21, यशया 42 मधून अवतरण)

आपल्या पुत्राची सेवक-सदृश्य नम्रता आणि करुणा पाहून पित्याचा जीव आनंदाने उल्लासतो.

जेव्हा बोरू चेपलेला असतो व तो मोडणार तोच हा सेवक तो बरा होईपर्यंत त्याला आपल्या करुणेंने सरळ धरून ठेवतो. जेव्हा एखादी वात मिणमिणती असते आणि विझणारच असते तेव्हां हा सेवक ती वात बाहेर उपटून काढत नाहीं, तर आपला हात तिच्या सभोताल ठेवतो व जोवर ती पुन्हा जळू लागत नाहीं तोवर तिजवर हळूवारपणें फुंकर मारतो.

त्यामुळें पिता घोषणा करतो, “पाहा, हा माझा सेवक, त्याच्याविषयी माझा जीव संतुष्ट आहे!” पुत्राची ही योग्यता आणि त्याचे हे तेज केवळ त्याच्या वैभवीपणातून किंवा केवळ त्याच्या सौम्यतेतून येत नाहीं, तर ह्या दोन्ही गुणविशेषांच्या सिद्ध एकात्मतेतून उफळून येतांत.

प्रकटीकरण 5:2 मध्यें एक देवदूत, “गुंडाळीवरचे शिक्के फोडून ती उघडण्यास कोण योग्य आहे?” असे मोठ्याने पुकारतो, तेव्हां उत्तर आलें, “रडू नकोस; पाहा, ‘यहूदा’ वंशाचा ‘सिंह’, दाविदाचा ‘अंकुर’ ह्याने जय मिळवला; म्हणून तो तिचे सात शिक्के फोडून ती उघडण्यास योग्य ठरला आहे” (प्रकटीकरण 5:5).

‘यहूदा’ वंशाचा ‘सिंह’ याच्या सामर्थ्यात देव उल्लासतो. म्हणूनच तो इतिहासाच्या गुंडाळीवरचे शिक्के फोडून शेवटच्या दिवसाचा उलगडा करण्यासाठीं देवाच्या दृष्टित पात्र आहे.

पण हे चित्र पूर्ण नाहीं. या सिंहाने जय कसा मिळवला? पुढील वचन त्याच्या स्वरूपाचे वर्णन करते: “तेव्हा राजासन व चार प्राणी ह्यांच्यामध्यें व वडीलमंडळ ह्यांच्यामध्यें, ज्याचा जणू काय ‘वध करण्यात’ आला होता, असा ‘कोकरा’ उभा राहिलेला मी पाहिला” (प्रकटीकरण 5:6). येशू केवळ ‘यहूदा’ वंशाचा ‘सिंह’ म्हणूनच नव्हे तर ‘वध करण्यात’ आला होता, असा ‘कोकरा’ म्हणूनही पित्याच्या आनंदास पात्र ठरला आहे.

देवाचा देहधारी झालेंला पुत्र येशू ख्रिस्ता याच्या गौरवाचे हेच वैशिष्ट आहे – वैभव आणि सौम्यता या अद्भुत मिश्रणातून उद्भवलेली एकात्मता.

30 अगस्त : सही समय पर की गई प्रार्थना

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30 अगस्त : सही समय पर की गई प्रार्थना
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“‘अब हे प्रभु, उनकी धमकियों को देख; और अपने दासों को यह वरदान दे कि तेरा वचन बड़े हियाव से सुनाएँ’ . . . जब वे प्रार्थना कर चुके, तो वह स्थान जहाँ वे इकट्ठे थे हिल गया, और वे सब पवित्र आत्मा से परिपूर्ण हो गए, और परमेश्‍वर का वचन हियाव से सुनाते रहे।” प्रेरितों 4:29, 31

जब हमें लगता है कि हमारा समाज अधिक दृढ़ता से सुसमाचार से मुँह मोड़ रहा है और पवित्रशास्त्र के दावों का बड़ी आक्रामकता से विरोध कर रहा है, तो स्वाभाविक सवाल यह होता है: हमें क्या करना चाहिए? हमारी प्रतिक्रिया यह नहीं होनी चाहिए कि हमें क्या आरामदायक लगता है, बल्कि यह होनी चाहिए कि बाइबल क्या कहती है।

प्रारम्भिक कलीसिया सामाजिक उथल-पुथल से अपरिचित नहीं थी। यह जानते हुए कि आशा और उद्धार मसीह के मृत्यु और पुनरुत्थान में ही पाया जाता है, पतरस ने पिन्तेकुस्त के दिन निडर होकर प्रचार किया, बस कुछ सप्ताह बाद ही जब उसने यीशु को जानने और उनका अनुयायी होने से इनकार किया था (प्रेरितों 2:1-41)। पतरस और अन्य प्रेरितों का साहसी प्रचार कलीसिया के त्वरित विकास का कारण बना—लेकिन साथ ही यह विश्वासियों के लिए हिंसा और उत्पीड़न का कारण भी बना (पद 1-22)।

तो फिर हमें यह पढ़ते हुए कोई आश्चर्य नहीं होना चाहिए कि उन्होंने परमेश्वर के सामने अपनी आवाज उठाई। उन्हें जिस विरोध का सामना करना पड़ रहा था, वे उसे जानते थे और उन्होंने ज्ञान के साथ, बाइबल के तरीके से, और साहस से प्रार्थना की।

“अब हे प्रभु . . .” यदि हमसे यह प्रार्थना पूरी करने के लिए कहा जाए, तो हम शायद परमेश्वर से धमकियों को दूर करने, विरोध को दबाने, या उत्पीड़न से बचाने के लिए कहेंगे। हालाँकि प्रारम्भिक विश्वासियों की प्रार्थना यह नहीं थी। इसके बजाय, उन्होंने यह प्रार्थना की कि वे “बड़े हियाव से” सुसमाचार का प्रचार करें।

उनकी प्रार्थना आज भी प्रासंगिक है। निस्सन्देह, यीशु मसीह की कलीसिया की इस समय की सबसे बड़ी आवश्यकता यह है: आत्मा से प्रेरित और मसीह पर केन्द्रित साहस। हम एक ऐसे समाज में जी रहे हैं जिसे विभिन्न विचारों और तनावों का मिश्रण आकार दे रहा है। इसी सन्दर्भ में परमेश्वर ने हमें यह कहने के लिए बुलाया है: “मैं सुसमाचार से नहीं लजाता, इसलिए कि वह हर एक विश्वास करने वाले के लिए, पहले तो यहूदी फिर यूनानी के लिए, उद्धार के निमित्त परमेश्‍वर की सामर्थ्य है” (रोमियों 1:16)।

जब हम ऐसा करते हैं, तो हमें यह याद रखना चाहिए कि सुसमाचार के केन्द्र में क्रूस है। यदि हम सचमुच साहस के साथ ये शब्द बोलना चाहते हैं, तो हम यशायाह के शब्दों में यह घोषणा करेंगे कि क्रूस पर यीशु “हमारे ही अपराधों के कारण घायल किया गया, वह हमारे अधर्म के कामों के कारण कुचला गया; हमारी ही शान्ति के लिए उस पर ताड़ना पड़ी, कि उसके कोड़े खाने से हम लोग चंगे हो जाएँ” (यशायाह 53:5)। जैसा कि रिको टाइस ने बताया है, इसका मतलब यह है कि हमें दर्द की सीमा को पार करने और विरोध करने वाले लोगों की शत्रुता का जोखिम उठाने के लिए साहसी होना होगा, ताकि हम उन लोगों के बीच भूख पा सकें जिनमें परमेश्वर पहले से काम कर रहा है।[1]

सम्पूर्ण सुसमाचार सम्पूर्ण कलीसिया को सम्पूर्ण संसार तक पहुँचाने के लिए दिया गया है। चाहे आप संगीतकार, अभियन्ता, किसान या फार्मासिस्ट हों, इससे कोई फर्क नहीं पड़ता; परमेश्वर का आदेश हममें से प्रत्येक के लिए यह है कि हम उसके वचन और सुसमाचार के रहस्य को बोलें।

तो क्या आप साहस के साथ साहस के लिए प्रार्थना करने के लिए तैयार हैं? आसान या आरामदायक या स्वस्थ या प्रशंसा पाने वाले जीवन के लिए नहीं, बल्कि एक साक्षी के जीवन के लिए? क्या आप प्रारम्भिक कलीसिया की प्रार्थना को प्रतिदिन अपनी प्रार्थना बनाएँगे, यह माँगते हुए कि आप परमेश्वर के आत्मा से भरपूर और साहसी हों, ताकि आप किसी भी क़ीमत पर सुसमाचार को ऐसे संसार के साथ साझा कर सकें, जो सत्य के लिए तरस रहा है?

  प्रेरितों 4:1-22

पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: भजन 129–131; 2 कुरिन्थियों 9 ◊


[1] ऑनेस्ट इवेंजेलिज़म (द गुड बुक कम्पनी, 2015), p 15.

30 August : मंडळीची वाढ ही देवाच्या पद्धतीने होते

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30 August : मंडळीची वाढ ही देवाच्या पद्धतीने होते
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म्हणजें देहाद्वारे झालेंली मुले देवाची मुले आहेत असे नाहीं तर अभिवचनानुसार जन्मलेली मुलेच संतान अशी गणण्यात येतांत. (रोम 9:8)

कल्पना करा कीं जुन्या करारातील अब्राहाम एक पाळक आहे. परमेश्वर म्हणतो, “मी तुला आशीर्वाद देईन आणि तुझ्या सेवेची भरभराट करीन.” पण मंडळी मात्र मुलबाळ नसलेली अशा वांझ अवस्थेतआहे.

अब्राहाम काय करतो? तो स्वर्गाच्या अलौकिक हस्तक्षेपाचा बेत हाणून पाडण्याचा प्रयत्न करू लागतो. तो म्हातारा होत आहे. त्याची पत्नी अजूनही वांझ आहे. म्हणून तो स्वर्गाच्या अलौकिक हस्तक्षेपावाचूनच देवाच्या अभिवचनानुसार असलेल्या पुत्राला जन्मास घालण्याचे ठरवतो. तो त्याच्या बायकोची दासी हागार हिच्याशी लैंगिक संबंध स्थापित करतो (उत्पत्ति 16:4). परंतु परिणामी “अभिवचनानुसार असलेल्या मुलाऐवजी” “देहाद्वारे झालेंले मुल” म्हणजें इश्माएल ह्याचा जन्म होतो.

देव अब्राहामाला आश्चर्याचा धक्का देत असे म्हणतो, “[तुझी पत्नी सारा] तिच्या पोटी तुला एक मुलगा देईन” (उत्पत्ति 17:16). हे ऐकून अब्राहाम देवाचा धावा करून म्हणतो, “इश्माएल तुझ्यासमोर जगला म्हणजें झालें!” (उत्पत्ति 17:18). त्याच्या स्वतःच्या नैसर्गिक, मानवी प्रयत्नांद्वारे असलेले काम ह्याद्वारे देवाचे अभिवचन पूर्णत्वास यावें अशी त्याची इच्छा आहे. पण देव म्हणतो, “नाहीं, नाहीं, तुझी बायको सारा हिच्याच पोटी तुला मुलगा होईल” (उत्पत्ति 17:19).

पण सारा 90 वर्षांची झाली आहे. तिचे आतापर्यंतचे आयुष्य वांझ अवस्थेंतच आहे, शिवाय ती आधीच रजोनिवृत्तीतून गेलेली आहे (उत्पत्ति 18:11). अब्राहाम 100 वर्षांचा झाला आहे. अभिवचनानुसार मुलासाठीं एकमात्र आशा जर असेल तर ती म्हणजें अद्भुत, अलौकिक हस्तक्षेपच.

“अभिवचनानुसार मूल” होण्याचा अर्थ असा आहे – त्याचा “जन्म रक्त, अथवा देहाची इच्छा, अथवा मनुष्याची इच्छा ह्यांपासून” होत नाहीं; तर देवापासून” होतो (योहान 1:13). या जगात देवाची मुलें तिच गणली जातांत जीं अलौकिकरित्या अभिवचनानुसार जन्मलेलीं आहेत. गलतीकरांस 4:28 मध्यें पौल म्हणतो, “बंधुजनहो, इसहाकाप्रमाणें तुम्हीं [ख्रिस्ती लोक], अभिवचनाची संतती आहात.” तुमचा जन्म “देहस्वभावानुसार” नाहीं, तर “आत्म्यानुसार” झाला आहे (गलती 4:29).

परत एकदा कल्पना करा कीं अब्राहाम एक पाळक आहे. त्याला जसे वाटते कीं मंडळीची वाढ ही देवानें दिलेंल्या अभिवचनानुसार व्हावीं त्याप्रमाणें ती वाढत नाहींये. तो अलौकिक हस्तक्षेपाची वाट पाहत थकला आहे. म्हणून तो केवळ मानवी माध्यम असलेल्या “हागारे” कडें वळतो आणि पवित्र आत्म्याच्या अलौकिक कार्यावाचून आपण “लोकांना आकर्षित” करू शकतो असे ठरवतो.

तथापि, ही इसहाकीं मंडळी नसून इश्माएली मंडळी असेल- म्हणजें देहाद्वारे झालेंली मुले, देवाची मुले नाहीं. देव आम्हांला अशा घातक यशापासून वाचवो. सर्व प्रकारे कष्ट करा. परंतु निर्णायक, अलौकिक कार्यासाठीं नेहमी परमेश्वराकडें पहा. “लढाईच्या दिवसासाठीं घोडा सज्ज करतांत, पण यश देणें परमेश्वराकडें असते” (नीतिसूत्रे 21:31).

29 अगस्त : एक नाम जो अद्वितीय है

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29 अगस्त : एक नाम जो अद्वितीय है
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“यहोवा के नाम की स्तुति करो, क्योंकि केवल उसी का नाम महान है; उसका ऐश्वर्य पृथ्वी और आकाश के ऊपर है।” भजन 148:13

परमेश्वर ने हमें अपना नाम प्रकट करके स्वयं को हम पर प्रकट किया है। जब हम परमेश्वर के नाम के बारे में सोचते हैं, तो हमें उसके स्वभाव—उसकी वास्तविकता, उसके चरित्र और उसके गुणों—के बारे में सोचना चाहिए। उसका नाम उसे हर किसी से और हर चीज़ से अलग करता है, क्योंकि यह उसके सम्पूर्ण अस्तित्व का प्रतिनिधित्व करता है।

निर्गमन 3 में मूसा और जलती हुई झाड़ी में परमेश्वर से उसकी मुलाकात की घटना परमेश्वर के नाम और उसके चरित्र के बीच के सम्बन्ध को दर्शाती है। जब मूसा झाड़ी के पास आया, तो परमेश्वर ने उससे कहा कि वह अपने पैरों से जूते उतार दे, क्योंकि वह पवित्र भूमि पर खड़ा था। इसके बाद जब परमेश्वर ने मूसा को फिरौन के पास जाकर इस्राएलियों की मुक्ति की माँग करने की आज्ञा दी, तो मूसा ने पूछा, “जब मैं इस्राएलियों के पास जाकर उनसे कहूँ, ‘तुम्हारे पितरों के परमेश्‍वर ने मुझे तुम्हारे पास भेजा है,’ तब यदि वे मुझ से पूछें, ‘उसका क्या नाम है?’ तब मैं उनको क्या बताऊँ?” परमेश्वर ने उत्तर दिया, “मैं जो हूँ सो हूँ” (निर्गमन 3:13-14)।

परमेश्वर ने “मैं हूँ” कहकर अपने नाम को प्रकट किया। इस उत्तर के द्वारा उसने स्वयं को सभी झूठे देवताओं से अलग कर दिया, जिन्हें वास्तव में “मैं नहीं हूँ” कहना चाहिए। मूर्तियाँ मनुष्यों के हाथों से बनाई जाती हैं—या फिर आज के समय में अक्सर हमारे हृदयों के भीतर गढ़ी जाती हैं। कारीगर उन्हें लकड़ी, पत्थर, या हाथी दाँत से बनाते हैं और उन्हें किसी चबूतरे पर स्थापित करते हैं। फिर भी, वे अनिवार्य रूप से गिर जाती हैं और उन्हें फिर से खड़ा करने की आवश्यकता होती है। एक मूर्ति हमारी सेवा की माँग करती है, लेकिन यह हमें बचा नहीं सकती। यह कभी भी वह पूरा नहीं करती जिसका यह वादा करती है।

परन्तु सम्पूर्ण सृष्टि के रचयिता के लिए यह उचित और सही है कि वह “मैं हूँ” के रूप में जाना जाए, क्योंकि वह किसी और के समान नहीं है। वह कभी उत्पन्न नहीं हुआ। वह पूर्णतः आत्म-विद्यमान और आत्म-निर्भर है। उसे किसी भी व्यक्ति या वस्तु की आवश्यकता नहीं है। जो कुछ उसके पास सदा से था, वह उसके पास अब भी है। उसका न तो कोई आरम्भ है और न अन्त। वह अपनी सभी प्रतिज्ञाओं को पूर्ण करता है। वह अनन्त जीवन और असीम सामर्थ्य का परमेश्वर है।

हमारा एकमात्र उद्देश्य यह है कि हम केवल उसी के नाम को ऊँचा उठाएँ। हम सभी इस बात के लिए संघर्ष करते हैं कि हम मूर्तियों के आगे न झुकें—वे बनाई गई चीज़ें जिन्हें हम पूजते हैं और जिनके सामने यह सोचकर बलिदान चढ़ाते हैं कि वे हमें जीवन देंगी। परन्तु यदि हम परमेश्वर की आराधना सही रीति से करना चाहते हैं, तो हमें अपने जीवन की सभी मूर्तियों को उसके सामने गिरने देना होगा। वही एकमात्र सृष्टिकर्ता है, वही “मैं हूँ” है—वही जो स्वर्ग और पृथ्वी पर राज्य करता है।

यशायाह 46:3-11

◊ पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: भजन 126–128; 2 कुरिन्थियों 8

29 August : ख्रिस्त येशूमध्यें असणें म्हणजें सहा गोष्टीं

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29 August : ख्रिस्त येशूमध्यें असणें म्हणजें सहा गोष्टीं
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[देवानें] आमच्या कृत्यांप्रमाणें नव्हे तर स्वत:च्या संकल्पाप्रमाणें व कृपेप्रमाणें आम्हांला तारले व पवित्र पाचारणाने पाचारले आहे; ही कृपा युगांच्या काळापूर्वी ख्रिस्त येशूच्या ठायीं आपल्यावर करण्यात आली होती. (2 तीमथ्य 1:9)

“ख्रिस्त येशूमध्यें” असणें हे एक अद्भुत सत्य आहे. ख्रिस्ताशी एकरूप होणें चित्तथरारक आहे. ख्रिस्ताशी बांधलेलें.

जर तुम्हीं “ख्रिस्तात” आहांत तर तुमच्या बाबतींत ते काय आहे हे ऐका:

1. जगाच्या स्थापनेपूर्वी ख्रिस्त येशूच्या ठायीं तुम्हांवर कृपा करण्यात आली होती. दुसरा तीमथ्य 1:9, “ही कृपा युगांच्या काळापूर्वी ख्रिस्त येशूच्या ठायीं आपल्यावर करण्यात आली होती.”

2. देवानें जगाच्या स्थापनेपूर्वी तुम्हांला ख्रिस्ताच्या ठायीं निवडून घेतले. इफिस 1:4, “[देवानें] जगाच्या स्थापनेपूर्वी आपल्याला ख्रिस्ताच्या ठायीं निवडून घेतले.”

3. ख्रिस्त येशूमध्यें देवानें तुमच्यावर अशी प्रीति केलीं जिच्यापासून तुम्हांला कोणतीही गोष्ट विभक्त करू शकणार नाहीं. रोमकरांस 8:38-39, “कारण माझी खातरी आहे कीं, मरण, जीवन, देवदूत, अधिपती, वर्तमानकाळच्या गोष्टी, भविष्यकाळच्या गोष्टी, बले, उंची, खोली, किंवा दुसरी कोणतीही सृष्ट वस्तू, ख्रिस्त येशू आपला प्रभू ह्याच्यामध्यें देवाची आपल्यावरील जी प्रीति आहे तिच्यापासून आपल्याला विभक्त करायला समर्थ होणार नाहीं.”

4. ख्रिस्त येशूमध्यें तुम्हांला मुक्ती आणि तुमच्या सर्व अपराधांची क्षमा मिळाली आहे. इफिस 1:7, “[ख्रिस्तात] त्याच्या रक्ताच्या द्वारे खंडणी भरून मिळवलेली मुक्ती, म्हणजें आपल्या अपराधांची क्षमा, आपल्याला मिळाली आहे.”

5. ख्रिस्त येशूमध्यें तुम्हीं देवासमोर नीतिमान ठरला आहांत आणि ख्रिस्ताच्या ठायीं देवाचे नीतिमत्व हे तुमचे नीतिमत्त्व गणण्यात आलें आहे. दुसरे करिंथ 5:21, “[ख्रिस्ताला] पाप ठाऊक नव्हते त्याला [देवानें]  तुमच्या-आमच्याकरता पाप असे केलें; ह्यासाठीं कीं, आपण त्याच्या ठायीं देवाचे नीतिमत्त्व असे व्हावे.”

6. ख्रिस्त येशूमध्यें तुम्हीं नवी उत्पत्ती आणि देवाचे पुत्र झाला आहांत. दुसरे करिंथ 5:17, “म्हणून जर कोणी ख्रिस्ताच्या ठायीं असेल तर तो नवी उत्पत्ती आहे; जुने ते होऊन गेले; पाहा, ते नवे झालें आहे.” गलती 3:26, “तुम्हीं सर्व ख्रिस्त येशूवरील विश्वासाच्या द्वारे देवाचे पुत्र आहात.”

माझी तुमच्यासाठीं अशी प्रार्थना आहे कीं “ख्रिस्त येशूमध्यें” असण्याचा जो अतुल्य विशेषाधिकार तुम्हांला प्राप्त झाला आहे त्यावर चिंतन करण्यापासून आणि त्याचा आनंद घेण्यापासून तुम्हीं कधीही खचून जाऊ नये.