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6 अक्तूबर : पवित्रशास्त्र की सैद्धान्तिक शिक्षा

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6 अक्तूबर : पवित्रशास्त्र की सैद्धान्तिक शिक्षा
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“पवित्रशास्त्र . . . तुझे मसीह पर विश्‍वास करने से उद्धार प्राप्त करने के लिए बुद्धिमान बना सकता है। सम्पूर्ण पवित्रशास्त्र परमेश्‍वर की प्रेरणा से रचा गया है और उपदेश, और समझाने, और सुधारने, और धार्मिकता की शिक्षा के लिए लाभदायक है, ताकि परमेश्‍वर का जन सिद्ध बने, और हर एक भले काम के लिए तत्पर हो जाए।” 2 तीमुथियुस 3:15-17

पवित्रशास्त्र का अधिकार, पर्याप्तता, अचूकता और निष्कपटता परमेश्वर और उसकी कलीसिया के निरन्तर कार्य के लिए अत्यन्त महत्त्वपूर्ण सिद्धान्त हैं। जब तक हम सुसमाचार के दिव्य स्रोत के प्रति आश्वस्त नहीं होते, तब तक हम इसे खोए हुए और पीड़ित संसार तक नहीं ले जा सकते। जैसा कि जे. सी. राइल ने लिखा है, यदि मसीहियों के पास बाइबल एक “दिव्य पुस्तक के रूप में नहीं है, जिस पर वे अपनी सैद्धान्तिक शिक्षा और आचरण का आधार बना सकें, तो उनके पास न तो वर्तमान शान्ति या आशा के लिए कोई ठोस आधार होगा और न ही मानवजाति का ध्यान आकर्षित करने का कोई अधिकार होगा।”[1]

पौलुस ने इसी विषय पर तीमुथियुस को याद दिलाया कि “सम्पूर्ण पवित्रशास्त्र परमेश्वर की प्रेरणा से रचा गया है।” दूसरे शब्दों में, बाइबल कोई मानव निर्मित ग्रंथ नहीं है, जिसमें दिव्यता का समावेश किया गया हो; बल्कि यह एक दिव्य उपहार है जिसे परमेश्वर ने मनुष्यों के माध्यम से दिया है। इसकी प्रत्येक पुस्तक, अध्याय, वाक्य और शब्द मूल रूप से परमेश्वर की प्रेरणा से दिए गए हैं।

अन्य मसीही सैद्धान्तिक शिक्षाओं के समान पवित्रशास्त्र की सैद्धान्तिक शिक्षा को समझना भी एक चुनौती हो सकता है। लेकिन किसी बात को समझने में आने वाली कठिनाई उसकी सच्चाई को कम नहीं करती। इसके अलावा, जब पवित्रशास्त्र के सिद्धान्त की बात आती है, तो कई बातें ऐसी होती हैं जिन्हें हम वस्तुनिष्ठ रूप से देख सकते हैं। उदाहरण के लिए, यह स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है कि बाइबल पूर्ण रूप से एक संगठित और सामंजस्यपूर्ण रचना है। यह तीस से अधिक लेखकों द्वारा लगभग पन्द्रह सौ वर्षों की अवधि में लिखी गई थी, फिर भी वे सभी लेखक एक ही कहानी बताते हैं—इस संसार का वर्णन करना, इसके सृष्टिकर्ता के चरित्र को उजागर करना, मानव हृदय की समस्या को दर्शाना, और परमेश्वर के मेमने के बलिदान के माध्यम से उद्धार के अद्‌भुत मार्ग की ओर संकेत करना—और उत्पत्ति से लेकर प्रकाशितवाक्य तक एक ही कहानी को बताया गया है!

बाइबल समय, संस्कृति, लिंग और बुद्धिमत्ता की सीमाओं को पार कर जाती है। कुछ पुस्तकें किसी विशेष व्यक्ति, युग या स्थान के लिए उपयुक्त हो सकती हैं, लेकिन कोई अन्य पुस्तक ऐसी नहीं है, जो हर दिन और हर युग की चुनौतियों का सामना इतनी पूर्णता से कर सके और जीवन के मूलभूत प्रश्नों का उत्तर दे सके। परमेश्वर के वचन की गहराइयों को सबसे महान बुद्धिजीवी भी पूरी तरह से नहीं समझ सकते, और फिर भी छोटे बच्चे तक इसे पढ़कर इसके सत्य को जान सकते हैं और अपने जीवन को परिवर्तित कर सकते हैं।

पवित्रशास्त्र का अधिकार, पर्याप्तता, अचूकता और निष्कपटता ही वह आधार हैं, जिन पर हमें खड़े रहना है; और इस कार्य को करने के लिए हमारे पास दिव्य सहायता भी उपलब्ध है। जिस पवित्र आत्मा ने परमेश्वर के वचन को प्रेरित किया, वही पवित्र आत्मा उस वचन को प्रकाशित भी करता है और हमें यह विश्वास दिलाता है कि यह परमेश्वर का दिया हुआ वचन है, जिससे हम उसमें विश्वास करें जो देहधारी वचन है। जब आत्मा यह कार्य आपके भीतर करता है, तब आपका विश्वास केवल एक बौद्धिक स्वीकृति तक सीमित नहीं रहता, बल्कि यह आपको परमेश्वर के वचन को और अधिक जानने और समझने की भूख से भर देता है—उसके लिए जो न केवल इसका लेखक है बल्कि इसका केन्द्र भी है।

  भजन 12

◊ पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: यहेजकेल 40–41; यूहन्ना 18:19-40


[1] बाइबल इंस्पिरेशन: इट्स रियैलिटी एण्ड नेचर (विलियम हण्ट, 1877), पृ. 6.

5 अक्तूबर : आत्मा से भरी निडरता

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5 अक्तूबर : आत्मा से भरी निडरता
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परन्तु यदि तू चढ़ाई करते डरता हो, तो अपने सेवक फूरा को संग लेकर छावनी के पास जाकर सुन, कि वे क्या कह रहे हैं; उसके बाद तुझे उस छावनी पर चढ़ाई करने का साहस होगा।” न्यायियों 7:10-11

डर में पीछे हटना हमेशा आसान होता है, जबकि विश्वास में आगे बढ़ना कठिन। पीछे हटना आसान तो है, लेकिन कभी भी बेहतर नहीं है।

गिदोन डर के बारे में और उसकी वजह से होने वाली हिचकिचाहट के बारे में बहुत कुछ जानता था। जब परमेश्वर के दूत ने उसे इस्राएल का नेतृत्व करने के लिए बुलाया, तब उसने संकोच किया (न्यायियों 6:13, 15)। जब इस्राएल के शत्रु उससे युद्ध करने के लिए इकट्ठा हुए, तब भी उसने संकोच किया (पद 36-40)। और ऐसा प्रतीत होता है कि युद्ध से ठीक पहले, जिसमें परमेश्वर ने उसे विजय का आश्वासन दिया था, वह फिर से संकोच कर रहा था (7:9-10)। इसी डर और संकोच के बीच परमेश्वर ने उससे बात की। ध्यान दें कि गिदोन के डर को देखकर भी परमेश्वर अनुग्रह और धैर्य से उससे बात करता है, “परन्तु यदि तू चढ़ाई करते डरता हो . . .” और उसे अपने सेवक के साथ शत्रु शिविर में जाने के लिए प्रोत्साहित करता है। यह गिदोन के भय को ध्यानपूर्वक सम्बोधित करने का एक संवेदनशील तरीका है। परमेश्वर ने यह स्वीकार किया कि मानवीय दृष्टिकोण से गिदोन के पास डरने के ठोस कारण थे! वह एक ऐसे शत्रु के खिलाफ युद्ध में जा रहा था, जिसकी सेना उसके सैनिकों की तुलना में हजारों में अधिक थी। लेकिन परमेश्वर ने उसे उसके डर के लिए डाँटा नहीं, बल्कि उसे आत्मविश्वास से भरने का कारण दिया।

गिदोन की तरह हमें भी प्रभु के ऐसे ही दयालु शब्दों की जरूरत है। हम अक्सर यह भूल जाते हैं कि हम अपनी सारी चिन्ताएँ उस पर डाल सकते हैं (1 पतरस 5:7)। हम अपने सारे बोझ और भय उसके चरणों में रख सकते हैं। हमें यह अनुमति दी गई है कि हम उसके पास जाकर कहें कि हमें नहीं पता कि हमें क्या करना चाहिए। और उसका उत्तर हमेशा अनुग्रह और करुणा से भरा होता है।

जो बात इस कहानी को और भी सुन्दर बनाती है, वह है गिदोन की परमेश्वर की कोमल प्रेरणा के प्रति प्रतिक्रिया। जब वह अपने सेवक के साथ छिपकर शत्रु शिविर में जाता है, तो वह दो सैनिकों को एक स्वप्न के बारे में चर्चा करते हुए सुनता है, जिसमें एक सैनिक इसकी व्याख्या इस प्रकार करता है कि वे “गिदोन की तलवार” से हार जाएँगे क्योंकि “उसी के हाथ में परमेश्वर ने मिद्यान को सारी छावनी समेत कर दिया है” (न्यायियों 7:14)। जब गिदोन यह सुनता है और महसूस करता है कि परमेश्वर ने सचमुच उसके लिए पहले से ही वह कार्य कर दिया है जो वह स्वयं कभी नहीं कर सकता था, तो वह क्या करता है? “उसने आराधना की” (पद 15)। इस प्रतिक्रिया में बहुत गहराई है। असम्भव परिस्थितियों का सामना करते हुए, लेकिन परमेश्वर की प्रतिज्ञा में आश्वस्त होकर, यह भयभीत, कमजोर और अप्रत्याशित अगुवा परमेश्वर की स्तुति में अपना हृदय उण्डेल देता है और फिर परमेश्वर से मिले साहस से अपनी सेना को एकत्र करता है। उसकी निडरता एक गुप्त, निजी क्षण से आई थी, जो उसने परमेश्वर के साथ बिताया था।

यह महत्त्वपूर्ण है कि हम उस अन्तर को समझें जो मनुष्यों द्वारा संचालित योजनाओं और आत्मा से भरी वास्तविक निडरता के बीच है। मानवीय योजनाएँ केवल एक मानवीय प्रयास होती हैं और जल्दी ही बिखर सकती हैं; लेकिन आत्मा से मिलने वाली निडरता केवल तब पाई जाती है, जब हम परमेश्वर के सामने दीन होते हैं, अपनी अपर्याप्तता को स्वीकार करते हैं, और उसके सामर्थ्य को याद रखते हैं। यही वह ठोस स्थान है जिस पर हम खड़े हो सकते हैं। डर का समाधान स्वयं को महान मान लेना नहीं है, जैसा कि बहुत से लोग दावा करते हैं। इसका समाधान यह है कि हम परमेश्वर को महान मानें और उसकी शक्ति पर विश्वास करें, जो हमें एक पवित्र और विनम्र निडरता प्रदान कर सकता है।

आप इस समय किससे डर रहे हैं? किस बात को लेकर आप संकोच कर रहे हैं, जबकि परमेश्वर आपको आज्ञाकारिता में आगे बढ़ने के लिए बुला रहा है? अपने भय को परमेश्वर के पास लाएँ। उससे प्रार्थना करें कि वह आपको वह सामर्थ्य दिखाए जो आप में नहीं है। फिर उस पर भरोसा करें, उसकी आराधना करें, और उसकी आज्ञा का पालन करें।

यहोशू 1:1-11

पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: यहेजकेल 37–39; यूहन्ना 18:1-18 ◊

5 October : परतफेड केलीं जाईल व न्याय मिळेल

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5 October : परतफेड केलीं जाईल व न्याय मिळेल
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प्रिय जनहो, सूड उगवू नका, तर देवाच्या क्रोधाला वाट द्या; कारण असा शास्त्रलेख आहे कीं, “सूड घेणें मजकडे आहे, मी परतफेड करीन,” असे प्रभू म्हणतो.” (रोमकरांस 12:19)

तुमच्या सर्वांवर कधी ना कधी अन्याय किंवा अत्याचार झालाच आहे. शक्यता तुमच्यापैकीं बहुतेकांवर एखाद्या व्यक्तीनें गंभीर अत्याचार केला असेल आणि त्यानें आजपर्यंत क्षमा मागितली नाहीं किंवा त्याची योग्य परतफेड करण्यासाठीं समाधानकारक असे कांहींही केलें नाहीं.

आणि तुमच्या त्या दुखावलेल्या भावना विसरून उद्भवलेली कटुता सोडून देण्याच्या मार्गातील सर्वांत मोठे अडखळण म्हणजें हे ठराविक मत – जे योग्यच आहे – कीं परतफेड केलीं गेलीच पाहिजे, कीं ज्यांच्यावर भयंकर अत्याचार झाला आहे ते लोक अत्याचार करणाऱ्याला जर असेच सुटून जाऊ देतील तर ह्या विश्वाची नैतिक व्यवस्था कोलमडून जाईल आणि प्रत्येकावर अन्याय होईल.

हे ठराविक मत द्वेष सोडून क्षमा करण्यांत अडखळण आहे. परंतु हे एकमेव अडखळण नाहीं. आम्हाला सामोरे गेलें पाहिजे अशी आमची स्वतःची पापे देखील आहेतच. पण खरे अडखळण वर सांगितल्याप्रमाणेंच आहे.

आम्हाला असे वाटते कीं अपराध्यांना दंड न देता मोकळे सोडून देणें म्हणजें आपल्याला न्याय मिळणार नाहीं हे मान्य करणें होय. आणि आम्हांला ते मान्य नसते.

म्हणून आपण आपल्या मनांत राग धरून राहतो, आणि ती घटना किंवा ते शब्द यांची पुन्हा पुन्हा आठवण करून स्वतःच्या भावनांशी खेळतो : असे व्हायला नको होते; असे व्हायला नको होते; जे झालें ते खूप चुकीचे होते; जे झालें ते खूप चुकीचे होते. मी इथे इतका दुःखी आहे आणि तो (किंवा ती) मात्र आनंदी व सुखी आहे, हे कसे? हे खूप चुकीचे आहे. हे खूप चुकीचे आहे! आम्हीं घडलेल्या प्रकाराला असेच विसरू शकत नाहीं. आणि आपल्या अं:तकरणात भरण-पोषण केलेली ही कटुता प्रत्येक गोष्टीला विषाक्त करू लागते.

रोमकरांस 12:19 मधील हे अभिचचन आपल्याला देवानें आपल्यावरील सूडाचे हे ओझे उचलून घेण्यासाठीं दिलें आहे.

” सूड उगवू नका, तर देवाच्या क्रोधाला वाट द्या.” म्हणजें काय?

क्रोधाचे हे ओझे खाली टाकून देणें, आपल्यावर अन्याय झाल्याच्या भावनेने दुःखाचे पोषण करण्याची जणू कांही एक प्रथाच, ती टाकून देणें, याचा अर्थ असा होत नाहीं कीं तुमच्यावर कोणताही मोठा अत्याचार झाला नव्हता. अत्याचार तर झालाच आहे.

पण याचा अर्थ असाही नाहीं कीं न्याय मिळत नाहीं. याचा अर्थ असा नाहीं कीं तुम्हांला निर्दोष सिद्ध केलें जाणार नाहीं. याचा अर्थ असा नाहीं कीं अपराधी असेच मोकळे सुटून गेलेंत. नाहीं, ते असेच मोकळे सुटून गेलें नाहीं.

याचा अर्थ असा कीं, जेव्हा तुम्हीं सूडाचे ओझे खाली टाकतां, तेव्हा परमेश्वर ते उचलतो.

सूड उगण्याचा हा धूर्त मार्ग नाहीं. तर  सूड घेणें ज्याच्याकडे आहे त्याला सूड घेण्यासाठीं वाट देणें. सूड घेणें मजकडे आहे, असे प्रभू म्हणतो. तू ते ओझे खाली टाक, मी ते उचलीन. मी परतफेड करीन व तुला न्याय मिळेल. किती अद्भुत सुटका. मला हे ओझे उचलण्याची गरज नाहीं. हे सत्य सुटकेचा नि:श्वास सोडण्यासारखे आहे, कदाचित आयुष्यांत पहिल्यांदाच, आणि असे वाटते कीं आता तुम्हीं आपल्या वैर्‍यांवर फक्त प्रीति करण्यास मोकळे आहात.

4 अक्तूबर : अस्थिर चट्टान

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4 अक्तूबर : अस्थिर चट्टान
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“भोजन करने के बाद यीशु ने शमौन पतरस से कहा, ‘हे शमौन, यूहन्ना के पुत्र, क्या तू इन से बढ़कर मुझ से प्रेम रखता है?’ उसने उससे कहा, ‘हाँ, प्रभु; तू तो जानता है कि मैं तुझ से प्रीति रखता हूँ।’ उसने उससे कहा, ‘मेरे मेमनों को चरा।’” यूहन्ना 21:15

यूहन्ना 21 में यीशु का झील के तट पर प्रकट होना उसके पुनरुत्थान के बाद का घटनाक्रम था, और इस प्रकार यह क्रूस पर उसकी मृत्यु और उससे जुड़े सभी घटनाक्रमों के बाद हुआ था—जिसमें पतरस का कायरता से मसीह को पहचानने से इनकार करना भी शामिल था। हम निश्चित रूप से मान सकते हैं कि पतरस ने अपनी इस विश्वासघाती असफलता के लिए गहरा पश्चाताप और शर्मिन्दगी महसूस की होगी। हम कल्पना कर सकते हैं कि वह अन्य चेलों से कह रहा होगा, मुझे एक मौका मिला था, और मैंने उसे गँवा दिया। मैंने उससे विश्वासघात किया। मैं, जिसने खुद को एक नायक समझा था, अब यहाँ एक सबसे बड़े कायर के रूप में खड़ा हूँ। इसलिए जब यीशु ने पतरस से बात की, तो निश्चय ही पतरस सोच रहा होगा, अब वह मुझसे क्या कहेगा? क्या अब भी मेरा उसके लोगों में कोई स्थान है?

यीशु ने पतरस की असफलता को नजरअंदाज नहीं किया; उसने उसे स्वीकार किया। भोजन के बाद यीशु ने पतरस को उसके पुराने नाम “शमौन” से सम्बोधित किया, जिसका अर्थ है “सुनना।” अपने सेवाकार्य की आरम्भ में यीशु ने उसका नाम बदलकर “पतरस” रखा था, जिसका अर्थ है “पत्थर” (यूहन्ना 1:42)। यह नाम परिवर्तन उस बदलाव को दर्शाता था, जो पतरस के स्वभाव और बुलाहट में आने वाला था: वह डगमगाने वाला व्यक्ति था, लेकिन भविष्य में वह एक दृढ़ चट्टान की तरह स्थिर होने वाला था। झील के तट पर यीशु ने पतरस को उसकी अस्थिरता की याद दिलाई। पतरस के स्थिर बनने से पहले उसे यह समझना जरूरी था कि उसके आचरण ने न तो एक मजबूत विश्वास को दर्शाया था और न ही मसीह के प्रेम में दृढ़ निडरता दर्शाई थी।

हम भी पतरस की तरह कभी-कभी अपनी असफलताओं, पतन, और अविश्वास के कारण हतोत्साहित महसूस कर सकते हैं। हमें अपने “असन्तुलित विश्वास” की पीड़ा महसूस होगी; और हमें उस महान चिकित्सक की जरूरत होगी जो हमारे प्रेम को फिर से सही स्थान पर रखे—कभी-कभी पीड़ादायक तरीके से, लेकिन हमेशा पुनर्स्थापना के लिए। ध्यान दें कि यीशु यहाँ पतरस के दिल, उसके प्रेम और उसकी भक्ति की ही चिन्ता कर रहा था। हाँ, यह सच है कि अन्य गुण आवश्यक और उपयोगी हैं, लेकिन मसीह के प्रति हमारा प्रेम अनिवार्य है। हमारा प्रेम कहाँ टिका है? क्या वह अस्थिर रेत पर आधारित है या एक दृढ़ चट्टान पर?

फिर भी, जब मसीह हमारे प्रेम को पुनर्स्थापित करता है, तब भी वह हमें अपने राज्य का सेवाकार्य सौंपता है। यीशु ने अभी भी पतरस को अपनी कलीसिया के निर्माण के लिए चुना। यह कितना आश्चर्यजनक है कि यीशु ने अपने “मेमनों” की देखभाल उस चेले को सौंपी, जिसने (यहूदा को छोड़कर) उसे सबसे अधिक चोट पहुँचाई थी और जिसके शब्दों और कार्यों में सबसे अधिक अन्तर था। लेकिन यह हमारे लिए भी कितना उत्साहजनक है कि यीशु ने ऐसा किया! क्योंकि यदि वह पतरस जैसे व्यक्ति को उपयोग करने के लिए तैयार था, तो वह मुझ जैसे और आपके जैसे व्यक्ति को भी उपयोग कर सकता है।

यीशु ने पतरस को बहुत बड़ी ज़िम्मेदारी दी, लेकिन यह ज़िम्मेदारी पतरस के लिए एक परीक्षा भी थी। मसीह के प्रति प्रेम की परीक्षा यह है कि हमारा जीवन आज्ञाकारिता और कर्म को कैसे प्रदर्शित करता है। प्रेरितों की पुस्तक हमें दिखाती है कि कैसे पतरस ने परमेश्वर के आत्मा के सामर्थ्य से इस परीक्षा का उत्तर दिया।

डगमगाती चट्टान, अर्थात पतरस की कहानी हमें यह याद दिलाती है कि हमारा परमेश्वर अनुग्रह देने वाला और दूसरा अवसर देने वाला परमेश्वर है। हमारी कमजोरियाँ हमें यह दिखाती हैं कि हमें एक ऐसी शक्ति की आवश्यकता है जो हमारी अपनी नहीं है, बल्कि उस महान शाश्वत चट्टान, अर्थात मसीह में पाई जाती है। इसलिए यह जानते हुए कि वही सामर्थ्य हमारे लिए हमारे उद्धारकर्ता की ओर से उपलब्ध है—जो हमारे लिए मरा, और जिसने हमें अपनी सेवा के लिए बुलाया है—आप निश्चिन्त होकर अपने दिन में आगे बढ़ सकते हैं और प्रेमपूर्वक उसकी आज्ञा का पालन कर सकते हैं।

प्रेरितों 5:17-42

◊ पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: यहेजकेल 35–36; यूहन्ना 17

4 October : अखंड आनंद

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4 October : अखंड आनंद
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 “मी तुझे नाव त्यांना कळवले आहे आणि कळवीन; ह्यासाठीं कीं, जी प्रीति तू माझ्यावर केलीं ती त्यांच्यामध्यें असावी आणि मी त्यांच्यामध्यें असावे.” (योहान 17:26)

येशूनें त्याच्या मरणाच्या आदल्या रात्री हीच प्रार्थना केलीं होती. जे अति आनंददायक त्याचा तुम्हीं अफाट ऊर्जा आणि पूर्ण आवेशाने सर्वकाळ आनंद घ्यावयांस समर्थ व्हावें याची कल्पना करा. हा आमचा वर्तमान अनुभव नाहीं. या जगात आपण आणि आपली अंतिम आत्मतृप्ती यांमध्यें तीन गोष्टी आडकाठी बनून उभ्या आहेत.

एक आडकाठी म्हणजें ही कीं, या सृष्ट जगात आपल्या जिवाची अगम्य तहान तृप्त करू शकेल असे वैयक्तिक मूल्य असलेली एकही गोष्ट नाहीं.

दुसरी ही कीं, त्या अविनाशी धनाचे जे मूल्य आहे त्यामानाने त्याचा आनंद घेण्याची ताकद आपल्यात नाहीं.

आणि तिसरी आडकाठी जी आमच्या या अंतिम आत्मतृप्तीच्या मार्गात उभी आहे ती म्हणजें जो आनंद आपल्याला येथें मिळतो तो तात्पुरता आहे. येथें कांहींही टिकत नाहीं. पण जर योहान 17:26 मधील येशूचे ध्येय आणि प्रार्थना खरी ठरली तर हे सर्व बदलेल. त्यानें अशी प्रार्थना केलीं कीं “जी प्रीति तू माझ्यावर केलीं ती त्यांच्यामध्यें असावी.” ज्याच्याविषयी देव संतुष्ट आहे त्या आपल्या पुत्रावर असलेली त्याची असीम प्रीति, तीच आमच्यामध्येंही! 

जर पुत्रामध्यें असलेला देवाचा आनंद हा पुत्रामध्यें आपला आनंद झाला, तर आपल्या आनंदाचा गंतव्य, म्हणजें येशू, ह्याचे वैयक्तिक मूल्य अविनाशी असणार. तो कधीही कंटाळवाणा किंवा निराश करणारा किंवा आडकाठी होणार नाहीं.

देवाचा जो पुत्र ह्याच्यापेक्षा मोठ्या अशा कोणत्याही खजिन्याची कल्पना देखील केलीं जाऊ शकत नाहीं.

शिवाय, या अविनाशी खजिन्याचा आनंद घेण्याची आपली शक्ती मानवी दुर्बळतेमुळें मर्यादित राहणार नाहीं. आपण पुत्राचा आनंद त्याच्या पित्यामध्यें असलेल्या आनंदसह घेऊ. येशूनें यासाठींच प्रार्थना केलीं होती!

त्याच्या पुत्रामध्यें देवाचा आनंद हा आपल्यामध्यें त्याचा आनंद होईल आणि तोच आनंद आपला देखील होईल  – पुत्रामध्यें आपला आनंद. आणि या आनंदाचा अंत नाहीं, कारण पित्याचा किंवा पुत्राचा कधीही अंत होणार नाहीं.

त्यांची एकमेकांवरील प्रीति हीच त्यांच्यावरील आपली प्रीति होईल आणि म्हणूनच त्यांच्यावर आपली प्रीति कधीही विरणार नाहीं, कीं थंडावणारही नाहीं.

3 अक्तूबर : परमेश्वर के वचन के प्रति समर्पित

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3 अक्तूबर : परमेश्वर के वचन के प्रति समर्पित
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“‘हम तो प्रार्थना में और वचन की सेवा में लगे रहेंगे।’ यह बात सारी मण्डली को अच्छी लगी।” प्रेरितों 6:4-5

यद्यपि पिन्तेकुस्त के दिन पवित्र आत्मा से परिपूर्ण घटनाएँ और उसके परिणामस्वरूप हुआ सेवाकार्य असाधारण थे, तौभी प्रेरितों और उनके अनुयायियों ने यह कहना आरम्भ नहीं कर दिया कि अब परमेश्वर का आत्मा मुझे सिखाता है; इसलिए मुझे किसी और की सुनने की आवश्यकता नहीं है। इसके विपरीत, जब वे पवित्र आत्मा से भर गए, तो वे परमेश्वर के वचन के अधिकारपूर्ण प्रचार और शिक्षा को पूरी तत्परता से सुनने लगे। यह हमें एक महत्त्वपूर्ण शिक्षा देता है: परमेश्वर का आत्मा सदैव परमेश्वर के लोगों को उसके वचन के प्रति समर्पित होने के लिए प्रेरित करता है।

इसी कारण प्रेरितों की पुस्तक प्रचार की केन्द्रीयता से भरी हुई है। प्रेरितों ने पहचाना कि परमेश्वर द्वारा अपने लोगों को अपने पुत्र की छवि में नया बनाने का सर्वोच्च साधन उसका वचन है, और उसका आत्मा उसके वचन के माध्यम से कार्य करता है। प्रेरितों 6 में हम यह देखते हैं कि प्रेरितों ने उन लोगों को किस प्रकार प्राथमिकता और संरक्षण दिया, जिन्हें शिक्षा देने के लिए बुलाया और तैयार किया गया था। प्रेरितों ने यह गम्भीर जिम्मेदारी समझी कि उन्हें परमेश्वर के वचन को लोगों के सामने प्रस्तुत करने के लिए सेवक बनाए जाने का सौभाग्य मिला है।

पुराने नियम की पुस्तकें भविष्यवक्ताओं के “वचनों” का उल्लेख करती हैं; इस शब्द का अनुवाद “भारी भविष्यवाणी” भी किया जा सकता है (उदाहरण के लिए, यशायाह 13:1 देखें)। यह हृदय और मन पर पड़े उस भार को दर्शाता है, जो परमेश्वर के सत्य को लोगों तक पहुँचाने की महान जिम्मेदारी के कारण उत्पन्न होता है। उन्नीसवीं शताब्दी में सी. एच. स्पर्जन ने इस भार को स्वीकार करते हुए यह घोषणा की थी कि उनका पुलपिट इंग्लैंड के राजा के सिंहासन से अधिक प्रभावशाली है, क्योंकि वह वहाँ परमेश्वर के सिंहासन से मिले सन्देश को लेकर खड़े होते थे और मसीही सैद्धान्तिक शिक्षा के सत्य का प्रचार करते थे।

हमें उन लोगों के लिए प्रार्थना करनी चाहिए और उनकी रक्षा करनी चाहिए, जिन्हें पवित्रशास्त्र की सच्चाइयों को सिखाने के लिए बुलाया गया है—चाहे वे किसी मण्डली को सिखाते हों, छोटे बच्चों को सिखाते हों, या किसी अन्य सन्दर्भ में सिखाते हों। यह कोई छोटी बात नहीं है कि कोई व्यक्ति नियमित रूप से एक पवित्र परमेश्वर और उसके लोगों के बीच खड़ा होकर उसके वचन की घोषणा करे। यह एक भारी उत्तरदायित्व होने के साथ-साथ एक अद्‌भुत विशेषाधिकार भी है।

जैसे हमें अपने शिक्षकों और प्रचारकों के लिए प्रार्थना करनी चाहिए, वैसे ही हमें स्वयं भी विनम्र और उत्सुक होकर परमेश्वर के वचन की अधिकारपूर्ण शिक्षा को सुनने और सीखने के लिए तत्पर रहना चाहिए। प्रारम्भिक कलीसिया ने इस समर्पण का उदाहरण स्थापित किया, जब उन्होंने प्रेरितों की शिक्षा के प्रति स्वयं को समर्पित किया (प्रेरितों 2:42)। आज भी हमें उसी प्रकार समर्पित रहना चाहिए; हमें उस शिक्षा के प्रति प्रतिबद्ध होना चाहिए, जो प्रेरितों को प्रकट किए गए नए नियम के सत्यों पर आधारित है और जो पुराने नियम की सैद्धान्तिक शिक्षा की नींव पर निर्मित है।

हमें अपना समय व्यर्थ की चीज़ों में नहीं लगाना चाहिए—जैसे ऐसे टीवी कार्यक्रम देखने में जो केवल हमारे विचारों की पुष्टि करें, ऐसी पुस्तकें या वीडियो गेम में जो हमें वास्तविकता से दूर ले जाएँ। इसके बजाय, हमें परमेश्वर के वचन पर ध्यान केन्द्रित करना चाहिए। उसे ही अपना आत्मिक भोजन बनाएँ और आप पाएँगे कि प्रतिदिन परमेश्वर का आत्मा आपको उसकी सच्चाइयों और आनन्द में और भी गहराई तक ले जाता है।

भजन 119:81-96

पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: यहेजकेल 33–34; यूहन्ना 16 ◊

3 October : अंतिम, सार्वभौम, सर्वसमर्थ अशी प्रीति

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3 October : अंतिम, सार्वभौम, सर्वसमर्थ अशी प्रीति
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“परमेश्वर, परमेश्वर, दयाळू व कृपाळू देव, मंदक्रोध, स्थिर प्रीति व विश्वासूपण यात उदंड.” (निर्गम 34:6)

देव प्रीति व विश्वासूपण यात उदंड आहे.

तुलना म्हणून माझ्या मनात दोन चित्र येतात:

1. देवाचे मन पाण्याच्या सतत वाहणाऱ्या एका अशा झऱ्यासारखे आहे जे पर्वताच्या शिखरावरून प्रीति आणि विश्वासूपण यांचे बुड-बुडे फुलवते. हा झरा शतकानुशतके अखंडपणें वाहत राहतो.

2. किंवा देवाचे मन जणू एखाद्या ज्वालामुखीसारखे आहे जे प्रीतिच्या उष्णतेने इतके तापते कीं तिचा पर्वताच्या शिखरावर स्फोट होतो आणि मग प्रीति आणि विश्वासूपण ही लाव्हा बनून वर्षानुवर्षे वाहतांत.

जेव्हा देव “उदंड” ह्या शब्दाचा उपयोग करतो — “स्थिर प्रीति व विश्वासूपण यात उदंड” — तेव्हा अर्थ हा आहे कीं त्याच्या प्रीतिच्या झऱ्याला सीमा नाहींत हे आपण समजून घ्यावे आणि अनुभवाने जाणून घ्यावे अशी त्याची इच्छा आहे. तुम्हीं या डोंगराळ प्रदेशात वाहणाऱ्या झऱ्यातून दिवसभर, वर्षानुवर्षे, पिढ्यानपिढ्या पिऊ शकता, तरी तो कधीही कोरडा पडणार नाहीं.

तुम्हीं असे म्हणण्याचे देखील धाडस करू शकता कीं देव अशा सरकारसारखा आहे जो गरजेच्या प्रत्येक प्रसंगी अधिक पैसे छापतो. अविनाशी, नाहीं का? तरी, एक फरक आहे. देव जे सर्व पैसे छापतो त्याची बरोबरी करणारा असा सोनेरी प्रीतिचा उदंड खजिना देवाकडे आहे. सरकार स्वप्नांच्या दुनियेत जगते. परंतु देवाचे देवपणच या उदंड संसाधनांचा अत्यंत वास्तववादी उगम आहे.

देवाचे अंतिम देवपण, सार्वभौम स्वातंत्र्य आणि त्याचे सर्वसमर्थपण हे तो ज्वालामुखी आहे ज्यातून प्रीति उदंडपणें फुटून वाहते. देवाच्या ह्या परिपूर्ण थोरपणाचा असा अर्थ होतो कीं त्याला स्वतःमध्यें कोणतीही कमतरता भरून काढण्याची गरज नाहीं. उलट त्याचा हा उदंड स्वयंभूपणाचा (आत्मनिर्भरतेचा) गुण आपल्यावर त्याच्या प्रीतिचा वर्षाव करतो, म्हणजें आम्हां पापी लोकांवर – ज्यांना त्याची गरज आहे, आणि ज्याने येशूमध्यें स्वतःला उत्तम देणगी म्हणून दिलें.  

आपण त्याच्या प्रीतिवर डोळे झाकून अवलंबून राहू शकतो कारण आपण त्याच्या अंतिम देवपणावर, त्याच्या स्वतंत्र सार्वभौमत्वावर आणि त्याच्या अमर्याद सामर्थ्यावर विश्वास ठेवतो.

2 अक्तूबर : पुनर्स्थापना की प्रतिज्ञा

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2 अक्तूबर : पुनर्स्थापना की प्रतिज्ञा
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“उसने अपनी इच्छा का भेद उस भले अभिप्राय के अनुसार हमें बताया, जिसे उसने अपने आप में ठान लिया था कि समयों के पूरे होने का ऐसा प्रबन्ध हो कि जो कुछ स्वर्ग में है और जो कुछ पृथ्वी पर है, सब कुछ वह मसीह में एकत्र करे।” इफिसियों 1:9-10

अपने निबन्ध “ऑन फेयरी स्टोरीज़” में जे. आर. आर. टोल्किन उन कारणों के बारे में लिखते हैं, जिनकी वजह से लोग परीकथाओं की ओर आकर्षित होते हैं। ऐसी कहानियाँ अक्सर हमारे दैनिक समाचारों के विपरीत होती हैं: जहाँ वास्तविक जीवन में युद्ध, आर्थिक अस्थिरता, महामारी और दिल टूटने की घटनाएँ होती हैं, वहीं परीकथाएँ सुखद अन्त प्रस्तुत करती हैं, जो मानव हृदय की गहरी इच्छाओं को प्रतिबिम्बित करता है। टोल्किन सुझाव देते हैं कि इन इच्छाओं की जड़ में यह तड़प है कि मसीह इस संसार को सही करे—सभी चीज़ों को एक साथ लाए, सब कुछ पुनर्स्थापित करे, और संसार को उतना ही सुन्दर बनाए, जितना यह आदम के विद्रोह से पहले था। क्या आप भी नहीं चाहते कि परमेश्वर सब कुछ ठीक कर दे? क्या आप भी उस सुखद अन्त की लालसा नहीं रखते?

पवित्रशास्त्र में, और हमारे जीवन में भी, हमें बार-बार याद दिलाया जाता है कि हम अभी वहाँ तक नहीं पहुँचे हैं। हम एक पतित संसार में रहते हैं, जहाँ अलगाव, निराशा और विघटन व्याप्त है। पहले आदम ने पाप किया, और मृत्यु और अराजकता उसका परिणाम बनी। लेकिन फिर दूसरा आदम आया ताकि वह पहले आदम द्वारा किए गए काम को सुधार कर सब कुछ पुनर्स्थापित कर सके और वह पूरा कर सके जो कोई और नहीं कर सकता था। परमेश्वर सब कुछ ठीक करेगा। वास्तव में, उसने इसका आरम्भ कर भी दिया है।

पहली शताब्दी की कलीसियाओं को लिखे अपने पत्रों में पौलुस ने उनकी कठिनाइयों को पहचाना और उन्हें कम करके नहीं आँका; लेकिन उसने हमेशा अपने पाठकों को यह याद दिलाया कि एक दिन ऐसा आएगा “जब दुख समाप्त होंगे और पीड़ाएँ मिट जाएँगी,” और हमारी सभी इच्छाएँ पूरी हो जाएँगी।[1] उसने उन्हें प्रोत्साहित किया कि वे अपनी आँखें परम लक्ष्य पर टिकाए रखें, ताकि वे अपने तत्कालीन संघर्षों का सामना कर सकें।

जो उन्हें तब चाहिए था, वही हमें अब चाहिए। यदि आप केवल उन परिस्थितियों पर ध्यान केन्द्रित करेंगे, जो आपके सामने हैं और परमेश्वर के पुनर्स्थापना की प्रतिज्ञा को अपनी दृष्टि में नहीं लाएँगे, तो आप वास्तव में अपने सामने आने वाली समस्याओं से नहीं निपट पाएँगे। वे आपके नियन्त्रण से बाहर लगने लगेंगी। वे आपको निराश कर देंगी। वे आपकी आशा और आनन्द को छीन लेंगी। चाहे समस्याएँ वैश्विक हों, राष्ट्रीय हों, या व्यक्तिगत, सबसे अच्छा तरीका यही है कि आप परमेश्वर के वचन पर ध्यान केन्द्रित करें और याद रखें कि परमेश्वर का वचन परमेश्वर की योजना के बारे में क्या कहता है। एक सुखद अन्त होगा। एक समय आएगा जब सब कुछ एक सिद्ध राजा के अधीन एकजुट होगा।

वह क्या है जो आज आपको परेशान कर रहा है? समय के मामलों को पवित्र आत्मा की सहायता के द्वारा एक शाश्वत दृष्टिकोण से देखें और आप उसकी सिद्ध योजना में सुरक्षा प्राप्त करेंगे। आप इस संसार की पूरी कहानी के सभी विवरण अभी नहीं जान सकते, लेकिन आप यह ज़रूर जान सकते हैं कि जो लोग मसीह पर विश्वास रखते हैं, उनके लिए अन्तिम दृश्य एक ऐसा सुखद अन्त लाएगा जिससे अनन्तता का आरम्भ होगा—और यह कोई परीकथा नहीं है।

  यशायाह 65:17-25

◊ पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: यहेजकेल 30–32; यूहन्ना 15


[1] स्टूअर्ट टाऊण्ट, “देयर इज़ ए होप” (2007).

2 October : देव सनकी (मूडी) नाहीं

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2 October : देव सनकी (मूडी) नाहीं
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राष्ट्रांच्या मसलती परमेश्वर निरर्थक करतो; लोकांचे संकल्प निष्फळ करतो. परमेश्वराची योजना सर्वकाळ टिकते; त्याच्या मनातील संकल्प पिढ्यानपिढ्या कायम राहतात. (स्तोत्र 33:10-11)

“आमचा देव स्वर्गात आहे; त्याला योग्य दिसते ते सर्व तो करतो” (स्तोत्र 115:3). या शास्त्रलेखाचा अर्थबोध हा आहे कीं देवाला ज्या गोष्टींमध्यें आनंद मिळतो त्यां सर्व करण्याचा त्याला अधिकार आणि  सामर्थ्य आहे. देव सार्वभौम आहे या कथनाचा अर्थ हाच आहे.

काहीं क्षण यावर विचार करा : जर देव सार्वभौम आहे आणि त्याच्या इच्छेस येईल ते सर्व करण्यांस तो समर्थ आहे, तर त्याचा कोणताही संकल्प निष्फळ होऊ शकत नाहीं. “राष्ट्रांच्या मसलती परमेश्वर निरर्थक करतो; लोकांचे संकल्प निष्फळ करतो. परमेश्वराची योजना सर्वकाळ टिकते; त्याच्या मनातील संकल्प पिढ्यानपिढ्या कायम राहतात” (स्तोत्र 33:10-11).

आणि जर त्याचा कोणताही संकल्प निष्फळ होऊ शकत नाहीं, तर तो सर्व जीवितांमध्यें सर्वात अधिक आनंदी असला पाहिजे.

हाच असीम, ऊर्ध्वलोकीं आनंद तो झरा आहे ज्यातून ख्रिस्ती हेडोनिस्ट म्हणजें सुख हेच अंतिम उद्दिष्ट हा सिद्धांत मानणारा मनुष्य सातत्यानें पितो आणि जो अधिक खोलवर जाऊन प्यावयांस तळमळतो.

जगावर राज्य करणारा देव आनंदी नसता तर काय झालें असते याची तुम्हीं कल्पना करू शकता का? देव जर आकाशातल्या एखाद्या दैत्याप्रमाणें कुरकुर करणारा, चिडचिडपणानें वेडापिसा होणारा आणि दु:खाने खिन्न होऊन बसणारा असता तर? जर देव निराश, वैफल्यग्रस्त, खिन्न आणि हताश आणि असमाधानी आणि विषादपूर्ण वृत्तीचा असतां तर?

आपण दाविदाबरोबर असे म्हणू शकलो असतो का, “हे देवा, तू माझा देव आहेस; मी आस्थेने तुझा शोध करीन; शुष्क, रुक्ष व निर्जल प्रदेशात माझा जीव तुझ्यासाठीं तान्हेला झाला आहे, माझ्या देहालाही तुझी उत्कंठा लागली आहे” (स्तोत्र 63:1)? मला असे वाटत नाहीं.

आपण लेकरें म्हणून परमेश्वराला असे गणूं जसे एक निराश झालेला, खिन्न आणि हताश, व असंतुष्ट असा बाप असलेलीं बालकें त्याला गणतील. ते त्याच्यामध्यें आनंद करूं शकत नाहींत. ते फक्त त्याला त्रास न देण्याचा प्रयत्न करू शकतात किंवा कदाचित थोड्याफार स्वार्थासाठीं त्याचे ऐकण्याचा प्रयत्न करतील.

पण आमचा परमेश्वर तसा नाहीं. तो कधीही नैराश्याने किंवा असमाधानामुळें लहरी माणसासारखा चिडत नाहीं. आणि, स्तोत्र 147:11 मध्यें सांगितल्याप्रमाणें, “जे परमेश्वराचा आदर करतात,जे त्याच्या दयेची आशा धरतात त्यांच्याबरोबर तो आनंदित होतो.” म्हणून या देवाला टाळणें, वा त्याच्यापासून पळ काढणें किंवा त्याचा खिन्नपणा क्रोधाद्वारे प्रकट होऊ नये म्हणून दिवाणखान्यात डोकावून सुद्धा न पाहणें हा ख्रिस्ती हेडोनिस्टचा उद्दिष्ट नाहीं. नाहीं, उलट त्याच्या स्थिर प्रीतिची आशा धरणें हे आपले उद्दिष्ट असते. त्याच्याकडे धाव घेणें हे आपले उद्दिष्ट असते. देवामध्यें आनंद करणें, देवामध्यें हर्ष करणें, त्याचा सहवास आणि त्याची कृपा यांना आपल्या हृदयांत जपणें व त्यांत आनंद करणें हे आपले उद्दिष्ट आहे.

1 अक्तूबर : शरीर और आत्मा

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1 अक्तूबर : शरीर और आत्मा
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“जब मैं चुप रहा तब दिन भर कराहते-कराहते मेरी हड्डियाँ पिघल गईं। क्योंकि रात दिन मैं तेरे हाथ के नीचे दबा रहा; और मेरी तरावट धूप काल की सी झुर्राहट बनती गई।” भजन 32:3-4

जो लोग मनोविज्ञान, मनोरोग और सामाजिक सेवाओं के क्षेत्रों में काम करते हैं, वे अक्सर इस तथ्य का सामना करते हैं कि किसी व्यक्ति के हृदय और मन में जो कुछ हो रहा है, उसका गहरा प्रभाव उसके शरीर में भी दिखाई देता है। परमेश्वर का वचन इस सम्बन्ध पर प्रकाश डालता है और फिर और भी गहराई तक जाता है, क्योंकि यह हमें बताता है कि हमारे शरीर की स्थिति और हमारी आत्मा की स्थिति के बीच एक सम्बन्ध है।

भजन 32 में, दाऊद परमेश्वर से बहुत व्यक्तिगत रूप से बात करता है और उस बोझ को स्वीकार करता है, जिसे उसने तब अनुभव किया जब वह अन्धकार में छिपा रहा और बतशेबा के साथ किए गए अपने पाप और उसके पति ऊरिय्याह की हत्या को स्वीकार करने से इनकार करता रहा (2 शमूएल 11 देखें)। दाऊद के माध्यम से पवित्र आत्मा हमें सिखाता है कि एक व्याकुल विवेक, पश्चाताप की कमी और हमारे शारीरिक स्वास्थ्य के बीच एक सम्बन्ध है। जो लोग दाऊद के निकट थे, शायद वे यह नहीं जान सके थे कि उसकी आत्मा के भीतर क्या चल रहा था, लेकिन वे उसके शरीर में हो रहे परिवर्तनों को नज़रअंदाज़ नहीं कर सकते थे।

जो विवरण वह देता है, वह अन्य स्थानों पर दिए गए उसके विवरण को और अधिक स्पष्ट करता है: “मेरा हृदय धड़कता है, मेरा बल घटता जाता है; और मेरी आँखों की ज्योति भी मुझ से जाती रही। मेरे मित्र और मेरे संगी मेरी विपत्ति में अलग हो गए, और मेरे कुटुम्बी भी दूर जा खड़े हुए” (भजन 38:10-11)। यह बहुत ही विनाशकारी चित्र प्रस्तुत करता है।

दाऊद ने अपनी स्थिति को पहचाना कि यह एक दण्ड था। बाइबल स्पष्ट रूप से बताती है कि वासना, अतिरेक और परमेश्वर की आज्ञाओं की अवहेलना के स्वाभाविक परिणाम निकलते हैं (रोमियों 1:24-25 देखें)—और इन सभी में दाऊद दोषी था। दुर्बलता, वज़न घटना, अनिद्रा, अस्वीकृति की भावना, उदासी, चिन्ता और निराशा अक्सर उन लोगों को सताती है, जो अपने पाप को परमेश्वर से छिपाने और स्वयं इन्हें स्वीकार न करने का प्रयास करते हैं।

जिस बात ने दाऊद को पुनः स्थापित किया, वह कोई स्वास्थ्य सुधार योजना या जल्दी सोने जाना नहीं था, बल्कि उसके पाप की जड़ से निपटना था: “जब मैंने अपना पाप तुझ पर प्रगट किया . . . तब तूने मेरे अधर्म और पाप को क्षमा कर दिया” (भजन 32:5)। परमेश्वर ने अपनी शक्ति से दाऊद को तब तक दबाए रखा, जब तक कि उसने अपने पाप को परमेश्वर के हाथों में सौंपकर उससे समाधान नहीं माँगा। यह हमारे लिए आशीष है कि परमेश्वर हमें हमारे पाप को भूलने नहीं देता—जब हमें अपनी आत्मिक बीमारी के कारण शारीरिक भारीपन का अनुभव होता है। यह हमें वह करने के लिए प्रेरित करने का उसका तरीका है, जिसकी हमें सबसे अधिक आवश्यकता है, अर्थात अपने पाप को स्वीकार करना और उसकी क्षमा माँगना।

क्या आप कोई पाप छिपा रहे हैं? उसे छिपाएँ नहीं; उसे स्वीकार करें। जब दाऊद ने परमेश्वर की क्षमा माँगी, तो उसे अपने कष्टों से मुक्तिदायक राहत मिली। आप भी उसी आनन्द का अनुभव कर सकते हैं, क्योंकि परमेश्वर के वचन की प्रतिज्ञा है कि “यदि हम अपने पापों को मान लें, तो वह हमारे पापों को क्षमा करने और हमें सब अधर्म से शुद्ध करने में विश्वासयोग्य और धर्मी है” (1 यूहन्ना 1:9)।

भजन 51

पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: यहेजकेल 27–29; यूहन्ना 14 ◊