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27 सितम्बर : वे अपने फल से पहचाने जाते हैं

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27 सितम्बर : वे अपने फल से पहचाने जाते हैं
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“कोई अच्छा पेड़ नहीं जो निकम्मा फल लाए, और न तो कोई निकम्मा पेड़ है जो अच्छा फल लाए। हर एक पेड़ अपने फल से पहचाना जाता है।” लूका 6:43-44

छात्र हमेशा अपने शिक्षकों की शिक्षा का प्रतिबिम्ब होते हैं। चाहे कोई छात्र अपने शिक्षक की क्षमताओं से कहीं आगे क्यों न बढ़ जाए, वह हमेशा उस मार्गदर्शन का ऋणी रहेगा जो उसे मिला था।

जब यीशु ने पेड़ों और उनके फलों के बारे में कहा, तो उनका ध्यान अपने समय के आत्मिक अगुवों की ओर था। इस शिक्षा के माध्यम से उसने हमें एक चेतावनी दी—कि हम गलत शिक्षक का चुनाव न करें। और हम यह कैसे जानें कि कौन-सा शिक्षक अच्छा है और कौन बुरा? यीशु कहता है—उसके फलों से, अर्थात् उनकी शिक्षा और आचरण से जो परिणाम निकलते हैं, वे बताएँगे कि वह शिक्षक कैसा है।

जब हम फलों की बात करते हैं, तो हम शिक्षक के चरित्र के सम्बन्ध में बात कर रहे हैं—और चरित्र को केवल बोलने की कला या प्रतिभा से नहीं परखा जा सकता। यीशु ने जब दाखलता और डाली की बात की, तो वहाँ यह स्पष्ट होता है कि फलवन्त होने का अर्थ मसीह के समान होना है (यूहन्ना 15:1–8)। हर पेड़ उसके फल से पहचाना जाता है। इसलिए आत्मा का फल—प्रेम, आनन्द, शान्ति, धीरज, कृपा, भलाई, विश्वास, नम्रता, और संयम (गलातियों 5:22–23)—एक अच्छे शिक्षक के जीवन में स्पष्ट रूप से प्रकट होगा।

हमें शिक्षक की शिक्षा की सामग्री को भी परखना चाहिए। पौलुस ने जब अपने प्रिय सेवक तीमुथियुस को लिखा, तो उसने इस मसले पर कहा: “अपनी चौकसी रख”—अर्थात् अपने चरित्र की—“और अपने उपदेश की चौकसी रख” (1 तीमुथियुस 4:16)। क्योंकि हर वह व्यक्ति जो बाइबल लेकर आता है, जरूरी नहीं कि आपके हित में ही बोलता हो। हर वह व्यक्ति जो मसीह का नाम लेता है, जरूरी नहीं कि वह परमेश्वर के वचन का सच्चा शिक्षक हो। झूठे भविष्यवक्ताओं की भरमार है। इसलिए मसीही विश्वासियों के लिए यह अनिवार्य है कि वे बाइबल से सीखें, न केवल पवित्रता में बढ़ने के लिए, बल्कि सही शिक्षा को पहचानने के लिए भी—जो कि एक परमेश्वर-भक्त शिक्षक की पहचान है। हमें इस तथ्य से भी ढाढ़स मिलना चाहिए कि पवित्र आत्मा हमारे भीतर निवास करता है, जो हमें सब बातों की शिक्षा देता है और सत्य व असत्य के बीच अन्तर समझने की बुद्धि देता है (1 यूहन्ना 2:27)।

एक शिक्षक के चरित्र और उसकी शिक्षा की सामग्री में गहरा सम्बन्ध होता है—और इसका सीधा असर उस व्यक्ति पर पड़ता है जो उससे शिक्षा प्राप्त करता है। इसलिए अपने आत्मिक शिक्षकों और मार्गदर्शकों का चुनाव सोच-समझकर करें। उनकी बोलने की कला या सांस्कृतिक समझदारी या आत्मविश्वास या हास्य या लोकप्रियता को मत देखें—बल्कि देखें कि उनका चरित्र कैसा है और वे क्या सिखा रहे हैं। क्योंकि इसमें कोई सन्देह नहीं कि आपके जीवन में वही फल दिखाई देगा, जो आप अपने शिक्षक से सीखते हैं। जब लोग आपके पास आएँगे, तो वे क्या पाएँगे? क्या वे आलोचना, कटुता, अभिमान या आत्म-धार्मिकता पाएँगे? क्या वे उत्साह की कमी और विश्वास की दुर्बलता पाएँगे? या फिर, क्या वे प्रेम, आनन्द, शान्ति और धार्मिकता के मधुर फल को चख पाएँगे?

2 तीमुथियुस 2:15-26

पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: यहेजकेल 18–19; यूहन्ना 12:1-26 ◊

27 September : अधिक उत्तम अभिवचनाचे सामर्थ्य

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27 September : अधिक उत्तम अभिवचनाचे सामर्थ्य
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मी मोकळेपणाने चालेन, कारण मी तुझ्या नीतिनियमांचा आश्रय केला आहे. (स्तोत्र 119:45, माझे भाषांतर)

स्वातंत्र्य हे पूर्णानंदाचा एक आवश्यक घटक आहे. आपल्याला ज्या गोष्टीचा तिटकारा वाटतो तिजपासून जर आपण बंधमुक्त नाहीं आणि ज्यां गोष्टीवर आपण प्रीति करतो ती करण्यासाठीं जर आपण स्वतंत्र नाहीं तर आपल्यापैकीं कोणीही आनंदी असणार नाहीं.

आपल्याला हे खरे स्वातंत्र्य कुठे मिळते? स्तोत्र 119:45 म्हणते, “मी मोकळेपणाने चालेन, कारण मी तुझ्या नीतिनियमांचा आश्रय केला आहे.”

येथें जे चित्र आहे ते मोकळेपणाने वावरण्यासंबंधीचे आहे. वचन आपल्याला क्षुल्लक शहाणपणापासून बंधमुक्त करते. “परमेश्वराने शलोमोनला……समुद्रकाठच्या वाळूप्रमाणें मोजमाप काढता येत नाहीं इतके फार मोठे शहाणपण व अगाध समज दिली होती” (1 राजे 4:29). वचन आपल्याला आपल्या जिवावर उठलेल्या बंदिवासातून बंधमुक्त करते. “त्यांनी मला प्रशस्त ठिकाणी आणले” (स्तोत्र 18:19).

येशूनें म्हटलें, “तुम्हांला सत्य समजेल व सत्य तुम्हांला बंधमुक्त करील” (योहान 8:32). तो हे बोलत असतांना त्याच्या मनात जे स्वातंत्र्य होते ते पापाच्या गुलामगिरीपासून मुक्तीचे स्वातंत्र्य होते (योहान 8:34). किंवा, सकारात्मक दृष्टिने सांगायचे तर, ते स्वातंत्र्य पवित्रतेसाठीं असलेले स्वातंत्र्य आहे.

देवाच्या कृपेची अभिवचने ते सामर्थ्य देतांत ज्यामुळें देवानें आम्हांकडून पवित्र जीवनाविषयी केलेंली अपेक्षा आम्हांला भीतीदायक आणि बंधन वाटण्या ऐवजी स्वातंत्र्याचा अनुभव बनवते. पेत्राने देवाच्या अभिवचनांच्या बंधमुक्त करणाऱ्या सामर्थ्याचे वर्णन यां शब्दांत केलें : “त्यांच्या योगे मोलवान व अति महान अशी वचने आपल्याला देण्यात आली आहेत, ह्यासाठीं कीं, त्यांच्या द्वारे तुम्हीं वासनेपासून उत्पन्न होणारी जगातील भ्रष्टता चुकवून ईश्वरी स्वभावाचे वाटेकरी व्हावे” (2 पेत्र 1:4 ).

याचा अर्थ असा कीं, आपण देवाच्या अभिवचनांवर विश्वास ठेवतो, तेव्हा आपण अधिक उत्तम अभिवचनाच्या सामर्थ्याने भ्रष्टता व कामवासना यांचे मूळ उपटून काढतो.

काल्पनिक खोट्या सुखांचे सामर्थ्य मोडून टाकणारे हे वचन किती आवश्यक आहे! तर मग, देवाच्या वचनाने आपला मार्ग प्रकाशित व्हावा आणि ते आपल्या मनात जपून राहावे म्हणून आपण किती जागरूक असले पाहिजे!

“तुझे वचन माझ्या पावलांसाठीं दिव्यासारखे व माझ्या मार्गावर प्रकाशासारखे आहे” (स्तोत्र 119:105). “मी तुझ्याविरुद्ध पाप करू नये म्हणून मी आपल्या मनात तुझे वचन जपून ठेवले आहे” (स्तोत्र 119:11).

26 सितम्बर : तिनका और लट्ठा

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26 सितम्बर : तिनका और लट्ठा
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“जब तू अपनी ही आँख का लट्ठा नहीं देखता, तो अपने भाई से कैसे कह सकता है, ‘हे भाई; ठहर जा तेरी आँख से तिनके को निकाल दूँ’? हे कपटी, पहले अपनी आँख से लट्ठा निकाल, तब जो तिनका तेरे भाई की आँख में है, उसे भली भाँति देखकर निकाल सकेगा।” लूका 6:42

मुझे एक बार की घटना याद है—मैं एक परीक्षा में डेस्क पर बैठा था, जैसे ही मैंने प्रश्न-पत्र पलटा, तुरन्त ही मैं इधर-उधर देखने लगा कि क्या बाकी सभी लोग भी पहले प्रश्न को देखकर उतने ही परेशान हैं जितना मैं था। तभी शिक्षक की सख़्त आवाज़ आई: “दूसरों को मत देखो, खुद पर ध्यान दो!”

यीशु भी इन पदों में कुछ ऐसा ही कहता है—एक प्रभावशाली उपमा के ज़रिए वह अपने श्रोताओं को यह सिखाता है कि दूसरों के पापों की ओर अंगुली उठाने से पहले उन्हें अपने पापों से निपटना चाहिए। यीशु ने “तिनके” के लिए जिस शब्द का प्रयोग किया है, वह आमतौर पर भूसे या लकड़ी के बहुत ही छोटे कणों के लिए इस्तेमाल होता है। इसके विपरीत, “लट्ठे” का भाव किसी घर की छत का भार-वहन करने वाली बड़ी लकड़ी से है। अगर मेरी आँख में ऐसा लट्ठा है, तो यह स्पष्ट है कि दूसरे की आँख का तिनका निकालने से पहले मेरी आँख के लट्ठे को निकाला जाना ज़रूरी है।

पतित मनुष्यों के रूप में हम अक्सर यह सोचने की प्रवृत्ति रखते हैं कि अपनी आत्मिक स्थिति का ध्यान रखने से पहले दूसरों की आत्मिक स्थिति को सुधारना हमारी प्राथमिक ज़िम्मेदारी है। लेकिन मसीह ने हमें इसलिए नहीं बुलाया है कि हम प्राथमिक और प्रारम्भिक रूप से पहले दूसरों की आँखों से तिनके निकालें। नहीं, वह कहता है कि पवित्रशास्त्र के प्रकाश में और उसके द्वारा ठहराए गए मापदण्ड के अनुसार हमें स्वयं को परखना है।

यीशु की यह शिक्षा हमारे सामने एक बड़ी चुनौती रखती है। कई बार हम दूसरों की गलतियों को इस बहाने उजागर करते हैं कि हम उनकी आत्मिक भलाई चाहते हैं। लेकिन यदि हमने पहले अपने ही पापों के प्रति ईमानदारी और कठोरता नहीं दिखाई, तो वह केवल पाखण्ड है! हम अक्सर इस झूठे विचार का शिकार हो जाते हैं कि यदि मैं तुम्हारी गलती पकड़ लूँ और तुम्हें सुधार दूँ, तो शायद मुझे अपने पापों से निपटने की ज़रूरत नहीं पड़ेगी। दूसरों की दशा पर बात करना अक्सर अपने हृदय की सच्चाई से सामना करने से आसान लगता है।

यदि हम वास्तव में दूसरों की सहायता करना चाहते हैं, तो पहले हमें अपने हृदय की गम्भीर अवस्था को पहचानना होगा—जैसा कि रॉबर्ट मुरे म’शेन ने कहा था: “सभी पापों के बीज मेरे हृदय में हैं।”[1] जब हम यह सच्चाई स्वीकार कर लेते हैं और उस पर विश्वास करते हैं, तब जब हम दूसरों की ओर जाते हैं, तो हम नम्रता और प्रेम के निम्न स्तर पर खड़े होते हैं, न कि अहंकार और पूर्वानुमान के ऊँचे स्तर पर। इन दोनों दृष्टिकोणों के बीच का अन्तर सम्पूर्ण जीवन का अन्तर है।

यहूदा 20-25

◊ पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: यहेजकेल 16–17; यूहन्ना 11:28-57


[1] एण्ड्रू बोनार, मेमोयर ऐण्ड रिमेंस ऑफ रॉबर्ट मुरे म’शेन (बैनर ऑफ ट्रुथ, 1995) में उद्धृत, पृ. 153.

26 September : देवाच्या सार्वभौम सामर्थ्यावर विश्वास ठेवत जगणें

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26 September : देवाच्या सार्वभौम सामर्थ्यावर विश्वास ठेवत जगणें
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जे आपण विश्वास ठेवणारे त्या आपणांविषयीच्या त्याच्या सामर्थ्याचे अपार महत्त्व. . . (इफिस 1:19)

देवाचे अपार सामर्थ्य हे देवाच्या सार्वकालिक गौरवांत असलेले युगानुयुगाचे व खंबीर आश्रयस्थान आहे मग या पृथ्वीवर कोणत्याही परिस्थिती उद्भवल्या तरी त्यानें काहीं फरक पडत नाहीं. आणि हाच दृढ विश्वास देवानें केलेंले पाचारण पूर्ण आज्ञाधारकपणें अनुसरण्याचा स्रोत आणि सामर्थ्य आहे.

सर्वसमर्थ देव हा तुमचा आश्रय आहे या सत्यापेक्षा अधिक स्वतंत्र करणारे, अधिक पराक्रमी किंवा अधिक बळकट करणारे काहीं आहे का — तेहि दिवसभर, दररोज, जीवनातील सर्वसामान्य आणि असामान्य अशा सर्व घडामोडींमध्यें?

जर आपण यावर विश्वास ठेवला, जर आपण खरोखरच देवाच्या सर्वसमर्थपणाचे हे सत्य समजून घेतले तर आपल्या वैयक्तिक जीवनात आणि आपल्या सेवाकार्यात किती बदल घडून येतील! तारण करण्याच्या देवाच्या संकल्पांसाठीं आपण किती नम्र आणि सामर्थ्यवान बनू!

देवाचा सर्वसमर्थपणाचा गुणविशेष हा देवाच्या लोकांसाठीं आश्रयस्थान आहे. आणि सर्वसमर्थ देवाचा हा सर्वसमर्थपणाचा गुणविशेष तुमचे आश्रयस्थान आहे असा विश्वास तुम्हीं ठेवतां, तेव्हा तुम्हांला असा आनंद, असे एक स्वातंत्र्य आणि असे सामर्थ्य प्राप्त होते जे आमच्या जीवनाला येशू ख्रिस्ताप्रत मौलिक आज्ञाधारकपणाने व्यापून टाकते.

देवाचा सर्वसमर्थपणाचा गुणविशेष हा त्याच्या कराराच्या लोकांसाठीं आदर, शत्रूकडून सूड आणि आश्रयस्थान आहे.

मी तुम्हांला त्याच्या कृपेच्या कराराच्या अटी स्वीकारण्यासाठीं आव्हाहन करतो : आपल्या पापापासून वळा आणि प्रभु येशू ख्रिस्तावर विश्वास ठेवा; आणि सर्वसमर्थ देवाचा सर्वसमर्थपणाचा जो गुणविशेष आहे तो तुमच्या जिवासाठीं आदर, तुमच्या शत्रूंकडून सूड आणि तुमच्या जीवनाचा आश्रय ठरेल – सर्वकाळासाठीं.

25 सितम्बर : क्षमाशीलता की विशालता

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25 सितम्बर : क्षमाशीलता की विशालता
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“क्षमा करो, तो तुम्हें भी क्षमा किया जाएगा। दिया करो, तो तुम्हें भी दिया जाएगा।” लूका 6:37-38

हमारे हृदय और सोच को जितनी जल्दी कोई चीज़ भ्रष्ट कर सकती है, वह है क्षमा न करने वाला हृदय। लेकिन इसका उल्टा भी उतना ही सत्य है: सच्चे दिल से क्षमा देने के अनुभव के अतिरिक्त और कुछ नहीं है, जो हमें इतनी जल्दी आन्तरिक स्वतन्त्रता, आनन्द और शान्ति देता है। वास्तव में, किसी को क्षमा करने की हमारी तत्परता ही हमारे आत्मिक जीवन की एक कसौटी है; जब हम पूरे दिल से क्षमा करते हैं, तो यह प्रमाण होता है कि हम वास्तव में परमप्रधान परमेश्वर के पुत्र और पुत्रियाँ हैं (लूका 6:35)।

हमें क्षमा किए जाने और हमारी ओर से क्षमा दिए जाने की इच्छा को यीशु प्रायः एक साथ रखता है (लूका 11:4 देखें)। इसलिए जब हम क्षमा करने के अभ्यास की बात करते हैं, तो सबसे पहले यह पूछा जाना चाहिए: हमें क्षमा कहाँ से प्राप्त होती है? उत्तर है—सच्ची क्षमा का स्रोत केवल परमेश्वर ही है। परमेश्वर की दया की प्रचुरता से ही क्षमा बहती है।

क्षमा हमारी आत्मा के जीवन और स्वास्थ्य के लिए उतनी ही आवश्यक है, जितना शारीरिक भोजन हमारे शरीर के लिए। पवित्रशास्त्र बार-बार हमें यह याद दिलाता है कि परमेश्वर एक क्षमाशील परमेश्वर है। भजनकार कहता है: “हे याह, यदि तू अधर्म के कामों का लेखा ले, तो हे प्रभु, कौन खड़ा रह सकेगा? परन्तु तू क्षमा करने वाला है” (भजन संहिता 130:3-4)। इसी तरह भविष्यद्वक्ता दानिय्येल कहता है: “तू दया का सागर और क्षमा की खान है” (दानिय्येल 9:9)। और परमेश्वर का पुत्र, जब उसपर थूका गया, उसे अपमानित किया गया, उसके वस्त्र छीन लिए गए, क्रूस पर कीलों से जड़ दिया गया और दो अपराधियों के बीच तड़पता हुआ छोड़ दिया गया—तब भी उसने यह कहा: “हे पिता, इन्हें क्षमा कर” (लूका 23:34)। परमेश्वर की क्षमा की भावना अतुलनीय है।

यीशु मसीह पर विश्वास के द्वारा जब हम परमेश्वर की सन्तान बन जाते हैं, तो हमें भी अपने पिता और प्रभु का अनुकरण करते हुए क्षमा का अभ्यास करना है। यह मसीही जीवन का इतना मूलभूत हिस्सा है कि यीशु यहाँ तक कहता है कि यदि हम क्षमा करने को तैयार नहीं हैं, तो हमें गम्भीरता से यह पूछना चाहिए कि क्या हम वास्तव में क्षमा किए गए हैं—अर्थात्, क्या हमने सच में सुसमाचार को अपने हृदय में ग्रहण किया है? (मत्ती 6:14-15 देखें)। यदि आपने अपने हृदय में क्षमा न करने का भाव छिपा रखा है, तो उसे अनदेखा न करें, न ही उसे छोटा समझें। इसके बजाय, सुसमाचार को उसमें प्रवेश करने दें। यह विचार करें कि मसीह के द्वारा आपको कितनी बड़ी क्षमा मिली है। अपने पिता की क्षमाशील प्रकृति को याद करें, जिसे आपको अपने जीवन में प्रकट करना चाहिए। क्षमा न करने के भाव को एक विनाशकारी बोझ और जीवन को खोखला कर देने वाला प्रभाव समझें। विशेष रूप से यह सोचें: किसे क्षमा करना है, और कैसे? यही वह मार्ग है जिस पर चलकर हम उस शान्ति और स्वतन्त्रता का अनुभव कर सकते हैं, जो क्षमा देने से आती है—वैसी ही क्षमा जैसी हमें स्वयं मिली है।

लूका 7:36-50

पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: यहेजकेल 14–15; यूहन्ना 11:1-27 ◊

25 September : देवाचे वचन जीवनाधार आहे

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25 September : देवाचे वचन जीवनाधार आहे
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तेव्हा तो त्यांना म्हणाला: “आज मी ज्या नियमशास्त्रामधील आज्ञा तुमच्यापुढे जाहीर केल्या आहेत, त्याला हृदयात साठवून ठेवा आणि तुमच्या मुलाबाळांना काळजीपूर्वक रीतीने त्यांचे पालन करण्यास शिकवा. कारण हे केवळ पोकळ शब्द नाहींत—तर ते तुमचे जीवन आहे. त्याद्वारे यार्देनेच्या पलीकडें असलेला जो देश तुम्हीं ताब्यात घेणार आहात, त्या देशात तुम्हीं दीर्घकाल जगाल.” (अनुवाद 32:46-47)

देवाचे वचन म्हणजें थट्टामस्करी नाहीं; हा जीवन आणि मरणाचा प्रश्न आहे. जर तुम्हीं शास्त्रवचनांना खेळ किंवा पोकळ शब्द समजता तर तुम्हीं खऱ्या जीवनास मुकाल.

आपलें हे भौतिक जीवन देवाच्या वचनावर अवलंबून आहे, कारण त्याच्या शब्दाने आपल्याला निर्माण केलें गेले होते (स्तोत्र 33:6; इब्री 11:3), आणि “आपल्या सामर्थ्याच्या शब्दाने विश्वाधार आहे” (इब्री 1:3).

आणि आपल्या आध्यात्मिक जीवनाचा आरम्भ देवाच्या वचनाने होतो : “त्यानें स्वतःच्या इच्छेने आपल्याला सत्यवचनाने जन्म दिला.” (याकोब 1:18). “देवाच्या जिवंत व सर्वकाल टिकणार्‍या’ शब्दाच्या द्वारे पुन्हा जन्म पावलेले आहात” (1 पेत्र 1:23).

आपण देवाच्या वचनाद्वारे केवळ पुन्हा जन्म पावलेले नाहीं, तर आपण जगतो तेही केवळ देवाच्या वचनाने : “मनुष्य केवळ भाकरीने नव्हे, तर परमेश्वराच्या मुखातून निघणार्‍या वचनाने जगेल” (मत्तय 4:4; अनुवाद 8 :3).

तर मग आपलें भौतिक जीवन देवाच्या वचनाद्वारे निर्माण झालें आहे आणि त्याद्वारेच टिकून राहते, त्याचप्रमाणें आपलें आध्यात्मिक जीवन देखील देवाच्या वचनाने नव्याने जन्मलेले आहे आणि टिकून राहते. देवाच्या वचनाच्या जीवन देणाऱ्या सामर्थ्याची साक्ष देण्यासाठीं अशा किती तरी गोष्टी सांगता येतील!

खरंच, बायबल “हे केवळ पोकळ शब्द नाहींत” — ते तुमचे जीवन आहे! सर्व आनंदाचा पाया जीवन आहे. जे चिरकाळ टिकून राहते, म्हणजें ज्याद्वारे आपली निर्मिती झालीं आणि आपल्याला राखले जाते, त्यापेक्षा मूलभूत व महत्वाचे काहींही नाहीं.

हे सर्व केवळ देवाच्या सामर्थ्यवान वचनामुळें आहे. त्याच सामर्थ्याने, तो आमचे आध्यात्मिक जीवन अस्तित्वात आणण्यासाठीं आणि त्याचे पालनपोषण करण्यासाठीं पवित्र शास्त्रात बोलला आहे. म्हणून, बायबल हे केवळ पोकळ शब्द नाहींत, तर तुमचे जीवन आहे – तुमच्या आनंदाचा पाया आणि प्रकाश!

24 सितम्बर : जीवन बोलो, दोष नहीं

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24 सितम्बर : जीवन बोलो, दोष नहीं
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“दोष मत लगाओ, तो तुम पर भी दोष नहीं लगाया जाएगा। दोषी न ठहराओ, तो तुम भी दोषी नहीं ठहराए जाओगे।” लूका 6:37

अक्सर हम इस भ्रम में पड़ जाते हैं कि हमें दूसरों पर दोष लगाने का अधिकार है—क्योंकि यह हमारी पापमयी प्रवृत्ति को भाता है। सच कहें तो, जैसे ही हमें नेतृत्व या अधिकार की कोई भी स्थिति मिलती है—चाहे वह छोटी हो या बड़ी—हमें आश्चर्यजनक रूप से जल्दी यह प्रलोभन घेर लेता है कि हम दया दिखाने की बजाय दोष लगाने लगें।

हमें याद रखना चाहिए कि हम दोष लगाने के योग्य नहीं हैं। क्यों? क्योंकि हम किसी दूसरे के दिल को नहीं पढ़ सकते। हम किसी के इरादों का सही आकलन नहीं कर सकते। केवल परमेश्वर ही यह कह सकता है: “हृदय और मन का परखने वाला मैं ही हूँ, और मैं तुममें से हर एक को उसके कामों के अनुसार बदला दूँगा” (प्रकाशितवाक्य 2:23)। चूंकि आप और मैं परमेश्वर नहीं हैं, इसलिए हम दोष लगाने के अधिकारी नहीं हैं। हम यीशु की इस आज्ञा को सबसे ज़्यादा और सबसे आसानी से किस तरह तोड़ते हैं? अपनी जीभ से। हम दूसरों की बदनामी करके उनके चरित्र पर दोष लगा देते हैं। मसीही समाज में हम अक्सर बड़ी चालाकी से इस तरह की चुगली को प्रार्थना निवेदन या चिन्ता के रूप में पेश करते हैं—लेकिन सच्चाई यह है कि अक्सर हमें यह कहने में एक अजीब-सी खुशी मिलती है: “क्या तुमने उसके बारे में यह सुना है?” “क्या तुम जानते हो उसने ऐसा क्यों किया?” “तुम्हें मालूम है उसके साथ क्या हुआ?” यह वही भाव है जो फरीसियों में था—दूसरों को दोषी ठहराकर खुद को ऊँचा दिखाना। यह प्रवृत्ति आज भी मसीहियों के बीच जीवित है।

इसीलिए हमें अपने शब्दों के प्रयोग को लेकर बेहद सतर्क रहना चाहिए। अपनी जीभ दोष लगाने की बजाय, हमें पवित्र आत्मा से प्रार्थना करनी चाहिए कि वह हमें जीवनदायक शब्द बोलने का सामर्थ्य दे। मुँह खोलने से पहले हमें मिशनरी एमी कार्माइकल की इस सलाह को याद रखना चाहिए और स्वयं से पूछना चाहिए: “क्या जो मैं कहने जा रहा हूँ, वह दयालु है? क्या वह सत्य है? क्या वह आवश्यक है?” पवित्रशास्त्र इस विषय पर पूर्णतः स्पष्ट है। वास्तव में, नीतिवचन की पुस्तक हमें सिखाती है: “मूर्ख का विनाश उसकी बातों से होता है, और उसके वचन उसके प्राण के लिए फन्दे होते हैं,” लेकिन “विश्वासयोग्य मनुष्य बात को छिपा रखता है” (नीतिवचन 18:7; 11:13)।

हमें यीशु में एक ऐसा उद्धारकर्ता मिला है, जिसका लहू हमारे हर लापरवाह शब्द और हर निन्दात्मक टिप्पणी से हमें शुद्ध करता है—एक ऐसा उद्धारकर्ता जो हमें उस पापी प्रवृत्ति से क्षमा करता है, जो हमें परमेश्वर की भूमिका हथिया लेने की ओर खींचती है। इस सच्चाई के प्रकाश में, हमें प्रतिदिन अपनी जीभ के पापों के लिए पश्चाताप करना चाहिए और पवित्र आत्मा से प्रार्थना करनी चाहिए कि वह हमारे मन में एक नई लालसा उत्पन्न करे—कि हमारे मुँह के वचन और हमारे हृदय का ध्यान उसके सम्मुख ग्रहण योग्य हों (भजन संहिता 19:14)।

लूका 6:37-45

◊ पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: यहेजकेल 11–13; यूहन्ना 10:22-42

24 September : येशूचा आनंदाचा पाठलाग

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24 September : येशूचा आनंदाचा पाठलाग
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आपण आपल्या विश्वासाचा उत्पादक व पूर्ण करणारा येशू ह्याच्याकडें पाहत असावे; जो आनंद त्याच्यापुढे होता त्याकरता त्यानें लज्जा तुच्छ मानून वधस्तंभ सहन केला, आणि तो देवाच्या राजासनाच्या उजवीकडें बसला आहे. (इब्री 12:2)

येशूचे उदाहरण ख्रिस्ती पूर्णानंदाच्या तत्त्वाशी विरोधक आहे का? म्हणजें हे कीं, प्रीति आनंदाचा मार्ग आहे आणि हे कीं मनुष्यानें याच कारणामुळें हा मार्ग निवडला पाहिजे, असे न होवो कीं कोणी सर्वशक्तिमान देवाची आज्ञा पाळण्याच्या बाबतींत गोंधळात पडलेला किंवा कृपेचे साधन बनण्याच्या विशेषाधिकाराशी असंतुष्ट असलेला किंवा प्रतिज्ञेच्या  प्रतिफळांना कमी लेखताना आढळून येवो.

इब्री लोकांस 12:2 अगदी स्पष्टपणें सांगतांना दिसून येते कीं येशूनें या तत्त्वावर आक्षेप घेतला नाहीं वा त्याचा नकार केला नाहीं.

आजवर घडलेले प्रीतिचे सर्वात मोठे परिश्रम शक्य झालें कारण येशूनें जो सर्वात मोठा आनंद त्याच्यापुढे होता त्याकडें आपली दृष्टि लावली, म्हणजें, लोकांच्या सभेत देवाच्या राजासनाच्या उजवीकडें उंच केलेंल्याचा आनंद : म्हणजें तो आनंद ज्याकरता “त्यानें लज्जा तुच्छ मानून वधस्तंभ सहन केला!”

हे सांगताना, लेखक येशूचे आणखी एक उदाहरण देतो, आणि त्यांत तो इब्री 11 मध्यें वर्णिलेल्या इतर पवित्रजनांचाहि उल्लेख करतो, म्हणजें त्यांचे उदाहरण जें त्यांच्यापुढे देवानें ठेविलेल्या आनंदासाठीं इतके आवेशी आणि विश्वासाने भरलेले होते कीं त्यांनी “पापाचे क्षणिक सुख भोगणें” सुद्धा नाकारले (इब्री 11: 25) आणि देवाच्या इच्छेशी एकरूप होण्यासाठीं दुःख सोसणें पसंत करून घेतले.

म्हणून, गेथसेमानेच्या त्या काळोख्या रात्री ख्रिस्ताला ज्या गोष्टीने दुख सहनांत टिकवून ठेवले तिचे किमान एक पक्ष त्या आनंदाची आशा होती जो वधस्तंभाच्या पलीकडें त्याच्यासाठीं ठेविलेला होता असे म्हणणें बायबल-विरोधी कथन होणार नाहीं. त्यामुळें आपल्यावरील त्याच्या प्रीतिची वास्तविकता आणि महानता कमी होत नाहीं, कारण ज्या आनंदाची त्याला आशा होती तो आनंद पुष्कळ पुत्रांना गौरवात आणण्याचा आनंद होता (इब्री 2:10).

त्याचा आनंद आपल्याला मुक्ती मिळावी यांत होता, जिचा परिणाम देवाचे गौरव आहे. आम्हीं येशूबरोबर त्याच्या आनंदाचे  भागीदार बनतो आणि गौरव देवाचे होते.

23 सितम्बर : पिता की दया की अनुकरण करना

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23 सितम्बर : पिता की दया की अनुकरण करना
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“अपने शत्रुओं से प्रेम रखो, और भलाई करो, और फिर पाने की आशा न रखकर उधार दो; और तुम्हारे लिए बड़ा फल होगा, और तुम परमप्रधान के सन्तान ठहरोगे, क्योंकि वह उन पर जो धन्यवाद नहीं करते और बुरों पर भी कृपालु है। जैसा तुम्हारा पिता दयावन्त है, वैसे ही तुम भी दयावन्त बनो।” लूका 6:35-36

“जैसा तुम्हारा पिता दयावन्त है, वैसे ही तुम भी दयावन्त बनो”—यीशु के प्रसिद्ध धन्य-वचनों की शिक्षा का सार है (लूका 6:20-23), और वास्तव में यह हर विश्वासी के जीवन का एक उत्तम आदर्श वाक्य हो सकता है। ये शब्द उस हर बात पर बल देते हैं, जो यीशु पहले ही हमें दूसरों के प्रति हमारे व्यवहार के बारे में सिखा चुका है—विशेषकर उनके प्रति जो प्रभु के प्रति हमारी निष्ठा के कारण हमसे बैर रखते हैं (पद 22)।

हालाँकि, यह बात हमें एक प्रश्न पूछने के लिए प्रेरित करती है: दयालु होना वास्तव में कैसा दिखता है? हमारा बुद्धिमान और कोमल चरवाहा यीशु हमें इस सिद्धान्त को स्वयं ही समझने के लिए नहीं छोड़ देता। इसके विपरीत, वह हमें यह स्पष्ट रूप से बताता है कि हमारे स्वर्गिक पिता की दया का अनुकरण करना कैसा दिखता है।

परमेश्वर “उन पर जो धन्यवाद नहीं करते और बुरों पर भी कृपालु है।” और चूंकि हम उसकी सन्तान हैं, इसलिए हमें भी यही दया दिखाने के लिए बुलाया गया है—अर्थात अपने शत्रुओं से प्रेम करना, बुराई के बदले भलाई करना, और बिना किसी प्रतिफल की आशा किए दूसरों को देना। ध्यान दें कि यीशु यहाँ किसी प्रकार की छूट या ऐसा न करने का कोई बहाना नहीं देता।

जब यीशु हमें परमेश्वर की दया के वाहक बनने के लिए बुलाता है, तो उसी क्षण वे हमें यह भी बताता है कि हमें दूसरों पर दोष नहीं लगाना है (लूका 6:37)। वह यह नहीं कह रहा कि हम अपने रिश्तों में सही-गलत की परख करने की क्षमता को एक ओर रख दें। हमें सत्य और असत्य या भलाई और बुराई में भेद करना बन्द नहीं कर देना है। यीशु यह भी नहीं कह रहा कि हम पापों को अनदेखा करें या गलतियों को न सुधारें। बल्कि जब यीशु कहता है कि “दोष मत लगाओ,” तो वह एक प्रकार की आत्म-धर्मी, खुद को ऊँचा समझने वाली, कपटी और कठोर आलोचना वाली प्रवृत्ति को गलत ठहरा रहा है—एक ऐसा दृष्टिकोण जो केवल दूसरों की गलतियाँ उजागर करता है और हमेशा कटुता की भावना लेकर आता है।

एक निर्दयी मनोदशा पूरी तरह से यीशु की उस प्रेरणा के विरुद्ध है, जिसमें उसने हमसे कहा है कि हम अपने मित्रों और शत्रुओं दोनों के प्रति दया दिखाएँ। हममें से हर किसी को अपने भीतर किसी भी प्रकार की आलोचनात्मक भावना को पहचानकर उसे जड़ से उखाड़ फेंकना है, और उसकी जगह कोमलता और समझदारी को देना है।

यही वह तरीका है जिससे हम दूसरों को वह दया दिखाते हैं, जो परमेश्वर ने हम पर दिखाई है। एक (सम्भवतः काल्पनिक) कहानी बताई जाती है कि जब रानी एलीज़ाबेथ द्वितीय छोटी थीं, तो उनकी माँ उन्हें और उनकी बहन मार्गरेट को किसी पार्टी में जाने से पहले कहा करती थीं: “याद रखना: तुम शाही सन्तान हो, इसलिए शाही व्यवहार करना।” उनका आचरण उन्हें शाही परिवार का सदस्य नहीं बनाता था, लेकिन यह दिखाता था कि वे उस परिवार के सदस्य हैं।

मसीही भाइयो और बहनो, आप और मैं इस सृष्टि के शाही परिवार के सदस्य हैं, और इस सृष्टि का राजा हमारा पिता है। यह निश्चित करें कि आपका व्यवहार यह दर्शाए कि आप कौन हैं और किसके हैं। जैसा तुम्हारा पिता दयावन्त है, वैसे ही तुम भी दयावन्त बनो

इफिसियों 4:25 – 5:2

पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: यहेजकेल 8–10; यूहन्ना 10:1-21 ◊

23 September : अति वाईट पाप्यांसाठीं तारणाची आशा

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23 September : अति वाईट पाप्यांसाठीं तारणाची आशा
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“ज्याच्यावर कृपा करावी असे वाटेल त्याच्यावर मी कृपा करीन आणि ज्याच्यावर दया करावी असे वाटेल त्याच्यावर दया करीन.” (निर्गम 33:19)

ताठ मानेच्या ह्या लोकांवर ज्यांनी नुकतीच मूर्तिपूजा केलीं आणि ज्या देवानें त्यांना मिसर देशातून बाहेर काढले त्याची निंदा केलीं तोच देव खरोखरच दया करील या आशेची मोशेला गरज होती.

मोशेला आवश्यक असलेली आशा आणि खात्री देण्यासाठीं, देव म्हणाला, “ज्याच्यावर कृपा करावी असे वाटेल त्याच्यावर मी कृपा करीन.” दुसऱ्या शब्दांत सांगायचे तर, “मी जी निवड करतो ती मनुष्यांच्या दुर्गुणांवर किंवा सद्गुणांवर अवलंबून नसून केवळ माझ्या स्वतंत्र, सार्वभौम इच्छेवर अवलंबून आहे. म्हणून कोणीही असे म्हणू शकत नाहीं कीं तो मनुष्य इतका वाईट आहे कीं त्याच्यावर कृपा केलीं जाऊच शकत नाहीं.” जर निवड ही मनुष्यांच्या दुर्गुणांवर किंवा सद्गुणांवर अवलंबून असती तर देव स्वतंत्र नाहीं आणि त्याची निवड अटविरहित नाहीं असा याचा अर्थ होईल.

अटविरहित निवडलें ज्याण्याचा  सिद्धांत हा सर्वात वाईट पापी लोकांसाठीं आशेचा महान सिद्धांत आहे. म्हणजें जेव्हा कृपेसाठीं पात्र होण्याचा विचार येतो तेव्हा तुमच्या पार्श्वभूमीचा देवानें केलेंल्या तुमच्या निवडीशी काहींही संबंध नाहीं. हे तर शुभवर्तमानाचेच एक स्वरूप आहे.

जर तुमचा नव्याने जन्म झाला नसेल आणि येशू ख्रिस्तावर जो तारणहार विश्वास तो जर तुम्हांला दिला गेलेला नसेल, तर तुमचा पूर्वायुष्यातील अत्याधिक दुष्टपणा किंवा मनाची कठोरता ही तुमच्या जीवनात देवाच्या कृपेंत मोठा अडथळा बनत आहे असा विचार करून नैराश्याच्या डोहांत बुडू नका. अति वाईट पापी लोकांवर कृपा करून त्यांच्या तारणांत आपल्या कृपेच्या स्वातंत्र्याचा गौरव करणें देवाला आवडते.

आपल्या पापापासून वळा; परमेश्वराला हाक मारा. या दैनंदिन भक्तीमध्येंही, जे तुम्हीं वाचत आहात किंवा ऐकत आहात, तो तुमच्यावर कृपा करत आहे, आणि तुम्हीं दयेसाठीं त्याच्याकडें यावें असे उत्तेजन तो तुम्हांला देत आहे.

“परमेश्वर म्हणतो, चला, या, आपण बुद्धिवाद करू; तुमची पातके लाखेसारखी लाल असली तरी ती बर्फासारखी पांढरी होतील; ती किरमिजासारखी तांबडी असली तरी लोकरीसारखी निघतील” (यशया 1:18).