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2 अक्तूबर : पुनर्स्थापना की प्रतिज्ञा

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2 अक्तूबर : पुनर्स्थापना की प्रतिज्ञा
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“उसने अपनी इच्छा का भेद उस भले अभिप्राय के अनुसार हमें बताया, जिसे उसने अपने आप में ठान लिया था कि समयों के पूरे होने का ऐसा प्रबन्ध हो कि जो कुछ स्वर्ग में है और जो कुछ पृथ्वी पर है, सब कुछ वह मसीह में एकत्र करे।” इफिसियों 1:9-10

अपने निबन्ध “ऑन फेयरी स्टोरीज़” में जे. आर. आर. टोल्किन उन कारणों के बारे में लिखते हैं, जिनकी वजह से लोग परीकथाओं की ओर आकर्षित होते हैं। ऐसी कहानियाँ अक्सर हमारे दैनिक समाचारों के विपरीत होती हैं: जहाँ वास्तविक जीवन में युद्ध, आर्थिक अस्थिरता, महामारी और दिल टूटने की घटनाएँ होती हैं, वहीं परीकथाएँ सुखद अन्त प्रस्तुत करती हैं, जो मानव हृदय की गहरी इच्छाओं को प्रतिबिम्बित करता है। टोल्किन सुझाव देते हैं कि इन इच्छाओं की जड़ में यह तड़प है कि मसीह इस संसार को सही करे—सभी चीज़ों को एक साथ लाए, सब कुछ पुनर्स्थापित करे, और संसार को उतना ही सुन्दर बनाए, जितना यह आदम के विद्रोह से पहले था। क्या आप भी नहीं चाहते कि परमेश्वर सब कुछ ठीक कर दे? क्या आप भी उस सुखद अन्त की लालसा नहीं रखते?

पवित्रशास्त्र में, और हमारे जीवन में भी, हमें बार-बार याद दिलाया जाता है कि हम अभी वहाँ तक नहीं पहुँचे हैं। हम एक पतित संसार में रहते हैं, जहाँ अलगाव, निराशा और विघटन व्याप्त है। पहले आदम ने पाप किया, और मृत्यु और अराजकता उसका परिणाम बनी। लेकिन फिर दूसरा आदम आया ताकि वह पहले आदम द्वारा किए गए काम को सुधार कर सब कुछ पुनर्स्थापित कर सके और वह पूरा कर सके जो कोई और नहीं कर सकता था। परमेश्वर सब कुछ ठीक करेगा। वास्तव में, उसने इसका आरम्भ कर भी दिया है।

पहली शताब्दी की कलीसियाओं को लिखे अपने पत्रों में पौलुस ने उनकी कठिनाइयों को पहचाना और उन्हें कम करके नहीं आँका; लेकिन उसने हमेशा अपने पाठकों को यह याद दिलाया कि एक दिन ऐसा आएगा “जब दुख समाप्त होंगे और पीड़ाएँ मिट जाएँगी,” और हमारी सभी इच्छाएँ पूरी हो जाएँगी।[1] उसने उन्हें प्रोत्साहित किया कि वे अपनी आँखें परम लक्ष्य पर टिकाए रखें, ताकि वे अपने तत्कालीन संघर्षों का सामना कर सकें।

जो उन्हें तब चाहिए था, वही हमें अब चाहिए। यदि आप केवल उन परिस्थितियों पर ध्यान केन्द्रित करेंगे, जो आपके सामने हैं और परमेश्वर के पुनर्स्थापना की प्रतिज्ञा को अपनी दृष्टि में नहीं लाएँगे, तो आप वास्तव में अपने सामने आने वाली समस्याओं से नहीं निपट पाएँगे। वे आपके नियन्त्रण से बाहर लगने लगेंगी। वे आपको निराश कर देंगी। वे आपकी आशा और आनन्द को छीन लेंगी। चाहे समस्याएँ वैश्विक हों, राष्ट्रीय हों, या व्यक्तिगत, सबसे अच्छा तरीका यही है कि आप परमेश्वर के वचन पर ध्यान केन्द्रित करें और याद रखें कि परमेश्वर का वचन परमेश्वर की योजना के बारे में क्या कहता है। एक सुखद अन्त होगा। एक समय आएगा जब सब कुछ एक सिद्ध राजा के अधीन एकजुट होगा।

वह क्या है जो आज आपको परेशान कर रहा है? समय के मामलों को पवित्र आत्मा की सहायता के द्वारा एक शाश्वत दृष्टिकोण से देखें और आप उसकी सिद्ध योजना में सुरक्षा प्राप्त करेंगे। आप इस संसार की पूरी कहानी के सभी विवरण अभी नहीं जान सकते, लेकिन आप यह ज़रूर जान सकते हैं कि जो लोग मसीह पर विश्वास रखते हैं, उनके लिए अन्तिम दृश्य एक ऐसा सुखद अन्त लाएगा जिससे अनन्तता का आरम्भ होगा—और यह कोई परीकथा नहीं है।

  यशायाह 65:17-25

◊ पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: यहेजकेल 30–32; यूहन्ना 15


[1] स्टूअर्ट टाऊण्ट, “देयर इज़ ए होप” (2007).

2 October : देव सनकी (मूडी) नाहीं

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2 October : देव सनकी (मूडी) नाहीं
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राष्ट्रांच्या मसलती परमेश्वर निरर्थक करतो; लोकांचे संकल्प निष्फळ करतो. परमेश्वराची योजना सर्वकाळ टिकते; त्याच्या मनातील संकल्प पिढ्यानपिढ्या कायम राहतात. (स्तोत्र 33:10-11)

“आमचा देव स्वर्गात आहे; त्याला योग्य दिसते ते सर्व तो करतो” (स्तोत्र 115:3). या शास्त्रलेखाचा अर्थबोध हा आहे कीं देवाला ज्या गोष्टींमध्यें आनंद मिळतो त्यां सर्व करण्याचा त्याला अधिकार आणि  सामर्थ्य आहे. देव सार्वभौम आहे या कथनाचा अर्थ हाच आहे.

काहीं क्षण यावर विचार करा : जर देव सार्वभौम आहे आणि त्याच्या इच्छेस येईल ते सर्व करण्यांस तो समर्थ आहे, तर त्याचा कोणताही संकल्प निष्फळ होऊ शकत नाहीं. “राष्ट्रांच्या मसलती परमेश्वर निरर्थक करतो; लोकांचे संकल्प निष्फळ करतो. परमेश्वराची योजना सर्वकाळ टिकते; त्याच्या मनातील संकल्प पिढ्यानपिढ्या कायम राहतात” (स्तोत्र 33:10-11).

आणि जर त्याचा कोणताही संकल्प निष्फळ होऊ शकत नाहीं, तर तो सर्व जीवितांमध्यें सर्वात अधिक आनंदी असला पाहिजे.

हाच असीम, ऊर्ध्वलोकीं आनंद तो झरा आहे ज्यातून ख्रिस्ती हेडोनिस्ट म्हणजें सुख हेच अंतिम उद्दिष्ट हा सिद्धांत मानणारा मनुष्य सातत्यानें पितो आणि जो अधिक खोलवर जाऊन प्यावयांस तळमळतो.

जगावर राज्य करणारा देव आनंदी नसता तर काय झालें असते याची तुम्हीं कल्पना करू शकता का? देव जर आकाशातल्या एखाद्या दैत्याप्रमाणें कुरकुर करणारा, चिडचिडपणानें वेडापिसा होणारा आणि दु:खाने खिन्न होऊन बसणारा असता तर? जर देव निराश, वैफल्यग्रस्त, खिन्न आणि हताश आणि असमाधानी आणि विषादपूर्ण वृत्तीचा असतां तर?

आपण दाविदाबरोबर असे म्हणू शकलो असतो का, “हे देवा, तू माझा देव आहेस; मी आस्थेने तुझा शोध करीन; शुष्क, रुक्ष व निर्जल प्रदेशात माझा जीव तुझ्यासाठीं तान्हेला झाला आहे, माझ्या देहालाही तुझी उत्कंठा लागली आहे” (स्तोत्र 63:1)? मला असे वाटत नाहीं.

आपण लेकरें म्हणून परमेश्वराला असे गणूं जसे एक निराश झालेला, खिन्न आणि हताश, व असंतुष्ट असा बाप असलेलीं बालकें त्याला गणतील. ते त्याच्यामध्यें आनंद करूं शकत नाहींत. ते फक्त त्याला त्रास न देण्याचा प्रयत्न करू शकतात किंवा कदाचित थोड्याफार स्वार्थासाठीं त्याचे ऐकण्याचा प्रयत्न करतील.

पण आमचा परमेश्वर तसा नाहीं. तो कधीही नैराश्याने किंवा असमाधानामुळें लहरी माणसासारखा चिडत नाहीं. आणि, स्तोत्र 147:11 मध्यें सांगितल्याप्रमाणें, “जे परमेश्वराचा आदर करतात,जे त्याच्या दयेची आशा धरतात त्यांच्याबरोबर तो आनंदित होतो.” म्हणून या देवाला टाळणें, वा त्याच्यापासून पळ काढणें किंवा त्याचा खिन्नपणा क्रोधाद्वारे प्रकट होऊ नये म्हणून दिवाणखान्यात डोकावून सुद्धा न पाहणें हा ख्रिस्ती हेडोनिस्टचा उद्दिष्ट नाहीं. नाहीं, उलट त्याच्या स्थिर प्रीतिची आशा धरणें हे आपले उद्दिष्ट असते. त्याच्याकडे धाव घेणें हे आपले उद्दिष्ट असते. देवामध्यें आनंद करणें, देवामध्यें हर्ष करणें, त्याचा सहवास आणि त्याची कृपा यांना आपल्या हृदयांत जपणें व त्यांत आनंद करणें हे आपले उद्दिष्ट आहे.

1 अक्तूबर : शरीर और आत्मा

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1 अक्तूबर : शरीर और आत्मा
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“जब मैं चुप रहा तब दिन भर कराहते-कराहते मेरी हड्डियाँ पिघल गईं। क्योंकि रात दिन मैं तेरे हाथ के नीचे दबा रहा; और मेरी तरावट धूप काल की सी झुर्राहट बनती गई।” भजन 32:3-4

जो लोग मनोविज्ञान, मनोरोग और सामाजिक सेवाओं के क्षेत्रों में काम करते हैं, वे अक्सर इस तथ्य का सामना करते हैं कि किसी व्यक्ति के हृदय और मन में जो कुछ हो रहा है, उसका गहरा प्रभाव उसके शरीर में भी दिखाई देता है। परमेश्वर का वचन इस सम्बन्ध पर प्रकाश डालता है और फिर और भी गहराई तक जाता है, क्योंकि यह हमें बताता है कि हमारे शरीर की स्थिति और हमारी आत्मा की स्थिति के बीच एक सम्बन्ध है।

भजन 32 में, दाऊद परमेश्वर से बहुत व्यक्तिगत रूप से बात करता है और उस बोझ को स्वीकार करता है, जिसे उसने तब अनुभव किया जब वह अन्धकार में छिपा रहा और बतशेबा के साथ किए गए अपने पाप और उसके पति ऊरिय्याह की हत्या को स्वीकार करने से इनकार करता रहा (2 शमूएल 11 देखें)। दाऊद के माध्यम से पवित्र आत्मा हमें सिखाता है कि एक व्याकुल विवेक, पश्चाताप की कमी और हमारे शारीरिक स्वास्थ्य के बीच एक सम्बन्ध है। जो लोग दाऊद के निकट थे, शायद वे यह नहीं जान सके थे कि उसकी आत्मा के भीतर क्या चल रहा था, लेकिन वे उसके शरीर में हो रहे परिवर्तनों को नज़रअंदाज़ नहीं कर सकते थे।

जो विवरण वह देता है, वह अन्य स्थानों पर दिए गए उसके विवरण को और अधिक स्पष्ट करता है: “मेरा हृदय धड़कता है, मेरा बल घटता जाता है; और मेरी आँखों की ज्योति भी मुझ से जाती रही। मेरे मित्र और मेरे संगी मेरी विपत्ति में अलग हो गए, और मेरे कुटुम्बी भी दूर जा खड़े हुए” (भजन 38:10-11)। यह बहुत ही विनाशकारी चित्र प्रस्तुत करता है।

दाऊद ने अपनी स्थिति को पहचाना कि यह एक दण्ड था। बाइबल स्पष्ट रूप से बताती है कि वासना, अतिरेक और परमेश्वर की आज्ञाओं की अवहेलना के स्वाभाविक परिणाम निकलते हैं (रोमियों 1:24-25 देखें)—और इन सभी में दाऊद दोषी था। दुर्बलता, वज़न घटना, अनिद्रा, अस्वीकृति की भावना, उदासी, चिन्ता और निराशा अक्सर उन लोगों को सताती है, जो अपने पाप को परमेश्वर से छिपाने और स्वयं इन्हें स्वीकार न करने का प्रयास करते हैं।

जिस बात ने दाऊद को पुनः स्थापित किया, वह कोई स्वास्थ्य सुधार योजना या जल्दी सोने जाना नहीं था, बल्कि उसके पाप की जड़ से निपटना था: “जब मैंने अपना पाप तुझ पर प्रगट किया . . . तब तूने मेरे अधर्म और पाप को क्षमा कर दिया” (भजन 32:5)। परमेश्वर ने अपनी शक्ति से दाऊद को तब तक दबाए रखा, जब तक कि उसने अपने पाप को परमेश्वर के हाथों में सौंपकर उससे समाधान नहीं माँगा। यह हमारे लिए आशीष है कि परमेश्वर हमें हमारे पाप को भूलने नहीं देता—जब हमें अपनी आत्मिक बीमारी के कारण शारीरिक भारीपन का अनुभव होता है। यह हमें वह करने के लिए प्रेरित करने का उसका तरीका है, जिसकी हमें सबसे अधिक आवश्यकता है, अर्थात अपने पाप को स्वीकार करना और उसकी क्षमा माँगना।

क्या आप कोई पाप छिपा रहे हैं? उसे छिपाएँ नहीं; उसे स्वीकार करें। जब दाऊद ने परमेश्वर की क्षमा माँगी, तो उसे अपने कष्टों से मुक्तिदायक राहत मिली। आप भी उसी आनन्द का अनुभव कर सकते हैं, क्योंकि परमेश्वर के वचन की प्रतिज्ञा है कि “यदि हम अपने पापों को मान लें, तो वह हमारे पापों को क्षमा करने और हमें सब अधर्म से शुद्ध करने में विश्वासयोग्य और धर्मी है” (1 यूहन्ना 1:9)।

भजन 51

पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: यहेजकेल 27–29; यूहन्ना 14 ◊

1 October : सर्व-समाधानी विषय

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1 October : सर्व-समाधानी विषय
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परमेश्वरामध्यें आनंद कर, म्हणजें तो तुझे मनोरथ पूर्ण करील. (स्तोत्र 37:4)

आनंदाचा शोध “आम्हांला वाटेल तर आम्हीं घेऊं” असा वैकल्पिक विषय नाहीं, तर ही आज्ञा आहे (स्तोत्रांमध्यें दिलेलीं): “परमेश्वरामध्यें आनंद कर, म्हणजें तो तुझे मनोरथ पूर्ण करील” (स्तोत्र 37:4).

स्तोत्रकर्त्यांनी असेच करण्याचा प्रयत्न केला : “जशी हरिणी पाण्याच्या प्रवाहासाठीं धापा टाकते, तसा हे देवा, माझा जीव तुझ्यासाठीं धापा टाकतो. माझा जीव देवासाठीं, जिवंत देवासाठीं तहानेला आहे. मी केव्हा देवासमोर येऊन हजर होईन” (स्तोत्र 42:1-2). “हे देवा, तू माझा देव आहेस; मी कळकळीने तुझा शोध घेईन; शुष्क आणि रूक्ष आणि निर्जल ठिकाणी माझा जीव तुझ्यासाठीं तान्हेला झाला आहे” (स्तोत्र 63:1).

या तहानेच्या उद्देश्यामागे तृप्त करणारा असा समतुल्य झरा आहे जेव्हां स्तोत्रकर्ता म्हणतो कीं लोक “तुझ्या घरातल्या समृद्धीमुळें तृप्त होतील. तू आपल्या बहुमोल नदीतून त्यांना मनसोक्त पिण्यास देशील” (स्तोत्र 36:8).

मला असा शोध लागला कीं देवाचा चांगुलपणा, जो आमच्या उपासनेचा मुख्य पाया आहे, अशी गोष्ट नाहीं कीं तुम्हीं कुठल्यातरी निरुत्साही भक्तीने त्याच्या आदर करता. नाहीं, हे असे कांहींतरी आहे ज्यामध्यें आम्हांला आनंद घ्यावयाचा असतो: “परमेश्वर किती चांगला आहे, ह्याचा अनुभव घेऊन पाहा!” (स्तोत्र 34:8). अनुभव. अनुभव! अनुभव घेऊन पाहा.

“तुझी वचने माझ्या जिभेला किती मधुर लागतात! माझ्या तोंडाला ती मधापेक्षा गोड लागतात!” (स्तोत्र 119:103).

सी.एस. लुईस यांनी म्हटल्याप्रमाणें, स्तोत्रांत वर्णिलेला परमेश्वर हा “सर्व-समाधानी विषय” आहे. त्याच्या लोकांना त्याच्यामध्यें जो “काठोकाठ वाहणारा आनंद” मिळतो त्या आनंदासाठीं ते हर्ष-वर्धनाणें त्याची उपासना करतात (स्तोत्र 43:4). तो तृप्तीदायक आणि सर्वकाळ वाहणाऱ्या आनंदाचा झरा आहे: “तुझ्या सान्निध्यात पूर्णानंद आहे; तुझ्या उजव्या हातात सौख्ये सदोदित आहेत” (स्तोत्र 16:11).

30 सितम्बर : एक मन, एक उद्देश्य, एक आत्मा

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30 सितम्बर : एक मन, एक उद्देश्य, एक आत्मा
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“मेरा यह आनन्द पूरा करो कि एक मन रहो, और एक ही प्रेम, एक ही चित्त, और एक ही मनसा रखो। विरोध या झूठी बड़ाई के लिए कुछ न करो, पर दीनता से एक दूसरे को अपने से अच्छा समझो।” फिलिप्पियों 2:2-3

हालाँकि यह निश्चित रूप से लाभदायक है कि कलीसिया के सदस्य सेवाकार्यों में पहल करें, फिर भी विश्वासियों की एक स्वस्थ मण्डली व्यक्तिगत विचारों और योजनाओं द्वारा नहीं चलती। यदि कलीसिया को वास्तव में मसीह की अधीनता में रहना है, तो पहले हमारे मन सुसमाचार में एकजुट होने चाहिएँ। यदि यह एकता नहीं है, तो हम अपने स्वार्थी और प्रतिस्पर्धात्मक इच्छाओं और योजनाओं द्वारा ही संचालित होंगे।

बाइबल हमारे मन के विषय में बहुत कुछ कहती है, क्योंकि जैसा हम सोचते हैं, वैसे ही हम बनते हैं। जब हम अपने मन को सही सोच के लिए प्रशिक्षित करते हैं, तब हम ठीक से प्रेम करना और एक आत्मा तथा एक उद्देश्य में साथ मिलकर सेवा करना सीखते हैं। हमारे मानसिक संघर्ष का एक भाग हमारी पुरानी, स्वार्थी, मानवीय प्रकृति में फँसा हुआ होता है। हमारी सबसे बड़ी ठोकरों में से एक घृणा नहीं बल्कि आत्म-प्रेम होता है: हम घमण्ड की प्रवृत्ति रखते हैं, जो हमारे प्रभु के स्वभाव के पूर्णतः विपरीत है, और हमारी नम्रता की कमी हमारे आस-पास के लोगों के साथ सामंजस्य के अनुभव में बाधा बनती है। यहाँ तक कि हमारे अच्छे कार्य भी अक्सर दूषित उद्देश्यों से भरे होते हैं।

यदि हमें मसीह में एक होना है, तो हम अपने ही तरीके पर अड़े नहीं रह सकते। इसके विपरीत, हमें “एक दूसरे को अपने से अच्छा समझना” सीखना होगा। इसका अर्थ है कि हम अपने से पहले दूसरों की अच्छाइयों को याद करें, कि हम पहले यह सोचें कि दूसरों के लिए क्या अच्छा होगा बजाय इसके कि हमारे लिए क्या सुविधाजनक होगा, और यह कि हम दूसरों के जीवन और संघर्षों में भाग लेने को तैयार हों बजाय इसके कि उनसे दूर खड़े रहें। सच्ची नम्रता कभी सबसे आगे वाली सीट नहीं लेती या हर बात का आरम्भ “मैं” से नहीं करती। वास्तव में यह “वह शून्यता है जो परमेश्वर को उसका सामर्थ्य दिखाने के लिए स्थान देती है।”[1] पौलुस हमें बताता है कि यह वह गुण है, जो स्वयं यीशु मसीह में था: “हम में से हर एक अपने पड़ोसी को उसकी भलाई के लिए प्रसन्न करे कि उसकी उन्नति हो। क्योंकि मसीह ने अपने आप को प्रसन्न नहीं किया” (रोमियों 15:2-3)।

जब हम पहले अपने बारे में सोचते हैं, तब परमेश्वर के वचन को लागू करना कठिन हो जाता है—बल्कि असम्भव हो जाता है। लेकिन जब हम दूसरों को पहले रखना सीखते हैं, तब हम उनके हितों की चिन्ता करने के लिए अधिक तत्पर हो जाते हैं। और ऐसा करके हम मसीह की देह में वास्तव में एक हो सकते हैं। आप निश्चित ही कुछ ऐसे लोगों को जानते होंगे जिनके जीवन में यह आत्मिक नम्रता दिखाई देती है। उनके लिए अभी परमेश्वर का धन्यवाद करें और यह प्रार्थना करें कि आप देख सकें कि कैसे आप उनके उदाहरण का और सबसे बढ़कर, स्वयं मसीह के उदाहरण का अनुसरण कर सकते हैं। उसने आपकी ज़रूरतों को अपनी सुविधा से भी अधिक—यहाँ तक कि अपने जीवन से भी अधिक महत्त्वपूर्ण समझा। पौलुस की हम सबके लिए यह चुनौती है: “जैसा मसीह यीशु का स्वभाव था वैसा ही तुम्हारा भी स्वभाव हो” (फिलिप्पियों 2:5)।

  यूहन्ना 3:22-36

◊ पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: यहेजकेल 24–26; यूहन्ना 13:21-38


[1] एण्ड्रू मुरे, ह्युमिलिटी: दि ब्यूटी ऑफ होलीनेस, द्वितीय संस्करण (1896), पृ. 50.

30 September : बंधमुक्त करणारा असा प्रचंड शोध

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30 September : बंधमुक्त करणारा असा प्रचंड शोध
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शेवटी, माझ्या बंधूंनो, प्रभूमध्यें आनंद करा. (फिलिप्पै 3:1)

आपण देवामध्यें आनंद करतो तेव्हां त्याचा गौरव होतो हें शिक्षण मला कोणी कधीही दिलें नव्हतें – कीं देवामध्यें आनंद करणें नेमकीं हीच बाब आपण करत असलेल्या देवाच्या स्तुतीला आपला ढोंगीपणा नाहीं तर देवाचा सन्मान बनवते.

पण जोनाथन एडवर्ड्स यांनी ही गोष्ट स्पष्टपणें आणि ठामपणें सांगितलीं :

देव मनुष्यांमध्यें देखील स्वतःचे गौरव करून घेतो असें दोन मार्ग आहेत : (1) तो त्यांना दर्शन देऊन. . . त्यांची समज उघडतो तेव्हां; (2) जेव्हां तो त्यांच्या अंतःकरणात आपलें वचन प्रकट करून त्यांच्याशी बोलतो तेव्हां त्याला ओळखून त्यांना होणारा हर्ष आणि आनंद, आणि त्याचा लाभ याद्वारे देवाचा गौरव केवळ त्याच्या गौरवाचे झालेंलें प्रकटीकरण याद्वारेच होत नाहीं, तर त्याच्यामध्यें जो आनंद ते करतांत त्याद्वारे सुद्धा त्याचा गौरव होतो. . .

त्याचा गौरव पाहणारे जेव्हां आनंद करतांत : तेव्हां केवळ गौरव पाहण्यापेक्षा जे त्या गौरवांत आनंदही करतांत तेव्हां त्याचा अधिक गौरव होतो. . . . जो मनुष्य देवाच्या गौरवाविषयी आपलें केवळ विचार व्यक्त करतो तो देवाचा तितका गौरव करत नाहीं जितका तो मनुष्य जो त्या गौरवाचे कौतुक करतो आणि त्यात आनंद करतो, देवाचा गौरव करतो.

हा माझ्यासाठीं एक धक्कादायक शोध होता. जर मला विश्वातील सर्वांत मौल्यवान वास्तव म्हणून देवाचा गौरव करायचा असेल तर मला त्याच्यामध्यें आनंदाचा शोध घेणें अगत्याचे आहे. उपासना करतांना आनंद करणें हा निव्वळ पर्याय नाहीं, तर उपासनेचा अत्यावश्यक घटक आहे. खरंच, उपासनेचे सार हेच – देवाच्या गौरवामध्यें आनंद करणें.

असे लोक जे देवाची स्तुती तर करतांत, परंतु आनंद न करताच त्याची स्तुती करतांत त्यांच्यासाठीं आमच्याकडें एक नाव आहे. त्यांना आपण ढोंगी म्हणतो. येशू म्हणाला, “अहो ढोंग्यांनो, तुमच्याविषयी यशयाने यथायोग्य संदेश दिला कीं, ‘हे लोक [तोंड घेऊन माझ्याकडें येतांत व] ओठांनी माझा सन्मान करतांत, परंतु त्यांचे अंतःकरण माझ्यापासून दूर आहे’” (मत्तय 15:7-8). ही वस्तुस्थिती – कीं देवाचा खरा सम्मान म्हणजें परिपूर्ण आनंद आणि हे कीं मनुष्याच्या जीवनाचा मुख्य हेतू देवाच्या गौरवासाठीं या आनंदाचा खोलवर शोध घेणें हाच आहे – हा कदाचित मी आजवर केलेंला बंधमुक्त करणारा असा प्रचंड शोध होता.

29 सितम्बर : हमारा सहानुभूतिपूर्ण चरवाहा

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29 सितम्बर : हमारा सहानुभूतिपूर्ण चरवाहा
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उसे देख कर प्रभु को तरस आया, और उससे कहा, ‘मत रो।’ तब उसने पास आकर अर्थी को छूआ, और उठाने वाले ठहर गए। तब उसने कहा, ‘हे जवान, मैं तुझ से कहता हूँ, उठ!’” लूका 7:13-14

परमेश्वर के राज्य का आगमन संसार की शक्तियों और अधिकारियों पर किसी शानदार या नाटकीय विजय से नहीं हुआ, बल्कि उससे कहीं अधिक रूपान्तरणकारी कारक अर्थात इसके राजा की महान करुणा के द्वारा हुआ।

यीशु के जीवन-वृतान्तों में सुसमाचार लेखक हमें बार-बार ऐसे प्रसंगों से परिचित कराते हैं, जो मसीह की अनुपम करुणा को दर्शाते हैं। इन घटनाओं में मसीह का सामर्थ्य उस समय प्रकट होता है, जब वह अपनी करुणा प्रदर्शित करता है। उदाहरण के लिए, अपने सुसमाचार के सातवें अध्याय में लूका एक शोकाकुल विधवा के प्रति यीशु की सहानुभूति को दर्शाता है—एक ऐसी प्रतिक्रिया जो उसकी महानता के बारे में किसी भी सन्देह को दूर कर देती है।

लूका के वृतान्त के इस भाग में वर्णित स्त्री सचमुच संकट में थी। उसका पति पहले ही मर चुका था, और अब उसका पुत्र भी चल बसा था। प्राचीन मध्य-पूर्वी समाज में इसका अर्थ था कि वह किसी भी प्रकार की सुरक्षा या आजीविका के सहारे से वंचित हो गई थी। अब वह दुख, अकेलेपन, और अस्थिरता से भरे जीवन का और साथ ही अपने वंश के अन्त का भी सामना कर रही थी।

लेकिन फिर यीशु इस स्त्री के जीवन की चरम परिस्थिति में आया और “उसे देख कर प्रभु को तरस आया, और उससे कहा, ‘मत रो।’”

इस कोमल चरवाहे के हृदय में करुणा जगाने के लिए केवल इतना ही काफ़ी था कि उसने इस शोक-सन्तप्त स्त्री को देखा। यहाँ पर प्रयुक्त शब्द “तरस” शाब्दिक रूप से दर्शाता है कि “उसकी अन्तड़ियाँ हिल उठीं”—हमारे शब्दों में कहें तो “उसका पेट मरोड़ खा उठा।” जब यीशु—जिसके द्वारा और जिसके लिए सब कुछ रचा गया—इस टूटे हुए संसार में दुख और शोक को देखता है, तो वह इसे गहराई से अनुभव करता है। वह एक ऐसा राजा है, जो अपनी प्रजा की दिल से चिन्ता करता है।

और भी अधिक सुन्दर बात यह है कि यीशु के पास इस विधवा की आवश्यकता को पूरा करने का सामर्थ्य था और उसने वह किया जो केवल वही कर सकता था: मरे हुए को जीवन देना। उसने केवल एक मरे हुए पुत्र को उसकी शोकग्रस्त माँ को लौटा कर उसका दुख ही दूर नहीं किया, बल्कि उससे कहीं अधिक महत्त्वपूर्ण यह था कि यीशु ने भीड़ (और हम सब) के सामने स्वयं को अपनी सम्पूर्ण शक्ति, दयालुता, और अधिकार के साथ—यहाँ तक कि मृत्यु पर भी अधिकार के साथ प्रकट किया।

ऐसे दृश्य हमें दिखाते हैं कि यीशु केवल बीमारी और मृत्यु—जो मानवजाति के सबसे बड़े शत्रु हैं—के बारे में केवल टिप्पणी ही नहीं करता, या केवल उनके लिए रोता ही नहीं है, बल्कि वह उन्हें पराजित भी करता है। वह शोकाकुलों की पुकार को सुनता है और उन्हें सान्त्वना देता है—केवल सांसारिक और अस्थाई रूप में नहीं, बल्कि एक अन्तिम, परिपूर्ण और अनन्त तरीके से, जब वह विश्वास करने वाले सब लोगों को स्वयं को उद्धार के साधन के रूप में प्रदान करता है।

आपका राजा न केवल अनन्त रूप से सामर्थी है; वह अनन्त रूप से करुणामय भी है। और उसमें मौजूद ये दोनों गुण पर्याप्त हैं कि वह आपको इस संसार के हर दुख और शोक से पार ले जाए—जब तक कि आप उसके सामने खड़े न हो जाएँ, और वह आपकी आँखों से हर आँसू पोंछ न दे।

लूका 7:1-17

पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: यहेजकेल 22–23; यूहन्ना 13:1-20 ◊

29 September : अविश्वासाशी सुयुद्ध करा

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29 September : अविश्वासाशी सुयुद्ध करा
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आणि ह्या सर्वांबरोबरच जिच्या योगे त्या दुष्टाचे सगळे जळते बाण तुम्हांला विझवता येतील, ती विश्वासाची ढाल हाती घ्या व उभे राहा. तारणाचे शिरस्त्राण व आत्म्याची तलवार म्हणजें देवाचे वचन, ही घ्या. (इफिस 6:16-17)

जेव्हा जेव्हा मला म्हातारपणाची भीती वाटते, तेव्हा तेव्हां मी हे अभिवचन घेऊन अविश्वासाशी सुयुद्ध करतो, “तुमच्या वृद्धापकाळापर्यंतही मीच तो आहे; तुमचे केस पिकत तोपर्यंत मी तुम्हांला वागवीन; निर्माणकर्ता मीच आहे, वागवणारा मीच आहे, मी खांद्यांवर वागवून तुमचा बचाव करीन” (यशया 46:4).

जेव्हा जेव्हा मला मरणाची भीती वाटते, तेव्हा तेव्हा मी हे अभिवचन घेऊन अविश्वासाशी सुयुद्ध करतो “कारण आपल्यातील कोणी स्वतःकरता जगत नाहीं आणि कोणी स्वतःकरता मरत नाहीं. कारण जर आपण जगतो तर प्रभूकरता जगतो, आणि जर आपण मरतो तर प्रभूकरता मरतो; म्हणून आपण जगलो किंवा मेलो तरी आपण प्रभूचेच आहोत. कारण ख्रिस्त ह्यासाठीं मरण पावला व पुन्हा जिवंत झाला कीं, त्यानें मेलेल्यांचा व जिवंतांचाही प्रभू असावे” (रोमकरांस 14:7-9).

माझ्या विश्वासाचा नाश होऊन मीं देवापासून दूर जात आहे अशी भीती मला वाटते, तेव्हा तेव्हां मी ही अभिवचनें घेऊन अविश्वासाशी सुयुद्ध करतो, “ज्याने तुमच्या ठायीं चांगले काम आरंभले तो ते येशू ख्रिस्ताच्या दिवसापर्यंत सिद्धीस नेईल” (फिलिप्पैकर 1:6) ); आणि, “ह्यामुळें ह्याच्या द्वारे देवाजवळ जाणार्‍यांना पूर्णपणें तारण्यास हा समर्थ आहे; कारण त्यांच्यासाठीं मध्यस्थी करण्यास हा सर्वदा जिवंत आहे” (इब्री 7:25).

या युद्धांत मजबरोबर सहभागी व्हां! चला, आपण युद्ध करू, इतर लोकांशी नाहीं तर आपल्या स्वतःच्या अविश्वासाशी. देवाच्या अभिवचनांवर अविश्वास हे सर्व भीतीचे मूळ आहे, आणि हे इतर पुष्कळ पापांचे देखील मूळ आहे. आत्म्याची तलवार हे देवाचे वचन आहे, असे पौलाने इफिस 6:17 मध्यें म्हटले आहे : जिच्या योगे त्या दुष्टाचे सगळे जळते बाण तुम्हांला विझवता येतील, ती विश्वासाची ढाल हाती घ्या (वचन 16) – म्हणजें देवाच्या त्याच वचनावर विश्वास. तर मग, आपल्या डाव्या हातांत ढाल आणि उजव्या हातांत तलवार घ्या आणि आपण विश्वासाचे जे सुयुद्ध ते करूया.

बायबल हाती घ्या व उभे राहा, व पवित्र आत्म्याकडें मदतीसाठीं आरोळी मारा, त्याची अभिवचने तुमच्या हृदयात ठेवा आणि चांगली लढाई लढा – जेणेंकरून तुम्हीं भावी कृपेवर विश्वास ठेवीत जिवंत राहावें.

28 सितम्बर : असली विश्वास का प्रमाण

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28 सितम्बर : असली विश्वास का प्रमाण
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“जब तुम मेरा कहना नहीं मानते तो क्यों मुझे ‘हे प्रभु, हे प्रभु,’ कहते हो? जो कोई मेरे पास आता है और मेरी बातें सुनकर उन्हें मानता है, मैं तुम्हें बताता हूँ कि वह किसके समान है : वह उस मनुष्य के समान है, जिसने घर बनाते समय भूमि गहरी खोदकर चट्टान पर नींव डाली।” लूका 6:46-48

यीशु चाहता है कि हमारे मुख की बातें और जीवन का व्यवहार एक-दूसरे के अनुरूप हों। इसलिए वह अपने “मैदानी उपदेश” के अन्त में एक बहुत ही टटोलने वाला प्रश्न पूछता है: “जब तुम मेरा कहना नहीं मानते तो क्यों मुझे ‘हे प्रभु, हे प्रभु,’ कहते हो?” यीशु ने देखा कि लोग जो कह रहे थे और जो कर रहे थे, उसमें गहरा विरोधाभास था। इसलिए उसने उन्हें एक गहन आत्मिक मूल्यांकन का बुलावा दिया—जो बुलावा वह आज हमें भी देता है। जैसा वह उनके लिए चाहता था, वैसा ही वह हमारे लिए भी चाहता है कि हमारे मुख से निकलने वाली यीशु में विश्वास की घोषणा के साथ-साथ हमारे जीवन में उसके प्रति नैतिक आज्ञापालन भी दिखे।

यीशु ने यह नहीं सिखाया कि स्वर्ग के राज्य में प्रवेश आज्ञाकारिता के अच्छे कामों के द्वारा होता है। उद्धार केवल परमेश्वर के अनुग्रह से, केवल विश्वास के द्वारा, और बिना किसी अन्य चीज़ के मिलता है (इफिसियों 2:8)। हम मसीह के पास केवल एक ही चीज़ लेकर आते हैं—हमारा पाप, जिससे हमें क्षमा की आवश्यकता है। तो फिर यीशु क्या सिखा रहा है? बहुत सीधी बात: केवल उन्हीं लोगों ने सच में यीशु की बात को सुना है और सुसमाचार से परिवर्तित हुए हैं, जो उसकी आज्ञा मानते हैं—अर्थात जो अपने विश्वास को अपने कर्मों के द्वारा व्यक्त करते हैं। जैसा सुधारवादियों ने कहा था: “उद्धार अकेले विश्वास से होता है, लेकिन उद्धार देने वाला वह विश्वास अकेला नहीं होता।” प्रेरित यूहन्ना भी यीशु की बात को दोहराते हुए अपनी पहली चिट्ठी में लिखता है: “यदि हम कहें कि उसके साथ हमारी सहभागिता है और फिर अन्धकार में चलें, तो हम झूठे हैं और सत्य पर नहीं चलते” (1 यूहन्ना 1:6)। बाइबल हमें बार-बार दिखाती है कि हम यीशु की बातों को जैसे सुनते हैं और उनका पालन करते हैं, उसका महत्त्व अनन्तकाल तक जाता है, क्योंकि यह हमारे विश्वास की सच्ची अवस्था और वास्तविकता को प्रकट करता है।

किसी भी मात्रा में धार्मिक कर्मकाण्ड या आध्यात्मिक बातें हमारे गुप्त व्यवहार को परमेश्वर से छिपा नहीं सकते। प्रेरित पौलुस बहुत स्पष्ट रूप से कहता है: “जो कोई प्रभु का नाम लेता है, वह अधर्म से बचा रहे” (2 तीमुथियुस 2:19)। हम इस आदेश की मांग की गम्भीरता को कम करने का प्रयास न करें। यही असली विश्वास का प्रमाण है।

यद्यपि कोई भी मनुष्य सिद्ध जीवन नहीं जीता, तौभी हम सभी को एक बदला हुआ जीवन जीने के लिए बुलाया गया है। हम अब मसीह के प्रभुत्व के अधीन हैं। उसका आत्मा हममें वास करता है। क्या हम पूरी तरह सफल होंगे? नहीं। लेकिन हम भिन्न होंगे, और हमारे जीवन में यह निरन्तर दिखेगा कि हम “मूरतों से परमेश्‍वर की ओर फिरे हैं, ताकि जीवते और सच्चे परमेश्‍वर की सेवा करें” (1 थिस्सलुनीकियों 1:9)। इसलिए अपने जीवन पर विचार करें। क्या आप यीशु को “प्रभु” कहते हैं? बहुत अच्छा! लेकिन सबसे महत्त्वपूर्ण बात यह है: क्या आप अपने जीवन में कोई ऐसा प्रमाण दिखा सकते हैं—उन बातों में जो आप नहीं करते, उन कामों में जो आप करते हैं, उन प्रलोभनों में जिनसे आप लड़ते हैं, उन गुणों में जिन्हें आप पाने का प्रयास करते हैं, और उस क्षमा में जिसे आप पश्चात्ताप पूर्वक मांगते हैं—कि यीशु वास्तव में आपका प्रभु है?

याकूब 2:14-26

◊ पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: यहेजकेल 20–21; यूहन्ना 12:27-50

28 September : आमचे कल्याण हेच त्याचे गौरव आहे

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28 September : आमचे कल्याण हेच त्याचे गौरव आहे
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“तू तर जेव्हा जेव्हा प्रार्थना करतोस तेव्हा तेव्हा ‘आपल्या खोलीत जा व दार लावून घेऊन’ आपल्या गुप्तवासी पित्याची ‘प्रार्थना कर’ म्हणजें तुझा गुप्तदर्शी पिता तुला उघडपणें तिचे फळ देईल.” (मत्तय 6:6)

ख्रिस्ती हेडोनिझम -म्हणजें सुख हेच अंतिम उद्दिष्ट- या सिद्धांतावर एक सामान्य आक्षेप हा घेतला जातो कीं हा सिद्धांत मनुष्याच्या हितांना देवाच्या गौरवापेक्षा अधिक महत्व देतो – म्हणजें हे शिक्षण माझ्या आनंदाला देवाच्या सन्मानाच्या वर स्थान देते. परंतु खरे पाहता, ख्रिस्ती हेडोनिझमचा हा अर्थ नाहीं हे मीं ठामपणें सांगतो.

ठामपणें सांगायचे तर, आम्हीं ख्रिस्ती हेडोनिस्ट म्हणून आमच्या सर्व शक्तीने आमचे हित आणि आमच्या आनंदाचा पाठपुरावा करण्याचा प्रयत्न करतो. आम्हीं तरुण जोनाथन एडवर्ड्स यांच्या पुढील संकल्पाचे समर्थन करतो : “संकल्प : मी माझ्यासाठीं दुसऱ्या जगात शक्य तितका आनंद मिळवण्याचा प्रयत्न करीन -सर्व शक्तीने, सामर्थ्याने, श्रमाने आणि आवेशाने, किबहुंना आक्रमक वृत्तीनेहि, माझ्याकडून शक्य होईल तितके, किंवा माझ्या मनांत येईल तितके, मीं अनुसरू शकतो अशा कोणत्याही मार्गाने.”

परंतु आपल्याला बायबलमधून (आणि एडवर्ड्सकडून!) ही ज्ञानप्राप्ती झालीं आहे कीं देवाला आपल्यावर -आम्हा पापी लोकांवर, ज्यांना त्याची नितांत गरज आहे- त्याची कृपा ओतण्याद्वारे त्याच्या गौरवाच्या परिपूर्णतेचा महिमा वाढवणें आवडते.

म्हणून, आपल्या हितांचा आणि आपल्या आनंदाचा पाठलाग करणें, मग त्यासाठीं आपल्याला आपलें जीवन गमवावे लागलें तरी, हे देवाचा सम्मान आणि त्याचा आनंद यांपेक्षा आणि देवाचे जे गौरव यापेक्षा कधीही वर नाहीं, तर हा पाठलाग नेहमीच देवामध्यें असतो. बायबलमधील सर्वात मौल्यवान सत्यांपैकीं एक हे आहे कीं देवाच्या कृपेच्या विपुलतेचा महिमा करणें हे पापी लोकांचे त्याच्यामध्यें आणि केवळ त्याच्यामध्यें आपला आनंद शोधणें आहे!

जेव्हा आपण लहान बालकांसारखे स्वतःला लीन-दीन करतो आणि मी माझा समर्थ या वृत्तीचे कुपोषण करतो, तर आपल्या पित्याच्या मिठीत असलेल्या आनंदाकडें हर्षाने धाव घेतो, तेव्हा त्याच्या कृपेचा महिमा वाढतो आणि आपल्या जिवाची तळमळ तृप्त होते. आपलें कल्याण आणि त्याचे गौरव परस्पर विलीन झालें.

जेव्हा येशू मत्तय 6: 6 मध्यें असे अभिवचन देतो, “तुझा गुप्तदर्शी पिता तुला उघडपणें तिचे फळ देईल,” तेव्हां हे ते फळ आहे ज्याच्या पाठीस आपण लागावें अशी देव आपल्याठायीं इच्छा बाळगतो. तो आपल्याला अशा आनंदाचे आमिष देत नाहीं जो तो आपल्याला देऊ करत नाहीं! पण हे फळ – हा आनंद –जेव्हां आम्हीं लोकांनी आपलें गौरव करावें या वृत्तीपासून दूर जातो आणि देवाचा शोध घेण्यासाठीं आपल्या खोलीत जातो तेव्हां काठोकाठ वाहणारा तो हा आनंद आहे.

यास्तव, ख्रिस्ती हेडोनिस्ट, म्हणजें सुख हेच अंतिम उद्दिष्ट या सिद्धांतावर विश्वास ठेवणारे लोक, हे त्यांच्या आनंदाला देवाच्या गौरवावर उंच स्थान देत नाहींत. तर ते आपल्या आनंदाचा शोध प्रत्यक्ष देवामध्यें घेतांत, आणि ‘जेव्हा आपण देवामध्यें सर्वात जास्त तृप्त असतो, तेव्हा देव आपल्यामध्यें सर्वात जास्त गौरव पावतो’ हे महान सत्य शोधून काढतांत.