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1 नवम्बर : एक निस्तारक-कुटुम्बी

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1 नवम्बर : एक निस्तारक-कुटुम्बी
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“मैं तो तेरी दासी रूत हूँ; तू अपनी दासी को अपनी चद्दर ओढ़ा दे, क्योंकि तू हमारी भूमि छुड़ाने वाला कुटुम्बी है।” रूत 3:9

यह एक सत्य सब कुछ बदल देता है: आपके पास एक निस्तारक-कुटुम्बी है।

रूत के दूसरे अध्याय का अन्त नाओमी के इस रहस्योद्‌घाटन के साथ होता है कि बोअज़ एक दूर का रिश्तेदार और “एक कुटुम्बी” है (रूत 2:20)। रूत के घटनाक्रम से बहुत पहले परमेश्वर ने ऐसी प्रथाएँ स्थापित की थीं, जो न केवल रूत पर बल्कि पूरे इस्राएल पर और उद्धार के इतिहास में परमेश्वर के सभी लोगों पर प्रभाव डालने वाली थीं।

हमें पुराने नियम की दो महत्त्वपूर्ण प्रथाओं को समझने की आवश्यकता है, ताकि हम इस घटनाक्रम की पृष्ठभूमि और इसके आनन्द की सराहना कर सकें। ये दो प्रथाएँ परिवार की विधवा का पुनर्विवाह और गोएल हैं। परिवार की विधवा के पुनर्विवाह की प्रथा इस्राएलियों की पुनर्विवाह परम्परा को नियन्त्रित करती थी, ताकि यदि किसी पुरुष की मृत्यु हो जाए, तो उसका नाम और वंश उसकी मृत्यु के साथ समाप्त न हो जाए या अन्य लोगों की इच्छाओं पर निर्भर न रहे (व्यवस्थाविवरण 25:5-10)। दूसरी ओर, गोएल एक इब्रानी क्रिया है जिसका अर्थ है “पुनः प्राप्त करना या छुड़ाना” और सामान्यतः इसका अनुवाद “निस्तारक-कुटुम्बी” के रूप में किया जाता है। मूसा का व्यवस्था-विधान लैव्यव्यवस्था 25 में इस जिम्मेदारी को स्पष्ट रूप से परिभाषित करता है, जहाँ एक रिश्तेदार को यह अधिकार और दायित्व दिया जाता है कि वह कठिनाई में पड़े अपने परिवार के सदस्य की देखभाल और सहायता करे। निस्तारक-कुटुम्बी को अपने रिश्तेदार की भूमि को सुरक्षित करने और उसका सहारा बनने के लिए सभी आवश्यक प्रयास करने होते थे।

बोअज़ ने इन दोनों परम्पराओं का स्वेच्छा से पालन किया और कठिन परिस्थिति में पड़ी हुई बेसहारा नाओमी व रूत की सहायता की। बोअज़ न केवल यीशु के पूर्वजों में से एक था, बल्कि इस कृत्य के द्वारा उसने हमारे निस्तारक-कुटुम्बी के रूप में मसीह के आने की भविष्यवाणी भी की।

जैसे रूत ने पूर्णतः असहाय अवस्था में बोअज़ की दया पर निर्भर होकर स्वयं को उसके चरणों में डाल दिया, वैसे ही हम भी मसीह की करुणा की खोज में स्वयं को मसीह के चरणों में डालते हैं। और जैसे बोअज़ ने रूत के साथ व्यवहार किया, वैसे ही मसीह हर उस पापी के साथ व्यवहार करता है जो पश्चाताप के साथ उसके पास आता है। वह उन्हें वाचा के लहू से ढक देता है, जिसके द्वारा वह हमें अपनी छत्रछाया में शान्ति, सुरक्षा और सन्तोष प्रदान करता है (भजन 91:4)। वह हमारे दुखों में हमें शान्ति देता है, हमारे भय को दूर करता है और हमारे आँसुओं को पोंछता है। रूत एक निर्धन परदेशी के रूप में बोअज़ के पास आई और उसकी आशिषों से समृद्ध हो गई। हम आत्मिक निर्धनता में यीशु के पास आते हैं और उसके साथ उसके उत्तराधिकारी बन जाते हैं (रोमियों 8:17)। जैसे बोअज़ ने रूत को लेकर उसे अपनी दुल्हन बना लिया, वैसे ही मसीह हमें लेकर अपनी दुल्हन बना लेता है (प्रकाशितवाक्य 19:7-8)।

बाइबल में ऐसे अनेक उदाहरण मिलते हैं, जहाँ परमेश्वर अपने लोगों की आवश्यकताओं में उनकी देखभाल और रक्षा करता है, इससे पहले कि वे स्वयं अपनी आवश्यकताओं को समझें। इस्राएल में रूत के लिए और इतिहास भर में परमेश्वर के सभी लोगों के लिए परमेश्वर के उद्धार योजना न केवल निस्तारक-कुटुम्बी की भूमिका की स्थापना के समय से आई थी, बल्कि सृष्टि के प्रारम्भ से ही तैयार की गई थी (इफिसियों 1:3-7)।

आज निश्चिन्त रहें क्योंकि यीशु अपनी कलीसिया का दूल्हा और निस्तारक-कुटुम्बी है। निश्चिन्त रहें क्योंकि उसने आपके लिए आवश्यक सभी देखभाल और प्रबन्ध करने का, तथा आपको सुरक्षित रूप से प्रतिज्ञा किए हुए शाश्वत देश में पहुँचाने का दायित्व उठाया है। निश्चिन्त रहें क्योंकि चाहे कोई भी आन्तरिक या बाहरी संकट आपको घेर ले, आप उसकी छत्रछाया में सुरक्षित हैं।

भजन 57

◊ पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: 2 शमूएल 19–20; 2 यूहन्ना

1 November : आमच्याठायीं ख्रिस्ताचे क्लेश

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1 November : आमच्याठायीं ख्रिस्ताचे क्लेश
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तुमच्यासाठीं जी माझी दुःखे त्यांमध्यें मी आनंद करतो आणि ख्रिस्ताच्या क्लेशांतलें जे उरलें आहे ते मी आपल्या देहानें, त्याचे शरीर जी मंडळी तिच्यासाठीं भरून काढत आहे. (कलस्सै 1:24)

ख्रिस्तानें पापी लोकांसाठीं क्लेश व मरण सोसून जगासाठीं प्रेमार्पण तयार केलें आहे. ते एक सिद्ध-साध्य बलिदान आहे. त्याद्वारें त्यानें त्याच्या सर्व लोकांच्या सर्व पातकांसाठीं पूर्ण खंडणी भरलीं. हे दान इतके उत्तम आहें कीं त्यांत कांहींही जोडता येऊ शकत नाहीं. त्यात कसलीही उणीव नाहीं – फक्त एक गोष्ट सोडून, स्वतः ख्रिस्ताद्वारें जगातील राष्ट्रांसमक्ष वैयक्तिक प्रस्तुती.

ही उणीव भरून काढण्यासाठीं परमेश्वराचा उपाय हा कीं तो ख्रिस्ताच्या लोकांना (पौलासारखे लोक) जगासमोर ख्रिस्ताच्या क्लेशांचे वैयक्तिक प्रस्तुतीकरण करण्यासाठीं पाचारण करतो. हे क्लेश भोगून, आपण “ख्रिस्ताच्या क्लेशांत जी उणीव आहे ती भरून काढतो.” देवानें त्यां क्लेशांना ज्यां उद्देशाने नेमिलें होते तो उद्देश आपण पूर्ण करतो, म्हणजेच, ज्यां लोकांना ते देवाच्या दृष्टीनें किती असीम मौल्यवान आहेत हे समजत नाहीं अशा लोकांसमक्ष ख्रिस्ताच्या क्लेशांचे वैयक्तिक सादरीकरण.

परंतु कलस्सै. 1:24 बाबत सर्वात अद्भुत गोष्ट म्हणजें याचे प्रदर्शन कीं पौल ख्रिस्ताच्या क्लेशांत असलेलीं उणीव कशी भरून काढतो.

तो म्हणतो कीं तो आपल्या स्वतःच्या क्लेशानें ख्रिस्ताचे क्लेश भरून काढतो. तर मग, याचा अर्थ हा आहे कीं, पौल ज्यांना ख्रिस्तासाठीं जिंकण्याचा प्रयत्न करत आहे त्यांच्यासाठीं तो स्वतः दुःख सोसून ख्रिस्ताचे क्लेश प्रदर्शित करतो. म्हणजें त्याच्या क्लेशात त्यांना ख्रिस्ताचे क्लेश दिसलें पाहिजेत.

याचा थक्क करणारा अंतिम निष्कर्ष हा : ख्रिस्ताचे क्लेश हें त्याच्या लोकांच्या क्लेशांद्वारें जगापुढे मांडावे हा देवाचा हेतू आहे.

ख्रिस्ताचे शरीर जी मंडळी तिच्यासाठीं परमेश्वराचा हेतू खरोखर हा आहे कीं त्यानें अनुभवलेंल्या कांहीं क्लेशांचा अनुभव तिनें  सुद्धा घ्यावा यासाठीं कीं जेव्हां आपण जीवनाचा मार्ग म्हणून वधस्तंभाची घोषणा करूं, तेव्हां लोकांनी आपल्यामध्यें वधस्तंभाच्या खुणा पाहाव्यांत आणि आम्हांद्वारें त्यांस वधस्तंभाच्या प्रीतिची जाणीव व्हावीं.

31 अक्तूबर : प्रतीक्षा कक्ष से बाहर

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31 अक्तूबर : प्रतीक्षा कक्ष से बाहर
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“तब [रूत] चुपचाप गई, और [बोअज़ के] पाँव उघाड़ के लेट गई। आधी रात को वह पुरुष चौंक पड़ा, और आगे की ओर झुककर क्या पाया, कि उसके पाँवों के पास कोई स्त्री लेटी है!” रूत 3:7-8

मसीही जीवन आरामदायक क्षेत्र में नहीं जीया जाता।

रूत 3 में हम पाते हैं कि रूत ने बड़ा जोखिम उठाया जब वह बोअज़ के पास यह अनुरोध करने गई कि वह उसे अपनी पत्नी के रूप में अपनाए। वह, एक अकेली स्त्री, आधी रात को एक खलिहान में गई जहाँ केवल पुरुष थे, जो अभी-अभी फसल की कटनी के पूरा होने का उत्सव मना कर हटे थे। जब बोअज़ सो गया, तो वह अन्धेरे की आड़ में उसके पास गई और उसके पाँवों पर से चादर हटाई। यदि उसने कोई गलती की होती या पकड़ी गई होती, तो कहना मुश्किल है कि उन पुरुषों ने उसके साथ क्या किया होता या लोग उसकी मंशा के बारे में क्या कहते।

ये घटनाएँ हमारी 21वीं सदी की दृष्टि से अजीब लगती हैं, लेकिन रूत के असामान्य कार्य परमेश्वर की देखभाल और सुरक्षा में उसके सच्चे विश्वास को दर्शाते हैं। परमेश्वर ने अपने व्यवस्था-विधान में यह निर्धारित किया था कि बोअज़ एक निस्तारक-कुटुम्बी के रूप में—एक रक्षक और पालक के रूप में—रूत की सहायता कर सकता है। परमेश्वर ने अपने प्रावधान के अनुसार रूत को बोअज़ के खेत में पहुँचाया, जहाँ उसने रूत पर अनुग्रह किया। रूत की कहानी बार-बार यह दिखाती है कि परमेश्वर कैसे अपने लोगों की भलाई और अपनी महिमा के लिए सभी अनापेक्षित परिस्थितियों पर प्रभुता करता है।

रूत की तरह, हमें भी कभी-कभी जीवन में ऐसे अवसरों का सामना करना पड़ता है, जब हम अपने अगले कदम से आगे कुछ नहीं देख सकते। हममें से अधिकांश लोग तब तक प्रतीक्षा कक्ष में रहना पसन्द करते हैं, जब तक कि सारी बातें स्पष्ट और ज्ञात न हो जाएँ। हम सुरक्षित महसूस करना चाहते हैं और साथ ही चाहते हैं कि सब कुछ हमारे नियन्त्रण में रहे। लेकिन यदि हम तब तक कभी आगे नहीं बढ़ते जब तक हम ऐसा महसूस न करें, तो हमारा जीवन आध्यात्मिक प्रगति की बहुत कम गवाही देगा और परमेश्वर के अद्‌भुत कार्यों का बहुत कम साक्षी होगा। गलत दिशा में जाने का डर हमें आगे बढ़ने से पूरी तरह रोक देता है।

जब हम अपने अगले कदम से आगे नहीं देख सकते या जीवन में अनिश्चित समय आता है—और ऐसा समय आएगा!—तो हमें परमेश्वर पर विश्वास करना होगा और उसके वचन की सच्चाई के आधार पर कार्य करना होगा और उसके आत्मा की अगुवाई में भरोसा करना होगा। रूत की योजना न तो सुरक्षित थी और न ही निश्चित, लेकिन उसने आगे बढ़ने का निर्णय लिया क्योंकि वह उस परमेश्वर पर भरोसा करती थी, जिसने बार-बार अपनी विश्वासयोग्यता प्रमाणित की थी।

क्या आपको इस प्रकार सोचना आरम्भ करने की आवश्यकता है? क्या आपको अपने आराम क्षेत्र की सीमाओं से ऊपर और आगे देखना की आवश्यकता है, जहाँ परमेश्वर आपको बुला रहा है? यदि रूत विश्वास और आज्ञाकारिता से प्रेरित थी, तो आप किससे प्रेरित होते हैं? इस क्षण आपके जीवन में ऐसा क्या है, जो विश्वास को दर्शाता है? हो सकता है कि आपको कोई निर्णय लेना हो, कहीं जाना हो, कोई प्रयास करना हो, या कोई बातचीत करनी हो, जिसके सभी परिणाम आपको ज्ञात न हों, और आप केवल इतना कह सकते हैं, “मुझे बिल्कुल नहीं पता कि यह कैसे होगा, लेकिन यही वह है जिसके लिए परमेश्वर मुझे बुला रहा है।”

इन परिस्थितियों में परमेश्वर का वचन आपको बुद्धि का उपयोग करने और फिर विश्वास में एक-एक कदम करके आगे बढ़ने के लिए बुलाता है, उस पर भरोसा करते हुए जिसने आपके लिए प्राण दिए और जिसने यह प्रतिज्ञा की है, “मैं जगत के अन्त तक सदा तुम्हारे संग हूँ” (मत्ती 28:20)। अपने जीवन को अपने आराम क्षेत्र की सुरक्षा में नहीं, बल्कि परमेश्वर के सम्प्रभु हाथों में सौंप दें।

रूत 3

पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: 2 शमूएल 16–18; 1 यूहन्ना 5 ◊

31 October : दुःखाचे धर्म-विद्यालय

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31 October : दुःखाचे धर्म-विद्यालय
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 “माझी कृपा तुला पुरेशी आहे; कारण अशक्तपणातच माझी शक्ती पूर्णतेस येते.” (2 करिंथ 12:9)

ख्रिस्ती म्हणून आम्हांवर जी सर्व नाना प्रकारची संकटें व दुःखें येतांत त्यांमागे देवाचा सार्वत्रिक उद्देश हा आहे : देवामध्यें प्रगतीशील समाधान आणि स्वतःवर आणि जगावर ऱ्हासशील अवलंबन. “आयुष्यातील वास्तविक कठीण धडे मीं अगदी सहज आणि अनुकूल काळांतच शिकलो आहें” असे कोणी म्हटलेंलें मी कधीच ऐकले नाहीं.

उलट मी सशक्त पवित्र जनांना असे म्हणताना ऐकलें आहे कीं, “देवाच्या प्रीतिची खोली काय आहे ती जाणून घेण्यात आणि त्याच्याबरोबरचा माझा खोलवर सहवास यांत मी केलेंलीं प्रत्येक वैशिष्ट्यपूर्ण प्रगती ही दुःखांच्या माध्यमातूनच झालीं आहे.”

सर्वात मौल्यवान मोती म्हणजें ख्रिस्ताचा गौरव पाहणें.

अशाप्रकारे, पौल मोठ्या कळकळीने सांगतो कीं जेव्हां आपल्यावर दुःखें येतांत, तेव्हां ख्रिस्ताची पुरेशी जी कृपा ती पूर्णतेस येऊन तिचा गौरव वाढतो. जर आपण आपल्या सर्व संकटांत त्याच्यावर विसंबून राहतो, आणि आमचा जो “आशेचा हर्ष”  त्यांस तोच बळकट करतो, तर तो कृपा आणि सामर्थ्य यांचा संतोषकारक पुरवठा करणारा देव आहे हे प्रदर्शित केलें जाते.

जर आपण त्याला बळकटपणें धरून राहतो तर, “जेव्हा ह्या जगातील सर्व आशा सोडून जातांत,” तेव्हां आपण दाखवून देतो कीं आपण गमावलेल्या सर्व जगिक गोष्टींपेक्षा आपल्याला तो अधिक हवा हवासा आहे.

ख्रिस्ताने दुःख सहन करित असलेल्या ह्या प्रेषिताला म्हटलें, “माझी कृपा तुला पुरेशी आहे; कारण अशक्तपणातच माझी शक्ती पूर्णतेस येते.” म्हणून ख्रिस्ताच्या सामर्थ्याची छाया माझ्यावर राहावी म्हणून मी विशेषेकरून आपल्या अशक्तपणाची प्रौढी फार आनंदाने मिरवीन. ख्रिस्तासाठीं दुर्बलता, अपमान, अडचणी, पाठलाग, संकटे ह्यांत मला संतोष आहे; कारण जेव्हा मी अशक्त तेव्हाच मी सशक्त आहे” (2 करिंथ 12:9-10).

अशाप्रकारे देवानें दु:ख हे ख्रिस्ती विश्वासनार्यांनी स्वतःवर अवलंबून न राहता केवळ कृपेवर अवलंबून राहावें म्हणून केवळ नव्हें, तर त्या कृपेवर जोर द्यावा आणि तिला तेजस्वी स्वरूप द्यावें ह्या हेतूनें देखील त्यानें ते योजिलें आहे. विश्वास आम्हांमध्यें हीच कृति घडवून आणतो : तो ख्रिस्ताच्या भावी कृपेला उंचवितो.

देवामध्यें असलेल्या आपल्या जीवनाच्या खोल गोष्टींचा शोध आपल्याला दुःखातच लागतो आणि त्यांचा गौरव करतो.

30 अक्तूबर : परमेश्वर के प्रावधान की सान्त्वना

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30 अक्तूबर : परमेश्वर के प्रावधान की सान्त्वना
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“नाओमी ने उससे कहा, ‘हे मेरी बेटी, क्या मैं तेरे लिए ठाँव न ढूँढ़ूँ कि तेरा भला हो? अब जिसकी दासियों के पास तू थी, क्या वह बोअज़ हमारा कुटुम्बी नहीं है? वह तो आज रात को खलिहान में जौ फटकेगा। तू स्नान कर तेल लगा, और अच्छे वस्त्र पहिनकर खलिहान को जा।’” रूत 3:1-3

परमेश्वर सम्प्रभु है, इसलिए हम साहसिक निर्णय ले सकते हैं।

जैसे कोई भी भला व्यक्ति करता है, वैसे ही नाओमी भी चाहती थी कि उसकी विधवा बहू रूत का जीवन सुरक्षित और स्थिर हो। इसलिए उसने रूत से आग्रह किया कि वह बोअज़ के पास जाए और उससे विवाह करके जीवनभर की सुरक्षा की याचना करे।

निस्सन्देह, हमें इस पुराने नियम की कथा में आज के समय के विचारों को ज़रूरत से ज़्यादा नहीं डालना चाहिए, क्योंकि उस समय की अपनी सांस्कृतिक परम्पराएँ थीं। परन्तु यह भी याद रखना ज़रूरी है कि यह वास्तविक लोगों का वास्तविक जीवन था, जो एक वास्तविक मध्य-पूर्वी गाँव में एक जीवित परमेश्वर से मिल रहे थे और अपने जीवन को पूरी तरह से उसे समर्पित कर रहे थे।

इसलिए इसमें कुछ शाश्वत सत्य हैं, जिन्हें हम सीख सकते हैं। मुख्य रूप से, हम सीख सकते हैं कि हालाँकि परमेश्वर की सर्वशक्तिमान योजना हमारे जीवनों पर शासन करती है, तौभी वह हमारे निर्णय लेने की स्वतन्त्रता को सीमित नहीं करती। परमेश्वर की प्रभुता न तो नाओमी की सोच को रोकती है, न ही रूत की प्रतिक्रिया को। प्रभु उन सभी बातों पर प्रभुत्व रखता है, लेकिन वह उनके चुनावों को जबरन प्रभावित नहीं कर रहा था।

रूत की कहानी यह भी याद दिलाती है कि भले ही गलतियाँ हमारे जीवन की दिशा को बदल दें, तौभी परमेश्वर उन्हें हमारे अन्तिम भले और अपनी महिमा के लिए छुटकारे में बदल देता है। नाओमी के पति को अपने परिवार को प्रतिज्ञा के देश से परमेश्वर की प्रजा के शत्रु देश मोआब में नहीं ले जाना चाहिए था; और उसके बेटों को मोआबी स्त्रियों से विवाह नहीं करना चाहिए था, क्योंकि परमेश्वर के व्यवस्था-विधान के अनुसार अन्य धर्मों के लोगों से विवाह करने की मनाही थी। फिर भी इन गलत चुनावों ने रूत को नाओमी तक पहुँचाया, परमेश्वर तक पहुँचाया, और यीशु के पूर्वज के रूप में उसे उद्धार की वंशावली में शामिल कर दिया (मत्ती 1:1-6)।

इस प्रकार का छुटकारा जानबूझकर विद्रोह करने का बहाना नहीं है, बल्कि यह निरन्तर आश्वासन है कि हमें अपने अतीत की गलतियों के कारण निराश होने की आवश्यकता नहीं है। उसी प्रकार, परमेश्वर की प्रभुता—जो पहले उसके पुत्र को संसार में लाकर और फिर अपने लोगों को उसमें विश्वास करने के लिए बुलाकर उसके छुटकारे की योजना को बुनती है—तब हमारे लिए निरन्तर आश्वासन बनी रहती है, जब हम निर्णयों का सामना करते हैं और इस या उस मार्ग को चुनने का विचार करते हैं।

हम विश्वास से भरे कार्यों के माध्यम से परमेश्वर पर भरोसा करते हैं। नाओमी बस अपने घर में बैठकर परमेश्वर के चमत्कार की प्रतीक्षा नहीं करती रही और यह नहीं कहती रही, जो होगा देखा जाएगा। नहीं—उसने कार्य किया, उसने रूत को आगे बढ़ने और अगला कदम उठाने को कहा, जो कि परमेश्वर की योजना का हिस्सा लगता था। परमेश्वर की प्रभुता पर विश्वास का अर्थ यह नहीं कि हम निष्क्रिय होकर बस योजना को घटित होते हुए देखें और Que será, será गाते रहें—अर्थात जो होना है, वह होकर रहना है—क्योंकि “भविष्य हमारे हाथों में नहीं है”[1]

इसके बजाय, हमें यीशु के शब्दों को दोहराना चाहिए: “मेरी नहीं परन्तु तेरी ही इच्छा पूरी हो” (लूका 22:42)। इस प्रार्थना को करने के बाद यीशु ने इसे अपने जीवन में पूरी तरह आज्ञाकारिता से जीया, यहाँ तक कि मृत्यु तक। जीवन का मार्ग चाहे जितना भी टेढ़ा-मेढ़ा हो, परमेश्वर का वचन यह प्रतिज्ञा करता है: “कि जो लोग परमेश्‍वर से प्रेम रखते हैं, उनके लिए सब बातें मिलकर भलाई ही को उत्पन्न करती हैं; अर्थात् उन्हीं के लिए जो उसकी इच्छा के अनुसार बुलाए हुए हैं” (रोमियों 8:28)। इस प्रतिज्ञा में ढाढ़स रखें।

क्या आप किसी निर्णय का सामना कर रहे हैं? क्या आप सोच रहे हैं कि कौन सा मार्ग चुनें? परमेश्वर सम्प्रभु है और वह उद्धार करता है। आप जो भी निर्णय लें, परमेश्वर के प्रावधान की सान्त्वना के भीतर साहसपूर्वक और स्वतन्त्र रूप से जीवन जीएँ।

प्रेरितों 16:6-15

◊ पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: 2 शमूएल 14–15; 1 यूहन्ना 4


[1] रेय इवैंस, “क्यू सेरा, सेरा” (1956).

30 October : वाहवत जाण्याचा धोका

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30 October : वाहवत जाण्याचा धोका
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ह्या कारणामुळें ऐकलेल्या गोष्टींकडे आपण विशेष लक्ष लावले पाहिजे, नाहीं तर आपण त्यांपासून वाहवत जाऊ. (इब्री 2:1)

आपल्यांपैकीं प्रत्येकाला हे ठाऊकच आहे कीं वाहवत जाण्याच्या घटना झाल्यां आहेत. कोणतीही तत्परता नाहीं. दक्षता घेणें नाहीं. लक्ष लावून ऐकणें किंवा ऐकलेल्या गोष्टींवर काळजीपूर्वक विचार करणें नाहीं, कीं येशू ह्याच्यावर आपलें लक्ष केंद्रित करणें नाहीं, आणि परिणामी विश्वासांत टिकाव धरून उभें न राहता त्यांपासून वाहवत जाणें.

येथे तोच मुद्दा आहे : ते विश्वासांत टिकाव धरून राहत नाहींत. जगिक जीवन म्हणजें काहीं सरोवर नाहीं. ते एका नदीप्रमाणें आहे. आणि ते विनाशाकडे वाहवत जात आहे. येशू काय म्हणतो त्याकडे जर तुम्हीं विशेष लक्ष लावत नाहीं आणि प्रती दिवशी त्याजवर चिंतन-मनन करित नाहीं आणि क्षणोक्षणी त्याच्याकडे आपली दृष्टि लावलेली ठेवित नाहीं तर तुम्हीं टिकाव धरणार नाहीं; तुम्हीं मागे जाल. तुम्हीं ख्रिस्तापासून दूर जाल.

वाहवत जाणें ही ख्रिस्ती जीवनासाठीं विनाशकारक गोष्ट आहे. आणि जसे इब्री 2:1 सांगते, यावर एकच उपाय आहे : तुम्हीं ऐकलेल्या गोष्टींकडे विशेष लक्ष लावा. म्हणजेंच, देव त्याचा पुत्र येशू ह्याच्याद्वारें काय म्हणत आहे त्यावर काळजीपूर्वक विचार करा. देवाचा पुत्र, येशू ख्रिस्त ह्याच्याद्वारें देव जें बोलत आहे आणि जें करत आहे त्यावर आपले लक्ष केंद्रित करा (किंवा पाहत असावे).

हे कौशल शिकणें म्हणजें नदींत पोहण्यासाठीं हात-पाय मारण्याचे कौशल शिकण्याइतके कठीण नाहीं. फक्त एक गोष्ट जी आपल्याला ह्या पापी संस्कृतीच्या विपरीत दिशेनें पोहण्यास प्रतिरोध करते ती म्हणजें पोहण्यासाठीं हात-पाय मारण्यांस लागणारे परिश्रम नाहीं तर प्रवाहाबरोबर जाण्याची आपली पापी प्रवृत्ती, ही मूळ समस्या आहे.

देवानें आपल्याला कठीण काम दिलें, अशी तक्रार आपण करू नये. ऐका, त्यावर काळजीपूर्वक विचार करा, आपले लक्ष केंद्रित करा (किंवा पाहत असा)— याला तुम्हीं कठीण कामाचे विवरण म्हणू शकत नाहीं. खरे पाहता, हे कामाच्या स्वरूपाचे वर्णन नाहीं. आपण येशूनें केलेंल्या कामामध्यें संतुष्ट असावे यासाठीं हे एक निकडीचे पाचारण आहे जेणेंकरून आपण आपल्या फसव्या इच्छांनी बहकून जाऊ नये.

जर तुम्हीं आज वाहवत जात असाल, तर तुमचा नव्याने जन्म झाला आहे या आशेच्या लक्षणांपैकीं एक म्हणजें हे वाचल्यावर तुम्हांला तुमच्या अं:तकरणात टोचल्यासारखे जाणवत आहे आणि आपण येशूकडे आपली दृष्टि फिरवावी आणि त्याच्याकडे आपलें लक्ष्य केंद्रित करावें आणि दिवसोंदिवस, महिनोन्महिने, आणि वर्षानुवर्षे त्याचे पूर्ण लक्ष देऊन ऐकावें अशी कळकळीची उत्कंठा तुमच्यांत वाढत चालली आहे.

29 अक्तूबर : परमेश्वर की कृपा को दूसरों तक बढ़ाना

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29 अक्तूबर : परमेश्वर की कृपा को दूसरों तक बढ़ाना
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“उसने अपनी सास को बता दिया कि मैंने किसके पास काम किया, और कहा, ‘जिस पुरुष के पास मैं ने आज काम किया उसका नाम बोअज़ है।” नाओमी ने अपनी बहू से कहा, “वह यहोवा की ओर से आशीष पाए, क्योंकि उसने न तो जीवित पर से और न मरे हुओं पर से अपनी करुणा हटाई!’” रूत 2:19-20

आज आप अदृश्य परमेश्वर को दृश्य बना सकते हैं।

जब रूत खेतों में अनाज बीनने के लिए निकली, तो उसे यह कभी नहीं पता था कि परमेश्वर का प्रावधान कितना अद्‌भुत होगा। वह परमेश्वर में शरण में तो आ ही चुकी थी, लेकिन बोअज़ के माध्यम से उसने यह अनुभव किया कि प्रभु उसकी सोच या उसके मांगने से कहीं अधिक करने में सक्षम था।

जब परमेश्वर ने इस्राएल के साथ अपनी वाचा स्थापित की, तो उसने अपनी कृपा का परिचय इस रूप में दिया कि वह “अनाथों और विधवाओं का न्याय चुकाता, और परदेशियों से ऐसा प्रेम करता है कि उन्हें भोजन और वस्त्र देता है” (व्यवस्थाविवरण 10:18)। उसने अपना व्यवस्था-विधान अपने लोगों को इसलिए नहीं दिया था कि वे कर्मकाण्डवादी बन जाएँ, बल्कि इसलिए कि वे उसके गुणों को प्रदर्शित करें और अपने आज्ञापालन के माध्यम से उसके नाम की महिमा करें। उस व्यवस्था-विधान के एक हिस्से ने कठिनाई में जी रहे लोगों के लिए प्रावधान करने का एक ढांचा प्रदान किया था।

जब बोअज़ ने व्यवस्था-विधान के निर्देश का पालन करते हुए रूत को भोजन करने के लिए आमन्त्रित किया (रूत 2:14), तो उसने यह कृपापूर्वक किया। उसने परमेश्वर की कृपा प्राप्त की थी, और उसे यह एहसास हुआ कि वह इसे दूसरों के साथ साझा कर सकता है। उसने परमेश्वर के आदेशों का पालन करने के लिए सचमुच हाथ-पैर लगाए और इसके परिणामस्वरूप रूत ने परमेश्वर का हृदय और भी अधिक जाना। इसके अतिरिक्त, बोअज़ की कृपा उदारता के साथ जुड़ी हुई थी: उसने रूत को केवल भोजन करने का आमन्त्रण नहीं दिया, बल्कि उसे अपनी फसल काटने वाले मजदूरों के बीच बैठने का स्थान भी दिया। उसने उसे अपनी तृप्ति तक खाने के लिए प्रोत्साहित किया। उसने उसे केवल बाकी बचा हुआ अनाज नहीं, बल्कि गेहूँ के सबसे अच्छे पूलों में से अन्न लेने की अनुमति दी। उसके सामाजिक और जातीय भेदभाव के बावजूद उसने रूत को अलग-थलग नहीं किया, और न ही उसे दूरी पर रखा।

इसके विपरीत, बोअज़ ने परमेश्वर के व्यवस्था-विधान से कहीं अधिक किया। यह उस स्वागत की केवल एक झलक है, जो परमेश्वर मसीह के माध्यम से हमें प्रदान करता है, जब वह हमें अपनी स्वर्गिक मेज़ पर आमन्त्रित करता है। और यह वही प्रस्ताव है जिसे हम सभी मसीहियों को अपने जीवन में प्रदर्शित करना चाहिए। यदि कोई—चाहे वह विधवा हो, गरीब हो, दुखी हो या कड़वाहट से भरा हो—कलीसिया की सभा या किसी मसीही घर में प्रवेश करता है, तो वहाँ उसे विश्वासयोग्य स्वीकृति का अनुभव होना चाहिए, क्योंकि परमेश्वर की प्रजा उसकी वाचागत देखभाल को अपने जीवन से प्रकट करती है।

दिन के अन्त तक, रूत बोअज़ द्वारा बार-बार दिखाए जा रहे अनुग्रह से अभिभूत हो गई थी। जब वह अपने प्रचुर प्रावधान के साथ घर लौटी, तो नाओमी ने उस उदारता पर आनन्दित होकर उसका वर्णन ख़ेसेद शब्द से किया—जो परमेश्वर की निरन्तर प्रेममय करुणा और दयालु प्रावधान को दर्शाता है। बोअज़ के ख़ेसेद ने रूत और नाओमी के हृदयों को उस परमेश्वर की आराधना करने के लिए प्रेरित किया जो ख़ेसेद में भरपूर है (निर्गमन 34:6-7)।

बोअज़ की कृपा उस अनुग्रहपूर्ण, उदार, और निरन्तर करुणा से प्रवाहित हुई जो उसने स्वयं परमेश्वर से प्राप्त की थी। प्रभु की देखभाल के सह-प्राप्तकर्ता होने के नाते जब हम दूसरों पर ऐसी करुणा दर्शाते हैं, तब वे भी परमेश्वर को जान सकते हैं। अदृश्य परमेश्वर हर पीढ़ी में अपने लोगों की करुणा के माध्यम से दृश्य हो जाता है। आज आप किस पर ऐसी अनुग्रहपूर्ण, उदार, और अप्रत्याशित करुणा प्रकट करेंगे?

रूत 2:14-23

पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: 2 शमूएल 12–13; 1 यूहन्ना 3 ◊

29 October : पाप, सैतान, आजार किंवा विध्वंस

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29 October : पाप, सैतान, आजार किंवा विध्वंस
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“हा माझ्यापासून दूर व्हावा अशी मी प्रभूजवळ तीनदा विनंती केलीं; परंतु त्यानें मला म्हटलें आहे, “माझी कृपा तुला पुरेशी आहे; कारण अशक्तपणातच माझी शक्ती पूर्णतेस येते.” म्हणून ख्रिस्ताच्या सामर्थ्याची छाया माझ्यावर राहावी म्हणून मी विशेषेकरून आपल्या अशक्तपणाची प्रौढी फार आनंदाने मिरवीन. (2 करिंथ 12:8-9)

ख्रिस्ती लोकांना छळवणूकमुळें उद्भवणारी संकटें व दुःखें यांमुळें ज्यां वेदना सोसाव्या लागतांत त्यां कर्करोगामुळें सोसाव्या लागणाऱ्या वेदनांसारख्यांच असतांत का? जर देवानें एखाद्या गोष्टी संदर्भात काहीं अभिवचनें दिलीं तर ती दुसऱ्या गोष्टींवर देखील लागू होतांत का? माझे उत्तर होय आहे. संपूर्ण जीवन, जेव्हां ते देवाच्या गौरवासाठीं आणि इतरांचे तारण व्हावें या कळकळीने विश्वासाद्वारें जगले जाते, तर अशा जीवनांत कोणती ना कोणती अडखळणें आणि दुःखें येतीलच. आज्ञाधारक जीवन जगण्यासाठीं ख्रिस्ती लोकांना जी किंमत मोजावी लागते, दुःखें ही त्याचा एक अविभाज्य भाग आहे जी सोसून तुम्हीं देवानें केलेंलें पाचारण अनुसरत असतां.

ख्रिस्त ज्या मार्गाने घेऊन जातो त्या मार्गाने त्याच्या मागे मागे जाण्याचा निर्धार करून, आपण या मार्गात त्यानें त्याच्या सार्वभौम इच्छेने ज्यां ज्यां गोष्टीं नेमून दिल्यां आहें त्या सर्व गोष्टी निवडतो. अशाप्रकारे, आज्ञाधारकतेच्या मार्गात येणारी सर्व दुःखें व संकटें ही ख्रिस्तासोबत आणि ख्रिस्तासाठीं सोसलेलीं दुःखें व संकटें असतांत- मग ती घरातच झालेला कर्करोग असो किंवा बाहेर अविश्वासणाऱ्यांनी मांडलेला आपला करणारा छळ असो.

शिवाय, ती आपण “निवडलेलीं” असतांत — म्हणजें, जिथें जिथें दुःख आपल्यावर येतांत तिथें तिथें आपण स्वेच्छेने आज्ञाधारकतेचा मार्ग निवडतो आणि आपण देवाविरुद्ध कुरकुर करत नाहीं. आपण अशी प्रार्थना करूं — जशी पौलाने केलीं — कीं हे दुःख माझ्यापासून दूर व्हावे (2 करिंथ 12:8); परंतु जर देवाची इच्छा असेल, तर स्वर्गाच्या मार्गावर असतांना आज्ञाधारक शिष्य म्हणून आम्हांला जी किंमत मोजावी लागते तिचा एक भाग म्हणून आम्हीं ती स्वीकारतो.

ख्रिस्ती आज्ञाधारकतेच्या मार्गात सोसावी लागणारी सर्व संकटें व दुःखें, मग ती छळामुळें उद्भवोत किंवा आजार किंवा अपघात यांमुळें उद्भवोत, त्यां सर्वांचा स्वभावगुण हा एकच आहे : ती सर्व देवाच्या चांगुलपणावर आपल्या विश्वासाला धोका निर्माण करतांत आणि आपण आज्ञाधारकतेचा मार्ग सोडून द्यावा म्हणून प्रवृत्त करतांत.

म्हणून, विश्वासाचा आपला प्रत्येक विजय, आणि आज्ञाधारकतेमध्यें आपली सर्व चिकाटी, ही सर्व देवाच्या चांगुलपणाची आणि ख्रिस्तच आमच्यासाठीं सर्वकाही आहे याची साक्ष देतांत – मग तो शत्रू आजार, सैतान, पाप असो किंवा विध्वंस असो. म्हणून, आपल्या ख्रिस्ती पाचारणाच्या मार्गात आपण सहन करत असलेलीं सर्व दुःखें, नाना प्रकारची सर्व दुःखें ही “ख्रिस्ताबरोबर” आणि “ख्रिस्तासाठीं” आहेंत.

त्याच्याबरोबर  या अर्थाने कीं आपण त्याच्याबरोबर विश्वासाने चालत असताना दुःखें आपल्यावर येतांत, आणि या अर्थाने देखील कीं आपण ती सर्व दु:खें त्यां सामर्थ्याने सहन करतो जो तो आपल्याला त्याच्या सहानुभूतीपूर्ण महायाजकीय सेवेद्वारे पुरवतो (इब्री 4:15).

आणि त्याच्यासाठीं  या अर्थाने कीं ही दुःखें आपण त्याचा चांगुलपणा आणि सामर्थ्य यांवर किती विश्वास ठेवितो याची कसौटी घेऊन तो प्रमाणित केला जातो, आणि या अर्थाने देखील कीं ही दुःखें तोंच सर्वांमध्यें सर्वकाही भरून काढतो याबाबतींत त्याची योग्यता प्रकट करतांत.

28 अक्तूबर : चौकस रहो!

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28 अक्तूबर : चौकस रहो!
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“कुत्तों से चौकस रहो, उन बुरे काम करने वालों से चौकस रहो, उन काट कूट करने वालों से चौकस रहो। क्योंकि खतना वाले तो हम ही हैं।” फिलिप्पियों 3:2-3

प्रेरित पौलुस ने अपनी सभी पत्रियों में शायद ही कहीं इतना तीव्र और स्पष्ट वक्तव्य दिया हो जितना इस पद में दिया है। अपने समय के झूठे शिक्षकों को “कुत्ते” कहकर सम्बोधित करना आज की तुलना में उस समय और भी अधिक साहसी और टकरावपूर्ण था। लेकिन पौलुस ने इस भाषा का उपयोग केवल प्रभाव डालने के लिए नहीं किया; वह गम्भीर रूप से चिन्तित था क्योंकि कुछ खतरनाक लोग फिलिप्पी की कलीसिया में घूम रहे थे।

झूठे सम्प्रदाय और झूठे शिक्षक प्रायः आनन्दहीन होते हैं, और फिलिप्पी के ये दुष्ट पुरुष कोई अपवाद नहीं थे। वे जो होने का दावा करते थे, उससे बिल्कुल विपरीत थे—वे इस बात पर ज़ोर दे रहे थे कि पुराने नियम की धार्मिक विधियाँ सच्चे मसीही होने के लिए आवश्यक थीं। वे उन फिलिप्पी विश्वासियों से, जिन्होंने प्रभु में आनन्द प्राप्त किया था, मूल रूप से यह पूछ रहे थे: यदि तुम बाहरी खतना की विधि पर ध्यान नहीं देते तो क्या तुम सच में सच्चे मसीही हो? पौलुस की यह चेतावनी कि “चौकस रहो” (फिलिप्पियों 3:2), इस युवा कलीसिया को यह स्मरण दिलाने के लिए थी कि जब मसीही विश्वास में कुछ जोड़ दिया जाता है, तो वह वास्तव में सुसमाचार को बिगाड़ देता है। सुसमाचार में कुछ भी जोड़ने से हमेशा उसमें से आनन्द और यहाँ तक कि उद्धार भी निकल जाता है।

इसलिए जब हम इस पद में “कुत्ते” शब्द पढ़ते हैं, तो हमें एक प्यारे पारिवारिक पालतू जानवर की कल्पना नहीं करनी चाहिए। पौलुस यहाँ किसी गोल्डन रिट्रीवर की बात नहीं कर रहा था। इसके बजाय, एक ऐसे आवारा, रोगग्रस्त कुत्ते की कल्पना करें जो कूड़ेदानों के आस-पास घूमता रहता है और जिसके काटने से आप गम्भीर रूप से घायल हो सकते हैं। पौलुस ने यह स्पष्ट रूप से कहा कि ये लोग, जो अनुग्रह के योग्य बनने के लिए लोगों से विधिवत आवश्यकताओं को पूरा करने की मांग कर रहे थे, उन कुत्तों के समान ही खतरनाक थे। वे मसीह से ध्यान हटा रहे थे और उसकी मृत्यु, पुनरुत्थान, और स्वर्गारोहण की पर्याप्तता को कम कर रहे थे।

पौलुस ने लगातार झूठी शिक्षा के दुखद परिणामों के बारे में चेतावनी दी—और क्योंकि वह फिलिप्पी की कलीसिया के लोगों से प्रेम करता था, उन्हें अपना “आनन्द और मुकुट” (फिलिप्पियों 4:1) कहकर सम्बोधित करता था, इसलिए वह किसी भी व्यक्ति और किसी भी चीज़ का विरोध करता था जो उन्हें महिमा के एकमात्र मार्ग से भटका देती। वह चाहता था कि वे चौकस रहें।

हम भी बहुत आसानी से यह भूल सकते हैं कि सुसमाचार का सन्देश केवल यह है, “अपना सर्वोत्तम करो और पर्याप्त रूप से अच्छे बनो!” जबकि सुसमाचार का सच्चा सन्देश यह है: “तुम्हारा सर्वोत्तम कभी पर्याप्त नहीं होगा—परन्तु यीशु पर्याप्त है।”

इसलिए शुभ समाचार यह है: केवल मसीह में विश्वास के द्वारा हम सच्चा “खतना” हैं—अर्थात वे लोग जो परमेश्वर की सच्ची प्रजा के रूप में अलग किए गए हैं, इसलिए नहीं कि हमारे शरीर से कुछ काटा गया है, बल्कि इसलिए कि मसीह हमारे लिए काटा गया। हर पीढ़ी में कुछ लोग होते हैं जो विश्वास के बाहरी रूपों पर ज़ोर देते हैं और—प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से—उन रीति-रिवाजों को उद्धार के लिए आवश्यक बना देते हैं। लेकिन कोई भी बाहरी अनुष्ठान या धार्मिक कार्य हमें उद्धार नहीं दे सकता। अपने शरीर पर भरोसा न रखें—न अपनी कलीसिया में उपस्थिति पर, न अपनी दैनिक बाइबल पढ़ने की आदत पर, न अपने पति या पत्नी, माता-पिता, कर्मचारी या सुसमाचार प्रचारक के रूप में प्रदर्शन पर। अपना सारा भरोसा मसीह में रखें। वह और केवल वही पर्याप्त है।

गलातियों 2:11-21

◊ पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: 2 शमूएल 9–11; 1 यूहन्ना 2

28 October : शंभर पटीनें परत फेड

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28 October : शंभर पटीनें परत फेड
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“मी तुम्हास खरे सांगतो, ज्याने ज्याने माझ्याकरिता व सुवार्तेकरिता घरदार, बहिण, भाऊ, आईवडील, मुलेबाळे किंवा शेतीवाडी सोडली आहे, अशा प्रत्येकाला शेवटच्या काळी छळणुकीबरोबर शंभरपटीने घरे, भाऊ, बहिणी, आया, मुले, शेते आणि येणाऱ्या युगात सार्वकालिक जीवन मिळाल्याशिवाय राहणार नाहीं.” (मार्क 10:29-30)

येथें येशूच्या बोलण्याचा अर्थ असा आहे कीं तुमच्या प्रत्येक बलिदानाची परतफेड तो स्वतःने भरून काढील.

  • जर तुम्हीं तुमच्याशी घनिष्ठ असलेल्या तुमच्या ममताळू आईचा आणि तिच्या सान्निध्याचा त्याग करतां, तर तुम्हांबरोबर सर्वकाळ उपस्थित राहणारा जो ख्रिस्त याजकडून तुम्हांला शंभरपटीने ममता आणि सान्निध्य प्राप्त होईल.
  • जर तुम्हीं तुमच्या जिवलग भावाबरोबर असलेल्या उदार व प्रेमळ सहचर्याचा त्याग करतां, तर तुम्हाला ख्रिस्ताकडून  शंभरपटीने उदार व प्रेमळ सहचर्य प्राप्त होईल.
  • जर तुम्हीं तुम्हांला तुमच्या घरात मिळत असलेली विश्रांती व सुरक्षितपणाची भावना सोडून देतां, तर जेव्हां तुम्हाला कळेल कीं तुमचा प्रभू हाच प्रत्येक घराचा स्वामी आहे, तेव्हां तुम्हाला शंभरपटीने विश्रांती आणि सुरक्षितता प्राप्त होईल.

जें तरुण मिशनरी होऊं पाहत आहें, त्यांना येशू म्हणतो, “मी अभिचचन देतों कीं मीं तुमचे सर्व श्रम साध्य करीन, आणि तुम्हांबरोबर असा राहीन कीं तुम्हीं कधी कोणत्या गोष्टीचा त्याग केला असे तुम्हीं म्हणूंच शकणार नाहीं.”

पेत्रानें आपली “त्याग” करण्याची भावना व्यक्त केलीं त्यावेळी येशूचा विरोधी-पवित्रा काय होता? पेत्र म्हणाला, “पाहा, आम्हीं सर्व सोडले आहे आणि आपल्यामागे आलो आहोत” (मार्क 10:28). येशूनें “आत्मत्याग” करण्याची जी आज्ञा आम्हांला दिलीं त्या आत्मत्यागाची ही भावना आहे का? नाहीं, त्यानें अशा भावनेला फटकारलें.

येशू पेत्राला म्हणाला, “ज्याची मी शंभरपटीने परतफेड करणार नाहीं असा त्याग माझ्यासाठीं कोणीही कधीच करूं शकत नाहीं- होय, एका अर्थाने या जीवनातच, येणाऱ्या युगात जे सार्वकालिक जीवन मिळेल त्याची तर बातच नको.”