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4 सितम्बर : विवाह के लिए परमेश्वर की योजना

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4 सितम्बर : विवाह के लिए परमेश्वर की योजना
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“इस कारण पुरुष अपने माता–पिता को छोड़कर अपनी पत्नी से मिला रहेगा, और वे एक ही तन बने रहेंगे। आदम और उसकी पत्नी दोनों नंगे थे, पर लजाते न थे।” उत्पत्ति 2:24-25

विवाह परमेश्वर द्वारा दिया गया एक उपहार है, जिसे हमने अपने पाप के कारण मलिन कर दिया है। ये बाइबल-पद एक पूर्ण विश्वास से भरे, पूर्ण रूप से निर्बोध, और प्रेम में पूर्णतः एकता से जुड़े हुए सम्बन्ध को दर्शाते हैं। दुर्भाग्यवश, पतित संसार में रहने का एक स्पष्ट प्रभाव यह है कि फिल्मों के अतिरिक्त वास्तविक जीवन में कोई भी विवाह केवल और हमेशा ऐसा नहीं होता। मानव पाप का सबसे बड़ा दुख यह है कि हमारी प्रवृत्ति ही यह है कि हम परमेश्वर द्वारा बनाई गई अच्छी चीज़ों को भ्रष्ट कर दें, जिससे विवाह की सुन्दरता और आनन्द, जैसा कि परमेश्वर ने उसे रचा था, नष्ट हो जाता है। लेकिन एक आशा है! विश्वासियों के लिए, परमेश्वर का आत्मा हमें विवाह को उसकी मूल योजना के अनुसार समझने में सहायता करता है।

सबसे पहले, हमें यह स्वीकार करना होगा कि मसीह के बिना, हम सभी परमेश्वर की योजना के विरुद्ध विद्रोह में जी रहे हैं। समस्या केवल यह नहीं कि हम विवाह के स्वरूप को लेकर भ्रमित हैं, बल्कि यह भी है कि हमारी पाप से भरी इच्छाएँ विवाह की हमारी थोड़ी सी समझ को भी पूरी तरह अस्वीकार कर देती हैं। आज के संसार में विवाह को अक्सर एक बन्धन, एक सीमा, या एक पुरानी परम्परा के रूप में देखा जाता है, जो अब किसी काम की नहीं। यदि हम विवाह को इसी दृष्टि से देखते हैं, तो इसका कारण यह है कि हमारी प्रवृत्ति यही कहने की है, “मुझे परमेश्वर की योजना पसन्द नहीं। मैं इसे अपनी तरह से करूँगा।”

लेकिन जब हम मसीह में होते हैं, तब परमेश्वर हमें विवाह को उसकी योजना के अनुसार देखने की बुद्धि और सामर्थ्य प्रदान करता है। चाहे कोई भी सरकार कुछ भी तय करे, पवित्रशास्त्र पूरी तरह स्पष्ट है कि विवाह केवल एक पुरुष और एक स्त्री के बीच ही हो सकता है और न तो एक पुरुष एक से अधिक पत्नी रख सकता है और न ही एक स्त्री एक से अधिक पति रख सकती है। यही विवाह का मूल स्वरूप है, क्योंकि यही वह योजना है जिसे परमेश्वर ने सृष्टि के आरम्भ से निर्धारित किया था (उत्पत्ति 2)। यीशु ने भी उत्पत्ति 2 में विवाह के वर्णन को प्रमाणित किया और कहा कि परमेश्वर की योजना आरम्भ से लेकर अभी तक कभी नहीं बदली (मत्ती 19:4-6)।

हमें बाइबल को आधुनिक समाज के अनुसार बदलने या उसमें संशोधन करने का प्रयास नहीं करना चाहिए। यद्यपि यह पतित संसार बाइबल-आधारित विवाह के स्वरूप को अस्वीकार कर सकता है, परन्तु यदि हम विश्वास करते हैं कि बाइबल परमेश्वर का वचन है, तो हम उसकी शिक्षाओं का पालन करेंगे—अपने स्वयं के जीवन में, और जब हम दूसरों के विवाह के बारे में बात करते हैं और उनके लिए प्रार्थना करते हैं।

विश्वासियों के रूप में, हमें यह पहचानना चाहिए कि हर संस्कृति और हर युग में विवाह के प्रति परमेश्वर का उद्देश्य यह है कि यह मसीह के प्रेम और उसके लोगों के प्रति उसकी प्रतिबद्धता को प्रतिबिम्बित करे (इफिसियों 5:22-25)। और हमें यह भी याद रखना चाहिए कि जो कुछ पाप के कारण नष्ट और विकृत हो गया है, उसे प्रभु यीशु पुनर्स्थापित करने और सुधारने आया था।

केवल मसीह में और मसीह के द्वारा ही हम विवाह को परमेश्वर की योजना और स्वरूप के अनुसार देख सकते हैं। जहाँ संसार कहता है कि हम अपनी मर्जी से जीएँगे, वहीं परमेश्वर हमें प्रेमपूर्वक आमन्त्रित करता है कि हम अपने हृदय को उसकी योजना के अधीन करें। कुछ लोगों के लिए इस क्षेत्र में परमेश्वर की आज्ञाओं का पालन करना एक बड़े व्यक्तिगत बलिदान की मांग कर सकता है। और हम सब के लिए, 21वीं सदी में, संसार के मार्ग का विरोध करने और परमेश्वर के मार्ग पर दृढ़ता से चलने के लिए साहस की आवश्यकता होगी। आपकी विशेष परिस्थिति और सन्दर्भ में, परमेश्वर द्वारा विवाह जैसे महान उपहार के लिए बनाई गई उसकी योजना को प्रतिबिम्बित करने वाले ढंग से सोचना, बोलना और कार्य करना आपके लिए क्या मायने रखेगा?

उत्पत्ति 2

◊ पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: भजन 143–145; 2 कुरिन्थियों 13

4 September : नव्या कराराविषयी नवे असे काय आहे

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4 September : नव्या कराराविषयी नवे असे काय आहे
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“त्या दिवसांनंतर मी इस्राएलच्या घराण्याशी हा करार करीन, असे परमेश्वर म्हणतो: मी माझा नियम त्यांच्यामध्यें ठेवीन आणि मी ते त्यांच्या हृदयावर लिहीन. आणि मी त्यांचा देव होईन आणि ते माझे लोक होतील.” (यिर्मया 31:33)

येशू आज्ञा आणि प्रीति यांमध्यें असलेली कोणतीही अजोड आडभिंत उद्ध्वस्त करून टाकतो.

तो म्हणतो, “माझ्यावर तुमची प्रीति असली तर तुम्हीं माझ्या आज्ञा पाळाल. . . . ज्याच्याजवळ माझ्या आज्ञा आहेत व जो त्या पाळतो तोच माझ्यावर प्रीति करणारा आहे; आणि जो माझ्यावर प्रीति करतो त्याच्यावर माझा पिता प्रीति करील” (योहान 14:15, 21). “जसा मी आपल्या पित्याच्या आज्ञा पाळून त्याच्या प्रीतित राहतो तसे तुम्हीं माझ्या आज्ञा पाळाल तर माझ्या प्रीतित राहाल” (योहान 15:10).

आज्ञा आणि आज्ञापालन या दृष्टीने विचार केला, तर ह्या दोन्हीं गोष्टी येशूला त्याच्या पित्याच्या प्रीतिचा आनंद घेण्यापासून थांबवू शकल्या नाहीं. म्हणून त्याला अशी अपेक्षा आहे कीं आपण जेव्हां त्याच्याकडें आज्ञा देणारा प्रभू म्हणून पाहतो तेव्हां त्याच्याबरोबरचे असलेले आपलेंही प्रीतिचे नाते धोक्यात येणार नाहींत.

हे लक्षात घेणें अत्यंत महत्त्वाचे आहे कारण येशू ख्रिस्ताद्वारे देवाबरोबर असलेले आपलें नव्या कराराचे नाते म्हणजें असा करार नाहीं जो आज्ञांविरहित असेल. देवानें मोशेच्या द्वारे देऊ केलेंला जुना करार आणि देवानें ख्रिस्ताद्वारे देऊ केलेंला नवा करार यातील मूलभूत फरक हा नाहीं कीं एका करारात आज्ञा होत्या आणि दुसऱ्या करारात आज्ञा नाहींत.

यां दोन करारातील मुख्य फरक पुढीलप्रमाणें आहे: (1) मशीहा, म्हणजें येशू प्रकट झाला आणि त्यानें नव्या कराराचे रक्त ओतले (मत्तय 26:28; इब्री 10:29) जेणेंकरून यापुढे त्यानें ह्या नव्या कराराचा मध्यस्थ व्हावे, जेणेंकरून सर्वांचे तारण व्हावे, करार पाळणारा विश्वास हा त्याच्यावर जाणीवपूर्वक विश्वास आहे; (2) त्यामुळें जुना करार “जीर्ण” झाला आहे (इब्री 8:13) आणि नव्या कराराचे म्हटलेले जें देवाचे लोक त्यांच्यावर यापुढे त्याचे आधिपत्य चालत नाहीं (2 करिंथ 3:7-18; रोम 7:4,6; गलती 3:19) ; आणि (3) वचनदत्त नवे हृदय आणि पवित्र आत्म्याचे समर्थ बनविणारे सामर्थ्य हे विश्वासाद्वारे देण्यांत आलेंले आहेंत.

जुन्या करारात, आम्हांला देवाची आज्ञा पाळण्यास समर्थ बनविणारे कृपेचे सामर्थ्य त्या पूर्णतेने ओतले गेलें नव्हते ज्या पूर्णतेने ते येशू प्रकट झाल्यापासून ओतण्यांत आलें आहे. “पण आजपर्यंत परमेश्वराने तुम्हांला समजायला मन, पाहायला डोळे व ऐकायला कान दिलें नाहींत.” (अनुवाद 29:4). नव्या कराराविषयी जे नवे आहे त्याच्या अर्थ असा होत नाहीं कीं त्या करारात कोणत्याही आज्ञा नाहींत, तर हे कीं देवानें जी अभिवचने दिली होती ती पूर्णत्वास आलीं आहेत! “मी माझा नियम त्यांच्यामध्यें ठेवीन आणि मी ते त्यांच्या हृदयावर लिहीन” (यिर्मया 31:33). “मी तुमच्या ठायीं माझा आत्मा घालीन आणि तुम्हीं माझ्या नियमांनी चालाल, माझे निर्णय पाळून त्यांप्रमाणें आचरण कराल असे मी करीन ” (यहेज्केल 36:27).

3 सितम्बर : पत्नियों के लिए एक सन्देश

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3 सितम्बर : पत्नियों के लिए एक सन्देश
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“हे पत्नियो, अपने-अपने पति के ऐसे अधीन रहो जैसे प्रभु के।” इफिसियों 5:22

“अधीनता” शब्द अक्सर तरह-तरह की नकारात्मक प्रतिक्रियाएँ उत्पन्न करता है। इसका एक कारण यह है, जैसा कि जॉन स्टॉट ने 40 साल पहले लिखा था, “आज के युग में अधिकार की अधीनता में आने का विचार पुराना हो चुका है। यह वर्तमान समय की स्वच्छन्दता और स्वतन्त्रता की मानसिकता से पूरी तरह मेल नहीं खाता।”[1] बीते दशकों में अधीनता की नकारात्मक छवि और भी गहरी हो गई है, जिसे विशेष रूप से विवाह के सन्दर्भ में देखा जा सकता है।

फिर भी यह तथ्य बना हुआ है कि यदि इसे सही रूप में समझा और लागू किया जाए, तो सम्बन्धों के केन्द्र में अधीनता ही होती है, जैसा कि परमेश्वर ने उन्हें स्थापित किया है। बच्चे अपने माता-पिता के अधीन होते हैं (इफिसियों 6:1), कलीसिया के सदस्य अपने अगुवों के अधीन होते हैं (इब्रानियों 13:17), और इसी प्रकार पत्नियाँ अपने पतियों के वैसे ही अधीन होती हैं, “जैसे प्रभु के” (इफिसियों 5:22)। हमारे जीवन में हमें जिन भूमिकाओं के लिए बुलाया गया है, उनके अनुसार दूसरों की अधीनता में आना हमारे सम्बन्धों का एक स्वाभाविक भाग है। इस दृष्टि से, एक पत्नी का अपने पति की अधीनता में आना विवाह के लिए परमेश्वर की दिव्य व्यवस्था को प्रतिबिम्बित करता है। लेकिन हमें इस शिक्षा को कैसे समझना चाहिए?

पहली बात, पत्नी को अपने पति की अधीनता में होने की आज्ञा का अर्थ यह नहीं कि वह अपने पति से कम मूल्यवान या हीन है। बाइबल स्पष्ट रूप से सिखाती है कि पुरुष और स्त्री दोनों समान सम्मान के योग्य हैं, क्योंकि दोनों ही परमेश्वर के स्वरूप में सृजे गए हैं (उत्पत्ति 1:27)। विश्वासियों के रूप में, हम छुटकारे में भी समान हैं—और यह समानता इस बात में प्रकट होती है कि हम परमेश्वर के अनुग्रह के संयुक्त उत्तराधिकारी हैं (1 पतरस 3:7)। परमेश्वर के सामने पुरुषों और स्त्रियों की स्थिति पूरी तरह से समान है।  भूमिका में अन्तर का अर्थ मूल्य में अन्तर नहीं होता।

दूसरी बात, पत्नियों को अपने-अपने पति के अधीन होने के लिए कहा गया है, न कि सभी पुरुषों के अधीन। पौलुस समाज में महिलाओं की स्थिति को लेकर कोई सामान्य आदेश नहीं दे रहा है, बल्कि वह परिवार में पत्नी की भूमिका के बारे में एक विशिष्ट निर्देश दे रहा है। इस सन्दर्भ में, पत्नी का प्रभु की अधीनता में आना उसके अपने पति की अधीनता में आने के द्वारा प्रकट होता है।

तीसरी बात, यह अधीनता अंधी और बिना शर्त आज्ञाकारिता नहीं है। पति अपनी पत्नियों को बलपूर्वक अधीनता के लिए बाध्य नहीं कर सकते, और न ही वे उनसे कोई भी ऐसी माँग कर सकते हैं जो प्रभु की इच्छा के विरुद्ध हो। इसका अर्थ यह भी नहीं है कि पत्नी को अपने पति के हर आदेश को बिना किसी प्रश्न के मानना होगा। इसके विपरीत, पति को “अपनी पत्नी से अपने समान प्रेम” रखना है, उसके लिए अपना जीवन देना है और उसे पवित्रता में अगुवाई करनी है (इफिसियों 5:33)। यदि आप पति हैं, तो आपके लिए यह समझना आवश्यक है कि यदि आप अपनी पत्नी को मसीह की आज्ञा मानने से रोकने या उससे दूर ले जाने का प्रयास करते हैं, तो उसे बाइबल के अनुसार आपका अनुसरण करने की कोई बाध्यता नहीं है।

यदि आप पत्नी हैं, तो बाइबल आपको अंधी और दासत्व जैसी आज्ञाकारिता के लिए नहीं बुलाती। बल्कि, आपकी अधीनता एक आनन्दमयी निष्ठा और अपने पति के नेतृत्व का अनुसरण करने की प्रतिबद्धता होनी चाहिए—एक पारस्परिक सहभागिता का हिस्सा, जो हर बात में परमेश्वर की महिमा को खोजती है। सम्पूर्ण हृदय से, बिना किसी अनिच्छा के की गई यह अधीनता केवल परमेश्वर की शक्ति से सम्भव है, ताकि आप अपने पति से “अपने जीवन के सारे दिनों में बुरा नहीं, वरन् भला ही व्यवहार” करें (नीतिवचन 31:12)।

बाइबल पर आधारित यह अधीनता निश्चित रूप से आज के संसार में लोकप्रिय नहीं है। यह अक्सर आसान भी नहीं होती। लेकिन परमेश्वर और उसके लोगों की दृष्टि में यह अत्यन्त सुन्दर है।

  नीतिवचन 31:10-31

पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: भजन 140–142; 2 कुरिन्थियों 12 ◊


[1] द मैसेज ऑफ इफिशियंस: द बाइबल स्पीक्स टूडे (आई.वी.पी. अकेडेमिक, 1979), पृ. 215.

3 September : परमेश्वराच्या “मी करीन” अभिव्यक्तीं

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3 September : परमेश्वराच्या "मी करीन" अभिव्यक्तीं
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“यरुशलेमेत माणसे व गुरेढोरे फार झाल्यामुळें भिंती नसलेल्या खेड्यांप्रमाणें तिच्यात वस्ती होईल. परमेश्वर म्हणतो, तिच्या सभोवार मी तिला अग्नीचा कोट होईन, व तिच्या ठायीं मी तेजोरूप होईन.” (जखऱ्या 2:4-5)

असे काहीं पहाटेचे प्रसंग आहेत जेव्हा मला बिछान्यावरून उठताच दुर्बळपणा जाणवतो. म्हणजें असहाय. असे का हे अनेकदा कळत नाहीं. धोका कसलाही नसतो. कसलीही कमजोरी नसते. असते ती केवळ एक अशी स्वरूप नसलेली भावना कीं काहींतरी वाईट होणार आहे आणि त्यासाठीं मीच जबाबदार असेल.

असे सहसा तेव्हां होते जेव्हां माझी बरीच टीका झालेंलीं असते. किंवा कदाचित तेव्हां जेव्हां माझ्याकडून बऱ्याच अपेक्षां केल्यां जातांत ज्यांच्या मुदती ठराविक आहेत आणि त्या पूर्ण करण्याच्या दृष्टीनें खूप मोठ्या आणि खूप जास्त वाटतांत.

जेव्हां मी अशा नियतकालिक पहाटे झालेंल्या प्रसंगावर विचार करतांना  सुमारे 50 वर्षांहून अधिक काळ मागे वळून पाहतो, तेव्हां मला या गोष्टीचे आश्चर्य वाटते कीं कशाप्रकारे प्रभु येशूनें माझ्या जीवनाचा व सेवेचा सांभाळ केला आहे. अशा तणावापासून दूर पळण्याच्या ज्यां परीक्षा माझ्यावर आल्या त्यां कधीही विजयी होऊं शकल्या नाहीं- आजवर तर नाहीं. हे अद्भुत आहे. यासाठीं मी माझ्या महान देवाची उपासना व गौरव करतो.

मला भीतीच्या अर्धांगवायूमध्यें बुडू देण्याऐवजी किंवा मला हिरव्या गवताच्या मृगजळात पळून जाऊ देण्याऐवजी, तो मला जागे करायचा कीं अशा वेळी मी त्याच्याकडें मदतीसाठीं धावा केला पाहिजे आणि नंतर तो मला आपल्या ठोस अभिवचनांची आठवण देऊन उत्तरही द्यायचा.

मी एक उदाहरण देतो. आणि हा प्रसंग नुकताच घडला. मी एका पहाटे उठलो तेव्हां मला भावनिकदृष्ट्या दुर्बळपणा जाणवत होता. असहाय. असुरक्षित. मी प्रार्थना केलीं: “प्रभु मला मदत कर. प्रार्थना कशी करावी हेही मला कळत नाहींये.”

एका तासानंतर मी जखऱ्याचे पुस्तक वाचू लागलो आणि ज्या मदतीसाठीं मी धावा केला होता तिचा शोध घेऊ लागलो. आणि मला ते सहाय्य या वचनांत पुरविण्यात आलें :-

“यरुशलेमेत माणसे व गुरेढोरे फार झाल्यामुळें भिंती नसलेल्या खेड्यांप्रमाणें तिच्यात वस्ती होईल. परमेश्वर म्हणतो, तिच्या सभोवार मी तिला अग्नीचा कोट होईन, व तिच्या ठायीं मी तेजोरूप होईन.” (जखऱ्या 2:4-5)

देवाच्या लोकांची अशी समृद्धी आणि वाढ होईल कीं यरुशलेमेला स्वतः भोवती यापुढे तटबंदी देखील उभारता येणार नाहीं. “माणसे व गुरेढोरे” इतके वाढतील कीं यरुशलेम भिंती नसलेल्या अनेक खेड्यांप्रमाणें होईल.

समृद्धी तर ठीक आहे, पण संरक्षणाचे काय?

वचन 5 मध्यें परमेश्वर याचे उत्तर देतो, “परमेश्वर म्हणतो, तिच्या सभोवार मी तिला अग्नीचा कोट होईन.” होय. बस इतके पुरे आहे. हेच ते अभिवचन आहे. परमेश्वराच्या “मी करीन” यां अभिव्यक्तीं. मला त्याचीच गरज आहे.

आणि जर ते यरुशलेमेच्या असुरक्षित खेड्यांच्या बाबतींत खरे आहे तर मग मी जो देवाचे मुल आहे, ते माझ्या बाबतींत देखील सत्य आहे. मी जुन्या करारातील ही अशी अभिवचनें देवाच्या लोकांवर या  पद्धतीनेच लागू करतो. सर्व अभिवचने मला ख्रिस्ताठायीं होय हेच आहेत (2 करिंथ 1:20). जे ख्रिस्तामध्यें आहेत त्यांच्यासाठीं प्रत्येक वचनानंतर “किती विशेषकरून” अशी घोषणा आहे. देव माझ्या सभोवार “अग्नीचा कोट” होईन. होय. तो होईल. तो झाला आहे. आणि तो पुढेही होईल. 

आणि हे अंशा-अंशाने अधिक चांगले होत जाते. संरक्षणाच्या त्या अग्नी-कोटातून तो म्हणतो, “तिच्या ठायीं मी तेजोरूप होईन.” देव आपलें संरक्षण करण्यासाठीं आपला केवळ अग्नी-कोट बनून तिथेच थांबत नाहीं; तर आपल्याला त्याच्या उपस्थितीचा सुखद आनंद द्यावा हा त्याचा अंतीम हेतू. मला देवाची “मी करीन” ह्या अभिव्यक्तीं खूप आवडतांत!

2 सितम्बर : मसीह के प्रति श्रद्धा

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2 सितम्बर : मसीह के प्रति श्रद्धा
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“. . . मसीह के भय से एक दूसरे के अधीन रहो।” इफिसियों 5:20-21

लोग कई कारणों से एक-दूसरे के अधीन होते हैं—राजनीति, सामाजिक संरचनाओं, या यहाँ तक कि व्यवहारिकता के आधार पर। कभी-कभी दूसरों के अधीन होना बहुत आसान (और निश्चित रूप से सुखद) होता है, बजाय इसके कि असभ्य या टकरावपूर्ण प्रतीत होने का जोखिम उठाया जाए।

तौभी ये कारण मसीही अधीनता के प्रेरक कारक नहीं हैं। इसके बजाय, हमारी परस्पर अधीनता की विशिष्ट विशेषता यह होनी चाहिए कि इसे “मसीह के प्रति श्रद्धा” के कारण किया जाए। यीशु के सामने घुटने टेकने से हमें आत्म-केन्द्रित होने से बचने में मदद मिलती है। मसीह के प्रति श्रद्धा न केवल हमें स्वयं से दूर खींचती है, बल्कि यह हमें यीशु की ओर आकर्षित भी करती है। उसी में हम अधीनता के आह्वान को समझना सीखते हैं, क्योंकि यीशु ने स्वयं सिखाया, “जो तुम में प्रधान होना चाहे, वह तुम्हारा दास बने . . . जैसे कि मनुष्य का पुत्र; वह इसलिए नहीं आया कि उसकी सेवा टहल की जाए, परन्तु इसलिए आया कि आप सेवा टहल करे, और बहुतों की छुड़ौती के लिए अपने प्राण दे” (मत्ती 20:26, 28)। उसने न केवल ये बातें कहीं, बल्कि उन्हें अपने जीवन में पूरा भी किया।

उदाहरण के लिए, यूहन्ना 13 में यीशु द्वारा चेलों के पाँव धोने की घटना पर विचार करें। यूहन्ना लिखता है: “यीशु ने, यह जानकर कि पिता ने सब कुछ मेरे हाथ में कर दिया है और मैं परमेश्‍वर के पास से आया हूँ और परमेश्‍वर के पास जाता हूँ, भोजन पर से उठकर अपने ऊपरी कपड़े उतार दिए, और अँगोछा लेकर अपनी कमर बाँधी। तब बरतन में पानी भरकर चेलों के पाँव धोने और जिस अँगोछे से उसकी कमर बँधी थी उसी से पोंछने लगा” (यूहन्ना 13:3-5)।

यहाँ क्या हो रहा था? यही कि परमेश्वर पुत्र परमेश्वर पिता के अधीन हो रहा था। जो परमेश्वर से आया था और स्वयं परमेश्वर था, उसने स्वयं को विनम्र बनाया और “दास का स्वरूप धारण किया” (फिलिप्पियों 2:7)।

यीशु अपनी इच्छा पूरी करने नहीं, बल्कि अपने पिता की इच्छा पूरी करने आया था (यूहन्ना 6:38)। परिणामस्वरूप, उसने कठिनाइयाँ स्वीकार कीं। उसे अलग-थलग किया गया और दुर्व्यवहार सहना पड़ा। उसने द्वेष, गलतफहमियों और मृत्यु तक को झेला। यीशु तोड़ा गया ताकि हमारे टूटे हुए जीवन को पुनः स्थापित और परिवर्तित किया जा सके। वह अपने पिता की इच्छा के अधीन होकर क्रूस पर मरने के लिए आया था, ताकि वह उन सभी के लिए छुटकारे का प्रबन्ध करे, जो विनम्र होकर झुकते हैं और स्वीकार करते हैं, “यही वह उद्धारकर्ता है, जिसकी मुझे आवश्यकता है।”

जब हम मसीह को वैसे देखते हैं जैसा वह वास्तव में है, तो हम उसे आदर और श्रद्धा देने के लिए बाध्य हो जाते हैं। त्रिएक परमेश्वर के दूसरे व्यक्ति के अतिरिक्त और कौन है जिसे हम अधिक सम्मान और प्रेम दे सकते हैं, जिसने अपने पिता की आज्ञा का पालन करते हुए और अपने लोगों की भलाई के लिए स्वयं को मृत्यु तक अधीन कर दिया? जब हम मसीह की श्रद्धा करते हैं, तो हम उसी मनोभाव को अपनाने के लिए तैयार होते हैं जो मसीह का था—एक ऐसा मनोभाव जो प्रभुता प्राप्त करने की लालसा नहीं करता, अधिकार के लिए संघर्ष नहीं करता, या अपने अधिकारों पर अड़ा नहीं रहता, बल्कि ऐसा मनोभाव जो परमेश्वर की आज्ञा का पालन करता है और अपने भाइयों-बहनों के हितों को अपनी इच्छाओं से ऊपर रखता है।

कई कारण हो सकते हैं जिनके कारण हम किसी के अधीन होने या न होने का चुनाव करते हैं। लेकिन आपके बारे में यह बात सत्य हो: कि आप मसीह की श्रद्धा के कारण अपनी कलीसिया में दूसरों के अधीन हों—जो अपने पिता के अधीन हुआ और ऐसा करते हुए आपका उद्धारकर्ता बन गया।

फिलिप्पियों 2:17-30

◊ पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: भजन 137–139; 2 कुरिन्थियों 11:16-33

2 September : उद्ध्वस्त आणि आनंदित

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2 September : उद्ध्वस्त आणि आनंदित
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“कारण तू आपला देव परमेश्वर ह्याची पवित्र प्रजा आहेस, तू त्याची खास प्रजा व्हावेस म्हणून सार्‍या पृथ्वीवरील राष्ट्रांतून तुझा देव परमेश्वर ह्याने तुला निवडून घेतले आहे.” (अनुवाद 7:6)

कृपेचे सिद्धांत – कीं आमचे तारण हे केवळ देवाच्या सार्वभौम कृपेनेच होते ह्या कॅल्विनवादी शिकवणीसाठीं पारंपारिकरित्या उपयोगांत आणलेली जुनी प्युरिटन संज्ञा (TULIP) – ह्या झाडातील प्रत्येक फांदी जर संत ऑगस्टीन यांच्या आनंदाशी समतुल्य  अशा आनंदाच्या भरात (ज्याला “ख्रिस्ती विश्वासाचा परमानंद म्हणतांत”) डोलत असेल तर या कृपेच्या सिद्धांतांची अनुभूती काय असेल बरे?

  • सार्वत्रिक नैतिक अध:पात (Total depravity) म्हणजें केवळ स्वभावात असलेला वाईटपणा नव्हे, तर देवाचे वैभव पाहण्यापासून आंधळेपण आणि परम आनंद याविषयी मृतावस्था.
  • अटविरहित निवड (Unconditional election)  म्हणजें ख्रिस्तांत असलेला आपला परम आनंद, म्हणजें त्रिएक देव स्वतःमध्यें घेतो तो काठोकाठ आनंद, आपण अस्तित्वात येण्यापूर्वीच आपल्यासाठीं नियोजित करण्यात आला होता.
  • (लोकसंख्येच्या दृष्टिने) मर्यादित प्रायश्चित्त (Limited atonement)  हे या गोष्टीची खात्री आहे कीं देवामध्यें असलेला अविनाशी आनंद नव्या कराराच्या रक्ताद्वारे देवाच्या लोकांसाठीं निर्णायकपणें साध्य करण्यांत आला आहे.
  • अप्रतिकारक कृपा (Irresistible grace)  ही देवाच्या प्रीतिची वचनबद्धता आणि सामर्थ्य आहे ज्याद्वारे आपल्याला ह्या जगातील आत्मघातकीं सुखांना बिलगून राहण्यापासून व अविनाशी असा जो आनंद त्याच्या प्राप्तीसाठीं आपल्याला सार्वभौम सामर्थ्याने बंधमुक्त केलें जाते.
  • पवित्रजनांच्या विश्वासाची चिकाटी (Perseverance of the saints)  हे सर्वसमर्थ देवाचे कार्य आहे जे आपल्याला अति निकृष्ट दर्जाच्या आनंदाच्या कायमस्वरूपी बंधनात पडू देत नाहीं, तर आपल्याला त्याच्या सान्निध्यात विपुल आनंदाचा वारसा मिळावा म्हणून व आपल्याला त्याच्या उजवीकडें असलेले सार्वकालिक सुख प्राप्त व्हावें म्हणून आपल्याला सर्व संकटे व दु:खें यांमध्यें राखून ठेवते.

या पाच मुद्द्यांपैकीं, अटविरहित निवड हा मुद्दा माझ्या जिवाच्या बाबतींत सर्वात कठोर आणि अति गोड असे दोन न्यायनिवाडे देतो. ही निवड अटविरहित आहे हे सत्य माझा सर्व गर्विष्ठपणा उद्ध्वस्त करते (कठोर बाजू); आणि हे कीं ही निवड  मला त्याचे अनमोल धन बनवते (अति गोड बाजू).

यां बायबलसम्मत कृपेच्या सिद्धांतांची एक वैभवी बाजू ही आहे : जे सिद्धांत आमचा  गर्विष्ठपणा उद्ध्वस्त करतांत, तेंच खरे पाहता आपल्याला परम आनंदासाठीं सज्ज करतांत.

जर ही निवड कोणत्याही प्रकारे आमच्यातील सद्गुणांवर अवलंबून असती तर यां वचनाच्या प्रकाशांत जिथें देव म्हणतो कीं “कारण तू आपला देव परमेश्वर ह्याची पवित्र प्रजा आहेस, तू त्याची खास प्रजा व्हावेस म्हणून सार्‍या पृथ्वीवरील राष्ट्रांतून तुझा देव परमेश्वर ह्याने तुला निवडून घेतले आहे” (अनुवाद 7:6), आपण स्वतःला कसे श्रेष्ठ समजू शकतो? परंतु आढ्यता बाळगण्यापासून आपल्याला सुरक्षित ठेवण्यासाठीं, परमेश्वर आपल्याला शिकवतो कीं आपली निवड ही पूर्णपणें अट-विरहित आहे (अनुवाद 7:7-9). “त्यानें एक दयनीय जिवाला आपलें धन असे केलें” असे जे आपण एक भजन गातो अगदी त्याप्रमाणें.

कृपेने झालेंल्या ह्या निवडीची अटविरहित बाजूच आहे — ज्या पाठोपाठ ह्या तारणदायी कृपेचा इतर सर्व अनुक्रम येतो — जी आपल्याला कोणतीही आढ्यता न बाळगू देता अशा दानांचा आनंद घ्यावयांस समर्थ बनविते.

1 सितम्बर : उदारता से भरपूर

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1 सितम्बर : उदारता से भरपूर
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“फिर मूसा ने इस्राएलियों की सारी मण्डली से कहा, ‘जिस बात की आज्ञा यहोवा ने दी है वह यह है। तुम्हारे पास से यहोवा के लिए भेंट ली जाए, अर्थात् जितने अपनी इच्छा से देना चाहें वे यहोवा की भेंट करके ये वस्तुएँ ले आएँ।’” निर्गमन 35:4-5

परमेश्वर के लोग उसके अनुग्रह के प्रत्युत्तर में आभार से भरकर दान देते हैं।

या कम से कम, हमें ऐसा अवश्य करना चाहिए। लेकिन अक्सर हमारे दान देने के कारण बहुत अलग होते हैं। कई लोग दान देने को एक ऐसा कार्य मानते हैं, जिसे करना उनके लिए अनिवार्य है या कर्तव्य है। ऐसा वे शायद उनकी सामाजिक स्थिति या दूसरों की धारणा के कारण करते हैं। कुछ लोग अपराध-बोध की भावना से दान देते हैं और अपने बुरे कर्मों का प्रायश्चित करने का प्रयास करते हैं। अन्य लोग भय से दान देते हैं, यह सोचकर कि “मेरे लिए दान देना ही अच्छा है, नहीं तो परमेश्वर मुझे आशीर्वाद नहीं देगा।”

लेकिन बाइबल में दिया गया दान देने का सिद्धान्त इससे बहुत अलग है।

जब इस्राएली मरुभूमि में परमेश्वर के लिए पवित्र निवास स्थान स्वरूप तम्बू बनाने की तैयारी कर रहे थे, तो मूसा ने इस कार्य के लिए सामग्री का संग्रह आरम्भ किया। उसकी अपील जबरदस्ती या छलपूर्वक नहीं थी; उसने बस लोगों से कहा कि परमेश्वर उन सभी से प्राप्त करने को तैयार हैं जो स्वेच्छा से देना चाहते हैं, और हर उदार व्यक्ति ने भेंट चढ़ाई। उन्होंने न केवल अपनी सम्पत्ति में से दिया, बल्कि अपने कौशल और योग्यताओं के आधार पर भी दिया, जो परमेश्वर ने उन्हें दिए थे—चाहे वह निर्माण कार्य हो, कपड़ा बुनाई हो, कारीगरी हो या कला हो।

बहुतों ने दिया, और उन्होंने अत्यधिक दिया। परिणामस्वरूप, मूसा को दूसरा निर्देश देना पड़ा और पूरी छावनी में सन्देश भेजना पड़ा: “क्या पुरुष, क्या स्त्री, कोई पवित्रस्थान के लिए और भेंट न लाए” (निर्गमन 36:6)। उन्हें यह एहसास था कि परमेश्वर ने ही उन्हें सब कुछ दिया था। परमेश्वर की भलाई की विशालता से प्रेरित होकर वे उदारता से भर उठे—यहाँ तक कि मूसा को उन्हें रोकने के लिए कहना पड़ा!

परमेश्वर को किसी भी चीज़ की आवश्यकता नहीं है, फिर भी वह उन लोगों से प्राप्त करने के लिए तैयार रहता है, जो उसके अनुग्रह से उसके अनेक आशीर्वादों के भागीदार हैं। परमेश्वर अपने अनुग्रह को प्रतिशत में नहीं देता; वह उसे प्रचुर मात्रा में उण्डेलता है—और अपने हृदय की इसी उदारता से उसने यीशु के माध्यम से अपने लोगों को एक के बाद एक आशीर्वाद दिया है। जब हम, जो उसके अनुग्रह के प्राप्तकर्ता हैं, अपने समय, धन, प्रतिभा या किसी भी अन्य चीज़ को प्रचुरता और कृतज्ञता से देते हैं, तो परमेश्वर की महिमा होती है।

परमेश्वर हमेशा उदार हृदयों की इच्छा रखता है। उसके पास अपने पुत्र के कार्य के माध्यम से लोगों को बचाने की योजना है, और वह ऐसे अनुयायियों की लालसा रखता है जो दान देने के द्वारा सुसमाचार के कार्य में शामिल होने के लिए तैयार हों। यह केवल अनुग्रह ही है जो किसी व्यक्ति को बलिदानी रूप से और प्रसन्नतापूर्वक देने के लिए प्रेरित करता है। यदि आपका देना—चाहे वह आपका समय हो, आपकी प्रतिभा हो या आपका धन—सीमित या अनिच्छा से हो रहा है, तो इस बात पर मनन करें कि परमेश्वर ने आपको कितना अधिक दिया है, विशेष रूप से प्रभु यीशु में। उसके अनुग्रह से प्रेरित हों, और आप कृतज्ञता से भर जाएँगे, जो उदारता में परिवर्तित होगी, तथा परमेश्वर की महिमा और स्तुति लाएगी।

यूहन्ना 12:1-8

पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: भजन 135–136; 2 कुरिन्थियों 11:1-15 ◊

1 September : त्याला योग्य दिसते ते सर्व तो करतो

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1 September : त्याला योग्य दिसते ते सर्व तो करतो
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आमचा देव स्वर्गात आहे; त्याला योग्य दिसते ते सर्व तो करतो. (स्तोत्र 115:3)

हे वचन शिकवते कीं देव ज्या ज्यावेळी एखादे कार्य करतो, तो ते त्याला योग्य दिसते त्याप्रमाणें करतो.

देवाला ज्या गोष्टीचा तिटकारा वाटतो ती करण्यास तो बंधनकारक नाहीं. त्याच्यावर असला प्रसंग कधीही येत नाहीं जिथे त्याला एखाद्या गोष्टीचा एकमात्र तोडगा काढण्यासाठीं असे काहींतरी करणें भाग पडते जे त्याला योग्य दिसत नाहीं.

त्याच्या इच्छेस येईल ते तो करतो. आणि म्हणूनच, एका अर्थाने, तो जे काहीं करतो त्यापासून  त्याला आनंद होतो.

हे असे ज्ञान आहे कीं आपण देवासमोर नतमस्तक होऊन त्याच्या सार्वभौम स्वातंत्र्याची स्तुती करण्यास प्रवृत्त झालों पाहिजे – म्हणजें असे कीं, त्याला जे योग्य व संतुष्टीदायक आहे त्यावर अंमलबजावणी करून तो नेहमी आपल्या स्वतंत्र इच्छेनुसार  स्वत: च्या “सत्संकल्पाप्रमाणें” सर्वकाहीं करतो.

देव कधीच कुठल्याही परिस्थितीला बळी पडत नाहीं. त्याच्यावर अशी परिस्थिती कधीही उद्भवत नाहीं जी त्याला असे काहींतरी करण्यांस आवरून धरते ज्यामध्यें तो आनंद करू शकत नाहीं. त्याचा उपहास व्हायचा नाहीं. गुप्तपणें फासा मांडून त्याला अडकविले जाऊ शकत नाहीं, किंवा त्याच्या इच्छे विरुद्ध काहीं करण्यांस त्याच्यावर दबाव टाकला जाऊ शकत नाहीं.

देवासाठीं एका अर्थाने सर्वात कठीण जर एखादी गोष्ट असेल जी त्यानें इतिहासात एका समयी केलीं तर ती म्हणजें, जेव्हां त्यानें “आपल्या स्वतःच्या पुत्रास राखून” ठेविले नाहीं (रोम 8:32). देव स्वतंत्र होता आणि त्याला जे योग्य दिसायचे ते सर्व तो करत असे. पौल म्हणतो कीं ख्रिस्तानें मरण सोसून जेव्हां स्वतःला अर्पण केलें, ते त्यानें “देवाला सुवास मिळावा म्हणून स्वत:ला आपल्याकरता अर्पण व यज्ञ म्हणून दिलें” होते (इफिस 5:2). जगात घडलेले हे महापाप, आणि हे महामरण, व सर्वात कठीण अशी देवाची ही कृती, हे सर्व गोपनीय दृष्ट्या पित्याला जे योग्य दिसते त्याप्रमाणेंच झालें.

आणि कॅल्वरीच्या कृसाकडें जात असतांना, साक्षांत देवदूतांचे सैन्य त्याची सेवा करीत होते. “कोणी [माझा जीव]  माझ्यापासून घेत नाहीं, तर मी होऊनच तो देतो” (योहान 10:18) — त्याला जे योग्य दिसले — आणि इब्री 12:2 म्हणते त्याप्रमाणें हे सर्व त्यानें “जो आनंद त्याच्यापुढे होता” त्यासाठीं केलें. विश्व-इतिहासाची ही वेळ जिथे असें दिसत होते कीं जणू येशूला फासा मांडून अडकविले गेलें, त्या सर्व घटनाक्रमावर पूर्णपणें त्याचेच आधिपत्य होते आणि त्याला जे योग्य दिसलें तेच तो करत होता – म्हणजें आम्हां अनीतिमानांना नीतिमान ठरविण्यात देवाच्या नीतिमत्वाचे गौरव व्हावें म्हणून त्यानें मरण पत्करले.

तर, आपण भय व आदर मानूं. आणि “आमचा देव स्वर्गात आहे; त्याला योग्य दिसते ते सर्व तो करतो” यावर देवाच्या सार्वभौमत्वाविषयी आपल्या स्तुतीचाच नाहीं तर आम्हांसाठीं ख्रिस्ताच्या मृत्यूद्वारे जे तारण साध्य करणांत आलें त्याचा पाया देखील यावरच बांधलेला आहे, हे जाणून आपण थरथर कापूं:

31 अगस्त : हम धर्मी कैसे ठहराए जाते हैं?

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31 अगस्त : हम धर्मी कैसे ठहराए जाते हैं?
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“परन्तु जो जो बातें मेरे लाभ की थीं, उन्हीं को मैं ने मसीह के कारण हानि समझ लिया है . . . जिसके कारण मैं ने सब वस्तुओं की हानि उठाई, और उन्हें कूड़ा समझता हूँ, जिससे मैं मसीह को प्राप्त करूँ और उसमें पाया जाऊँ।” फिलिप्पियों 3:7-9

हमारे जीवन में यह प्रश्न प्रायः आम होता है कि हमें प्रवेश या स्वीकृति प्राप्त करने के लिए क्या करना होगा। “उस स्कूल में प्रवेश पाने के लिए मुझे क्या करना होगा? उस सामाजिक मण्डली का हिस्सा बनने के लिए मुझे क्या करना होगा? उच्च कार्यकारी स्थिति प्राप्त करने के लिए मुझे क्या करना होगा?” स्वाभाविक रूप से मनुष्य आत्मिक मामलों के बारे में भी यही सवाल पूछते हैं: “अनन्त जीवन का अधिकारी होने के लिए मैं क्या करूँ?” (लूका 18:18, अतिरिक्त बल दिया गया है)।

हम अक्सर अपनी गतिविधियों पर निर्भर रहते हैं, जैसे कलीसिया में उपस्थित होना, प्रार्थना करना, बाइबल पढ़ना। जब हम इन्हें करते हैं, तो हमें आत्मविश्वास महसूस होता है, और जब नहीं करते, तो हम खुद को दोषी महसूस करते हैं। हम परमेश्वर के विधान को एक सीढ़ी के रूप में देखते हैं, जिस पर चढ़कर हम उसकी स्वीकृति प्राप्त करते हैं।

इस वचन से पहले के पदों में पौलुस ने अपने जीवन के सभी भौतिक “लाभों” का उल्लेख किया है, जो उसने विरासत में प्राप्त किए थे और अपनी शिक्षा के आधार पर भी प्राप्त किए थे। उसका कुलीन वंश कभी सवालों के घेरे में नहीं आया था। पौलुस वास्तव में कहता है, यदि ये सभी चीजें परमेश्वर के पास स्वीकृति प्राप्त करने के लिए आवश्यक हैं, तो देखो, मुझे इनमें से सब कुछ प्राप्त था। क्या मैंने सभी आध्यात्मिक कर्तव्यों और धार्मिक दायित्वों को पूरा किया था? बिल्कुल किया था।

एक समय पर पौलुस को लगता था कि वह आध्यात्मिक दृष्टि से अत्यन्त धनी था और वह पवित्रता में उन्नति कर रहा था। फिर एक दिन सब कुछ बदल गया। यरूशलेम से दमिश्क तक की एक यात्रा में पौलुस ने यह जान लिया कि वह आध्यात्मिक रूप से निर्धन था—और वह पवित्रता की राह पर भी नहीं चल रहा था।

वह क्या था जिसने पौलुस को आशा दी? उसी यात्रा में उसकी मुलाकात क्रूस पर मरे और फिर मृतकों में से जी उठे यीशु से हो गई (प्रेरितों 9:1-19), और उसने धर्मी ठहराए जाने के सिद्धान्त की समझ प्राप्त की: कि परमेश्वर पापी मनुष्यों को अपने पुत्र के पूर्ण कार्य के आधार पर धर्मी घोषित करता है।

परमेश्वर का विधान कोई सीढ़ी नहीं है, बल्कि यह एक दर्पण जैसा है, जो हमें यह दिखाता है कि हम गलत हैं और खुद को सही नहीं कर सकते। पौलुस की तरह जो कुछ भी हमें पहले लाभ लगता था, वह अब एक हानि, एक विफलता के रूप में देखा जाता है।

आप कैसे जान सकते हैं कि मसीह आपको स्वीकार करता है? यह इस कारण नहीं कि आप उसके पास अपनी कोई धार्मिकता लेकर आते हैं; बल्कि इस कारण कि आपका पाप मसीह के खाते में स्थानान्तरित कर दिया गया, जिसने कभी पाप नहीं किया और आपके लिए पाप बन गया, ताकि आप उसकी पूर्ण धार्मिकता प्राप्त कर सकें (2 कुरिन्थियों 5:21)। आप परमेश्वर के साथ धर्मी ठहराए जाने में कुछ भी जोड़ या घटा नहीं सकते। धर्मी ठहराया जाना पूर्ण इसलिए हुआ है, क्योंकि परमेश्वर विश्वासियों को मसीह की धार्मिकता देता है, और यह अन्तिम है क्योंकि यह केवल उपहार के रूप में मिले परमेश्वर के पुत्र पर निर्भर करता है।

एक बार जब आप जान जाते हैं कि आप अनन्त जीवन में अपने प्रवेश को खो नहीं सकते, तो आप अपना सब कुछ—अपनी प्रतिष्ठा, सम्पत्ति, प्रसिद्धि, स्थिति, सम्पत्ति—उसकी खातिर त्यागने के लिए तैयार हो जाते हैं, जिसने आपको यह प्रवेश दिलाया है। जो कुछ भी आप पहले लाभ मानते थे, आप अब खुशी से उसे हानि मान सकते हैं। आप मसीह के लिए अपना जीवन खोने के लिए तैयार हैं, क्योंकि आप जानते हैं कि मसीह के द्वारा ही आपको सच्चा जीवन प्राप्त हुआ है। आप मसीह के लिए क्या त्यागने में संघर्ष करते हैं? अपने धर्मी ठहराए जाने को अपने समर्पित आज्ञाकारिता का प्रोत्साहन बनाएँ।

प्रेरितों 26:1-29

◊ पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: भजन 132–134; 2 कुरिन्थियों 10

31 August : सिंह आणि कोकरा

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31 August : सिंह आणि कोकरा
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“पाहा, हा माझा सेवक, ह्याला मी निवडले आहे; तो मला परमप्रिय आहे; त्याच्याविषयी माझा जीव संतुष्ट आहे; त्याच्यावर मी आपला आत्मा घालीन, तो परराष्ट्रीयांना न्याय कळवील. तो भांडणार नाहीं व ओरडणार नाहीं, व रस्त्यांवर त्याची वाणी कोणाला ऐकू येणार नाहीं. चेपलेला बोरू तो मोडणार नाहीं, व मिणमिणती वात तो विझवणार नाहीं; तो न्यायाला विजय देईल तोपर्यंत असे होईल, आणि परराष्ट्रीय त्याच्या नावाची आशा धरतील.” (मत्तय 12:18-21, यशया 42 मधून अवतरण)

आपल्या पुत्राची सेवक-सदृश्य नम्रता आणि करुणा पाहून पित्याचा जीव आनंदाने उल्लासतो.

जेव्हा बोरू चेपलेला असतो व तो मोडणार तोच हा सेवक तो बरा होईपर्यंत त्याला आपल्या करुणेंने सरळ धरून ठेवतो. जेव्हा एखादी वात मिणमिणती असते आणि विझणारच असते तेव्हां हा सेवक ती वात बाहेर उपटून काढत नाहीं, तर आपला हात तिच्या सभोताल ठेवतो व जोवर ती पुन्हा जळू लागत नाहीं तोवर तिजवर हळूवारपणें फुंकर मारतो.

त्यामुळें पिता घोषणा करतो, “पाहा, हा माझा सेवक, त्याच्याविषयी माझा जीव संतुष्ट आहे!” पुत्राची ही योग्यता आणि त्याचे हे तेज केवळ त्याच्या वैभवीपणातून किंवा केवळ त्याच्या सौम्यतेतून येत नाहीं, तर ह्या दोन्ही गुणविशेषांच्या सिद्ध एकात्मतेतून उफळून येतांत.

प्रकटीकरण 5:2 मध्यें एक देवदूत, “गुंडाळीवरचे शिक्के फोडून ती उघडण्यास कोण योग्य आहे?” असे मोठ्याने पुकारतो, तेव्हां उत्तर आलें, “रडू नकोस; पाहा, ‘यहूदा’ वंशाचा ‘सिंह’, दाविदाचा ‘अंकुर’ ह्याने जय मिळवला; म्हणून तो तिचे सात शिक्के फोडून ती उघडण्यास योग्य ठरला आहे” (प्रकटीकरण 5:5).

‘यहूदा’ वंशाचा ‘सिंह’ याच्या सामर्थ्यात देव उल्लासतो. म्हणूनच तो इतिहासाच्या गुंडाळीवरचे शिक्के फोडून शेवटच्या दिवसाचा उलगडा करण्यासाठीं देवाच्या दृष्टित पात्र आहे.

पण हे चित्र पूर्ण नाहीं. या सिंहाने जय कसा मिळवला? पुढील वचन त्याच्या स्वरूपाचे वर्णन करते: “तेव्हा राजासन व चार प्राणी ह्यांच्यामध्यें व वडीलमंडळ ह्यांच्यामध्यें, ज्याचा जणू काय ‘वध करण्यात’ आला होता, असा ‘कोकरा’ उभा राहिलेला मी पाहिला” (प्रकटीकरण 5:6). येशू केवळ ‘यहूदा’ वंशाचा ‘सिंह’ म्हणूनच नव्हे तर ‘वध करण्यात’ आला होता, असा ‘कोकरा’ म्हणूनही पित्याच्या आनंदास पात्र ठरला आहे.

देवाचा देहधारी झालेंला पुत्र येशू ख्रिस्ता याच्या गौरवाचे हेच वैशिष्ट आहे – वैभव आणि सौम्यता या अद्भुत मिश्रणातून उद्भवलेली एकात्मता.