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9 सितम्बर : विनम्र सेवक

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9 सितम्बर : विनम्र सेवक
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“तुम मुझे गुरु और प्रभु कहते हो, और ठीक ही कहते हो, क्योंकि मैं वही हूँ। यदि मैं ने प्रभु और गुरु होकर तुम्हारे पाँव धोए, तो तुम्हें भी एक दूसरे के पाँव धोना चाहिए।यूहन्ना 13:13-14

एण्ड्रू मार्टिनेज गोल्फ के इतिहास के सबसे महान सहायकों में से एक थे, जो जॉनी मिलर, जॉन कुक और टॉम लेहमन जैसे महान खिलाड़ियों के साथ सहायक रहे। वह स्वयं भी एक प्रतिभाशाली खिलाड़ी थे। एक बात जो उन्हें गोल्फ खिलाड़ी का एक असाधारण सहायक बनाती थी, वह था उनका अपने बॉस के प्रति समर्पण, जो तब तुरन्त आरम्भ हो जाता जब वह प्रतीक्षा कक्ष में कदम रखते और सफेद वस्त्र पहनते। अपनी भूमिका में वह स्वयं को खो देते थे। वह अभी भी मार्टिनेज थे, लेकिन उनके पीछे का नाम अलग था; वह केवल किसी और की सेवा करने के लिए अस्तित्व में थे, भले ही उनके पास अपनी स्वयं की प्रतिभा और क्षमताएँ थीं।

यीशु ने अपनी मृत्यु से पहले की उस यादगार रात को अपने शिष्यों के पाँव धोए। इसका एक कारण यह था ताकि वह विनम्र सेवा का आदर्श प्रस्तुत कर सके, क्योंकि पाँव धोने का कार्य दास का था, न कि राजा का। हम सभी उसके आदर्श का अनुसरण करके लाभ उठा सकते हैं: सृष्टिकर्ता ने अपनी सृष्टि के पाँव धोए और ऐसा करते हुए उसने न केवल अपने झगड़ते शिष्यों की सेवा की बल्कि अपने विश्वासघाती शिष्य, यहूदा की भी सेवा की। यह विशिष्ट कार्य सामान्य अतिथि-सत्कार की इस परम्परा से कहीं अधिक था।

यीशु के कार्य हमारे लिए आदर्श थे (“तुम्हें भी एक दूसरे के पाँव धोना चाहिए”), लेकिन वे केवल आदर्श ही नहीं थे—और यदि हम इस घटना में केवल यीशु के विनम्र व्यवहार की नकल करने के बुलावे पर ध्यान केन्द्रित करते हैं, तो हम नैतिकतावाद के शिकार हो सकते हैं और मसीह के पूरे एवं महिमामयी उद्देश्य को खो सकते हैं। जब यीशु अपने शिष्यों के पाँव धो रहा था, तब भी वह यह जानता था कि भविष्य में क्या होने वाला था। वह पूरी तरह से जानता था कि एक बड़ी दुखभरी घड़ी—क्रूस पर उसकी मृत्यु—निकट थी। उसका कार्य यह दर्शाता है कि भविष्य हमेशा पिता के प्रेमपूर्ण हाथों में होता है। अपने शिष्यों के पाँव धोने से उसका उद्देश्य उनके पापों के धोने का प्रतीक प्रस्तुत करना था—और यह धुलाई उसके कटोरे के पानी से नहीं, बल्कि क्रूस पर बहने वाले उसके लहू से आने वाली थी। परमेश्वर का पुत्र अपनी विनम्रता में हमारे पापों के दाग से हमें शुद्ध करने का प्रस्ताव देता है, और उसकी विनम्रता को हमें अपनी विनम्रता से स्वीकार करना चाहिए और अपनी आवश्यकता को स्वीकार करते हुए उसे कहना चाहिए कि वह हमें भी धो दे।

जब हम यह समझ जाएँगे कि हमारे उद्धारकर्ता ने किस प्रकार हमारी सेवा की है, केवल तभी हम उसी प्रकार दूसरों की सेवा कर पाएँगे। पतरस, जो उस समय यह नहीं समझ पा रहा था कि यीशु क्या कर रहा है (यूहन्ना 13:6-8), एक दिन अपने प्रभु के सन्देश को समझने पर था। सालों बाद, वह अपने सह-विश्वासियों को यह कहकर प्रेरित करने वाला था, “परमेश्‍वर के बलवन्त हाथ के नीचे दीनता से रहो, जिससे वह तुम्हें उचित समय पर बढ़ाए” (1 पतरस 5:6)। उसे पता था कि मसीह का आदर्श केवल हमारा व्यवहार सुधारने के लिए नहीं था; बल्कि यह हमें विनम्र करने के लिए था और फिर हमें हमारी क्षमा का आश्वासन देने के लिए था।

आज किस प्रकार आपको दूसरों के पाँव धोने के लिए बुलाया गया हैं? आप अपने समय या आराम को किस प्रकार बलिदान कर सकते हैं ताकि आप उन लोगों की सेवा कर सकें जो आपके आस-पास हैं, और यह सेवा केवल विनम्र प्रेम से प्रेरित हो? और सबसे महत्त्वपूर्ण बात यह है कि आप दूसरों की सेवा किस प्रकार कर सकते हैं जो उन्हें सबसे बड़ी सेवा के कार्य की ओर ले जाए—अर्थात उस शुद्धता की ओर जो क्रूस पर बहा हुआ मसीह का लहू प्रदान करता है?

यूहन्ना 13:1-17

पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: न्यायियों 7– 8; यूहन्ना 3:16-36 ◊

9 September : कृपा ही विनामूल्य असावी हे आवश्यक आहे

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9 September : कृपा ही विनामूल्य असावी हे आवश्यक आहे
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तुला निराळेपण कोणी दिलें? आणि जे तुला दिलेंले नाहीं असे तुझ्याजवळ काय आहे? तुला दिलेंले असता, दिलेंले नाहीं असा अभिमान तू का बाळगतोस? (1 करिंथ 4:7)

तुम्हीं ज्या घरांत राहता त्या घराप्रमाणें तारणाचे चित्रण उभारा.

ते तुमचे संरक्षण करते. त्यात तुम्हीं आपल्या खाण्या-पिण्याच्या वस्तूंचा साठा ठेवता ज्यामुळें त्यां वस्तू टिकून राहतांत. ते कधीही कुजत नाहीं किंवा त्याचा चुराडाही होत नाहीं. त्याच्या खिडक्या अशा दिशेनें उघडतांत जिथून तुम्हांला अशा वैभवाचा कळस दिसून येतो जो पाहून तुम्हांला सार्वकालिक संतुष्टी मिळते.

देवानें ते खुद्द स्वतःचे आणि त्याचा प्रिय पुत्र याचे प्रचंड मोल देऊन ते बांधले आणि त्यानें ते तुम्हांला विनामूल्य आणि लखलखीत अशा अवस्थेत दिलें.

या घराच्या “खरेदी” कराराला “नवा करार” म्हणतांत. त्यां कराराच्या अटींमध्यें असे लिहिले आहे: “जर तुम्हीं हे घर भेटवस्तू स्वरूपात स्वीकार करतां आणि पिता व पुत्र जे या घरात तुमच्याबरोबर वस्ती करतील त्यांच्याठायीं आनंद करतां तर हे घर तुमचे होईल आणि सर्वकाळासाठीं तुमचेच राहील. तुम्हीं इतर देवतांना आश्रय देऊन देवाच्या घराला अपवित्र करणार नाहीं किंवा इतर वस्तूंकडें आपलें मन वळवणार नाहीं, तर या घरात देवाच्या सहवासात आपलें सर्व समाधान शोधणार.”

या कराराला हो म्हणणें, पण नंतर मात्र त्या घराचे मासिक हप्ते भरण्यासाठीं या आशेने बँकेतून कर्ज घेणें कीं तुम्हीं या घरासाठीं किंमत मोजाल, हे मूर्खपणाचे ठरणार नाहीं का?

तुम्हीं त्यां घराला भेटवस्तू म्हणून मिळालेले नाहीं तर खरेदी करून मिळविलेले घर म्हणून मानाल. देव यापुढे विनामूल्य उपकार करणारा राहणार नाहीं. आणि तुम्हीं स्वतःला अशा विचित्र मागण्यांचे गुलाम बनवून घ्याल ज्यां त्यानें तुमच्यावर टाकण्याचे स्वप्नही पाहिले नव्हते.

जर कृपा ही विनामूल्य व्हावयाची असेल – जो कृपेचा खरा अर्थ आहे – तर आपल्याला त्या कृपेची परतफेड करावी लागेल अशी वागणूक आपण तिला देऊ शकत नाहीं.

8 सितम्बर : सदा आनन्दित रहो

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8 सितम्बर : सदा आनन्दित रहो
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“प्रभु में सदा आनन्दित रहो; मैं फिर कहता हूँ, आनन्दित रहो।” फिलिप्पियों 4:4

हम सदा आनन्दित कैसे रह सकते हैं? क्या यह सम्भव है? या क्या हमें पौलुस के “प्रभु में सदा आनन्दित रहो” की चेतावनी को एक प्रकार के अतिशयोक्ति के रूप में समझना चाहिए, जिसे पौलुस ने कभी हमें हमारे मसीही जीवन में वास्तविक अनुभव करने का इरादा नहीं किया था? नहीं, हमें ऐसा नहीं करना चाहिए! पौलुस ने जो कहा, पूरी गम्भीरता से कहा। विश्वासियों के रूप में, हमें वास्तव में सदा आनन्दित रहना है।

इस अपील को लेकर हमें जिस कठिनाई का सामना करना पड़ता है, उसका एक कारण यह है कि हम आनन्द को उसी गलत तरीके से सोचते हैं जैसे हम प्रेम को सोचते हैं— अर्थात्, यह कि हम इसे अपनी इच्छा के दास के बजाय अपनी भावनाओं का उत्पाद मानते हैं। जब इसे इस तरह देखा जाता है, तो आनन्द हमारी परिस्थितियों और भावनाओं का उत्पाद बन जाता है; और उस दृष्टिकोण से हम केवल तभी आनन्दित हो सकते हैं, जब हम अच्छा महसूस कर रहे हों, जब सूरज चमक रहा हो, और जब सब कुछ हमारे तरीके से हो रहा हो।

लेकिन बाइबल जब हमें सदा आनन्दित रहने के लिए कहती है, तो वह पूरी गम्भीरता से ऐसा कहती है, यहाँ तक कि तब भी जब जीवन वैसा नहीं होता जैसा हम चाहते हैं, जब बादल घिर आते हैं, और जब हम उदास हो जाते हैं। इसलिए हमें आनन्द को समझने का प्रयास करना चाहिए।

हबक्कूक 3 में हम पढ़ते हैं कि भविष्यद्वक्ता आने वाली मुसीबत के दिन के बारे में सुनकर काँप उठा (3:16)। भावनाओं के सन्दर्भ में सब कुछ हबक्कूक को घबराहट की ओर ले जा रहा था। लेकिन उसने चिन्ता का शिकार होने के बजाय अपनी भावनाओं को अपने प्रदाता के बारे में जो वह जानता था, उसके अधीन कर दिया। सही सोच की शक्ति से हबक्कूक ने निष्कर्ष निकाला, “चाहे अंजीर के वृक्षों में फूल न लगें, और न दाखलताओं में फल लगें, जलपाई के वृक्ष से केवल धोखा पाया जाए और खेतों में अन्न न उपजे, भेड़शालाओं में भेड़–बकरियाँ न रहें, और न थानों में गाय बैल हों, तौभी मैं यहोवा के कारण आनन्दित और मगन रहूँगा” (पद 17-18, अतिरिक्त बल दिया गया)। वह यह दिखाता है कि सदा आनन्दित रहना सम्भव है—यहाँ तक कि गहरे संघर्ष और दर्द के बीच भी—जब हमारा आनन्द बाहरी कारकों पर निर्भर न होकर केवल परमेश्वर पर निर्भर करता है।

परमेश्वर का यह उद्देश्य रहा है कि हमारी सोच को उसके प्रकट किए हुए सत्य के द्वारा मार्गदर्शन और आकार मिले—जो उसने अपने वचन और सृष्टि के माध्यम से स्वयं के बारे में प्रकट किया है। 16वीं सदी के वैज्ञानिक जोहानस केपलर के शब्दों में, हमें “परमेश्वर के विचारों को उसकी पद्धति के अनुसार ही सोचना” चाहिए। जैसे-जैसे हम सही ढंग से सोचना सीखते हैं, वैसे-वैसे हम अपनी भावनाओं को सही सोच के अनुसार लाने में सक्षम होंगे।

जब आपका आनन्द परमेश्वर के अपरिवर्तनीय चरित्र में निहित होता है, तब आपका आनन्द आपके स्वयं की और आपकी परिस्थितियों की कैद से मुक्त हो जाता है। हाँ, आपका आनन्द आपके दिन की कठिनाइयों और निराशाओं से चुनौती प्राप्त कर सकता है, लेकिन वह पलट नहीं जाएगा। आज जब भी आपके आनन्द को चुनौती मिले, इन शब्दों को अपने होंठों पर लाएँ:

जो मैं तेरे बारे में जानता हूँ, मेरे प्रभु और परमेश्वर,

वह मेरी आत्मा को शान्ति से और मेरे होंठों को गीतों भर देता है;

तू मेरी सेहत है, मेरा आनन्द है, मेरी लाठी है, मेरी छड़ी है;

मैं तेरे आसरे खड़ा होकर अपनी निर्बलता में मजबूत होता हूँ।[1]

  भजन 20

◊ पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: न्यायियों 4– 6; यूहन्ना 3:1-15


[1] होराटियस बोनार, “नॉट व्हाट आई ऐम, ओ लोर्ड, बट व्हाट दाओ आर्ट” (1861).

8 September : देवाची परतफेड कशी करावी

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8 September : देवाची परतफेड कशी करावी
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परमेश्वराने माझ्यावर केलेंल्यां सर्व उपकाराची मी कशी परतफेड करू? मी तारणाचा प्याला उंचावून परमेश्वराच्या नावाने हाक मारीन. त्याच्या सर्व लोकांसमोर, मी परमेश्वरास केलेंले नवस पूर्ण करीन. (स्तोत्र 116:12-14)

“परमेश्वराने माझ्यावर केलेंल्या सर्व उपकाराची मी कशी परतफेड करू” ही भाषा मला अस्वस्थ करते. “उपकाराची परतफेड” हे शब्द इतक्या सहजपणें असे सूचित करत असल्यासारखे जाणवतांत कीं कृपा जणू अशी आहे जिला देव आपल्याकडें गहाण ठेवतो. ती खरोखर औदार्यपूर्ण तर आहे, परंतु तुम्हांला तिची परतफेड करावी लागेल.

पौलाने प्रेषितांची कृत्ये 17:25 मध्यें असे म्हटले आहे, कीं “माणसांच्या हातून त्याची सेवा घडावी असेही नाहीं; कारण जीवन, प्राण व सर्वकाहीं तो स्वतः सर्वांना देतो.” दुसऱ्या शब्दांत सांगायचे झालें तर, तुम्हीं देवाला असे काहींही देऊ शकत नाहीं किंवा देवासाठीं असे काहींही करू शकत नाहीं जे त्यानें तुम्हांला आधीच दिलें नाहीं आणि जे त्यानें तुमच्यासाठीं आधीच केलें नाहीं.

1 करिंथ 15:10 मध्यें तुम्हीं हीच गोष्ट पुन्हा पाहूं शकतां, “तरी जो काहीं मी आहे तो देवाच्या कृपेने आहे आणि माझ्यावर त्याची जी कृपा झाली आहे ती व्यर्थ झाली नाहीं; परंतु ह्या सर्वांपेक्षा मी अतिशय श्रम केलें, ते मी केलें असे नाहीं, तर माझ्याबरोबर असणार्‍या देवाच्या कृपेने केलें.” तर मग आपलें कोणतेही काम देवाची परतफेड कधीही करू शकत नाहीं, कारण ते काम देखील देवाचे एक कृपादानच आहे. आपण देवासाठीं करत असलेले प्रत्येक काम आपल्यावर त्याच्या कृपेचे ऋण अधिकच वाढवत जाते.

ह्याप्रमाणें स्तोत्र 116 मध्यें नवस पूर्ण करण्याच्या कृतीला जी गोष्ट कर्जाची परतफेड केलीं जात आहे असा गैरसमज होण्याच्या धोक्यांपासून मुक्त ठेवते ती म्हणजें ही कीं “नवस पूर्ण करणें” ही खरे पाहता एक सामान्य परतफेड नाहीं, तर प्राप्त करून घेण्याची आणखी एक कृती आहे जी देवाच्या वर्तमान समयी होत असलेल्या कृपेला उंचाविते. नवस पूर्ण करणें हे आपल्या साधनसंपत्तीला उंचावत नाहीं.

“परमेश्वराने माझ्यावर केलेंल्या सर्व उपकाराची मी कशी परतफेड करू” या स्तोत्रकर्त्याने स्वतःला केलेंल्या प्रश्नाचे उत्तर “मी तारणाचा प्याला उंचावून परमेश्वराच्या नावाने हाक मारीन” हे आहे. दुसऱ्या शब्दांत सांगायचे तर, माझा तारणाचा प्याला भरून वाहावा अशी मी देवाकडें हाक मारतो. परमेश्वराची परतफेड करणें म्हणजें परमेश्वराकडून अधिक प्राप्त करत जाणें कीं जेणेंकरून परमेश्वराच्या अक्षय चांगुलपणाचे गौरव अधिकाधिक होईल.

तारणाचा प्याला उंचावून धरणें हे परमेश्वराचे संतुष्टीदायक तारण हातांत घेणें आणि त्यातुन पिणें आणि त्याची अधिक अभिलाषा धरणें होय. आपण हे पुढील वाक्यप्रयोगामुळें समजतो: “मी . . . परमेश्वराच्या नावाने हाक मारीन.” मी अधिक साहाय्यासाठीं धावा करीन. परमेश्वराने दया करून माझ्या हाकेकडें आपलें कान लाविलें त्या उपकाराची मी कशी परतफेड करू? उत्तरः मी पुन्हा त्याला हाक मारीन. मी देवाचे या गोष्टीसाठीं स्तवन करीन व त्याचा सम्मान करीन कीं त्याला माझ्याकडून कधीच कोणत्याही वस्तूची, कींबहुंना माझी देखील गरज पडत नाहीं, तर उलट जेव्हा मला त्याची गरज असते (जी माझी नित्य गरज आहे) तेव्हा तो सर्व वेळी माझे कल्याणच करत असतो.

मग स्तोत्रकर्ता आपलें तिसरे वक्तव्य बोलतो, “मी परमेश्वरास केलेंले नवस पूर्ण करीन.” पण तो आपलें केलेंले नवस पूर्ण कसे करील? ते नवस तो तारणाचा प्याला उंचावून व परमेश्वराच्या नावाने हाक मारून पूर्ण करील. म्हणजेंच, आपल्याला कायमस्वरूपी कृपेवर कृपा मिळत जाईल- सर्व भरून काढणारी अशी पुरेशी कृपा – या अभिवचनावरील विश्वासाने ते नवस पूर्ण केलें जातील.

7 सितम्बर : परमेश्वर की प्रजा

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7 सितम्बर : परमेश्वर की प्रजा
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“यहूदी वह नहीं जो प्रगट में यहूदी है; और न वह खतना है जो प्रगट में है और देह में है। पर यहूदी वही है जो मन में है; और खतना वही है जो हृदय का और आत्मा में है, न कि लेख का।” रोमियों 2:28-29

हर राज्य के नागरिक होते हैं, और परमेश्वर का राज्य भी अलग नहीं है। फिर, परमेश्वर के राज्य में नागरिक कौन हैं? परमेश्वर की प्रजा कौन हैं?

परमेश्वर की प्रजा वे लोग हैं, जिन्होंने यीशु मसीह में अपना विश्वास रखा है। ये लोग परमेश्वर के राज्य का हिस्सा अपनी बुद्धि, शक्ति, या किसी अन्य बाहरी कारण से नहीं हैं, बल्कि केवल और केवल इसलिए हैं, क्योंकि परमेश्वर ने उनसे प्रेम किया और उन्हें अपने पुत्र में विश्वास का उपहार दिया। यीशु ने फरीसियों को डाँटे क्योंकि वे सोचते थे कि अपने वंश के कारण वे परमेश्वर के परिवार का सदस्य हैं: “यीशु ने उनसे कहा, ‘यदि तुम अब्राहम की सन्तान होते, तो अब्राहम के समान काम करते’” (यूहन्ना 8:39)। और अब्राहम ने क्या किया? उसने परमेश्वर की प्रतिज्ञाओं पर विश्वास किया; उसने “परमेश्वर पर विश्वास किया और यह उसके लिए धार्मिकता गिनी गई” (गलातियों 3:6)।

तो फिर, हम परमेश्वर के परिवार के पूर्ण सदस्य हमारे द्वारा किए गए किसी काम के कारण नहीं हैं, बल्कि परमेश्वर के आत्मा के कार्य से हैं, जो हमारे हृदयों को कायल करता है, हमें विश्वास करने के लिए प्रेरित करता है, और हमें पश्चाताप की ओर ले जाता है। हमें परमेश्वर की प्रजा में शामिल होने के लिए यहूदी कानून के आनुष्ठानिक नियमों का पालन करने या अब्राहम के शारीरिक वंशज होने की आवश्यकता नहीं है। रोमियों 2:29 में, पौलुस मूल रूप से यह पूछता है, अब्राहम की सन्तान कौन हैं? इसका उत्तर है: वही जो हृदय का खतना करवाता है।

जब हम इन सत्यों पर ध्यान करते हैं, तो हम यह सवाल कर सकते हैं कि क्या पौलुस को यहूदी होने का कोई लाभ लगता था। पौलुस ने यह स्पष्ट किया कि वास्तव में इसका एक अद्‌भुत लाभ था, क्योंकि यहूदियों ने परमेश्वर की प्रतिज्ञाओं को सबसे पहले प्राप्त किया, जिससे उन्हें मसीह में पूरे होने वाली भविष्यवाणियों को समझने का एक अद्वितीय अवसर मिला (रोमियों 3:1-2)। लेकिन इस समझ से कोई भी परमेश्वर के राज्य का नागरिक नहीं बनता। यह अवसर केवल उन लोगों के लिए खुला और आरक्षित है, जो उसके राजा के अधीन होते हैं। चाहे हम यहूदी हों या अन्यजाति—हमारी पृष्ठभूमि चाहे जो भी हो, हम चाहे जहाँ भी पैदा हुए हों, और चाहे जैसे भी पले-बढ़े हों— परमेश्वर मसीह में विश्वास करने वाले सभी लोगों को उद्धार प्रदान करता है। परमेश्वर के राज्य में हमारी नागरिकता जाति या बाहरी बातों से नहीं जुड़ी होती, बल्कि मसीह में विनम्र, बालक जैसे विश्वास से जुड़ी होती है।

संसार भर में लोग यह जानने के लिए संघर्ष करते हैं कि उनका सही स्थान कहाँ है और वे किसी कम्पनी, समाज, मित्र मण्डल, या यहाँ तक कि अपने परिवार में अपनी स्थिति बनाए रखने के लिए भी संघर्ष करते हैं। परमेश्वर आपसे संघर्ष करने या प्रयास करने को नहीं कहता, बल्कि केवल आनन्द लेने को कहता है। यदि आप यीशु में विश्वास करके परमेश्वर की प्रजा के लोग हैं, तो आप उसके नाम से उद्धार पाए हैं, आप लज्जा से मुक्त हो गए हैं, और आप उसकी प्रजा हैं। यहीं पर आपको आपका सही स्थान मिलता है, यहीं पर आपको अपना घर मिलता है।

इफिसियों 2:11-22

पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: न्यायियों 1–3; यूहन्ना 2 ◊

7 September : देवानें दिलेंलें विरोधक आणि देवानें दिलेंला विश्वास

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7 September : देवानें दिलेंलें विरोधक आणि देवानें दिलेंला विश्वास
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सांगायचे ते इतकेच कीं, ख्रिस्ताच्या सुवार्तेस शोभेल असे आचरण ठेवा……आणि विरोध करणार्‍या लोकांकडून कशाविषयीही भयभीत झाला नाहींत;….कारण त्याच्यावर विश्वास ठेवावा इतकेच केवळ नव्हे, तर ख्रिस्ताच्या वतीने त्याच्याकरता दुःखही सोसावे अशी कृपा तुमच्यावर झाली आहे. (फिलिप्पै 1:27-29)

पौलाने फिलिप्पैकरांना सांगितले कीं ख्रिस्ताच्या सुवार्तेस शोभेल असे आचरण ठेवणें म्हणजें आपल्या शत्रूंपुढे निर्भय असणें होय. त्यानंतर तो त्या निर्भयपणामागे असलेलें तर्कशुद्ध कारण सांगतो.

तर्कशुद्ध कारण हे आहे : देवानें तुम्हांला फक्त एक नाहीं तर दोन अशी कृपादानें दिलीं आहेत, विश्वास आणि दुःख. 29 वे वचन नेमके हेच सांगत आहे. “कारण त्याच्यावर विश्वास ठेवावा इतकेच केवळ नव्हे, तर ख्रिस्ताच्या वतीने त्याच्याकरता दुःखही सोसावे अशी कृपा तुमच्यावर झाली आहे.” तुम्हीं विश्वास ठेवावा असे कृपादान तुम्हांला देण्यांत आलें, आणि तुम्हीं दुःखही सोसावे हे कृपादान देखील तुम्हांला देण्यांत आलें.

या संदर्भात याचा अर्थ असा होतो : दुःखाचे प्रसंग येतांत तेव्हां तुमचा ‘विश्वास’ आणि तुमचे ‘दुःख’ ही दोन्ही देवाची कृपादानें आहेत. जेव्हा पॉल म्हणतो, विरोध करणार्‍या लोकांकडून कशाविषयीही भयभीत होऊं नका, तेव्हा त्यांनी भयभीत का होऊं नये यामागची त्याच्या मनात दोन कारणें होती :

1. पहिले कारण म्हणजें विरोधक हें देवाच्या हातांत आहेत. ते विरोध करतांत हे देवानें तुम्हांला दिलेंलें कृपादान आहे. विरोध हा त्याच्या अधिपत्याखाली होतो. हा 29 व्या वचनाचा पहिला मुद्दा आहे.

2. आणि भयभीत न होण्यामागचे दुसरे कारण म्हणजें तुमची निर्भयता, म्हणजेंच तुमचा विश्वास हा सुद्धा देवाच्या हातांत आहे. ते सुद्धा देवानें दिलेंलें कृपादानच आहे. हा 29 व्या वचनाचा दुसरा मुद्दा आहे.

त्यामुळें संकटे येतांत त्यावेळी निर्भय असण्यामागे असलेलें तर्कशुद्ध कारण हे दोन पदरी सत्य आहे : तुमची संकटे आणि संकटाच्या वेळी टिकाव धरणारा तुमचा विश्वास ही दोन्ही देवाची कृपादानें आहेत.

अशा जगण्याला “ख्रिस्ताच्या सुवार्तेस शोभेल असे आचरण” का म्हटले जाते? कारण सुवार्ता ही ह्या चांगल्या गोष्टींची बातमी आहे कीं ख्रिस्तानें आपल्या नव्या कराराच्या रक्ताद्वारे त्याच्या सर्व लोकांना विश्वासाचे कृपादान प्राप्त व्हावे आणि त्यांनी आपल्या वैऱ्यांवर प्रभूत्व करावें हे आपल्यात घडून येणारे देवाचे सार्वभौम कार्य साध्य केलें आहे – आणि हे सर्व त्यानें आपलें सार्वकालिक कल्याण व्हावे म्हणून केलें. हेच सुवार्तेने साध्य केलें आहे. म्हणून, सुवार्तेस शोभेल असे आचरण ठेऊन जगणें हे सुवार्तेचे सामर्थ्य आणि चांगुलपण प्रमाणित करते.

म्हणून, भयभीत होऊं नका. तुमचे विरोधक देवानें त्यांना जी सीमा ठरविली आहे त्यापलीकडें जास्त काहीं करू शकत नाहींत. आणि तो तुम्हांला आवश्यक असलेला सर्व विश्वास देईल. ही अभिवचनें रक्ताने विकत घेतलेली आहेत आणि त्यावर शिक्कामोर्तब करण्यांत आलें आहे. ही सुवार्तेची अभिवचनें आहेत.

6 सितम्बर : ईर्ष्या के परिणाम

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6 सितम्बर : ईर्ष्या के परिणाम
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“शान्त मन, तन का जीवन है, परन्तु मन के जलने से हड्डियाँ भी जल जाती हैं।” नीतिवचन 14:30

ईर्ष्या आत्मिक कैंसर के समान है, जो व्यक्ति को भीतर से नष्ट कर देती है।

ईर्ष्या के परिणाम गम्भीर होते हैं। राजा सुलैमान इस घातक रोग के बारे में हमें स्पष्ट शब्दों में सचेत करता है और इसके स्थान पर हमें स्वास्थ्य और शान्ति का जीवन अपनाने के लिए प्रेरित करता है।

ईर्ष्या हमें नुकसान पहुँचाती है। भले ही यह दूसरों को प्रत्यक्ष रूप से कोई हानि न पहुँचाए, लेकिन यह ईर्ष्या करने वाले व्यक्ति को भीतर से खोखला कर देती है। यह दूसरों के प्रति हमारे दृष्टिकोण को प्रभावित करती है। यह एक नकारात्मक तथा आलोचनात्मक दृष्टिकोण को जन्म देती है, जिससे हम अपने पड़ोसियों को अनुचित सन्देह और क्रोध की दृष्टि से देखने लगते हैं। यह हमें दूसरों की खुशी में सहभागी होने से रोकती है और हमारे सन्तोष को छीन लेती है, क्योंकि हमेशा कोई न कोई ऐसा होगा जिसके पास हमसे अधिक होगा और जिससे तुलना करके हम असन्तोष में घिर सकते हैं। ईर्ष्या हड्डियों को गला देती है।

ईर्ष्या अचानक और चुपचाप हमारे मन में घर कर सकती है। प्रेरित पतरस इसका एक उदाहरण है। क्रूस पर यीशु की मृत्यु से ठीक पहले उसने मसीह का तीन बार इनकार कर दिया और परिस्थितियों को और बिगाड़ दिया। यूहन्ना अपने सुसमाचार में बताता है कि पुनरुत्थान के बाद यीशु ने पतरस और अन्य चेलों के लिए समुद्र के किनारे नाश्ता तैयार किया और पतरस से बातचीत की। इस मुलाकात में यीशु ने पतरस के साथ अपने सम्बन्ध को पुनः स्थापित किया, उसे फिर से अपने पीछे चलने के लिए बुलाया, और उसे अपने लोगों की चरवाही करने की ज़िम्मेदारी सौंपी। यदि उससे एक दिन पहले पतरस से पूछा जाता कि उसके हृदय की सबसे बड़ी लालसा क्या है, तो वह यही होती। लेकिन जब यीशु ने कहा कि पतरस को भविष्य में उसके लिए अपना जीवन देना होगा, तो पतरस की क्या प्रतिक्रिया थी? उसने यूहन्ना की ओर देखकर पूछा, “हे प्रभु, इसका क्या हाल होगा?”

यीशु, जो ईर्ष्या के खतरों को भली-भाँति जानता था, उत्तर देता है, “यदि मैं चाहूँ कि वह मेरे आने तक ठहरा रहे, तो तुझे इससे क्या? तू मेरे पीछे हो ले!” (यूहन्ना 21:22)।

यह कितनी सरलता से हो जाता है कि जब हम आत्मिक उन्नति की ओर बढ़ रहे होते हैं, तब भी ईर्ष्या हमें जकड़ लेती है और हमें यह भुला देती है कि यीशु ने हमारे लिए क्या किया है और हमें क्या दिया है! तो फिर, इस आत्मिक बीमारी का कोई इलाज कैसे सम्भव है?

जो कार्य हम सबसे आखिर में करना चाहते हैं, वही हमें सबसे पहले करने की आवश्यकता है: ईर्ष्या को पाप के रूप में पहचानना और इसे परमेश्वर की उपस्थिति में अंगीकार करके प्रकाश में लाना। इसके बाद, हम प्रार्थना के द्वारा ईर्ष्या को हर क्षण में त्यागने का संकल्प लें, और पवित्र आत्मा से सहायता माँगें कि वह हमें स्मरण कराए कि मसीह में हमें कितना कुछ प्राप्त हुआ है। जब तक हमारे हृदय ईर्ष्या से नहीं, बल्कि आनन्द से भर न जाएँ, तब तक हमें सतत प्रयास करते रहना है। जो लोग अपनी आशिषों को गिनते हैं, वे दूसरों को मिली आशिषों के लिए परमेश्वर की स्तुति करने में अधिक सक्षम होते हैं। और एक शान्त चित्त जीवन प्रदान करता है।

अपनी ईर्ष्या को अनियन्त्रित रूप से आपको खोखला न करने दें। यह किस रूप में आपको जकड़े हुए है? इसे स्वीकार करें, इसके लिए प्रार्थना करें, और सुसमाचार के सत्य से इसका विरोध करें।

यूहन्ना 21:15-23

◊ पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: भजन 148–150; यूहन्ना 1:29-51

6 September : विद्यमान आणि सर्वसमर्थ अशी प्रीति

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6 September : विद्यमान आणि सर्वसमर्थ अशी प्रीति
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ख्रिस्ताच्या प्रीतिपासून आपल्याला कोण विभक्त करील? क्लेश, आपत्ती, छळणूक, उपासमार, नग्नता, संकट किंवा तलवार ही विभक्त करतील काय? (रोमकरांस 8:35)

रोमकरांस 8:35 मध्यें प्रकट तीन गोष्टींकडें लक्ष द्या.

  1. ख्रिस्त सांप्रतकाळी आम्हांवर प्रीति करतो.

एखादी स्त्री कदाचित् तिच्या हयात नसलेल्या पतीविषयी म्हणेंल: कोणतीही वस्तू मला त्याच्या प्रीतिपासून विभक्त करायला समर्थ होणार नाहीं. तिच्या या वक्तव्याचा अर्थ असा असू शकतो कीं तिच्या अंत:करणांत त्याच्या प्रीतिच्या आठवणी तिला आयुष्यभर गोडवा देणारी आणि शक्तिवर्धक अशा असतील. पण पौल इथे जें म्हणत आहे त्याचा अर्थ तो होत नाहीं.

रोमकरांस 8:34 मध्यें स्पष्टपणें असे म्हटले आहे कीं, “जो मेला इतकेच नाहीं, तर मेलेल्यांतून उठला आहे, जो देवाच्या उजवीकडें आहे आणि जो आपल्यासाठीं मध्यस्थीही करत आहे तो ख्रिस्त येशू आहे.” कोणतीही वस्तू आपल्याला ख्रिस्ताच्या प्रीतिपासून विभक्त करायला समर्थ होणार नाहीं असे पौल म्हणू शकतो याचे कारण हे कीं ख्रिस्त जिवंत आहे आणि आत्ताही तो आपल्यावर प्रीति करतो.

तो देवाच्या उजवीकडें आहे आणि म्हणून तो आम्हांसाठीं सर्व वस्तूंवर राज्य करत आहे. एवढेच नाहीं, तर तो आपल्यासाठीं मध्यस्थी देखील करत आहे, याचा अर्थ असा कीं त्यानें आमच्या मुक्तीसाठीं जे कार्य साध्य केलें ते आम्हांला क्षणोक्षणी तारून नेत आहे आणि सार्वकालिक असा जो आनंद त्यांत आपल्याला सुरक्षितपणें घेऊन येत आहे, याकडें तो पुरेपूर लक्ष्य देतोय. त्याची प्रीति फक्त आठवणी नाहींत. ही सर्वसमर्थ, देवाच्या जिवंत पुत्राची क्षणोक्षणी जिवंत असलेली एक क्रिया आहे, जी आपल्याला सार्वकालिक आनंद देते.

2. ख्रिस्ताची ही प्रीति आम्हांला विभक्त होण्यापासून वाचवण्यात प्रबळ आहे, आणि म्हणून ही प्रीति सर्वांवर असलेली सामान्य वैश्विक प्रीति नाहीं तर त्याच्या लोकांसाठीं असलेली विशिष्ट अशी वैयक्तिक प्रीति आहे – म्हणजें रोमकरांस 8:28 म्हणते त्याप्रमाणें, त्यांच्यावर असलेली प्रीति जे देवावर प्रीति करतांत आणि त्याच्या संकल्पाप्रमाणें बोलाविलेलें आहेत.

ही इफिस 5:25 मध्यें वर्णिलेली प्रीति आहे, “पतींनो, जशी ख्रिस्तानें मंडळीवर प्रीति केलीं तशी तुम्हींही आपापल्या पत्नीवर प्रीति करा; ख्रिस्तानें मंडळीवर प्रीति केलीं आणि स्वतःस तिच्यासाठीं समर्पण केलें.” ही ख्रिस्ताची आपल्या मंडळीवर, जी त्याची नवरी आहे, प्रीति आहे. ख्रिस्ताची सर्वांवर प्रीति आहे, आणि जी प्रीति त्याला आपल्या वधूसाठीं आहे ती विशेष, तारणदायी, राखणारी प्रीति आहे. जर तुमचा ख्रिस्तावर विश्वास असेल तर तुम्हीं त्या वधूचा भाग आहात हे आपल्याला ठाऊक आहे. जो कोणी – यांत अपवाद नाहींच – जो कोणी ख्रिस्तावर विश्वास ठेवतो तो हे म्हणू शकतो कीं, मी त्याच्या वधूचा, त्याच्या मंडळीचा भाग आहे; जें त्याचे बोलाविलेले आणि निवडलेलें आहेंत त्यांपैकीं एक आहे, म्हणजें त्यांपैकीं ज्यांची रोमकरांस 8:35 मध्यें सांगितल्याप्रमाणें, काहींही झालें तरी, युगानुयुग राखण केलीं जाते आणि ज्यांचे संरक्षण केलें जाते.

3. ही सर्वसमर्थ, प्रबळ, राखून ठेवणारी प्रीति आपल्याला या जीवनातील संकटांपासून वाचवत नाहीं, तर त्यां संकटांद्वारे आपल्याला सुरक्षितपणें देवासोबत सार्वकालिक आनंदात घेऊन येते.

आपण सर्वांना मरण येईल, परंतु ते मरण आपल्याला विभक्त करण्यांस समर्थ होणार नाहीं. म्हणून जेव्हा पौल वचन 35 मध्यें म्हणतो कीं “तलवार” आपल्याला ख्रिस्ताच्या प्रीतिप्रेमापासून विभक्त करण्यांस समर्थ होणार नाहीं, तेव्हा त्याचा अर्थ असा आहे : जरी आपण जिवे मारिलें गेलो तरी आपण ख्रिस्ताच्या प्रीतिप्रेमापासून विभक्त केलें जाणार नाहीं.

ह्याप्रमाणें वचन 35 चा सारांश असा आहे : येशू ख्रिस्त सांप्रतकाळी आपल्या लोकांवर अशा प्रीतिने प्रेम करतो जी सर्वसमर्थ, क्षणोक्षणी वर्तमान अशी आहे, जी आपल्याला नेहमीच संकटांतून सोडवत नाहीं, तर दुःख व मरण यांतूनही त्याच्या उपस्थितीत आम्हांला सार्वकालिक आनंद प्राप्त व्हावा म्हणून आम्हांला राखून ठेविते.

5 सितम्बर : पतियों के लिए एक सन्देश

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5 सितम्बर : पतियों के लिए एक सन्देश
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“हे पतियो, अपनी-अपनी पत्नी से प्रेम रखो जैसा मसीह ने भी कलीसिया से प्रेम करके अपने आप को उसके लिए दे दिया कि उसको वचन के द्वारा जल के स्नान से शुद्ध करके पवित्र बनाए।” इफिसियों 5:25-26

परमेश्वर के अनुग्रह से प्रत्येक मसीही विवाह केवल विवाह तक सीमित नहीं रहता।

मनुष्य के विवाह का उद्देश्य स्वयं विवाह से आगे संकेत करना है, उस परम विवाह की ओर जो स्वर्ग में ठहराया गया है—अर्थात जिसमें दूल्हा मसीह है और कलीसिया उसकी दुल्हन है। दूसरे शब्दों में, विवाह परमेश्वर की परम योजना को दर्शाने के लिए है, जिसके अन्तर्गत “जो कुछ स्वर्ग में है और जो कुछ पृथ्वी पर है, सब कुछ वह मसीह में एकत्र” करेगा (इफिसियों 1:10)। यही कारण है कि पौलुस पतियों के लिए विशेष निर्देश देता है, ताकि उनके विवाह उस मिलन को प्रकट कर सकें जिसे परमेश्वर ने ठहराया है।

विवाह में पति का मुख्य उद्देश्य केवल अपनी पत्नी की शारीरिक और भावनात्मक देखभाल करना नहीं है। हाँ, यह भी आवश्यक है, लेकिन उसका परम उद्देश्य यह होना चाहिए कि उसकी पत्नी यीशु से मिलने के लिए तैयार हो।

इसीलिए पौलुस यहाँ जिस “प्रेम” शब्द का उपयोग करता है, वह महत्त्वपूर्ण है। यूनानी भाषा में “अगापे” प्रेम आत्म-त्याग और आत्म-न्यूनता को व्यक्त करता है। यह प्रेम पाने के बारे में नहीं, बल्कि देने के बारे में है। यह इस बात पर केन्द्रित नहीं कि हमें क्या मिलना चाहिए, बल्कि इस पर कि हमें क्या देना है। यह स्वार्थी हितों की खोज नहीं, बल्कि अपनी पत्नी के वास्तविक हित के लिए स्वयं को समर्पित करने का प्रेम है, जिससे वह “पवित्र और निर्दोष हो” (इफिसियों 5:27)। यही कारण था कि मसीह ने अपने जीवन को अपनी कलीसिया के लिए दे दिया, और पति के रूप में यही प्रेम हमें अपनी पत्नियों के लिए रखना चाहिए।

लेकिन एक पति अपने दैनिक जीवन में इस प्रेम को कैसे व्यक्त कर सकता है? इसका एक व्यावहारिक तरीका यह है कि पति शारीरिक, भावनात्मक और आत्मिक रूप से अपनी पत्नी की उपेक्षा न करें—और यदि आपका पेशा, या सामाजिक या कलीसियाई जिम्मेदारियाँ किसी भी प्रकार की बाधा बनती हैं, तो आपको अपनी प्राथमिकताओं पर पुनर्विचार करना होगा। आपको अत्याचार का त्याग भी करना होगा, जिसमें न केवल गम्भीर पाप शामिल हैं, बल्कि इसमें अपनी पत्नी को नीचा दिखाना, उस पर हुक्म जमाना, उसे नज़रअन्दाज़ करना, या ऐसा व्यवहार करना जैसे वह आपसे विवाह करके बहुत सौभाग्यशाली है—ये सब भी शामिल हैं। और अन्त में, आपको यह भी सुनिश्चित करना होगा कि आप अपनी शादी को कभी भी हल्के में न लें, जो कि समय के साथ होना सम्भव हो सकता है।

फिर भी, ये व्यावहारिक सुझाव चाहे जितने भी सहायक हों, असली मापदण्ड और प्रेरणा का स्रोत क्रूस पर मसीह का अपनी कलीसिया के प्रति प्रेम है। यदि हम स्पष्ट रूप से नहीं देख पाते कि यीशु ने अपनी कलीसिया से कैसा प्रेम किया है, तो हमारी अच्छी इच्छाएँ भी असफल हो जाएँगी, और हमारी कमियाँ हमें तोड़ देंगी। इसलिए हमें मसीह की ओर देखना चाहिए, जिसे स्वयं किसी व्यक्ति या वस्तु की ज़रूरत नहीं थी, तौभी उसने अपने आपको दे दिया ताकि हम—जो ज़रूरतमन्द हैं, विद्रोही हैं, और खाली हैं—उसकी बाँहों में समा सकें, उसके हृदय में स्वागत पा सकें, उसके परिवार में शामिल हो सकें, और उसकी दुल्हन का हिस्सा माने जा सकें।

क्या आप यह सोचकर चकित होते हैं, “उसने मुझसे इतना प्रेम क्यों किया?” यदि हाँ, तो आप समझ सकते हैं कि पतियों के लिए यह आदेश कि “अपनी-अपनी पत्नी से प्रेम रखो जैसा मसीह ने भी कलीसिया से प्रेम करके अपने आप को उसके लिए दे दिया,” कितना ऊँचा है। यदि आप एक पति हैं, या भविष्य में बनना चाहते हैं, तो इसे प्रार्थना से आरम्भ करें—प्रार्थना करें कि पवित्र आत्मा आपको बाइबल आधारित सोचने, आज्ञाकारिता से जीने, और वास्तव में निःस्वार्थ प्रेम करने में सक्षम बनाए। और यदि आप एक पत्नी हैं, या भविष्य में बनने की आशा रखती हैं, तो आप यह प्रार्थना अपने पति के लिए भी करें, जिससे आपकी और उसकी प्रसन्नता सुनिश्चित हो, और सबसे बढ़कर, परमेश्वर को महिमा मिले।

इफिसियों 5:22-32

पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: भजन 146–147; यूहन्ना 1:1-28 ◊

5 September : ख्रिस्ताच्या प्रेमाचे ध्येय

“हे माझ्या पित्या, माझी अशी इच्छा आहे कीं, तू जे मला दिलें आहेत त्यांनीही जेथे मी आहे तेथे माझ्याजवळ असावे; ह्यासाठीं कीं, जो माझा गौरव तू मला दिला आहेस तो त्यांनी पाहावा” (योहान 17:24).

येशूवर विश्वास ठेवणारे देवाच्या दृष्टित मौल्यवान आहेत (आम्हीं त्याची वधू आहोत!). आणि तो आम्हांवर इतकीं प्रीति करतो कीं आमची जी मौल्यवानता आहे तिला तो आमच्यासाठीं भजनीय दैवत बनू देणार नाहीं.

अर्थातच, देवानें आपल्यासाठीं बरेच काहीं केलें आहे (तो आपल्याला दत्तक घेऊन त्याचे कुटुंबीय बनवतो!), परंतु तो असे करतो याचे कारण म्हणजें हे कीं आपण त्याच्या महानतेचा (गौरवाचा) आनंद घ्यावा म्हणून तो आधी आपल्याला आमच्या स्व:पणातून बाहेर काढतो.

आपापले परीक्षण करा. कल्पना करा, कीं जर येशू तुमच्यासोबत दिवस घालवण्यासाठीं येतो, तुमच्या शेजारी पलंगावर बसतो आणि म्हणतो, “माझं तुझ्यावर खरं प्रेम आहे,” तर आता ज्याअर्थी तुम्हीं त्याच्याबरोबर दिवस घालविला, तर उर्वरित दिवस तुम्हीं कशावर लक्ष केंद्रित करून घालवाल?

मला असे वाटते कीं अशी बरीच गीतें आणि प्रवचने आहेत जी आपल्याला चुकींचे उत्तर देऊन सोडतांत. त्यांचे उत्तर आमच्या अंत:करणांत अशी छाप सोडतांत कीं आमचा आनंद तेव्हां काठोकाठ भरतो जेव्हां आमच्यावर प्रीति केल्याची भावना आम्हांला वारंवार जाणवते. “तो माझ्यावर प्रेम करतो!” “तो माझ्यावर प्रेम करतो!” निश्चितच, हा आनंद खरा आहे यांत शंका नाहीं. पण हा आनंद काठोकाठ नाहीं, आणि हा त्या मागचा मुख्य हेतूही नाहीं.

जेव्हां आपण म्हणतो “मजवर प्रीति केलीं गेलीं” तेव्हां आपण काय म्हणत आहोत? आम्हांला काय म्हणायचे आहे? “मजवर प्रीति केलीं गेलीं” ह्याचे खरे औचित्य काय आहे?

दिवसभर येशूला निरक्षून आणि “अहाहा तू किती गौरवी आहेस!” “अहाहा! काय तुझे ते गौरव!” असे मोठ्याने उद्गार काढण्यात सर्वात मोठा, व ख्रिस्ताला उंचवणारा आनंद मिळणार नाहीं का?

  • तो सर्वात अवघड अशा प्रश्नाचे उत्तर देतो म्हणजें त्याचे शहाणपण गौरवी आहे.
  • तो घाणेंरड्या, रक्तस्त्राव होणाऱ्या फोडाला स्पर्श करतो, म्हणजें त्याचा कळवळा गौरवी आहे.
  • तो वैद्यकींय परीक्षकांच्या कार्यालयात जाऊन मृत झालेंल्या एका महिलेला उठवतो म्हणजें त्याचे सामर्थ्य गौरवी आहे.
  • तो दुपारच्या घडामोडींचे भाकींत करतो म्हणजें त्याचे पूर्वज्ञान गौरवी आहे.
  • भूकंपाच्या वेळी तो शांत झोप घेतो म्हणजें त्याची निर्भयता गौरवी आहे.
  • तो म्हणतो, “अब्राहामाचा जन्म झाला त्यापूर्वी मी आहे” (योहान 8:58), म्हणजें त्याची वचनें गौरवी आहेत.

आम्हीं दिवसभर त्याच्याबरोबर चालतो-फिरतो, आणि जे आम्हांला दिसते ते पाहून त्याच्या गौरवाने भारावून जातो.

त्याला आपल्यासाठीं जे काहीं करणें अगत्याचे आहे (ज्यात आमच्यासाठीं मरण सोसणें देखील आहे) ते तो आपल्यासाठीं करावयास आवेशी आहे जेणेंकरुन आपण त्याला पाहून आश्चर्य करावें आणि त्यानें आम्हांस भस्म करू नये, ही त्याची आपल्यासाठीं प्रीति नाहीं का? पापमुक्ती, प्रायश्चित्त, अपराधांची क्षमा, नीतिमान ठरविले जाणें, देवाबरोबर समेट – हे सर्व होणें अगत्याचे होते. ही सर्व प्रीतिची कार्य आहेत.

परंतु जी प्रीति त्या कृत्यांना प्रीतिचे स्वरूप देते त्या प्रीतिचे ध्येय हे कीं आपण त्याच्याबरोबर असावे आणि थक्क करणारे असे जे त्याचे गौरव ते आम्हीं पाहावे आणि चकित व्हावे. हे असे क्षण आहेत जेव्हां आपण स्वतःला विसरून जातो आणि देव त्याच्याद्वारे आम्हांबरोबर आहे हे पाहण्यांस समर्थ होतो.

म्हणून मी पाळकांना आणि शिक्षकांना विनंती करतो : ख्रिस्तानें त्याचे प्रीतिचे जे कार्य केलें तेंच त्याच्या प्रीतिचे ध्येय आहे हे मंडळीला आवर्जून सांगा आणि प्रीतिच्या बाबतींत त्यांच्या विचारसरणीत बदल घडवून आणा. जर पापमुक्ती, प्रायश्चित्त, अपराधांची क्षमा, नीतिमान ठरविले जाणें, देवाबरोबर समेट – हे सर्व आपल्याला स्वतः येशूमध्यें आनंद करण्याकडें घेऊन जात नसतील तर ही प्रीतिची कार्यें नाहींत.

तुमचा संदेश व शिक्षण यावर केंद्रित असू द्या. योहान 17:24 मध्यें येशूनें याचसाठींच प्रार्थना केलीं होती, “हे माझ्या पित्या, माझी अशी इच्छा आहे कीं, तू जे मला दिलें आहेत त्यांनीही जेथे मी आहे तेथे माझ्याजवळ असावे; ह्यासाठीं कीं, जो माझा गौरव…तो त्यांनी पाहावा.”