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24 सितम्बर : जीवन बोलो, दोष नहीं

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24 सितम्बर : जीवन बोलो, दोष नहीं
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“दोष मत लगाओ, तो तुम पर भी दोष नहीं लगाया जाएगा। दोषी न ठहराओ, तो तुम भी दोषी नहीं ठहराए जाओगे।” लूका 6:37

अक्सर हम इस भ्रम में पड़ जाते हैं कि हमें दूसरों पर दोष लगाने का अधिकार है—क्योंकि यह हमारी पापमयी प्रवृत्ति को भाता है। सच कहें तो, जैसे ही हमें नेतृत्व या अधिकार की कोई भी स्थिति मिलती है—चाहे वह छोटी हो या बड़ी—हमें आश्चर्यजनक रूप से जल्दी यह प्रलोभन घेर लेता है कि हम दया दिखाने की बजाय दोष लगाने लगें।

हमें याद रखना चाहिए कि हम दोष लगाने के योग्य नहीं हैं। क्यों? क्योंकि हम किसी दूसरे के दिल को नहीं पढ़ सकते। हम किसी के इरादों का सही आकलन नहीं कर सकते। केवल परमेश्वर ही यह कह सकता है: “हृदय और मन का परखने वाला मैं ही हूँ, और मैं तुममें से हर एक को उसके कामों के अनुसार बदला दूँगा” (प्रकाशितवाक्य 2:23)। चूंकि आप और मैं परमेश्वर नहीं हैं, इसलिए हम दोष लगाने के अधिकारी नहीं हैं। हम यीशु की इस आज्ञा को सबसे ज़्यादा और सबसे आसानी से किस तरह तोड़ते हैं? अपनी जीभ से। हम दूसरों की बदनामी करके उनके चरित्र पर दोष लगा देते हैं। मसीही समाज में हम अक्सर बड़ी चालाकी से इस तरह की चुगली को प्रार्थना निवेदन या चिन्ता के रूप में पेश करते हैं—लेकिन सच्चाई यह है कि अक्सर हमें यह कहने में एक अजीब-सी खुशी मिलती है: “क्या तुमने उसके बारे में यह सुना है?” “क्या तुम जानते हो उसने ऐसा क्यों किया?” “तुम्हें मालूम है उसके साथ क्या हुआ?” यह वही भाव है जो फरीसियों में था—दूसरों को दोषी ठहराकर खुद को ऊँचा दिखाना। यह प्रवृत्ति आज भी मसीहियों के बीच जीवित है।

इसीलिए हमें अपने शब्दों के प्रयोग को लेकर बेहद सतर्क रहना चाहिए। अपनी जीभ दोष लगाने की बजाय, हमें पवित्र आत्मा से प्रार्थना करनी चाहिए कि वह हमें जीवनदायक शब्द बोलने का सामर्थ्य दे। मुँह खोलने से पहले हमें मिशनरी एमी कार्माइकल की इस सलाह को याद रखना चाहिए और स्वयं से पूछना चाहिए: “क्या जो मैं कहने जा रहा हूँ, वह दयालु है? क्या वह सत्य है? क्या वह आवश्यक है?” पवित्रशास्त्र इस विषय पर पूर्णतः स्पष्ट है। वास्तव में, नीतिवचन की पुस्तक हमें सिखाती है: “मूर्ख का विनाश उसकी बातों से होता है, और उसके वचन उसके प्राण के लिए फन्दे होते हैं,” लेकिन “विश्वासयोग्य मनुष्य बात को छिपा रखता है” (नीतिवचन 18:7; 11:13)।

हमें यीशु में एक ऐसा उद्धारकर्ता मिला है, जिसका लहू हमारे हर लापरवाह शब्द और हर निन्दात्मक टिप्पणी से हमें शुद्ध करता है—एक ऐसा उद्धारकर्ता जो हमें उस पापी प्रवृत्ति से क्षमा करता है, जो हमें परमेश्वर की भूमिका हथिया लेने की ओर खींचती है। इस सच्चाई के प्रकाश में, हमें प्रतिदिन अपनी जीभ के पापों के लिए पश्चाताप करना चाहिए और पवित्र आत्मा से प्रार्थना करनी चाहिए कि वह हमारे मन में एक नई लालसा उत्पन्न करे—कि हमारे मुँह के वचन और हमारे हृदय का ध्यान उसके सम्मुख ग्रहण योग्य हों (भजन संहिता 19:14)।

लूका 6:37-45

◊ पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: यहेजकेल 11–13; यूहन्ना 10:22-42

24 September : येशूचा आनंदाचा पाठलाग

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24 September : येशूचा आनंदाचा पाठलाग
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आपण आपल्या विश्वासाचा उत्पादक व पूर्ण करणारा येशू ह्याच्याकडें पाहत असावे; जो आनंद त्याच्यापुढे होता त्याकरता त्यानें लज्जा तुच्छ मानून वधस्तंभ सहन केला, आणि तो देवाच्या राजासनाच्या उजवीकडें बसला आहे. (इब्री 12:2)

येशूचे उदाहरण ख्रिस्ती पूर्णानंदाच्या तत्त्वाशी विरोधक आहे का? म्हणजें हे कीं, प्रीति आनंदाचा मार्ग आहे आणि हे कीं मनुष्यानें याच कारणामुळें हा मार्ग निवडला पाहिजे, असे न होवो कीं कोणी सर्वशक्तिमान देवाची आज्ञा पाळण्याच्या बाबतींत गोंधळात पडलेला किंवा कृपेचे साधन बनण्याच्या विशेषाधिकाराशी असंतुष्ट असलेला किंवा प्रतिज्ञेच्या  प्रतिफळांना कमी लेखताना आढळून येवो.

इब्री लोकांस 12:2 अगदी स्पष्टपणें सांगतांना दिसून येते कीं येशूनें या तत्त्वावर आक्षेप घेतला नाहीं वा त्याचा नकार केला नाहीं.

आजवर घडलेले प्रीतिचे सर्वात मोठे परिश्रम शक्य झालें कारण येशूनें जो सर्वात मोठा आनंद त्याच्यापुढे होता त्याकडें आपली दृष्टि लावली, म्हणजें, लोकांच्या सभेत देवाच्या राजासनाच्या उजवीकडें उंच केलेंल्याचा आनंद : म्हणजें तो आनंद ज्याकरता “त्यानें लज्जा तुच्छ मानून वधस्तंभ सहन केला!”

हे सांगताना, लेखक येशूचे आणखी एक उदाहरण देतो, आणि त्यांत तो इब्री 11 मध्यें वर्णिलेल्या इतर पवित्रजनांचाहि उल्लेख करतो, म्हणजें त्यांचे उदाहरण जें त्यांच्यापुढे देवानें ठेविलेल्या आनंदासाठीं इतके आवेशी आणि विश्वासाने भरलेले होते कीं त्यांनी “पापाचे क्षणिक सुख भोगणें” सुद्धा नाकारले (इब्री 11: 25) आणि देवाच्या इच्छेशी एकरूप होण्यासाठीं दुःख सोसणें पसंत करून घेतले.

म्हणून, गेथसेमानेच्या त्या काळोख्या रात्री ख्रिस्ताला ज्या गोष्टीने दुख सहनांत टिकवून ठेवले तिचे किमान एक पक्ष त्या आनंदाची आशा होती जो वधस्तंभाच्या पलीकडें त्याच्यासाठीं ठेविलेला होता असे म्हणणें बायबल-विरोधी कथन होणार नाहीं. त्यामुळें आपल्यावरील त्याच्या प्रीतिची वास्तविकता आणि महानता कमी होत नाहीं, कारण ज्या आनंदाची त्याला आशा होती तो आनंद पुष्कळ पुत्रांना गौरवात आणण्याचा आनंद होता (इब्री 2:10).

त्याचा आनंद आपल्याला मुक्ती मिळावी यांत होता, जिचा परिणाम देवाचे गौरव आहे. आम्हीं येशूबरोबर त्याच्या आनंदाचे  भागीदार बनतो आणि गौरव देवाचे होते.

23 सितम्बर : पिता की दया की अनुकरण करना

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23 सितम्बर : पिता की दया की अनुकरण करना
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“अपने शत्रुओं से प्रेम रखो, और भलाई करो, और फिर पाने की आशा न रखकर उधार दो; और तुम्हारे लिए बड़ा फल होगा, और तुम परमप्रधान के सन्तान ठहरोगे, क्योंकि वह उन पर जो धन्यवाद नहीं करते और बुरों पर भी कृपालु है। जैसा तुम्हारा पिता दयावन्त है, वैसे ही तुम भी दयावन्त बनो।” लूका 6:35-36

“जैसा तुम्हारा पिता दयावन्त है, वैसे ही तुम भी दयावन्त बनो”—यीशु के प्रसिद्ध धन्य-वचनों की शिक्षा का सार है (लूका 6:20-23), और वास्तव में यह हर विश्वासी के जीवन का एक उत्तम आदर्श वाक्य हो सकता है। ये शब्द उस हर बात पर बल देते हैं, जो यीशु पहले ही हमें दूसरों के प्रति हमारे व्यवहार के बारे में सिखा चुका है—विशेषकर उनके प्रति जो प्रभु के प्रति हमारी निष्ठा के कारण हमसे बैर रखते हैं (पद 22)।

हालाँकि, यह बात हमें एक प्रश्न पूछने के लिए प्रेरित करती है: दयालु होना वास्तव में कैसा दिखता है? हमारा बुद्धिमान और कोमल चरवाहा यीशु हमें इस सिद्धान्त को स्वयं ही समझने के लिए नहीं छोड़ देता। इसके विपरीत, वह हमें यह स्पष्ट रूप से बताता है कि हमारे स्वर्गिक पिता की दया का अनुकरण करना कैसा दिखता है।

परमेश्वर “उन पर जो धन्यवाद नहीं करते और बुरों पर भी कृपालु है।” और चूंकि हम उसकी सन्तान हैं, इसलिए हमें भी यही दया दिखाने के लिए बुलाया गया है—अर्थात अपने शत्रुओं से प्रेम करना, बुराई के बदले भलाई करना, और बिना किसी प्रतिफल की आशा किए दूसरों को देना। ध्यान दें कि यीशु यहाँ किसी प्रकार की छूट या ऐसा न करने का कोई बहाना नहीं देता।

जब यीशु हमें परमेश्वर की दया के वाहक बनने के लिए बुलाता है, तो उसी क्षण वे हमें यह भी बताता है कि हमें दूसरों पर दोष नहीं लगाना है (लूका 6:37)। वह यह नहीं कह रहा कि हम अपने रिश्तों में सही-गलत की परख करने की क्षमता को एक ओर रख दें। हमें सत्य और असत्य या भलाई और बुराई में भेद करना बन्द नहीं कर देना है। यीशु यह भी नहीं कह रहा कि हम पापों को अनदेखा करें या गलतियों को न सुधारें। बल्कि जब यीशु कहता है कि “दोष मत लगाओ,” तो वह एक प्रकार की आत्म-धर्मी, खुद को ऊँचा समझने वाली, कपटी और कठोर आलोचना वाली प्रवृत्ति को गलत ठहरा रहा है—एक ऐसा दृष्टिकोण जो केवल दूसरों की गलतियाँ उजागर करता है और हमेशा कटुता की भावना लेकर आता है।

एक निर्दयी मनोदशा पूरी तरह से यीशु की उस प्रेरणा के विरुद्ध है, जिसमें उसने हमसे कहा है कि हम अपने मित्रों और शत्रुओं दोनों के प्रति दया दिखाएँ। हममें से हर किसी को अपने भीतर किसी भी प्रकार की आलोचनात्मक भावना को पहचानकर उसे जड़ से उखाड़ फेंकना है, और उसकी जगह कोमलता और समझदारी को देना है।

यही वह तरीका है जिससे हम दूसरों को वह दया दिखाते हैं, जो परमेश्वर ने हम पर दिखाई है। एक (सम्भवतः काल्पनिक) कहानी बताई जाती है कि जब रानी एलीज़ाबेथ द्वितीय छोटी थीं, तो उनकी माँ उन्हें और उनकी बहन मार्गरेट को किसी पार्टी में जाने से पहले कहा करती थीं: “याद रखना: तुम शाही सन्तान हो, इसलिए शाही व्यवहार करना।” उनका आचरण उन्हें शाही परिवार का सदस्य नहीं बनाता था, लेकिन यह दिखाता था कि वे उस परिवार के सदस्य हैं।

मसीही भाइयो और बहनो, आप और मैं इस सृष्टि के शाही परिवार के सदस्य हैं, और इस सृष्टि का राजा हमारा पिता है। यह निश्चित करें कि आपका व्यवहार यह दर्शाए कि आप कौन हैं और किसके हैं। जैसा तुम्हारा पिता दयावन्त है, वैसे ही तुम भी दयावन्त बनो

इफिसियों 4:25 – 5:2

पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: यहेजकेल 8–10; यूहन्ना 10:1-21 ◊

23 September : अति वाईट पाप्यांसाठीं तारणाची आशा

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23 September : अति वाईट पाप्यांसाठीं तारणाची आशा
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“ज्याच्यावर कृपा करावी असे वाटेल त्याच्यावर मी कृपा करीन आणि ज्याच्यावर दया करावी असे वाटेल त्याच्यावर दया करीन.” (निर्गम 33:19)

ताठ मानेच्या ह्या लोकांवर ज्यांनी नुकतीच मूर्तिपूजा केलीं आणि ज्या देवानें त्यांना मिसर देशातून बाहेर काढले त्याची निंदा केलीं तोच देव खरोखरच दया करील या आशेची मोशेला गरज होती.

मोशेला आवश्यक असलेली आशा आणि खात्री देण्यासाठीं, देव म्हणाला, “ज्याच्यावर कृपा करावी असे वाटेल त्याच्यावर मी कृपा करीन.” दुसऱ्या शब्दांत सांगायचे तर, “मी जी निवड करतो ती मनुष्यांच्या दुर्गुणांवर किंवा सद्गुणांवर अवलंबून नसून केवळ माझ्या स्वतंत्र, सार्वभौम इच्छेवर अवलंबून आहे. म्हणून कोणीही असे म्हणू शकत नाहीं कीं तो मनुष्य इतका वाईट आहे कीं त्याच्यावर कृपा केलीं जाऊच शकत नाहीं.” जर निवड ही मनुष्यांच्या दुर्गुणांवर किंवा सद्गुणांवर अवलंबून असती तर देव स्वतंत्र नाहीं आणि त्याची निवड अटविरहित नाहीं असा याचा अर्थ होईल.

अटविरहित निवडलें ज्याण्याचा  सिद्धांत हा सर्वात वाईट पापी लोकांसाठीं आशेचा महान सिद्धांत आहे. म्हणजें जेव्हा कृपेसाठीं पात्र होण्याचा विचार येतो तेव्हा तुमच्या पार्श्वभूमीचा देवानें केलेंल्या तुमच्या निवडीशी काहींही संबंध नाहीं. हे तर शुभवर्तमानाचेच एक स्वरूप आहे.

जर तुमचा नव्याने जन्म झाला नसेल आणि येशू ख्रिस्तावर जो तारणहार विश्वास तो जर तुम्हांला दिला गेलेला नसेल, तर तुमचा पूर्वायुष्यातील अत्याधिक दुष्टपणा किंवा मनाची कठोरता ही तुमच्या जीवनात देवाच्या कृपेंत मोठा अडथळा बनत आहे असा विचार करून नैराश्याच्या डोहांत बुडू नका. अति वाईट पापी लोकांवर कृपा करून त्यांच्या तारणांत आपल्या कृपेच्या स्वातंत्र्याचा गौरव करणें देवाला आवडते.

आपल्या पापापासून वळा; परमेश्वराला हाक मारा. या दैनंदिन भक्तीमध्येंही, जे तुम्हीं वाचत आहात किंवा ऐकत आहात, तो तुमच्यावर कृपा करत आहे, आणि तुम्हीं दयेसाठीं त्याच्याकडें यावें असे उत्तेजन तो तुम्हांला देत आहे.

“परमेश्वर म्हणतो, चला, या, आपण बुद्धिवाद करू; तुमची पातके लाखेसारखी लाल असली तरी ती बर्फासारखी पांढरी होतील; ती किरमिजासारखी तांबडी असली तरी लोकरीसारखी निघतील” (यशया 1:18).

22 सितम्बर : प्रेम का नियम

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22 सितम्बर : प्रेम का नियम
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“मैं तुम सुनने वालों से कहता हूँ कि अपने शत्रुओं से प्रेम रखो; जो तुम से बैर करें, उनका भला करो।” लूका 6:27

जब आप बाइबल पढ़ते हैं और उसमें मसीही आस्था का वर्णन पाते हैं, और फिर आप अपने आप को देखते हैं, तो क्या कभी आप यह सोचते हैं कि क्या आप सचमुच एक मसीही हैं या नहीं? मुझे पता है कि मैं ऐसा करता हूँ।

विश्वासियों के रूप में हमारा आश्वासन और परमेश्वर का हमसे प्रेम इस बात पर निर्भर नहीं करता कि हम कुछ मसीही सिद्धान्तों का अपने जीवन में कितने अच्छे तरीके से पालन करते हैं; बल्कि ये दोनों हमारे लिए मसीह द्वारा क्रूस पर किए गए काम पर निर्भर करते हैं। फिर भी, बाइबल हमें वर्तमान में अपनी मुक्ति के प्रमाण देखने के बारे में सिखाती है। यदि हम सचमुच अपने स्वर्गिक पिता के बच्चे हैं, तो हमें दूसरों के प्रति एक ऐसा प्रेम दिखाना होगा जो यीशु के हमारे लिए प्रेम के समान हो।

यीशु हमें लोगों से इस प्रकार प्रेम करने के लिए कहता है, जो उनके आकर्षण, योग्यता या अनुराग्यता से सम्बन्धित न हो। हम जानते हैं कि परमेश्वर हमसे ठीक ऐसा ही प्रेम करता है—उसका प्रेम इस बात पर आधारित नहीं है कि हमने अपना व्यवहार ठीक किया है, हम उसके ध्यान के योग्य हैं या हम उसकी सेवा में सहायक अथवा उपयोगी हैं। इन सभी बातों से परमेश्वर का प्रेम हमारे लिए बढ़ता नहीं है। नहीं—“परन्तु परमेश्वर हम पर अपने प्रेम की भलाई इस रीति से प्रगट करता है कि जब हम पापी ही थे तभी मसीह हमारे लिए मरा” (रोमियों 5:8, अतिरिक्त बल जोड़ा गया)।

इसलिए, हमारी आस्था का सबसे बड़ा मापदण्ड प्रेम है—वह प्रेम जो उस प्रेम को दर्शाता है जो हमें इतनी अधिकता में प्राप्त हुआ है। हम अगापे प्रेम में संलग्न होते हैं—शर्त-रहित, बलिदानी प्रेम—क्योंकि यह परमेश्वर के चरित्र और उसके द्वारा हमारे लिए किए गए कामों का एक प्रकट रूप है। हम अपने शत्रुओं से इस प्रकार का प्रेम इस कारण नहीं करते क्योंकि हम उन्हें उनके असली रूप में नहीं देख पाते, बल्कि इसलिए क्योंकि हमने अपने स्वयं के लिए परमेश्वर के प्रेम को देखा है। यीशु कहता है कि जब हम दूसरों को जैसा वे हैं वैसे देखते हैं—उनकी सारी कुरूपता और नफरत, उनके सारे शाप, उनके सारे द्वेष, और हमसे उधार लिए हुए को न चुकाना—तो हमें इसके बारे में यथार्थवादी होना चाहिए, और फिर उनसे प्रेम करना चाहिए। यीशु कहता है, जब तुम यह सारी शत्रुता देखो, तो मैं चाहता हूँ कि तुम अपने शत्रुओं से प्रेम करो।

स्वभाव से, हम इस प्रकार के प्रेम को दिखाने में असमर्थ हैं। लेकिन ज़रा सोचिए कि यदि हम तैयार हों कि हर अपने दैनिक जीवन में और असाधारण परिस्थितियों में भी मसीह जैसा प्रेम दर्शाएँ—एक ऐसा प्रेम जो उनके लिए भी भलाई चाहता है जिन्होंने हमारे प्रति शत्रुता दिखाई हो—तो हम अपनी संस्कृति में कितना बड़ा बदलाव ला सकते हैं। यह निश्चित रूप से एक क्रान्तिकारी परिवर्तन होगा और इसमें कोई सन्देह नहीं है।

प्रेरितों 9:10-28

◊ पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: यहेजकेल 5–7; यूहन्ना 9:24-41

22 September : ऐहिक मालमत्ताजाओ, जाओ आप्तजनही सोडूनी

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22 September : ऐहिक मालमत्ताजाओ, जाओ आप्तजनही सोडूनी
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पूर्वीचे दिवस आठवा; त्यांमध्यें तुम्हांला प्रकाश मिळाल्यावर तुम्हीं दुःखाबरोबर फार धीराने झोंबी केलीं; कधी विटंबना व संकटे सोसल्याने तुमचा तमाशा झाला; तर कधी अशी दया झालेंल्यांचे तुम्हीं सहभागी झालात. कारण बंदिवानांबरोबर तुम्हीं समदुःखी झालात आणि [स्वर्गात]आपली स्वतःची अधिक चांगली मालमत्ता आपल्याजवळ आहे व ती टिकाऊ आहे, हे समजून तुम्हीं आपल्या मालमत्तेची हानी आनंदाने सोसली. म्हणून आपलें धैर्य सोडू नका, त्याचे प्रतिफळ मोठे आहे. (इब्री 10:32-35)

इब्री 10:32-35 मध्यें उल्लेख केलेंल्यां ख्रिस्ती बांधवांना आपल्याला मौल्यवान प्रीति काय आहे हे शिकवण्याचा पूर्ण अधिकार आहे.

परिस्थिती अशी दिसते : त्यांच्या विश्वासातील सुरुवातीच्या दिवसांत, त्यांच्यापैकीं काहींना त्यांच्या विश्वासामुळें तुरुंगात टाकण्यात आलें. तर काहींवर मोठा कठीण निर्णय घेण्याचा प्रसंग ओढवला : आपण भूमिगत होऊन “सुरक्षित” असावें, कीं आपण तुरुंगात असलेल्या आपल्या बंधू-भगिनींची भेट घेऊन आपला जीव व मालमत्ता धोक्यात घालावींत? त्यांनी प्रीतिचा मार्ग निवडला आणि त्यासाठीं त्यांना जी किंमत मोजावी लागणार होती ती त्यांनी मान्य केलीं.

“कारण बंदिवानांबरोबर तुम्हीं समदुःखी झालात…..आणि तुम्हीं आपल्या मालमत्तेची हानी आनंदाने सोसली.”

तरी त्यांना खरेच हानी झाली का? नाहीं. त्यांनी आपल्या मालमत्तेची हानी सोसली परंतु त्यांतून त्यांना आनंदच प्राप्त झाला! त्यांनी मालमत्तेची हानी आनंदाने सोसली.

एका अर्थाने, त्यांनी स्वतःचा नकार केला. त्यांचा तो नकार खरा आणि मौल्यवान होता. पण दुसऱ्या अर्थाने त्यांनी कसलीही हानी सोसली नव्हती. तर त्यांनी आनंदाचा मार्ग निवडला होता. म्हणजें ज्याप्रमाणें मासेदोनियातील मंडळ्यांना औदार्यपणाची प्रेरणा मिळाली आणि त्यांनी गोरगरीबांना आपल्या दारिद्य्रातही मदत पुरविली, त्याप्रमाणें ह्या ख्रिस्ती लोकांना देखील तुरुंगात असलेल्यांची सेवा करण्याची प्रेरणा मिळाली होती (2 करिंथ 8:1-9. देवामध्यें असलेला त्यांचा आनंद इतरांवरील प्रीति-प्रदर्शनाने ओसंडून वाहत होता.

त्यांनी आपल्या जीवनाकडें पाहिले आणि म्हटले, “परमेश्वराचे टिकाऊ वात्सल्य जीवनाहून उत्तम आहे” (स्तोत्र 63:3 पहा).

त्यांनी आपल्या सर्व मालमत्तेकडें पाहिले आणि म्हटले, “आमच्याकडें स्वतःची अधिक चांगली मालमत्ता आहे व ती यापैकीं कोणत्याही मालमत्तेपेक्षा टिकाऊ आहे” (इब्री 10:34 पहा).

मग त्यांनी एकमेकांकडें पाहिले आणि म्हटले, कदाचित मार्टिन ल्यूथरच्या या लोकप्रिय महान गीतासारखे काहींतरी गायले असेल :

ऐहिक मालमत्ता जाओ,

जाओ आप्तजनही सोडूनी

हे नश्वर जीवन देखील जाओ,

शरीराचा घात ते करतील

तरी देवाचे सत्य कायम राहती

त्याचे राज्य सार्वकालिक

21 सितम्बर : उत्पीड़न का आशीर्वाद

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21 सितम्बर : उत्पीड़न का आशीर्वाद
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“धन्य हो तुम जब मनुष्य के पुत्र के कारण लोग तुम से बैर करेंगे, और तुम्हें निकाल देंगे, और तुम्हारी निन्दा करेंगे, और तुम्हारा नाम बुरा जानकर काट देंगे। उस दिन आनन्दित होकर उछलना, क्योंकि देखो, तुम्हारे लिए स्वर्ग में बड़ा प्रतिफल है; उनके बाप–दादे भविष्यद्वक्‍ताओं के साथ भी वैसा ही किया करते थे।” लूका 6:22-23

यह एक ऐसी सच्चाई है, जो हममें से लगभग सभी को सहज रूप से स्पष्ट लगती है कि यह अत्यन्त महत्वपूर्ण है कि लोग हमें पसन्द करें। इसलिए यह बात हमें हैरान कर देती है जब हम यह सुनते हैं कि यीशु ने स्पष्ट रूप से यह सिखाया कि जब लोग “मनुष्य के पुत्र के कारण” हमें तिरस्कृत करें, बहिष्कृत करें, और अपमानित करें, तब हम धन्य हैं।

यह विरोध और निन्दा केवल इसलिए होती है क्योंकि हमारा सम्बन्ध यीशु मसीह से है। वास्तव में, यीशु ने यह स्पष्ट किया कि जो भी उसका अनुसरण करेगा, उसे यह संसार अस्वीकार करेगा। यह सत्य उसने अन्य स्थानों पर भी सिखाया है। उदाहरण के लिए, जब उसने अपने क्रूस पर चढ़ाए जाने से एक रात पहले अपने चेलों को याद दिलाया कि यदि संसार तुम से बैर रखता है, तो यह जान लो कि उसने तुमसे पहले मुझसे बैर रखा है, और यदि उन्होंने मेरे साथ ऐसा किया, तो वे तुम्हारे साथ भी ऐसा करेंगे (यूहन्ना 15:18-20)।

हो सकता है आपने खुद भी इस प्रकार के सताव का अनुभव किया हो—शायद स्कूल में आपने बाइबल का पक्ष लिया और फिर अचानक आप अपने दोस्तों से अलग कर दिए गए। या किसी दोस्त को यीशु के बारे में समझाने के कारण आपको उनके समूह से निकाल दिया गया, या कार्यस्थल पर पदोन्नति से वंचित कर दिया गया क्योंकि आपने मसीह की साक्षी दी कि वह कौन था, उसकी मृत्यु कैसे हुई, और इन सब के क्या मायने हैं। शायद आपके परिवार के ही किसी सदस्य ने आपके विश्वास के कारण आपको ठुकरा दिया। जब आप मसीह के लिए खड़े होते हैं, तो धीरे-धीरे लेकिन स्पष्ट रूप से लोगों की नाराजगी, नफरत और उपेक्षा सामने आने लगती है। यह आसान नहीं होता। अपमानित या अकेला महसूस करना कोई सुखद अनुभव नहीं है, विशेषकर जब आप परमेश्वर की आज्ञाकारिता में जी रहे हों। अस्वीकृति का दर्द वास्तविक होता है। तो ऐसे में हम कैसे आशीष और सान्त्वना पा सकते हैं?

हमें यीशु की कही हुई इस सच्चाई को थामे रहना है: जब संसार की नफ़रत हमारे प्रति केवल इस कारण प्रकट होती है कि हम “मनुष्य के पुत्र,” अर्थात यीशु मसीह के प्रति विश्वासयोग्य हैं—तो इसका अर्थ यह नहीं कि कुछ गलत हुआ है। बल्कि वहीं पर हमें पता चलता है कि आशीष क्या होती है। और यह इस बात का स्पष्ट प्रमाण है कि हमारा विश्वास वास्तविक है और हमारा प्रभु से जीवित सम्बन्ध है। इसके अतिरिक्त, यीशु ने यह भी प्रतिज्ञा की है कि यदि हम मनुष्यों के सामने उसका अंगीकार करेंगे, तो वह भी इसके विषय में अपने स्वर्गिक पिता के सामने हमारा अंगीकार करेगा। (मत्ती 10:32)

जो व्यक्ति पवित्र जीवन जीता है—जो साहस के साथ परमेश्वर के वचन को बोलता और मानता है और जो यह दिखाने का प्रयास नहीं करता कि वह एक साथ आज्ञाकारी और लोकप्रिय बना रह सकता है—वह एक दिन अनिवार्य रूप से इस संसार के पापपूर्ण मार्ग से टकराएगा और विरोध झेलेगा। अब प्रश्न यह है: क्या आप किसी को मसीह के बारे में बताने, या मसीह के लिए जीवन जीने के कारण अस्वीकृति का जोखिम उठाने को तैयार हैं? हतोत्साहित न हों! जब लोग आपके विरुद्ध झूठ बोलें, आपको नापसन्द करें, या तिरस्कार करें—केवल इस कारण कि आप सुसमाचार पर विश्वास रखते हैं—तो प्रसन्न हों, क्योंकि जैसा यीशु ने कहा: “देखो, तुम्हारे लिए स्वर्ग में बड़ा प्रतिफल है।” यह संसार जो कुछ भी देता है, वह उस प्रतिफल के सामने कुछ भी नहीं है।

दानिय्येल 3 पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: यहेजकेल 3–4; यूहन्ना 9:1-23 ◊

21 September : चिंते विरुद्ध लढण्यासाठीं शस्त्रसामग्री किंवा  दारूगोळा

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21 September : चिंते विरुद्ध लढण्यासाठीं शस्त्रसामग्री किंवा  दारूगोळा
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कशाविषयीही चिंताक्रांत होऊ नका, तर सर्व गोष्टींविषयी प्रार्थना व विनंती करून आभारप्रदर्शनासह आपली मागणी देवाला कळवा. (फिलिप्पै 4:6)

आपण आपल्या विनंत्या देवाला कळवतो तेव्हा आपण ज्या गोष्टींसाठीं आभारप्रदर्शन करतो त्यांपैकीं एक म्हणजें त्यानें आम्हांला दिलेंली त्याची अभिवचनें. ही अभिवचनें तोफेत वापरला जाणारा दारूगोळा आहेत जीं चिंतेला जन्म देणाऱ्या अविश्वासाला ध्वस्त करतांत. म्हणून, मी कसा युद्ध करतो ती नीति येथे आहे.

माझी सेवा निरुपयोगी आणि व्यर्थ आहे या विषयीं मी चिंताक्रांत होऊन जातो तेव्हां मी यशया 55:11 मध्यें असलेले अभिवचन घेऊन अविश्वासाशी लढतो. “त्याप्रमाणें माझ्या मुखातून निघणारे वचन होईल; ते माझी इच्छा पूर्ण केल्यावाचून व ज्या कार्यासाठीं मी ते पाठवले ते केल्यावाचून माझ्याकडें विफल होऊन परत येणार नाहीं.”

मी माझे कार्य करण्याच्या बाबतीत अशक्त आहे अशी मला चिंता वाटू लागते, तेव्हा मी ख्रिस्तानें दिलेंलें हे अभिवचन घेऊन अविश्वासाशी लढतो, “माझी कृपा तुला पुरेशी आहे; कारण अशक्तपणातच माझी शक्ती पूर्णतेस येते” (2 करिंथ 12:9).

मला भविष्याविषयी निर्णय घ्यायचे असतांत आणि मी त्यांविषयी चिंताग्रस्त असतो, तेव्हा मी हे अभिवचन घेऊन अविश्वासाशी लढतो, “मी तुला बोध करीन; ज्या मार्गाने तुला गेले पाहिजे त्याचे शिक्षण तुला देईन; मी आपली दृष्टी तुझ्यावर ठेवून तुला बुद्धिवाद सांगेन” (स्तोत्र 32:8).

जेव्हां मीं माझ्या विरोधकांना तोंड देण्याविषयीं चिंताक्रांत असतो, तेव्हा मी हे अभिवचन घेऊन अविश्वासाशी लढतो, “देव आपल्याला अनुकूल असल्यास आपल्याला प्रतिकूल कोण?” (रोमकरांस 8:31).

मी ज्यांच्यावर प्रीति करतो त्यांच्या कल्याणासाठीं मीं चिंताक्रांत असतो, तेव्हा मी हे अभिवचन घेऊन अविश्वासाशी लढतो कीं, मीं वाईट असताना आपल्या मुलाबाळांना चांगल्या देणग्या देणें मला समजते, “तर तुमच्या स्वर्गातील पित्याजवळ जे मागतांत त्यांना तो किती विशेषेकरून चांगल्या देणग्या देईल!” (मत्तय 7:11).

आणि मी माझे आध्यात्मिक जीवन स्थिर राखण्यासाठीं स्वतःला हे अभिवचन स्मरण देऊन लढतो कीं ज्याने ज्याने ख्रिस्ताकरितां आपलें घर किंवा भाऊ किंवा बहिणी किंवा आई किंवा वडील किंवा मुले किंवा शेती सोडली आहे, “अशा प्रत्येकाला सांप्रतकाळी छळणुकींबरोबर शंभरपटीने घरे, भाऊ, बहिणी, आया, मुले, शेते आणि येणार्‍या युगात सार्वकालिक जीवन मिळाल्याशिवाय राहणार नाहीं” (मार्क 10:29-30).

जेव्हा मी आजारी असण्याविषयीं चिंताक्रांत होतो, तेव्हा मी हे अभिवचन घेऊन अविश्वासाशी लढतो, “नीतिमानाला फार कष्ट होतांत, तरी परमेश्वर त्या सर्वांतून त्याला सोडवतो” (स्तोत्र 34:19).

आणि मी थरथर कापत हे अभिवचन स्मरण करतो : “कीं, संकटाने धीर, धीराने शील व शीलाने आशा निर्माण होते; आणि ‘आशा लाजवत नाहीं;’ कारण आपल्याला दिलेंल्या पवित्र आत्म्याच्या द्वारे आपल्या अंतःकरणात देवाच्या प्रीतिचा वर्षाव झाला आहे” (रोमकरांस 5:3-5).

20 सितम्बर : स्वीकार करना कि हम दीन हैं

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“तब उसने अपने चेलों की ओर देखकर कहा, ‘धन्य हो तुम जो दीन हो, क्योंकि परमेश्‍वर का राज्य तुम्हारा है।’” लूका 6:20

यीशु उस वस्तु को महत्त्व देता है जिसे संसार तुच्छ समझता है, और जिसे संसार सराहता है, उसे यीशु अस्वीकार करता है।

यही है धन्य-वचनों की सबसे बड़ी चुनौती, और विशेष रूप से तब जब यीशु धन-सम्पत्ति के विषय में सिखाता है। हम एक ऐसे संसार में जीते हैं जो हमें लगातार यह कहता है कि हम अपनी पहचान विशेष रूप से वित्तीय सफलता और भौतिक सुख-सुविधाओं में खोजें। आराम और सुविधा इस उपभोक्तावादी संस्कृति का राजा है—और यह संस्कृति वह जल है, जिसमें हम सब तैर रहे हैं।

इसलिए यीशु के इस उपदेश के आरम्भिक शब्द हमें चुनौती देते हैं: “धन्य हो तुम जो दीन हो।” वह क्या कहना चाह रहा है? क्या वह सिखा रहा है कि दीन-दरिद्रता उद्धार की कुंजी है? बिल्कुल नहीं! बल्कि वह यह समझा रहा है कि जो व्यक्ति अपनी आत्मिक दरिद्रता को पहचान लेता है, वही परमेश्वर के राज्य में प्रवेश करता है।

कुछ लोग दावा करते हैं कि यीशु का अर्थ यह है कि यदि आप दरिद्र हैं, तो आपको अत्यन्त प्रसन्न होना चाहिए क्योंकि आप स्वर्ग के राज्य में स्वाभाविक रूप से ही प्रवेश कर जाते हैं। लेकिन इस प्रकार की दरिद्रता परमेश्वर के राज्य में प्रवेश की कुंजी नहीं है और न ही धन-सम्पत्ति किसी के बाहर रह जाने का मुख्य कारण है। वास्तविकता तो यह है कि दरिद्र और धनवान—दोनों को ही जब यह अहसास होता है कि उन्हें उनके पापों के लिए क्षमा की आवश्यकता है और जब वे यीशु मसीह पर विश्वास करते हैं, तभी वे परमेश्वर के राज्य में प्रवेश पाते हैं। यदि ऐसा न होता, तो फिलिप्पी में रहने वाली एक समृद्ध व्यापारी स्त्री लुदिया कभी सुसमाचार की सच्चाई को न समझ पाती (प्रेरितों 16:11-15)। नहीं, आवश्यक यह है कि हम मसीह के बिना अपनी आत्मिक दरिद्रता को पहचानें।

हालाँकि यह समझना भी आवश्यक है कि वित्तीय दरिद्रता आत्मिक आशीष का माध्यम बन सकती है। दरिद्रता अक्सर मनुष्यों को परमेश्वर पर सम्पूर्ण निर्भरता की ओर ले जाती है—न केवल भौतिक आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए, बल्कि आत्मिक आशिषों के लिए भी। यही कारण है कि दरिद्र वर्ग में सुसमाचार को लेकर अधिक सकारात्मक और विनम्र प्रतिक्रिया देखने को मिलती है, जबकि भौतिक समृद्धि हमारी गहरी आत्मिक आवश्यकता को, अर्थात् परमेश्वर के राज्य में प्रवेश पाने की आवश्यकता को ढँक सकती है। धन अक्सर गर्व के पनपने की भूमि बन जाता है, जहाँ हृदय यह भूल जाता है कि चाहे धनवान हो या दरिद्र, “वह घास के फूल की तरह जाता रहेगा” (याकूब 1:10)।

जैसा कि जॉन कैल्विन ने कहा: “वही व्यक्ति आत्मा में दरिद्र होता है, जो अपने आप को पूरी तरह शून्य समझता है और केवल परमेश्वर की दया पर निर्भर रहता है।” दरिद्रता के साथ कठिनाइयाँ आती हैं, लेकिन क्या आपने कभी यह सोचा है कि धन के साथ भी परीक्षाएँ आती है—जैसे कि अहंकार, आत्मनिर्भरता और आत्मिक सुस्ती की परीक्षा?

तो क्या हम अपनी आत्मिक दरिद्रता को स्वीकार करने के लिए तैयार हैं? या क्या हम अपनी सांसारिक समृद्धि में पूर्णतः आत्म-निर्भर और आत्म-सन्तुष्ट हो गए हैं? इन प्रश्नों का सच्चा उत्तर जानने का एक तरीका यह है: क्या आपका हृदय नीतिवचन में आगूर की इस प्रार्थना को दोहरा सकता है—“मुझे न तो निर्धन कर और न धनी बना” (नीतिवचन 30:8)?

लूका 6:20-36

◊ पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: यहेजकेल 1–2; यूहन्ना 8:30-59

20 September : खरेखुरे सौख्यवादी नाहीं

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20 September : खरेखुरे सौख्यवादी नाहीं
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“पृथ्वीवर आपल्यासाठीं संपत्ती साठवू नका; तेथे कसर व जंग खाऊन नाश करतांत आणि चोर घर फोडून चोरी करतांत; तर स्वर्गात आपल्यासाठीं संपत्ती साठवा; तेथे कसर व जंग खाऊन नाश करत नाहींत व चोर घरफोडी करत नाहींत व चोरीही करत नाहींत.” (मत्तय 6:19-20)

देशाच्या राष्ट्रीय बँकांतून मोठ्याने ओरडून सांगणें आवश्यक असलेला संदेश हा आहे: जगिक मनुष्या, तू खराखुरा सौख्यवादी नाहींस!

ज्यां वाढत्या महागाईचे भक्ष बनतांत आणि ज्यांना मृत्यूचा जंग लागतो अशा किरकोळ आनंद देणाऱ्या गोष्टींत समाधानी राहणें सोडा. गुंतवणूक करायची असेल तर ती उच्च-उत्पन्न देणाऱ्या स्वर्गातील दैवी विम्यात करा जिथें तुमचे धन पूर्णपणें सुरक्षित राहते.

भौतिक सुखसोयी आणि सुरक्षितता आणि रोमांचक आनंद अशा नश्वर गोष्टींसाठीं आपलें आयुष्य घालवणें म्हणजें पैसे उंदराच्या छिद्रांत टाकण्यासारखे आहे. परंतु प्रीतिचे जे श्रम त्यांत जर आपण आपलें आयुष्य गुंतवतो तर शेवटी अतुल्य आणि सार्वकालिक अश्या मोठ्या आनंदाचा लाभांश मिळतो:

“जे तुमचे आहे ते विकून दानधर्म करा; तसेच स्वर्गातील अक्षय धनाच्या जीर्ण न होणार्‍या थैल्या आपणांसाठीं करून ठेवा; तेथे चोर येत नाहीं व कसर लागत नाहीं” (लूक 12:33).

हा उपदेश उत्तम गोष्टींची बातमी आहे : ख्रिस्ताकडें या, ज्याच्या सान्निध्यात पूर्णानंद आणि सौख्ये सदोदित आहेत. खरे ख्रिस्ती सौख्यवादी बनण्यासाठीं श्रम घ्या. कारण परमेश्वर बोलला आहे: ऐशोआरामात जगण्यापेक्षा प्रीति करणें अधिक धन्य आहे! सांप्रतकाळी अति धन्य आणि येणाऱ्या युगात सर्वकाळासाठीं धन्य.