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2 December : मरीयेचा प्रतापी परमेश्वर

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2 December : मरीयेचा प्रतापी परमेश्वर
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“माझा जीव प्रभूला’ थोर मानतो, आणि ‘देव जो माझा तारणारा’ त्याच्यामुळें माझा आत्मा ‘उल्लासला आहे.’ कारण ‘त्यानें’ आपल्या ‘दासीच्या दैन्यावस्थेचे अवलोकन केलें आहे.’ पाहा, आतापासून सर्व पिढ्या मला धन्य म्हणतील! कारण जो समर्थ आहे, त्यानें माझ्याकरता महत्कृत्ये केली आहेत; आणि ‘त्याचे नाव पवित्र आहे.’ आणि जे ‘त्याचे भय धरतात, त्यांच्यावर त्याची दया पिढ्यानपिढ्या आहे.’ त्यानें आपल्या ‘बाहूने’ पराक्रम केला आहे; जे आपल्या अंतःकरणाच्या कल्पनेने ‘गर्विष्ठ आहेत त्यांची त्यानें दाणादाण केली आहे.’ ‘त्यानें अधिपतींना’ राजासनांवरून ‘ओढून काढले आहे’ व ‘दीनांस उंच केलें आहे.’ ‘त्यानें भुकेलेंल्यांस उत्तम पदार्थांनी तृप्त केलें आहे,’ व ‘धनवानांस रिकामे लावून दिलें आहे.’ ‘आपल्या पूर्वजांस’ त्यानें सांगितले ‘त्याप्रमाणें अब्राहाम’ व त्याचे ‘संतान ह्यांच्यावरील दया’ सर्वकाळ स्मरून त्यानें आपला सेवक इस्राएल ह्याला साहाय्य केलें आहे.” (लूक 1:46-55)

मरीया देवाविषयी स्पष्टपणें एक अतिशय उल्लेखनीय गोष्ट पाहते: तो संपूर्ण मानव इतिहासाचा क्रम बदलणार आहे; इतिहासातील अत्यंत महत्वाची तीन दशके सुरू होणार आहेत.

आणि देव कोठे आहे? तो आपलें सर्व लक्ष अप्रसिद्ध व दीन अशा दोन स्त्रियांवर केंद्रित करतो – एक म्हातारी आणि वांझ (अलीशिबा), एक तरुण आणि कुमारीका (मरीया). आणि मरीया देवाच्या या दृष्टांताने, जो दीनांवर प्रीति करणारा आहे, इतकीं भारावून जाते कीं तिच्या अंतःकरणातून गीत उचंबळून येते – असे गीत ज्यास “मरीयेचे स्तोत्र” म्हटलें जाते.

मरीया आणि अलीशिबा लूकाच्या वृत्तांतातील दोन महान नायिका आहेत. त्याला या दोन स्त्रियांचा विश्वास आवडतो. असें दिसून येतें कीं त्यां दोघींच्या बाबतीत ज्यां गोष्टीचा त्याच्यावर जास्त प्रभाव पडला, आणि जी गोष्ट तो त्याच्या शुभवर्तमानाचा कुलीन वाचक थियोफिलस याच्या मनावर ठसवू इच्छितो ती गोष्ट आहे अलीशिबा आणि मरीया ज्या त्यांच्या प्रतापी देवाला समर्पित होतात त्याबाबतीत त्यांचा दीनपणा आणि हर्षयुक्त नम्रपणा.

अलीशिबानें म्हटलें, (लूक 1:43) माझ्या प्रभूच्या मातेने माझ्याकडें यावे हा मान मला कोठून? आणि मरीयेनें म्हटलें (लूक 1:48) “त्यानें’ आपल्या ‘दासीच्या दैन्यावस्थेचे अवलोकन केलें आहे”

ज्यांचा जीव खरोखर प्रभूला थोर मानतो असें एकमेव लोक अलीशिबा आणि मरीयेसारखे लोक आहेत – जे लोक त्यांची दीन दशा कबूल करतात आणि प्रतापी देवाच्या नम्रतेने भारावून जातात.

1 दिसम्बर : आदि में वचन था

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1 दिसम्बर : आदि में वचन था
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“आदि में वचन था, और वचन परमेश्‍वर के साथ था, और वचन परमेश्‍वर था। यही आदि में परमेश्‍वर के साथ था।” यूहन्ना 1:1-2

हमारे मन में यीशु मसीह की जो तस्वीरें बनी हुई हैं, वे बाइबल की थियोलॉजी के बजाय कलात्मक कल्पनाओं पर आधारित हैं। बाइबल में मसीह का शारीरिक वर्णन नहीं मिलता, सिवाय इसके कि वह “डील–डौल में . . . बढ़ता गया” (लूका 2:52)। इसलिए यह हमारे लिए अत्यन्त अनुपयोगी है कि हम उसकी कल्पना सुनहरे बालों और चमकीली नीली आँखों वाले व्यक्ति के रूप में करें, जैसा कि पश्चिमी संस्कृति में प्रचलित है। इस प्रकार की कल्पना न केवल यह भूल जाती है कि यीशु एक मध्य-पूर्वी यहूदी था, बल्कि यह हमें यूहन्ना के सुसमाचार में जिस अद्‌भुत रीति से यीशु का परिचय दिया गया है, उसे समझने और उसका आनन्द लेने से भी वंचित कर देती है।

यूहन्ना अपने सुसमाचार के पहले ही पद से मसीह की शाश्वतता, व्यक्तित्व और दिव्यता को प्रकट करता है। हम समय के आरम्भ को जितना भी पीछे लेकर जाएँ, या समय की उत्पत्ति के बारे में हमारे मन में जो भी विचार हो, वहाँ हम परमेश्वर के पुत्र को उसके देहधारण के पहले के रूप में पाएँगे। उसे सृजा नहीं गया था, क्योंकि वह स्वयं सृष्टिकर्ता है। चरनी में पड़ा शिशु वही था जिसने आकाश में तारों को रखा था—यहाँ तक कि वही तारा भी, जिसने पूरब से ज्योतिषियों को उसकी आराधना करने के लिए मार्ग दिखाया था।

अपनी शाश्वतता में यह वचन, अर्थात यीशु, पिता और पवित्र आत्मा से भिन्न है, भिन्न व्यक्ति है लेकिन सार-तत्व में नहीं। वह “परमेश्वर के साथ था,” फिर भी वह “परमेश्वर था।” यह भले ही रहस्यमयी लगे, लेकिन यूहन्ना किसी अमूर्त विचार की बात नहीं कर रहा था; वह उस व्यक्ति का वर्णन कर रहा था, जिससे वह मिला था, जिसे उसने स्वयं देखा, सुना और छूआ था। मंच अब तैयार है, ताकि प्रेरित यूहन्ना के साथ पाठक भी कह सकें, “यह जीवन प्रगट हुआ, और हमने उसे देखा” (1 यूहन्ना 1:2), क्योंकि यही जीवित परमेश्वर के वचन का सामर्थ्य है।

जब यूहन्ना इस सच्चाई को दृढ़ता से स्थापित करता है कि मसीह न केवल परमेश्वर के साथ था, बल्कि वह स्वयं परमेश्वर था, तो वह चाहता है कि हम उसके पूरे सुसमाचार को यीशु की दिव्यता को ध्यान में रखकर पढ़ें। जब हम हर पन्ना पलटें, यीशु के वचन पढ़ें और उसके कार्यों को देखें, तो हमें यह समझना चाहिए कि ये स्वयं परमेश्वर के वचन और कार्य हैं।

यदि यीशु मात्र एक भला मनुष्य था, तो यूहन्ना के सुसमाचार में जो कुछ भी लिखा है, वह वास्तव में ईश-निन्दा है। परन्तु वह केवल मनुष्य नहीं था। वह सम्पूर्ण सृष्टि के परमेश्वर के साथ एक था, है, और सदा रहेगा। हमें यूहन्ना के आरम्भिक पदों को समझने की आवश्यकता है, ताकि हम यीशु को सही रूप में जान सकें और हम ब्रूस मिल्ने के शब्दों में कह सकें: “हम उसकी आराधना बिना रुके करें, उसकी आज्ञा बिना झिझक मानें, उससे बिना किसी शर्त के प्रेम करें, और उसकी सेवा बिना रुके करते रहें।”[1]

यदि आज आपको प्रभु की आराधना करने, उसकी आज्ञा मानने, उससे प्रेम करने या उसकी सेवा करने में कठिनाई हो रही है, तो उत्तर यही है: उसकी ओर देखें। क्योंकि जितना अधिक हम यह समझेंगे कि चरनी में पड़ा वचन वही था जो आदि से परमेश्वर के साथ था और परमेश्वर था, उतना ही सहज रूप से हमारे मसीही कर्तव्य आनन्द में बदलते जाएँगे।

यूहन्ना 1:1-18

◊ पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: 2 इतिहास 25–27; लूका 9:37- 62


[1] द मैसेज ऑफ जॉन, द बाइबल स्पीक्स टूडे (आई.वी.पी. अकैडेमिक, 2020), पृ. 21.

1 December: मार्ग तयार करा

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1 December: मार्ग तयार करा
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“तो इस्राएलाच्या संतानांतील अनेकांना त्यांचा देव प्रभू ह्याच्याकडें वळवील. बापाची अंतःकरणें मुलांकडें’, व आज्ञाभंजक लोकांना नीतिमान जनांच्या ज्ञानाकडें वळवून प्रभूसाठीं सिद्ध प्रजा तयार करावी म्हणून तो एलीयाच्या आत्म्याने व सामर्थ्याने त्याच्यापुढे चालेल.”  (लूक 1:16-17)

बापतिस्मा करणाऱ्या योहानाने इस्राएलसाठीं जे केलें ते नाताळाचा आगमनोत्सव आमच्यासाठीं करू शकते. तुम्हीं नाताळासाठीं तयार नाहीं असे दिसता कामा नये. माझ्या म्हणण्याचा अर्थ आध्यात्मिक तयारी न केलेंलें. जर तुम्हीं तयार राहता तर नाताळाचा आनंद आणि परिणाम कितीतरी मोठा असेल!  

यासाठीं कीं तुम्हीं तयार असावें…

पहिले, तुम्हांला तारणाऱ्याची गरज आहे या सत्यावर विचार करा. नाताळ हा आनंदाचा विषय होण्यापूर्वी तो एक लेखी आरोपपत्र आहे, म्हणजें, “तुमच्यासाठीं आज दाविदाच्या गावात तारणारा जन्मला आहे, तो ख्रिस्त प्रभू आहे” (लूक 2:11). जर तुम्हांला तारणाऱ्याची गरज नसेल, तर तुम्हांला नाताळाचीहि गरज नाहीं. जोवर तुम्हांला तारणाऱ्याची नितांत गरज भासत नाहीं तोवर नाताळाचा मूळ उद्देश सार्थक होणार नाहीं. नाताळाच्या आगमनोत्सवासमयीची ही जी कांही संक्षिप्त चिंतने आहेंत ती तुमच्यात तारणाऱ्याच्या गरजेचा कडू-गोड अनुभव जागे करण्यासाठीं आहेत.

दुसरे, गांभीर्याने आपलें आत्म-परीक्षण करा. ख्रिस्ताचे प्रथम आगमन नाताळसाठीं अगदी तसेच आहे जसा चाळीस दिवसाचा उपवासाचा काळ ईस्टरसाठीं असतो. “हे देवा, माझी झडती घेऊन माझे हृदय जाण; मला कसोटीस लावून माझे मनोगत जाण. माझ्या ठायीं दुष्टपणाकडें काही प्रवृत्ती असेल तर पाहा; आणि मला सनातन मार्गाने चालव” (स्तोत्र 139:23-24). प्रत्येक अंतःकरण त्याच्यासाठीं जागा तयार करो… घर स्वच्छ करण्याद्वारे.

तिसरे, तुमच्या घरात देव-केंद्रित अपेक्षा आणि उत्कंठा आणि उत्तेजन यांनी युक्त वातावरण तयार करा – विशेषतः लहान लेकरांसाठीं. जर तुम्हीं ख्रिस्ताविषयी उत्साहित असाल, तर ते सुद्धा असतील. जर तुम्हीं नाताळाचा उत्सव केवळ भौतिक गोष्टींनी उत्साहपूर्ण बनवित असाल, तर लेकरांच्या मनात देवासाठीं तहान कशी निर्माण होईल? तुमच्या कल्पना घेऊन लेकरांसाठीं राजाच्या आगमनाच्या चमत्काराचे प्रात्यक्षिक तयार करा.

चौथे, पवित्र शास्त्र-मननांत अधिक वेळ घालवा, आणि मोठमोठे शास्त्र-पाठ मुखपाठ करा! “परमेश्वर म्हणतो, माझे वचन अग्नीसारखे, खडकाला फोडून तुकडें-तुकडें करणाऱ्या हातोड्यासारखे नव्हे काय?” (यिर्मया 23:29)! या ख्रिस्तागमनाच्या हंगामांत अग्नीभोवती एकत्र व्हा. हा अग्नी उबदार आहे. तो कृपेच्या रंगानी चकाकत आहे. तो हजार दुखापतींसाठीं आरोग्य आहे. तो अंधाऱ्या  रात्रींसाठीं प्रकाश आहे.

30 नवम्बर : परमेश्वर हमारी पुकार सुनता है

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30 नवम्बर : परमेश्वर हमारी पुकार सुनता है
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“इस्राएली कठिन सेवा के कारण लम्बी-लम्बी साँस लेकर आहें भरने लगे, और पुकार उठे … परमेश्‍वर ने उनका कराहना सुनकर अपनी वाचा को … स्मरण किया।निर्गमन 2:23-24

भोजन की प्रतिज्ञा ने याकूब और उसके परिवार को अपने अकालग्रस्त देश को छोड़ने और मिस्र जाकर यूसुफ के साथ बसने के लिए प्रेरित किया। कुछ समय तक सब कुछ बहुत अच्छा था। लेकिन परिस्थितियाँ तब बिगड़ने लगीं जब मिस्र में एक नया राजा सत्ता में आया। उसे इस्राएलियों की बढ़ती संख्या और प्रभाव अच्छा नहीं लगा, इसलिए उसने उन्हें कठोर दासता में झोंक दिया। उनका जीवन आँसुओं और कड़वाहट से भर गया।

परमेश्वर की प्रजा के पास अब भी उसकी प्रतिज्ञाएँ थी, लेकिन वे प्रतिज्ञाएँ अब खोखली सी लगने लगी थीं। जब वे स्वतन्त्र थे और भरपेट खाते थे, तब परमेश्वर पर भरोसा करना आसान था। लेकिन जब वे गुलामी में थे, तब यह भरोसा बहुत कठिन हो गया। वर्षों की लम्बी पीड़ा में कुछ लोगों ने अवश्य सोचा होगा: मुझे लगता है परमेश्वर अपनी प्रतिज्ञाओं को भूल गया है। मुझे अब बिल्कुल भरोसा नहीं कि वह सचमुच वही करेगा जो उसने कहा था। फिर भी, इसके बावजूद, उन्होंने परमेश्वर को पुकारा और छुटकारे की तीव्र पुकार लगाई।

परमेश्वर ने उन्हें नहीं भुलाया था—और उसका उत्तर आया। परमेश्वर ने उनकी आहें सुनीं; उसने उनकी कराह को सुना और प्रतिक्रिया में उसने छुटकारे की एक योजना आरम्भ की। परमेश्वर उन्हें उनके दुख में छोड़ने वाला नहीं था। वह उन्हें दासता से छुड़ाने के लिए अपनी योजना को पूरा करने जा रहा था। उसने “अपनी वाचा को स्मरण किया”—इसका यह अर्थ नहीं कि वह अब्राहम से की गई प्रतिज्ञा को भूल गया था, बल्कि यह कि अब, एकदम सही समय पर (हालाँकि शायद उस समय नहीं जब उसकी प्रजा चाहती थी), उसने अपने लोगों से की गई वाचा को पूरा करने की दिशा में कार्य किया।

यही वह सच्चाई है जो आज परमेश्वर की प्रजा को याद दिलाए जाने की आवश्यकता है, ठीक वैसे ही जैसे तब थी: परमेश्वर हमारी कराह को सुनता है, वह हमारे हालात को जानता है, और वह कार्य करेगा। उसकी एक भी प्रतिज्ञा असफल नहीं होगी। वास्तव में, जब हमारे दुखों में हमारे शब्द समाप्त हो जाते हैं, तब हम यह पाते हैं कि पवित्र आत्मा स्वयं हमारे लिए कराहते हुए प्रार्थना करता है (रोमियों 8:26-27)। यही है परमेश्वर की हमारे लिए चिन्ता की गहराई और उसके अपने लोगों के लिए अनन्त भलाई करने की प्रतिबद्धता।

जब आपकी आत्मा की पुकारें अनसुनी लगने लगें—जब आप सोचने लगें कि क्या कोई सच में परवाह करता है—तो याद करें कि परमेश्वर ने स्वयं को मिस्र में और सर्वोत्तम रूप से अपने पुत्र में कैसे प्रकट किया है:

मैं क्यों उदास हो जाऊँ,

क्यों अंधेरे मुझे घेरें,

क्यों मेरा हृदय अकेला हो

और स्वर्ग व घर की लालसा करे,

जब यीशु ही मेरा भाग है?

वह मेरा सदा का मित्र है।

उसकी दृष्टि गौरैया पर है,

और मैं जानता हूँ—वह मुझ पर भी दृष्टि रखता है।[1]

छुटकारे के लिए पुकारते रहें। परमेश्वर सुनता है, परवाह करता है, और आपके लिए कार्य करता है।

  मरकुस 5:21-43

पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: 2 इतिहास 23–24; लूका 9:18-36 ◊


[1] सिविल्ला डी. मार्टिन, “हिज़ आई इज़ ऑन द स्पैरो” (1905)

30 November : वधस्तंभाची विजयी लज्जा

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30 November : वधस्तंभाची विजयी लज्जा
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आणि जसा प्रमुख याजक प्रतिवर्षी स्वतःचे नसलेंलें रक्त घेऊन परमपवित्रस्थानात जातो, तसे त्याला वारंवार स्वतःचे अर्पण करायचे नव्हते; तसे असते तर जगाच्या स्थापनेंपासून त्याला वारंवार दुःख सोसावे लागलें असते; पण आता तो एकदाच युगाच्या समाप्तीस आत्मयज्ञ करून पापे नाहींशी करण्यासाठीं प्रकट झाला आहे. (इब्री 9:25-26)

आपण हे गृहीत धरता कामा नये कीं स्वर्गात पापी लोकांचा मोठ्या स्वगोस्तवाने प्रवेश होत असावा.

देव पवित्र आणि शुद्ध आणि पूर्णपणें न्यायप्रिय आणि नीतिमान असा आहे. तरीही संपूर्ण बायबलची गोष्ट अशी आहे कीं असा पवित्र आणि थोर परमेश्वर तुमच्यां आणि माझ्यासारख्या घाणेंरड्या आणि अमंगळ लोकांचे त्याच्या कृपेत कसे स्वागत करू शकतो. हे कसे शक्य आहे?

इब्री 9:25 म्हणते कीं पापासाठीं ख्रिस्ताचा आत्मयज्ञ यहूदी महायाजकांच्या बलिदानांसारखा नव्हता. ते दरवर्षी लोकांच्या पापांसाठीं प्रायश्चित करण्याकरिता पशूंचे अर्पण घेऊन पवित्र स्थानी जात असत. पण ही वचनें म्हणतात कीं ख्रिस्तानें “वारंवार दुःख सोसण्यासाठीं” स्वर्गात प्रवेश केला नाहीं… “तसे असते तर जगाच्या स्थापनेंपासून त्याला वारंवार दुःख सोसावे लागलें असते” (इब्री 9:26).

जर ख्रिस्तानें याजकांच्या नमून्याचे अनुसरण केलें असते, तर त्याला दरवर्षी मरावे लागलें असते. आणि जी पापे झाकावयाची होती त्यात आदाम आणि हव्वेच्या पापांचा समावेश होता, म्हणून त्याला त्याच्या वार्षिक मरणाचा आरंभ जगाच्या उत्पत्तिच्या सुरूवातीलाच करावा लागला असता. परंतु लेखकाच्या दृष्टिने हे अशक्य आहे.

हे अशक्य का आहे? कारण त्यामुळें परमेश्वराच्या पुत्राचे मरण दुर्बळ आणि निष्प्रभ दिसलें असते. जर अनेंक शतके वर्षानुवर्षे त्याला वारंवार स्वतःचे अर्पण करावे लागले असते, तर विजय कोठे असता? आपण परमेश्वराच्या पुत्राच्या आत्मयज्ञाचे अमर्याद मूल्य कोठे पाहिलें असते? ते वार्षिक क्लेशात आणि मृत्यूच्या लज्जेत अदृश्य झालें असते. 

वधस्तंभाठायीं लज्जा होती, पण ती विजयी लज्जा होती. “(येशूनें) लज्जा तुच्छ मानून वधस्तंभ सहन केला, आणि तो देवाच्या राजासनाच्या उजवीकडे बसला आहे.” (इब्री 12:2)

ही ख्रिस्त, जो देवाचे प्रतिरूप आहे, त्याच्या गौरवाची सुवार्ता आहे (2 करिंथ 4:4). माझी प्रार्थना आहे कीं तुम्हीं पापानें कितीही घाणेंरडे किंवा अपवित्र का असेनात, त्यां तुम्हांला या गौरवाचा प्रकाश पाहता यावा आणि तुम्हीं ख्रिस्तावर विश्वास ठेवावा.

29 नवम्बर : एकता में आराधना

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29 नवम्बर : एकता में आराधना
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“हे भाइयो, मैं तुम से हमारे प्रभु यीशु मसीह के नाम से विनती करता हूँ कि तुम सब एक ही बात कहो, और तुम में फूट न हो, परन्तु एक ही मन और एक ही मत होकर मिले रहो।” 1 कुरिन्थियों 1:10

सुसमाचार में एकता रखने वाली कलीसिया एक स्वस्थ कलीसिया होती है। और विभाजन से बढ़कर और कुछ नहीं है जो कलीसिया को इतनी तेजी से नष्ट करता है।

परमेश्वर की प्रजा के साथ हमेशा से ऐसा ही होता रहा है। जब-जब वे एकता में रहे हैं, उन्होंने अपना सर्वोत्तम समय देखा है। उदाहरण के लिए, जब इस्राएली लोग बेबीलोन की बँधुआई से लौटे, तो नहेम्याह 8 में लिखा है कि वे “एक मन होकर” एकत्र हुए ताकि याजक एज्रा द्वारा व्यवस्था की पुस्तक का सार्वजनिक पाठ सुन सकें (नहेम्याह 8:1)। उस समय लगभग 5,000 पुरुष और स्त्रियाँ जल फाटक के सामने के चौक में एकता और आपसी समर्पण की भावना से इकट्ठा हुए थे। उनका ध्यान केवल इस पर नहीं था कि “मुझे इस उपदेश से क्या मिल रहा है,” बल्कि इस पर भी था कि “मैं अपने साथियों के लिए क्या ला रहा हूँ, जो मेरे साथ आराधना करने आए हैं।”

परमेश्वर की प्रजा को आराधना में इसी भावना से आना चाहिए यदि हमें अपने बीच सच्ची एकता चाहिए।

जब हम वास्तव में मसीह के साथ चल रहे होते हैं, तो हम उन लोगों के साथ सामूहिक आराधना करने की लालसा रखते हैं जो मसीह से प्रेम करते हैं। हालाँकि हमारी प्रेरणा कभी-कभी क्षीण हो सकती है, फिर भी पवित्र आत्मा की सहायता से हम भजनकार की आराधना की भावना को अपना कर कह सकते हैं: “जब लोगों ने मुझ से कहा, ‘आओ, हम यहोवा के भवन को चलें,’ तब मैं आनन्दित हुआ!” (भजन 122:1)। सामूहिक कलीसिया की आराधना केवल एक कार्यक्रम नहीं है, जिसमें हम भाग लें या उसे बर्दाश्त करें; यह हमारे राजा के प्रति हमारी साझी निष्ठा की घोषणा है और परमेश्वर की प्रजा द्वारा प्राप्त गहन एकता की सामर्थी याद दिलाती है।

हमारी कलीसियाओं में हम हमेशा एकमत नहीं होते और नहीं होंगे—हमारी अपनी व्यक्तिगत पसन्द-नापसन्द और मान्यताएँ होती हैं। लेकिन परमेश्वर के परिवार में सदस्यता का मूल किसी बात पर स्पष्ट एकता में होना चाहिए—जैसे बाइबल की अधिकारिता, यीशु की केन्द्रीयता और प्रधानता, सुसमाचार प्रचार की अनिवार्यता, और प्रार्थना व आराधना की अपने दैनिक जीवन में प्राथमिकता। यही साझे विश्वास परमेश्वर की प्रजा को एकता में एकत्र होने की शक्ति देते हैं।

इसलिए, यद्यपि मंच से हास्य, सुन्दर संगीत, और परिवारों के लिए अर्थपूर्ण कार्यक्रम प्रभु की ओर से उपहार हो सकते हैं, तौभी वे हमारी प्राथमिकता नहीं होनी चाहिए। इसके बजाय, हमें एकता में मिलकर आराधना करने की इच्छा रखते हुए अपने सह-विश्वासियों के लिए प्रार्थना में लगे रहना चाहिए, यह मांगते हुए कि परमेश्वर के वचन के सत्य को सुनने की हमारी स्वयं की इच्छा आत्मिक जागृति का कारण बने। क्योंकि जब कोई मण्डली प्रार्थनापूर्वक अपेक्षा करती है, तो परमेश्वर निश्चय ही वही करेगा जो उसने अपने वचन के माध्यम से करने का प्रतिज्ञा की है।

कलीसिया के प्रति “पहले मैं” वाला दृष्टिकोण रखना और तुरन्त आलोचना करना बहुत आसान होता है—आसान, लेकिन घातक होता है। अगले रविवार को सुनिश्चित करें कि आप वहाँ केवल अपने लिए नहीं बल्कि दूसरों के लिए भी हों। आप अपने गीतों और वचनों में ऐसी भावना रखें जो साझी एकता को बनाए और मजबूत करे।

नहेम्याह 8:1-12

◊ पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: 2 इतिहास 21–22; लूका 9:1-17

29 November : सदसद्विवेकबुद्धी शुद्ध करणारा एकमेव महायाजक

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29 November : सदसद्विवेकबुद्धी शुद्ध करणारा एकमेव महायाजक
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तर सार्वकालिक आत्म्याच्या योगे ज्यानें निष्कलंक अशा स्वतःस देवाला अर्पण केलें, त्या ख्रिस्ताचे रक्त आपली सदसद्विवेकबुद्धी जिवंत देवाच्या सेवेसाठीं निर्जीव कृत्यांपासून किती विशेषेकरून शुद्ध करील? (इब्री 9:14)

आपण आधुनिक युगात आहों – इंटरनेंटचे, स्मार्ट फोन्सचे, अंतराळयात्रेचे आणि हृदय प्रत्यारोपणाचे युग – आणि आमची अग्रगण्य अडचण आजही नेंहमीसारखीच आहे : आमची सदसदविवेकबुद्धी आम्हास दोष लावते आणि आम्हीं परमेश्वरासाठीं धिक्कारलेले आहों याची सतत जाणीव करून देते. आम्हीं परमेश्वरापासून परके असें आहों. आणि आमची सदसदविवेकबुद्धी तशी साक्षहि देते.

आम्हीं स्वतःस जख्मी करू शकतो अथवा आपल्या मुलांना पवित्र नदीत फेकू शकतो, अथवा लक्षावधी रूपये दान म्हणून देऊ शकतो, किंवा एखाद्या लंगरला जाऊन तिथें लोकांसाठीं ताटे वाढू शकतो, अथवा शेकडो प्रकारचे पत करू शकतो, पण परिणाम आहे तोच असेल. आमचे डाग जसेच्या तसे राहतांत आणि मृत्यू घाबरवून सोडतो.

आम्हीं जाणतो कीं आमची विवेकबुद्धी भ्रष्ट झाली आहे – प्रेत-स्पर्श, घाणेंरडे डायपर किंवा डुकराचे मांस यासारख्या बाह्य गोष्टींनी नव्हे. येशूनें म्हटलें कीं माणसातून जे बाहेर येते तेच त्याला अशुद्ध करते, जे आत जाते ते नाहीं (मार्क 7:15-23). आम्हीं गर्व, बिचारेपणा, कटुत्व, वासना, हेवा, मत्सर, लोभ, उदासीनता आणि भीती यासारख्या प्रवृत्तींनी अशुद्ध झालो आहों.

प्रत्येक युगाप्रमाणेंच आजच्या युगातही एकमेव उत्तर आहे, ख्रिस्ताचे रक्त. जेव्हा तुमची सदसदविवेकबुद्धी उठून तुम्हांला दोष लावते, तेव्हां तुम्हीं कोठे वळाल? इब्री 9:14 आम्हांला उत्तर देतो: “तर सार्वकालिक आत्म्याच्या योगे ज्यानें निष्कलंक अशा स्वतःस देवाला अर्पण केलें, त्या ख्रिस्ताचे रक्त आपली सदसद्विवेकबुद्धी जिवंत देवाच्या सेवेसाठीं निर्जीव कृत्यांपासून किती विशेषेकरून शुद्ध करील?”

उत्तर आहे: ख्रिस्ताच्या रक्ताकडे वळा. विश्वातील एकमेव शुद्धीकरण करणाऱ्या मध्यस्थाकडे वळा जो तुम्हांला जीवनात विसावा, आणि मरणात शांती देऊ शकतो.

28 नवम्बर : सुख का मार्ग

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28 नवम्बर : सुख का मार्ग
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“क्या ही धन्य है वह जिसका अपराध क्षमा किया गया, और जिसका पाप ढाँपा गया हो।” भजन 32:1

कुछ वर्षों पहले, BBC ने दुनिया के लगभग 65 देशों में एक सर्वेक्षण किया और यह बताया कि कौन से देश सबसे अधिक सुखी और सबसे कम सुखी थे। जब लोगों से पूछा गया कि उनके आनन्द का स्रोत क्या है, तो कोई स्पष्ट सहमति नहीं मिली। सुख की राह कठिन और भ्रमित करने वाली थी।[1]

अंग्रेजी की ESV बाइबल में भजन 32 का आरम्भ “धन्य” शब्द से होता है, लेकिन इस शब्द का शायद अधिक प्रभावशाली और उपयुक्त अनुवाद “सुखी” हो सकता है। वास्तव में, जो इब्रानी शब्द यहाँ प्रयुक्त हुआ है, उस शब्द का अक्सर यूनानी में अनुवाद “सुखी” के तौर पर किया जाता है—चाहे वह सेप्टुआजिण्ट (पुराने नियम का यूनानी अनुवाद) हो या नया नियम। यही शब्द यीशु के पहाड़ी उपदेश के आरम्भ में भी प्रयुक्त हुआ, जहाँ उसने अपने अनुयायियों से कहा: “धन्य [अर्थात सुखी] हैं वे, जो मन के दीन हैं, क्योंकि स्वर्ग का राज्य उन्हीं का है” (मत्ती 5:3)।

हममें से बहुत से लोग चाहते हैं कि हम जितने सुखी अभी हैं, उससे अधिक सुखी हों। लेकिन कैसे? कुछ लोग सोचते हैं कि यदि वे अधिक घूमेंगे-फिरेंगे, तो उन्हें सन्तोष मिलेगा। कुछ लोग बड़े स्तर पर सोचते हैं—जैसे कि यदि वे अपने क्षेत्र में न्याय स्थापित कर दें तो वे अधिक सुखी होंगे। अन्य लोग मानते हैं कि सृष्टि की सुन्दरता को सराहने या आध्यात्मिकता को खोजने में सुख मिलता है। फिर भी बार-बार हमें यह सच्चाई झकझोरती है कि कुछ न कुछ है जो हमारी कोशिशों को बर्बाद कर देता है और हमारे सारे सपनों पर धूल की परत चढ़ा देता है। इन सब बातों से मिलने वाला सुख नाज़ुक होता है; वह आसानी से टूट सकता है और स्थायी नहीं रहता। सुख की तलाश या उसे थामे रहने का प्रयास स्वयं एक बोझ बन जाता है।

स्थायी सुख की हमारी खोज व्यर्थ ही रहती है, जब तक हम उस स्थान पर नहीं देखते जहाँ भजनकार ने इसे मूल रूप से पाया—हमारे सृष्टिकर्ता परमेश्वर के साथ एक सम्बन्ध में, जिसका आरम्भ क्षमा से होता है। शायद हम वहाँ देखने की सोच भी न पाएँ, क्योंकि यह विरोधाभासी लगता है कि पहले अपने पापों की गम्भीरता और क्षमा की आवश्यकता को समझकर हमें सुख कैसे मिलेगा। लेकिन इब्रानी भाषा में “क्षमा किया गया” शब्द का अर्थ ही होता है “उठा लिया गया” या “हटा दिया गया।” जिस शान्ति और सुख की हम लालसा करते हैं, वह तभी आता है जब पाप का बोझ उठा लिया जाता है। और फिर हम जीवन के सभी उपहारों का आनन्द लेने के लिए स्वतन्त्र हो जाते हैं, बिना किसी वस्तु या व्यक्ति से यह अपेक्षा किए कि वे हमारे परम सुख का स्रोत बनें।

यह सच्चाई संत ऑगस्टीन के अनुभव में भी दिखाई देती है। उन्होंने अपने जीवन का पहला हिस्सा भोग-विलास में बिताया। फिर जब उन्होंने बाइबल पढ़ी और परमेश्वर के वचन में उससे मुलाकात की, तो उन्होंने जीवन की धुंध से बाहर आकर लिखा: “हे परमेश्वर, हमारा हृदय तब तक अशान्त रहता है, जब तक वह तुझ में विश्राम नहीं पाता।”[2] क्या आपका विश्वास भी वैसा है, जैसा ऑगस्टीन का था? उनके इस कथन का आधार इस भजन के पहले पद में ही मिल जाता है। आपको पाप और दुख के बोझ तले जीवन जीने की ज़रूरत नहीं है, क्योंकि परमेश्वर ने आपको यीशु मसीह के माध्यम से क्षमा और अपने साथ एक सम्बन्ध का निमन्त्रण दे दिया है। आपको उस तरह से सुख की खोज करने की आवश्यकता नहीं है, जैसे यह संसार करता है। जब आपका बोझ उठा लिया जाता है, और जब आप जानते हैं कि परमेश्वर आपके सबसे बुरे पक्ष को जानता है और फिर भी आपसे प्रेम करता है—तब आप एक असाधारण और स्थायी सुख का अनुभव करते हैं।

  भजन 32

पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: 2 इतिहास 19–20; लूका 8:26-56 ◊


[1] माइकल बोण्ड, “द परसुट ऑफ हैपीनेस,” न्यू साईंटिस्ट, अक्तूबर 4, 2003, https://www.newscientist.com/article/mg18024155-100-the-pursuit-of-happiness/ अप्रैल 13, 2021 को इस वैबसाइट पर देखा गया।

[2] कनफेशंस 1.1.

28 November : कृतघ्नतेचे मूळ

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28 November : कृतघ्नतेचे मूळ
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देवाला ओळखूनसुद्धा त्यांनी देव म्हणून त्याचा गौरव केला नाहीं किंवा त्याचे आभार मानलें नाहींत; पण ते आपल्या कल्पनांनी शून्यवत झालें आणि त्यांचे निर्बुद्ध मन अंधकारानें भरून गेलें. (रोम 1:21)

जेव्हा मनुष्याच्या अंतःकरणात परमेश्वरासाठीं कृतज्ञता उसळून येते, तेव्हा आमच्या आशीर्वादाचा समृद्ध स्रोत म्हणून त्याचे गौरव होते. त्याला दाता आणि परोपकारी, आणि त्यामुळें तो किती गौरवी आहे असा त्याचा अंगीकार केला जातो.

पण जेव्हा आम्हांसाठीं परमेश्वराच्या थोर चांगुलपणाविषयी आमच्या अंतःकरणात कृतज्ञता उसळून येत नाहीं, तेव्हा त्याचा शक्यतः असा अर्थ असतो कीं आम्हीं त्याची वाखाणणी करू इच्छित नाहीं; आम्हीं आमचा परोपकारकर्ता म्हणून त्याचा गौरव करूं इच्छित नाहीं.

आणि मनुष्य प्राणी हा स्वभावतः त्यांचा उपकारकर्ता म्हणून उपकारस्तवनाद्वारे परमेश्वराचे आभार मानूं इच्छित नाहीं किंवा त्याचा गौरव करूं इच्छित नाहीं. त्याचे कारण हे कीं आपण जर त्याचा गौरव केला तर मग आमचा स्वतःचा गौरव होत नाहीं, आणि सर्व लोकांस स्वभावतःच परमेश्वराच्या गौरवापेक्षा स्वतःचे गौरव करणें आवडते.

या सर्व कृतघ्नतेचे मुळ म्हणजें स्वतःच्या मोठेपणावर प्रीति करण्यांस प्राधान्य दिलें जाते. कारण खरी कृतज्ञता कबूल करते कीं आम्हास असा वारसा प्राप्त झाला आहे जो आम्हीं स्वतः कमाविलेला नाहीं. आम्हीं असें लंगडे लोक आहोत जें येशू ख्रिस्ताच्या वधस्तंभाच्या आकाराच्या कुबडीच्या आधारे चालतांत. आपण असें पक्षाघाती लोक आहोत जे परमेश्वराच्या कृपेच्या लोखंडी फुप्फुसात क्षणोक्षणी जगत आहोत. आम्हीं स्वर्गाच्या बाबागाडीमध्यें झोपी गेलेलीं बालकें आहोत.

तारणाऱ्या कृपेवाचून, स्वाभाविक वृत्तीच्या मनुष्याला आपण अशा रूपांचे आहों असा स्वतःविषयी विचार करणें आवडत नाहीं : म्हणजें अयोग्य लाभार्थी, लंगडा, पक्षाघाती, एक असहाय बालक. उलट देवच असा आहे असें म्हणत ते त्याच्या गौरवावर दरोडा टाकतांत.

म्हणून, जोपर्यंत मनुष्याला स्वतःचे गौरव करणें आवडते, आणि ‘माझा मी समर्थ आहे’ असें समजतो, आणि आपण पापाच्या असाध्य रोगाने ग्रस्त आहों हे ओळखत नाहीं आणि आपणांस असहाय्य समजण्याचा तिटकारा करतो, तोपर्यंत तो खऱ्या परमेश्वरासाठीं कधीही खरी कृतज्ञता अनुभवू शकणार नाहीं आणि परमेश्वराचे जसे गौरव केलें पाहिजे तसे तो कधीही करणार नाहीं, तर केवळ स्वतःचे गौरव करील.

येशूनें म्हटलें, “निरोग्यांना वैद्याची गरज नसते, तर रोग्यांना असते; मी नीतिमानांना नव्हे तर पाप्यांना पश्घ्चात्तापासाठीं बोलावण्यास आलो आहे” (मार्क 2:17)

येशू अशा लोकांची सेवा करावयास आला नाहीं जे हा आग्रह करतात कीं ते निरोगी आहेत. तो कांहींतरी मोठा कबुलीजबाब मागतो : म्हणजें असें कीं आम्हीं आमचे समर्थ नाहीं हे आम्हीं कबूल करावें. ही गर्विष्ठांसाठीं कुवार्ता आहे, पण ज्यांनी आत्मसंतुष्टतेचे ढोंग त्यागलें आहे आणि परमेश्वराचा शोध करीत आहेत त्यांच्यासाठीं ती मधासारखी गोड वचनें आहेत.

27 नवम्बर : उसकी दया से

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27 नवम्बर : उसकी दया से
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“अतः यह न तो चाहने वाले की, न दौड़ने वाले की परन्तु दया करने वाले परमेश्‍वर की बात है।” रोमियों 9:16

परमेश्वर मनुष्य द्वारा बनाए गए रीति-रिवाजों से बँधा नहीं है, और न ही वह हमारी अपेक्षाओं के अनुसार चलने के लिए बाध्य है।

शायद यह सच्चाई एसाव और याकूब के जीवन में सबसे स्पष्ट रूप से दिखाई देती है। एसाव इसहाक का पहला बेटा था, और इसहाक के पिता अब्राहम को परमेश्वर ने स्वयं के वचन और आशिषों का वाहक बनने के लिए चुना था, जिससे वह एक अपने लिए एक प्रजा बनाए और संसार में आशीष लाए (उत्पत्ति 12:1-3)। परम्परा के अनुसार वारिस होने के नाते एसाव को इसहाक की आशीष और विरासत मिलनी चाहिए थी, वैसे ही जैसे इसहाक को अपने पिता अब्राहम से मिली थी।

परन्तु इसके बजाय, परमेश्वर ने एसाव के छोटे जुड़वाँ भाई याकूब को चुना, जिसे यह सब कुछ प्राप्त हुआ।

याकूब केवल छोटा ही नहीं था, बल्कि उसका स्वभाव भी अच्छा नहीं था, जिसके नाम का मूल रूप से अर्थ था, “धोखेबाज।” यह अविश्वसनीय लगता है कि उसे चुना गया—फिर भी वाचा की रेखा याकूब से होकर ही आगे बढ़नी थी। उसके वंशज आगे चलकर इस्राएल, परमेश्वर की प्रजा, कहलाए।

कभी-कभी मैं इस बात से संघर्ष करता हूँ कि परमेश्वर ने याकूब को क्यों चुना। यह अनुचित प्रतीत होता है! फिर भी बाइबल बताती है कि याकूब को, जो एक अनापेक्षित विकल्प था, परमेश्वर ने पहले से ही चुन लिया था ताकि वह अपनी प्रतिज्ञाओं को एसाव की बजाय याकूब के माध्यम से पूरा करे: “. . . और अभी तक न तो बालक जन्मे थे, और न उन्होंने कुछ भला या बुरा किया था; इसलिए कि परमेश्‍वर की मनसा जो उसके चुन लेने के अनुसार है, कर्मों के कारण नहीं परन्तु बुलाने वाले के कारण है, बनी रहे” (रोमियों 9:11)। याकूब को चुनकर, परमेश्वर ने अपने अनादिकालीन उद्देश्य को पूरा किया। साथ ही उसने एक सिद्धान्त भी सिखाया: परमेश्वर योग्यता के आधार पर चयन नहीं करता। हममें से कोई भी उसके योग्य नहीं है।

यहीं पर हम कभी-कभी सोचने में उलझ जाते हैं। हम याकूब को देखते हैं और सोचते हैं कि उसे क्यों चुना गया, जबकि हमें वास्तव में परमेश्वर को देखना चाहिए और उसकी अनुग्रहपूर्ण प्रकृति पर आश्चर्य करना चाहिए। वह कहता है, “मैं जिस किसी पर दया करना चाहूँ उस पर दया करूँगा, और जिस किसी पर कृपा करना चाहूँ उसी पर कृपा करूँगा” (रोमियों 9:15)। और परमेश्वर हमें भी, जो अयोग्य हैं, दया से बुलाता है।

जब हम यह पूरी तरह से समझ जाते हैं कि परमेश्वर की सन्तान बनने से पहले हम कितने गहरे संकट में थे—हमारा विद्रोह, जो न्याय, क्रोध और मृत्यु का योग्य था—तब हम परमेश्वर के प्रेम और दया की महानता को समझना आरम्भ करते हैं। हम यह पूछना बन्द कर देते हैं कि परमेश्वर कुछ लोगों पर दया क्यों नहीं करता; और यह सोचने लगते हैं कि वह किसी पर भी दया क्यों करता है। यह एक गहरी कृतज्ञता का विषय बन जाता है कि उसने हमें अपनी सन्तान और वारिस बना लिया है।

आपने राजा की कृपा पाने के लिए कुछ भी नहीं किया। आपने अपने विद्रोह के लिए कोई भरपाई नहीं की। केवल एक ही आधार है जिस पर आपको उसके परिवार में अपनाया गया: उसकी दया, जो स्वतन्त्र रूप से दी गई और कभी अर्जित नहीं की जा सकती। जैसे एक भजन के लेखक ने कहा है, “यीशु ने सब मूल्य चुका दिया।”[1] यह सत्य आपको अच्छे दिनों में विनम्र बनाए रखेगा और जब आप पाप कर बैठते हैं, तो आशा देगा; उद्धार कभी आपकी योग्यता पर नहीं, बल्कि हमेशा केवल उसकी दया पर निर्भर है।

रोमियों 9:1-18

◊ पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: 2 इतिहास 17–18; लूका 8:1-25


[1] एल्विना एम. हॉल, “जीज़स पेड इट ऑल” (1865).