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7 December : मागी लोकांसाठींख्रिस्त

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7 December : मागी लोकांसाठींख्रिस्त
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“हेरोद राजाच्या काळात यहूदीयातील बेथलेहेमात येशूच्या जन्मानंतर, पाहा, पूर्वेकडून मागी लोक यरुशलेमेस येऊन विचारपूस करू लागले कीं, यहूद्यांचा राजा जन्मास आला तो कोठे आहे?” (मत्तय 2:1-2)

लूक नमूद करतो त्याप्रमाणें, मत्तय आम्हांला गव्हाणीत येशूला भेट द्यायला आलेल्या मेंढपाळांविषयी सांगत नाहीं. तो आपला वृत्तांत लगेच विदेशी- परराष्ट्रीय, गैरयहूदी –  लोकांकडें वळवितो, जे येशूला दंडवत करण्यासाठीं पूर्वेकडून येतात.

म्हणून, मत्तय त्याच्या शुभवर्तमानाच्या सुरूवातीला आणि शेवटास येशूचे वर्णन केवळ यहूद्यांसाठीं नव्हे, तर सर्व राष्ट्रांसाठीं असलेला वैश्विक मशीहा, ख्रिस्त म्हणून करतो.

येथे आपण जे प्रथम उपासक पाहतो ते राजवाड्यातील जादूगार, अथवा ज्योतिषी, किंवा असें लोक आहेत जे इस्राएलमधून नव्हे, तर पूर्वेकडून आले – कदाचित बॅबीलोनहून आलेले बुद्धीमान लोक आहेत. ते परराष्ट्रीय होते. जुन्या कराराच्या विधिनियमानुसार ते अशुद्ध होते.

आणि मत्तयाच्या शेवटी, येशूचे शेवटचे शब्द आहेत, “स्वर्गात आणि पृथ्वीवर सर्व अधिकार मला दिलेंला आहे. तेव्हां तुम्हीं जाऊन सर्व राष्ट्रांतील लोकांना शिष्य करा” (मत्तय 28:18-19).

त्याच्या या आदेशाने आम्हां परराष्ट्रीयांसाठीं ख्रिस्तामध्यें आनंद करण्याचे केवळ दारच उघडले नाहीं, तर त्यानें आपण ख्रिस्त असल्याचा पुरावा देखील दिला, कारण एक भविष्यवाणी वारंवार देण्यांत आलेली होती कीं राष्ट्रे आणि राजे, वस्तुतः, जगाचा राजा म्हणून त्याच्याकडें येतील. उदाहरणार्थ, यशया 60:3 म्हणते, “राष्ट्रे तुझ्या प्रकाशाकडें येतील, राजे तुझ्या उदयप्रभेकडें येतील.”

म्हणून, मत्तय येशू हाच ख्रिस्त असल्याचा पुरावा देतो आणि दाखवतो कीं तोच ख्रिस्त – राजा, आणि अभिवचन पूर्ण करणारा आहे – फक्त इस्राएलसाठीं नव्हे, तर सर्व राष्ट्रांसाठीं.

6 दिसम्बर : जागते रहना

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6 दिसम्बर : जागते रहना
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“अब तुम्हारे लिए नींद से जाग उठने की घड़ी आ पहुँची है; क्योंकि जिस समय हमने विश्‍वास किया था, उस समय के विचार से अब हमारा उद्धार निकट है . . . जैसा दिन को शोभा देता है, वैसा ही हम सीधी चाल चलें, न कि लीला–क्रीड़ा और पियक्‍कड़पन में, न व्यभिचार और लुचपन में, और न झगड़े और डाह में।” रोमियों 13:11, 13

“लापरवाह बातों से जानें जा सकती हैं”—यह एक प्रसिद्ध अभियान था जो दूसरे विश्व युद्ध के दौरान ब्रिटिश सरकार द्वारा चलाया गया था। सरकार चाहती थी कि लोग अपने आस-पास के खतरे को लेकर सतर्क रहें: यह जानते हुए कि शत्रु कान लगाए बैठा है और जुबान की जरा-सी चूक भी घातक सिद्ध हो सकती है। इसी प्रकार, प्रेरित पौलुस हमारे मसीही जीवन के लिए भी ऐसी ही एक चेतावनी देता है: लापरवाही जानलेवा हो सकती है।

लापरवाही हमें खतरे के घेरे में ले आती है। बहुत से लोग आत्मिक दृष्टि से एक प्रकार की नैतिक नींद में जी रहे हैं—जागृत और सतर्क रहने के बजाय वे आत्मिक शिथिलता में जीवन व्यतीत कर रहे हैं। इससे हम शत्रु के लिए एक आसान लक्ष्य बन जाते हैं। शुद्धता के जीवन में जागते और सतर्क रहने के इन दो मुख्य कारणों पर ध्यान दें।

पहला, प्रेरित पतरस हमें चेतावनी देता है: “तुम्हारा विरोधी शैतान गर्जने वाले सिंह के समान इस खोज में रहता है कि किस को फाड़ खाए” (1 पतरस 5:8)। आइए खुद को धोखा न दें—पाप एक शिकारी है। शत्रु एक सिंह है। याद करें कि प्रभु ने कैन से क्या कहा था जब वह अपने भाई से क्रोधित था: “पाप द्वार पर छिपा रहता है; और उसकी लालसा तेरी ओर होगी, और तुझे उस पर प्रभुता करनी है” (उत्पत्ति 4:7)।

क्या आप जानते हैं कि कौन एक आसान शिकार होता है? एक संगति से दूर रहने वाला मसीही। जब हम आत्मिक संगति से कट जाते हैं, तो हम असुरक्षित और उत्तरदायित्व से मुक्त हो जाते हैं। धर्मी संगति में चलना हमें सचेत और स्थिर बनाता है। हम दिन के बच्चे हैं—अतः हमें अन्धकार की ओर आकर्षित नहीं होना चाहिए, क्योंकि अन्धकार अलगाव और गुमराही को जन्म देता है। शुद्धता के प्रति उत्साह का अर्थ है कि हम ज्योति में चलें और उन लोगों के साथ चलें, जो ज्योति के पुत्र हैं।

दूसरा, हमें जागते और सतर्क रहना चाहिए क्योंकि अनन्तता हमारी प्रतीक्षा कर रही है। इब्रानियों 11 के नायकों को “विश्वास के वीर” किस कारण कहा गया? क्योंकि वे अपने से परे एक नगर की प्रतीक्षा में थे—एक ऐसा नगर जिसका आधार और रचयिता स्वयं परमेश्वर है (इब्रानियों 11:10)।

मूसा को ही देखें: उसने तात्कालिक सुख-सुविधा के प्रलोभन के आगे हार नहीं मानी। उसने क्षण भर की विलासिता के लिए अपनी आत्मा नहीं बेची। उसने मिस्र के ऐश्वर्य के कारण अपना सेवाकार्य, भविष्य और परिवार नहीं छोड़ा। और इसका कारण क्या था? “उसने मसीह के कारण निन्दित होने को मिस्र के भण्डार से बड़ा धन समझा, क्योंकि उसकी आँखें फल पाने की ओर लगी थीं” (इब्रानियों 11:26)। मूसा निष्कलंक नहीं था—और हम भी नहीं हैं। परन्तु इसका अर्थ यह नहीं है कि हम मसीह के लिए शुद्ध और पवित्र जीवन न जीएँ। क्योंकि हमारी मुक्ति का दिन निकट आता जा रहा है, और हम चाहते हैं कि जब प्रभु यीशु प्रकट हो, तो वह हमें तैयार और चौकस पाए।

आपका अतीत चाहे जैसा भी रहा हो, चाहे हाल ही में आपके कदम लड़खड़ाए हों या निराशाएँ आई हों, अभी भी समय है कि आप जाग जाएँ और सतर्क हो जाएँ। शत्रु तो सोएगा नहीं, लेकिन जागृत रहने वाले का प्रतिफल अनन्त जीवन है। आज ही परमेश्वर से प्रार्थना करें कि वह आपके हृदय पर शुद्धता के जीवन की प्रतिबद्धता अंकित कर दे, ताकि आप आज सावधानीपूर्वक और सीधा चलें—सिर ऊँचा करके और अपनी दृष्टि उस महिमामय दिन पर केन्द्रित करके, जब आपकी मुक्ति पूर्ण हो जाएगी।

इफिसियों 6:10-20

पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: एस्तेर 1–2; लूका 12:1-31 ◊

6 December : ज्यांच्यावर त्याचा प्रसाद झाला आहे त्या मनुष्यांत शांती

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6 December : ज्यांच्यावर त्याचा प्रसाद झाला आहे त्या मनुष्यांत शांती
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“आणि तुम्हांला खूण ही कीं, बाळंत्यानें गुंडाळलेले व गव्हाणीत ठेवलेले एक बालक तुम्हांला आढळेल.” इतक्यात स्वर्गातील सैन्याचा समुदाय त्या देवदूताजवळ अकस्मात प्रकट झाला आणि देवदूत देवाची स्तुती करत म्हणाले, “ऊर्ध्वलोकीं देवाला गौरव, आणि पृथ्वीवर ज्यांच्यावर त्याचा प्रसाद झाला आहे त्या मनुष्यांत शांती.” (लूक 2:12)

कोणासाठीं शांती? देवदूतांच्या स्तुतीगानात एक गंभीर स्वर नादला आहे. पृथ्वीवर ज्यांच्यावर त्याचा प्रसाद झाला आहे त्या मनुष्यांत शांती. म्हणजें त्या लोकांमध्यें शांती ज्यांच्यावर तो प्रसन्न झाला आहे. पण विश्वासावाचून देवाला प्रसन्न करणें शक्य नाहीं (इब्री 11:6). म्हणून, नाताळाचा उत्सव हा सर्वांसाठीं शांती घेऊन येत नाहीं.  

येशूनें म्हटलें “निवाडा हाच आहे कीं, जगात प्रकाश आला आहे आणि मनुष्यांनी प्रकाशापेक्षा अंधाराची आवड धरली; कारण त्यांची कृत्ये दुष्ट होती” (योहान 3:19). किंवा म्हाताऱ्या शिमोनाने बाळ येशूला पाहतांना म्हटलें, “पाहा, इस्राएलात अनेकांचे पडणें व पुन्हा उठणें होण्यासाठीं व ज्याच्याविरुद्ध लोक बोलतील असे एक चिन्ह होण्यासाठीं ह्याला नेमले आहे; ह्यासाठीं कीं, पुष्कळ लोकांच्या अंतःकरणातील विचार उघडकीस यावेत” (लूक 2:34,35). आह, कितीतरी लोक आहेत जे एका उदासवाण्या आणि थंड नाताळाच्या दिवसाची वाट पाहत आहेत आणि त्या पलीकडें तें काहीही पाहत नाहींत – ज्याच्याविरुद्ध लोक बोलतील असे एक चिन्ह.

“जे त्याचे स्वतःचे2 त्याकडें तो आला तरी त्याच्या स्वकीयांनी त्याचा स्वीकार केला नाहीं. परंतु जितक्यांनी त्याचा स्वीकार केला तितक्यांना म्हणजें त्याच्या नावावर विश्वास ठेवणार्‍यांना त्यानें देवाची मुले होण्याचा अधिकार दिला” (योहान 1:11-12). येशू हे शब्द केवळ आपल्या शिष्यांना बोलला, “मी तुम्हांला शांती देऊन ठेवतो; मी आपली शांती तुम्हांला देतो; जसे जग देते तसे मी तुम्हांला देत नाहीं. तुमचे अंत:करण अस्वस्थ अथवा भयभीत होऊ नये” (योहान 14:27).

जे लोक देवाच्या शांतीचा आनंद घेतात जी बुद्धिसामर्थ्याच्या पलीकडें आहे ते सर्व गोष्टींविषयी प्रार्थना व विनंती करून आपली मागणी देवाला कळवतात (फिलिप्पै 4:6-7).

देवाच्या खजान्याच्या पेटीचे कुलूप उघडणारी किल्ली म्हणजें देवाच्या अभिवचनांवरील विश्वास. म्हणून पौल प्रार्थना करतो, “आता आशेचा देव विश्वास ठेवण्यामुळें तुम्हांला संपूर्ण आनंदाने व शांतीने भरो” (रोमकरांस 15:13). आणि जेव्हां आपण देवाच्या अभिवचनांवर विश्वास ठेवतो आणि आनंद व शांती व प्रीतिचा अनुभव घेतो, तेव्हां देवाचे गौरव होते.

ऊर्ध्वलोकी देवाला गौरव, आणि पृथ्वीवर ज्यांच्यावर त्याचा प्रसाद झाला आहे त्या मनुष्यांत शांती! प्रत्येक जण – सर्व राष्ट्रे, वंश, लोक व निरनिराळ्या भाषा बोलणारे– जें विश्वास ठेवतील- अशा सर्वांवर.     

5 दिसम्बर : उसने स्वयं को दीन किया

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5 दिसम्बर : उसने स्वयं को दीन किया
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“और वचन देहधारी हुआ; और अनुग्रह और सच्चाई से परिपूर्ण होकर हमारे बीच में डेरा किया, और हम ने उसकी ऐसी महिमा देखी, जैसी पिता के एकलौते की महिमा . . . उसकी परिपूर्णता में से हम सब ने प्राप्त किया अर्थात् अनुग्रह पर अनुग्रह।” यूहन्ना 1:14, 16

अभिनेता स्टीव मैक्वीन का जीवन अत्यन्त रोचक, यद्यपि कई बार भ्रष्ट और अस्त-व्यस्त रहा। उनका देहान्त 1980 में हुआ, परन्तु इससे पहले कि बीमारी उन्हें अपना ग्रास बना लेती, एक विश्वासयोग्य पास्टर ने उन्हें सुसमाचार सुनाया और उन्होंने नम्र होकर मसीह में विश्वास किया। उनके जीवन-परिवर्तन के बाद, वे नियमित रूप से बाइबल अध्ययन और रविवार की आराधना में भाग लेते रहे, लेकिन बिना किसी सार्वजनिक प्रशंसा के। वे इस सत्य से विस्मित रहते थे कि यद्यपि उनका जीवन तलाकों, व्यसनों और नैतिक पतनों से भरा था, फिर भी परमेश्वर ने उन्हें ऐसा प्रेम दिखाया।

मैक्वीन इस सच्चाई को समझने लगे कि परमेश्वर ने उन्हें “शून्य” बना दिया, ताकि जब वे अपनी शून्यता को पहचानें, तब परमेश्वर उन्हें “कुछ” बना सके। यही कार्य परमेश्वर हमारे साथ भी करता है।

इसमें हम मसीह यीशु की पद्धति का अनुसरण करने के लिए बुलाए गए हैं। अपने जन्म के दिन से ही मसीह ने अपनी शाश्वत अतुल्य महिमा को त्याग दिया, ताकि वह इस पतित और असहाय संसार में हमारे लिए आ सके। वह रथ पर सवार होकर नहीं, परन्तु चरनी में आया; वह राजदण्ड लेकर नहीं, परन्तु एक गौशाला में आया। यीशु जितना स्वर्गिक राजा है, उतना ही वह पृथ्वी पर दास बना।

यह कहना कि उसने अपने आप को “शून्य” कर दिया, यह नहीं दर्शाता कि वह परमेश्वर होना छोड़कर मनुष्य बन गया और फिर से परमेश्वर बन गया। जब हम पढ़ते हैं, “वचन देहधारी हुआ; और अनुग्रह और सच्चाई से परिपूर्ण होकर हमारे बीच में डेरा किया,” तो हमें इस विस्मयकारी विरोधाभास पर मनन करना चाहिए कि हमारे अद्‌भुत उद्धारकर्ता ने अपने आप को मानवता में उण्डेल दिया, लेकिन अपने ईश्वरत्व को नहीं छोड़ा। वह पूर्णतः परमेश्वर है और पूर्णतः मनुष्य भी!

हमारी सीमित मानवीय बुद्धि कभी-कभी मसीह के ईश्वरत्व पर इतना ध्यान देती है कि हम यह भूल जाते हैं कि वह हमारे समान पूर्णतः मानव था; और कभी-कभी हम उसकी मानवता में इतने खो जाते हैं कि उसका ईश्वरत्व दृष्टि से हमारी ओझल हो जाता है। परन्तु पवित्रशास्त्र मसीह के इन दोनों स्वभावों को पूर्ण सामंजस्य में रखता है: वह मनुष्य के रूप में पाया गया (फिलिप्पियों 2:8), परन्तु वह केवल वही नहीं था जो बाहरी दृष्टि से प्रतीत होता था।

यीशु में वह सामर्थ्य था जो बाहरी रूप से दिखाई नहीं देता था। वह देखने में तो अन्य पुरुषों के समान प्रतीत होता था, परन्तु ऐसा कोई अन्य मनुष्य नहीं है जो आँधी-तूफान के मध्य में नौका में खड़ा होकर समुद्र को शान्त कर दे। केवल परमेश्वर ही लंगड़े को चला सकता है या अन्धे को दृष्टि दे सकता है। केवल वही मनुष्य स्वर्गदूतों की आराधना और सम्पूर्ण सृष्टि की स्तुति का अधिकारी है। फिर भी यीशु ने जब देहधारण किया, तो यह सोचकर नहीं आया कि मुझे इससे क्या लाभ मिलेगा? बल्कि वह इस उद्देश्य के साथ आया कि “मनुष्य का पुत्र इसलिए नहीं आया कि उसकी सेवा टहल की जाए, पर इसलिए आया कि आप सेवा टहल करे, और बहुतों की छुड़ौती के लिए अपना प्राण दे” (मरकुस 10:45)।

उसने सब कुछ छोड़ने और “शून्य” बनने को स्वीकार किया, ताकि अपनी शून्यता को स्वीकार करने वाले लोगों को परमेश्वर “सब कुछ” दे सके। वह देहधारी हुआ ताकि वह सेवा कर सके, और उसने उन सब के लिए दीनता का उत्तम आदर्श प्रस्तुत किया, जो उसका अनुसरण करना चाहते हैं। आज जब आप अपने कार्यों और जिम्मेदारियों में लगें हैं, तो क्या आप यीशु के इस नम्र आदर्श की ओर दृष्टि करेंगे?

फिलिप्पियों  2:1-13

◊ पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: 2 इतिहास 34–36; लूका 11:29-54

5 December : कॅलवरीपासून वळसा नाहीं

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5 December : कॅलवरीपासून वळसा नाहीं
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तेथे असताना असे झालें कीं, तिचे दिवस पूर्ण भरले; आणि तिला तिचा प्रथमपुत्र झाला; त्याला तिने बाळंत्यानें गुंडाळून गव्हाणीत ठेवले, कारण त्यांना उतारशाळेत जागा नव्हती. (लूक 2:6-7)

तुम्हीं विचार कराल कीं जर देव जगावर अशाप्रकारे राज्य करतो कीं तो मरीया आणि योसेफाला बेथलेहेमात आणण्यासाठीं पूर्ण साम्राज्यात जनगणनेचा आदेश अस्तित्वांत आणतो, तर मग त्यानें निश्चितच ह्या गोष्टीची देखील खात्री करून घ्यायला पाहिजें होती कीं उतारशाळेत त्यांच्यासाठीं जागा उपलब्ध असावी.

होय, तो ह्या गोष्टीची देखील खात्री करून घेऊ शकला असता. तो नक्कीच तसें करू शकला असता! आणि येशूचा जन्म श्रीमंत कुटूंबात होणें शक्य होते. त्याला अरण्यात धोंड्यांपासून भाकरी बनविणेंहि शक्य होते. त्याला गेथशेमाने बागेत त्याच्या मदतीसाठीं 10,000 देवदूतांना बोलावणें शक्य होते. तो वधस्तंभावरून उतरून खाली येऊ शकला असता आणि स्वतःला वाचवू शकला असता. प्रश्न हा नाहीं कीं देव काय करू शकला असतां, पण त्यानें काय करण्याचे ठरविलें होते हा आहे.

देवाची इच्छा ही होती कीं ख्रिस्त जरी धनवान होता, तरी त्यानें तुमच्यासाठीं तो दरिद्री व्हावें. बेथलेहेमातील कोणत्याच उतारशाळेत “जागा नव्हती” ही तुम्हांला खूण होती. “तो तुमच्याकरिता दरिद्री झाला” (2 करिंथ 8:9).

तो त्याच्या लेकरांसाठीं सर्व गोष्टींवर – मग ते होटेल्स, असोत, वा विमानें- राज्य करतो. त्याचा कलवरीचा प्रवास बेथलेहेमात “जागा नव्हती” या चिन्हाने सुरू होतो आणि त्याचा शेवट यरूशलेमातील वधस्तंभावर थूंकणें आणि थट्टा करणें याने होतो.

आणि त्यानें जें म्हटलें तें आम्हीं हे विसरता कामा नये, कीं “जर कोणी माझ्यामागे येऊ पाहतो तर त्यानें आत्मत्याग करावा व दररोज स्वतःचा वधस्तंभ उचलून घेऊन मला अनुसरावे” (लूक 9:23).

आम्हीं कलवरीच्या मार्गावर त्याला अनुसरतो आणि त्याला हे म्हणतांना ऐकतो, “दास धन्यापेक्षा मोठा नाहीं’ हे जे वचन मी तुम्हांला सांगितले त्याची आठवण करा. ते माझ्या पाठीस लागले तर तुमच्याही पाठीस लागतील” (योहान 15:20).

जो उत्साहाने म्हणतो, “आपण जेथे कोठे जाल तेथे मी आपल्यामागे येईन” त्याला येशू उत्तर देतो, “खोकडांना बिळे व आकाशातल्या पाखरांना घरटी आहेत; परंतु मनुष्याच्या पुत्राला डोके टेकायला ठिकाण नाहीं” (लूक 9:57-58).

होय, येशूच्या जन्माच्या वेळी त्याला खोली मिळावी याविषयी देव खात्री करून घेऊ शकला असतां. पण ते कलवरीच्या मार्गावरून वळसा म्हणजें माघार घेणें झालें असते.

4 दिसम्बर : परमेश्वर की सन्तान

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4 दिसम्बर : परमेश्वर की सन्तान
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“परन्तु जितनों ने उसे ग्रहण किया, उसने उन्हें परमेश्‍वर की सन्तान होने का अधिकार दिया, अर्थात् उन्हें जो उसके नाम पर विश्‍वास रखते हैं। वे न तो लहू से, न शरीर की इच्छा से, न मनुष्य की इच्छा से, परन्तु परमेश्‍वर से उत्पन्न हुए हैं।” यूहन्ना 1:12-13

कुछ कलीसियाओं में यह आम बात है कि वे परमेश्वर की सार्वभौमिक पितृत्व और मानवजाति के भाईचारे की बात करते हैं। परन्तु हमें ऐसे दावों की सीमाओं के प्रति सजग रहना चाहिए। यह बात एक अर्थ में सत्य है कि हम सब सृष्टि के भाव से परमेश्वर की सन्तान हैं, परन्तु नया नियम यह भी स्पष्ट करता है कि साथ ही हम “क्रोध की सन्तान” हैं (इफिसियों 2:3)—जो खोए हुए हैं और जिन्हें परमेश्वर के परिवार में ग्रहण किए जाने की आवश्यकता है।

हम स्वाभाविक रूप से परमेश्वर की सन्तान नहीं बनते। यह न तो मानव वंशानुक्रम का परिणाम है, न ही किसी मानवीय प्रयास का। कोई भी जन्म से परमेश्वर के राज्य में प्रवेश नहीं करता—इसीलिए यीशु ने नीकुदेमुस से कहा, जो कि एक धार्मिक पुरुष था और यहूदी वंशावली में निर्दोष था, कि उसे नए सिरे से जन्म लेना अवश्य है (यूहन्ना 3:3)। परमेश्वर की सन्तान बनना एक आत्मिक प्रक्रिया है—ऐसा कार्य जिसे परमेश्वर अपनी दया और अनुग्रह से हमारे लिए करता है।

अपने शारीरिक जन्म के विषय में सोचें। उस पर आपका कोई नियन्त्रण नहीं था। यह आपकी अपनी उपलब्धि नहीं थी। मसीह में नया जन्म भी ऐसा ही है। जब परमेश्वर किसी को नया जन्म देता है, तो जो नया जीवन उत्पन्न होता है वह केवल उसी की प्रभुता के कारण सम्भव होता है। वही हमें अपनी सन्तान बनने का अधिकार देता है।

कहा जाता है कि सम्राट नेपोलियन एक बार अपने घोड़े पर से लगभग गिर ही गया था जब उसने लगाम छोड़ दी ताकि अपने साथ रखे दस्तावेज़ पढ़ सके। जैसे ही घोड़ा बेकाबू हुआ, एक युवा सैनिक ने तुरन्त हस्तक्षेप किया और घोड़े की लगाम थाम ली। नेपोलियन ने उसकी ओर मुड़कर कहा, “धन्यवाद, कप्तान।” सैनिक ने तुरन्त पूछा, “किस टुकड़ी का, श्रीमान?” सम्राट ने उत्तर दिया, “मेरे अंगरक्षकों का।”[1]

क्षणमात्र में उस सैनिक को पदोन्नत कर दिया गया, उसे सेनापति के मुख्यालय में प्रवेश का अधिकार मिल गया और वह सम्राट के अधिकारियों में सम्मिलित हो गया। जब लोगों ने उससे पूछा कि वह वहाँ क्या कर रहा है, तो वह उत्तर दे सकता था: “मैं सम्राट के आदेश से अंगरक्षकों का कप्तान हूँ।”

यदि आपने यीशु को अपना प्रभु और उद्धारकर्ता ग्रहण किया है, तो आप परमेश्वर की सन्तान हैं। परमेश्वर ने आपके जीवन पर एक नई पहचान की मुहर लगा दी है, जिसे कोई चुनौती नहीं दे सकता। आप इस महान आश्वासन के साथ जीवन जी सकते हैं कि राजाओं के राजा और आपके उद्धार के सेनापति यीशु ने आपको परमेश्वर की सन्तानों में गिने जाने के योग्य बना दिया है। यही वह महान सत्य है जो अब आपकी पहचान का केन्द्र है—फिर चाहे आप कोई भी हों और आपकी परिस्थिति कोई भी हो। यही वह सत्य है जो आपको हर दिन सिर उठाकर, आत्मविश्वास से जीने में समर्थ बनाता है, यह जानते हुए कि जो भी हो, आप परमेश्वर की सन्तान हैं।

  1 यूहन्ना 2:28 – 3:3

पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: 2 इतिहास 32–33; लूका 11:1-28 ◊


[1] जेम्स मोण्ट्गोमेरी बोइस, दि गॉस्पल ऑफ जॉन: ऐन एक्सपोज़िशनल कॉमैण्ट्री (ज़ोण्डरवन, 1975), खण्ड. 1, पृ. 89.

4 December : देवाच्या दीनजनांकरिता

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4 December : देवाच्या दीनजनांकरिता
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त्या दिवसांत असे झालें कीं, सर्व जगाची नावनिशी लिहिली जावी अशी कैसर औगुस्त ह्याची आज्ञा झाली. क्‍विरीनिय हा सूरियाचा सुभेदार असताना ही पहिली नावनिशी झाली. तेव्हां सर्व लोक आपापल्या गावी नावनिशी लिहून देण्यास गेलें. योसेफ हा दाविदाच्या घराण्यातला व कुळातला असल्यामुळें तोही गालीलातील नासरेथ गावाहून वर यहूदीयातील दाविदाच्या बेथलहेम गावी गेला, व नावनिशी लिहून देण्यासाठीं, त्याला वाग्दत्त झालेंली मरीया गरोदर असताना तिलाही त्यानें बरोबर नेले. (लूक 2:1-5)

मशीहाचा जन्म बेथलेहेमात व्हावा (मीखा 5:2 मधील भविष्यवाणी दाखविते त्याप्रमाणें) हे देवानें आधीच योजून ठेवले होते हे किती अद्भुत आहे ह्याचा आपण कधी विचार केलात का; आणि त्यानें काही बाबी अशारीतीने योजल्या कीं काळाची पूर्णता झाल्यावर, मशीहाची आई आणि अधिकृत पिता हे बेथलेहेमात नव्हे तर नासरेथात राहात होते; आणि त्याच्या वचनाची पूर्ती करण्याकरिता दोन अप्रसिद्ध, अत्यंत गरीब, हीन-दीन लोकांना त्या पहिल्या नाताळासाठीं बेथलेहेमास आणण्याकरिता, देवानें कैसर औगुस्ताच्या मनात घातले कीं संपूर्ण रोमी जगताची आपापल्या गावी नावनिशी व्हावी? दोन लोकांना सत्तर मैल स्थलांतरित करण्याकरिता संपूर्ण जगाला आज्ञा!

सात अब्ज लोकसंख्या असलेल्या या जगामध्यें, जिथे सर्व बातम्या ह्या मोठ्या राजकिय आणि आर्थिक आणि सामाजिक चळवळी आणि जागतिक स्तरावरील लक्षणीय महत्व प्राप्त व भरपूर सामर्थ्य आणि प्रतिष्ठा असणार्‍या लोकांबाबत असतात, तिथें मला जाणवते तसे तुम्हांला सुद्धा आपण दीन आणि अप्रसिद्ध आहोत असे कधी जाणवलें आहे का?

आपणास तसे वाटले असेल, तर त्यामुळें स्वत:ला निराश आणि दु:खी होऊ देऊ नका. कारण पवित्र शास्त्रात हे गृहित धरण्यात आलेले आहे कीं सर्व भव्य राजकिय शक्ती आणि विशाल औद्योगिक जाळे, या सर्वांना त्यांच्या नकळकत स्वतः देव चालवितो, त्यांच्या स्वत:करिता नव्हे तर देवाच्या दीन लोकांकरिता—कनिष्ठ मरीया आणि कनिष्ठ योसेफाला नासरेथाहून बेथलेहेमेला आणण्याकरिता. देव त्याचा शब्द पूर्ण करण्याकरिता आणि त्याच्या लेकरांना आशीर्वाद देण्याकरिता एका साम्राज्याला हाती धरून त्याचा उपयोग करतो.

आपण आपल्या अनुभवाच्या जगतामध्यें विपत्ती अनुभवली म्हणून देवाचा हात तोकडा पडला असा विचार करू नका. आमची समृद्धी किंवा प्रसिद्धी नव्हे तर देव त्याच्या संपूर्णमनानें आमचे पावित्र्य शोधत आहे. आणि त्याकरिता तो संपूर्ण जगावर  हुकुमत करतो. नीतिसूत्रे 21:1 म्हणते, “राजाचे मन पाटाच्या पाण्याप्रमाणें परमेश्वराच्या हाती आहे. त्याला वाटेल तिकडें तो ते वळवतो.” आणि त्याच्या लोकांमध्यें त्याचे तारण आणि त्याचे पवित्रीकरण आणि सनातन संकल्प सिद्धीस नेण्याकरिता तो ते नहेमीच वळवतो.

हीन-दीन लोकांकरिता थोर असा देव आहे, आणि आम्हांला आनंद करण्याचे फार मोठे कारण आहे कीं जगाचे सर्व राजे आणि अध्यक्ष आणि पंतप्रधान आणि कुलपती आणि मुख्य लोक नकळतआमच्या स्वर्गीय देवाची सार्वभौम आज्ञा पाळतात, जेणेंकरून, आम्हीं जी त्याची लहान बालकें त्याचा पुत्र, येशू ख्रिस्त ह्याच्या प्रतिरूपाशी एकरूप व्हावे— आणि त्याच्या सार्वकालिक गौरवात प्रविष्ट व्हावे.

3 दिसम्बर : परमेश्वर के अधिकार को चुनौती देना

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3 दिसम्बर : परमेश्वर के अधिकार को चुनौती देना
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“वह अपने घर आया और उसके अपनों ने उसे ग्रहण नहीं किया।” यूहन्ना 1:11

बहुत से अभिनेता यह सोचते हैं कि वे हैमलेट की भूमिका निभाने के योग्य हैं। परन्तु अनेक बार, वे वास्तव में उस योग्य नहीं होते। उनमें वह क्षमता और अनुभव नहीं होता, जो इस गहन भूमिका के लिए अपेक्षित है—हालाँकि यह तथ्य उन्हें इसका प्रयास करने से रोकता नहीं है!

इसी प्रकार, हर पुरुष और स्त्री अपने जीवन में किसी न किसी समय परमेश्वर के अधिकार को चुनौती देने के प्रलोभन में पड़ते हैं और यह भ्रम पाल लेते हैं कि वे वह भूमिका निभा सकते हैं जो केवल वही निभा सकता है। अक्सर हम अपनी परिस्थितियों में उसकी दिव्य योजना और नियन्त्रण पर भरोसा करने में असफल होते हैं। इसके स्थान पर, हम उसके सम्पूर्ण प्रभुत्व पर प्रश्न उठाते हैं। हम उस स्थान को छीनने का प्रयास करते हैं, जो केवल सृष्टिकर्ता परमेश्वर का है।

परमेश्वर के अधिकार का विरोध कोई नई बात नहीं है। जब यीशु पुराने नियम की भविष्यवाणियों की पूर्ति के रूप में इस पृथ्वी पर आया, तब भी अपने सेवा-काल में वह अपने ही लोगों द्वारा अस्वीकार किया गया। इस्राएल मसीह की प्रतीक्षा कर रहा था—परन्तु जब वह आया, तब उन्होंने उसके अधिकार पर प्रश्न उठाया और उसकी पहचान को अस्वीकार कर दिया। वे भविष्यवाणियों को जानते थे, परन्तु उनकी पूर्ति को नहीं पहचान सके।

यहूदी धार्मिक अगुवों और अन्यजाति शासकों द्वारा क्रूस पर मारे जाने से कुछ दिन पहले यीशु ने दुष्ट किसानों का दृष्टान्त कहा, जिन्होंने दाख-वाटिका के स्वामी के पुत्र को अस्वीकार किया और उसे मार डाला। प्रभु ने इस दृष्टान्त के द्वारा मुख्य याजकों, शास्त्रियों और अगुवों के आत्मिक अन्धेपन को उजागर किया, जो उससे उसके कार्यों का हिसाब मांग रहे थे (मरकुस 12:1–12)। वे समझ गए थे कि यीशु स्वयं को परमेश्वर का पुत्र कह रहा था। परन्तु जब यीशु ने स्पष्ट रूप से उन्हें चेतावनी दी कि वे उन किसानों जैसे हैं, जिन्होंने स्वामी के पुत्र को मार डाला, तब दुख की बात है कि वे उसी क्षण उसे पकड़ने का षड्यन्त्र रचने लगे!

हमें यह सोचने का प्रलोभन हो सकता है: “वे धार्मिक अगुवे कितने घमण्डी थे, जो सृष्टि के राजा के सामने खड़े होकर उसके अधिकार को चुनौती दे रहे थे!” परन्तु सच तो यह है कि हम भी पहले उनसे भिन्न नहीं थे। अपने पापपूर्ण स्वभाव में, हम भी उस पुत्र को ग्रहण नहीं करना चाहते थे जिसे परमेश्वर ने भेजा था। हम अन्धकार में रहना पसन्द करते थे। सच कहें तो, वह अन्धकार हमें भाता था!

यूहन्ना इस सत्य को स्पष्ट रूप से प्रकट करता है जब वह कहता है, “ज्योति जगत में आई है, और मनुष्यों ने अन्धकार को ज्योति से अधिक प्रिय जाना क्योंकि उनके काम बुरे थे” (यूहन्ना 3:19)। मनुष्य स्वाभाविक रूप से यह नहीं करते कि वे बैठकर सुसमाचार की ज्योति को अपने हृदय में आने की प्रतीक्षा करें। परन्तु अपने अनुग्रह में, परमेश्वर अन्धों की आँखें खोलता है, जिससे वे उसके पुत्र की पहचान को देखें, उस पर विश्वास करें और उसकी आराधना करें।

यही कारण है कि बाइबल हमेशा “आज” की बात करती है। मसीह के लिए जीवन जीने का कोई दिन आज से उत्तम नहीं है। हम विश्वासियों को भी, अपने मसीही जीवन में निरन्तर पश्चाताप और पुनर्स्थापना के लिए बुलाया गया है। हमें अपने जीवन में वह स्थान नहीं हथियाना है, जो केवल परमेश्वर के लिए आरक्षित है। जब हमारे हृदय अपने पाप के प्रति अधिक संवेदनशील होते हैं, और जब हम उसके धीरज और दया को अनुभव करते हैं, तो उसकी भलाई हमें पवित्रता की ओर ले जाती है। और जब आप अपने जीवन के केन्द्र में परमेश्वर को रखते हैं—उसे वह भूमिका निभाने देते हैं जो केवल उसी के योग्य है—तब आप आनन्द और आत्मविश्वास के साथ उस भूमिका को पूरा कर सकते हैं जो उसने आपको दी है, अर्थात वह जीवन जीना जो उसने आपको उपहारस्वरूप दिया है, और उस उद्देश्य को पूरा करना जिसके लिए उसने आपको जीवन के “मंच” पर बुलाया—एक ऐसा जीवन जो उसे जानने, उससे प्रेम करने, और उसकी सेवा करने में व्यतीत होता है।

मरकुस 12:1-12

◊ पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: 2 इतिहास 30–31; लूका 10:25-42

3 December : दीर्घकाळ प्रलंबित भेट

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3 December : दीर्घकाळ प्रलंबित भेट
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“इस्राएलाचा देव प्रभू धन्यवादित असो, कारण त्यानें ‘आपल्या लोकांची’ भेट घेऊन त्यांची ‘खंडणी भरून सुटका’ केली आहे; आणि आपल्यासाठीं त्यानें आपला दास ‘दावीद’ ह्याच्या घराण्यात ‘बलवान उद्धारक प्रस्थापित केला आहे; हे त्यानें युगाच्या प्रारंभापासून आपल्या पवित्र संदेष्ट्यांच्या मुखाद्वारे सांगितले होते;’ म्हणजें आपल्या ‘शत्रूंच्या’ व आपला ‘द्वेष करणार्‍या’ सर्वांच्या ‘हातून’ सुटका करावी.” (लूक 1:68-71)

लूक 1 मधील अलीशिबेचा पति, जखऱ्या याच्या शब्दांतून निघालेल्या दोन अद्भुत गोष्टींकडें लक्ष द्या.

पहिली, नऊ महिन्यांपूर्वी, जखऱ्याला विश्वास नव्हतां कीं त्याच्या पत्नीला मूल होईल. परंतु आता, पवित्र आत्म्याने परिपूर्ण होऊन, त्याला येणाऱ्या मशीहात देवाच्या मुक्तीच्या कार्याविषयी एवढा विश्वास आहे कीं तो ते भूतकाळात मांडतो: “त्यानें ‘आपल्या लोकांची’ भेट घेऊन त्यांची ‘खंडणी भरून सुटका’ केली आहे.” विश्वास ठेवणाऱ्या मनासाठीं, देवाचे अभिवचनदत्त कार्य जणू ते पूर्ण झाल्याइतकेच उत्तम आहे. जखऱ्या हा देवाच्या शब्दावर विश्वास करावयास शिकला आणि म्हणून त्याला ही अद्भुत खात्री पटलीं : देवानें “भेट घेऊन…सुटका केली आहें!” (लूक 1:68).

दुसरी, येशू ख्रिस्ताचे येणें हे देवानें जगाची घेतलेली भेट आहे : इस्राएलाच्या देवानें भेट घेऊन सुटका केली. अनेक शतके, यहूदी लोक या विश्वासाखाली खितपत पडले होते कीं देव हा पाठमोरा झाला होता : संदेशाचा आत्मा थांबला होता; इस्राएल रोमी लोकांच्या हातात दास्यांत पडले होते. आणि इस्राएलातील सर्व भक्तिमान लोक देवाच्या भेटीची प्रतीक्षा करीत होते. लूक आम्हांला सांगतो कीं आणखी एक वृद्ध पुरुष, भक्तिमान शिमोन, होता जो “इस्राएलाच्या सांत्वनाची वाट पाहत होता” (लूक 2:25). त्याचप्रमाणें, प्रार्थनाशील हन्ना ही देखील “यरूशलेमेच्या मुक्ततेची वाट पाहत” होती (लूक 2:38).

हे मोठ्या आशेनें भरलेलें दिवस होते. जिची ते दीर्घकाळ प्रतीक्षा करित आलें होते ती देवाची भेट आता घडून येणार होती – कोणीही अपेक्षा केली नव्हती अशाप्रकारे तो खरोखर येण्याच्या मार्गावर होता.

2 दिसम्बर : सृष्टिकर्ता को जानना

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2 दिसम्बर : सृष्टिकर्ता को जानना
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“सच्‍ची ज्योति जो हर एक मनुष्य को प्रकाशित करती है, जगत में आने वाली थी। वह जगत में था, और जगत उसके द्वारा उत्पन्न हुआ, और जगत ने उसे नहीं पहचाना।” यूहन्ना 1:9-10

यद्यपि चारों सुसमाचार प्रभु यीशु मसीह के जीवन का विवरण देने के लिए भिन्न-भिन्न दृष्टिकोण अपनाते हैं, फिर भी उनका उद्देश्य एक ही है: जैसा कि यूहन्ना लिखता है, “तुम विश्वास करो कि यीशु ही परमेश्वर का पुत्र मसीह है, और विश्वास करके उसके नाम से जीवन पाओ” (यूहन्ना 20:31)। ये वचन उसके सुसमाचार के अन्त के निकट आते हैं और यह उसके आरम्भिक पाठकों को यह स्मरण दिलाने के लिए लिखे गए थे कि परमेश्वर ने अनुग्रहपूर्वक पहल की, ताकि हम उसे जानें और उससे प्रेम करें।

यद्यपि यीशु उस संसार का सृष्टिकर्ता था जिसमें वह आया, फिर भी संसार ने उसे नहीं पहचाना। वह स्वर्ग से मनुष्य के रूप में पृथ्वी पर उतरा, नगरों की गलियों में चला-फिरा, और हमारे बीच वास किया, ताकि हम उसके साथ ज्योति में जीएँ और अनन्तकाल के लिए अन्धकार में न पड़े रहें। परन्तु आज भी, जैसे दो हज़ार वर्ष पूर्व था, बहुत से लोग इस संसार में मसीह द्वारा प्रदान किए गए जीवन के महानतम वरदान को नहीं समझते, और इस कारण वे उस अनन्त जीवन को भी खो देते हैं, जिसे मसीह ने हमें देने के लिए जन्म लिया, क्योंकि वे उसे नहीं जानते।

प्रेरित पौलुस ने अपनी प्रभावशाली पुस्तक रोमियों में लिखा कि परमेश्वर के “अदृश्य गुण, अर्थात् उसकी सनातन सामर्थ्य और परमेश्वरत्व, जगत की सृष्टि के समय से उसके कामों के द्वारा देखने में आते हैं” (रोमियों 1:20)। अर्थात्, सामान्य अनुग्रह के कारण सृष्टि में इतना प्रमाण विद्यमान है कि मनुष्य कम से कम एक सच्चे परमेश्वर के अस्तित्व को स्वीकार कर सके। इसलिए मनुष्य “निरुत्तर हैं” (रोमियों 1:20)।

किन्तु इस सन्दर्भ में भी पौलुस आगे कहता है कि “परमेश्वर को जानने पर भी उन्होंने परमेश्वर के योग्य बड़ाई और धन्यवाद न किया, परन्तु व्यर्थ विचार करने लगे, यहाँ तक कि उनका निर्बुद्धि मन अन्धकारमय हो गया” (रोमियों 1:21)। वे परमेश्वर के अस्तित्व से अवगत थे, परन्तु उन्होंने उस सत्य को दबा दिया, और प्रभु और उद्धारकर्ता के रूप में उसे जानने से इनकार कर दिया।

यह हमारे लिए एक विनम्रतापूर्ण चेतावनी है। यदि हम परमेश्वर को उसका यथोचित सम्मान और महिमा नहीं देते, तो हम इस तथ्य को भूलने का जोखिम उठाते हैं कि वह आज भी प्रेमपूर्वक और अनुग्रह से हमारी खोज करता है।

पश्चिमी संसार में प्रभु यीशु का वचन, सत्य और कथा सदियों से उपलब्ध हैं—फिर भी, यहाँ के लोग यह पहचाने बिना अपना जीवन जीते रहते हैं कि यीशु वास्तव में कौन है। विश्वासी भी इस दशा से बचे हुए नहीं है; वे ऐसे जीवन जीते हैं जिनमें रविवार की आराधना या सुबह की भक्ति को छोड़कर और कहीं कोई चिह्न नहीं दिखता कि वे प्रभु और उद्धारकर्ता यीशु को जानते हैं। कल्पना करें कि यदि हम हर क्षण यह स्मरण रखते कि वही हमारे भीतर का प्रकाश और नया जीवन है, कि वही हमें अनन्तकाल परमेश्वर के साथ बिताने के योग्य बनाता है, कि वही हमारा महान प्रभु और दीन उद्धारकर्ता है और उसे जानना सबसे मूल्यवान है, तो इससे हमारे जीवन में कितना अधिक अन्तर आ जाता।

1 कुरिन्थियों 1:18-31

पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: 2 इतिहास 28–29; लूका 10:1-24 ◊