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19 अक्तूबर : चुप्पी और दुख

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19 अक्तूबर : चुप्पी और दुख
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“अय्यूब के इन तीन मित्रों ने इस सब विपत्ति का समाचार पाया जो उस पर पड़ी थीं। तब वे . . . अपने-अपने यहाँ से उसके पास चले . . . वे सात दिन और सात रात उसके संग भूमि पर बैठे रहे, परन्तु . . . किसी ने उससे एक भी बात न कही . . . तब तेमानी एलीपज ने कहा, ‘यदि कोई तुझसे कुछ कहने लगे, तो क्या तुझे बुरा लगेगा? परन्तु बोले बिना कौन रह सकता है?” अय्यूब 2:11, 13; 4:1-2

अय्यूब के दोस्तों ने हमें यह दिखाया कि जब कोई व्यक्ति गहरे दर्द और शोक से गुजर रहा हो, तो हमें कैसे प्रतिक्रिया देनी चाहिए—और फिर उन्होंने यह भी दिखाया कि हमें क्या नहीं करना चाहिए।

अय्यूब के दोस्तों को उसके दुखों का साक्षी बनने का अवसर मिला था, और वे उसे अपने शब्दों से कोई सान्त्वना नहीं दे पाए थे। उनका अन्तिम प्रत्युत्तर पूरी तरह से शाब्दिक था और बहुत अप्रभावी था।

यदि हमें सामने वाले व्यक्ति के जैसा अनुभव नहीं हुआ है या हमने उसे अच्छे से सुनने और परमेश्वर से विनम्रता से प्रार्थना करने में समय नहीं बिताया है, तो दुख भोग रहे उस व्यक्ति के बारे में टिप्पणी करना या उसे सलाह देना बहुत खतरनाक हो सकता है। अय्यूब 16 में इन दोस्तों को “मूर्खता भरी सान्त्वना देने वाले” कहा गया है—जो अय्यूब के खिलाफ “बातें जोड़ सकते थे” और जिनके शब्दों का अन्त नहीं था (16:4)। अय्यूब के दुख का तुरन्त इलाज और त्वरित उत्तर पाने की कोशिश करते हुए उसके दोस्तों ने उस पर आरोपों की बौछार कर दी। विशेष रूप से सोपर ने अय्यूब को यह याद दिलाया कि उसके साथ इस समय जो कुछ हुआ था, वास्तव में उसके साथ इससे भी बुरा होना चाहिए था (अय्यूब 11:4-6)।

इसी प्रकार, एलीपज ने यह सुझाव दिया कि शायद अय्यूब परमेश्वर से भटक गया था और उसे परमेश्वर से अधिक सावधानी से सुनने की आवश्यकता थी (22:21-23)। इन पुरुषों ने अय्यूब के दुख के लिए एक अत्यधिक सरल दृष्टिकोण अपनाया—एक ऐसा दृष्टिकोण जो उपचार करने के बजाय और भी पीड़ादायी था। वे अय्यूब के प्रत्येक विलाप का उत्तर देने के लिए तत्पर थे। जब एलीपज ने पहली बात बोली और पूछा, “बोले बिना कौन रह सकता है?” तो उसे स्वयं को यह उत्तर देना चाहिए था, “मैं!”

अय्यूब ने उनके परामर्श के तरीके पर तीखा प्रहार किया: “तुम लोग झूठी बात के गढ़ने वाले हो; तुम सबके सब निकम्मे वैद्य हो। भला होता कि तुम बिलकुल चुप रहते, और इससे तुम बुद्धिमान ठहरते!” (अय्यूब 13:4-5)। और वास्तव में, उसके दोस्तों ने आरम्भ में ठीक यही किया था। वे एक सप्ताह तक बिना कुछ बोले उसके पास बैठे रहे थे।

दुख के अनुभव में, पीड़ित के सामने मौन रहना अक्सर बहुत शब्दों से कहीं अधिक सहायक होता है। यह पूरी सम्भावना है कि यदि उसके दोस्त अपनी प्रारम्भिक प्रतिक्रिया बनाए रखते—उसके पास चुपचाप बैठे रहते—तो अय्यूब को अधिक आराम और साथ मिल सकता था।

मौन अक्सर हमारे दुखों के प्रति प्रतिक्रिया में गायब रहने वाला तत्व होता है। जबकि यह निश्चित रूप से एकमात्र आवश्यक प्रतिक्रिया नहीं है, तौभी इसके महत्त्व को बहुत कम आंका जाता है। यदि हम बिना किसी उद्देश्य के अपने चारों ओर के शोर से अलग हो जाएँ और पीड़ितों की आवाज़ों को सुनने का प्रयास करें, तो हम मौन चिन्तन में इतनी अधिक प्रगति कर सकते हैं, जितनी हमने कल्पना भी नहीं की होगी। और तब हमारे पास कहने के लिए बहुत अधिक उपयोगी बातें हो सकती हैं, और हमें पता होगा कि हमें क्या कहना है और कैसे कहना है। अय्यूब निश्चित रूप से ऐसा ही सोचता था। क्या इस सप्ताह कोई ऐसा व्यक्ति है जिसे आप अपनी शान्त उपस्थिति से आशीषित कर सकते हैं?

भजन 42 – 43

पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: 1 शमूएल 17–18; 2 पतरस 2 ◊

19 October : प्रितीचा महान आनंद

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19 October : प्रितीचा महान आनंद
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कोणी कधी आपल्या देहाचा द्वेष केलेंला नाहीं; तर तो त्याचे पालनपोषण करतो; जसे ख्रिस्तही मंडळीचे पालनपोषण करतो तसे तो करतो, कारण आपण ख्रिस्ताच्या शरीराचे अवयव आहोत. (इफिस 5:29-30)

ती शेवटची अभिव्यक्ती चुकवू नका : “कारण आपण ख्रिस्ताच्या शरीराचे अवयव आहोत.” आणि पौलाने अगदी दोन वचनांपूर्वी जे म्हटलें ते विसरू नका, ते हे कीं ख्रिस्तानें स्वतःस आपल्यासाठीं समर्पण केलें, अशासाठीं कीं “गौरवयुक्त मंडळी अशी ती स्वतःला सादर करावी.” अशाप्रकारे पौल ही गोष्ट दोन वेगवेगळ्या पद्धतीने मांडून हे स्पष्ट करतो कीं ख्रिस्तानें आपल्या लोकांना पवित्र करून, त्यांना सुशोभित करून व त्यांना आपला आनंद देऊन स्व:ताचा आनंद साध्य केला आहें.

ख्रिस्त आणि त्याची वधू यांच्यातील नाते इतके घनिष्ठ आहे (“एकदेह”) कीं तो जे काहीं चांगले तिच्यासाठीं करतो ते जणू त्यानें स्वतःसाठीं केलेंले सत्कर्म ठरते. याचा अर्थ असा कीं, परमेश्वर आपल्या वधूचे पालनपोषण, भरण-पुरण, पवित्रीकरण आणि शुद्धीकरण करण्यास प्रवृत्त होतो ते यासाठीं कारण यातच त्याचा आनंद आहे असेच हा शास्त्रपाठ स्पष्टपणें अभिव्यक्त करत आहे.

आपण जर काहीं लोकांच्या व्याख्यांवर दृष्टि टाकली, तर त्यांच्यामते ही प्रीति असू शकत नाहीं. ते म्हणतांत, प्रीति ही स्वार्थ शोधापासून मुक्त असली पाहिजे – विशेषतः जशी प्रीति ख्रिस्तानें केलीं ती, विशेषत: कॅल्व्हरी वर प्रकट झालेंलीं प्रीति. प्रीतिची अशी व्याख्या जी पवित्र शास्त्राच्या या पाठाबरोबर सुसंगत होईल, मी कधीही पाहिली नाहीं.

तरीही ख्रिस्त आपल्या वधूसाठीं जे करतो, ती प्रीति आहे असे हा शास्त्रपाठ स्पष्टपणें उघड करतो : “पतींनो, जशी ख्रिस्ताने मंडळीवर प्रीति केलीं तशी तुम्हींही आपापल्या पत्नीवर प्रीति करा. . . (इफिस 5:25). प्रीतिची व्याख्या नीतीशास्त्र किंवा तत्त्वज्ञान यांच्या मदतीने करण्याऐवजी आपण ह्या शास्त्रपाठालाच प्रीतिची व्याख्या करूं दिलीं तर? या शास्त्रपाठानुसार, प्रीति म्हणजें आपल्या प्रेयसीच्या पवित्र आनंदातच ख्रिस्ताचा आनंदाचा शोध (म्हणजें ख्रिस्त त्याच्या वधूच्या शुद्धीकरणात आपला आनंद शोधतो).

तर मग, आत्मकेंद्रीत आनंद आपण प्रीतिपासून विभक्त करावा याचा कोणताही मार्ग नाहीं, कारण आत्मकेंद्रीत आनंद आणि स्वार्थ या दोन्हीं गोष्टीं वेगवेगळ्या आहें. स्वार्थ हा इतरांना तरवारीच्या धारेवर धरून स्वतःचा खाजगी आनंद शोधतो.

ख्रिस्ताच्या प्रीतिसारखी प्रीति ही इतरांच्या आनंदात आपला आनंद शोधते – त्यांना तरवारीच्या धारेवर धरून नाहीं. ही अशी प्रीति आहे जी आपल्या प्रेयसीच्या जीवनात आणि पवित्रतेमध्यें तिचा आनंद पूर्ण व्हावा म्हणून आपल्या प्रियकरासाठीं दुःख सहन करेल आणि मरणही सोसेल.

ख्रिस्ताने आम्हांवर अशीच प्रीति केलीं आणि आपणही एकमेकांवर अशीच प्रीति करावीं यासाठीं त्यानें आपल्याला पाचारण केलें आहें.

18 अक्तूबर : काम के लिए तैयारी

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18 अक्तूबर : काम के लिए तैयारी
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“इस कारण अपनी-अपनी बुद्धि की कमर बाँधकर, और सचेत रहकर, उस अनुग्रह की पूरी आशा रखो जो यीशु मसीह के प्रगट होने के समय तुम्हें मिलने वाला है।” 1 पतरस 1:13

पायलट बनने के प्रशिक्षण में घण्टों और कई घण्टों की कड़ी तैयारी की आवश्यकता होती है। इसमें से कुछ प्रशिक्षण सिमुलेटर्स में होता है, जहाँ दबाव इतना तीव्र होता है कि पसीना और तनाव उत्पन्न हो जाता है। पायलटों को ऐसा कठिन प्रशिक्षण क्यों दिया जाता है? ताकि वे तब सही निर्णय ले सकें, जब सच में वह जरूरी हो!

शुद्धता के सन्दर्भ में अक्सर ऐसा होता है कि लोग पाप में इसलिए फँस जाते हैं क्योंकि वे क्षणिक भावनाओं के प्रभाव में महत्त्वपूर्ण निर्णय लेने की कोशिश करते हैं। इससे काम नहीं बनेगा। यदि हमें शुद्धता बनाए रखनी है, तो हमें पहले से और परमेश्वर के वचन के आधार पर निर्णय लेने होंगे।

इसीलिए पतरस हमें “अपनी-अपनी बुद्धि की कमर बाँधकर, और सचेत रहकर” तैयार रहने को कहता है। किंग जेम्स संस्करण में इस पद का अनुवाद इस प्रकार किया गया है: “अपने मन की कमर कस लो।” दूसरे शब्दों में, हमें अपने मन पर नियन्त्रण रखना है—अपने विचारों की प्रक्रिया को समझना है—ताकि हम अच्छाई का पीछा कर सकें और बुराई से दूर भाग सकें।

यदि हम अपनी बुद्धि की कमर बाँधकर सचेत नहीं रहते, तो हम आसानी से बहक सकते हैं और दुर्घटनाओं के शिकार हो सकते हैं। हम आमतौर पर कठिन और जीवन बदलने वाले निर्णयों को उस गरम माहौल में लेंगे, जब हमारी भावनाएँ सक्रिय होंगी और हमारी इच्छाएँ हमें चिल्लाकर बुला रही होंगी। लेकिन शुद्धता का जीवन आकस्मिक नहीं होता; यह परमेश्वर के आत्मा द्वारा प्रेरित पूर्ण संकल्प का कार्य होता है, जो उसके वचन द्वारा मार्गदर्शन पाता है और उसकी शक्ति से सक्षम होता है।

हमें शुद्धता के प्रति एक दृढ़ संकल्प करने की आवश्यकता है, जैसे भजनकार ने कहा, “मैं ने शपथ खाई, और ठान लिया है, कि मैं तेरे धर्ममय नियमों के अनुसार चलूँगा” (भजन 119:106)। बहुत देर होने से पहले अपना संकल्प कर लें।

एक सुझाव इस प्रकार है कि किस प्रकार का संकल्प लिया जाना चाहिए: संकल्प करें कि आप संकीर्ण मार्ग के मध्य में चलेंगे, किनारे पर नहीं। नीतिवचन 7 में उस युवक की तरह न बनें जो “पराई स्त्री” के प्रलोभन का शिकार हुआ था। वह किनारे पर चल रहा था; वह “उस स्त्री के घर के कोने के पास की सड़क पर चला जाता था, और उसने उसके घर का मार्ग लिया” (नीतिवचन 7:5, 8-9)। बाइबल का सन्देश स्पष्ट है: गलत समय और गलत स्थान पर न फँसे।

शुद्धता के मामले में किनारे पर रहने से कुछ हासिल नहीं होता। प्रलोभन आने से पहले अपना संकल्प कर लें, ताकि जब बुरे दिन आएँ, तो आप कह सकें, “नहीं, मैंने पहले ही यह निर्णय ले लिया था।” अपने जीवन को संकीर्ण मार्ग के मध्य में रखें और वहाँ बने रहने का संकल्प लें। जिस दिन मसीह यीशु लौटेगा और उसके लोग उसके सिंहासन के चारों ओर खड़े होंगे, हममें से कोई नहीं कहेगा कि पवित्रता के मार्ग पर चलना निरर्थक था।

नीतिवचन 7

◊ पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: 1 शमूएल 15–16; 2 पतरस 1

18 October : विवाहाचा येशूचा आनंद

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18 October : विवाहाचा येशूचा आनंद
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पतींनो, जशी ख्रिस्ताने मंडळीवर प्रीति केलीं तशी तुम्हींही आपापल्या पत्नीवर प्रीति करा; ख्रिस्ताने मंडळीवर प्रीति केलीं आणि स्वतःस तिच्यासाठीं समर्पण केलें, अशासाठीं कीं, तिला त्यानें वचनाद्वारे जलस्नानाने स्वच्छ करून पवित्र करावे, आणि गौरवयुक्त मंडळी अशी ती स्वतःला सादर करावी, म्हणजें तिला डाग, सुरकुती किंवा अशासारखे काही नसून ती पवित्र व निर्दोष असावी. (इफिस 5:25-27)

वैवाहिक जीवनात इतकीं दुःखें येतांत ते ह्यामुळें नाहीं कीं पती-पत्नी आपापल्या सुखाच्या शोधांत असतांत, तर ती ह्यामुळें कीं ते आपलें सुख आपल्या जोडीदाराच्या सुखामध्यें शोधत नाहींत. पती-पत्नींना बायबलची आज्ञा ही आहे कीं तुम्हीं तुमच्या जोडीदाराच्या आनंदातच तुमचा स्वतःचा आनंद शोधावा.

इफिस 5:25-30 मध्यें वैवाहिक जीवनाविषयी जो शास्त्रपाठ आहे त्यापेक्षा बायबलमध्यें इतरत्र क्वचितच अशा पूर्णानंदाला संबोधित करणारा शास्त्रपाठ असेल. जशी ख्रिस्ताने मंडळीवर प्रीति केलीं तशी पतींनीही आपापल्या पत्नीवर प्रीति करावी असे त्यांना येथें सांगण्यांत आलें आहें.

त्यानें मंडळीवर कशी प्रीति केलीं? वचन 25 म्हणते कीं त्यानें “स्वतःस तिच्यासाठीं समर्पण केलें.” पण का? वचन 26 म्हणते, “अशासाठीं कीं, तिला त्यानें वचनाद्वारे जलस्नानाने स्वच्छ करून पवित्र करावे.” पण त्याला असं का करावें लागलें? वचन 27 उत्तर देते, “गौरवयुक्त मंडळी अशी ती स्वतःला सादर करावी!”

आहाहा! येथें मूळ आहे! “जो आनंद त्याच्यापुढे होता त्याकरता त्यानें लज्जा तुच्छ मानून वधस्तंभ सहन केला” (इब्री 12:2). कसला आनंद? मंडळी, जी त्याची वधू आहे, तिजबरोबर विवाहाचा आनंद. रक्ताने विकत घेतलेली गौरवयुक्त मंडळी अशी ती स्वतःला सादर करावी हा आनंद.

डाग, सुरकुती किंवा अशासारखे काही असलेली पत्नी स्वतःला सादर करावी असा येशूचा हेतू नव्हतां. म्हणून, तो आपल्या विवाहितेला पवित्र करण्यासाठीं आणि शुद्ध करण्यासाठीं मरण पत्करण्यास तयार झाला जेणेंकरून तो गौरवयुक्त मंडळी अशी ती स्वतःला सादर करू शकेल. त्यानें आपल्या वधूच्या कल्याणासाठीं दुःख सोसून व स्वतःस तिच्यासाठीं समर्पण करून आपला मनोरथ पूर्ण केला.

मग पौल ख्रिस्ताने जे केलें ते 28-30 या वचनांमध्यें पतींवर लागू करतो: “त्याचप्रमाणें पतींनी आपापली पत्नी आपलेच शरीर आहे असे समजून तिच्यावर प्रीति करावी. जो आपल्या पत्नीवर प्रीति करतो तो स्वतःवरच प्रीति करतो. कोणी कधी आपल्या देहाचा द्वेष केलेंला नाहीं; तर तो त्याचे पालनपोषण करतो; जसे ख्रिस्तही मंडळीचे पालनपोषण करतो तसे तो करतो. कारण आपण ख्रिस्ताच्या शरीराचे अवयव, [त्याच्या हाडामांसाचे] आहोत.”

येशूनें पती-पत्नींना – आणि इतर सर्वांना – “जशी आपणावर तशी आपल्या शेजाऱ्यावर प्रीति कर” असे म्हटलें होते (मत्तय 22:39). वैवाहिक जीवन ही आज्ञा पाळण्याचे अद्भुत स्थान आहे. ही आज्ञा फक्त असे म्हणत नाहीं कीं “जेव्हां” तुम्हीं स्वतःवर प्रीति करतां. तर तुम्हीं स्वतःवर प्रीति करतच आहात. जेव्हा तुम्हीं त्या व्यक्तीवर प्रीति करता जिच्याशी देवानें तुम्हाला एक-देह बनवले आहे, तेव्हा तुम्हीं स्वतःवर प्रीति करता. म्हणजेंच, तुम्हीं तुमच्या जोडीदाराच्या सर्वात मोठ्या आनंदाच्या शोध घेऊनच तुमचा सर्वात मोठा आनंद प्राप्त करून घेतां.

17 अक्तूबर : हमारा धैर्यवान शिक्षक

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17 अक्तूबर : हमारा धैर्यवान शिक्षक
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“पर यह बात उन की समझ में नहीं आई, और वे उससे पूछने से डरते थे।” मरकुस 9:32

कल्पना कीजिए एक छात्रा कक्षा में बैठी हुई है, बोर्ड पर लिखे एक सूत्र को घूर रही है। उस सूत्र के चिह्न उसके लिए पूरी तरह से अर्थहीन हैं, लेकिन वह समझने के उद्देश्य से प्रश्न पूछने के लिए हाथ उठाने से डर रही है। हममें से कई लोगों ने शायद ऐसा अनुभव किया होगा या ऐसी किसी स्थिति में फँस गए होंगे, जहाँ एक ओर हमें यह डर था कि कहीं हम मूर्ख न समझे जाएँ या उत्तर हमें ऐसी दिशा में न ले जाए जहाँ हम नहीं जाना चाहते, और दूसरी ओर हम यह जानने थे कि यदि हमने नहीं पूछा, तो हम इस उलझन में फँसे रहेंगे।

यद्यपि यीशु के शिष्य यीशु के साथ रहते थे, उसके उपदेश सुनते थे, उसकी शिक्षाएँ ग्रहण करते थे, और उसके अद्‌भुत कार्यों के साक्षी बनते थे, फिर भी वे उसके सेवाकार्य की पूरी तस्वीर को समझने में संघर्ष करते रहे। यीशु ने कई बार बहुत स्पष्ट रूप से बताया कि उसके साथ क्या होने वाला था—उससे विश्वासघात, मृत्यु, और पुनरुत्थान। फिर भी शिष्य सबसे कठिन स्थिति में थे: “वे इस बात को समझ न सके और उससे पूछने से डरते थे।”

पतरस, याकूब, और यूहन्ना ने अभी-अभी यीशु का रूपान्तरण देखा था (मरकुस 9:2-8)। वे जानते थे कि वह परमेश्वर का पुत्र है। फिर भी शिष्यों में यीशु को मसीह मानने की जो गम्भीरता थी, वह इस समझ से मेल नहीं खाती थी कि वास्तव में उसके मसीह होने का क्या अर्थ था। मसीह के प्रति उनकी धारणा धुंधली और अधूरी थी, जिससे उनके भीतर भ्रम और भय उत्पन्न हुआ। शायद उन्होंने यीशु से और स्पष्टीकरण इसलिए नहीं माँगा क्योंकि वे अपनी अज्ञानता को स्वीकार नहीं करना चाहते थे; या फिर इसलिए, क्योंकि वे उन बातों के परिणामों का सामना करने के लिए तैयार नहीं थे, जो यीशु उन्हें बता रहा था—न तो उसके स्वयं के लिए (पद 30-31) और न ही उनके लिए (8:34-35)।

यहाँ तक कि यीशु की मृत्यु और पुनरुत्थान के बाद भी इम्माऊस के मार्ग पर दो शिष्यों को यीशु ने पूरी बाइबल के घटनाक्रमों के द्वारा फिर से सब कुछ समझाया ताकि वे उसके दुखों को समझ जाते और इन बातों का अर्थ समझ पाते (लूका 24:26-27)। यीशु के स्वर्गारोहण के ठीक पहले तक भी शिष्य मसीह के राज्य के स्वरूप को लेकर असमंजस में थे। इस बार उन्होंने यीशु से प्रश्न पूछा और यीशु ने उन्हें यह नहीं कहा, फिर वही सवाल? “तुम एक ही सवाल कितनी बार पूछोगे?” बल्कि उसने नम्रता और कृपा से समझाया कि उसका राज्य यरूशलेम के मन्दिर की पुनः स्थापना से नहीं आएगा, बल्कि प्रत्येक शिष्य में होने वाले पवित्र आत्मा के कार्य के द्वारा फैलेगा (प्रेरितों 1:8)।

शायद आप स्वयं को भी इन शिष्यों के स्थान पर पाते हैं, जहाँ परमेश्वर के वचन को पूरी तरह समझना आपको कठिन लग रहा है, या आपने जो थोड़ा सा समझा है, उसके निहितार्थों से आपको डर लग रहा है। लेकिन यह डर का विषय नहीं है। यह कितना अच्छा है कि यीशु एक कोमल और धैर्यवान शिक्षक है—जैसे वह अपने शिष्यों के साथ धैर्य रखता था, वैसे ही वह हमारे साथ भी धैर्य रखता है। और यह भी कितनी अच्छी बात है कि पवित्र आत्मा आपके भीतर निवास करता है और आपको वही सब करने का सामर्थ्य देता है जिसके लिए प्रभु ने आपको बुलाया है (यहेजकेल 36:26-27; गलातियों 5:16)। इसलिए आज यदि आपको बुद्धि और समझ की कमी महसूस हो रही हो, तो बस परमेश्वर से माँगें—“जो बिना उलाहना दिए सब को उदारता से देता है” (याकूब 1:5)।

1 कुरिन्थियों 2:1-16

पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: 1 शमूएल 13–14; इफिसियों 6 ◊

17 October : संपत्तीचा उद्देश

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17 October : संपत्तीचा उद्देश
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चोरी करणार्‍याने पुन्हा चोरी करू नये; तर त्यापेक्षा गरजवंताला देण्यास आपल्याजवळ काही असावे म्हणून जे चांगले ते आपल्या हातांनी करून उद्योग करत राहावे. (इफिस 4:28)

भौतिक वस्तुं मिळवून समृद्धीत कसे जगायचे याचे तीन विकल्प आहेत : (1) तुम्हीं त्यां भौतिक वस्तुं मिळविण्यासाठीं चोरी करूं शकतां; (2) किंवा तुम्हीं त्यां मिळविण्यासाठीं आपल्या हातांनी काहीं कष्ट करूं शकतां; (3) किंवा गरजवंताला देण्यास आपल्याजवळ काहीं असावे म्हणून  तुम्हीं उद्योग करूं शकतां.

ख्रिस्ती विश्वासाचा अंगीकार करणारे बरेंच लोक दुसऱ्या क्रमांकाचा विकल्प घेऊन आपापलें जीवन जगतांत. आम्हांला चोरी करण्यापेक्षा किंवा उसने पैसे मागत भिकाऱ्याचे जीवन जगण्यापेक्षा स्वतः कष्ट करायला आवडते आणि आपण चोरी केलीं नाहीं व कोणाकडून उसने पैसे घेतलें नाहीं आणि प्रामाणिकपणें दिवसाचा सदुपयोग केला असा विचार करून आपल्याला काहींतरी कर्तव्यतत्पर कृती केल्याची भावना जाणवते. असे वाटणें म्हणजें काही वाईट गोष्ट नाहीं. आपल्या हातांनी काहीं उद्योग करणें हे चोरी करण्यापेक्षा किंवा “उधार कीं ज़िन्दगी” जगण्यापेक्षा कधीही चांगलेच आहे. पण प्रेषित आपल्याला हे असे स्वतःपुरते जीवन जगण्याचे आव्हान करित नाहींये.

मानव संस्कृतीतील जवळजवळ सर्वच बळें आपल्याला वरील तीनपैकीं दोन स्तरावर जीवन जगण्याचे आव्हान करतांत : मिळकतीसाठीं आपल्या हातांनी काहीं उद्योग करा. परंतु बायबल आपल्याला सातत्यानें तिसऱ्या स्तरावर आणून सोडते : गरजवंतांना देण्यास आपल्याजवळ काही असावें म्हणून उद्योग करणें. “सर्व प्रकारची कृपा तुमच्यावर विपुल होऊ देण्यास देव समर्थ आहे; ह्यासाठीं कीं, तुम्हांला सर्व गोष्टींत सगळा पुरवठा नेहमी होऊन प्रत्येक चांगल्या कामासाठीं सर्वकाही तुमच्याजवळ विपुल व्हावे” (2 करिंथ 9:8).

देव आपल्याला सर्व गोष्टींचा विपुल पुरवठा का करतो? यासाठीं कीं आपल्या उपजीविकेसाठीं आपल्याकडे पुरेसे असावें, आणि त्या नंतर उर्वरित सर्व प्रकारच्या चांगल्या कामांसाठीं आपण देण्यांस समर्थ व्हावें, जेणेंकरून आध्यात्मिक आणि शारीरिक दुःख दूर होतील – म्हणजें क्षणिक आणि सार्वकालिक दु:खे. आमच्यासाठीं पुरेसे; इतरांसाठीं विपुल.

मुद्दा हा नाहीं कीं एखादी व्यक्ती किती कमावते. मोठ-मोठे उद्योग आणि भरपूर पगार हे आपल्या काळातील सत्य आहे आणि हे वाईटच आहेत असे नाहीं. वाईट आहे ते हा विचार करून स्वतःची फसवणूक करणें कीं आपल्याला इतका मोठा पगार मिळावा कीं आपण एक आलिशान जीवनशैली जगूं शकूं.

आपण देवाची कृपा इतरांपर्यंत वाहवत न्यावीं म्हणून देवानें आपल्याला त्याच्या कृपेच्या नलिका बनवलें आहे. पण नलिका ह्या सोन्याने मढलेल्यां असाव्यांत असा विचार करणें दुर्दैवच. नाहीं, त्यां सोन्याने मढलेल्यां नसाव्यांत. साधे पीव्हीसी (पॉलीविनाइल क्लोराईड) पाईप पुरे आहेंत.  पीव्हीसी पाईप टिकाऊपणा आणि अष्टपैलूपणामुळें इतरांना विपुल पुरवठा करूं शकतात. आणि आनंद देणारा विपुल आशीर्वाद हा आपण कसे देतो ह्यांत आहे (प्रेषित 20:35).

16 अक्तूबर : अपने मुँह की चौकसी करो

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16 अक्तूबर : अपने मुँह की चौकसी करो
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“जो अपने मुँह की चौकसी करता है, वह अपने प्राण की रक्षा करता है, परन्तु जो गाल बजाता है उसका विनाश हो जाता है।” नीतिवचन 13:3

प्युरिटन थॉमस ब्रूक्स ने एक बार लिखा था, “हम धातुओं को उनकी छनकार से पहचानते हैं, और लोगों को उनके बोलने से।”[1]

शब्द कभी तटस्थ नहीं होते। हमारे द्वारा बोले जाने वाले प्रत्येक शब्द को परमेश्वर सुनता है—हमारे जीवन उनके सामने उजागर हैं, और बाइबल में यह अद्वितीय क्षमता है कि वह हमारे दिलों के गहरे कोनों तक पहुँचकर उसे भी परख सकती है जिसे हम खुद से और दूसरों से छिपाना चाहते हैं।

जो शब्द लोगों द्वारा हमसे बोले जाते हैं, उनकी छाप हमारी स्मृति में छप जाती है। शायद हम एक बच्चे द्वारा बोले गए पहले शब्दों की खुशी पर विचार करते हैं या फिर एक दोस्त के दर्दनाक शब्दों की कड़वाहट को महसूस करते हैं। बचपन से ही हम यह सीख जाते हैं कि हानि पहुँचाने के लिए या खुशी दिलाने के लिए शब्दों का उपयोग कैसे किया जाता है। राजा सुलैमान ने सही कहा था: “जीभ के वश में मृत्यु और जीवन दोनों होते हैं” (नीतिवचन 18:21)।

हम सभी पाप में पतन के शिकार हैं। इसलिए चोट पहुँचाने वाले शब्द बड़ी आसानी से हमारे मुँह से निकल आते हैं। वे एक तलवार के अनियन्त्रित प्रहार के समान बड़े घातक हो सकते हैं और जब हम सुनने से पहले उत्तर दे देते हैं, तो हमारे शब्द बड़े लापरवाही से भरे हो सकते हैं। कभी-कभी हम बस जरूरत से ज्यादा बोल जाते हैं; और परिणामस्वरूप हम ऐसी बातें कह देते हैं जो हमें अपने तक ही रखनी चाहिए थीं। शब्द किसी पड़ोसी को नष्ट कर सकते हैं, किसी मित्र की भावनाओं को आहत कर सकते हैं, और हमारे सम्बन्धों में आग लगा सकते हैं। एक गलत शब्द किसी के चरित्र को बिगाड़ सकता है, किसी की प्रतिष्ठा को धूमिल कर सकता है, या किसी और के जीवन की उपयोगिता को लम्बे समय तक नुकसान पहुँचा सकता है। हम यह सब जानते हैं, फिर भी अपने मुँह पर नियन्त्रण रखना हमारे लिए कितना कठिन होता है। कितनी बार हम तब मुँह बन्द करते हैं जब बहुत देर हो चुकी होती है—जब हम पहले ही उसे जरूरत से ज्यादा खोल चुके होते हैं और खुद को या दूसरों को नुकसान पहुँचा चुके होते हैं।

यदि हम सचमुच अपनी जीभ की असफलताओं के बारे में ईमानदार होते, तो हम एक-दूसरे के प्रति बहुत अधिक सहनशील होते। और परमेश्वर की मदद से हम अपने मुँह की रक्षा करने और विनाशकारी शब्दों को हटाने में और अधिक गम्भीर होते। यह हमारे दोस्तों, परिवार और पड़ोसियों के लिए अनुग्रह का कितना सुन्दर प्रदर्शन होता! यीशु ही एकमात्र सिद्ध व्यक्ति है; उसने अपने शब्दों से कभी पाप नहीं किया (याकूब 3:2)। यदि हम इस पहलू में उसके जैसे बनने का प्रयास करें, तो शायद लोग इस बात पर चकित होंगे कि उसके होंठों से कैसे करुणा, कोमलता और दयालुता से भरे शब्द निकलते थे (लूका 4:22)।

यद्यपि आपके शब्द और कार्य स्वयं में स्वर्ग के द्वार पर आपके लिए कुछ प्राप्त नहीं कर सकते, फिर भी ये इस बात का प्रमाण हैं कि प्रभु यीशु मसीह में आपके विश्वास की घोषणा सच्ची है। अब ज़रा सोचिए, कैसा लगेगा जब आप इन शब्दों को गम्भीरता से लेना आरम्भ करेंगे: “हर एक मनुष्य सुनने के लिए तत्पर और बोलने में धीर और क्रोध में धीमा हो” (याकूब 1:19)?

  याकूब 3:2-12

◊ पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: 1 शमूएल 10–12; इफिसियों 5:17-33


[1] द कम्पलीट वर्क्स ऑफ थॉमस ब्रूक्स  में “दि अनसर्चेबल रिचेस ऑफ क्राईस्ट,” सम्पादक ऐल्क्ज़ेण्डर बालोख़ ग्रोज़ार्ट (जेम्स निकोल, 1866), खण्ड 3, पृ. 178.

16 October : परमेश्वर ईर्ष्यावान आहे याची भीती बाळगून आशा ठेवणें

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16 October : परमेश्वर ईर्ष्यावान आहे याची भीती बाळगून आशा ठेवणें
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“ज्याचे नाव ईर्ष्यावान आहे, तो परमेश्वर ईर्ष्यावान देव आहे.” (निर्गम 34:14)

देव त्याच्या नावाच्या प्रतिष्ठेसाठीं अफाट ईर्ष्यावान आहे, आणि तो अशा लोकांविरुद्ध भयंकर क्रोधाविष्ठ होऊन त्यांचा न्याय करतो ज्यांचे अंतःकरण त्याच्याठायीं असायला पाहिजे परंतु ते इतर गोष्टींच्या मागे जातांत, जशी कीं एक पत्नी आपला नवरा सोडून दुसऱ्या प्रियकराच्या मागे जाते.

उदाहरणार्थ, यहेज्केल 16:38-40 मध्यें तो विश्वास न ठेवणाऱ्या इस्राएलला म्हणतो,

“जारिणी व रक्तपाती स्त्रिया ह्यांचा न्याय करावा तसा मी तुझा न्याय करीन आणि क्रोधाने व ईर्ष्येने मी तुझा रक्तपात करीन. मी तुला त्यांच्या हाती देईन, म्हणजें ते तुझी कमानदार घरे उद्ध्वस्त करतील, तुझी उच्च स्थाने पाडून टाकतील; तुझी वस्त्रे हिरावून घेऊन व तुझे उंची जवाहीर काढून घेऊन तुला उघडीनागडी करून सोडतील. ते तुझ्याविरुद्ध मंडळी जमवून आणून तुला दगडमार करतील व आपल्या तलवारींनी तुला भोसकतील.”

तुम्हीं ह्या सावधगिरीच्या इशाऱ्याकडे आपलें कान लावावे अशी मी तुम्हांला विनंती करतो. तुमची समर्पित प्रीति आणि भक्ती यांसाठीं देवाची ईर्ष्या ही सदैव अंतिम दावा ठरते. ज्यां काहीं गोष्टीं तुम्हांला भ्रामक आकर्षण देऊन देवावरील तुमची प्रीति हिरावून घेतांत त्यां सर्व तुमच्यावर उठून तुम्हांला उद्ध्वस्त करतील.

देवानें तुम्हांला जे जीवन दिलें त्याचा उपयोग तुम्हीं त्या सर्वसमर्थाच्याच विरुद्ध व्यभिचार करण्यासाठीं करावा ही एक भयानक गोष्ट आहे.

परंतु तुमच्यांपैकीं जे खरोखर ख्रिस्ताशी एकरूप झालें आहेत ते तुम्हीं बाकीं सर्व गोष्टींचा त्याग करून केवळ त्याच्याशीच जडून राहण्याचे आणि त्याच्या प्रतिष्ठेसाठीं जीवन जगण्याचे आपलें वचन पाळतां त्यां तुम्हांसाठीं देवाची ईर्ष्या मोठे समाधान आणि मोठी आशा आहे.

कारण कीं देव त्याच्या नावाच्या प्रतिष्ठेसाठीं अफाट ईर्ष्यावान आहे म्हणून जे काहीं किंवा जो कोणी त्याच्या विश्वासू पत्नीच्या कल्याणासाठीं धोका निर्माण करतो ते सर्व ह्या सर्वसमर्थ देवाचा वैरी ठरते. देवाच्या विश्वासू पत्नीसाठीं, म्हणजें त्याच्या विश्वासू लोकांसाठीं हे शुभवृत्त आहे.

जारकर्म करणाऱ्या आणि आपलीं अं:तकरणने जगाला विकणाऱ्या व देवाबरोबर वैर ठेवणाऱ्या लोकांसाठीं देवाची ईर्ष्या विनाशकारी आहे (याकोब 4:3-4). परंतु जे लोक आपल्या कराराची शपथ पाळतात आणि आपण ह्या जगांत परके आणि प्रवासी आहों असे मान्य करतांत त्यांच्यासाठीं त्याची ईर्ष्या मोठे समाधान आहे.

15 अक्तूबर : चिरस्थाई शान्ति

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15 अक्तूबर : चिरस्थाई शान्ति
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“इसलिए हे भाइयो, जो जो बातें सत्य हैं, और जो जो बातें आदरणीय हैं, और जो जो बातें उचित हैं, और जो जो बातें पवित्र हैं, और जो जो बातें सुहावनी हैं, और जो जो बातें मनभावनी हैं, अर्थात् जो भी सद्‌गुण और प्रशंसा की बातें हैं उन पर ध्यान लगाया करो।” फिलिप्पियों 4:8

हम सभी परमेश्वर की शान्ति को जानने और उसकी उपस्थिति को महसूस करने के लिए लालायित रहते हैं। लेकिन परमेश्वर की शान्ति, जो हमारे हृदय और मन की रक्षा करती है (फिलिप्पियों 4:7), अपने आप नहीं आती।

यह स्वाभाविक रूप से नहीं आती। परमेश्वर की स्थाई शान्ति का अनुभव तभी होता है, जब हम अपने मनों को उन बातों पर केन्द्रित करते हैं जो उसे प्रसन्न करती हैं। इसलिए को शान्ति जानने के लिए सबसे पहले यह सवाल करें, “मुझे किस प्रकार से सोचना चाहिए?”

इस पद में पौलुस का उत्तर दिया गया है। वह हमें प्रोत्साहित करता है कि हम अपने विचारों के ढांचे को उन बातों पर आधारित करें जो श्रेष्ठ और सराहनीय हैं। इसी उद्देश्य से, वह हमें मसीही जीवन में विचारों के छः मूलभूत सद्‌गुणों की एक सूची प्रदान करता है।

पहला है सत्य। सबसे पहले हमें सत्य का कमरबन्द कसना है, ताकि हम परमेश्वर के अन्य अस्त्रों-शस्त्रों से लाभ उठा सकें (इफिसियों 6:14)। इसलिए यहाँ सत्य को प्रथम स्थान दिया गया है, जो मसीह में वस्तुनिष्ठ रूप से पाया जाता है और जिसे तब अनुभव किया जाता है, जब हम स्वयं को और दूसरों को सुसमाचार का प्रचार करते हैं।

दूसरा, पौलुस हमें “जो जो बातें आदरणीय हैं” की ओर निर्देशित करता है—या “उत्तम,” जैसा कि कुछ अनुवादों में है। हमें अपने विचारों को वैभव से भरपूर या प्रेरणादायक बातों पर केन्द्रित करना है, जो अनैतिक और सांसारिक बातों के उलट है। विश्वासियों के रूप में, हमें अपने मनों को तुच्छ मनोरंजन या उसके समान महत्त्वहीन बातों से नहीं भरना है, जिनके पीछे हमारा गैर-धार्मिक संसार पड़ा हुआ है। इसके बजाय, हमें ऐसी बातों पर मन लगाना है जो हमारी आत्मा को ऊपर की ओर, परमेश्वर और उनके महान कार्यों की ओर ले जाती हैं। तीसरे और चौथे स्थान पर, पौलुस हमें उचित और पवित्र बातों के आधार पर निर्णय लेने के लिए कहता है, न कि उन पर जो सुविधाजनक या सन्तोषजनक हो। यही वह सोच थी जिसने यूसुफ को दाऊद से उस समय अलग किया, जब उन्होंने एक जैसी परिस्थिति का सामना किया। जब पोतीपर की पत्नी यूसुफ के पीछे पड़ गई थी, तो उसने सही बात के आधार पर निर्णय लिया, न कि उस बात के आधार पर जो आसान या तात्कालिक रूप से सन्तोषजनक थी (उत्पत्ति 39:6-12)।

दूसरी ओर, दाऊद ने अपनी भावनाओं का अनुसरण किया और बतशेबा के साथ सोने और उसके पति की हत्या करके बड़ा अन्याय किया (2 शमूएल 11)। उद्धार प्राप्त कर लेने का अर्थ यह नहीं है कि अब हम अपने आप ही अधर्म से बच जाएँगे, जिसका आरम्भ मन में होता है और समापन पापी कार्यों में होता है। लेकिन उद्धार प्राप्त कर लेने के बाद जब हम उद्धार पाए हुए व्यक्ति के रूप में सोचते हैं, तब हम अधर्म से बचे रहते हैं। पाँचवें और छठे स्थान पर, “जो जो बातें सुहावनी हैं” और “जो जो बातें मनभावनी हैं” हमें उन पर ध्यान करना चाहिए—या जैसा कि किंग जेम्स संस्करण में है, उन पर जो “अच्छी प्रतिष्ठा” वाली बातें हैं। जब हम इस तरह से सोचते हैं, तो हम ऐसी बातों को सुनेंगे जो लोगों को बढ़ाती हैं, न कि ऐसी बातों को जो निन्दा करती हैं, निराश करती हैं, और नष्ट करती हैं। यह मानसिकता भाईचारे के प्रेम को बढ़ावा देती है और परमेश्वर के अनुग्रह के साथ चलती है जैसे वह हमारे जीवन में कार्य करता है।

पौलुस द्वारा दिए गए ढांचे के अनुसार अपने विचारों को ढालें और इसके साथ प्रार्थना अवश्य करें (फिलिप्पियों 4:6-8), तब आपके पास चिन्ता के लिए बहुत कम स्थान होगा, अर्थात उस मानसिकता के लिए जो शान्ति को घटाने वाली और आनन्द को नष्ट करने वाली होती है और अक्सर हमारे जीवन में चुपचाप घुस आती है। इसके बजाय, अपने मन को परमेश्वर के विचारों के अनुरूप प्रशिक्षित करें, और तब आप उसकी शान्ति और उपस्थिति का अधिक अनुभव कर पाएँगे।

भजन  119:97-104

पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: 1 शमूएल 7–9; इफिसियों 5:1-16 ◊

15 October : प्रार्थनेची योजना करा

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15 October : प्रार्थनेची योजना करा
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तुम्हीं माझ्यामध्यें राहिलात व माझी वचने तुमच्यामध्यें राहिली तर जे काही तुम्हांला पाहिजे असेल ते मागा म्हणजें ते तुम्हांला प्राप्त होईल. तुम्हीं विपुल फळ दिल्याने माझ्या पित्याचा गौरव होतो; आणि तुम्हीं माझे शिष्य व्हाल. . . . माझा आनंद तुमच्यामध्यें असावा व तुमचा आनंद परिपूर्ण व्हावा म्हणून मी तुम्हांला ह्या गोष्टी सांगितल्या आहेत.” (योहान 15:7-8,11)

प्रार्थना, या गोष्टीची जाणीव ठेऊन कीं आपल्यां प्रार्थनांच्या उत्तरस्वरूपांत आपण जे फळ देतो त्याद्वारे देवाचा गौरव होतो, येशूबरोबर फळदायक सहभागितेंत असलेल्या आनंदाचा शोध घेते. पण तरी, देवाची मुले आनंद देणाऱ्या ह्या फलदायी प्रार्थनेच्या अखंडित सवयी विकसित करण्यांत वारंवार का अपयशी ठरतात?

जर मी अति शहाणपण दाखविण्याची चूक करित नसेल, तर याची पुष्कळ कारणें असूं शकतांत आणि त्यांपैकीं एक म्हणजें आपल्याला प्रार्थना करण्यांत रस नसतो असे नाहीं, तर आपण तिची योजना करत नाहीं.

जर तुम्हांला चार आठवड्यांची सुट्टी घ्यायची असेल, तर तुम्हीं एक दिवस सकाळी-सकाळी उठून असे म्हणत नाहीं, “चला, आज ऑफिसला जाऊया!” त्यासाठीं तुमची तयारी नसते. तुम्हाला कुठे जायचे हे कळणार नाहीं. काहीही नियोजन केलेंलें नसते.

पण आपल्यांपैकीं बरेच लोक प्रार्थनेला असेच समजतांत. आपण प्रत्येक दिवशी उठतो आणि आपल्यां लक्षात येते कीं अरे, आपल्या जीवनाचा एक महत्वाचा भाग प्रार्थनेची ठराविक वेळ असायला पाहिजे, परंतु प्रार्थना कशाविषयी करावीं यावर आपल्याकडे विषयच नसतो.

कुठून सुरवात करावी हे आपल्याला माहित नसते. कोणतीही योजना केलेंलीं नसते. ठराविक वेळ नाहीं. ठराविक ठिकाण नाहीं. कुठलाही क्रम नाहीं. आणि आपल्या सर्वांना ठाऊक आहे कीं जेथें योग्य योजना असते तेथें प्रार्थना ही खोल अं:तकरणात उत्स्फूर्त अशा अनुभवांचा एक अद्भुत प्रवाह बनते. जेथें योग्य योजना नसते तेथें त्यांच त्यां जुन्या पुनरावृत्ती असतांत.

जर तुम्हीं सुट्ट्यांचा आनंद कुठे आणि कसा घ्यावा याची योग्य योजनाच केलीं नाहीं, तर तुम्हीं कदाचित घरी राहून टीव्ही पाहत बसाल. आध्यात्मिक जीवनाच्या ह्या अशा स्वाभाविक आणि अनियोजित सरावामुळें संजीवनाचा स्तर अधिक खालच्या पातळीवर जातो. आम्हांला नेमून दिलेली धाव धावायची आहे आणि एक युद्ध जिंकायचे आहे. जर तुम्हांला तुमच्या प्रार्थनेच्या जीवनांत एक नवे परिवर्तन घडवून आणायचे असेल, तर तुम्हांला ते परिवर्तन मूर्त स्वरूपांत पाहण्यासाठीं तशी योजनाहि करणें आवश्यक आहे.

म्हणून, मीं तुम्हांला सोप्या भाषेंत उत्तेजन देतो : आपण आजच आपला प्राधान्यक्रम आणि त्या क्रमाशी प्रार्थनेची सांगड कशी बसते यांवर पुनर्विचार करण्यासाठीं वेळ काढूया. आपण काहीं नवनवीन संकल्प करूं. देवाच्या सामर्थ्याने काही नवे पराक्रम करण्याचा प्रयत्न करूं. एक ठराविक वेळ साध्य करूं. एक ठिकाण ठरवू. मार्गदर्शनासाठीं पवित्र शास्त्राचा एक भाग निवडा.

स्वतःवर व्यस्त दिवसांची जुलमी हुकुमत चालू देऊन कामाच्या दडपणाखाली येऊ नका. आम्हां सर्वांना आपली दिनचर्या सुधारण्याची गरज आहे. आजचा हा दिवस तो दिवस बनूं द्या जेव्हां तुम्हीं प्रार्थनेच्या नित्यक्रमाकडे वळलांत- जेणेंकरून देवाचा गौरव व्हावा आणि तुमचा आनंद परिपूर्ण व्हावा.