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4 मार्च : क्षमा किया गया व्यक्ति और क्षमाशील व्यक्ति

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4 मार्च : क्षमा किया गया व्यक्ति और क्षमाशील व्यक्ति
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“इसलिए जैसे मैं ने तुझ पर दया की, वैसे ही क्या तुझे भी अपने संगी दास पर दया करना नहीं चाहिए था?  मत्ती 18:33

क्षमा किए गए व्यक्ति को क्षमाशील व्यक्ति होना चाहिए, और चूंकि क्षमा करना हमारे लिए स्वाभाविक नहीं है, इसलिए हमें इस बात को बार-बार सुनने की आवश्यकता है।

दूसरे शब्दों में हम क्षमा इसलिए करते हैं, क्योंकि यीशु के द्वारा परमेश्वर हमें क्षमा करता है। बाइबल इस बात को पूरी तरह से स्पष्ट कर देती है कि क्षमा करने का भाव किसी मानवीय गुण से उत्पन्न नहीं होता और यह दूसरों के प्रति दयालु और क्षमाशील होने के हमारे अपने प्रयासों का परिणाम नहीं है, परन्तु यह परमेश्वर के अनुग्रह के द्वारा आता है।

इस कारण, किसी व्यक्ति द्वारा अपने पापों का वास्तव में पश्चाताप करने का एक मुख्य प्रमाण उसमें क्षमा करने की भावना का होना है। इसके विपरीत, यदि हम लगातार अपने हृदयों में शत्रुता, द्वेष और कड़वाहट रखते हैं तो हम न केवल अपने जीवनों को हानि पहुँचाते हैं और अपने सम्बन्धों को संकट में डालते हैं, अपितु सच कहें तो हम यह प्रश्न भी उठाते हैं कि क्या हमने सच में परमेश्वर की क्षमा की प्रकृति को समझा भी है।

वास्तविक रूप से क्षमा प्रदान करना तब तक असम्भव है, जब तक हमने इसका अनुभव स्वयं नहीं किया है, और यदि हमने इसका अनुभव किया है तो ऐसा न करना असम्भव बात है। यह हमारे हृदय से तभी प्रवाहित होगी, जब हम परमेश्वर के अनुग्रह के द्वारा बदले जा चुके होंगे और उसके विरुद्ध अपने अपराध की भयावहता पर विचार कर चुके होंगे। जब ऐसा परिवर्तन आ जाता है, तो लोगों ने जो हमारे विरुद्ध पाप किए हों उनका भार कम हो जाएगा क्योंकि, जिस प्रकार हमें क्षमा मिल चुकी है उसी प्रकार परमेश्वर हमें भी क्षमा करने में सक्षम बना देता है।

मत्ती 18 में सेवक के बारे में यीशु के दृष्टान्त के पीछे यही सिद्धान्त है। आज के समय के अनुसार देखा जाए, तो जिस सेवक का पहली सदी में आज के हिसाब से 70 हजार करोड़ रुपए का ऋण माफ कर दिया गया था, उसने 17 लाख रुपए का ऋण माफ करने से इनकार कर दिया। यीशु चाहता है कि हम उस सेवक की नासमझी को देखें जिसका इतना बड़ा ऋण माफ कर दिया गया था और फिर भी वह उस ऋण को माफ करने से इनकार कर रहा था जो उसका किसी दूसरे पर बकाया था। अपने आप में देखा जाए तो वह ऋण बहुत बड़ा था, किन्तु उस राशि की तुलना में जो उसके लिए माफ की गई थी, वह बहुत छोटा था। इसी प्रकार यह बात समझ से परे लगती है कि हम कभी भी दूसरों को क्षमा न करें, जबकि परमेश्वर के विरुद्ध हमारे अपराध के इतने बड़े ऋण को क्षमा कर दिया गया है।

 यदि हमने परमेश्वर की दया का अनुभव किया है, तो निश्चित रूप से हमें क्षमा करने को अनदेखा नहीं करनी चाहिए। दूसरों को क्षमा करने में हमें परमेश्वर की क्षमा की पूर्णता का आनन्द मिलता है। जिन पापों के अभिलेखों को थामे रहने के लिए आप प्रलोभित होते हैं, उन्हें त्याग दें। जब ऐसा करना कठिन लगे क्योंकि जिस गलती को आपको क्षमा करने के लिए कहा जा रहा है वह बड़ी है, तब उस ऋण को देखें जिसे परमेश्वर ने आपके लिए क्षमा किया है और देखें कि ऐसा करने के लिए उसने क्या त्याग किया है, तो ये बातें आपको अपनी ओर से दया दिखाने में सक्षम बना देंगी। यदि परमेश्वर ने आपको क्षमा किया है, तो वह दूसरों के साथ सद्‌भाव में चलने में आपकी सहायता करने के लिए अपनी दया और अनुग्रह अवश्य उण्डेलेगा।       
मरकुस 11:20-25

4 March : देवाला तुमचे हित करण्यात आनंद मिळतो

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4 March : देवाला तुमचे हित करण्यात आनंद मिळतो
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मी त्यांजशी सर्वकाळचा करार करी; तो असा कीं मी त्यांचे हित करण्यापासून माघार घेणार नाहीं …. मी त्यांचे हित करण्यांत आनंद पावीन.(यिर्मया 32 :4041 )

जेव्हां जेव्हां मी निराश होतो, तेव्हां तेव्हां मी देवाच्या ज्यां अनेक वचनांकडें पुन्हा पुन्हा परत येतों, त्यांपैकींच हें एक वचन आहे. देवाला तुमचे हित करण्यात आनंद मिळतो, यापेक्षा उत्तजेन देणा-या  कोणत्या गोष्टीचा तुम्हीं विचार करू शकता का ? देव केवळ तुमचे हित करतो म्हणून नव्हे. केवळ तुमचे हित करण्याचे आश्वासनच नव्हे – हे कितीही गौरवी असेल तरीही, तर हें कीं देवाला तुमचे हित करण्यात आनंद मिळतो,”मी त्यांचे हित करण्यांत आनंद पावीन. ” अहाहा!

रोम 8:28 यातील सर्व काहीं आपल्यां भल्यांसाठीं करण्याच्या अभिवचनाची पूर्तता तो नाखुशीनी करत नाहीं. आपले हित करण्यात त्याला आनंद मिळतो. आणि तो आनंद केवळ कधीतरीच नाहीं – तर सर्वदा! ” मी त्यांचे हित करण्यापासून माघार घेणार नाहीं.” जे त्याच्यावर विश्वास ठेवतात त्यांच्याबाबतींत तो त्याचें अभिवचन रद्द करत नाहीं किंवा त्याच्या लेकरांचे कल्यांण करण्याविषयीं आपला आनंद गमावत नाहीं.

ह्या गोष्टीने आपल्यांला आनंद व्हावयाला पाहिजे!

पण कधी कधी आनंद वाटणे अवघड होतं. आपली परिस्थिति आपल्यां सहनशीलते पलीकडें होते ज्यांमुळें आनंद पावणे शक्य होत नाहीं. माझ्या बरोबर जेव्हां असे होते तेव्हां मी अब्राहमाचे अनुकरण करतो : “आशेला जागा नसताही त्यानें आशेने विश्वास ठेवला” (रोम 4:18). दुसर्‍या शब्दांत, जेव्हां तुम्हीं तुमच्या आशाहीन परिस्थितिकडें पाहतां, तेव्हां तुम्हांला असें म्हणायचे आहे, “तू माझ्या देवाइतका सामर्थ्यशाली नाहींस! तो तर जें अशक्य ते करू शकतो. आणि जे त्याच्यावर विश्वास ठेवतात त्यांच्याकरिता तो प्रीतिने हे करतो, यासाठींच निराशेकडें अंतिम अधिकार नाहीं. मी देवावर विश्वास ठेवतो.

माझ्या मधील असलेल्यां विश्वासाच्या लहानश्या ठिणगीचे रक्षण करण्यास देव विश्वासू आहे आणि (लगेचच नाहीं) तर अखेरीस तो आनंदाच्या व विश्वासाच्या भावना चेतवतो. आणि त्याचा तो आनंद यिर्मया 32:41 मध्यें दडलेला आहे.

मी किती आनंदी आहे कीं देवाच्या अंतकरणाला तुमचे आणि माझे कल्यांण करण्यात देखील आनंद प्राप्त होतो! मी त्यांचे हित करण्यांत आनंद पावीन.

3 मार्च : आत्मा में विश्राम

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3 मार्च : आत्मा में विश्राम
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“इसलिए जब कि उसके विश्राम में प्रवेश करने की प्रतिज्ञा अब तक है, तो हमें डरना चाहिए ऐसा न हो कि तुम में से कोई जन उससे वंचित रह जाए। क्योंकि हमें उन्हीं की तरह सुसमाचार सुनाया गया है, पर सुने हुए वचन से उन्हें कुछ लाभ न हुआ; क्योंकि सुनने वालों के मन में विश्वास के साथ नहीं बैठा।”  इब्रानियों 4:1-2

प्रायः मसीही लोग छुट्टी मनाने में तो बहुत कुशल होते हैं, किन्तु वे विश्राम करने में उतने ही खराब होते हैं। ऐसा क्यों है? एक कारण यह हो सकता है कि पश्चिमी संस्कृति सफलता और समृद्धि के उच्चतर स्तरों को लगातार खोजते रहने को बहुत महत्त्वपूर्ण मानती है। यहाँ तक कि हमारा छुट्टी का समय भी “गतिविधियों में व्यस्त रहने” और कुछ न कुछ सुधार करने तथा सफल होने की अभिलाषा से भरा होता है। और इसके पीछे प्रत्येक संस्कृति का रोग छिपा होता है, अर्थात् उस परमेश्वर से हमारा अलगाव जिसने हमें सृजा और हमें काम करने तथा विश्राम करने के लिए बनाया है।

जब से संसार में पाप आया है, तब से विश्राम मानवजाति से लुप्त होता गया है। मानवजाति के बारे में आप चाहे कोई भी अन्य बात क्यों न कहें, फिर भी यह तथ्य निर्विवाद है कि हममें शान्ति या विश्राम दिखाई नहीं देता। यदि शान्ति के कुछ क्षण पाने के लिए आपने अथक परिश्रम किया हो या फिर आप अपने छुट्टी के समय को गतिविधियों से भर देते हैं, तो वह छुट्टी का समय विश्राम करना नहीं है। निश्चित रूप से परमेश्वर कुछ और चाहता है।

परमेश्वर एक ऐसा विश्राम प्रदान करता है, जो हमारी आत्माओं को शान्त करता है। आत्मा में विश्राम उस जीवन से प्रवाहित होता है, जो विश्वास में उसके प्रति समर्पित होता है। जब पाप के कारण आई मृत्यु की धूल मानवजाति पर जम गई, तब से हम उस गहन विश्राम का आनन्द लेने में असमर्थ हो गए जो परमेश्वर ने चाहा था। हमें आवश्यकता है एक नई उत्पत्ति की, और परमेश्वर ने ठीक वही हमें प्रदान कर दिया है! “यदि कोई मसीह में है तो वह नई सृष्टि है” (2 कुरिन्थियों 5:17)। सृष्टि के सृजन में परमेश्वर ने शारीरिक विश्राम के सिद्धान्त की स्थापना की और छुटकारे में उसने पूर्ण आत्मिक विश्राम की सम्भावना स्थापित की। फिर भी सभी प्रकार के लोग, जिनमें कुछ मसीही होने का दावा करने वाले लोग भी सम्मिलित हैं, परमेश्वर के प्रति अनादर के साथ अपना जीवन जीने पर अड़े रहते हैं। वे अपनी आत्माओं को विश्राम देने के उसके निमन्त्रण को ठुकरा देते हैं और इस प्रकार केवल वचन के सुनने वाले बने रहते हैं, उस पर चलने वाले नहीं (याकूब 1:22)। और फिर वे मरने पर विश्राम में अपने प्रवेश कर लेने की आशा करते हैं। बाइबल जीवन के प्रति ऐसे दृष्टिकोण को कोई आशा प्रदान नहीं करती है। जिस तरह मरुभूमि में इस्राएलियों के लिए परमेश्वर की प्रतिज्ञाएँ व्यर्थ ठहरीं क्योंकि वे उन पर विश्वास करने में विफल रहे, उसी तरह यदि हम भी अपने विश्वास रहित प्रयासों में लगे रहेंगे तो इस जीवन में या आने वाले जीवन में आत्मा में विश्राम प्राप्त करने के परमेश्वर के वरदान को जानने की आशा नहीं कर सकते।

धन्यवाद है कि यीशु में सब कुछ निश्चित हो जाता है। वह खोखले धार्मिक दिखावे और निराशाजनक सांसारिक प्रयासों के मुखौटे को पीछे छोड़ते हुए आगे बढ़कर हमें यह अनुग्रहकारी निमन्त्रण देता है, “हे सब परिश्रम करने वालो और बोझ से दबे हुए लोगो, मेरे पास आओ; मैं तुम्हें विश्राम दूँगा। मेरा जूआ अपने ऊपर उठा लो, और मुझसे सीखो; क्योंकि मैं नम्र और मन में दीन हूँ : और तुम अपने मन में विश्राम पाओगे” (मत्ती 11:28-29)। यह एक ऐसा विश्राम है जिसका हम काम करते हुए भी आनन्द उठाते हैं, एक ऐसा विश्राम जो वास्तव में हमें हमारे काम से विश्राम पाने में सक्षम बनाता है, और एक ऐसा विश्राम जिसका हम अन्ततः एक दिन पूरी तरह से और अनन्त काल तक उसकी उपस्थिति में आनन्द लेंगे। क्या आपकी आत्मा में आज विश्राम है? या आप इस बात को लेकर चिन्तित हैं कि कल क्या होगा या फिर आपके अनुसार जो आज आपको पा लेना चाहिए था, उसके बारे में सोचते हुए थक गए हैं? वह कार्य जो आपकी सबसे बड़ी अभिलाषा को तृप्ति प्रदान करता है और आपकी सबसे बड़ी आवश्यकता का समाधान करता है, वह उद्धार का कार्य यीशु ने कलवरी में आपकी ओर से पूरा कर दिया था। वह आपको यह जानने के लिए अपने पास आने का निमन्त्रण देता है कि उसने आपके अनन्त भविष्य का समाधान कर दिया है और वे कार्य जो उसने आज आपके लिए निर्धारित किए हैं वे सभी पूरे होकर रहेंगे, न उससे अधिक और न उससे कम। इसलिए उस पर विश्वास  करें और अपनी आत्मा को वास्तव में विश्राम करने दें.  इब्रानियों 4:1-10

3 March : चांगुलपणाच्या मनोदयाद्वारें देवाचे कार्य

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3 March : चांगुलपणाच्या मनोदयाद्वारें देवाचे कार्य
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ह्याकरता तर आम्हीं तुमच्यासाठीं सर्वदा अशी प्रार्थना करतो कीं, आपल्यां देवानें तुम्हांला झालेल्यां ह्या पाचारणाला योग्य असे मानावे आणि चांगुलपणाचा प्रत्येक मनोदय व विश्वासाचे कार्य सामर्थ्याने पूर्ण करावे. 2 थेस्सलनी 1:11

आपले चांगुलपणाचे मनोदय पूर्ण करण्याकरिता देवाच्या सामर्थ्याचा शोध करणे याच अर्थ असा होत नाहीं कीं आपण संकल्पच (मनोदय) करत नाहीं किंवा आपण आपल्यां इच्छाशक्तीचा वापर करत नाहीं.

देवाच्या सामर्थ्याची बाजू आपल्यां इच्छेच्या बाजूची जागा कधीच घेत नाहीं, आपल्यां पवित्रीकरणातील देवाचे सामर्थ्य आपल्यांला निष्क्रिय बनवत नाहीं! देवाच्या इच्छेचे सामर्थ्य आपल्यां इच्छेची जागा न घेता, ते आपल्यां इच्छेच्या मुळाशी किंवा मागे आणि इच्छेमध्यें राहून कार्य करते.

आपल्यांतील इच्छेचा अभाव हा देवाच्या सामर्थ्याचा पुरावा नसून, आपल्यां इच्छेचे सामर्थ्य व आपले आनंदाने इच्छा करणे याचा पुरावा आहे.

जर कोणी म्हणत असेल कीं, “माझा देवाच्या सार्वभौमतेवर विश्वास आहे आणि म्हणून मी नुसतं बसून राहणार,  काहींच करणार नाहीं, तर त्याचा देवाच्या सार्वभौमतेवर विश्वास नाहीं आहे. कारण जर कोणी देवाच्या सार्वभौमतेवर विश्वास ठेवत असेल तर तो का बरं उघडपणे देवाची आज्ञा मोडेल?

जेव्हां तुम्हीं काहींच न करण्याचा निर्णय घेता, तेव्हां तुम्हीं काहींच करत नाहीं असे होत नाहीं. तुम्हीं तुमची इच्छाशक्ती सक्रियपणे काहींच न करण्यासाठीं वापरत आहात. आणि जर तुम्हीं अशाप्रकारे तुमच्या जीवनात येणारे पाप आणि मोहाला हाताळत असाल तर ते देवाची आज्ञा मोडण्यासारखे आहे, कारण आपल्यांला आज्ञा दिली आहे कीं, सुयुद्ध कर (1 तिमथ्य 1:18), सैतानाला अडवा ( याकोब 4:7), पवित्रीकरण मिळवण्याचा झटून प्रयत्न करा ( इब्री 12:14) आणि शरीराची कर्मे ठार मारा ( रोम 8:13).

2 थेस्सलनी 1:11असे म्हणते कीं, आपले चांगुलपणाचे मनोदय आणि विश्वासाचे कार्य हें देवाच्या सामर्थ्याने पूर्ण होतात. म्हणून “चांगुलपणाचे मनोदय” आणि “कार्य” या शब्दाचे महत्व रद्द होत नाहीं. आम्हांला झालेल्यां ह्या पाचारणाला योग्य असे चालण्याकरिता, नीतीमत्वाला शोभेसे कृत्य करण्याच्या सत्संकल्पामध्यें आपल्यां इच्छेला सक्रियपणे सहभागी करणे आवश्यक असते.

जर तुमच्या जीवनात प्रदीर्घ काळापासून काहीं पाप आहे, किंवा तुम्हीं काहीं तरी चांगले कर्म करण्याकडें दुर्लक्ष करत आहात कारण तुम्हीं त्याच्याशी लढा न देताच विजय मिळवू पाहता, तर तुम्हीं तुमच्या आज्ञाभंगामध्यें वाढ करीत आहात. देव त्याच्या सामर्थ्याचा वापर तेव्हांच करतो, जेव्हां आपण आपल्यां इच्छेचा वापर करतो, व आपल्यां इच्छेद्वारें देवाचे सामर्थ्य आपल्यां चांगुलपणाच्या मनोदयातून – आपल्यां सदभावातून आणि योजना आणि उद्देश यातून कार्य करते.

यासाठींच, जे लोक देवाच्या सार्वभौमतेमध्यें विश्वास ठेवतात त्यांनी त्यांच्या इच्छांना पावित्र्यासाठीं झटण्याकरिता सहभागी करण्यास भिऊ नये. “अरुंद दरवाजाने आत जाण्याचा प्रयत्न करा, कारण मी तुम्हांला सांगतो कीं, पुष्कळ जण आत येण्याचा प्रयत्न करतील, पण त्यांना ते शक्य होणार नाहीं.” (लुक 13:24). केवळ विश्वासाने प्रयत्न करीत रहा, व आपल्यां प्रयत्नाद्वारें इच्छा करणे व कृती करणे हे तुमच्या ठायी आपल्यां सत्यसंकल्पासाठीं साधून देणारा तो देव आहे (फिलिप्पै 2:13).

2 मार्च : मेरे हाथ में कुछ भी नहीं

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2 मार्च : मेरे हाथ में कुछ भी नहीं
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“मसीह ने जो हमारे लिए शापित बना, हमें मोल लेकर व्यवस्था के शाप से छुड़ाया, क्योंकि लिखा है, ‘जो कोई काठ पर लटकाया जाता है वह शापित है।’ यह इसलिए हुआ कि अब्राहम की आशीष मसीह यीशु में अन्यजातियों तक पहुँचे, और हम विश्वास के द्वारा उस आत्मा को प्राप्त करें जिसकी प्रतिज्ञा हुई है।”  गलातियों 3:13-14

यीशु में विश्वास करने वाले लोगों के रूप में हमें पाप के बड़े अभिशाप से छुटकारा मिल चुका है। इस छुटकारे का आश्चर्य हमें उसी क्षण मोह लेता है जब हम इस बात को समझ जाते हैं कि यह अभिशाप, जिसका अर्थ है कि परमेश्वर के समक्ष हम दोषी हैं और मृत्यु के योग्य हैं, मसीह के द्वारा हमसे हटा लिया गया है।

बचाए जाने के बाद भी इस आश्चर्य का खत्म हो जाना और इस बात की मनोहरता का कम हो जाना एक सरल बात है। हम इतनी सरलता से सुखद और आरामदायक जीवन जीना आरम्भ कर सकते हैं कि हम पर जो पाप की पकड़ है, उसे देखना कठिन हो जाता है। इतनी सरलता से हम यह मानने लग जाते हैं कि यदि हम अपने वैवाहिक सम्बन्धों, अपनी नौकरी, अपने सम्बन्धों में और अपनी सफलता पर थोड़ा और प्रयास करें तो हम भले लोग बन सकते हैं तथा आशीष के पात्र बन सकते हैं। हम विश्वासी लोग नहीं बनना चाहते, बल्कि सफल व्यक्ति बनना चाहते हैं। निरन्तर हम अपने स्वयं के प्रयासों पर आधारित झूठे धर्म की ओर प्रलोभित होते रहते हैं।

गलातियों की कलीसिया के सामने भी यही प्रलोभन था। इसीलिए पौलुस ने उन्हें लिखा और अनिवार्य रूप से कहा कि मसीही सन्देश यह है ही नहीं।  वास्तविकता तो यह है कि यह इसके पूरी तरह उलट है! यदि सुसमाचार यह है कि यीशु केवल हमारे जीवन में व्याप्त किसी कमी को पूरा करने के लिए आया था, तो फिर या तो व्यवस्था का अभिशाप कोई चिन्ता की बात नहीं है या फिर उपचार हो सकने से परे है। किन्तु अभिशाप तो वास्तविक है और इसका समाधान होना भी आवश्यक है। जब तक हम पहले यह नहीं समझ लेते कि हम उस अभिशाप के पात्र हैं, जिसे उसने अपने ऊपर ले लिया तब तक हम किसी ऐसे व्यक्ति में क्यों रुचि लेंगे जो हमारे स्थान पर मर गया?

इस अभिशाप का प्रभाव देखने के लिए हमें केवल मूसा की व्यवस्था को देखने की आवश्यकता है (उदाहरण के लिए, निर्गमन 20:1-17 देखें)। व्यवस्था बताती है कि किस तरह से हमने अपने सम्पूर्ण हृदय से परमेश्वर से प्रेम नहीं किया है। हमने उसकी आज्ञा नहीं मानी है। हमने दूसरों से अपने जैसा प्रेम नहीं किया है। हमने हर बात में सच नहीं बोला है। हम लालच करने के दोषी हैं। यह सूची बहुत लम्बी है। यद्यपि जब परमेश्वर का आत्मा हमें दोषी ठहराता है और हम अपनी कमियों को देखने लगते हैं, तो हम इस भजन के लिखने वाले के साथ गाने लग जाते हैं कि “मेरे हाथों के काम तेरी व्यवस्था की मांगों को पूरा नहीं कर सकते।”[1] हम उस अभिशाप के बोझ को देखते हैं, जो कभी हम पर था और अभी भी हम पर होना चाहिए था, और तब हम मसीह को अपने उद्धारकर्ता के रूप में उसकी सारी महिमा में देखते हैं, जो उस बोझ को ले लेने के लिए आया था।

यह हमारे विश्वास का मूल है। जब हम क्रूस पर दृष्टि करते हैं और देखते हैं कि किस प्रकार से यीशु वहाँ लटका हुआ था, तब हम देख पाते हैं कि उसने जो किया वह आवश्यक था और उसकी अपनी इच्छा से किया गया कार्य था। उसने वह स्थान ले लिया, जहाँ हमें होना चाहिए था। यही अनुग्रह है।

यदि हम अपने प्रयासों से परमेश्वर के साथ अपने आप को सही स्थिति में रखने में सक्षम होते, तो न ही छुटकारे में कोई आश्चर्य होता और न ही लेपालक पुत्र/पुत्रियाँ बनाए जाने के भरोसे में कोई सुन्दरता होती। जब हम अपने आप को और अपने कार्यों को देखने के लिए प्रलोभित होते हैं, तो हमें याद रखना चाहिए कि मसीह ने उस अभिशाप को तोड़ दिया है। और उस आश्चर्य में होकर हम महिमा कर सकते हैं। भले ही आपको अनुग्रह की पहली झलक मिले कितना ही समय क्यों न बीत गया हो, आप अभी भी अपने लिए नए सिरे से गा सकते हैं:

मेरे हाथ में कुछ भी नहीं जो मैं लेकर आता हूँ, मैं केवल तेरे क्रूस से लिपटा हुआ हूँ।  गलातियों 2:15-3:9

2 March : अभिवचनांनी आपणांस सज्ज करा

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” जे आत्म्याने शुद्ध ते धन्य, कारण ते देवाला पाहतील. ” ( मत्तय 5:8 )

जेव्हां पौल म्हणतो कीं “आत्म्याने” शरीराची कर्मे ठार मारा ( रोम 8:13 ), याचा अर्थ मी अश्या प्रकारे घेतो कीं, आत्म्याच्या शस्त्रसामग्रीमधील एक शस्त्र ज्याचा उपयोग आपण ठार मारण्यासाठीं केला पाहिजे तें शस्त्र म्हणजे “तलवार‘, जे “देवाचे वचन होय” (इफिस 6:17 ).

तर मग, जेव्हां आपले शरीर एखाद्या भयामुळे किंवा मोहामुळे पाप करण्यास प्रवृत्त होते तेव्हां आपण आत्म्याच्या तलवारीने त्या भयाला आणि त्या मोहाला मारून टाकायचे आहे. माझ्या अनुभवा नुसार, पाप ज्या गोष्टीचे अभिवचन देते आपण त्याचापेक्षा उच्च अभिवचनाद्वारें त्या अभिवचनाच्या मुळावर प्रहार करतो.

उदारणार्थ, जेव्हां मला निषिद्ध अश्या शारीरिक वासनेची लालसा होत असते, तेव्हां या पापाच्या आनंदाच्या मुळावर प्रहार करण्यासाठीं मी “आत्म्याने शुद्ध ते धन्य, कारण ते देवाला पाहतील” (मत्तय 5:8),  या वचनाचा वापर तलवारी प्रमाणे करतो. शुद्ध अंतकरणाने देवाला पाहण्याचा जो आनंद आहे त्याचें मी स्मरण करतो, आणि पापाच्या क्षणिक, उथळ आणि पीडा देणार्‍या परिणामांची आठवण ठेवतो, आणि त्याच्याद्वारें देव मला पापाच्या मोहावर विजय मिळविण्यांस सहाय्य करतो.

पापासोबत यशस्वीरित्या युद्ध करण्याकरिता, येणार्‍या मोहांवर विजय मिळवण्यासाठीं त्या क्षणाला लागू पडतील अशी देवाची अभिवचनें हाताशी असणें हे एक महत्वाचे शस्त्र आहे.

तथापि, असेहि प्रसंग असतांत जेव्हां आपल्यांला त्या प्रसंगाशी संबंधित अशी वचनें आठवत नाहींत. आणि पवित्र शास्त्रामधून आपल्यांकरिता अनुरूप असे वचन बघण्यासाठीं वेळ नसतो. अश्या वेळेला त्या भयाला किंवा मोहाला बळी पडून भरकटण्यापासून वाचण्यासाठीं आपल्यां मनाच्या भांडारात देवाच्या वचनांची सर्वसाधारण माहिती तयार असने गरजेचे आहे.

खाली ती चार अभिवचनें आहेत ज्यांचा पापाविरुद्ध लढा देण्यासाठीं मी सर्वाधिक उपयोग केलेंला आहें :

यशया 41:10, “तू भिऊ नकोस, कारण मी तुझ्याबरोबर आहे, घाबरू नकोस, कारण मी तुझा देव आहे; मी तुला शक्ती देतो, मी तुझे साहाय्यही करता, मी आपल्यां नीतिमत्तेच्या उजव्या हाताने तुला सावरतो.”

फिलिप्पैकरांस 4:19, “माझा देव आपल्यां संपत्त्यनुरूप तुमची सर्व गरज ख्रिस्त येशूच्या ठायी गौरवाच्या द्वारें पुरवील.”

आणि फिलिप्पैकरांस 3:8 मधील स्पष्ट अभिवचन, “तर ख्रिस्त येशू माझा प्रभू, ह्याच्याविषयीच्या ज्ञानाच्या श्रेष्ठत्वामुळे मी सर्वकाहीं हानी असे समजतो.”

आणि अर्थातच, मत्तय 5:8, “जे आत्म्याने शुद्ध ते धन्य, कारण ते देवाला पाहतील.”

आपल्यां ज्ञानाच्या भांडारात सतत देवाच्या अभिवचनांची भर टाकींत जा. पण तुमच्या जीवनात देवानें आशीर्वादित केलेलीं जी मोजकीं अभिवचनें आहेत त्यांचा विसर पडू देऊ नका. दोन्हीकडें लक्ष्य ठेवा. जुन्या अभिवचनांनिशी सदैव तयार असा. आणि प्रत्येक पहाटे नव्या दिवसाला सामोरे जाण्याकरीता नवीन अभिवचनांचा शोध करा.

31 जनवरी : लज्जित न हो

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31 जनवरी : लज्जित न हो
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“हमारे प्रभु की गवाही से, और मुझसे जो उसका कैदी हूँ, लज्जित न हो, पर उस परमेश्‍वर की सामर्थ्य के अनुसार सुसमाचार के लिए मेरे साथ दुख उठा जिसने हमारा उद्धार किया और पवित्र बुलाहट से बुलाया, और यह हमारे कामों के अनुसार नहीं; पर उसके उद्देश्य और उस अनुग्रह के अनुसार है जो मसीह यीशु में सनातन से हम पर हुआ है।”  2 तीमुथियुस 1:8-9

स्वामी के कारण, स्वामी के सेवकों के कारण और स्वामी के सन्देश के कारण लज्जित होना एक बहुत ही सहज बात है। इसलिए यह सुनना एक बड़ी चुनौती है कि पौलुस कैसे तीमुथियुस को और हमें “लज्जित न होने” के लिए प्रोत्साहित कर रहा है।

पश्चिमी संस्कृति में धर्म, परमेश्वर और आत्मिकता के बारे में अस्पष्ट बातचीत व्यापक रूप से सहनीय मानी जाती है; हम कई बार कई तरह के अस्पष्ट कथनों को सुनते या पढ़ते हैं, जो सुसमाचार के साथ शिथिल रूप से जुड़े हुए प्रतीत होते हैं। तथापि समाज के मानकों के अनुसार यह पूर्ण रूप से अस्वीकार्य है कि यीशु मसीह के अतिरिक्त किसी और के द्वारा उद्धार नहीं है। यदि हम पतरस के साथ यह दावा करने के लिए तैयार हैं कि “स्वर्ग के नीचे मनुष्यों में और कोई दूसरा नाम नहीं दिया गया, जिसके द्वारा हम उद्धार पा सकें” (प्रेरितों के काम 4:12), तो यहाँ पौलुस के तीमुथियुस को लिखे शब्द हमारे लिए भी उपयुक्त होंगे कि “सुसमाचार के लिए मेरे साथ दुख उठा।”

सुसमाचार के लिए दुख उठाने के विशेषाधिकार में सम्मिलित होने के लिए पौलुस का निमन्त्रण, एक अर्थ में, हमें परेशान करने वाला है। यह हमारे समय के मसीही जयवन्तवाद के बिल्कुल विपरीत है, जो सदैव मसीही जीवन को भव्य तरीके से प्रस्तुत करना चाहता है। इस कारण बहुत से लोग केवल चंगा करने, चमत्कार करने और अपने लोगों को जीत की ओर ले जाने वाले परमेश्वर के सामर्थ्य की पुष्टि करना और स्वीकार करना चाहते हैं। तथापि, बाइबल और मानवीय अनुभव हमें बताते हैं कि—मृत्यु को परम चंगाई के रूप में अलग करके—जिन लोगों के लिए हमने प्रार्थना की है, उनमें से अधिकांश लोग पीड़ा में बने रहेंगे और कठिन दिनों में जीवन बिताएँगे। हमें सच बताना चाहिए। जॉन न्यूटन के शब्दों में, मसीही व्यक्ति को “बहुत सी विपत्तियों, कठिन कार्यों और प्रलोभन के फन्दों से होकर जाना होगा”[1] निकट भविष्य में हमारे लिए और भी परीक्षाएँ प्रतीक्षा कर रही हैं, विशेषकर यदि हमें पृथ्वी के अन्त तक सुसमाचार प्रचार करने के बुलावे के प्रति विश्वासयोग्य रहना है (प्रेरितों के काम 1:8)।

तो फिर हम सुसमाचार के लिए पीड़ा में कैसे स्थिर बने रहें? परमेश्वर के अनुग्रह के द्वारा मिलने वाला परमेश्वर का सामर्थ्य ही हमें अन्त तक स्थिर बनाए रखता है। न्यूटन के गीत के बोल इस वास्तविकता को बतलाते हैं, “अनुग्रह ही है जो मुझे अब तक सुरक्षित लाया है, और अनुग्रह ही मुझे घर ले जाएगा।” यह एक अद्‌भुत सत्य है!

परमेश्वर ने आपको बचाया है और वही आपको पीड़ा के समय में दृढ़ता से थामे रख सकता है। परमेश्वर ने आपको नियुक्त किया है और जब आपको उसके बारे में सच्चाई की साक्षी देने के लिए बुलाया जाए, तो वही आपको हियाव दे सकता है। उसके सम्भालने वाले सामर्थ्य की सच्चाई आपके हृदय में हलचल उत्पन्न कर सकती है और आपके जीवन को बदल सकती है। कठिन और सन्देह से भरे दिनों में आप अपनी आत्मा के लिए एक गढ़ के रूप में इस वास्तविकता को थामे रह सकते हैं। और जब आप उस स्वामी, उसके सेवकों या उसके सन्देश के लिए खड़े होने से पीछे हटने के लिए प्रलोभित हो रहे हों, तो जैसे ही आप बोलने के लिए अपना मुँह खोलें, आप उसके सामर्थ्य की ओर देखते हुए अपनी साक्षी के प्रभावी होने के लिए एक मौन प्रार्थना कर सकते हैं। “लज्जित न हों।”

रोमियों 1:8-17

31 जानेवारी : दु:खाचे पाच उद्देश

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परंतु आपल्याला ठाऊक आहे कीं, देवावर प्रीति करणार्‍यांना म्हणजे त्याच्या संकल्पाप्रमाणे बोलावलेल्यांना देवाच्या करणीने सर्व गोष्टी मिळून कल्याणकारक होतात. (रोमकरांस 8:28)

आमच्यावर येणाऱ्या तात्कालिक व हलक्या संकटाची लहान लहान कारणे आम्हांला क्वचितच माहीत असतात, परंतु तरी आपण विश्वासांत का टिकून राहतो याची लहान लहान कारणे बायबल आपल्याला सांगते.

त्यांपैकी काही कारणें लक्षात ठेवण्याचा एखादा मार्ग शोधून काढणे बरे राहील जेणेकरुन ज्यां ज्यां प्रसंगी आपल्यावर अचानक संकट किंवा दु:ख येते किंवा विश्वासांतील आपल्या प्रिय जनांना त्यांच्या दुःखात मदत करण्याची संधी मिळते, त्यां त्यां प्रसंगी आपण देवाने आपल्याला दिलेल्या काही सत्यांची आठवण करू शकतो ह्यासाठी कीं आपण आशा सोडू नये.

ती कारणें लक्षात ठेवण्याचा एक मार्ग आहे: इंग्रजी शब्दांचे 5 R’ (किंवा उपयुक्त असल्यांस त्यांपैकी फक्त तीन निवडा आणि त्यांना लक्षात ठेवण्याचा प्रयत्न करा).

आपल्याला जें दु:ख होतांत त्यांमागे असलेले देवाचे उद्देश पुढीलप्रमाणे आहेत:

Repentance: म्हणजे पश्‍चात्ताप – दुःख हे आपल्यासाठी आणि इतरांसाठीं देवाची हाक आहे कीं आपण पृथ्वीवरील कोणत्याही गोष्टीला देवाच्या वर ठेवण्यापासून वळावे. लूक 13:4-5:

“किंवा ज्या अठरा जणांवर शिलोहातील बुरूज पडला आणि ते ठार झाले, ते यरुशलेमेत राहणार्‍या सर्व माणसांपेक्षा अधिक अपराधी होते असे तुम्हांला वाटते काय? मी तुम्हांला सांगतो, नव्हते; पण जर तुम्हीं पश्‍चात्ताप केला नाही तर तुम्हा सर्वांचा त्यांच्याप्रमाणे नाश होईल.”

Reliance  म्हणजे भिस्त : दुःख या गोष्टीची हाक आहे कीं आपण ह्या जगाच्या जीवन-रक्षक साधनांवर नव्हे तर देवावर भरवसा ठेवावा. 2 करिंथकरांस1:8-9:

आम्हीं आमच्या शक्तीपलीकडे अतिशयच दडपले गेलो; इतके की आम्हीं जगतो की मरतो असे आम्हांला झाले. फार तर काय, आम्हीं मरणारच असे आमचे मन आम्हांला सांगत होते; आम्हीं स्वत:वर नव्हे तर मृतांना सजीव करणार्‍या देवावर भरवसा ठेवावा, म्हणून हे झाले

Righteousness म्हणजे नीतिमत्त्व : दुःख हे आपल्या प्रेमळ स्वर्गीय पित्याची शिस्त आहे जी तो आपण त्याच्या नीतिमत्वाचे आणि पवित्रतेचे वाटेकरी व्हावें म्हणून लावतो. इब्री 12:6, 10-11:

“कारण ज्याच्यावर परमेश्वर प्रीति करतो, त्याला तो शिक्षा करतो आणि ज्या पुत्रांना तो स्वीकारतो त्या प्रत्येकाला फटके मारतो.” . . . तो करतो ती आपल्या हितासाठी, म्हणजे आपण त्याच्या पवित्रतेचे वाटेकरी व्हावे म्हणून करतो. कोणतीही शिक्षा तत्काली आनंदाची वाटत नाही, उलट खेदाची वाटते; तरी ज्यांना तिच्याकडून वळण लागले आहे त्यांना ती पुढे नीतिमत्त्व हे शांतिकारक फळ देते.

Reward म्हणजे प्रतिफळ : दुःख आपल्यासाठी स्वर्गात एक मोठे प्रतिफळ उत्पन्न करत आहे जे आपल्याला इथें होत असलेल्या प्रत्येक दुखाच्या तुलनेने हजारपट मोठे आहे. 2 करिंथकरांस 4:17:

कारण आमच्यावर येणारे तात्कालिक व हलके संकट हे आमच्यासाठी अत्यंत मोठ्या प्रमाणात सार्वकालिक गौरवाचा भार उत्पन्न करते.

शेवटी, Reminder म्हणजे स्मरणपत्र: दु:ख आपल्याला याची आठवण करून देते की देवाने आपल्या पुत्राला दु:ख भोगण्यासाठी जगात पाठवले ह्यासाठी की आपल्यावर येणारे दुःख हे देवाचा न्याय नसून त्याचे शुद्धीकरणाचे कार्य असावें. फिलिप्पैकरांस 3:10:

. . . हे अशासाठी आहे की, तो व त्याच्या पुनरुत्थानाचे सामर्थ्य व त्याच्या दुःखाची सहभागिता ह्यांची, त्याच्या मरणाला अनुरूप होऊन मी ओळख करून घ्यावी.

यास्तव, ख्रिस्ती अंत:करण दुःखात जर ओरडत असेल, “का?” तर हे समजण्यासारखे आहे कारण आपल्या जी दु:खे होतांत त्यांची  तात्कालिक व हलकी कारणे आपल्याला माहित नसल्यामुळे – म्हणजे, आताच का, असे का, इतक्या दिवसांपासून का? परंतु ह्या लहान लहान कारणांविषयी आपल्याला असलेल्या या अज्ञानामुळे आपण देवाच्या त्या मोठ्या मदतीकडे दुर्लक्ष करूं नये जी तो आमची त्याच्या वचनांत ह्या दुखामागे असलेला त्याचा हेतू प्रकट करून करतो.

“तुम्हीं ईयोबाच्या धीराविषयी ऐकलें आहे, आणि त्याच्याविषयीचा प्रभूचा जो हेतू होता तो तुम्हीं पाहिला आहे; ह्यावरून ‘प्रभू फार कनवाळू व दयाळू’ आहे हे तुम्हांला दिसून आले” (याकोब 5:11).

30 जनवरी : उसकी उपस्थिति के द्वारा सुरक्षित

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“यहोवा उस [यूसुफ] के संग था इसलिए वह भाग्यवान् पुरुष हो गया”  उत्पत्ति 39:2

परमेश्वर की सेवा करने के लिए उस स्थान से अच्छा कोई और स्थान नहीं है, जहाँ वह आपको रखता है।

कोई भी नौकरी दोषरहित नहीं होती, कोई भी परिवार दोषरहित नहीं होता, कोई भी परिस्थितियाँ परेशानियों से मुक्त नहीं होतीं। हममें से जो लोग लगातार आदर्श जीवन की खोज करते रहते हैं, जो यह भूल जाते हैं कि सिद्धता को स्वर्ग के लिए सुरक्षित रखा गया है, वे अपने आप को एक ऐसी यात्रा पर ले जाते हैं, जिसमें बार-बार निराशा ही हाथ लगती है।

यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी कि यूसुफ ने जिन परिस्थितियों का अनुभव किया, वे बिल्कुल भी आदर्श परिस्थितियाँ नहीं थीं। अपने पिता से विशेष प्रेम पाने वाले व्यक्ति के रूप में अपना जीवन आरम्भ करने के बाद उसने अपने आप को गुलामों के व्यापारियों के व्यापार की वस्तु के रूप में पाया। उसके परिवार के घर की सुरक्षा का स्थान दासत्व की बेड़ियों ने ले लिया।

यूसुफ के समान हम सभी समय के साथ अपनी परिस्थितियों को बदलते हुए देखते हैं। हो सकता है कि हम लम्बे समय तक जिस घर में रहे हैं, उससे हमें दूर जाना पड़े, या हमारे प्रियजनों को कष्टों का सामना करना पड़े, या वित्तीय कठिनाइयाँ या स्वास्थ्य से सम्बन्धित समस्याएँ अप्रत्याशित रूप से आ जाएँ। तथापि, हममें से बहुत कम लोगों ने यूसुफ की तरह इस प्रकार के त्वरित विनाश का अनुभव किया होगा। (और यदि आपने ऐसा किया है, तो यह जानना कितना उत्साहजनक है कि पवित्रशास्त्र में आपके जैसे लोगों के जीवन में परमेश्वर के हस्तक्षेप की कहानियाँ सम्मिलित हैं!) हम सोच सकते हैं कि यूसुफ के पास कहीं भाग जाने, छिप जाने, हार मान लेने, या प्रतिरोधी बन जाने के सभी कारण मौजूद थे। और फिर भी परमेश्वर की उपस्थिति ने उसे प्रत्येक तराई के स्थान से बाहर निकाला।

यूसुफ को उसकी परिस्थितियों से  सुरक्षा नहीं दी गई; उसे अपनी परिस्थितियों में  सुरक्षित रखा गया। वह परमेश्वर की उपस्थिति के द्वारा सुरक्षित किया गया था। इसमें हमारे लिए एक सीख है। किसी विश्वासी की कठिनाइयों का सामना करने की क्षमता, ज्ञान या बुद्धि वह वस्तु नहीं है, जो उसकी रक्षा करती है। परन्तु परमेश्वर का सेवक परमेश्वर की उपस्थिति के द्वारा ही सुरक्षित किया जाता है। यह स्वाभाविक बात है कि हम परमेश्वर से अपनी परिस्थितियों को बदलने, बड़ी कठिनाइयों को दूर कर देने या हमें परीक्षाओं से दूर कर देने के लिए कहते हों। हो सकता है कि हम अपने आस-पास देखें और सोचें कि “मैंने कभी इसकी अपेक्षा तो नहीं की थी!” हम इस झूठ पर विश्वास करना आरम्भ कर देते हैं कि यदि हम केवल बच कर भाग निकलें या यदि हमारी समस्याएँ दूर हो जाएँ, तो सब कुछ ठीक हो जाएगा। किन्तु वास्तविक सच्चाई यह है कि हम चाहे कहीं भी चले जाएँ, समस्याएँ आएँगी और स्वर्ग के इस ओर सिद्धता हाथ नहीं आएगी। जैसा कि भजनकार कहता है कि मेरा भरोसा परमेश्वर पर है (भजन संहिता 11:1)।

परमेश्वर यूसुफ के जीवन को अलग तरीके से व्यवस्थित कर सकता था। इसके विपरीत उसने घटनाओं को वैसे ही घटित होने दिया जिस प्रकार वे घटित हुईं। उसकी योजना थी कि वह अपने सेवक को “बहुत सी विपत्तियों, कठिन कार्यों और प्रलोभन के फन्दों”[1] से होकर निकालेगा। ऐसा नहीं है कि जब वह दासों की पंक्ति में चल रहा था और दासों के बाजार में बैठा था, तब परमेश्वर उसके संग नहीं था और जब वह अपने स्वामी के घराने में सम्मान और प्रमुखता के पद तक ऊपर उठ गया, तब परमेश्वर उसके संग था। प्रभु की उपस्थिति हमारे साथ भी होती है। निस्सन्देह, उसने हमसे प्रतिज्ञा की है कि चाहे तुम तराइयों में हो या पर्वतों के शिखरों पर, “मैं जगत के अन्त तक सदा तुम्हारे संग हूँ” (मत्ती 28:20)। आज परमेश्वर ने आपको किस परिस्थिति में रखा है? और यह जानना कि वह आपके साथ उस परिस्थिति में है और उसी परिस्थिति में उसके पास आपके करने के लिए एक भला काम है, किस प्रकार से उन परिस्थितियों के बारे में आपके दृष्टिकोण को बदलेगा, जिन्हें आप चुन सकते थे और जिन्हें आप नहीं चुनते?

फिलिप्पियों 4:4-13

30 जानेवारी : विजय मिळविणारी कृपा

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मी त्याची चालचर्या पाहिली, मी त्याला सुधारीन; मी त्याला मार्ग दाखवीन, मी त्याचे, त्याच्यातल्या शोकग्रस्तांचे समाधान करीन.” (यशया 57:18)

ईश्वर-ज्ञानाचे सुशिक्षण (सिद्धांत) पवित्र शास्त्रातून जाणून घ्या. ते जर पवित्र शास्त्रातून असेल तरच ते स्थिर राहते, आणि आत्म्याचे पोषण करते.

उदाहरणार्थ, जर तुम्हांला अप्रतिकारजन्य कृपा म्हणजे काय हे जर जाणून घ्यायचे असेल तर ते सुशिक्षण पवित्र शास्त्रातून शिका. अशा पद्धतीने शोध केल्यांस, तुम्हांला कळेल की अप्रतिकारक कृपेचा अर्थ असा नाही की कृपेचा प्रतिकार केला जाऊ शकत नाही; तर त्याचा अर्थ असा की जेव्हा देव निर्णय घेतो तेव्हा तो त्या प्रतिकाराचा पराभव करण्यांस समर्थ आहे आणि तो  पराभव करेल.

उदाहरणार्थ, यशया 57:17-19 मध्ये देव त्याच्या बंडखोर लोकांना ताडन करून आणि त्यांच्याशी विन्मुख होऊन शिक्षा देतो: “त्याच्या स्वार्थमूलक अधर्मामुळे मी रागावून त्याला ताडन केले, मी विन्मुख झालो, मी त्याच्यावर कोपलो” (वचन 17).

तरी त्यांनी पश्चात्ताप केला नाही. उलट ते विश्वासापासून अजूनहि बहकत गेलें. त्यांनी विरोध केला: “पण तो आपल्या मनाच्या कलाप्रमाणे वागत गेला” (वचन 17).

तर मग कृपेचा विरोध केला जाऊ शकतो. वास्तविकता पाहता, स्तेफन यहूदी अधिकाऱ्यांना म्हणाला, “तुम्हीं तर ‘पवित्र आत्म्याला’ सर्वदा ‘विरोध करता” (प्रेषितांची कृत्ये 7:51).

मग देव काय करतो? जें पश्चात्ताप करत नाहींत तर विरोध करतांत अशांना तो आपल्याकडे वळवू शकणार नाहीं इतका तो अशक्त आहे का? नाही. तो अशक्त नाही. पुढील वचन म्हणते, “मी त्याची चालचर्या पाहिली, मी त्याला सुधारीन; मी त्याला मार्ग दाखवीन, मी त्याचे, त्याच्यातल्या शोकग्रस्तांचे समाधान करीन” (यशया 57:18).

तर मग, देवाला प्रतिकूल असलेल्या आणि कृपेचा विरोध करणाऱ्यांविषयीं, देव म्हणतो, “मी त्याला सुधारीन.” तो “मार्ग दाखवील”. तो समाधान करील.”समाधान करीन” या शब्दांचा अर्थ “पूर्ण करणें किंवा बरे करणे” असा होतो. हा शब्द ‘शालोम” म्हणजे “शांती.” ह्या शब्दाशी संबंधित आहे. पुढील वचन त्या संपूर्णतेचा आणि शांतीचा उल्लेख करते, आणि स्पष्ट करते की देव कसा कृपेचा विरोध करणाऱ्या हट्टी मनुष्याला आपणाकडे वळवतो.

तो हे अशा प्रकारे करतो “मी त्याच्या तोंडून आभारवचन उच्चारवीन, जे दूर आहेत व जे जवळ आहेत, त्यांना शांती असो, शांती असो (शालोम, शालोम); मी त्यांना सुधारीन असे परमेश्वर म्हणतो” (यशया 57:19). देव जे अस्तित्वांत नाही ते निर्माण करतो – म्हणजे समाधान, शांती, पूर्णता. अशा प्रकारे आपण तारले जातो. आणि अशा प्रकारे आपल्याला फिरवून मागे देवाकडे परत आणले जाते.

जिथे आभारवचन अस्तित्वात नाहींत तिथे त्यां आभारवचनांची निर्मिती करून देवाची कृपा आपल्या विरोधीपनावर विजय मिळवते. तो जें जवळ आहेत आणि जें दूर आहेत त्यांना शालोम, शालोम देतो. तो जें जवळ आहेत आणि जें दूर आहेत त्यांना पूर्णता देतो. तो असें “समाधान” देऊन करतो, म्हणजेच तो आम्हांला आमच्या विरोधीपनाच्या आजारापासून बरे करतो आणि त्या ठिकाणी आमच्यांत एक दृढ शरणागती शरण निर्माण करतो.

अप्रतिकारजन्य कृपेचा अर्थ असा होत नाही की आपण प्रतिकार किंवा विरोध करू शकत नाही. आपण विरोध करू शकतो, आणि आम्हीं विरोध करू. विषय हा आहे की जेव्हा देव निर्णय घेतो, तेव्हा तो आपल्या विरोधावर मात करतो आणि एक नम्र आत्मा पुनर्स्थापित करतो. तो निर्माण करतो. तो म्हणतो, “प्रकाश होवो!” तो बरा करतो. तो मार्ग दाखवितो. तो सुधारतो. तो समाधान देतो.

म्हणून आपण स्वतः त्याच्याकडे परत वळलो असा अभिमान आम्हीं बाळगत नाही. आणि ज्याने आमच्या सर्व विरोधीपनावर विजय मिळवला त्यां परमेश्वराच्या पायांजवळ आम्हीं पडतो आणि थरथरत आनंदाने त्याचे आभारवचन उच्चारितो.