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15 November : अभिवचनें घेऊन लढा देणें

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15 November : अभिवचनें घेऊन लढा देणें
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तू भिऊ नकोस, कारण मी तुझ्याबरोबर आहे, घाबरू नकोस, कारण मी तुझा देव आहे; मी तुला शक्ती देतो, मी तुझे साहाय्यही करता, मी आपल्या नीतिमत्तेच्या उजव्या हाताने तुला सावरतो. (यशया 41:10)

जेव्हा मी सेवेच्या एखाद नवीन उपक्रम राबवित असतांना किंवा सार्वजनिक सभेसाठीं जाते वेळी जर मी घाबरलो, तेव्हा मी माझ्या सर्वात जास्त उपयोगात येणाऱ्या  अभिवचनांपैकी एक घेऊन अविश्वासाशी लढा देतो : यशया 41:10.

ज्या दिवशी मी तीन वर्षांसाठीं जर्मनीत शिकण्यासाठीं निघालो, तेव्हा माझ्या वडिलांनी फार लांबून न्यूयॉर्कवरून फोन केला आणि मला या वचनात असलेलें अभिवचन दिलें. पुढील तीन वर्षे, अतिशय तनावाच्या काळात टिकून राहण्यासाठीं मी ते शेकडो वेळा वाचले असावे.

जेव्हा माझ्या मनाचे यंत्र निष्क्रिय असते, तेव्हा गीअर्सचा आवाज हा यशया 41:10 चा आवाज असतो. हे वचन मला खूप प्रिय आहे.

अर्थातच, माझ्या विश्वासाच्या शस्त्रागारात हाच एक खंजीर नाहीं.

माझी सेवा निरुपयोगी आणि व्यर्थ आहे या विषयीं मी चिंताक्रांत होऊन जातो तेव्हां मी यशया 55:11 मध्ये असलेले अभिवचन घेऊन अविश्वासाशी लढतो. “त्याप्रमाणें माझ्या मुखातून निघणारे वचन होईल; ते माझी इच्छा पूर्ण केल्यावाचून व ज्या कार्यासाठीं मी ते पाठवले ते केल्यावाचून माझ्याकडे विफल होऊन परत येणार नाहीं.”

मी माझे कार्य करण्याच्या बाबतीत अशक्त आहे अशी मला चिंता वाटू लागते, तेव्हा मी ख्रिस्तानें दिलेलें हे अभिवचन घेऊन अविश्वासाशी लढतो, “माझी कृपा तुला पुरेशी आहे; कारण अशक्तपणातच माझी शक्ती पूर्णतेस येते” (2 करिंथ 12:9).

मला भविष्याविषयी निर्णय घ्यायचे असतांत आणि मी त्यांविषयी चिंताग्रस्त असतो, तेव्हा मी हे अभिवचन घेऊन अविश्वासाशी लढतो, “मी तुला बोध करीन; ज्या मार्गाने तुला गेले पाहिजे त्याचे शिक्षण तुला देईन; मी आपली दृष्टी तुझ्यावर ठेवून तुला बुद्धिवाद सांगेन” (स्तोत्र 32:8).

जेव्हां मीं माझ्या विरोधकांना तोंड देण्याविषयीं चिंताक्रांत असतो, तेव्हा मी हे अभिवचन घेऊन अविश्वासाशी लढतो, “देव आपल्याला अनुकूल असल्यास आपल्याला प्रतिकूल कोण?” (रोमकरांस 8:31).

मी ज्यांच्यावर प्रीति करतो त्यांच्या कल्याणासाठीं मीं चिंताक्रांत असतो, तेव्हा मी हे अभिवचन घेऊन अविश्वासाशी लढतो की, मीं वाईट असताना आपल्या मुलाबाळांना चांगल्या देणग्या देणें मला समजते, “तर तुमच्यां स्वर्गातील पित्याजवळ जे मागतात त्यांना तो किती विशेषेकरून चांगल्या देणग्या देईल!” (मत्तय 7:11).

यास्तव पवित्र शास्त्रातील प्रत्येक अभिवचन घेऊन अविश्वासाशी सर्वप्रकारे लढा द्या. पण एक केन्द्रिय हत्यार बाळगणें सहायक ठरते. आणि माझ्यासाठीं ते आहे यशया 41:1, “तू भिऊ नकोस, कारण मी तुझ्याबरोबर आहे, घाबरू नकोस, कारण मी तुझा देव आहे; मी तुला शक्ती देतो, मी तुझे साहाय्यही करता, मी आपल्या नीतिमत्तेच्या उजव्या हाताने तुला सावरतो.”  अनमोल, बहुमूल्य अभिवचन!

14 नवम्बर : परिवर्तन की वास्तविकता

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14 नवम्बर : परिवर्तन की वास्तविकता
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“न वेश्यागामी, न मूर्तिपूजक, न परस्त्रीगामी, न लुच्‍चे, न पुरुषगामी, न चोर, न लोभी, न पियक्‍कड़, न गाली देनेवाले, न अन्धेर करनेवाले परमेश्‍वर के राज्य के वारिस होंगे। और तुम में से कितने ऐसे ही थे, परन्तु तुम प्रभु यीशु मसीह के नाम से और हमारे परमेश्‍वर के आत्मा से धोए गए और पवित्र हुए और धर्मी ठहरे।” 1 कुरिन्थियों 6:9-11

मसीही आस्था का प्रमाण उसके सामर्थ्य में है। केवल मसीह का सामर्थ्य ही खोए हुए, शर्म से डूबे हुए पुरुषों और महिलाओं को परमेश्वर के पुत्र-पुत्रियाँ बना सकता है। ऐसा कोई अपराध या लज्जा नहीं है जो किसी व्यक्ति को परमेश्वर के क्षमा करने वाले अनुग्रह से वंचित कर सके।

जब पौलुस एक लम्बी, कुरूप पापों की सूची को समाप्त करता है, तो वह कहता है, “तुम में से कितने ऐसे ही थे।” यह वाक्य पछतावे की नहीं, बल्कि विजय की पुकार है। यह भूतकाल है, वर्तमान नहीं। क्यों? यीशु के रूपान्तरित करने वाले सामर्थ्य के कारण! कोई पुरुष स्वयं को नहीं बदल सकता; कोई स्त्री स्वयं को नहीं बदल सकती—परन्तु यीशु उन्हें बदल सकता है!

क्या हम वास्तव में विश्वास करते हैं कि सम्पूर्ण व्यक्तिगत रूपान्तरण सम्भव है? हम अक्सर लोगों को सतही समाधान देने का प्रयास करते हुए उनसे कहते हैं कि वे अनुग्रह से उद्धार तो पा गए हैं, लेकिन अब उन्हें अपने पिछले पापों के कारण जीवनभर लड़खड़ाते हुए चलना होगा, या यह कि अब उन्हें स्वयं को बदलने के लिए कड़ी मेहनत करनी होगी। यह सन्देश हमने कहाँ से सीखा?

क्या यीशु ने कभी किसी से कहा, मैं तुम्हें छूऊँगा और थोड़ा-बहुत बदल दूँगा—बाकी अब तुम्हारे ऊपर है? नहीं! उसने कहा, मैं तुम्हें अन्दर से बाहर तक बिल्कुल नया बना दूँगा। मैं तुम्हारा रूपान्तरण करूँगा, तुम्हें मुक्त करूँगा, तुम्हें बदल दूँगा। यही यीशु का सुसमाचार है। और यही गवाही कुरिन्थुस के मसीहियों की भी थी—वे पहले एक प्रकार के लोग थे: पाप में डूबे हुए, न्याय के पात्र। लेकिन फिर वे बदल दिए गए। अब वे भिन्न थे। तो यह रूपान्तरण कहाँ से आरम्भ होता है? अपने पाप को स्पष्ट रूप से देखने से।

यदि मैं स्वयं को पापी नहीं समझता, तो मैं स्वयं को उद्धार पाने योग्य कैसे समझूँगा? हमें अपनी विकृति की गहराई का सामना करना होगा, ताकि जब परमेश्वर का वचन हमें बताए कि यीशु जीवन की हर उलझन और कठिनाई से लोगों को बचाने आया और उन्हें भीतर से बदलने के लिए अपना आत्मा देना चाहता है, तो हम पूरे मन और दोनों हाथों से उसकी ओर बढ़ें। यही उद्धार है! यही रूपान्तरण है!

हर मसीही विश्वासी इस सच्चाई का जीवित प्रमाण है कि परमेश्वर जीवनों को बदलता है। हर जगह ऐसे पुरुष और महिलाएँ हैं जो मसीह की सृजनात्मक और जीवन-परिवर्तक सामर्थ्य के जीवित प्रमाण हैं। तो क्या हम ऐसी कलीसिया के लिए तैयार हैं, जिसके सदस्य पहले व्यभिचारी, व्यसनी, शराबी, और छल करने वाले लोग थे—जो अब मसीह में बदल दिए गए हैं? क्या हम यह स्वीकार करने को तैयार हैं कि हम भी पहले ऐसे ही थे, परन्तु अब परमेश्वर के अनुग्रह से बदल गए हैं? या हम केवल ऐसी कलीसियाएँ चाहते हैं जो बाहर से अच्छी तरह सजे हुए, “स्वीकार्य” लोगों से भरी हों, जिन्हें यीशु की ज़रूरत ही महसूस नहीं होती?

यीशु बचाता है और यीशु बदलता है। विश्वास के द्वारा, आप अब वह नहीं हैं जो पहले थे—और अगले महीने, अगले वर्ष, आप फिर कह सकेंगे: “मैं अब भी वैसा नहीं हूँ जैसा पहले था।” आपको कौन ऐसा लगता है जो पाप में इतना डूबा है कि वह मसीह के पास नहीं आ सकता? उसके लिए प्रार्थना करें कि परमेश्वर उसे रूपान्तरित करे। आपके जीवन का कौन सा भाग आपको ऐसा लगता है कि कभी नहीं बदलेगा? उसके लिए भी प्रार्थना करें कि परमेश्वर उसे रूपान्तरित करे। आप किसी को भी नहीं बदल सकते, यहाँ तक कि खुद को भी नहीं। लेकिन जो काम आप नहीं कर सकते, उसे करने के लिए मसीह सामर्थी है।

2 कुरिन्थियों 3:17 – 4:6

पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: 1 इतिहास 10–12; लूका 1:39-56 ◊

13 नवम्बर : प्रभु में सहमति

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13 नवम्बर : प्रभु में सहमति
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“मैं यूओदिया को भी समझाता हूँ और सुन्तुखे को भी, कि वे प्रभु में एक मन रहें। हे सच्चे सहकर्मी, मैं तुझ से भी विनती करता हूँ कि तू उन स्त्रियों की सहायता कर, क्योंकि उन्होंने मेरे साथ सुसमाचार फैलाने में, क्लेमेंस और मेरे अन्य सहकर्मियों समेत परिश्रम किया, जिनके नाम जीवन की पुस्तक में लिखे हुए हैं।” फिलिप्पियों 4:2-3

विभाजन कलीसियाओं को भीतर से खोखला कर देता है।

इसी कारण पौलुस ने फिलिप्पी की कलीसिया की दो स्त्रियों—युओदिया और सुन्तुखे—के आपसी मतभेद की खबर को गम्भीरता से लिया। उसने अपने पत्र में उन्हें समझाया कि “वे प्रभु में एक मन रहें।” और इस असहमति को सम्बोधित करते हुए प्रेरित पौलुस हमें मेल-मिलाप का एक उपयोगी आदर्श प्रस्तुत करता है। वह स्पष्ट करता है कि हमें यह याद रखना चाहिए कि हम “प्रभु में” अपने भाइयों और बहनों से जुड़े हुए हैं। यह वाक्यांश हमारी असली पहचान को दर्शाता है: हम अपने नहीं हैं; हम मसीह के हैं।

इसलिए पौलुस युओदिया और सुन्तुखे से आग्रह करता है कि वे “प्रभु में” अपनी एकता को याद करें और परमेश्वर की उस शिक्षा के अधीन हो जाएँ जो प्रेरितों के द्वारा आई थी—वैसे ही जैसे आज हम बाइबल के माध्यम से परमेश्वर के वचन के अधीन होते हैं। बाइबल यह स्पष्ट करती है कि मसीही जीवन में हमें पहले परमेश्वर से प्रेम करना है और उसकी सेवा करनी है। और जब हम उसे प्रसन्न करने का प्रयास करते हैं, तो वह हमारे हृदयों में ऐसा कार्य करता है कि हम अपने पड़ोसियों की भलाई के लिए उनकी सेवा करने की लालसा रखते हैं, ताकि उन्हें उन्नति मिले (रोमियों 15:2)।

जब हम यह भूल जाते हैं कि हम पूरी तरह मसीह के हैं, तो हम जल्दी ही अपने स्वार्थों को बढ़ावा देने लगते हैं, अपने उद्देश्यों को स्थापित करने लगते हैं, अपने अधिकारों की लड़ाई लड़ने लगते हैं, और अपने घमण्ड पर सवार होकर उनसे झगड़ने लगते हैं जो हमसे असहमत हैं। विश्वासियों के बीच कलह हमें अक्सर छोटी-छोटी बातों में उलझा देती है, जो केवल विवाद में पड़े लोगों की नहीं बल्कि पूरी कलीसिया की ऊर्जा को समाप्त कर देती हैं। परिणामस्वरूप, कलीसिया बाहर की ओर हाथ बढ़ाने की बजाय अन्दर की ओर केन्द्रित हो जाती है। यह अत्यन्त असंगत बात है कि हम जबरदस्ती अपनी बात मनवाने की कोशिश करें, जबकि हमारा उद्धारकर्ता कभी ऐसा नहीं करता था। यदि यीशु भी हमारी तरह स्वार्थी भाव से अपने बारे में सोचता, तो न तो वह देहधारण करता, न क्रूस पर मरता, न हमें क्षमा मिलती, और न ही स्वर्ग की कोई आशा होती।

हमें यह दिखावा नहीं करना चाहिए कि विश्वासियों के बीच असहमति नहीं होती—वह होती है। लेकिन छुड़ाए गए लोगों के समूह के रूप में हमें “प्रभु में” अपनी एकता की नींव पर खड़े होकर असहमतियों को हल करना है। हमारा ध्यान हमारे स्वयं पर केन्द्रित नहीं रह सकता। टूटे हुए सम्बन्धों को चंगा करने में हमें मसीह का अनुकरण करते हुए मेल-मिलाप की पहल करनी चाहिए।

यह हम सभी के लिए एक बुलाहट है। यदि आज आप युओदिया और सुन्तुखे की स्थिति में हैं, तो आपके लिए बुलावा स्पष्ट है, भले ही यह चुनौतीपूर्ण हो: “प्रभु में एक मन रहें।” चाहे और कुछ भी विभाजित करता हो, मसीह में आपकी एकता उससे कहीं अधिक गहरी है। और यदि आप ऐसी कलीसिया में हैं जहाँ युओदिया और सुन्तुखे हैं, तो आपसे भी वही भूमिका निभाने की अपेक्षा की गई है, जो पौलुस ने अपने “सच्चे साथी” से करने को कहा था: जो विभाजित हैं, उन्हें मेल कराने में सहायता करें। सच्चा प्रेम पहल करता है। सच्चा प्रेम हस्तक्षेप करता है। सच्चा प्रेम विभाजन को बढ़ने नहीं देता, बल्कि उस एकता के लिए प्रयास करता है जो कलीसिया को मजबूत करती है।

यूहन्ना 17:1-26

◊ पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: 1 इतिहास 7–9; लूका 1:21-38

13 November : तुमचे अंतःकरण कठोर करू नका

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13 November : तुमचे अंतःकरण कठोर करू नका
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आणि ‘शपथ वाहून’ तो (परमेश्वर) कोणाला म्हणाला की, ‘तुम्हीं माझ्या विसाव्यात येणार नाहीं’? ज्यांनी अवज्ञा केली त्यांनाच की नाहीं? तरी ह्यावरून आपल्याला दिसून येते की, अविश्वासामुळे त्यांना आत येता आले नाहीं. (इब्री 3:18-19)

जरी इस्राएली लोकांनी तांबड्या समुद्राचे पाणी दुभागतांना पाहिले आणि ते कोरड्या भूमीवरून चालत गेले, तरीही ज्या क्षणी त्यांना तहान लागली, त्या क्षणी त्यांची अंतःकरणें परमेश्वराविरुद्ध कठोर झालीं आणि तो त्यांची काळजी घेईल असा भरवंसा त्यांनी केला नाहीं. ते त्याच्याविरुद्ध आरडाओरड करू लागले आणि म्हणाले की मिसर देशातील जीवन चांगले होते. 

अंत:करणाच्या अशा कठोरतेवर आळा घालणेंच इब्रीकरांस पत्र लिहिण्या मागचा हेतू होता. किती तथाकथित ख्रिस्ती परमेश्वरावर विश्वासाची सुरूवात करतात. ते ऐकतात की त्यांची पापे क्षमा केली जाऊ शकतात आणि नरकापासून त्यांचा बचाव होऊन ते स्वर्गात जाऊ शकतात. आणि ते म्हणतात: “यांत तर मी काहींच गमावत नाहीं? मग मी विश्वास ठेवायला काय जाते.”

मग एका आठवड्यात किंवा महिन्यात किंवा वर्षात अथवा दहा वर्षानंतर, परीक्षा येते – अरण्यात पाणी नसण्याचा काळ. मन्ना खाऊन-खाऊन आलेला किळस. आणि मिसर देशातल्या क्षणीक सुखांसाठीं मनांत गुप्तपणें वावरणारी इच्छा, जसे गणना 11:5-6 म्हणते, “मिसर देशात आम्हांला मासे फुकट खायला मिळत असत त्याची आठवण आम्हांला येते. त्याचप्रमाणें काकड्या, खरबुजे, भाजी, कांदे, लसूण ह्यांचीही आम्हांला आठवण येते; पण आता आमचा जीव सुकून गेला आहे; येथे ह्या मान्न्याशिवाय आमच्या दृष्टीस कांहींच पडत नाहीं.”

या परिस्थितीत राहणें भयावह आहे – ख्रिस्ताठायीं आणि त्याच्या वचनात आणि प्रार्थनेत आणि उपासनेत आणि सुवार्ता प्रचारात आणि परमेश्वराच्या गौरवासाठीं जगण्यात आता तुम्हांला कुठलीही रूचि वाटत नाहीं असें तुम्हांला दिसून येते. आत्म्याच्या गोष्टींपेक्षा या जगाची क्षणिक सुखे जास्त आकर्षक आहेत असें आता दिसून येते.

जर ही तुमची परिस्थिती असेल, तर मी तुम्हांला विनंती करतो की या वचनात पवित्र आत्मा जे बोलत आहे ते तुम्हीं ऐकावे. “ते अविश्वासामुळे प्रवेश करू शकले नाहींत!” परमेश्वराच्या वचनाकडे लक्ष द्या. तुमचे अंतःकरण कठोर करू नका. पापाच्या धोक्याबाबत जागृत व्हा. तुम्हीं पत्करलेल्या मार्गाचा प्रेषित व प्रमुख याजक ख्रिस्त येशू ह्याच्याकडे लक्ष लावा, आणि त्याच्यामध्ये तुम्हीं जो पत्कर केलेला आहे वा जी आशा धरली आहे ते दृढ धरून राहा.

आणि जर तुम्हीं अजूनही देवावर विश्वास ठेविलेला नसेल, तर त्याच्यावर तुमची आशा धरा. पापापासून आणि स्वतःवर अवलंबून राहण्यापासून मागे फिरा आणि थोर तारणकर्त्यावर तुमचा विश्वास असू द्या. यां गोष्टी यासाठीं लिहिण्यात आल्या आहेत की तुम्हीं विश्वास धरावा आणि धीर धरावा, आणि जिवंत राहावें.

12 नवम्बर : हम क्षमा क्यों करते हैं

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12 नवम्बर : हम क्षमा क्यों करते हैं
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“एक दूसरे पर कृपालु और करुणामय हो, और जैसे परमेश्‍वर ने मसीह में तुम्हारे अपराध क्षमा किए, वैसे ही तुम भी एक दूसरे के अपराध क्षमा करो।” इफिसियों 4:32

परमेश्वर की क्षमा केवल उसके हृदय की अभिव्यक्ति नहीं है (हालाँकि यह निश्चित रूप से है), बल्कि यह उसके वचन से एक प्रतिज्ञा भी है। इसलिए परमेश्वर की क्षमा का हमारा अनुभव सीधे इस बात पर निर्भर करता है कि हम उसके वचन पर कितना विश्वास करते हैं।

इब्रानियों का लेखक यह स्पष्ट करता है कि हमारे पापों की क्षमा का भरोसा केवल यीशु के प्रायश्चित करने वाले लहू पर आधारित है (इब्रानियों 10:19-22)। इसके अलावा, जब हम पश्चाताप के साथ परमेश्वर के पास आते हैं, तो वह प्रतिज्ञा करता है कि वह हमारे पापों को फिर कभी याद नहीं करेगा (पद 17)। परमेश्वर ने स्वयं यह प्रतिज्ञा की है कि वह हमारे अधर्मों का लेखा-जोखा नहीं रखेगा (यशायाह 43:25)। दूसरे शब्दों में, यदि हम उन बातों को लेकर फिर से परमेश्वर के पास जाते हैं जिन्हें वह पहले ही क्षमा कर चुका है, तो वह मानो यह कहता है: मेरे प्यारे बच्चे, मुझे याद नहीं कि तुम किस बारे में बात कर रहे हो। मैंने प्रतिज्ञा की है कि मैं उस बात को फिर कभी नहीं उठाऊँगा—और इसलिए, तुम्हें भी ऐसा नहीं करना चाहिए।

परमेश्वर का उदाहरण इस बात का आदर्श है कि हमें दूसरों को कैसे क्षमा करना चाहिए। दूसरों को क्षमा करना एक भावना का विषय नहीं है; यह एक प्रतिज्ञा और आज्ञाकारिता का विषय है। जब आप या मैं किसी को क्षमा करते हैं, तो हम मूल रूप से तीन बिन्दुओं वाली प्रतिज्ञा करते हैं: पहली, हम उस व्यक्ति के साथ उस बात को फिर कभी नहीं उठाएँगे; दूसरी, हम वह बात किसी और के सामने नहीं लाएँगे; और तीसरी, हम उसे अपने मन में भी दोबारा नहीं लाएँगे। सच्चे मन से क्षमा करने का अर्थ यह कहना है: “मैं तुम्हारे लिए वही करना चाहता हूँ जो परमेश्वर ने मसीह में मेरे लिए किया है।”

इसका यह अर्थ नहीं है कि क्षमा केवल हमारे मन की एक कल्पना है या सिर्फ इच्छा-शक्ति का एक कार्य है। बाइबल स्पष्ट रूप से कहती है कि हमें दिल से क्षमा करना चाहिए (मत्ती 18:35)। लेकिन इसका यह अर्थ अवश्य है कि जब हम मसीह में मिली अपनी क्षमा के प्रति जागरूकता और कृतज्ञता से प्रेरित होकर परमेश्वर की आज्ञा का पालन करते हुए दूसरों को क्षमा करते हैं—तभी हमारी क्षमा सबसे अधिक सच्ची और प्रभावशाली होती है।

क्या कोई ऐसा व्यक्ति है जिसे आपको क्षमा करने की आवश्यकता है? हो सकता है कि आज उस व्यक्ति को क्षमा करने का आपका मन न कर रहे हों—लेकिन यह आपकी भावना का विषय नहीं है। मसीह में परमेश्वर की क्षमा पाने वाले के रूप में आपको वैसी ही क्षमा करने के लिए बुलाया गया है, जैसी उसने आपको दी है। यह आसान नहीं है, लेकिन यह सम्भव है। परमेश्वर का आत्मा आपको वह प्रतिज्ञा करने और उसे निभाने की सामर्थ्य दे सकता है। जब आप परमेश्वर की आज्ञा का पालन करते हुए वह तीन बिन्दुओं वाली प्रतिज्ञा करके क्षमा करते हैं, तो वह न केवल आपके निर्णय को दृढ़ बनाएगा, बल्कि धीरे-धीरे आपके मन की भावनाओं को भी उसी के अनुसार ढाल देगा।

मत्ती 18:21-35

पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: 1 इतिहास 4– 6; लूका 1:1-20 ◊

12 November : सैतान हा देवाच्या संकल्पानुसार कसे कार्य करतो.

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12 November : सैतान हा देवाच्या संकल्पानुसार कसे कार्य करतो.
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पाहा, ‘ज्यांनी सहन केले त्यांना आपण धन्य म्हणतो.’ तुम्हीं ईयोबाच्या धीराविषयी ऐकले आहे, आणि त्याच्याविषयीचा प्रभूचा जो हेतू होता तो तुम्हीं पाहिला आहे; ह्यावरून ‘प्रभू फार कनवाळू व दयाळू’ आहे हे तुम्हांला दिसून आले. (याकोब 5:11)

सर्व रोग आणि अपंगत्वामागे निर्णायक भूमिका ही परमेश्वराची असते. यात सैतानाचा सहभाग नाहीं असें नाहीं – विध्वंसकारक हेतूंमध्ये कुठल्याना कुठल्याप्रकारे तो संभवतः नेहमीच सहभागी असतो (प्रेषित 10:38). पण त्याचे सामर्थ्य निर्णयाक नाहीं. तो परमेश्वराच्या परवानगीवाचून कांहींएक करू शकत नाहीं.

ईयोबाचा आजारपणाद्वारें ज्यां ज्यां गोष्टीं सूचित होतांत त्यांपैकी एक ही आहे. वचनात हे स्पष्टपणें सांगण्यात आले आहे की जेव्हा ईयोबावर आजारांचा मारा झाला तेव्हा, “सैतानाने ईयोबाला मोठमोठ्या गळवांनी नखशिखान्त अतिशय पिडले” (ईयोब 2:7). त्याच्या पत्नीने त्याला आग्रह केला की त्यानें परमेश्वराला शाप देऊन मरून जावे. पण ईयोब म्हणाला, “देवापासून सुखच घ्यावे, आणि दुःख घेऊ नये काय?” (ईयोब 2:10). आणि पुन्हा या पुस्तकाचा परमेश्वर प्रेरित लेखक असें म्हणून ईयोबाची प्रशंसा करतो (जसे त्यानें 1:22 मध्ये केले), “ह्या सर्व प्रसंगी ईयोबाने आपल्या वाचेने कांहीं पाप केले नाहीं.”

दुसऱ्या शब्दात सांगायचे तर : सैतानावर परमेश्वराच्या प्रभुत्वाचा हा योग्य दृष्टिकोण आहे. सैतान वास्तविक आहे आणि आमच्या संकटांत त्याचा हात असू शकतो, पण शेवटचा हात नाहीं, आणि निर्णायक हात तर नाहीं. याकोब स्पष्ट करतो की ईयोबाच्या सर्व कष्टांत परमेश्वराचा चांगला हेतू होता: “पाहा, ‘ज्यांनी सहन केले त्यांना आपण धन्य म्हणतो.’ तुम्हीं ईयोबाच्या धीराविषयी ऐकले आहे, आणि त्याच्याविषयीचा प्रभूचा जो हेतू होता तो तुम्हीं पाहिला आहे; ह्यावरून ‘प्रभू फार कनवाळू व दयाळू’ आहे हे तुम्हांला दिसून आले” (याकोब 5:11).

म्हणून जरी इयोबाला पीडण्यांत सैतानाचा हाथ होता, तरी अंतिम हेतू परमेश्वराचा होता, आणि तो “कनवाळू व दयाळू” होता.

हाच धडा आपल्याला 2 करिंथ 12:7 वरून शिकावयास मिळतो, जेथे पौल म्हणतो की त्याच्या शरीरातील काटा “सैतानाचा एक दूत” होता आणि त्याच्या स्वतःच्या पवित्रतेच्या निमित्ताने तो देण्यात आला होता – त्यानें फार चढून जाऊ नये म्हणून. “प्रकटीकरणांच्या विपुलतेमुळे मी चढून जाऊ नये म्हणून माझ्या शरीरात एक काटा, म्हणजें मला ठोसे मारण्याकरता सैतानाचा एक दूत, ठेवण्यात आला आहे; मी फार चढून जाऊ नये म्हणून ठेवण्यात आला आहे!”

पण लक्षांत घ्यां, आपण हे क्लेश भोगतो ते आपण क्लेशात नम्र व्हावें हा सैतानाचा हेतू नसतो. म्हणून, हेतू हा परमेश्वराचा असतो. याचा अर्थ येथे हा आहे की परमेश्वराचे उत्तम हेतू पौलाच्या जीवनात साध्य करण्यासाठीं परमेश्वर सैतानाचा उपयोग करीत आहे. खरे म्हणजें, परमेश्वराच्या निवडलेल्यांच्या बाबतींत, सैतान आमचा नाश करू शकत नाहीं, आणि शेवटी परमेश्वर त्याचे सर्व हल्ले आमच्यासाठीं सर्व कल्याणार्थ व्हावें म्हणून त्याच्यावरच उलथून टाकतो.

11 नवम्बर : प्रतिज्ञा और आशीष

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11 नवम्बर : प्रतिज्ञा और आशीष
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“मैं तुझ से एक बड़ी जाति बनाऊँगा, और तुझे आशीष दूँगा, और तेरा नाम महान करूँगा, और तू आशीष का मूल होगा। जो तुझे आशीर्वाद दें, उन्हें मैं आशीष दूँगा; और जो तुझे कोसे, उसे मैं शाप दूँगा; और भूमण्डल के सारे कुल तेरे द्वारा आशीष पाएँगे।” उत्पत्ति 12:1-3

जब भोजन तैयार किया जा रहा होता है, तो बच्चों का इधर-उधर दौड़ना स्वाभाविक है। कभी-कभी माता-पिता को लगता है कि वे चिल्ला उठें, “सुनो, तुम लोग रसोई में बाहर क्यों नहीं जाते? चलो, बाहर जाओ!”

बेबीलोन की मीनार पर लोग सिर्फ इधर-उधर भाग नहीं रहे थे; उन्होंने परमेश्वर से मुँह मोड़ लिया था। अपना स्वयं का राज्य स्थापित करने के इरादे से उन्होंने एक मीनार बनाई और स्वर्ग तक पहुँचने का प्रयास किया, ताकि वे देख सकें कि वे अपनी शक्ति से क्या कर सकते हैं। इस विद्रोह के परिणामस्वरूप, परमेश्वर ने उनकी भाषा बदलकर उन्हें संसार भर में बिखेर दिया (उत्पत्ति 11:1-9)।

एक निराश माता-पिता से कहीं अधिक न्यायसंगत होने के बावजूद, परमेश्वर लोगों को दूर भेज सकता था और उनका अन्त कर सकता था। लेकिन उसने ऐसा नहीं किया।

अपनी कृपा को प्रकट करने के लिए अगली ही पीढ़ी में परमेश्वर ने उसे सुधारना आरम्भ किया, जो टूट चुका था। उसने अब्राम नामक एक वृद्ध और निस्सन्तान मूर्तिपूजक व्यक्ति से बात की, जिसका नाम विडम्बनात्मक रूप से “उत्कृष्ट पिता” था, और उसने बेबीलोन के न्याय के प्रभाव को उलट देने की प्रतिज्ञा की। वहाँ लोग अपना नाम महान बनाने का प्रयास कर रहे थे, लेकिन परमेश्वर अब्राम का नाम महान बनाने जा रहा था। वे अपना स्वयं का राज्य स्थापित करना चाहते थे, लेकिन परमेश्वर अब्राम के लोगों को एक महान राष्ट्र बनाने जा रहा था। वे परमेश्वर से रहित संसार में आशीष खोजने का प्रयास कर रहे थे, लेकिन परमेश्वर अब्राम के परिवार के माध्यम से पूरी पृथ्वी पर आशीष लाने जा रहा था। परमेश्वर के अनुग्रह के द्वारा पाप को उलट दिया जाएगा और उसके प्रभाव को मिटा दिया जाएगा।

इस वाचा में परमेश्वर ने अब्राम को लेकर उसे अब्राहम अर्थात “अनेकों का पिता” बनाया, जब उसने अपने चुने हुए सेवक पर अपनी कृपा करने और पृथ्वी पर बिखरी भविष्य की पीढ़ियों को आशीष देने की प्रतिज्ञा की।

परमेश्वर द्वारा अब्राहम से की गई प्रतिज्ञा सुसमाचार की प्रतिज्ञा की एक प्रारम्भिक अभिव्यक्ति है। उसने अब्राहम से प्रतिज्ञा की और आगे चलकर अब्राहम के वंशजों को आशीष मिली। हालाँकि, वे अन्ततः यह जानेंगे कि प्रतिज्ञा और आशीष उन सभी के लिए भी है, जो यीशु पर विश्वास करते हैं: “क्योंकि तुम सब उस विश्वास के द्वारा जो मसीह यीशु पर है, परमेश्वर की सन्तान हो . . . और यदि तुम मसीह के हो तो अब्राहम के वंश और प्रतिज्ञा के अनुसार वारिस भी हो” (गलातियों 3:26, 29)। इसलिए जबकि परमेश्वर ने जो प्रतिज्ञाएँ अब्राहम से की थीं, वे पुराने नियम के इस्राएल राष्ट्र में आंशिक रूप से पूरी हुई थीं, तौभी वे अन्ततः यीशु मसीह के सुसमाचार और उसके लोगों में सम्पूर्ण रूप से पूरी हुईं।

इस पूर्णता की विशालता का केवल एक छोटा सा आभास पाकर आपका जीवन हमेशा के लिए बदल जाएगा। यदि आप आज मसीह में हैं, तो परमेश्वर द्वारा अब्राहम से की गई प्रतिज्ञा में आपका नाम भी शामिल है। आप स्वर्ग के नागरिक हैं और एक ऐसे राजा की सेवा करते हैं जो अब्राहम के वंश से उत्पन्न हुआ है, जिसका नाम यीशु है। जो कुछ परमेश्वर ने अब्राम से कहा था, वह अब आपके लिए भी पूरा हुआ है क्योंकि परमेश्वर लोगों को अपने राज्य में वापस बुला रहा है, ताकि वे हमेशा के लिए उनकी साक्षात उपस्थिति का आनन्द उठाएँ। आज आप चाहे जो भी हैं, विश्वास के द्वारा आप परमेश्वर की सन्तान हैं, अब्राहम के लोगों के सदस्य हैं, और इन महान प्रतिज्ञाओं के उत्तराधिकारी हैं।

उत्पत्ति 11:1-9; 12:1-9

◊ पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: 1 इतिहास 1–3; यहूदा

11 November : आपण तर त्याचे घर आहोत

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11 November : आपण तर त्याचे घर आहोत
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कारण ज्या मानाने घर बांधणाऱ्याला सबंध घरापेक्षा अधिक सन्मान आहे त्या मानाने हा मोशेपेक्षा अधिक वैभवास योग्य गणलेला आहे. कारण प्रत्येक घर कोणीतरी बांधलेले असते; पण सर्वकांहीं बांधणारा देवच आहे. जे पुढे विदित होणार होते याविषयीच्या साक्षीसाठीं ‘त्याच्या सबंध घरात मोशे सेवक ह्या नात्यानें विश्वासू होता.’ ख्रिस्त तर ‘देवाच्या घरावर’ नेमलेला पुत्र ह्या नात्यानें विश्वासू होता, आणि आपण आपला भरवसा व आपल्या आशेचा अभिमान शेवटपर्यंत दृढ राखल्यास त्याचे ते घर आहोत. (इब्री 3:3-6)

जे लोक येशू ख्रिस्ताठायीं अभिमान बाळगतात आणि त्याची आशा धरतात ते परमेश्वराचे घर आहेत. याचा अर्थ असा की येशू हा  केवळ मोशेच्या काळांत किंवा जेव्हां तो ह्या पृथ्वीवर प्रकट झाला केवळ त्यां दिवसातच नव्हे – तर अगदी आज, म्हणजें संप्रतकाळीही आपला उत्पन्नकर्ता, आपला स्वामी, आपला शासक आणि आपल्याला सर्वकांहीं पुरविणारा आपला प्रदाता (पोशिंदा) आहे.

येशूला या घराचा “बांधणारा” म्हटलेले आहे. मोशे हा ‘बांधणारा’ नव्हता. तो घराचा सदस्य होता. म्हणून असें म्हटलेले आहे की, “येशू मोशेपेक्षा अधिक वैभवास योग्य गणलेला आहे – ज्या मानाने घर बांधणाऱ्याला सबंध घरापेक्षा अधिक सन्मान आहे त्या मानाने.”  म्हणून मोशे, घराचे नेतृत्व करण्याच्या बाबतींत, आणि घरास परमेश्वराचे वचन देण्याच्या बाबतींत महान असला, तरीही तो घराचा केवळ एक सदस्य होता. पण घर येशूनें बांधले.

म्हणून जर आपण येशूठायीं अभिमान बाळगतो आणि येशूठायीं आशा धरतो तर आपण घर आहोत, आणि येशू हा आपला घर बनविणारा आणि स्वामी आणि शासक आणि पोशिंदा आहे. तो त्याच्या घराचा नाश होऊ देत नाहीं किंवा ते उध्वस्तही होऊ देत नाहीं.

मग लेखक आपले कल्पनाचित्र बांधणारा आणि घर या पासून, पुत्र आणि सेवक याकडे वळवतो. ”त्याच्या सबंध घरात मोशे सेवक ह्या नात्यानें विश्वासू होता.’ ख्रिस्त तर ‘देवाच्या घरावर’ नेमलेला पुत्र ह्या नात्यानें विश्वासू होता.” म्हणून ख्रिस्त त्यानें बनविलेल्या घराचा भाग बनला – घराण्याचा भाग बनला. पण तरीही, त्याचा आदर मोशेपेक्षा कितीतरी अधिक वरचा आहे. मोशे सेवक होता. ख्रिस्त पुत्र आहे. वारस आहे.

आणि आपण या घराचे सदस्य आहोत. इब्री 3:6: “आपण आपला भरवसा व आपल्या आशेचा अभिमान शेवटपर्यंत दृढ राखल्यास त्याचे ते घर आहोत.” सर्वप्रकारे, आपण मोशेचा आदर करावा या आणि जे त्याचे आहे ते आपण त्यास द्यावे. परंतु इब्रीकरांस लिहिलेल्या संपूर्ण पुस्तकांचा मुद्दा हा आहे : ख्रिस्त हा अधिक श्रेष्ठ आहे. प्रत्येक बाबतीत श्रेष्ठ. तो परमेश्वराच्या लोकांच्या घराचा बांधणारा आहे. परमेश्वराच्या लोकांच्या घरात तो पुत्र आहे. आपण मोशेचा आदर करू या. पण आपण येशूची उपासना करू या – जो आमचा कर्ता, आमचा बंधू आहे.

10 नवम्बर : बुराई की वास्तविकता

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10 नवम्बर : बुराई की वास्तविकता
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“मन तो सब वस्तुओं से अधिक धोखा देने वाला होता है, उसमें असाध्य रोग लगा है; उसका भेद कौन समझ सकता है? ’मैं यहोवा मन की खोजता और हृदय को जाँचता हूँ ताकि प्रत्येक जन को उसकी चाल–चलन के अनुसार अर्थात् उसके कामों का फल दूँ।’” यिर्मयाह 17:9-10

बाइबल दुष्टता की वास्तविकता के बारे में बहुत स्पष्ट है—और यह उस शक्ति की प्रकृति के बारे में भी उतनी ही स्पष्ट है जो संसार में दुष्टता के पीछे कार्यरत है। शैतान, जो दुष्टता का प्रतीक है, अपने शिकार की आत्मिक भलाई का पूरी तरह से विरोधी है। वह एक भयंकर शेर है, और (हालाँकि परमेश्वर के सार्वभौमिक नियन्त्रण से बाहर नहीं है) वह इस संसार का शासक है। वह सभी पापों के पीछे की शक्ति है; और जब तक कोई व्यक्ति परमेश्वर के आत्मा द्वारा नया जन्म नहीं पाता, वह वास्तव में उसके अधीन होता है, और उसके बुरे कर्म उसके स्वामित्व का प्रमाण होते हैं।

बेशक, अधिकांश समकालीन लोग दुष्टता की एक वास्तविक शक्ति के अस्तित्व का मजाक उड़ाते हैं। वे कहते हैं, “ओह, आप किसी दुष्टता की आध्यात्मिक शक्ति के अस्तित्व में विश्वास नहीं कर सकते। क्या आप सचमुच विश्वास करते हैं?” लेकिन जब वे शैतान के व्यक्तिगत अस्तित्व के विचार को कम करके आँकते हैं, तो ऐसे लोग यह समझाने में विफल रहते हैं कि ऐसा कैसे हो सकता है कि हम इतनी बड़ी तकनीकी प्रगति करने के बावजूद भी हम अपने जीवन की पापी प्रवृत्तियों को पिछली पीढ़ियों से बेहतर नियन्त्रण में क्यों नहीं रख सकते। ऐसा क्यों है?

बाइबल सिखाती है कि जब आदम अपनी पत्नी का अनुसरण करते हुए स्वयं को उस धोखेबाज के प्रभाव में ले आया और पाप कर बैठा, तो वह पूरी मानवता को अपने साथ पतन में ले गया। दूसरे शब्दों में, जब आदम ने पाप किया, तो हम सभी ने पाप किया। हम में से प्रत्येक का जन्म पतित अवस्था में हुआ है। इसीलिए हमारे हृदय—हमारे अस्तित्व का केन्द्र, हमारी भावनाओं, हमारी इच्छाओं, हमारे निर्णयों का स्रोत—“सब वस्तुओं से अधिक धोखा देने वाला होता है, उसमें असाध्य रोग लगा है।” यीशु ने फरीसियों से जो कहा, यिर्मयाह ने उसका पूर्वानुमान लगा लिया था: “ऐसी कोई वस्तु नहीं जो मनुष्य में बाहर से समाकर उसे अशुद्ध करे; परन्तु जो वस्तुएँ मनुष्य के भीतर से निकलती हैं, वे ही उसे अशुद्ध करती हैं . . . क्योंकि भीतर से, अर्थात् मनुष्य के मन से बुरे-बुरे विचार, व्यभिचार, चोरी, हत्या, परस्त्रीगमन,” और सभी प्रकार की बुराई निकलती है, जो स्पष्ट और गुप्त दोनों होती हैं (मरकुस 7:15, 21)।

जबकि ये सत्य इस संसार में हमें दिखने वाली सच्चाई का एक प्रेरक स्पष्टीकरण प्रदान करते हैं, वे हमें अपने बारे में एक बहुत चुनौतीपूर्ण दृष्टिकोण भी प्रस्तुत करते हैं। सच यह नहीं है कि हम अच्छे लोग हैं जो गलतियाँ कर बैठते हैं; बल्कि हम पापी लोग हैं, जिन्हें दया की आवश्यकता है। क्योंकि यह स्वीकार करने के लिए विनम्रता की आवश्यकता होती है कि हमारे हृदय वास्तव में कैसे हैं, वही हृदय स्वाभाविक रूप से स्वयं की प्रशंसा और आत्मविश्वास के प्रचारकों द्वारा धोखा खा जाते हैं, बजाय इसके कि वे यिर्मयाह जैसे भविष्यद्वक्ताओं की बात सुनें।

सच यह है कि हर कोई एक हृदय के परिवर्तन की आवश्यकता के साथ पैदा होता है—यह परिवर्तन शारीरिक या धार्मिक नहीं, बल्कि आत्मिक परिवर्तन है। केवल परमेश्वर ही इस परिवर्तन को ला सकता है। जैसे परमेश्वर ने हमें आदम के दोष से दोषी ठहराया, वैसे ही वह अपनी कृपा से विश्वासियों को प्रभु यीशु मसीह की धार्मिकता से धर्मी ठहराता है। यीशु में विश्वास करने के कारण हम अन्दर से बाहर तक बदल चुके हैं। हमेशा की तरह आज भी आपके धोखेबाज हृदय के लिए एकमात्र उपचार यह है कि आप विनम्रता और ईमानदारी से प्रभु के पास आकर प्रार्थना करें, “हे परमेश्‍वर, मेरे अन्दर शुद्ध मन उत्पन्न कर, और मेरे भीतर स्थिर आत्मा नए सिरे से उत्पन्न कर” (भजन 51:10)।

मरकुस 7:1-23

पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: एज्रा 9–10; 2 तीमुथियुस 4 ◊

10 November : तुमची भीती दूर करा

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10 November : तुमची भीती दूर करा
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मला भीती वाटेल तेव्हा मी तुझ्यावर भरवसा टाकीन. (स्तोत्र 56:3)

आपल्यां सर्व चिंता ह्यांचे मूळ आमचा अविश्वास आहे या सत्याचे एक संभाव्य स्पष्टीकरण अशाप्रकारे असूं शकते: “मला जवळजवळ दररोज चिंतेच्या भावनांस तोंड द्यावे लागते; आणि म्हणून मला असें वाटते की परमेश्वराच्या कृपेवर माझा विश्वास पूर्णतः अपुरा आहे. म्हणून माझे खरोखर तारण झालें आहे याची मला खात्रीच पटत नाहीं.”

या भीतीला माझे हे उत्तर आहे : समजा तुम्हीं कारस्पर्धेत भाग घेतला आणि तुमचा शत्रू, ज्याला असें वाटते की तुम्हीं तुमची ही शर्यत पूर्ण करू नये, तुमच्यां कारच्या विंडशील्डवर चिखल फेकतो. आणि तात्पुरते तुमचे लक्ष तुमच्यां लक्ष्य रेषेवरून विचलित होऊन जाते आणि तुमची कार अचानक दुसऱ्या दिशेने जाऊ लागते, तेव्हां त्याचा अर्थ असा होत नाहीं की तुम्हीं तुमची शर्यत अर्ध्यावर सोडणार आहात.

आणि निश्चितच याचा अर्थ असाहि नाहीं की तुम्हीं चुकीच्या रेसट्रॅकवर आहात. नाहीं तर, तुमच्यां प्रतिस्पर्धीने –  तुमच्यां शत्रूने – तुम्हांला मुळीच अडथळा आणला नसता. याचा अर्थ असा आहे की तुम्हांला ताबडतोब तुमच्यां विंडशील्डचे वाइपर सुरू करायचे आहे.

जेव्हा तुमच्यां मनात चिंता आक्रमण करते आणि परमेश्वराचे गौरव आणि त्यानें आमच्यासाठीं जे वैभवी भविष्य योजून ठेविलें त्यापासून आपली दृष्टी अंधुक होऊ लागते, तेव्हां त्याचा अर्थ असा होत नाहीं की आपण विश्वासहीन आहोत, अथवा हा की आपण स्वर्गात जाणार नाहीं. याचा अर्थ हा आहे की आपल्या विश्वासावर आक्रमण केलें जात आहे.

पहिला प्रहार होताच, परमेश्वराच्या अभिवचनांवरील आमचा विश्वास डळमळू शकतो आणि विचलित होऊ शकतो. परंतु आपण रेसट्रॅकवर राहून अंतिम रेखा पार करणार किंवा नाहीं हे यावर अवलंबून आहे की, कृपेने, आपण प्रतिरोधाची प्रक्रिया सुरू केली आहे किंवा नाहीं – आपण चिंतेच्या अविश्वासाविरुद्ध प्रतिघात करित आहों किंवा नाहीं. आपण विंडशील्ड वाइपर सुरू करणार आहोत का?

स्तोत्र 56:3 म्हणते, “मला भीती वाटेल तेव्हा मी तुझ्यावर भरवसा टाकीन.”

लक्ष द्या: हे वचन असं म्हणत नाहीं की “माझा भीतीशी कधीही संघर्ष होत नाहीं.” भीती आक्रमण करते, आणि एक सुयुद्ध सुरू होते. म्हणून खऱ्या विश्वासणाऱ्यांस कुठलीही चिंता नसते असें पवित्र शास्त्र गृहित धरत नाहीं. त्याऐवजी, पवित्र शास्त्र आम्हास सांगते की जेव्हां चिंता आम्हांवर आक्रमण करतांत तेव्हां आम्हांला कसें सुयुद्ध करायचे आहे. ते आम्हांला सांगते की विंडशील्ड वाइपर कसे सुरू करावे.