“मन तो सब वस्तुओं से अधिक धोखा देने वाला होता है, उसमें असाध्य रोग लगा है; उसका भेद कौन समझ सकता है? ’मैं यहोवा मन की खोजता और हृदय को जाँचता हूँ ताकि प्रत्येक जन को उसकी चाल–चलन के अनुसार अर्थात् उसके कामों का फल दूँ।’” यिर्मयाह 17:9-10
बाइबल दुष्टता की वास्तविकता के बारे में बहुत स्पष्ट है—और यह उस शक्ति की प्रकृति के बारे में भी उतनी ही स्पष्ट है जो संसार में दुष्टता के पीछे कार्यरत है। शैतान, जो दुष्टता का प्रतीक है, अपने शिकार की आत्मिक भलाई का पूरी तरह से विरोधी है। वह एक भयंकर शेर है, और (हालाँकि परमेश्वर के सार्वभौमिक नियन्त्रण से बाहर नहीं है) वह इस संसार का शासक है। वह सभी पापों के पीछे की शक्ति है; और जब तक कोई व्यक्ति परमेश्वर के आत्मा द्वारा नया जन्म नहीं पाता, वह वास्तव में उसके अधीन होता है, और उसके बुरे कर्म उसके स्वामित्व का प्रमाण होते हैं।
बेशक, अधिकांश समकालीन लोग दुष्टता की एक वास्तविक शक्ति के अस्तित्व का मजाक उड़ाते हैं। वे कहते हैं, “ओह, आप किसी दुष्टता की आध्यात्मिक शक्ति के अस्तित्व में विश्वास नहीं कर सकते। क्या आप सचमुच विश्वास करते हैं?” लेकिन जब वे शैतान के व्यक्तिगत अस्तित्व के विचार को कम करके आँकते हैं, तो ऐसे लोग यह समझाने में विफल रहते हैं कि ऐसा कैसे हो सकता है कि हम इतनी बड़ी तकनीकी प्रगति करने के बावजूद भी हम अपने जीवन की पापी प्रवृत्तियों को पिछली पीढ़ियों से बेहतर नियन्त्रण में क्यों नहीं रख सकते। ऐसा क्यों है?
बाइबल सिखाती है कि जब आदम अपनी पत्नी का अनुसरण करते हुए स्वयं को उस धोखेबाज के प्रभाव में ले आया और पाप कर बैठा, तो वह पूरी मानवता को अपने साथ पतन में ले गया। दूसरे शब्दों में, जब आदम ने पाप किया, तो हम सभी ने पाप किया। हम में से प्रत्येक का जन्म पतित अवस्था में हुआ है। इसीलिए हमारे हृदय—हमारे अस्तित्व का केन्द्र, हमारी भावनाओं, हमारी इच्छाओं, हमारे निर्णयों का स्रोत—“सब वस्तुओं से अधिक धोखा देने वाला होता है, उसमें असाध्य रोग लगा है।” यीशु ने फरीसियों से जो कहा, यिर्मयाह ने उसका पूर्वानुमान लगा लिया था: “ऐसी कोई वस्तु नहीं जो मनुष्य में बाहर से समाकर उसे अशुद्ध करे; परन्तु जो वस्तुएँ मनुष्य के भीतर से निकलती हैं, वे ही उसे अशुद्ध करती हैं . . . क्योंकि भीतर से, अर्थात् मनुष्य के मन से बुरे-बुरे विचार, व्यभिचार, चोरी, हत्या, परस्त्रीगमन,” और सभी प्रकार की बुराई निकलती है, जो स्पष्ट और गुप्त दोनों होती हैं (मरकुस 7:15, 21)।
जबकि ये सत्य इस संसार में हमें दिखने वाली सच्चाई का एक प्रेरक स्पष्टीकरण प्रदान करते हैं, वे हमें अपने बारे में एक बहुत चुनौतीपूर्ण दृष्टिकोण भी प्रस्तुत करते हैं। सच यह नहीं है कि हम अच्छे लोग हैं जो गलतियाँ कर बैठते हैं; बल्कि हम पापी लोग हैं, जिन्हें दया की आवश्यकता है। क्योंकि यह स्वीकार करने के लिए विनम्रता की आवश्यकता होती है कि हमारे हृदय वास्तव में कैसे हैं, वही हृदय स्वाभाविक रूप से स्वयं की प्रशंसा और आत्मविश्वास के प्रचारकों द्वारा धोखा खा जाते हैं, बजाय इसके कि वे यिर्मयाह जैसे भविष्यद्वक्ताओं की बात सुनें।
सच यह है कि हर कोई एक हृदय के परिवर्तन की आवश्यकता के साथ पैदा होता है—यह परिवर्तन शारीरिक या धार्मिक नहीं, बल्कि आत्मिक परिवर्तन है। केवल परमेश्वर ही इस परिवर्तन को ला सकता है। जैसे परमेश्वर ने हमें आदम के दोष से दोषी ठहराया, वैसे ही वह अपनी कृपा से विश्वासियों को प्रभु यीशु मसीह की धार्मिकता से धर्मी ठहराता है। यीशु में विश्वास करने के कारण हम अन्दर से बाहर तक बदल चुके हैं। हमेशा की तरह आज भी आपके धोखेबाज हृदय के लिए एकमात्र उपचार यह है कि आप विनम्रता और ईमानदारी से प्रभु के पास आकर प्रार्थना करें, “हे परमेश्वर, मेरे अन्दर शुद्ध मन उत्पन्न कर, और मेरे भीतर स्थिर आत्मा नए सिरे से उत्पन्न कर” (भजन 51:10)।
मरकुस 7:1-23
पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: एज्रा 9–10; 2 तीमुथियुस 4 ◊