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30 November : वधस्तंभाची विजयी लज्जा

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30 November : वधस्तंभाची विजयी लज्जा
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आणि जसा प्रमुख याजक प्रतिवर्षी स्वतःचे नसलेंलें रक्त घेऊन परमपवित्रस्थानात जातो, तसे त्याला वारंवार स्वतःचे अर्पण करायचे नव्हते; तसे असते तर जगाच्या स्थापनेंपासून त्याला वारंवार दुःख सोसावे लागलें असते; पण आता तो एकदाच युगाच्या समाप्तीस आत्मयज्ञ करून पापे नाहींशी करण्यासाठीं प्रकट झाला आहे. (इब्री 9:25-26)

आपण हे गृहीत धरता कामा नये कीं स्वर्गात पापी लोकांचा मोठ्या स्वगोस्तवाने प्रवेश होत असावा.

देव पवित्र आणि शुद्ध आणि पूर्णपणें न्यायप्रिय आणि नीतिमान असा आहे. तरीही संपूर्ण बायबलची गोष्ट अशी आहे कीं असा पवित्र आणि थोर परमेश्वर तुमच्यां आणि माझ्यासारख्या घाणेंरड्या आणि अमंगळ लोकांचे त्याच्या कृपेत कसे स्वागत करू शकतो. हे कसे शक्य आहे?

इब्री 9:25 म्हणते कीं पापासाठीं ख्रिस्ताचा आत्मयज्ञ यहूदी महायाजकांच्या बलिदानांसारखा नव्हता. ते दरवर्षी लोकांच्या पापांसाठीं प्रायश्चित करण्याकरिता पशूंचे अर्पण घेऊन पवित्र स्थानी जात असत. पण ही वचनें म्हणतात कीं ख्रिस्तानें “वारंवार दुःख सोसण्यासाठीं” स्वर्गात प्रवेश केला नाहीं… “तसे असते तर जगाच्या स्थापनेंपासून त्याला वारंवार दुःख सोसावे लागलें असते” (इब्री 9:26).

जर ख्रिस्तानें याजकांच्या नमून्याचे अनुसरण केलें असते, तर त्याला दरवर्षी मरावे लागलें असते. आणि जी पापे झाकावयाची होती त्यात आदाम आणि हव्वेच्या पापांचा समावेश होता, म्हणून त्याला त्याच्या वार्षिक मरणाचा आरंभ जगाच्या उत्पत्तिच्या सुरूवातीलाच करावा लागला असता. परंतु लेखकाच्या दृष्टिने हे अशक्य आहे.

हे अशक्य का आहे? कारण त्यामुळें परमेश्वराच्या पुत्राचे मरण दुर्बळ आणि निष्प्रभ दिसलें असते. जर अनेंक शतके वर्षानुवर्षे त्याला वारंवार स्वतःचे अर्पण करावे लागले असते, तर विजय कोठे असता? आपण परमेश्वराच्या पुत्राच्या आत्मयज्ञाचे अमर्याद मूल्य कोठे पाहिलें असते? ते वार्षिक क्लेशात आणि मृत्यूच्या लज्जेत अदृश्य झालें असते. 

वधस्तंभाठायीं लज्जा होती, पण ती विजयी लज्जा होती. “(येशूनें) लज्जा तुच्छ मानून वधस्तंभ सहन केला, आणि तो देवाच्या राजासनाच्या उजवीकडे बसला आहे.” (इब्री 12:2)

ही ख्रिस्त, जो देवाचे प्रतिरूप आहे, त्याच्या गौरवाची सुवार्ता आहे (2 करिंथ 4:4). माझी प्रार्थना आहे कीं तुम्हीं पापानें कितीही घाणेंरडे किंवा अपवित्र का असेनात, त्यां तुम्हांला या गौरवाचा प्रकाश पाहता यावा आणि तुम्हीं ख्रिस्तावर विश्वास ठेवावा.

29 नवम्बर : एकता में आराधना

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29 नवम्बर : एकता में आराधना
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“हे भाइयो, मैं तुम से हमारे प्रभु यीशु मसीह के नाम से विनती करता हूँ कि तुम सब एक ही बात कहो, और तुम में फूट न हो, परन्तु एक ही मन और एक ही मत होकर मिले रहो।” 1 कुरिन्थियों 1:10

सुसमाचार में एकता रखने वाली कलीसिया एक स्वस्थ कलीसिया होती है। और विभाजन से बढ़कर और कुछ नहीं है जो कलीसिया को इतनी तेजी से नष्ट करता है।

परमेश्वर की प्रजा के साथ हमेशा से ऐसा ही होता रहा है। जब-जब वे एकता में रहे हैं, उन्होंने अपना सर्वोत्तम समय देखा है। उदाहरण के लिए, जब इस्राएली लोग बेबीलोन की बँधुआई से लौटे, तो नहेम्याह 8 में लिखा है कि वे “एक मन होकर” एकत्र हुए ताकि याजक एज्रा द्वारा व्यवस्था की पुस्तक का सार्वजनिक पाठ सुन सकें (नहेम्याह 8:1)। उस समय लगभग 5,000 पुरुष और स्त्रियाँ जल फाटक के सामने के चौक में एकता और आपसी समर्पण की भावना से इकट्ठा हुए थे। उनका ध्यान केवल इस पर नहीं था कि “मुझे इस उपदेश से क्या मिल रहा है,” बल्कि इस पर भी था कि “मैं अपने साथियों के लिए क्या ला रहा हूँ, जो मेरे साथ आराधना करने आए हैं।”

परमेश्वर की प्रजा को आराधना में इसी भावना से आना चाहिए यदि हमें अपने बीच सच्ची एकता चाहिए।

जब हम वास्तव में मसीह के साथ चल रहे होते हैं, तो हम उन लोगों के साथ सामूहिक आराधना करने की लालसा रखते हैं जो मसीह से प्रेम करते हैं। हालाँकि हमारी प्रेरणा कभी-कभी क्षीण हो सकती है, फिर भी पवित्र आत्मा की सहायता से हम भजनकार की आराधना की भावना को अपना कर कह सकते हैं: “जब लोगों ने मुझ से कहा, ‘आओ, हम यहोवा के भवन को चलें,’ तब मैं आनन्दित हुआ!” (भजन 122:1)। सामूहिक कलीसिया की आराधना केवल एक कार्यक्रम नहीं है, जिसमें हम भाग लें या उसे बर्दाश्त करें; यह हमारे राजा के प्रति हमारी साझी निष्ठा की घोषणा है और परमेश्वर की प्रजा द्वारा प्राप्त गहन एकता की सामर्थी याद दिलाती है।

हमारी कलीसियाओं में हम हमेशा एकमत नहीं होते और नहीं होंगे—हमारी अपनी व्यक्तिगत पसन्द-नापसन्द और मान्यताएँ होती हैं। लेकिन परमेश्वर के परिवार में सदस्यता का मूल किसी बात पर स्पष्ट एकता में होना चाहिए—जैसे बाइबल की अधिकारिता, यीशु की केन्द्रीयता और प्रधानता, सुसमाचार प्रचार की अनिवार्यता, और प्रार्थना व आराधना की अपने दैनिक जीवन में प्राथमिकता। यही साझे विश्वास परमेश्वर की प्रजा को एकता में एकत्र होने की शक्ति देते हैं।

इसलिए, यद्यपि मंच से हास्य, सुन्दर संगीत, और परिवारों के लिए अर्थपूर्ण कार्यक्रम प्रभु की ओर से उपहार हो सकते हैं, तौभी वे हमारी प्राथमिकता नहीं होनी चाहिए। इसके बजाय, हमें एकता में मिलकर आराधना करने की इच्छा रखते हुए अपने सह-विश्वासियों के लिए प्रार्थना में लगे रहना चाहिए, यह मांगते हुए कि परमेश्वर के वचन के सत्य को सुनने की हमारी स्वयं की इच्छा आत्मिक जागृति का कारण बने। क्योंकि जब कोई मण्डली प्रार्थनापूर्वक अपेक्षा करती है, तो परमेश्वर निश्चय ही वही करेगा जो उसने अपने वचन के माध्यम से करने का प्रतिज्ञा की है।

कलीसिया के प्रति “पहले मैं” वाला दृष्टिकोण रखना और तुरन्त आलोचना करना बहुत आसान होता है—आसान, लेकिन घातक होता है। अगले रविवार को सुनिश्चित करें कि आप वहाँ केवल अपने लिए नहीं बल्कि दूसरों के लिए भी हों। आप अपने गीतों और वचनों में ऐसी भावना रखें जो साझी एकता को बनाए और मजबूत करे।

नहेम्याह 8:1-12

◊ पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: 2 इतिहास 21–22; लूका 9:1-17

29 November : सदसद्विवेकबुद्धी शुद्ध करणारा एकमेव महायाजक

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29 November : सदसद्विवेकबुद्धी शुद्ध करणारा एकमेव महायाजक
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तर सार्वकालिक आत्म्याच्या योगे ज्यानें निष्कलंक अशा स्वतःस देवाला अर्पण केलें, त्या ख्रिस्ताचे रक्त आपली सदसद्विवेकबुद्धी जिवंत देवाच्या सेवेसाठीं निर्जीव कृत्यांपासून किती विशेषेकरून शुद्ध करील? (इब्री 9:14)

आपण आधुनिक युगात आहों – इंटरनेंटचे, स्मार्ट फोन्सचे, अंतराळयात्रेचे आणि हृदय प्रत्यारोपणाचे युग – आणि आमची अग्रगण्य अडचण आजही नेंहमीसारखीच आहे : आमची सदसदविवेकबुद्धी आम्हास दोष लावते आणि आम्हीं परमेश्वरासाठीं धिक्कारलेले आहों याची सतत जाणीव करून देते. आम्हीं परमेश्वरापासून परके असें आहों. आणि आमची सदसदविवेकबुद्धी तशी साक्षहि देते.

आम्हीं स्वतःस जख्मी करू शकतो अथवा आपल्या मुलांना पवित्र नदीत फेकू शकतो, अथवा लक्षावधी रूपये दान म्हणून देऊ शकतो, किंवा एखाद्या लंगरला जाऊन तिथें लोकांसाठीं ताटे वाढू शकतो, अथवा शेकडो प्रकारचे पत करू शकतो, पण परिणाम आहे तोच असेल. आमचे डाग जसेच्या तसे राहतांत आणि मृत्यू घाबरवून सोडतो.

आम्हीं जाणतो कीं आमची विवेकबुद्धी भ्रष्ट झाली आहे – प्रेत-स्पर्श, घाणेंरडे डायपर किंवा डुकराचे मांस यासारख्या बाह्य गोष्टींनी नव्हे. येशूनें म्हटलें कीं माणसातून जे बाहेर येते तेच त्याला अशुद्ध करते, जे आत जाते ते नाहीं (मार्क 7:15-23). आम्हीं गर्व, बिचारेपणा, कटुत्व, वासना, हेवा, मत्सर, लोभ, उदासीनता आणि भीती यासारख्या प्रवृत्तींनी अशुद्ध झालो आहों.

प्रत्येक युगाप्रमाणेंच आजच्या युगातही एकमेव उत्तर आहे, ख्रिस्ताचे रक्त. जेव्हा तुमची सदसदविवेकबुद्धी उठून तुम्हांला दोष लावते, तेव्हां तुम्हीं कोठे वळाल? इब्री 9:14 आम्हांला उत्तर देतो: “तर सार्वकालिक आत्म्याच्या योगे ज्यानें निष्कलंक अशा स्वतःस देवाला अर्पण केलें, त्या ख्रिस्ताचे रक्त आपली सदसद्विवेकबुद्धी जिवंत देवाच्या सेवेसाठीं निर्जीव कृत्यांपासून किती विशेषेकरून शुद्ध करील?”

उत्तर आहे: ख्रिस्ताच्या रक्ताकडे वळा. विश्वातील एकमेव शुद्धीकरण करणाऱ्या मध्यस्थाकडे वळा जो तुम्हांला जीवनात विसावा, आणि मरणात शांती देऊ शकतो.

28 नवम्बर : सुख का मार्ग

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28 नवम्बर : सुख का मार्ग
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“क्या ही धन्य है वह जिसका अपराध क्षमा किया गया, और जिसका पाप ढाँपा गया हो।” भजन 32:1

कुछ वर्षों पहले, BBC ने दुनिया के लगभग 65 देशों में एक सर्वेक्षण किया और यह बताया कि कौन से देश सबसे अधिक सुखी और सबसे कम सुखी थे। जब लोगों से पूछा गया कि उनके आनन्द का स्रोत क्या है, तो कोई स्पष्ट सहमति नहीं मिली। सुख की राह कठिन और भ्रमित करने वाली थी।[1]

अंग्रेजी की ESV बाइबल में भजन 32 का आरम्भ “धन्य” शब्द से होता है, लेकिन इस शब्द का शायद अधिक प्रभावशाली और उपयुक्त अनुवाद “सुखी” हो सकता है। वास्तव में, जो इब्रानी शब्द यहाँ प्रयुक्त हुआ है, उस शब्द का अक्सर यूनानी में अनुवाद “सुखी” के तौर पर किया जाता है—चाहे वह सेप्टुआजिण्ट (पुराने नियम का यूनानी अनुवाद) हो या नया नियम। यही शब्द यीशु के पहाड़ी उपदेश के आरम्भ में भी प्रयुक्त हुआ, जहाँ उसने अपने अनुयायियों से कहा: “धन्य [अर्थात सुखी] हैं वे, जो मन के दीन हैं, क्योंकि स्वर्ग का राज्य उन्हीं का है” (मत्ती 5:3)।

हममें से बहुत से लोग चाहते हैं कि हम जितने सुखी अभी हैं, उससे अधिक सुखी हों। लेकिन कैसे? कुछ लोग सोचते हैं कि यदि वे अधिक घूमेंगे-फिरेंगे, तो उन्हें सन्तोष मिलेगा। कुछ लोग बड़े स्तर पर सोचते हैं—जैसे कि यदि वे अपने क्षेत्र में न्याय स्थापित कर दें तो वे अधिक सुखी होंगे। अन्य लोग मानते हैं कि सृष्टि की सुन्दरता को सराहने या आध्यात्मिकता को खोजने में सुख मिलता है। फिर भी बार-बार हमें यह सच्चाई झकझोरती है कि कुछ न कुछ है जो हमारी कोशिशों को बर्बाद कर देता है और हमारे सारे सपनों पर धूल की परत चढ़ा देता है। इन सब बातों से मिलने वाला सुख नाज़ुक होता है; वह आसानी से टूट सकता है और स्थायी नहीं रहता। सुख की तलाश या उसे थामे रहने का प्रयास स्वयं एक बोझ बन जाता है।

स्थायी सुख की हमारी खोज व्यर्थ ही रहती है, जब तक हम उस स्थान पर नहीं देखते जहाँ भजनकार ने इसे मूल रूप से पाया—हमारे सृष्टिकर्ता परमेश्वर के साथ एक सम्बन्ध में, जिसका आरम्भ क्षमा से होता है। शायद हम वहाँ देखने की सोच भी न पाएँ, क्योंकि यह विरोधाभासी लगता है कि पहले अपने पापों की गम्भीरता और क्षमा की आवश्यकता को समझकर हमें सुख कैसे मिलेगा। लेकिन इब्रानी भाषा में “क्षमा किया गया” शब्द का अर्थ ही होता है “उठा लिया गया” या “हटा दिया गया।” जिस शान्ति और सुख की हम लालसा करते हैं, वह तभी आता है जब पाप का बोझ उठा लिया जाता है। और फिर हम जीवन के सभी उपहारों का आनन्द लेने के लिए स्वतन्त्र हो जाते हैं, बिना किसी वस्तु या व्यक्ति से यह अपेक्षा किए कि वे हमारे परम सुख का स्रोत बनें।

यह सच्चाई संत ऑगस्टीन के अनुभव में भी दिखाई देती है। उन्होंने अपने जीवन का पहला हिस्सा भोग-विलास में बिताया। फिर जब उन्होंने बाइबल पढ़ी और परमेश्वर के वचन में उससे मुलाकात की, तो उन्होंने जीवन की धुंध से बाहर आकर लिखा: “हे परमेश्वर, हमारा हृदय तब तक अशान्त रहता है, जब तक वह तुझ में विश्राम नहीं पाता।”[2] क्या आपका विश्वास भी वैसा है, जैसा ऑगस्टीन का था? उनके इस कथन का आधार इस भजन के पहले पद में ही मिल जाता है। आपको पाप और दुख के बोझ तले जीवन जीने की ज़रूरत नहीं है, क्योंकि परमेश्वर ने आपको यीशु मसीह के माध्यम से क्षमा और अपने साथ एक सम्बन्ध का निमन्त्रण दे दिया है। आपको उस तरह से सुख की खोज करने की आवश्यकता नहीं है, जैसे यह संसार करता है। जब आपका बोझ उठा लिया जाता है, और जब आप जानते हैं कि परमेश्वर आपके सबसे बुरे पक्ष को जानता है और फिर भी आपसे प्रेम करता है—तब आप एक असाधारण और स्थायी सुख का अनुभव करते हैं।

  भजन 32

पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: 2 इतिहास 19–20; लूका 8:26-56 ◊


[1] माइकल बोण्ड, “द परसुट ऑफ हैपीनेस,” न्यू साईंटिस्ट, अक्तूबर 4, 2003, https://www.newscientist.com/article/mg18024155-100-the-pursuit-of-happiness/ अप्रैल 13, 2021 को इस वैबसाइट पर देखा गया।

[2] कनफेशंस 1.1.

28 November : कृतघ्नतेचे मूळ

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28 November : कृतघ्नतेचे मूळ
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देवाला ओळखूनसुद्धा त्यांनी देव म्हणून त्याचा गौरव केला नाहीं किंवा त्याचे आभार मानलें नाहींत; पण ते आपल्या कल्पनांनी शून्यवत झालें आणि त्यांचे निर्बुद्ध मन अंधकारानें भरून गेलें. (रोम 1:21)

जेव्हा मनुष्याच्या अंतःकरणात परमेश्वरासाठीं कृतज्ञता उसळून येते, तेव्हा आमच्या आशीर्वादाचा समृद्ध स्रोत म्हणून त्याचे गौरव होते. त्याला दाता आणि परोपकारी, आणि त्यामुळें तो किती गौरवी आहे असा त्याचा अंगीकार केला जातो.

पण जेव्हा आम्हांसाठीं परमेश्वराच्या थोर चांगुलपणाविषयी आमच्या अंतःकरणात कृतज्ञता उसळून येत नाहीं, तेव्हा त्याचा शक्यतः असा अर्थ असतो कीं आम्हीं त्याची वाखाणणी करू इच्छित नाहीं; आम्हीं आमचा परोपकारकर्ता म्हणून त्याचा गौरव करूं इच्छित नाहीं.

आणि मनुष्य प्राणी हा स्वभावतः त्यांचा उपकारकर्ता म्हणून उपकारस्तवनाद्वारे परमेश्वराचे आभार मानूं इच्छित नाहीं किंवा त्याचा गौरव करूं इच्छित नाहीं. त्याचे कारण हे कीं आपण जर त्याचा गौरव केला तर मग आमचा स्वतःचा गौरव होत नाहीं, आणि सर्व लोकांस स्वभावतःच परमेश्वराच्या गौरवापेक्षा स्वतःचे गौरव करणें आवडते.

या सर्व कृतघ्नतेचे मुळ म्हणजें स्वतःच्या मोठेपणावर प्रीति करण्यांस प्राधान्य दिलें जाते. कारण खरी कृतज्ञता कबूल करते कीं आम्हास असा वारसा प्राप्त झाला आहे जो आम्हीं स्वतः कमाविलेला नाहीं. आम्हीं असें लंगडे लोक आहोत जें येशू ख्रिस्ताच्या वधस्तंभाच्या आकाराच्या कुबडीच्या आधारे चालतांत. आपण असें पक्षाघाती लोक आहोत जे परमेश्वराच्या कृपेच्या लोखंडी फुप्फुसात क्षणोक्षणी जगत आहोत. आम्हीं स्वर्गाच्या बाबागाडीमध्यें झोपी गेलेलीं बालकें आहोत.

तारणाऱ्या कृपेवाचून, स्वाभाविक वृत्तीच्या मनुष्याला आपण अशा रूपांचे आहों असा स्वतःविषयी विचार करणें आवडत नाहीं : म्हणजें अयोग्य लाभार्थी, लंगडा, पक्षाघाती, एक असहाय बालक. उलट देवच असा आहे असें म्हणत ते त्याच्या गौरवावर दरोडा टाकतांत.

म्हणून, जोपर्यंत मनुष्याला स्वतःचे गौरव करणें आवडते, आणि ‘माझा मी समर्थ आहे’ असें समजतो, आणि आपण पापाच्या असाध्य रोगाने ग्रस्त आहों हे ओळखत नाहीं आणि आपणांस असहाय्य समजण्याचा तिटकारा करतो, तोपर्यंत तो खऱ्या परमेश्वरासाठीं कधीही खरी कृतज्ञता अनुभवू शकणार नाहीं आणि परमेश्वराचे जसे गौरव केलें पाहिजे तसे तो कधीही करणार नाहीं, तर केवळ स्वतःचे गौरव करील.

येशूनें म्हटलें, “निरोग्यांना वैद्याची गरज नसते, तर रोग्यांना असते; मी नीतिमानांना नव्हे तर पाप्यांना पश्घ्चात्तापासाठीं बोलावण्यास आलो आहे” (मार्क 2:17)

येशू अशा लोकांची सेवा करावयास आला नाहीं जे हा आग्रह करतात कीं ते निरोगी आहेत. तो कांहींतरी मोठा कबुलीजबाब मागतो : म्हणजें असें कीं आम्हीं आमचे समर्थ नाहीं हे आम्हीं कबूल करावें. ही गर्विष्ठांसाठीं कुवार्ता आहे, पण ज्यांनी आत्मसंतुष्टतेचे ढोंग त्यागलें आहे आणि परमेश्वराचा शोध करीत आहेत त्यांच्यासाठीं ती मधासारखी गोड वचनें आहेत.

27 नवम्बर : उसकी दया से

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27 नवम्बर : उसकी दया से
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“अतः यह न तो चाहने वाले की, न दौड़ने वाले की परन्तु दया करने वाले परमेश्‍वर की बात है।” रोमियों 9:16

परमेश्वर मनुष्य द्वारा बनाए गए रीति-रिवाजों से बँधा नहीं है, और न ही वह हमारी अपेक्षाओं के अनुसार चलने के लिए बाध्य है।

शायद यह सच्चाई एसाव और याकूब के जीवन में सबसे स्पष्ट रूप से दिखाई देती है। एसाव इसहाक का पहला बेटा था, और इसहाक के पिता अब्राहम को परमेश्वर ने स्वयं के वचन और आशिषों का वाहक बनने के लिए चुना था, जिससे वह एक अपने लिए एक प्रजा बनाए और संसार में आशीष लाए (उत्पत्ति 12:1-3)। परम्परा के अनुसार वारिस होने के नाते एसाव को इसहाक की आशीष और विरासत मिलनी चाहिए थी, वैसे ही जैसे इसहाक को अपने पिता अब्राहम से मिली थी।

परन्तु इसके बजाय, परमेश्वर ने एसाव के छोटे जुड़वाँ भाई याकूब को चुना, जिसे यह सब कुछ प्राप्त हुआ।

याकूब केवल छोटा ही नहीं था, बल्कि उसका स्वभाव भी अच्छा नहीं था, जिसके नाम का मूल रूप से अर्थ था, “धोखेबाज।” यह अविश्वसनीय लगता है कि उसे चुना गया—फिर भी वाचा की रेखा याकूब से होकर ही आगे बढ़नी थी। उसके वंशज आगे चलकर इस्राएल, परमेश्वर की प्रजा, कहलाए।

कभी-कभी मैं इस बात से संघर्ष करता हूँ कि परमेश्वर ने याकूब को क्यों चुना। यह अनुचित प्रतीत होता है! फिर भी बाइबल बताती है कि याकूब को, जो एक अनापेक्षित विकल्प था, परमेश्वर ने पहले से ही चुन लिया था ताकि वह अपनी प्रतिज्ञाओं को एसाव की बजाय याकूब के माध्यम से पूरा करे: “. . . और अभी तक न तो बालक जन्मे थे, और न उन्होंने कुछ भला या बुरा किया था; इसलिए कि परमेश्‍वर की मनसा जो उसके चुन लेने के अनुसार है, कर्मों के कारण नहीं परन्तु बुलाने वाले के कारण है, बनी रहे” (रोमियों 9:11)। याकूब को चुनकर, परमेश्वर ने अपने अनादिकालीन उद्देश्य को पूरा किया। साथ ही उसने एक सिद्धान्त भी सिखाया: परमेश्वर योग्यता के आधार पर चयन नहीं करता। हममें से कोई भी उसके योग्य नहीं है।

यहीं पर हम कभी-कभी सोचने में उलझ जाते हैं। हम याकूब को देखते हैं और सोचते हैं कि उसे क्यों चुना गया, जबकि हमें वास्तव में परमेश्वर को देखना चाहिए और उसकी अनुग्रहपूर्ण प्रकृति पर आश्चर्य करना चाहिए। वह कहता है, “मैं जिस किसी पर दया करना चाहूँ उस पर दया करूँगा, और जिस किसी पर कृपा करना चाहूँ उसी पर कृपा करूँगा” (रोमियों 9:15)। और परमेश्वर हमें भी, जो अयोग्य हैं, दया से बुलाता है।

जब हम यह पूरी तरह से समझ जाते हैं कि परमेश्वर की सन्तान बनने से पहले हम कितने गहरे संकट में थे—हमारा विद्रोह, जो न्याय, क्रोध और मृत्यु का योग्य था—तब हम परमेश्वर के प्रेम और दया की महानता को समझना आरम्भ करते हैं। हम यह पूछना बन्द कर देते हैं कि परमेश्वर कुछ लोगों पर दया क्यों नहीं करता; और यह सोचने लगते हैं कि वह किसी पर भी दया क्यों करता है। यह एक गहरी कृतज्ञता का विषय बन जाता है कि उसने हमें अपनी सन्तान और वारिस बना लिया है।

आपने राजा की कृपा पाने के लिए कुछ भी नहीं किया। आपने अपने विद्रोह के लिए कोई भरपाई नहीं की। केवल एक ही आधार है जिस पर आपको उसके परिवार में अपनाया गया: उसकी दया, जो स्वतन्त्र रूप से दी गई और कभी अर्जित नहीं की जा सकती। जैसे एक भजन के लेखक ने कहा है, “यीशु ने सब मूल्य चुका दिया।”[1] यह सत्य आपको अच्छे दिनों में विनम्र बनाए रखेगा और जब आप पाप कर बैठते हैं, तो आशा देगा; उद्धार कभी आपकी योग्यता पर नहीं, बल्कि हमेशा केवल उसकी दया पर निर्भर है।

रोमियों 9:1-18

◊ पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: 2 इतिहास 17–18; लूका 8:1-25


[1] एल्विना एम. हॉल, “जीज़स पेड इट ऑल” (1865).

27 November : परमेश्वराचा महिमा कसा वर्णावा

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27 November : परमेश्वराचा महिमा कसा वर्णावा
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गीत गाऊन मी देवाच्या नावाचे स्तवन करीन. त्याचे उपकारस्मरण करून त्याचा महिमा वर्णीन. (स्तोत्र 69:30)

दोन प्रकारचे भिंग आहेत: सूक्ष्मदर्शक भिंग आणि दुर्बिणीचे भिंग. सूक्ष्मदर्शक भिंगामुळें लहान वस्तू तिच्या आकारापेक्षा मोठी दिसते. दुर्बिणीच्या भिंगामुळें मोठी वस्तू तितकींच मोठी दिसते जितकीं मोठी ती प्रत्यक्षात आहे.

जेव्हा दावीद म्हणतो, “त्याचे उपकारस्मरण करून त्याचा महिमा वर्णीन,” तेव्हा त्याचा अर्थ असा नाहीं कीं, “मी लहान परमेश्वरास तो जसा आहे त्यापेक्षा मोठा करीन.” याचा अर्थ, “मी मोठ्या परमेश्वराचे गौरव त्यामानाने वर्णीन जितकी मोठी त्याची महती प्रत्यक्षात आहे.”

आम्हास सूक्ष्मदर्शक होण्यासाठीं पाचारण करण्यात आलेंलें नाहीं. आम्हास दुर्बिण होण्यासाठीं पाचारण करण्यांत आलें आहे. ख्रिस्ती लोकांस ठग होण्यासाठीं  बोलावण्यात आलेंलें नाहीं ज्यांना हे माहीत असतांनाहीं कीं त्यांच्या प्रतिस्पर्धीची वस्तू अतिशय उत्तम प्रतीची आहे, ते त्यांची वस्तू तिच्या वास्तविकतेपेक्षा सर्व प्रमाणांनी वाढवितात. परमेश्वरापेक्षा श्रेष्ठ कांहींही नाहीं आणि कोणीही नाहीं. आणि म्हणून परमेश्वरावर प्रीति करणाऱ्यांचे पाचारण आहे त्याची महानता इतकीं मोठी दाखविणें जितकीं ती खरोखर आहे.

म्हणूनच आम्हीं अस्तित्वात आहोत, आमचे तारण यासाठींच झालें होते, जसे पेत्र 1 पेत्र 2:9 मध्ये म्हणतो, “पण तुम्हीं तर ‘निवडलेला वंश, राजकीय याजकगण, पवित्र राष्ट्र,’ देवाचे ‘स्वत:चे लोक’ असें आहात; ह्यासाठीं कीं, ज्यानें तुम्हांला अंधकारातून काढून आपल्या अद्भुत प्रकाशात पाचारण केलें ‘त्याचे गुण तुम्हीं प्रसिद्ध करावेत.’”

ख्रिस्ती व्यक्तीचे संपूर्ण कर्तव्य यां शब्दांत सारगर्भित केलें जाऊ शकते : ओळखा, चिंतन करा, आणि तसेच आपलें आचरण ठेवा  ज्यामुळें परमेश्वर खरोखर जितका थोर आहे तितके थोर त्याला दाखविता यावें. जगासाठीं परमेश्वराच्या गौरवाच्या अमर्याद तारांकित संपत्तीची दुर्बिण बना.

ख्रिस्ती व्यक्तीसाठीं परमेश्वराचे गौरव करण्याचा हाच अर्थ आहे. पण तुम्हीं जे पाहिलें नाहीं अथवा जे तुम्हीं लगेच विसरून जाता त्याची तुम्हीं वाखाणणी करू शकत नाहीं.

यास्तव, आमचे पहिलें काम परमेश्वराची महानता आणि त्याचे चांगुलपण पाहणें आणि ते आठवणीत ठेवणें हे आहे. म्हणून आम्हीं परमेश्वराजवळ प्रार्थना करतो, “माझे अंतश्चक्षू प्रकाशित कर!” (इफिस 1:18), आणि आम्हीं आपल्या जीवास उपदेश देतो, “हे माझ्या जिवा, त्याचे सर्व उपकार विसरू नको” (स्तोत्र 103:2).

26 नवम्बर : दान क्यों दें?

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26 नवम्बर : दान क्यों दें?
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“तुम हर बात में सब प्रकार की उदारता के लिए जो हमारे द्वारा परमेश्‍वर का धन्यवाद करवाती है, धनवान किए जाओ।” 2 कुरिन्थियों 9:11

परमेश्वर कोई स्वर्गिक मनोरंजन-विरोधी नहीं है। वह हमें ऐसा निराशाजनक जीवन जीने को नहीं कहता, जिसमें हमें बैठकर झूठी प्रसन्नता का दिखावा करना पड़े। इसके विपरीत, वह हमें सब कुछ भरपूरी से प्रदान करता है। हमें उसकी दी हुई आशिषों के लिए माफी माँगने की ज़रूरत नहीं है; लेकिन हमें उन्हें दूसरों के साथ बाँटना अवश्य है।

परमेश्वर हमें हमारी आवश्यकताओं के लिए जो कुछ भी देता है (और अक्सर उससे भी अधिक देता है), तो उसमें उसका उद्देश्य यही है कि हम दूसरों को भी दें। जब हम “धनवान किए” जाते हैं, तो पौलुस कहता है कि यह “सब प्रकार की उदारता के लिए होता है, जो हमारे द्वारा परमेश्‍वर का धन्यवाद करवाती है।” हमने जो कुछ परमेश्वर से उपहार स्वरूप पाया है, उसे हमें दूसरों को भी परमेश्वर के उपहार स्वरूप देना है। याकूब इस विचार को चुनौतीपूर्ण रूप में आगे बढ़ाता है जब वह पूछता है: “यदि कोई कहे कि मुझे विश्वास है पर वह कर्म न करता हो, तो इससे क्या लाभ?” (याकूब 2:14)। उत्तर स्पष्ट है: ऐसे विश्वास का कोई लाभ नहीं है! जब हम जरूरतमंदों की मदद करने की अपनी ज़िम्मेदारी को निभाते हैं, तब हम न केवल परमेश्वर की स्तुति को प्रेरित करते हैं, बल्कि अपने विश्वास की वास्तविकता का प्रमाण भी देते हैं।

परमेश्वर हमें संसाधनों के साथ-साथ वह अनुग्रह भी देता है जिसकी जरूरत हमें सच्ची उदारता दिखाने के लिए होती है—यहाँ तक कि स्वयं का त्याग करने के लिए भी, ताकि औरों को आशीष मिल सके (2 कुरिन्थियों 8:1-3)। वही परमेश्वर है जो “सब प्रकार का अनुग्रह तुम्हें बहुतायत से दे सकता है जिस से हर बात में और हर समय, सब कुछ, जो तुम्हें आवश्यक हो, तुम्हारे पास रहे; और हर एक भले काम के लिए तुम्हारे पास बहुत कुछ हो” (2 कुरिन्थियों 9:8)।

एक उदार मन हमें स्वार्थ से और अधिक धन इकट्ठा करने की इच्छा से बचाता है। परमेश्वर की आशीष का आनन्द कोई मजबूत आर्थिक नींव रखने में नहीं है, जिससे हम किसी शानदार जगह पर रिटायर हो सकें, बड़ी विरासत छोड़ सकें, या बचत खाते में सुकून पा सकें। बल्कि हमें जो सम्पत्ति अभी दी गई है, उसे दूसरों के साथ साझा करने के लिए बुलाया गया है, ताकि जब दूसरे उसमें सहभागी हों, तो वे परम दाता परमेश्वर में सच्चा सन्तोष पाएँ।

यदि हम ईमानदारी से कहें, तो अक्सर हम इसलिए उदारता से नहीं देते, क्योंकि हमें डर होता है कि दान दे देने के बाद कहीं परमेश्वर हमें अकेला और खाली न छोड़ दे। लेकिन पवित्रशास्त्र हमें आश्वस्त करता है कि वही परमेश्वर, जिसने हमारे बचपन में हमारी देखभाल की, वह बुढ़ापे में भी हमारी आवश्यकता पूरी करेगा (यशायाह 46:4 देखें)।

सच्चा आनन्द तब पाया जाता है जब हम अपने स्वामित्व के बन्धनों से मुक्त हो जाते हैं। यह हमारा सौभाग्य और उत्तरदायित्व है कि हम भले कामों में धनवान हों और दूसरों के साथ बाँटने में तत्पर हों, चाहे हमें बहुत कुछ मिला हो या थोड़ा ही। परमेश्वर से यह अनुग्रह माँगें कि आप बिना संकोच और खुशी-खुशी दे सकें, और यह कभी न भूलें: आप परमेश्वर से अधिक नहीं दे सकते।

1 कुरिन्थियों 9:6-15

पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: 2 इतिहास 15–16; लूका 7:24-50 ◊

26 November : येशू आम्हांसाठीं प्रार्थना करतो

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26 November : येशू आम्हांसाठीं प्रार्थना करतो
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ह्यामुळें ह्याच्या द्वारे देवाजवळ जाणाऱ्यांना पूर्णपणें तारण्यास हा समर्थ आहे; कारण त्यांच्यासाठीं मध्यस्थी करण्यास हा सर्वदा जिवंत आहे. (इब्री 7:25)

हा शास्त्रलेख म्हणतो कीं ख्रिस्त पूर्णपणें तारण्यास समर्थ आहे – सर्वदा – कारण तो आमच्यासाठीं मध्यस्थी करण्यास हा सर्वदा जिवंत आहे. दुसऱ्या शब्दांत, जर तो आमच्यासाठीं सर्वदा मध्यस्थी करित नाहीं, तर तो आम्हास सर्वदा तारावयास समर्थहि असणार नाहीं.

याचा अर्थ असा कीं आमचे तारण तितकेच सुरक्षित आहे जितके ख्रिस्ताचे याजकपण अविनाशी आहे. म्हणूनच आम्हास कोणत्याही मानवी याजकापेक्षा अति श्रेष्ठ अशा याजकाची गरज होती. ख्रिस्ताचे ईश्वरत्व आणि मेलेल्यांतून त्याचे झालेलें पुनरूत्थान आमच्यासाठीं त्याचे अविनाशी याजकपद सुरक्षित करते.

याचा अर्थ हा कीं आपण आपल्या तारणाविषयी निष्क्रिय शब्दांत बोलता कामा नये जसे आम्हीं बरेचदा बोलतो – जणू कांहीं मी माझा एकदाचा निर्णय घेऊन माझे कर्तव्य केलें, आणि ख्रिस्तानें मरण सोसून व परत जिवंत होऊन त्यानें एकदाचे त्याचे काम संपविलें, बस इतकेच काय ते. परंतु ते इतकेच नाहीं.

स्वर्गात येशूच्या सार्वकालिक मध्यस्थीद्वारे मी आजहि तारला जात आहे. येशू आमच्यासाठीं प्रार्थना करीत आहे आणि हे आमच्या तारणासाठीं आवश्यक आहे.

आम्हीं आमचा महायाजक म्हणून स्वर्गातील येशूच्या सर्वदा सक्रिय असलेल्यां प्रार्थनांद्वारे (रोम 8:34) आणि मध्यस्थीद्वारे (1 योहान 2:1) सार्वकालिकरित्या तारण पावतो. तो आमच्यासाठीं प्रार्थना करतो आणि त्याच्या प्रार्थनांची उत्तरे मिळतात कारण तो त्याच्या सिद्ध बलिदानाच्या आधारे सिद्धपणें प्रार्थना करतो.

25 नवम्बर : सत्य को जीना

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25 नवम्बर : सत्य को जीना
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“तुम ये बातें जानते हो, और यदि उन पर चलो तो धन्य हो।” यूहन्ना 13:17

क्या आपको कभी ऐसा समय याद आता है जब कोई अजनबी अचानक आपके पास आया हो और आपसे पूछा हो कि आप यीशु मसीह और मसीही विश्वास के बारे में क्या मानते हैं? शायद आपके ऐसे अनुभव बहुत कम या बिल्कुल नहीं हुए होंगे। निश्चय ही, हमें ऐसे अवसरों के लिए तैयार रहना चाहिए; प्रेरित पतरस हमें बताता है कि हमें उस आशा का कारण बताने के लिए तैयार रहना चाहिए जो हमारे भीतर है (1 पतरस 3:15)। लेकिन हमारे विश्वास को समझाने के अवसर अक्सर अजनबियों से हुई आकस्मिक मुलाकातों से नहीं, बल्कि हमारे दैनिक जीवन के उस तरीके से उत्पन्न होते हैं, जिसे हम अपने परिचितों के सामने प्रतिदिन जीते हैं।

हम कैसे जीते हैं और क्या मानते हैं, यह हमारे मसीह से जुड़े होने को प्रतिबिम्बित करना चाहिए। इसी कारण पतरस कहता है कि मसीही “[परमेश्‍वर की] निज प्रजा” हैं (1 पतरस 2:9)। यीशु से हमारा सम्बन्ध व्यापक और सम्पूर्ण है। इसका अर्थ यह है कि हमें अब अपनी इच्छानुसार कुछ भी मानने की स्वतन्त्रता नहीं है; अब हम विवाह, लैंगिकता, धन-सम्पत्ति, या किसी भी अन्य विषय में अपने विचार नहीं बना सकते। अब हमारे विचार हमारे मसीह और गुरु, यीशु, के विचारों को प्रतिबिम्बित करने चाहिएँ। परन्तु यीशु केवल इतना नहीं चाहता कि उसके शिष्य सत्य को केवल जानें, वह यह भी चाहता है कि वे सत्य को जीएँ: “तुम ये बातें जानते हो, और यदि उन पर चलो तो धन्य हो।” अतः विश्वास का परिणाम कार्य में प्रकट होना चाहिए। इसका अर्थ यह भी है कि अब हमें अपनी इच्छानुसार आचरण करने की स्वतन्त्रता नहीं है। हमारा व्यवहार हमारे बलिदानी उद्धारकर्ता यीशु के समान होना चाहिए।

आज की बहुत-सी आधुनिक धार्मिक और धर्मनिरपेक्ष मान्यताएँ आपकी जीवनशैली से कुछ नहीं माँगतीं; वे आपको अपनी इच्छा से जीने की पूरी आज़ादी देती हैं। (वास्तव में, कई विचारधाराएँ इसी सिद्धान्त को प्राथमिकता देती हैं: “जो तुम्हें ठीक लगे वही करो।”) लेकिन मसीही शिष्यता का बुलावा बिल्कुल भिन्न है, क्योंकि इसके केन्द्र में यह बुलावा है: एक ऐसे राजा का अनुसरण करना जो आप स्वयं नहीं हैं। मसीही जीवन का बुलावा केवल सुसमाचार पर विश्वास करने का नहीं, बल्कि यह भी है कि “तुम्हारा चाल–चलन मसीह के सुसमाचार के योग्य हो” (फिलिप्पियों 1:27)। हम सभी इसमें पीछे रह जाते हैं। क्या आपके जीवन में कोई ऐसा व्यक्ति है जो आपको यह पहचानने में मदद करता है—और जिसकी आप भी मदद कर सकते हैं—कि आपके व्यवहार के कौन-कौन से क्षेत्र अभी भी सुसमाचार के योग्य नहीं हैं? मसीह में एक भाई या बहन के साथ साझेदारी करें, परमेश्वर के वचन का प्रकाश एक-दूसरे पर डालें, और सत्य को जीवन में लाने का प्रयास करें!

इस संसार में परमेश्वर के सुसमाचार को पहुँचाने का परमेश्वर द्वारा निर्धारित प्राथमिक साधन कलीसिया है। आप इसका हिस्सा हैं। लेकिन यदि आप स्वयं सुसमाचार के अनुसार नहीं जीते, तो दूसरों से यह अपेक्षा मत करें कि वे आपसे सुसमाचार के बारे में पूछेंगे—और उससे भी कम यह कि वे पश्चाताप करें और विश्वास करें:

आप एक सुसमाचार लिख रहे हैं,

हर दिन एक अध्याय,

अपने कामों के द्वारा,

अपनी बातों के द्वारा।

आप जो लिखते हैं उसे लोग पढ़ते हैं,

चाहे यह बिना विश्वास के हो, या सच्चा हो।

आपके अनुसार सुसमाचार क्या है?[1]

यूहन्ना 13:31-35

◊ पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: 2 इतिहास 13–14; लूका 7:1-23


[1] सामान्यतः इसका श्रेय पॉल गिलबर्ट को दिया जाता है।