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14 मार्च : आदर्श प्रतिबद्धता

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14 मार्च : आदर्श प्रतिबद्धता
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“नून का पुत्र यहोशू और यपुन्ने का पुत्र कालेब, जो देश के भेद लेने वालों में से थे, अपने-अपने वस्त्र फाड़कर, इस्राएलियों की सारी मण्डली से कहने लगे, “जिस देश का भेद लेने को हम इधर-उधर घूम कर आए हैं, वह अत्यन्त उत्तम देश है। यदि यहोवा हम से प्रसन्न हो, तो हम को उस देश में, जिसमें दूध और मधु की धाराएँ बहती हैं, पहुँचाकर उसे हमें दे देगा।”  गिनती 14:6-8

3 मई 1953 को सिंगापुर से लन्दन जा रहा एक विमान भारत के कोलकाता से 22 मील उत्तर-पश्चिम में दुर्घटनाग्रस्त हो गया, जिसमें कोई भी जीवित नहीं बचा। फ्रेड मिशेल, जो दस साल पहले चाइना इनलैंड मिशन के निदेशक बने थे, उस विमान में यात्रा कर रहे थे। उनकी जीवनी में फ्रेड को “एक साधारण व्यक्ति के रूप में वर्णित किया गया था, जो एक गाँव से थे और उनके माता-पिता श्रमिक वर्ग के थे। उन्होंने अपना अधिकांश जीवन प्रान्तों में रहते हुए एक रसायनज्ञ के रूप में बिताया और वे परमेश्वर के साथ चलते थे।”[1]

जब तक यपुन्ने का पुत्र कालेब एक भेदी न बना था, जिसे मूसा ने उस देश का भेद लेने के लिए नियुक्त किया था, जिसे देने की प्रतिज्ञा परमेश्वर ने अपने लोगों से की थी, तब तक ऐसा कुछ भी नहीं था जो यह संकेत दे कि वह विशेष रूप से महत्त्वपूर्ण या प्रतिष्ठित था। परन्तु ऐसा लगता है कि निश्चित रूप से उन साधारण अनुभवों में उसकी नीरस जीवन-यात्रा में परमेश्वर ने उस चरित्र को गढ़ा और विकसित किया जो गिनती 14 में प्रकट होता है।

संकट हमारे चरित्र को उजागर कर देता है। जब इस्राएली भेदिए कनान देश का भेद लेकर वापस आए तो उन्होंने वर्णन करते हुए कहा कि उसके नगर गढ़ वाले हैं, और “उन लोगों पर चढ़ने की शक्ति हममें नहीं है; क्योंकि वे हमसे बलवान हैं . . . हम अपनी दृष्टि में उनके सामने टिड्डे के समान दिखाई पड़ते थे” (गिनती 13:31, 33)। और लोग परमेश्वर पर आरोप लगाने लगे कि उसने उन्हें ऐसे देश में भेजा है, जहाँ वे मर जाएँगे (गिनती 14:3)।

कालेब की परमेश्वर के लिए प्रतिबद्धता स्पष्ट दिखाई पड़ती है। वह इतने लोगों की सामान्य राय के विरुद्ध खड़ा होने के लिए तैयार था। जब अन्य भेदियों ने प्रतिज्ञा के देश में प्रवेश न करने का सुझाव दिया तो उसने उनका विरोध किया। जब सभी लोग परमेश्वर के प्रति विद्रोह कर रहे थे तो उसने उनका साथ नहीं दिया। वह और उसका विश्वासयोग्य मित्र यहोशू ही थे, जिन्होंने परमेश्वर के प्रति साहसी आज्ञाकारिता का सुझाव दिया।

कालेब को निश्चय था कि परमेश्वर के सामर्थ्य से सब कुछ सम्भव है। उसने दूसरे भेदियों की कही गई बातों की सच्चाई को नकारा नहीं, परन्तु उसने केवल इसे एक अलग दृष्टिकोण से देखा। वह न तो अपनी क्षमता पर और न ही इस्राएलियों की क्षमता पर, किन्तु परमेश्वर के सामर्थ्य और उसके चरित्र की विश्वसनीयता पर भरोसा कर रहा था। वह एक ऐसा व्यक्ति था, जो भय के मध्य में भी विश्वास कर रहा था। वह जानता था कि जिस टिड्डे को परमेश्वर से सहायता प्राप्त हो, वह टिड्डा भी बड़े काम कर सकता है।

यद्यपि हमें लग सकता है कि हमारा जीवन नीरस है, फिर भी हम नीरसता में भी सदैव परमेश्वर को खोज सकते हैं। दैनिक जीवन के साधारण क्षणों में वह हमारे चरित्र को गढ़ेगा कि हम भी प्रत्येक परिस्थिति में साहसी व्यक्ति बन सकें। परमेश्वर अपनी योजनाओं को पूरी करने के लिए बहुत महान लोगों को नहीं ढूँढ रहा है। वह ऐसे साधारण लोगों को ढूँढ रहा है जो उस पर भरोसा करें, विश्वास में आगे कदम बढ़ाएँ और साहसपूर्वक आज्ञा मानने के लिए तैयार हों। आज आपको वैसा व्यक्ति बनने से कोई नहीं सकता।       

गिनती 13:25 – 14:25

14 March : विजय निश्चित आहे

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14 March : विजय निश्चित आहे
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“यास्तव आडदांड लोक तुझे गौरव करितील, बलात्कारी लोकांची शहरे तुझे भय धरितील.”  – (यशया 25:3)

यशया तो दिवस पाहत आहे जेव्हां सर्व राष्ट्रे – सर्व लोक गटांचे प्रतीनिधीं – इस्राएलचा देव याव्हे व त्याचा मसीहा, ज्याला आपण येशू म्हणून ओळखतो, यांच्या बरोबर त्यांचे शत्रुत्व असणार नाहीं.

ते या पुढे बआल किंवा निबो किंवा मोलेख किंवा अल्लाह किंवा बुद्ध किंवा काल्पनिक आदर्श जग निर्माण करण्या करिता असलेले सामाजिक कार्यक्रम किंवा आर्थिक विकास किंवा पूर्वजांची किंवा निसर्गाची भक्ति करणार नाहींत. या ऐवजी ते विश्वासाने देवाच्या पर्वतावर मेजवानीकरिता येतील.

आणि त्यांच्या दु:खाचा पडदा काढून टाकींलेला असेल आणि मरण नाहींसे झालेलें असेल आणि देवाच्या लोकांची निंदा काढून टाकली गेलेली असेल आणि त्यांचे अश्रु कायमचे पुसून टाकलेले असतील.

यशया 25:3 मधील द्रुष्टांत समजून घेण्याकरिता त्याची ही पार्श्वभूमी समजणे गरजेचे आहे. “यास्तव आडदांड लोक तुझे गौरव करितील, बलात्कारी लोकांची शहरे तुझे भय धरितील.” दुसर्‍या शब्दात, देव हा “आडदांड” लोकांपेक्षा अधिक सामर्थ्यशाली आहे, आणि तो इतका बलवान आणि कृपाळू आहे कीं शेवटी तो निर्दयी अशा राष्ट्रांना देखील त्याची भक्ति करायला भाग पाडील.

यशया जे चित्र दाखवत आहे त्यात, सर्व राष्ट्रे देवाची भक्ती करित त्याचाकडें वळाली आहेत, जे त्याचें लोक झाले आहेत त्या सर्व लोकांकरिता मोठी मेजवानी ठेवली आहे, राष्ट्रांमधून सर्व यातना, दु:ख आणि अपमान नाहींसा केला गेला आहे, आणि शेवटी मरण कायमचे नाहींसे केलें गेले आहे. 

हा विजय निश्चित आहे, कारण देवच  हे सर्व करीत आहे. त्यामुळे आपण याची खात्री बाळगू शकतो.

जगात सुवार्ता प्रसाराकरिता खर्च केलें गेलेले एकही जीवन व्यर्थ ठरणार नाहीं, देवाच्या राज्याच्यावाढीसाठीं केलेंली एकही प्रार्थना किंवा खर्च केलेंला एक रुपया किंवा एक संदेश किंवा उत्तेजनासाठीं लिहिलेले एक पत्र किंवा अंधारात प्रकाशणारा एक लहानसा दिवा देखील व्यर्थ ठरणार नाहीं. विजय हा निश्चत आहे.

13 मार्च : सब प्रकार के धीरज सहित

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13 मार्च : सब प्रकार के धीरज सहित
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“प्रेरित के लक्षण भी तुम्हारे बीच सब प्रकार के धीरज सहित चिह्नों, और अद्‌भुत कामों, और सामर्थ्य के कामों से दिखाए गए।”  2 कुरिन्थियों 12:12

जब हम मसीह के पुनरुत्थान और स्वर्गारोहण के तुरन्त बाद के समय के बारे में सोचते हैं, उस समय के बारे में जब प्रेरितों ने सेवाकार्य में उन्नति की और कलीसिया का जन्म हुआ, तो वे “चिह्न, अद्‌भुत काम, और सामर्थ्य के काम” जो किए गए थे, उनकी कल्पना करके यह आशा करना एक सामान्य बात है कि काश हम उन्हें देखने के लिए वहाँ होते तो हमारा विश्वास दृढ़ होता और उनके द्वारा हमारे सेवाकार्य में बढ़ोत्तरी होती।

निस्सन्देह, उस समय की अलौकिक घटनाओं की गुणवत्ता और मात्रा दोनों ही विशेष और अद्वितीय थीं। प्रेरितों को उस रीति से अलौकिक वरदान दिया गया था, जो आज के समय के मसीही लोगों को नहीं दिया गया है। यह ध्यान रखना महत्त्वपूर्ण है कि तब भी आरम्भिक कलीसिया ने इन अनुभवों को अपने विश्वास का मापदण्ड नहीं बनाया। हम केवल उन चमत्कारों पर ध्यान केन्द्रित करके उनके सन्दर्भ को नहीं भूल सकते कि वे लोग जो परमेश्वर के आत्मा से भरे गए थे तुरन्त परमेश्वर के वचन को समझने और उद्‌घोषित करने में लौलीन हो गए थे, जिससे वे अपने पूरे जीवन भर “सब प्रकार का धीरज,” जिसे “बड़ा धीरज” भी कहा जा सकता है, रखने के लिए सशक्त बनाए गए थे। कलीसिया के निर्माण का श्रेय प्रेरितों के चमत्कारों का उतना नहीं दिया जाना चाहिए, जितना उन प्रेरितों की विश्वासयोग्य, साहसिक सहनशीलता को दिया जाना चाहिए।

पौलुस चाहता था कि उसके सेवाकार्य का केन्द्र-बिन्दु न तो उन अनेक चमत्कारों पर हो, जो उसके द्वारा हुए थे और न ही उन बड़ी परीक्षाओं पर हो जो, जिनका उसने सामना किया था। बल्कि वह तो यह चाहता था कि उसके सेवाकार्य का केन्द्र-बिन्दु उस दृढ़ विश्वास पर हो, जो परमेश्वर ने उसे दिया था और उस सत्य पर हो, जिसका उसने प्रचार किया था। पौलुस के सेवाकार्य को देखकर, उसके बोझ को देखकर और उसके हृदय की पुकार को सुनकर हमारे लिए यह देखना सरल हो जाता है कि परमेश्वर ने उसके माध्यम से जो चिह्न और चमत्कार किए थे, वे मसीही दिखावे के दिखावटी प्रदर्शन नहीं थे। अपितु वे पीड़ा और विपत्ति से उत्पन्न हुए थे, वे एक ऐसे जीवन में किए गए जो सहे जाने से परे था और उन्होंने उस सन्देश की सच्चाई को रेखांकित कर दिया जिसका प्रचार किया जा रहा था।

इस सन्दर्भ को जानने के बाद पौलुस के अनुयायियों ने यह नहीं पूछा होगा कि उसने ऐसे चमत्कार कैसे किए थे, बल्कि यह कि वह इतना दृढ़ विश्वास कैसे प्रदर्शित कर सका। वह कष्ट सहते हुए “सब प्रकार के धीरज” के साथ आगे कैसे बढ़ सका? केवल यीशु मसीह में उसके विश्वास और परमेश्वर के वचन के उसके ज्ञान से वह ऐसा करने में सक्षम हो सका था।

हमें मसीही जीवन में धैर्य-युक्त सहनशीलता के साथ परीक्षाओं का सामना करने और चुनौतियों का सामना करने में कौन सी बात सक्षम बनाती है? क्या वे चमत्कार हैं? चिह्न हैं? अद्‌भुत काम हैं? कदापि नहीं। यद्यपि परमेश्वर की विशेष कृपा किसी विशिष्ट क्षण पर हमारी सहायता कर सकती है, तौभी मूल मसीही सैद्धान्तिक शिक्षा की एक ठोस, अनुभवात्मक समझ ही वह बात है जो निस्सन्देह हमारे मार्ग के लिए उस समय पर उजियाला ठहरेगी जब बाकी सब अन्धकारमय लग रहा होगा (भजन संहिता 119:105)। वही समझ हमारे विश्वास की गहरी जड़ है और हमारी आत्माओं के लिए लंगर भी वही है (इब्रानियों 6:19)। जब परमेश्वर की सच्चाई हमारे हृदय और मन में बस जाती है, तब ही हम विश्वास के साथ कह सकते हैं, “हे प्रभु के संतो, उसके उत्तम वचन में तुम्हारे विश्वास की नींव कितनी दृढ़ है!”[1] क्या है वह जो आपको बनाए रखेगा? ऊपरी अनुभव ऐसा नहीं कर सकेंगे, परन्तु केवल आन्तरिक विश्वास ही यह कर सकेगा। आपके भीतर होने वाला आत्मा का काम सर्वदा परमेश्वर द्वारा आपके आस-पास किए जाने वाले किसी भी काम से बड़ा चमत्कार होगा। प्रभु करे कि जब लोग आपकी ओर देखें, तो वे केवल उन अद्‌भुत कामों को ही न देखें जो वह आपके में जीवन करता है, बल्कि परीक्षाओं के मध्य आपके सब प्रकार के धीरज को और उसके वचन के सत्य के प्रति आपके आज्ञापालन को भी देखने पाएँ।       

याकूब 5:7-11

13 March : येशू हा देवाचा आमेन आहे

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13 March : येशू हा देवाचा आमेन आहे
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“देवाची वचनें कितीही असोत, त्याच्या ठायी होय हे आहे; म्हणून आम्हीं देवाच्या गौरवाला त्याच्या द्वारें आमेन म्हणतो. ( 2 करिंथकरास पत्र 1:20 )”

प्रार्थना ही अशी गोष्ट आहे जिथे आपल्यां जीवनातला भूतकाळ व आपला भविष्यकाळ सातत्यानें जुळत असतो. मी इथे ह्या गोष्टीचा उल्लेख करतो कारण पौल ह्या वचनात प्रार्थनेला, देवाच्या “होय” सोबत एका विलक्षण रीतीने जोडत आहे.

2 करिंथकरास पत्र 1:20 मध्यें तो म्हणतो, “देवाची वचनें कितीही असोत, त्याच्या ठायी होय हे आहे; म्हणून आम्हीं देवाच्या गौरवाला त्याच्या द्वारें आमेन म्हणतो.” ह्याचा अर्थ सुलभपणे समजून घेऊया.

इथे तो म्हणत आहे कीं “यास्तव, ख्रिस्तामुळे, आपण प्रार्थनेमध्यें देवाला आमेन हे दाखवण्यासाठीं म्हणतो कीं आपण देवाच्या ज्यां भावी कृपेसाठीं प्रार्थना करितो व जिचसाठीं त्याच्यावर अवलंबून राहतो तेव्हां सर्व गौरव त्यालाच दिलें जाईल.”

जर तुम्हांला कधी हा प्रश्न पडत असेल कीं ख्रिस्ती लोक प्रार्थनेनंतर आमेन का म्हणतात किंवा ही प्रथा कुठून आली, तर त्याचें उत्तर हे आहे कीं. आमेन हा शब्द कोणते ही भाषांतर न करता हिब्रू मधून ग्रीक मध्यें घेतला गेला आहे, अगदी जसा तो कोणत्या ही भाषांतराशिवाय इंग्रजीमध्यें व इतर भाषांमध्यें घेतला गेला आहे.

हिब्रू मध्यें, हे एक खात्रीपूर्वक सांगितलेले अनुमोदन आहे ( नहेम्या 5:22, नहेम्या 5:13; 8:6) – हे एक औपचारिक, आस्थापूर्वक “मी मान्य करतो” किंवा “मी जे बोललो त्या बद्दल मला खात्री आहे” किंवा “हे सत्य आहे” असं म्हणणे. सोप्या शब्दात सांगायचे झाले तर, “आमेन” म्हणजे देवा संदर्भात केलेंले विधान आस्थेने “होय’ असे मानणे.

आता 2 करिंथकरास पत्र 1:20 या वचनातील दोन भागामधील संबंध पाहूया. यातील पहिल्यां भागामध्यें लिहले आहे  कीं “देवाची वचनें कितीही असोत, त्याच्या ठायी होय हे आहे” व दुसर्‍या भागामध्यें लिहिले आहे, “म्हणून आम्हीं देवाच्या गौरवाला त्याच्या द्वारें आमेन म्हणतो.”

जेव्हां आपल्यांला हे समजते कीं “आमेन” आणी “होय” याचा अर्थ सारखाच आहे, तेव्हां हे वचन असे होईल : येशू ख्रिस्तामध्यें, त्याच्या अभिवचनांद्वारें देव आपल्यांला होय असे म्हणतो; आणि ख्रिस्ता मध्यें आपण प्रार्थनेद्वारें देवाला होय असे म्हणतो.

12 मार्च : परिवर्तनकारी पछतावा

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12 मार्च : परिवर्तनकारी पछतावा
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“जब उसके पकड़वाने वाले यहूदा ने देखा कि वह दोषी ठहराया गया है तो वह पछताया और वे तीस चाँदी के सिक्के प्रधान याजकों और पुरनियों के पास फेर लाया और कहा, ‘मैं ने निर्दोष को घात के लिए पकड़वाकर पाप किया है!’ उन्होंने कहा, ‘हमें क्या? तू ही जान।’ तब वह उन सिक्कों को मन्दिर में फेंककर चला गया, और जाकर अपने आप को फाँसी दी।”  मत्ती 27:3-5

यीशु को पकड़वाने के बाद यहूदा का क्या हुआ? “उसने अपना मन बदल लिया।” इस वाक्यांश का अनुवाद भी कितनी सहायक रीति से किया गया है, “वह पछताया।” ऐसा लगता है कि उसी क्षण यहूदा का हृदय परिवर्तित हो गया, और इसके साथ ही उसका दृष्टिकोण भी बदल गया।

हम जिस यहूदा को गतसमनी के बगीचे में देखते हैं, जो हथियार लिए लोगों की एक बड़ी भीड़ का नेतृत्व करते हुए यीशु को धृष्टता और निर्लज्ज कटुता के साथ गिरफ्तार कराता है, वह यहूदा नहीं है जिसे हम यहाँ घण्टों बाद प्रधान याजकों और पुरनियों के सामने देखते हैं। उसके कठोर हृदय का स्थान अब पश्चाताप की भावना ने ले लिया है, जिसने उसकी आत्मा को जकड़ लिया है।

एक क्षण के लिए यहूदा के अनुभव के बारे में सोच कर देखें और इसे एक चेतावनी बन जाने दें कि पाप सर्वदा झूठी आशा प्रदान करता है। पाप करने से पहले के क्षण प्रायः उसके बाद के क्षणों से बिल्कुल अलग महसूस होते हैं। यह वही बड़ा बदलाव है, जो आदम और हव्वा ने अपनी अनाज्ञाकारिता के बाद अदन के बगीचे में महसूस किया था। उन्हें उस क्षण में, जब उन्होंने फल खाने का निर्णय लिया, जो कुछ भी पता था और जो कुछ भी उन्होंने उस विद्रोह के कार्य में आशा की थी, वह सब उनके मुँह में धूल बनकर रह गया। (उत्पत्ति 3:6-8)। इसी प्रकार, यीशु को उसके शत्रुओं के हाथों पकड़वाने में जो कुछ भी यहूदा को आकर्षक लग रहा था, वह जल्दी ही उसके लिए कुछ भी नहीं रह गया था।

जब हम पाप करते हैं तो वे सभी मोहक, मादक प्रभाव, जो हमें विद्रोह करने के लिए आकर्षित करते हैं, एक क्षण में ही खत्म हो जाते हैं। जो सोने के समान चमक रहा था वह व्यर्थ वस्तु बन जाती है। केवल यह स्पष्ट तथ्य रह जाता है कि मैंने एक पवित्र, प्रेमपूर्ण परमेश्वर के विरुद्ध पाप किया है।

इस तरह का परिवर्तनकारी पछतावा होने पर हमारे पास विकल्प यह होता है कि हम पश्चाताप करें और परमेश्वर से मेल कर लें या निराश होकर अपने आप को दोषी ठहराएँ। दुखद रूप से, यहूदा ने बाद वाला विकल्प चुना। उसका अपराध इतना बड़ा था कि निश्चय ही हर चेहरा उसे दोषी ठहरा रहा था, वह जो भी आवाज सुन रहा था वह उसे चुभ रही थी, उसकी आत्मा की हर प्रतिध्वनि उसे दोषी ठहरा रही थी। जो धन उसे दिया गया था, वह उसने प्रधान याजकों को लौटाकर अपने अपराध को कम करने का प्रयास किया, तौभी सिक्कों की थैली का भार अपने ऊपर से हटाकर वह अपने हृदय पर पड़े बोझ नहीं हटा पाया। अपने को अलगाव की इस स्थिति में और किसी प्रकार के सुधार की आशा से परे महसूस करते हुए वह एक भयानक मौत मारा गया। हो सकता है कि आज आप भी अपने पाप के बोझ तले दबा हुआ महसूस कर रहे हों। हो सकता है कि आपने अपने आप सब ठीक करने का प्रयास किया तो हो, किन्तु बोझ अभी भी बना हुआ है। यदि ऐसा है तो यह जान लें कि यहूदा की कहानी को आपकी बनने की आवश्यकता नहीं है। आप मसीह की ओर फिर सकते हैं। वह स्वतन्त्रता और क्षमा प्रदान करता है, एक ऐसा जूआ देता है जो सहज है और एक ऐसा बोझ देता है जो हल्का है (मत्ती 11:28-30)। इसी कारण मसीह मरा कि यहूदा जैसे पापी विश्वासघातियों को छुटकारा दे सके।

अगली बार जब पाप हमें अपनी ओर आने का संकेत करे तो यहूदा का उदाहरण हमारे लिए चेतावनी के रूप में मौजूद है। इस समय कौन से पाप आपको विशेष रूप से लुभा रहे हैं? याद रखें कि वे जैसे पहले दिखाई देते हैं, वे बाद में वैसे नहीं लगेंगे। प्रलोभन के क्षणों के लिए सहायता और अपराध-बोध के क्षणों के लिए आशा उपलब्ध है। परमेश्वर की क्षमा हमारे पछतावे और पश्चाताप की प्रतीक्षा कर रही है। आपको केवल इतना करना है कि उसकी ओर मुड़ें।       

भजन संहिता 51

March 12 : जेव्हां घडविणारा आपल्यां बाजूनें असतो

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March 12 : जेव्हां घडविणारा आपल्यां बाजूनें असतो
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“जो आपल्यां उत्पन्नकर्त्याशी वाद घालतो त्यास धिक्कार असो! तो मातीच्या खापर्‍यापैकीं एक आहे. तू काय करतोस असे माती आपल्यां घडणा-याला म्हणेल काय? तुला हात नाहींत असे तुझे कृत्य तुला म्हणेल काय?” ( यशया 45:9)

देवाचा प्रतापीपणा अधिक उंचविला जातो जेव्हां आपण त्याच्याकडें एक निर्माणकर्ता ज्यानें शून्यातून हे विश्व निर्माण केलें, या दृष्टीने पाहतो. देव शून्यतेला आज्ञा करतो, आणि ती त्याची आज्ञा पाळते आणि शून्यातून विश्व निर्माण होते.

शून्यातून त्यानें माती घडवली, व त्या मातीतून त्यानें आपल्यांला घडवले- देवाची कलाकृती (यशया 45:9) – त्याच्या मालकींचे लोक, त्याच्या  गौरवाकरिता नेमून ठेवलले व त्याच्यावर पूर्णपणे अवलंबून असलेले. “परमेश्वर हाच देव आहे हे जाणा ; त्यानेंच आम्हांला उत्पन्न केलें; आम्हीं त्याचेंच आहों, आम्हीं त्याची प्रजा, त्याच्या कुरणातील कळप आहों” (स्तोत्र 100:3). दुसर्‍याच्या मालकींचे मेंढरू व पात्र असणे ही एक नम्र करणारी गोष्ट आहे.

आज सकाळी मी यशयाचे पुस्तक वाचत असताना मला देवाच्या प्रतापीपणाविषयीं आणखी एक वचन सापडले. जेव्हां मी ते वचन देवाच्या संपूर्ण सामर्थ्याशी व उत्पन्नकर्त्याच्या असलेल्यां अधिकाराशी एकत्र केलें, तेव्हां त्याचें एक ज्वलंत मिश्रण होऊन माझ्या मनात एक स्फोट झाला. धडाम!

यशया 33:21 म्हणते, “प्रतापी परमेश्वर आम्हांसाठीं असेल!”

आम्हांसाठीं! आम्हांसाठीं! निर्माणकर्ता आम्हांसाठीं आहे, आमच्या विरुद्ध नाहीं.   सर्व शक्तिनिशी आणि जे त्यानें घडवले आहे त्यावर संपूर्ण अधिकारासह – तो आम्हांसाठीं आहे!

“हे देवा, तुझी आशा धरून राहणार्‍यांचे इष्ट काम करणारा असा तुझ्याशिवाय दुसरा कोणी प्राचीन कालापासून ऐकण्यात आलेला नाहीं, त्याचें नाव आलेले नाहीं, कोणी तो डोळ्यांनी पाहिला नाहीं” (यशया 64:4). “देव आपल्यांला अनुकूल असल्यांस आपल्यांला प्रतिकूल कोण?” (रोम 8:31). 

तुम्हीं आणखी कोणत्या गोष्टीचा विचार करू शकता का, जी  इतकीं सांत्वन देणारी, खात्री देणारी व आनंद देणारी आहे कीं, हा प्रतापी परमेश्वर तुमच्यासाठीं आहे?

11 मार्च : उसकी युक्ति के अनुसार

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11 मार्च : उसकी युक्ति के अनुसार
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“तेरे पास क्या है जो तू ने (दूसरे से) नहीं पाया? और जब कि तू ने (दूसरे से) पाया है, तो ऐसा घमण्ड क्यों करता है कि मानो नहीं पाया?”  1 कुरिन्थियों 4:7

हम इसे कई तरीकों से छिपाते हुए अलग-अलग नाम देते हैं, किन्तु ईर्ष्या ऐसे इवेंजेलिकल पापों में से एक है जो प्रायः “सहनीय” माना जाता है। इसकी सम्भावना बहुत कम है कि यह आपको उन “दस सबसे अधिक किए जाने वाले” पापों की सूची में मिले जिसके विरुद्ध कोई पास्टर अपनी कलीसिया को चेतावनी देता हो या एक-दूसरे के साथ अपने संघर्षों के बारे में बात करते समय विश्वासी इसका उल्लेख प्रायः करते हों। तो भी, यह परमेश्वर की सूची में है और प्रायः पवित्रशास्त्र में इसका उल्लेख किया गया है। वास्तविकता यह है कि ईर्ष्या कुछ सबसे घिनौने पापपूर्ण व्यवहारों की सूची के बीच पाई जाती है, जिनका नए नियम की पत्रियों में उल्लेख किया गया है क्योंकि इसे बहुत गम्भीरता से लिया जाना चाहिए (उदाहरण के लिए, रोमियों 13:13 देखें)।

जब पौलुस ने कुरिन्थियों को पत्र लिखा था, उस समय से आज तक कुछ विशेष बदलाव नहीं आया है। सामान्य स्थानीय कलीसिया अभी भी ईर्ष्या के कारण बहुत अधिक अराजकता तथा विभाजन के कारण जूझ रही है और ईर्ष्या द्वारा उत्पन्न संकटों में से एक सम्भावना यह है कि हम सन्देह करने लगें कि क्या परमेश्वर जानता भी है कि वह वरदानों का वितरण किस प्रकार कर रहा है।

पौलुस कलीसिया के इन घमण्डी, विभाजित, ईर्ष्यालु सदस्यों से कहता है कि तुम्हारे पास जो कुछ भी है वह तुमने किसी दूसरे से पाया है  और वरदानों का देने वाला वह जगत का सृष्टिकर्ता, गलतियाँ नहीं करता। तो फिर वे, और हम भी, इस प्रकार अहंकार पूर्वक कैसे रह सकते हैं, मानो सृष्टि का नियन्त्रण हम अधिक अच्छे ढंग से कर सकते हैं? अपनी ऊँचाई, परिधि, गति या अपनी किसी भी योग्यता को क्या हमने निर्धारित किया है? हमें किसने विशिष्ट बनाया है? परमेश्वर ने! हमारा डी.एन.ए. परमेश्वर की ओर से नियोजित है। हमारी परिस्थितियाँ ठीक वैसी ही हैं जैसी परमेश्वर ने युक्ति की है, और वह गलतियाँ नहीं करता। डाह एक पाप इसलिए है, क्योंकि यह एक ऐसा रवैया है जो कहता है कि परमेश्वर भला नहीं है या वह नहीं जानता कि हमारे लिए क्या भला है। डाह मूर्तिपूजा जैसी लगती है।

एक संगीत मण्डल के रूप में जीवन के मंच जब हम बाँसुरी जैसा एक यन्त्र बजा रहे हों और अपने से कुछ ही दूरी पर एक बड़ी तुरही को ऊँचे और शक्तिशाली स्वरों के साथ बजती हुई देखें, तब हो सकता है कि हम अपने आप से यह कहना चाहें, “कोई भी मुझे नहीं सुन पा रहा। मेरा स्वर पर्याप्त रूप से ऊँचा नहीं है।” वहीं से अपनी स्थिति के बारे में कड़वाहट की भावना और तुरही वादक के प्रति ईर्ष्या की भावना उत्पन्न होती है। परन्तु हमारी बाँसुरी जैसे वाद्य यन्त्र की ध्वनि का भी एक कारण है। यह वह वाद्य यन्त्र है जिसे हमें ही बजाना है। इसलिए इसे आनन्द से और उत्कृष्टता के साथ बजाएँ!

परमेश्वर द्वारा दिए गए वरदानों का उपयोग करने के हमारे प्रयासों में हम एक-दूसरे से ईर्ष्या क्यों करते हैं? हम अपने उस आनन्द को असन्तोष के हाथों क्यों छिन जाने देते हैं, जो उसने हमें मुक्त रूप से प्रदान किया है? उसने किसी और के लिए जो किया है, उसके कारण हम क्यों उसके प्रति अन्धे हो जाते हैं कि उसने हमारे लिए क्या किया है, विशेषकर अपनी उपस्थिति में हमें अनन्त धरोहर देने में? इस एक सत्य को हम सभी को अभ्यास करने की आवश्यकता है, “परमेश्वर ने मुझे वही दिया है जो मुझे चाहिए, मैं बिल्कुल वैसा ही रचा गया हूँ जैसी उसकी इच्छा थी, और जो कुछ उसने मुझे दिया है और जो कुछ नहीं दिया है, वह मेरे भले और उसकी महिमा के लिए है।”

ईर्ष्या को अपने ऊपर हावी न होने दें। इसके विपरीत, जिस भूमिका के लिए आपको बनाया गया है, उसे आनन्द के साथ जीएँ। क्योंकि आप उसके बनाए हुए हैं, और मसीह यीशु में उन भले कामों के लिए सृजे गए हैं, जिन्हें परमेश्‍वर ने पहले से हमारे करने के लिए तैयार किया है और आपको वरदान में दिया है (इफिसियों 2:10)। उसको ही आज अपने लिए पर्याप्त होने दें।       1 तीमुथियुस 6:6-12

March 11 : दोन अमर्याद सबळ आणि मृदु सत्य

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March 11 : दोन अमर्याद सबळ आणि मृदु सत्य
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“मी आरंभीच शेवट कळवितो. होणार्‍या गोष्टी घडविण्यापूर्वी त्या मी प्राचीन काळापासून सांगत आलो आहे; माझा संकल्प सिद्धीस जाईल, माझा मनोरथ मी पूर्ण करीन . ” ( यशया 46:10 )

“सार्वभौमता” हा शब्द (“ट्रिनिटी”- त्रेकय ह्या शब्दाप्रमाणेच) पवित्र शास्त्रात आढळत नाहीं. आपण त्याचा उपयोग हे सत्य सांगण्यास करतो कीं, देवच ह्या जगाचा सर्वोच्च नियंत्रक आहे, मोठ्यातल्यां मोठ्या आंतरराष्ट्रीय घडामोडी व जंगलातील लहानातील लहान पाखराचे झाडावरून पडणे, ह्या सर्व गोष्टींवर त्याचें सर्वोच्च नियंत्रण आहे.

बायबल हा सिद्धांत अशाप्रकारे मांडतो : …मीच देव आहे, दुसरा कोणी नव्हे, माझ्यासमान कोणीच नाहीं…… ‘माझा संकल्प सिद्धीस जाईल, माझा मनोरथ मी पूर्ण करीन. (यशया 46:9–10.) आणि : तो (देव) आकाशातील आपल्यां सैन्याचे व पृथ्वीवरील रहिवाशांचे इच्छेस येईल ते करतो; “तू असे काय करतोस?” असे त्याचा हात धरून कोणाच्याने त्याला म्हणवत नाहीं” (दानीएल 4:35). आणि : “तो न बदलणारा आहे, त्याला त्यापासून कोण फिरवणार? आपल्यां मनास येते ते तो करतो; जे मला नेमले आहे ते तो घडवून आणत आहे; अशा पुष्कळ गोष्टी त्याच्याजवळ आहेत” (इयोब  23:13–14). आणि : “आमचा देव स्वर्गात आहे; त्याला योग्य दिसते ते सर्व तो करतो” (स्तोत्र 115:3).

ही शिकवण विश्वासणा-या करीत खूप मौल्यवान असण्याचे एक कारण हे आहे कीं, जे देवावर विश्वास ठेवतात त्यांचावर दया व कृपा करणे हा देवाचा मनोरथ आहे (इफिस 2:7, स्तोत्र 37:3-7, नीति 29:25).  देवाच्या सार्वभौमतेचा अर्थ असा होतो कीं आपल्यांकरिता असलेली त्याची योजना कधीच विफल होत नाहीं ती अपयशी होऊंच शकत नाहीं.

“जे देवावर प्रीति करतात” व ” जे त्याच्या संकल्पा प्रमाणे बोलाविलेलें” आहेंत, त्यांच्या बरोबर अशी कोणतीच गोष्ट घडत नाहीं जी सखोलपणे, दीर्घपणे व त्यांच्या सर्वोच्च कल्यांणाकरिता कार्य करीत नाहीं ( रोम 8:28 ; स्तोत्र 84:11 ). 

यासाठींच मी म्हणतो कीं देवाची दया व त्याचें सार्वभौमत्व हे माझ्या जीवनाचे दोन स्तंभ आहेत. ते माझ्या भविष्याची आशा आहेत, माझ्या सेवाकार्याचे बळ आहेत, माझ्या ईश्वरविज्ञानाचा केंद्रबिंदू आहेत, माझ्या विवाहाचा बंध आहेत, माझ्या सर्व रोगांचे औषध आहेत आणि माझ्या सर्व निराशेचा उपाय आहेत.

आणि जेव्हां मी मृत्युच्या पायरीवर येईन ( आता किंवा कालांतराने ) तेव्हां ही दोन सत्य माझ्या मृत्यूशय्येच्या बाजूला उभी असतील आणि अमर्याद बळाने आणि कोमलतेने मला उंचावून देवाकडें नेतील.

10 मार्च : अकेले पड़ जाने का झूठ

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“हे परमेश्‍वर, कब तक! क्या तू सदैव मुझे भूला रहेगा? तू कब तक अपना मुखड़ा मुझसे छिपाए रहेगा?”  भजन संहिता 13:1

लोग कहते हैं कि जब आप मौज-मस्ती कर रहे होते हैं, तो समय बहुत तेज़ी से बीतता हुआ प्रतीत होता है। किन्तु जब परिस्थितियाँ कम उत्साही हो जाती हैं, तो जीवन धीमी गति से चलता हुआ प्रतीत होता है। हम अपने आप को यह सोचते हुए पाते हैं, “मुझे नहीं पता कि मैं कभी इन परिस्थितियों से बाहर निकल पाऊँगा या नहीं। और मुझे नहीं पता कि मैं इन्हें कैसे सहन कर पाऊँगा।”

भजन संहिता 13 में बार-बार पूछा जाने वाला एक प्रश्न यह है, “कब तक? कब तक?” यहाँ पर दाऊद की परिस्थितियों का तो वर्णन नहीं किया गया है, किन्तु वह स्पष्ट रूप से भुला दिया गया और त्यागा हुआ महसूस कर रहा है, जो एक ऐसी भावना है जिसे हम सभी समझ सकते हैं। यह वैसा ही है, जैसा हम किसी प्रियजन को खो देने पर महसूस करते हैं या जब हमें लगता है कि हमें अकेले ही किसी परीक्षा की घाटी से होकर जाना होगा।

अकेला पड़ जाना निस्सन्देह कुचल देने वाला अनुभव होता है। परन्तु यहाँ दाऊद ने जो लिखा है, वह और भी अधिक महत्त्वपूर्ण है। वह महसूस कर रहा है कि स्वयं परमेश्वर ने ही उसे अकेला छोड़ दिया है।

यही भावना सम्पूर्ण पवित्रशास्त्र में परमेश्वर के कई अन्य लोगों में भी दिखाई देती है। यशायाह की पुस्तक में निर्वासन में गए हुए परमेश्वर के लोग चिल्लाते हैं, “यहोवा ने मुझे त्याग दिया है, मेरा प्रभु मुझे भूल गया है” (यशायाह 49:14)। मसीही पथ पर चलने वाले यात्रियों का, अर्थात् यीशु के सच्चे अनुयायियों और सेवकों का भी कभी-कभी यह कहने का मन करता है, “मुझे लगता है कि प्रभु ने सच में हमें भुला दिया है। यदि उसने सच में हमें भुला न दिया होता, यदि वह अब भी हमारे साथ होता तो हम इस स्थिति में कैसे होते? यदि वह सच में हमारी रक्षा कर रहा होता तो निश्चित रूप से हमें इन परीक्षाओं को नहीं झेलना पड़ता।”

फिर भी दाऊद की इस उभरती हुई निराशा में हम पाते हैं कि उसका अनुभव (जैसा कि प्रायः हमारे साथ भी होता है) वास्तविकता को प्रतिबिम्बित नहीं कर रहा है। और दाऊद में इस बात को स्वीकारने की आत्मिक परिपक्वता और दीनता है कि जो उसे सच लग रहा है , वह उससे मेल नहीं खा रहा जो वह जानता है  कि वास्तव में सच है। इसलिए वह स्वयं को परमेश्वर की महाकरुणा, उसके उद्धार और उसकी उदारता की याद दिलाता है, और संघर्ष और पीड़ा में होते हुए भी उन बातों में आनन्दित रहने का संकल्प लेता है (भजन संहिता 13:5-6)।

मसीही जीवन का आशा से भरा तनाव यही है। हम पूछ रहे होते हैं, “हे प्रभु, कब तक? हे परमेश्वर, आप कहाँ हैं?” जबकि हम अपने हृदयों को याद दिला रहे होते हैं कि परमेश्वर ने हमसे प्रेम करना, हमें छुड़ाना या हमारे भीतर काम करना समाप्त नहीं किया है।

त्याग दिए जाने के झूठ पर विश्वास न करें, जिसे आपकी भावनाएँ आपके सामने परोसती रहती हैं। अपने भुलक्कड़ लोगों के प्रति परमेश्वर की शान्ति प्रदान करने वाले इस प्रत्युत्तर में विश्राम प्राप्त करें, “क्या यह हो सकता है कि कोई माता अपने दूध पीते बच्चे को भूल जाए और अपने जन्माए हुए लड़के पर दया न करे? हाँ, वह तो भूल सकती है, परन्तु मैं तुझे नहीं भूल सकता। देख, मैं ने तेरा चित्र अपनी हथेलियों पर खोदकर बनाया है; तेरी शहरपनाह सदैव मेरी दृष्टि के सामने बनी रहती है” (यशायाह 49:15-16)। अपने बच्चों के लिए परमेश्वर का संरक्षण सूर्य के समान है, वह स्थाई है। यहाँ तक कि जब बादल इसे अवरुद्ध कर देते हैं, तब भी वह वहाँ होता है। यह सर्वदा वहाँ होता है।

क्या आप आज परमेश्वर की स्थिरता पर भरोसा करेंगे? जब आप अगली बार त्यागा हुआ महसूस करें तो यह जान लें कि परमेश्वर अपने हाथों को देखता है, जिन पर उसकी प्रत्येक सन्तान का नाम खुदा हुआ है और वह कहता है कि तुम यहीं हो। मैं तुम्हें नहीं भूला हूँ।       

भजन संहिता 13

March 10 : आपण कोकर्‍याची भक्ति करूया

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ही गुंडाळी उघडण्यास किंवा तिच्यात पाहण्यास योग्य असा कोणी आढळला नाहीं म्हणून मला फार रडू आले “. (प्रकटीकरण 5:4)

तुम्हीं कधी असा विचार केला आहे का, कीं तुमच्या प्रार्थना स्वर्गामधील सुवासा सारख्या आहेत?  प्रकटीकरण 5 वाचल्यांवर हेच चित्र समोर तयार होते. स्वर्गामधील जीवनाची ही एक झलक आहे.

प्रकटीकरण 5 मध्यें आपण पाहतो कीं, सर्वसमर्थ देव हातामध्यें गुंडाळी घेऊन राजासनावर बसला आहे. या गुंडाळीवर सात शिक्के आहेत. ती गुंडाळी उघडण्यासाठीं हे सात शिक्के फोडावे लागणार आहेत.

मला असे वाटते कीं गुंडाळीचे उघडणे हे मुक्तिच्या इतिहासाच्या शेवटच्या दिवसाचे दर्शक आहे, आणि शिक्क्यांचे फोडले जाणे हे आपली त्या दिवसाकडील वाटचालीच्या इतिहासाचे दर्शक आहे.

प्रकटीकरण 5:4 मध्यें सुरवातीला, योहान रडत असतो कारण ती गुंडाळी उघडण्यास कोणी योग्य नाहीं. तेव्हां स्वर्गातील वडीलमंडळापैकीं एक जण योहानाला म्हणतो कीं, “रडू नकोस; पाहा, ‘यहूदा’ वंशाचा ‘सिंह’, दाविदाचा ‘अंकुर’ ह्याने जय मिळवला; म्हणून तो तिचे सात शिक्के फोडून ती उघडण्यास योग्य ठरला आहे” ( प्रकटीकरण 5:5).

क्रूसावरील मरण स्वीकारून, येशूनें  मुक्तिच्या इतिहिसातील होऊ घातलेल्यां घटनां उघडण्याचा व त्याच्या लोकांना त्यातून विजयी वाटचाल करीत नेण्याचा अधिकार मिळवला.

पुढच्या वचनामध्यें, सिंहाचे चित्रण कोक-या प्रमाणे करण्यात आले आहे, “ज्याचा जणू काय वध करण्यात आला होता, असा कोकरा उभा राहिलेला मी पहिला” (प्रकटीकरण 5:6). येशूच्या क्रूसावरील विजयाचे हे सुंदर चित्रण आहे, नाहीं का? वधला असला तरी, उभा असलेला, खाली झोपलेला नाहीं!

हे तितक्याच खात्रीचे आहे जसे सिंहाने त्याच्या शत्रूला गिळंकृत केलें आहे – पण त्यानें हा विजय त्याच्या शत्रूंकडून स्वत:चा वध करून प्राप्त केला आहे !

त्यामुळे, कोकरा आता देवाच्या हातातून मुक्तीच्या इतिहासाची गुंडाळी घेऊन उघडण्यास समर्थ झाला आहे. हा किती राजेशाही क्षण आहे, जेव्हां स्वर्गामधील चोवीस वडील भक्ति करण्यास त्याच्या पाया पडत आहेत.

तुम्हांला ठाऊक आहे का, कीं धुपाने भरलेल्यां सोन्याच्या वाट्या काय आहेत? प्रकटीकरण 5:8 सांगते कीं “त्या पवित्र जनांच्या ‘प्रार्थना’ होत.” याचा अर्थ असा होत नाहीं का, कीं आपल्यां प्रार्थना स्वर्गातल्यां सुगंधा प्रमाणे आहेत, देवाच्या राजासना समोर व कोक-या समोर एका सुवासा प्रमाणे आहेत?

जेव्हां मी विचार करतो कीं माझ्या प्रार्थना साठवून ख्रिस्ताच्या स्वर्गातील भक्तिमध्यें सादर केल्यां जातात, तेव्हां मला अधिक जोमाने प्रार्थना करण्याचे सामर्थ्य व उत्तेजन प्राप्त होते.

तर आपण खाली आपल्यां प्रार्थनांद्वारें ख्रिस्ताला मान, गौरव व आपली भक्ति सादर करू, आणि आपल्यां प्रार्थना स्वर्गीय मंडळीद्वारें ख्रिस्त, जो वधला गेला होता, त्याला सुंगधी धुपाप्रमाणे सादर केल्यां जातात यात दुहेरी आनंद मानू.