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31 जनवरी : लज्जित न हो

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31 जनवरी : लज्जित न हो
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“हमारे प्रभु की गवाही से, और मुझसे जो उसका कैदी हूँ, लज्जित न हो, पर उस परमेश्‍वर की सामर्थ्य के अनुसार सुसमाचार के लिए मेरे साथ दुख उठा जिसने हमारा उद्धार किया और पवित्र बुलाहट से बुलाया, और यह हमारे कामों के अनुसार नहीं; पर उसके उद्देश्य और उस अनुग्रह के अनुसार है जो मसीह यीशु में सनातन से हम पर हुआ है।”  2 तीमुथियुस 1:8-9

स्वामी के कारण, स्वामी के सेवकों के कारण और स्वामी के सन्देश के कारण लज्जित होना एक बहुत ही सहज बात है। इसलिए यह सुनना एक बड़ी चुनौती है कि पौलुस कैसे तीमुथियुस को और हमें “लज्जित न होने” के लिए प्रोत्साहित कर रहा है।

पश्चिमी संस्कृति में धर्म, परमेश्वर और आत्मिकता के बारे में अस्पष्ट बातचीत व्यापक रूप से सहनीय मानी जाती है; हम कई बार कई तरह के अस्पष्ट कथनों को सुनते या पढ़ते हैं, जो सुसमाचार के साथ शिथिल रूप से जुड़े हुए प्रतीत होते हैं। तथापि समाज के मानकों के अनुसार यह पूर्ण रूप से अस्वीकार्य है कि यीशु मसीह के अतिरिक्त किसी और के द्वारा उद्धार नहीं है। यदि हम पतरस के साथ यह दावा करने के लिए तैयार हैं कि “स्वर्ग के नीचे मनुष्यों में और कोई दूसरा नाम नहीं दिया गया, जिसके द्वारा हम उद्धार पा सकें” (प्रेरितों के काम 4:12), तो यहाँ पौलुस के तीमुथियुस को लिखे शब्द हमारे लिए भी उपयुक्त होंगे कि “सुसमाचार के लिए मेरे साथ दुख उठा।”

सुसमाचार के लिए दुख उठाने के विशेषाधिकार में सम्मिलित होने के लिए पौलुस का निमन्त्रण, एक अर्थ में, हमें परेशान करने वाला है। यह हमारे समय के मसीही जयवन्तवाद के बिल्कुल विपरीत है, जो सदैव मसीही जीवन को भव्य तरीके से प्रस्तुत करना चाहता है। इस कारण बहुत से लोग केवल चंगा करने, चमत्कार करने और अपने लोगों को जीत की ओर ले जाने वाले परमेश्वर के सामर्थ्य की पुष्टि करना और स्वीकार करना चाहते हैं। तथापि, बाइबल और मानवीय अनुभव हमें बताते हैं कि—मृत्यु को परम चंगाई के रूप में अलग करके—जिन लोगों के लिए हमने प्रार्थना की है, उनमें से अधिकांश लोग पीड़ा में बने रहेंगे और कठिन दिनों में जीवन बिताएँगे। हमें सच बताना चाहिए। जॉन न्यूटन के शब्दों में, मसीही व्यक्ति को “बहुत सी विपत्तियों, कठिन कार्यों और प्रलोभन के फन्दों से होकर जाना होगा”[1] निकट भविष्य में हमारे लिए और भी परीक्षाएँ प्रतीक्षा कर रही हैं, विशेषकर यदि हमें पृथ्वी के अन्त तक सुसमाचार प्रचार करने के बुलावे के प्रति विश्वासयोग्य रहना है (प्रेरितों के काम 1:8)।

तो फिर हम सुसमाचार के लिए पीड़ा में कैसे स्थिर बने रहें? परमेश्वर के अनुग्रह के द्वारा मिलने वाला परमेश्वर का सामर्थ्य ही हमें अन्त तक स्थिर बनाए रखता है। न्यूटन के गीत के बोल इस वास्तविकता को बतलाते हैं, “अनुग्रह ही है जो मुझे अब तक सुरक्षित लाया है, और अनुग्रह ही मुझे घर ले जाएगा।” यह एक अद्‌भुत सत्य है!

परमेश्वर ने आपको बचाया है और वही आपको पीड़ा के समय में दृढ़ता से थामे रख सकता है। परमेश्वर ने आपको नियुक्त किया है और जब आपको उसके बारे में सच्चाई की साक्षी देने के लिए बुलाया जाए, तो वही आपको हियाव दे सकता है। उसके सम्भालने वाले सामर्थ्य की सच्चाई आपके हृदय में हलचल उत्पन्न कर सकती है और आपके जीवन को बदल सकती है। कठिन और सन्देह से भरे दिनों में आप अपनी आत्मा के लिए एक गढ़ के रूप में इस वास्तविकता को थामे रह सकते हैं। और जब आप उस स्वामी, उसके सेवकों या उसके सन्देश के लिए खड़े होने से पीछे हटने के लिए प्रलोभित हो रहे हों, तो जैसे ही आप बोलने के लिए अपना मुँह खोलें, आप उसके सामर्थ्य की ओर देखते हुए अपनी साक्षी के प्रभावी होने के लिए एक मौन प्रार्थना कर सकते हैं। “लज्जित न हों।”

रोमियों 1:8-17

31 जानेवारी : दु:खाचे पाच उद्देश

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31 जानेवारी : दु:खाचे पाच उद्देश
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परंतु आपल्याला ठाऊक आहे कीं, देवावर प्रीति करणार्‍यांना म्हणजे त्याच्या संकल्पाप्रमाणे बोलावलेल्यांना देवाच्या करणीने सर्व गोष्टी मिळून कल्याणकारक होतात. (रोमकरांस 8:28)

आमच्यावर येणाऱ्या तात्कालिक व हलक्या संकटाची लहान लहान कारणे आम्हांला क्वचितच माहीत असतात, परंतु तरी आपण विश्वासांत का टिकून राहतो याची लहान लहान कारणे बायबल आपल्याला सांगते.

त्यांपैकी काही कारणें लक्षात ठेवण्याचा एखादा मार्ग शोधून काढणे बरे राहील जेणेकरुन ज्यां ज्यां प्रसंगी आपल्यावर अचानक संकट किंवा दु:ख येते किंवा विश्वासांतील आपल्या प्रिय जनांना त्यांच्या दुःखात मदत करण्याची संधी मिळते, त्यां त्यां प्रसंगी आपण देवाने आपल्याला दिलेल्या काही सत्यांची आठवण करू शकतो ह्यासाठी कीं आपण आशा सोडू नये.

ती कारणें लक्षात ठेवण्याचा एक मार्ग आहे: इंग्रजी शब्दांचे 5 R’ (किंवा उपयुक्त असल्यांस त्यांपैकी फक्त तीन निवडा आणि त्यांना लक्षात ठेवण्याचा प्रयत्न करा).

आपल्याला जें दु:ख होतांत त्यांमागे असलेले देवाचे उद्देश पुढीलप्रमाणे आहेत:

Repentance: म्हणजे पश्‍चात्ताप – दुःख हे आपल्यासाठी आणि इतरांसाठीं देवाची हाक आहे कीं आपण पृथ्वीवरील कोणत्याही गोष्टीला देवाच्या वर ठेवण्यापासून वळावे. लूक 13:4-5:

“किंवा ज्या अठरा जणांवर शिलोहातील बुरूज पडला आणि ते ठार झाले, ते यरुशलेमेत राहणार्‍या सर्व माणसांपेक्षा अधिक अपराधी होते असे तुम्हांला वाटते काय? मी तुम्हांला सांगतो, नव्हते; पण जर तुम्हीं पश्‍चात्ताप केला नाही तर तुम्हा सर्वांचा त्यांच्याप्रमाणे नाश होईल.”

Reliance  म्हणजे भिस्त : दुःख या गोष्टीची हाक आहे कीं आपण ह्या जगाच्या जीवन-रक्षक साधनांवर नव्हे तर देवावर भरवसा ठेवावा. 2 करिंथकरांस1:8-9:

आम्हीं आमच्या शक्तीपलीकडे अतिशयच दडपले गेलो; इतके की आम्हीं जगतो की मरतो असे आम्हांला झाले. फार तर काय, आम्हीं मरणारच असे आमचे मन आम्हांला सांगत होते; आम्हीं स्वत:वर नव्हे तर मृतांना सजीव करणार्‍या देवावर भरवसा ठेवावा, म्हणून हे झाले

Righteousness म्हणजे नीतिमत्त्व : दुःख हे आपल्या प्रेमळ स्वर्गीय पित्याची शिस्त आहे जी तो आपण त्याच्या नीतिमत्वाचे आणि पवित्रतेचे वाटेकरी व्हावें म्हणून लावतो. इब्री 12:6, 10-11:

“कारण ज्याच्यावर परमेश्वर प्रीति करतो, त्याला तो शिक्षा करतो आणि ज्या पुत्रांना तो स्वीकारतो त्या प्रत्येकाला फटके मारतो.” . . . तो करतो ती आपल्या हितासाठी, म्हणजे आपण त्याच्या पवित्रतेचे वाटेकरी व्हावे म्हणून करतो. कोणतीही शिक्षा तत्काली आनंदाची वाटत नाही, उलट खेदाची वाटते; तरी ज्यांना तिच्याकडून वळण लागले आहे त्यांना ती पुढे नीतिमत्त्व हे शांतिकारक फळ देते.

Reward म्हणजे प्रतिफळ : दुःख आपल्यासाठी स्वर्गात एक मोठे प्रतिफळ उत्पन्न करत आहे जे आपल्याला इथें होत असलेल्या प्रत्येक दुखाच्या तुलनेने हजारपट मोठे आहे. 2 करिंथकरांस 4:17:

कारण आमच्यावर येणारे तात्कालिक व हलके संकट हे आमच्यासाठी अत्यंत मोठ्या प्रमाणात सार्वकालिक गौरवाचा भार उत्पन्न करते.

शेवटी, Reminder म्हणजे स्मरणपत्र: दु:ख आपल्याला याची आठवण करून देते की देवाने आपल्या पुत्राला दु:ख भोगण्यासाठी जगात पाठवले ह्यासाठी की आपल्यावर येणारे दुःख हे देवाचा न्याय नसून त्याचे शुद्धीकरणाचे कार्य असावें. फिलिप्पैकरांस 3:10:

. . . हे अशासाठी आहे की, तो व त्याच्या पुनरुत्थानाचे सामर्थ्य व त्याच्या दुःखाची सहभागिता ह्यांची, त्याच्या मरणाला अनुरूप होऊन मी ओळख करून घ्यावी.

यास्तव, ख्रिस्ती अंत:करण दुःखात जर ओरडत असेल, “का?” तर हे समजण्यासारखे आहे कारण आपल्या जी दु:खे होतांत त्यांची  तात्कालिक व हलकी कारणे आपल्याला माहित नसल्यामुळे – म्हणजे, आताच का, असे का, इतक्या दिवसांपासून का? परंतु ह्या लहान लहान कारणांविषयी आपल्याला असलेल्या या अज्ञानामुळे आपण देवाच्या त्या मोठ्या मदतीकडे दुर्लक्ष करूं नये जी तो आमची त्याच्या वचनांत ह्या दुखामागे असलेला त्याचा हेतू प्रकट करून करतो.

“तुम्हीं ईयोबाच्या धीराविषयी ऐकलें आहे, आणि त्याच्याविषयीचा प्रभूचा जो हेतू होता तो तुम्हीं पाहिला आहे; ह्यावरून ‘प्रभू फार कनवाळू व दयाळू’ आहे हे तुम्हांला दिसून आले” (याकोब 5:11).

30 जनवरी : उसकी उपस्थिति के द्वारा सुरक्षित

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30 जनवरी : उसकी उपस्थिति के द्वारा सुरक्षित
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“यहोवा उस [यूसुफ] के संग था इसलिए वह भाग्यवान् पुरुष हो गया”  उत्पत्ति 39:2

परमेश्वर की सेवा करने के लिए उस स्थान से अच्छा कोई और स्थान नहीं है, जहाँ वह आपको रखता है।

कोई भी नौकरी दोषरहित नहीं होती, कोई भी परिवार दोषरहित नहीं होता, कोई भी परिस्थितियाँ परेशानियों से मुक्त नहीं होतीं। हममें से जो लोग लगातार आदर्श जीवन की खोज करते रहते हैं, जो यह भूल जाते हैं कि सिद्धता को स्वर्ग के लिए सुरक्षित रखा गया है, वे अपने आप को एक ऐसी यात्रा पर ले जाते हैं, जिसमें बार-बार निराशा ही हाथ लगती है।

यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी कि यूसुफ ने जिन परिस्थितियों का अनुभव किया, वे बिल्कुल भी आदर्श परिस्थितियाँ नहीं थीं। अपने पिता से विशेष प्रेम पाने वाले व्यक्ति के रूप में अपना जीवन आरम्भ करने के बाद उसने अपने आप को गुलामों के व्यापारियों के व्यापार की वस्तु के रूप में पाया। उसके परिवार के घर की सुरक्षा का स्थान दासत्व की बेड़ियों ने ले लिया।

यूसुफ के समान हम सभी समय के साथ अपनी परिस्थितियों को बदलते हुए देखते हैं। हो सकता है कि हम लम्बे समय तक जिस घर में रहे हैं, उससे हमें दूर जाना पड़े, या हमारे प्रियजनों को कष्टों का सामना करना पड़े, या वित्तीय कठिनाइयाँ या स्वास्थ्य से सम्बन्धित समस्याएँ अप्रत्याशित रूप से आ जाएँ। तथापि, हममें से बहुत कम लोगों ने यूसुफ की तरह इस प्रकार के त्वरित विनाश का अनुभव किया होगा। (और यदि आपने ऐसा किया है, तो यह जानना कितना उत्साहजनक है कि पवित्रशास्त्र में आपके जैसे लोगों के जीवन में परमेश्वर के हस्तक्षेप की कहानियाँ सम्मिलित हैं!) हम सोच सकते हैं कि यूसुफ के पास कहीं भाग जाने, छिप जाने, हार मान लेने, या प्रतिरोधी बन जाने के सभी कारण मौजूद थे। और फिर भी परमेश्वर की उपस्थिति ने उसे प्रत्येक तराई के स्थान से बाहर निकाला।

यूसुफ को उसकी परिस्थितियों से  सुरक्षा नहीं दी गई; उसे अपनी परिस्थितियों में  सुरक्षित रखा गया। वह परमेश्वर की उपस्थिति के द्वारा सुरक्षित किया गया था। इसमें हमारे लिए एक सीख है। किसी विश्वासी की कठिनाइयों का सामना करने की क्षमता, ज्ञान या बुद्धि वह वस्तु नहीं है, जो उसकी रक्षा करती है। परन्तु परमेश्वर का सेवक परमेश्वर की उपस्थिति के द्वारा ही सुरक्षित किया जाता है। यह स्वाभाविक बात है कि हम परमेश्वर से अपनी परिस्थितियों को बदलने, बड़ी कठिनाइयों को दूर कर देने या हमें परीक्षाओं से दूर कर देने के लिए कहते हों। हो सकता है कि हम अपने आस-पास देखें और सोचें कि “मैंने कभी इसकी अपेक्षा तो नहीं की थी!” हम इस झूठ पर विश्वास करना आरम्भ कर देते हैं कि यदि हम केवल बच कर भाग निकलें या यदि हमारी समस्याएँ दूर हो जाएँ, तो सब कुछ ठीक हो जाएगा। किन्तु वास्तविक सच्चाई यह है कि हम चाहे कहीं भी चले जाएँ, समस्याएँ आएँगी और स्वर्ग के इस ओर सिद्धता हाथ नहीं आएगी। जैसा कि भजनकार कहता है कि मेरा भरोसा परमेश्वर पर है (भजन संहिता 11:1)।

परमेश्वर यूसुफ के जीवन को अलग तरीके से व्यवस्थित कर सकता था। इसके विपरीत उसने घटनाओं को वैसे ही घटित होने दिया जिस प्रकार वे घटित हुईं। उसकी योजना थी कि वह अपने सेवक को “बहुत सी विपत्तियों, कठिन कार्यों और प्रलोभन के फन्दों”[1] से होकर निकालेगा। ऐसा नहीं है कि जब वह दासों की पंक्ति में चल रहा था और दासों के बाजार में बैठा था, तब परमेश्वर उसके संग नहीं था और जब वह अपने स्वामी के घराने में सम्मान और प्रमुखता के पद तक ऊपर उठ गया, तब परमेश्वर उसके संग था। प्रभु की उपस्थिति हमारे साथ भी होती है। निस्सन्देह, उसने हमसे प्रतिज्ञा की है कि चाहे तुम तराइयों में हो या पर्वतों के शिखरों पर, “मैं जगत के अन्त तक सदा तुम्हारे संग हूँ” (मत्ती 28:20)। आज परमेश्वर ने आपको किस परिस्थिति में रखा है? और यह जानना कि वह आपके साथ उस परिस्थिति में है और उसी परिस्थिति में उसके पास आपके करने के लिए एक भला काम है, किस प्रकार से उन परिस्थितियों के बारे में आपके दृष्टिकोण को बदलेगा, जिन्हें आप चुन सकते थे और जिन्हें आप नहीं चुनते?

फिलिप्पियों 4:4-13

30 जानेवारी : विजय मिळविणारी कृपा

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30 जानेवारी : विजय मिळविणारी कृपा
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मी त्याची चालचर्या पाहिली, मी त्याला सुधारीन; मी त्याला मार्ग दाखवीन, मी त्याचे, त्याच्यातल्या शोकग्रस्तांचे समाधान करीन.” (यशया 57:18)

ईश्वर-ज्ञानाचे सुशिक्षण (सिद्धांत) पवित्र शास्त्रातून जाणून घ्या. ते जर पवित्र शास्त्रातून असेल तरच ते स्थिर राहते, आणि आत्म्याचे पोषण करते.

उदाहरणार्थ, जर तुम्हांला अप्रतिकारजन्य कृपा म्हणजे काय हे जर जाणून घ्यायचे असेल तर ते सुशिक्षण पवित्र शास्त्रातून शिका. अशा पद्धतीने शोध केल्यांस, तुम्हांला कळेल की अप्रतिकारक कृपेचा अर्थ असा नाही की कृपेचा प्रतिकार केला जाऊ शकत नाही; तर त्याचा अर्थ असा की जेव्हा देव निर्णय घेतो तेव्हा तो त्या प्रतिकाराचा पराभव करण्यांस समर्थ आहे आणि तो  पराभव करेल.

उदाहरणार्थ, यशया 57:17-19 मध्ये देव त्याच्या बंडखोर लोकांना ताडन करून आणि त्यांच्याशी विन्मुख होऊन शिक्षा देतो: “त्याच्या स्वार्थमूलक अधर्मामुळे मी रागावून त्याला ताडन केले, मी विन्मुख झालो, मी त्याच्यावर कोपलो” (वचन 17).

तरी त्यांनी पश्चात्ताप केला नाही. उलट ते विश्वासापासून अजूनहि बहकत गेलें. त्यांनी विरोध केला: “पण तो आपल्या मनाच्या कलाप्रमाणे वागत गेला” (वचन 17).

तर मग कृपेचा विरोध केला जाऊ शकतो. वास्तविकता पाहता, स्तेफन यहूदी अधिकाऱ्यांना म्हणाला, “तुम्हीं तर ‘पवित्र आत्म्याला’ सर्वदा ‘विरोध करता” (प्रेषितांची कृत्ये 7:51).

मग देव काय करतो? जें पश्चात्ताप करत नाहींत तर विरोध करतांत अशांना तो आपल्याकडे वळवू शकणार नाहीं इतका तो अशक्त आहे का? नाही. तो अशक्त नाही. पुढील वचन म्हणते, “मी त्याची चालचर्या पाहिली, मी त्याला सुधारीन; मी त्याला मार्ग दाखवीन, मी त्याचे, त्याच्यातल्या शोकग्रस्तांचे समाधान करीन” (यशया 57:18).

तर मग, देवाला प्रतिकूल असलेल्या आणि कृपेचा विरोध करणाऱ्यांविषयीं, देव म्हणतो, “मी त्याला सुधारीन.” तो “मार्ग दाखवील”. तो समाधान करील.”समाधान करीन” या शब्दांचा अर्थ “पूर्ण करणें किंवा बरे करणे” असा होतो. हा शब्द ‘शालोम” म्हणजे “शांती.” ह्या शब्दाशी संबंधित आहे. पुढील वचन त्या संपूर्णतेचा आणि शांतीचा उल्लेख करते, आणि स्पष्ट करते की देव कसा कृपेचा विरोध करणाऱ्या हट्टी मनुष्याला आपणाकडे वळवतो.

तो हे अशा प्रकारे करतो “मी त्याच्या तोंडून आभारवचन उच्चारवीन, जे दूर आहेत व जे जवळ आहेत, त्यांना शांती असो, शांती असो (शालोम, शालोम); मी त्यांना सुधारीन असे परमेश्वर म्हणतो” (यशया 57:19). देव जे अस्तित्वांत नाही ते निर्माण करतो – म्हणजे समाधान, शांती, पूर्णता. अशा प्रकारे आपण तारले जातो. आणि अशा प्रकारे आपल्याला फिरवून मागे देवाकडे परत आणले जाते.

जिथे आभारवचन अस्तित्वात नाहींत तिथे त्यां आभारवचनांची निर्मिती करून देवाची कृपा आपल्या विरोधीपनावर विजय मिळवते. तो जें जवळ आहेत आणि जें दूर आहेत त्यांना शालोम, शालोम देतो. तो जें जवळ आहेत आणि जें दूर आहेत त्यांना पूर्णता देतो. तो असें “समाधान” देऊन करतो, म्हणजेच तो आम्हांला आमच्या विरोधीपनाच्या आजारापासून बरे करतो आणि त्या ठिकाणी आमच्यांत एक दृढ शरणागती शरण निर्माण करतो.

अप्रतिकारजन्य कृपेचा अर्थ असा होत नाही की आपण प्रतिकार किंवा विरोध करू शकत नाही. आपण विरोध करू शकतो, आणि आम्हीं विरोध करू. विषय हा आहे की जेव्हा देव निर्णय घेतो, तेव्हा तो आपल्या विरोधावर मात करतो आणि एक नम्र आत्मा पुनर्स्थापित करतो. तो निर्माण करतो. तो म्हणतो, “प्रकाश होवो!” तो बरा करतो. तो मार्ग दाखवितो. तो सुधारतो. तो समाधान देतो.

म्हणून आपण स्वतः त्याच्याकडे परत वळलो असा अभिमान आम्हीं बाळगत नाही. आणि ज्याने आमच्या सर्व विरोधीपनावर विजय मिळवला त्यां परमेश्वराच्या पायांजवळ आम्हीं पडतो आणि थरथरत आनंदाने त्याचे आभारवचन उच्चारितो.

29 जनवरी : न्याय की तृप्ति हो चुकी

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29 जनवरी : न्याय की तृप्ति हो चुकी
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“क्योंकि बैरी होने की दशा में उसके पुत्र की मृत्यु के द्वारा हमारा मेल परमेश्वर के साथ हुआ, तो फिर मेल हो जाने पर उसके जीवन के कारण हम उद्धार क्यों न पाएँगे?”  रोमियों 5:10

परमेश्वर कोई दयालु दादा जी या जगत के सांता क्लॉज़ नहीं है, जो केवल उपहार देता है और जिसे किसी अन्य बात से कोई लेना-देना नहीं है। कदापि नहीं, वह पवित्र है और वह धर्मी है। इसलिए मनुष्य अपने पाप के कारण परमेश्वर की उपस्थिति से निकाले हुए लोग हैं। मानवता और हमारे सृष्टिकर्ता के बीच शत्रुता व्याप्त है। यह ऐसा सन्देश नहीं है, जिसे आप आमतौर पर सुनते हों और यह निश्चित रूप से बहुत सुहावना सन्देश भी नहीं है। किन्तु परमेश्वर उस शत्रुता को अनदेखा नहीं करता। न उसने कभी ऐसा किया है, और न ही वह कभी ऐसा करेगा। पाप के प्रति परमेश्वर के दृष्टिकोण के बारे में पवित्रशास्त्र बहुत स्पष्ट है। निस्सन्देह यह स्पष्ट करते हुए कि पाप हमें परमेश्वर से अलग कर देता है, पौलुस मनुष्यों को परमेश्वर के शत्रुओं के रूप में वर्णित करता है। पौलुस की भाषा भी भजनकार के शब्दों को प्रतिध्वनित करती है, जो परमेश्वर के बारे में कहता है कि “तुझे सब अनर्थकारियों से घृणा है” (भजन 5:5)। यह एक ऐसा सन्देश है, जो न तो पढ़ने में सुखद है और न ही पहली बार देखने पर समझने में सरल है।

तो फिर हमारी आशा कहाँ रही? हम परमेश्वर से मेल-मिलाप कैसे कर सकेंगे? ऐसा कैसे हो सकता है कि परमेश्वर पाप को तो उसके योग्य दण्ड दे और फिर भी पापियों को क्षमा कर दे?

हे हमारे परमेश्वर की प्रेमपूर्ण बुद्धि! जब सब कुछ पाप और शर्म से भरा था,

तब दूसरा आदम लड़ने और बचाने के लिए आ गया। [1]

यीशु ने क्रूस पर अपनी मृत्यु के द्वारा परमेश्वर के न्याय की तृप्ति कर दी है। पहले उसने परमेश्वर की व्यवस्था का पूरी तरह से पालन करने के हमारे दायित्व को और फिर इसमें विफल होने पर हमारे ऊपर पड़ने वाले बोझ को स्वयं अपने ऊपर धारण करने का निर्णय लिया। फिर उसने अपने पापरहित जीवन के द्वारा हमारे दायित्व को पूरा किया और क्रूस पर अपनी बलिदानी मृत्यु के द्वारा हमारे बोझ को निरस्त कर दिया। हमारे पापी अस्तित्व के प्रति परमेश्वर की घृणा के कारण जब परमेश्वर से हमारा अलगाव हुआ, तो उसने हमें त्यागा नहीं। इसके विपरीत, परमेश्वर आया और अपने पुत्र के माध्यम से हमारे साथ मेल-मिलाप किया। यदि यह सबसे अविश्वसनीय समाचार की तरह नहीं लगता है, तो हमने अपने पाप की गम्भीरता, या उसके न्याय की वास्तविकता, या हमारे उद्धार की परिमाण में से किसी एक बात को ठीक से नहीं समझा है।

हममें से वे लोग, जिन्हें मसीही बने हुए कुछ समय बीत चुका है, इसे अच्छी तरह जाने लेने के बाद चाहे इसका तिरस्कार न करें, तौभी आत्म-सन्तुष्टि के शिकार अवश्य हो सकते हैं। परन्तु मसीह की मृत्यु हमारे विश्वास का केवल प्रवेश बिन्दु ही नहीं है; यही हमारा विश्वास है। इसलिए आज उस दूसरे आदम, अर्थात सिद्ध मनुष्य को देखने के लिए ठहरें, जो वहाँ सफल हुआ जहाँ पहला आदम असफल हुआ था और जिसने शैतान को हराकर पतन के प्रभावों को उलट दिया है। यही सुसमाचार है। आपके पापों को क्षमा कर दिया गया है। आपको बचा लिया गया है। जहाँ आप पहले शत्रु थे, अब वहीं आप एक मित्र हैं। मसीह अब आपका भरोसा, आपकी शान्ति और आपका जीवन है।

मसीह में होने की वास्तविकता कोई सहज बात नहीं है; यह एक अद्‌भुत आश्वस्ति है। जब हम पाप के सामने शक्तिहीन थे, तब मसीह के सामर्थ्य ने हमें स्वतन्त्र किया। जब हम इतना बड़ा ऋण नहीं चुका सके, तब वह आप ही उसे लिए हुए क्रूस पर चढ़ गया (1 पतरस 2:24)। अब आप स्वर्गीय स्थानों में उसके साथ बैठे हैं। आज आपकी सबसे बड़ी सफलता भी आपको उससे ऊपर नहीं उठा सकेगी, जितना उसने आपको पहले ही उठा दिया है; न ही आपका सबसे बड़ा संघर्ष या असफलता आपको वहाँ से नीचे गिरा सकती है।

 कुलुस्सियों 1:15-23

29 जानेवारी : आम्हांला परत वळविलें

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29 जानेवारी : आम्हांला परत वळविलें
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हे परमेश्वरा, तू आम्हांला तुझ्याकडे परत वळव, म्हणजे आम्हीं वळू. (विलाप 5:21, माझे भाषांतर)

जोपर्यंत देव स्वतः आपल्या लोकांना त्यांचे पाप व अविश्वासामुळें उद्भवणाऱ्या धर्मत्यागापासून आपणांकडे परत वळवित नाहीं तोपर्यंत देवाच्या लोकांसाठीं कोणतीही आशा नाहीं.

विलापगीताचे पुस्तक हे बायबलमधील असे पुस्तक आहे जें सर्वात उदासीपूर्ण अशा विचारांनी भरलेलें पुस्तक आहे. देवानें स्वत: त्याच्या डोळ्याच्या बाहुलीला, म्हणजे यरुशलेमेला ओसाड केलें होते.

  • परमेश्वराने आपला क्रोध पूर्ण प्रकट केला आहे; त्यानें आपल्या संतप्त क्रोधाचा वर्षाव केला आहे त्यानें सीयोनेत अग्नी पेटवला आहे, त्या अग्नीने तिचे पाये भस्म केले आहेत. (विलाप 4:11)
  • दृष्टीस रम्य असे सर्व त्यानें मारून टाकले आहेत. (विलाप 2:4)
  • तिच्या बहुत अपराधांमुळे परमेश्वराने तिला पिडले आहे. (विलाप 1:5)

तर मग पुस्तकाचा शेवट कसा होतो?

यां पुस्तकाचा शेवट फक्त एकाच आशेनें होतो:

हे परमेश्वरा, तू आम्हांला तुझ्याकडे परत वळव, म्हणजे आम्हीं वळू. (विलाप 5:21)

माझ्यासाठीं हींच एकमेव आशा आहे – आणि तुमच्यासाठीं सुद्धा हींच एकमेव आशा आहे!

येशू पेत्राला म्हणाला, “शिमोना, शिमोना, पाहा, तुम्हांला गव्हासारखे चाळावे म्हणून सैतानाने मागणी केली; परंतु तुझा विश्वास ढळू नये म्हणून तुझ्यासाठी मी विनंती केली आहे; आणि तू वळलास म्हणजे तुझ्या भावांना स्थिर कर.” (लूक 22:31-32).

‘जर  तू वळलास तरच’  असें तो म्हणत नाहीं. पण तू वळलास म्हणजे. कारण मी तुझ्यासाठीं विनंती केलीं आहे, कीं तू परत वळावे. आणि जेव्हा तू वळतोस तेव्हा ही कृती माझ्या सार्वभौम कृपाचे कार्य असेल जी तुला धर्मत्यागाच्या कचाट्यातून परत घेऊन येईल.

ख्रिस्ती बंधू, हे तुमच्याबाबतींत सत्य आहे. विश्वासात टिकून राहण्यासाठीं हींच तुमची एकमेव आशा आहे. ह्याची प्रौढी मिरवा.

जो देवाच्या उजवीकडे आहे आणि जो आपल्यासाठी मध्यस्थीही करत आहे तो ख्रिस्त येशू आहे. (रोमकरांस 8:34)

तोच आम्हांला स्वतःकडे परत वळविल. म्हणून, “तुम्हांला पतनापासून राखण्यास जो समर्थ आहे…….अशा आपल्या उद्धारक एकाच ज्ञानी देवाला गौरव, महिमा, पराक्रम व अधिकार युगारंभापूर्वी, आता व युगानुयुग आहेत” (यहूदा 1:24-25). आमेन!

28 जनवरी : एक नाम से कहीं अधिक

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28 जनवरी : एक नाम से कहीं अधिक
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“परमेश्वर ने मूसा से कहा, ‘मैं जो हूँ सो हूँ।’ फिर उसने कहा, ‘तू इस्राएलियों से यह कहना, “जिसका नाम मैं हूँ है उसी ने मुझे तुम्हारे पास भेजा है।”’”  निर्गमन 3:14

कुछ संस्कृतियों में नामों के पीछे के अर्थ बहुत मायने नहीं रखते। कोई नाम हम इसलिए चुन लेते हैं, क्योंकि हमें उसका उच्चारण अच्छा लगता है, या क्योंकि वह हमारे परिवार के लिए अनमोल होता है। तथापि अन्य संस्कृतियों में नाम अपने आप में बहुत महत्त्व रखता है। उस नाम का अर्थ उस व्यक्ति के बारे में, जिसे वह नाम दिया गया है या उसे वह नाम देने वाले लोगों की आशा के बारे में कुछ स्थापित कर सकता है।

जब मूसा का जलती हुई झाड़ी में परमेश्वर से सामना हुआ, तो उसने पूछा, “जब मैं इस्राएलियों के पास जाकर उनसे कहूँ, ‘तुम्हारे पितरों के परमेश्वर ने मुझे तुम्हारे पास भेजा है,’ तब यदि वे मुझ से पूछें, ‘उसका क्या नाम है?’ तब मैं उनको क्या बताऊँ?”” (निर्गमन 3:13)। तब परमेश्वर ने मूसा को जो नाम बताया, वह है यहोवा (जिसका अनुवाद है “मैं जो हूँ सो हूँ”)। इसमें चार अक्षर हैं जो व्यंजन हैं और इसमें कोई स्वर नहीं है। यदि हम इसका सही उच्चारण करने का प्रयास करें, तो हम पाएँगे कि यह लगभग असम्भव है। यदि आप चाहें तो यह कह सकते हैं कि यह एक अवर्णनीय नाम है।

इस तरह उत्तर देने के द्वारा परमेश्वर क्या कर रहा था? मूसा इस्राएल के लोगों को और फिरौन को एक अधिकार वाला नाम देने का अनुरोध कर रहा था और परमेश्वर ने उसे वह नाम दिया जिसका उच्चारण ही नहीं किया जा सकता। ऐसा लगता है कि मानो परमेश्वर कह रहा था कि ऐसा कोई नाम नहीं है जो मेरे अस्तित्व को पूरी तरह से व्यक्त कर सके। इसलिए उनसे कहो कि मैं जो हूँ सो हूँने तुम्हें भेजा है। फिरौन से कहो कि वह देखे कि मैं अपने लोगों के लिए क्या करता हूँ। तब वह जान जाएगा कि मैं कौन हूँ।

बाइबल न केवल परमेश्वर के उद्धार के कार्य की कहानी है, परन्तु इससे बढ़कर वह परमेश्वर के चरित्र के अनावरण की भी कहानी है। हममें से बहुत से लोग अपनी बाइबल पढ़ने के बाद प्रयुक्ति से सम्बन्धित महत्त्वपूर्ण प्रश्न पूछने में निपुण हो चुके हैं, जैसे “यह कैसे सम्बन्धित है और कैसे लागू होता है? मेरे लिए इसका क्या अर्थ है?” ये बातें व्यर्थ या गलत नहीं हैं, किन्तु ये वे प्रमुख प्रश्न नहीं हैं जो पूछे जाने चाहिए। परमेश्वर कहानी का नायक और पुस्तक का प्रसंग है, और इसलिए प्रत्येक खण्ड से हमारा पहला प्रश्न यह होना चाहिए, “यह मुझे परमेश्वर के बारे में क्या बताता है?” बाइबल परमेश्वर के व्यवहार, चरित्र और महिमा को स्थापित करने के लिए लिखी गई थी।

हममें से बहुत से लोग ऐसा मानते हैं कि हमें प्रत्येक रविवार को कलीसिया से जो कुछ चाहिए वह है आमदनी, सम्बन्धों तथा किसी भी अन्य समस्याओं को हल करने के लिए कुछ किस्से या प्रेरणादायक सूचियाँ। मसीहियत के इतिहास में आज का युग ऐसा समय है, जिसमें विश्वासियों के लिए “कैसे करें” शीर्षक वाली इतनी अधिक पुस्तकें लिखी गई हैं। फिर भी, क्या हम वास्तव में अच्छा जीवन जी पा रहे हैं? ऐसा लगता है जैसे हम सब कुछ करना जानते हैं, परन्तु हम यह नहीं जानते कि परमेश्वर कौन है!

परमेश्वर ने मूसा को जो करने का बुलावा दिया था, उसे पूरा करने के लिए मूसा को यह समझना आवश्यक था कि परमेश्वर कौन था (और है)। उसे हमारे समान यह जानने की आवश्यकता थी कि परमेश्वर केवल एक नाम से कहीं अधिक है।

जब हम बाइबल को पढ़ते हैं और पूछते हैं कि “मैं परमेश्वर के बारे में क्या जान सकता हूँ?” तब हमारा जीवन बदल जाता है। जैसे-जैसे हम यह देखते जाते हैं कि परमेश्वर ने क्या किया है और अधिकता से समझने लगते हैं कि वह कौन है, तो हम उसके प्रति भय-युक्त प्रेम में और उसके लिए प्रेम में बढ़ने लगते हैं। और तभी हम अपने जीवन में उसके बुलावे को पूरा करते हुए उसकी इच्छा के अनुसार जीने में सक्षम होने पाएँगे। हम अपने अवर्णनीय रूप से विस्मयकारी परमेश्वर की महिमा की गहराई को पूर्ण रूप से कभी नहीं समझ पाएँगे, परन्तु हम अवश्य  अनन्त काल तक उसे अधिकाधिक देखते जाएँगे। और जबकि हम उसका वचन पढ़ ही रहे हैं, तो उसका आरम्भ आज से ही हो सकता है।

निर्गमन 3:1-22

28 जानेवारी : पश्चात्ताप कसा करावा

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28 जानेवारी : पश्चात्ताप कसा करावा
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जर आपण आपली पापें पदरी घेतलीं, तर तो विश्वसनीय व न्यायी आहे म्हणून आपल्या पापांची क्षमा करील, व आपल्याला सर्व अनीतीपासून शुद्ध करील. (1 योहान 1:9)

तुमच्या मनाची ही अंधुक, दुर्दैवी भावना कीं तुम्हीं एक अपूर्ण व्यक्ती आहां खरे पाहता पापाची खात्री पटविणारी भावना नाहीं. स्वतःविषयीं वाईट भावना जोपासणें म्हणजे पश्चात्ताप करणें असें होत नाहीं.

आज सकाळी मी प्रार्थना करूं लागलो, आणि लगेच मीं स्वतःला या जगाच्या निर्माणकर्त्याबरोबर संभाषण करण्यांस अयोग्य समजूं लागलो. आणि अर्थातच, ती स्वतःला अयोग्य समजण्याची एक अंधुक, दुर्दैवी भावना होती. आणि मी माझी ती अगोग्यता कबूलही केलीं. पण आता यापुढें काय?

जोपर्यन्त मी माझ्या पापांविषयीं योग्य आणि स्पष्ट वास्तविकता लक्षांत घेतली नाहीं, तोपर्यंत खरेंच कांहीहि बदललें नाहीं. मनाच्या अशा दुर्दैवी भावना योग्यच आहेत जर त्यां मला एखाद्या अशा विशिष्ट पापाविषयीं दोषी ठरवितांत जे मीं माझ्या सवयींमुळें सज्ञानाने वारंवार करतो. पण खरें पाहता, मी एक पापी मनुष्य आहे ह्या अस्पष्ट भावना सहसा फारशा लाभाच्या ठरत नाहीं.

मी अयोग्य आहे ही अंधुक व दुर्दैवी भावना केवळ तेव्हांच योग्य ठरते जेव्हां मी स्वत:कडे आज्ञा न पाळणारा मनुष्य म्हणून पाहतो. अशी खात्री पटल्यावर तुम्हीं तुमची पापें कबूल करून पश्चात्ताप करू शकता आणि देवाला क्षमा मागू शकता आणि ज्यां शुभवर्तमानावर तुम्हीं विश्वास ठेविला आहे त्याचे स्मरण करून तुम्हीं तुमची पापें जणूं नाहीशी करूं शकता.

मग मी त्यां सर्व आज्ञा ज्यां मीं वारंवार मोडतो, स्मरण करूं लागलो. तेव्हा ज्यां आज्ञा मी तोडल्याचे माझ्या लक्ष्यांत येते  त्यां ह्यां :

  • तू आपला देव परमेश्वर ह्याच्यावर पूर्ण अंतःकरणाने, पूर्ण जिवाने व पूर्ण मनाने प्रीति कर. म्हणजे 95% नाहीं, तर 100%. (मत्तय 22:37)
  • आपल्या शेजार्‍यावर स्वतःसारखी प्रीति कर. म्हणजे ज्या ज्या चांगल्या गोष्टीं तुमच्याकडे असाव्यांत अशी तुम्हीं आतुरतेने उत्कंठा करता त्यां त्यां वस्तु तुमच्या शेजार्यांकडेहि असाव्यांत अशी तितक्यांच आतुरतेणें उत्कंठा बाळगा. (मत्तय 22:39)
  • जे काही तुम्हीं कराल ते कुरकुर व वादविवाद न करता करा; – मग ते आंतरिक असों वा बाह्य (फिलिप्पैकर 2:14)
  • त्याच्यावर तुम्हीं ‘आपली’ सर्व ‘चिंता टाका’- म्हणजे यापुढे तुम्हीं त्यांच्या ओझ्याने भारावून जाणार नाहीं. (1 पेत्र 5:7)
  • तुमच्या मुखातून जे चांगले तेच मात्र निघो, ह्यासाठी की ऐकणार्‍यांना कृपादान प्राप्त व्हावे — विशेषत: तुमच्या जवळच्या लोकांना. (इफिस 4:29)
  • वेळेचा सदुपयोग करा. म्हणजे वेळ वाया घालवू नका, किंवा दिरंगाई करू नका. (इफिस 5:16)

हाय हाय! मीं खूप पवित्र आहों अशी फुशारकी मारणें कोठे! माझा ढोंगीपणा तर उघड झाला आहे.

माझी ही अवस्था तर त्यां अंधुक, दुर्दैवी भावनांपेक्षाहि अति वाईट आहे. अहाहा, पण आता मला माझा शत्रू स्पष्टपणे दिसतोय. माझी पापें विशिष्ट आहेत. ती आता अस्पष्ट धुक्यातुन उघड झाली आहेत. ती अगदी माझ्या समोर आहेंत. मी ह्या अपराध भावनेवर कुरकुर करत बसत नाहीं. त्या ऐवजी, मी ख्रिस्तानें मला आज्ञापिलेल्या गोष्टींचे पालन न केल्याबद्दल त्याला क्षमा मागतो.

माझे हृदय भग्न झालें व मी माझ्याच पापावर क्रोधाविष्ट झालों आहे. मला ते जिवे मारायचे आहे, नाहीं नाहीं, मी आत्महत्या करणार असें नाहीं. मी आत्मघातकीं नाहीं. तर मी पापाचा द्वेष करणारा आणि पाप-घातकी असा आहे. (“पृथ्वीवरील तुमचे अवयव म्हणजे जारकर्म, अमंगळपणा, कामवासना, कुवासना व लोभ…..हे जिवे मारा,” कलस्सै 3:5; “शरीराची कर्मे ठार मारा,” रोमकरांस 8:13.) मला जिवंत राहावयाचे आहे. म्हणूनच मी आत्म-रक्षक मारेकरी आहे — माझ्या स्वतःच्या पापाचा मारेकरी!

मी पापाबरोबर माझ्या ह्या संघर्षात असतांना, माझ्या कानावर हें अभिवचन येते, “जर आपण आपली पापे पदरी घेतली, तर तो विश्वसनीय व न्यायी आहे म्हणून आपल्या पापांची क्षमा करील, व आपल्याला सर्व अनीतीपासून शुद्ध करील” (1 योहान 1:9). मनांत शांती उदय पावते.

आता प्रार्थना करणे पुन्हा शक्य होते, आणि प्रार्थना करणे योग्य आहे आणि सामर्थ्याने भरलेली असें जाणवते.

27 जनवरी : वह कुचले हुए नरकटों के लिए आया था

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27 जनवरी : वह कुचले हुए नरकटों के लिए आया था
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“कुचले हुए नरकट को वह न तोड़ेगा और न टिमटिमाती बत्ती को बुझाएगा; वह सच्चाई से न्याय चुकाएगा।”  यशायाह 42:3

प्राचीन काल के बड़े राजनेता शासन करने के लिए अपनी शक्ति पर आश्रित रहते थे। (बहुत से लोग आज भी लोग ऐसा करते हैं।) फारस के राजा कुस्रू महान को इस प्रकार वर्णित किया जाता था जैसे कुम्हार गीली मिट्टी को लताड़ता है, वैसे ही वह हाकिमों को कीच के समान लताड़ देगा (यशायाह 41:25 देखें)। फिर भी उसी समय में यशायाह ने उस आने वाले सेवक के बारे में भविष्यद्वाणी की, जो उस समय के हाकिमों के बिल्कुल विपरीत होगा।

वह सेवक, अर्थात यीशु भला, संवेदनशील और दयालु है। जिन लोगों को दूसरे लोग त्याग देना चाहते हैं और ठुकरा देना चाहते हैं, वह उन्हें अपनाने के लिए इच्छुक और सक्षम है। यह कितना अधिक आशा-दायक वचन है!

कुचले हुए नरकट के चित्रण में हम यीशु की हमारे प्रति संवेदनशीलता के महत्त्व को देख सकते हैं। आप कुचले हुए नरकट के सहारे टिक नहीं सकते, और न ही आप उससे संगीत बजा सकते हैं। फिर भी यीशु उन लोगों को उठाता है, जिन्हें अन्य लोग एक ओर कर देते हैं और उनके जीवन में और उनके जीवनों के द्वारा एक मधुर धुन बजाता है। हो सकता है कि आज आप अपने आप को बुरी तरह से दबा हुआ, दूसरों के व्यवहार से टूटा हुआ या अतीत में की गई गलतियों से आहत महसूस कर रहे हों। हो सकता है कि आप लगभग यह विश्वास करने लगे हों कि आप टूटे हुए और बेकार हैं। परन्तु आपके लिए एक महिमामय समाचार यह है कि वह सेवक कुचले हुए नरकटों को उठाता है, और वह ऐसा बड़े ध्यान से करता है।

यीशु सुलगती हुई बत्तियों को भी अपनाता है। वह उन्हें बुझाता नहीं है; परन्तु इसके विपरीत वह टिमटिमाते हुए टुकड़े को लेता है और उसे चमकती हुई ज्योति में बदल देता है। हो सकता है कि आपको यह विश्वास दिला दिया गया हो कि आपके अच्छे दिन अब बीत चुके हैं; कि आप एक बुझती हुई पुरानी मोमबत्ती हैं, केवल एक टिमटिमाती और बुझती हुई लौ हैं। आप अपने आप से यह कहने लगते हैं कि यदि तुम अभी तक इसका हल नहीं निकाल सके हो, तो शायद तुम्हारे लिए कोई आशा नहीं है। परन्तु एक बार फिर शुभ समाचार यह है कि सुलगती हुई बत्तियाँ इस सेवक में आशा पाती हैं, जो हमें फिर से प्रज्ज्वलित करने आया है।

यीशु उन लोगों में असाधारण रुचि रखता है जिनका कहीं कोई नाम नहीं, अर्थात उन कुचले हुए नरकटों और सुलगती हुई बत्तियों में। वह उन्हें छुटकारा देता है और संसार में प्रकाश लाने और अपने नाम की स्तुति के लिए उनका उपयोग करता है। वास्तविकता तो यह है कि किसी न किसी तरह से हम सभी कुचले हुए नरकट और टिमटिमाती बत्तियाँ ही हैं। क्या हम अपनी दीन-हीन स्थिति को पहचानने के लिए तैयार हैं ताकि हम उस सेवक की भलाई और दयालुता को जान सकें? अन्ततः . . .

वह कभी भी धुआँ देते हुए रेशे को नहीं बुझाता, परन्तु उसे आग की लपटों में बदल देता है;

वह कुचले हुए नरकट को कभी नहीं तोड़ता, न ही सबसे निकृष्ट नाम का तिरस्कार करता है। [1]
लूका 7:11-17

27 जानेवारी : त्याला तुमची गरज माहीत आहे

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27 जानेवारी : त्याला तुमची गरज माहीत आहे
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ह्यास्तव ‘काय खावे? काय प्यावे? काय पांघरावे?’ असे म्हणत चिंता करत बसू नका. कारण ह्या सर्व गोष्टी मिळवण्याची धडपड परराष्ट्रीय लोक करत असतात. तुम्हांला ह्या सर्वांची गरज आहे हे तुमचा स्वर्गीय पिता जाणून आहे.” (मत्तय  6:31-32)

आपल्या शिष्यांनी चिंतामुक्त असावें अशी येशूची इच्छा आहे. मत्तय 6:25-34 मध्ये, तो आपलीं चिंता दूर करण्याच्या उद्देशाने तयार केलेंलें किमान सात तर्क देतो. त्यापैकीं एक तर्क देतांना तो खाणे, पिणे व वस्त्र यांचा उल्लेख करतो आणि लगेच म्हणतो, “तुम्हांला ह्या सर्वांची गरज आहे हे तुमचा स्वर्गीय पिता जाणून आहे” (मत्तय 6:32).

येशूला खचितच असे म्हणायचे होते कीं देवाला आमच्या गरजा ठाऊक असणें  ही गोष्ट त्या गरजा पूर्ण करण्याच्या त्याच्या इच्छेशी अनुकूल आहे. आमचा स्वर्गीय पिता आहे असें तो जोर देऊन म्हणतो. आणि हा पिता आमच्या ऐहिक पित्यापेक्षा श्रेष्ठ आहे.

मला पाच लेकरं आहेत. मला त्यांच्या गरजा पूर्ण करणं आवडतं. परंतु मला त्यांच्या गरजांची असलेली जाणीव ही देवाला आमच्या गरजांची असलेल्यां जाणीवेपेक्षा कमीतकमी तीन प्रकारे उणी पडते.

सर्व प्रथम, आता ह्या क्षणी मला ठाऊक नाहीं कीं माझी मुलें कुठे आहेत. मी केवळ अंदाजाने सांगू शकतो. ते कदाचित आपापल्या घरी असतील किंवा ऑफिस मध्यें असतील किंवा शाळेत जात असतील, तें सर्व निरोगी आणि सुरक्षित आहेत. पण जर त्यांना हृदयविकाराचा झटका आला असेल, तर तें कुठेतरी रस्त्यावर पडलेलें सुद्धा असूं शकतात.

दुसरे, कोणत्या वेळी ते काय विचार करतात हें मला ठाऊक नाहीं. मी कधी कधी केवळ एक अंदाज लावू शकतो. पण कदाचित त्यांना कुठल्यातरी गोष्टीची भीती वाटत असेल, किंवा त्यांच्यावर दुखाचा डोंगर कोसळला असेल, किंवा त्यांना राग आलेला असेल किंवा त्यांना कुठल्यातरी गोष्टीची इच्छा किंवा तिचा लोभ असू शकतो, किंवा ते आनंदी असतील किंवा एखाद्या गोष्टीची आशा करत असतील. मी त्यांच्या मनांत काय चाललय ते पाहू शकत नाहीं. त्यांना तर स्वतःच्या अंत:करानातील गोष्टीं देखील पूर्णपणे ठाऊक नसतील.

तिसरे, मला त्यांचे भविष्य ठाऊक नाहीं. आज तें मला एकदम निरोगी आणि ठणठणीत दिसत आहेत. पण उद्या मात्र त्यांच्यावर दुःखाचा मोठा डोंगर कोसळू शकतो.

याचा अर्थ असा कीं मला त्यांच्याविषयीं असलेली जाणीव त्यांना स्वतःची काळजी न करण्याचे मोठे निमित्त देऊं शकत नाहीं. त्यांच्या जीवनांत या क्षणी काहीं तरी घडामोडी होत असतील किंवा उद्या घडून येतील ज्यांविषयीं आज मला तिळमात्रहि कल्पना नाहीं. परंतु जेव्हा हींच बाब त्यांच्या स्वर्गातील पित्याच्या बाबतींत येते, तेव्हा दृश्य पूर्णपणे वेगळे आहे. “तुमचा स्वर्गीय पिता!” त्याला आपल्याबद्दल सर्व ठाऊक आहे, म्हणजे आपण कुठे आहों, आणि उद्या कुठे असणार, आपलं मन कसं आहे आणि बाहेरून आपण कसे वागतो, तें सर्वकांही तो जाणून आहे. त्याला आपली प्रत्येक गरज ठाऊक आहे.

याशिवाय, त्याला आपल्या गरजा पूर्ण करावयांची नेहमीच मोठी उत्कंठा लागलेली असते. मत्तय 6:30 मधील विशेषेकरून”  या शब्दाची आठवण ठेवा “जे रानातले गवत आज आहे व उद्या भट्टीत पडते त्याला जर देव असा पोशाख घालतो, तर, अहो तुम्हीं अल्पविश्वासी, तो विशेषेकरून  तुम्हांला पोशाख घालणार नाही काय?”

या व्यतिरिक्त, जे करण्याची त्याला उत्कंठा लागलेली आहे ते करण्यांस तो पूर्णपणे समर्थ देखील आहे (तो एकांच वेळी जगभरातील कोट्यवधी पक्ष्यांना खाऊं घालतो, मत्तय 6:26).

यास्तव, येशू आमच्या सर्व गरजा पूर्ण करतो ह्या त्याच्या वचनावर मजबरोबर विश्वास ठेवा, “तुम्हांला ह्या सर्वांची गरज आहे हे तुमचा स्वर्गीय पिता जाणून आहे” असें जेव्हा येशू म्हणतो तेव्हा तो हेंच आवाहन करत आहे.