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30 सितम्बर : पवित्रता का मार्ग

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30 सितम्बर : पवित्रता का मार्ग
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“क्योंकि यदि तुम शरीर के अनुसार दिन काटोगे तो मरोगे, यदि आत्मा से देह की क्रियाओं को मारोगे तो जीवित रहोगे।” रोमियों 8:13

आपकी पवित्रता महत्त्वपूर्ण है।

पुराने नियम में “पवित्र” शब्द सदा नैतिक अवस्था को ही नहीं दर्शाता; प्रायः वह एक सम्बन्ध को दर्शाता है। नगरों को पवित्र नगर कहा गया है, पात्रों को पवित्र पात्र, और भवनों को पवित्र स्थान कहा गया है। इसका अर्थ यह है कि वे परमेश्वर के साथ एक विशेष सम्बन्ध में खड़े थे। और उद्धार में भी ऐसा ही है: हमें परमेश्वर के साथ एक विशेष सम्बन्ध में रखा गया है। हमें एक पवित्र उपयोग के लिए अलग किया गया है।

यदि आप विवाहित हैं, तो सम्भव है कि अपने जीवनसाथी के साथ जिस सम्बन्ध का आप अब आनन्द लेते हैं, उससे पहले आपके अन्य सम्बन्ध रहे हों। मेरा विवाह 1975 की गर्मियों में हुआ था। उस दिन, मेरे अतीत के जितने भी रोमांटिक सम्बन्ध थे, वे सब समाप्त हो गए—पूरी तरह खत्म हो गए—क्योंकि मैं अपनी पत्नी के साथ एक हो गया। मैं नया बन गया। मैं विवाह में एक व्यक्ति के रूप में आया; और विवाहित होकर निकला। मेरी पत्नी और मैं एक-दूसरे के लिए अलग किए गए, उन प्रतिज्ञाओं के द्वारा, उस वाचा के द्वारा, जो हमने एक-दूसरे से बाँधी।

हम प्रभु यीशु मसीह से प्रतिज्ञाएँ बाँधकर फिर उसके साथ मनचाहा व्यवहार नहीं कर सकते। हम पवित्रता के विषय में हल्कापन नहीं बरत सकते। क्यों? क्योंकि पवित्रता के बिना “कोई प्रभु को कदापि न देखेगा” (इब्रानियों 12:14)। प्रेरित पौलुस यहाँ तक कहता है कि “आत्मा से देह की क्रियाओं को मारो।” प्यूरिटनों ने इसे “शरीर का मरण” कहा। और यह मरण अपने आप नहीं हो जाता। यह अनजाने में नहीं होता। यह निकट सम्पर्क के प्रभाव की प्रक्रिया नहीं है। इसके बजाय, हमें भय और काँपते हुए अपने उद्धार के कार्य को प्रकट करने का परिश्रम के साथ दिन-प्रतिदिन अभ्यास करना है (फिलिप्पियों 2:12)। हमें आत्मा की प्रेरणा और सामर्थ्य चाहिए, जो हमें स्मरण दिलाए कि हमें सोच-समझकर और सचेत रूप से अपने पापों पर शोक करना है, उनसे मन फिराना है, उन्हें छोड़ना है, और अपने प्रभु की आज्ञा मानने का प्रयत्न करना है—और यह केवल उन पापों के साथ ही नहीं जो स्पष्ट और प्रकट हैं, बल्कि उन भीतरी पापों के साथ भी करना है, जैसे ईर्ष्या, घमण्ड, द्वेष, कपट, और आत्म-धार्मिकता। वह एक अद्‌भुत दिन होता है जब परमेश्वर हमें उस पाप की कुरूपता दिखाता है जो हमारे भीतर बसा हुआ रहा है और हमें उससे निपटने के लिए प्रेरित करता है। पाप से निपटने का यही मार्ग है: निर्दयता, तुरन्त, और निरन्तर।

जब सच्ची पवित्रता हमारे जीवन में जड़ पकड़ने लगती है, तो वह हमें न्यायप्रिय या कठोर नहीं बनाती। वह तो कर्मकाण्डवाद है, जहाँ हम नियमों के पालन के गर्व के लिए अपने आप को अलग करते हैं; यह पवित्रता नहीं है, जहाँ हम परमेश्वर को प्रसन्न करने के लिए अलग किए जाते हैं। इसके विपरीत, पवित्रता अपने आप को अनुग्रह, मधुरता, और भलाई में प्रकट करती है। इस प्रकार पवित्रता आकर्षक होती है। जब हम उसे दूसरों में देखते हैं—चाहे हम उसे पवित्रता कहें या न कहें—तो हम उसकी ओर खिंचते हैं और उसके लिए लालायित होते हैं। और पवित्रता सम्भव है, क्योंकि प्रभु यीशु ने हमारे शरीर की दुर्बलताओं के लिए मृत्यु सही और अपनी आत्मा को हमारे भीतर वास करने के लिए भेजा, ताकि हम पाप से संघर्ष करें और अनन्त जीवन की ओर चलें।

उस पवित्रता का मार्ग इस बात पर मनन करने से प्रकट होता है कि यीशु ने हमारे लिए क्या-क्या अद्‌भुत कार्य किए हैं। उस मार्ग पर विचार करें। यीशु से प्रार्थना करें कि वह उसे आपके लिए इस प्रकार वास्तविक बना दे, जैसा वह पहले कभी न रहा हो। और जब आप चलते जाएँ, तो अपनी आँखें “विश्‍वास के कर्ता और सिद्ध करने वाले” यीशु पर स्थिर रखें (इब्रानियों 12:2)।

  रोमियों 6:1–11

◊ पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: यहेजकेल 24–26; यूहन्ना 13:21-38

30 September : बंधमुक्त करणारा असा प्रचंड शोध

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30 September : बंधमुक्त करणारा असा प्रचंड शोध
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शेवटी, माझ्या बंधूंनो, प्रभूमध्यें आनंद करा. (फिलिप्पै 3:1)

आपण देवामध्यें आनंद करतो तेव्हां त्याचा गौरव होतो हें शिक्षण मला कोणी कधीही दिलें नव्हतें – कीं देवामध्यें आनंद करणें नेमकीं हीच बाब आपण करत असलेल्या देवाच्या स्तुतीला आपला ढोंगीपणा नाहीं तर देवाचा सन्मान बनवते.

पण जोनाथन एडवर्ड्स यांनी ही गोष्ट स्पष्टपणें आणि ठामपणें सांगितलीं :

देव मनुष्यांमध्यें देखील स्वतःचे गौरव करून घेतो असें दोन मार्ग आहेत : (1) तो त्यांना दर्शन देऊन. . . त्यांची समज उघडतो तेव्हां; (2) जेव्हां तो त्यांच्या अंतःकरणात आपलें वचन प्रकट करून त्यांच्याशी बोलतो तेव्हां त्याला ओळखून त्यांना होणारा हर्ष आणि आनंद, आणि त्याचा लाभ याद्वारे देवाचा गौरव केवळ त्याच्या गौरवाचे झालेंलें प्रकटीकरण याद्वारेच होत नाहीं, तर त्याच्यामध्यें जो आनंद ते करतांत त्याद्वारे सुद्धा त्याचा गौरव होतो. . .

त्याचा गौरव पाहणारे जेव्हां आनंद करतांत : तेव्हां केवळ गौरव पाहण्यापेक्षा जे त्या गौरवांत आनंदही करतांत तेव्हां त्याचा अधिक गौरव होतो. . . . जो मनुष्य देवाच्या गौरवाविषयी आपलें केवळ विचार व्यक्त करतो तो देवाचा तितका गौरव करत नाहीं जितका तो मनुष्य जो त्या गौरवाचे कौतुक करतो आणि त्यात आनंद करतो, देवाचा गौरव करतो.

हा माझ्यासाठीं एक धक्कादायक शोध होता. जर मला विश्वातील सर्वांत मौल्यवान वास्तव म्हणून देवाचा गौरव करायचा असेल तर मला त्याच्यामध्यें आनंदाचा शोध घेणें अगत्याचे आहे. उपासना करतांना आनंद करणें हा निव्वळ पर्याय नाहीं, तर उपासनेचा अत्यावश्यक घटक आहे. खरंच, उपासनेचे सार हेच – देवाच्या गौरवामध्यें आनंद करणें.

असे लोक जे देवाची स्तुती तर करतांत, परंतु आनंद न करताच त्याची स्तुती करतांत त्यांच्यासाठीं आमच्याकडें एक नाव आहे. त्यांना आपण ढोंगी म्हणतो. येशू म्हणाला, “अहो ढोंग्यांनो, तुमच्याविषयी यशयाने यथायोग्य संदेश दिला कीं, ‘हे लोक [तोंड घेऊन माझ्याकडें येतांत व] ओठांनी माझा सन्मान करतांत, परंतु त्यांचे अंतःकरण माझ्यापासून दूर आहे’” (मत्तय 15:7-8). ही वस्तुस्थिती – कीं देवाचा खरा सम्मान म्हणजें परिपूर्ण आनंद आणि हे कीं मनुष्याच्या जीवनाचा मुख्य हेतू देवाच्या गौरवासाठीं या आनंदाचा खोलवर शोध घेणें हाच आहे – हा कदाचित मी आजवर केलेंला बंधमुक्त करणारा असा प्रचंड शोध होता.

29 सितम्बर : विश्वास और भय के बीच

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29 सितम्बर : विश्वास और भय के बीच
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“‘मेरे हाथ और मेरे पाँव को देखो कि मैं वही हूँ। मुझे छूकर देखो, क्योंकि आत्मा के हड्डी माँस नहीं होता जैसा मुझ में देखते हो।’ यह कहकर उसने उन्हें अपने हाथ पाँव दिखाए। जब आनन्द के मारे उनको प्रतीति न हुई, और वे आश्चर्य करते थे, तो उसने उनसे पूछा, ‘क्या यहाँ तुम्हारे पास कुछ भोजन है?’” लूका 24:39-41

चेले वास्तविक लोग थे—और उनके लिए पुनरुत्थान पर विश्वास करना कठिन था। यीशु के पुनरुत्थान का समाचार उनके भीतर भावनाओं का उतार-चढ़ाव ले आया। एक क्षण वे शिखर पर प्रतीत होते थे, और अगले ही क्षण भूमि की ओर गिरते हुए दिखते थे। खाली कब्र की खबर को विस्मय और अविश्वास की मिली-जुली भावनाओं से ग्रहण किया गया। वास्तव में, जिन स्त्रियों को यह सबसे पहले पता चला था, उनके शब्द उन्हें “कहानी सी जान पड़ीं, और उन्होंने उनकी प्रतीति न की” (लूका 24:11)।

यहाँ तक कि जब यीशु अचानक प्रकट होकर उनके बीच खड़ा हुआ, तब भी उनके शोक शान्त न हुए और उनके भय दूर न हुए। इसके विपरीत, हम पाते हैं कि वे अब भी घबराए हुए थे। पुनरुत्थित मसीह का सामना करके “वे घबरा गए और डर गए, और समझे कि हम किसी भूत को देख रहे हैं” (लूका 24:37)। यीशु द्वारा अपने हाथ और पाँव दिखाने के बाद भी वे उस अविश्वास से जूझते रहे जो उभरते हुए आनन्द से टकरा रहा था।

यह कितना ईमानदार चित्र है, है न? यहाँ हम उन लोगों के समूह को देखते हैं जो कलीसिया के स्तम्भ बनने वाले थे, और जो मूलतः सामान के पीछे छिपे हुए और अलमारियों से बाहर झाँकते हुए कह रहे थे, हमें लगा कि हमने भूत देखा है!

भय और अविश्वास के विरुद्ध चेलों का संघर्ष उन लोगों के लिए बड़ा उत्साह है जो आशा और निराशा के बीच झूलते रहते हैं। यह एक बात है कि हम किसी सुहावने रविवार की सुबह मसीहियों की भीड़ के बीच पुनरुत्थान में अपने विश्वास की घोषणा करें। परन्तु यह बिलकुल दूसरी बात है कि किसी कठिन मंगलवार की दोपहर को हम इसे दृढ़ता के साथ उन लोगों के बीच ऐलान करें जो इसे व्यर्थ कथा मानते हों, या जब हम डॉक्टर के कक्ष में जाँच के परिणामों की प्रतीक्षा कर रहे हों, या अकेलेपन से जूझ रहे हों।

एक सच्चा मसीही वह नहीं है जिसे कभी सन्देह न हो; बल्कि सच्चा मसीही वह है जो अपने सन्देहों को खाली कब्र के तथ्य के सामने लाता है और स्वयं को स्मरण दिलाता है कि हमारा विश्वास ऐतिहासिक घटनाओं पर आधारित है, और वे घटनाएँ हमें आनन्दित होने और परमेश्वर पर आश्चर्य करने के लिए प्रेरित करती हैं। यदि आज आप भय और अविश्वास के संघर्ष में हैं, तो परमेश्वर को पुकारें, और मरकुस 9 के उस मनुष्य की प्रार्थना करें: “मैं विश्‍वास करता हूँ, मेरे अविश्वास का उपाय कर!” (मरकुस 9:24)। चेलों के सन्देह और भय ने उन्हें परमेश्वर के राज्य से बाहर नहीं कर दिया; न ही उन्होंने उन्हें परमेश्वर के राज्य के काम से वंचित कर दिया। इसलिए आज परमेश्वर से विनती करें कि वह आपके विश्वास की रक्षा करे, और आगे बढ़ते हुए चलें, यह स्मरण रखते हुए कि यीशु सचमुच जी उठा है और उसके पास आपके लिए सचमुच काम है।

  1 कुरिन्थियों 15:50–58

पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: यहेजकेल 22–23; यूहन्ना 13:1-20 ◊

29 September : अविश्वासाशी सुयुद्ध करा

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29 September : अविश्वासाशी सुयुद्ध करा
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आणि ह्या सर्वांबरोबरच जिच्या योगे त्या दुष्टाचे सगळे जळते बाण तुम्हांला विझवता येतील, ती विश्वासाची ढाल हाती घ्या व उभे राहा. तारणाचे शिरस्त्राण व आत्म्याची तलवार म्हणजें देवाचे वचन, ही घ्या. (इफिस 6:16-17)

जेव्हा जेव्हा मला म्हातारपणाची भीती वाटते, तेव्हा तेव्हां मी हे अभिवचन घेऊन अविश्वासाशी सुयुद्ध करतो, “तुमच्या वृद्धापकाळापर्यंतही मीच तो आहे; तुमचे केस पिकत तोपर्यंत मी तुम्हांला वागवीन; निर्माणकर्ता मीच आहे, वागवणारा मीच आहे, मी खांद्यांवर वागवून तुमचा बचाव करीन” (यशया 46:4).

जेव्हा जेव्हा मला मरणाची भीती वाटते, तेव्हा तेव्हा मी हे अभिवचन घेऊन अविश्वासाशी सुयुद्ध करतो “कारण आपल्यातील कोणी स्वतःकरता जगत नाहीं आणि कोणी स्वतःकरता मरत नाहीं. कारण जर आपण जगतो तर प्रभूकरता जगतो, आणि जर आपण मरतो तर प्रभूकरता मरतो; म्हणून आपण जगलो किंवा मेलो तरी आपण प्रभूचेच आहोत. कारण ख्रिस्त ह्यासाठीं मरण पावला व पुन्हा जिवंत झाला कीं, त्यानें मेलेल्यांचा व जिवंतांचाही प्रभू असावे” (रोमकरांस 14:7-9).

माझ्या विश्वासाचा नाश होऊन मीं देवापासून दूर जात आहे अशी भीती मला वाटते, तेव्हा तेव्हां मी ही अभिवचनें घेऊन अविश्वासाशी सुयुद्ध करतो, “ज्याने तुमच्या ठायीं चांगले काम आरंभले तो ते येशू ख्रिस्ताच्या दिवसापर्यंत सिद्धीस नेईल” (फिलिप्पैकर 1:6) ); आणि, “ह्यामुळें ह्याच्या द्वारे देवाजवळ जाणार्‍यांना पूर्णपणें तारण्यास हा समर्थ आहे; कारण त्यांच्यासाठीं मध्यस्थी करण्यास हा सर्वदा जिवंत आहे” (इब्री 7:25).

या युद्धांत मजबरोबर सहभागी व्हां! चला, आपण युद्ध करू, इतर लोकांशी नाहीं तर आपल्या स्वतःच्या अविश्वासाशी. देवाच्या अभिवचनांवर अविश्वास हे सर्व भीतीचे मूळ आहे, आणि हे इतर पुष्कळ पापांचे देखील मूळ आहे. आत्म्याची तलवार हे देवाचे वचन आहे, असे पौलाने इफिस 6:17 मध्यें म्हटले आहे : जिच्या योगे त्या दुष्टाचे सगळे जळते बाण तुम्हांला विझवता येतील, ती विश्वासाची ढाल हाती घ्या (वचन 16) – म्हणजें देवाच्या त्याच वचनावर विश्वास. तर मग, आपल्या डाव्या हातांत ढाल आणि उजव्या हातांत तलवार घ्या आणि आपण विश्वासाचे जे सुयुद्ध ते करूया.

बायबल हाती घ्या व उभे राहा, व पवित्र आत्म्याकडें मदतीसाठीं आरोळी मारा, त्याची अभिवचने तुमच्या हृदयात ठेवा आणि चांगली लढाई लढा – जेणेंकरून तुम्हीं भावी कृपेवर विश्वास ठेवीत जिवंत राहावें.

28 सितम्बर : परमेश्वर की बुद्धि

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“देखो, मैंने केवल यह बात पाई है कि परमेश्‍वर ने मनुष्य को सीधा बनाया, परन्तु उन्होंने बहुत सी युक्तियाँ निकाली हैं।” सभोपदेशक 7:29

एक बार मुझे एक युवक का पत्र मिला, जिसने अमेरिका और ब्रिटेन दोनों के विश्वविद्यालयों में सर्वोच्च शिक्षा प्राप्त की थी। उस पत्र में उसने लिखा, “मुझे कहना होगा कि संसार की सारी शिक्षा ने मुझे सबसे मूर्ख और अज्ञान मनुष्य बना दिया है।” ऐसे विद्वान से ऐसे शब्द सुनना कठिन लगता है—परन्तु वास्तव में, वह इतना जानता था कि समझ सके कि मूर्खता का सम्बन्ध मानसिक क्षमता से नहीं, बल्कि नैतिक विद्रोह से है।

मानवीय मूर्खता हमारे उस परमेश्वर के विरुद्ध अवज्ञाकारी स्वभाव से उत्पन्न होती है जो सच्ची बुद्धि और प्रकाश का एकमात्र स्रोत है। ऐसा विद्रोह परमेश्वर और दूसरों से अलगाव का कारण बनता है। और क्योंकि परमेश्वर को पाप का दण्ड देना ही होता है, इसलिए मनुष्य की मूर्खता दोषारोपण की ओर ले जाती है। हमें “सीधा” बनाया गया था, परन्तु हम आत्म-निर्भर और आत्म-प्रशंसा से भरी युक्तियों की ओर झुक जाते हैं। हम विकृत और अवरुद्ध हो जाते हैं क्योंकि हम अपने सृष्टिकर्ता के लिए जीने के स्थान पर अपने लिए जीते हैं। इस प्रकार हम बहुत कुछ जान सकते हैं, फिर भी कुछ नहीं जानते। फिर भी, हमारी इस निराशाजनक स्थिति में, परमेश्वर की बुद्धि प्रभु यीशु मसीह में हमारे लिए प्रकट की गई है (कुलुस्सियों 2:2-3)। यह बुद्धि तभी हमारी बनती है जब हम उसे अपना परमेश्वर और उद्धारकर्ता मानकर उस पर विश्वास करते हैं, क्योंकि “यहोवा का भय मानना बुद्धि का मूल है” (नीतिवचन 1:7, बल दिया गया है)। परमेश्वर का आत्मा हमें हमारे पुराने जीवन के मार्ग से फिरने और एक नई यात्रा आरम्भ करने में समर्थ बनाता है। जब हम मन फिराकर उसकी ओर लौटते हैं, तब प्रभु हमें हमारी पापमयता में भी स्वीकार करता है। और फिर, अपनी महान शक्ति से वह हमें अपने अनुग्रह के द्वारा बदल देता है।

यही परमेश्वर की बुद्धि है। यह आपको किसी आत्म-सहायता की पुस्तक में नहीं मिलेगी। यह आपको केवल धर्म या दर्शनशास्त्र में नहीं मिलेगी। यह आपको श्रेष्ठ विश्वविद्यालयों में भी नहीं मिलेगी। वे सब बन्द गलियाँ हैं। यह आपको केवल यीशु मसीह में ही मिलेगी, जो आपकी बुद्धि और धार्मिकता बनने की पेशकश करता है। अपनी मूर्खता में हम सब उससे दूर भागे हैं जिसने हमें बनाया है—परन्तु उसने हमारा पीछा किया, हमें हमारी दशा बताई, और अपने पुत्र को हम पर प्रकट करने का निश्चय किया। परमेश्वर की अनन्त बुद्धि और अद्‌भुत अनुग्रह के लिए उसकी स्तुति करने के लिए समय निकालें! और फिर यह विचार करें: यदि आप अपने जीवन के सभी निर्णय और दिशा “यहोवा का भय” मानने से आरम्भ करते, न कि मनुष्य की युक्तियों से, तो क्या कुछ बदलना न पड़ता?

  कुलुस्सियों 2:1-4

◊ पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: यहेजकेल 20–21; यूहन्ना 12:27-50

28 September : आमचे कल्याण हेच त्याचे गौरव आहे

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28 September : आमचे कल्याण हेच त्याचे गौरव आहे
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“तू तर जेव्हा जेव्हा प्रार्थना करतोस तेव्हा तेव्हा ‘आपल्या खोलीत जा व दार लावून घेऊन’ आपल्या गुप्तवासी पित्याची ‘प्रार्थना कर’ म्हणजें तुझा गुप्तदर्शी पिता तुला उघडपणें तिचे फळ देईल.” (मत्तय 6:6)

ख्रिस्ती हेडोनिझम -म्हणजें सुख हेच अंतिम उद्दिष्ट- या सिद्धांतावर एक सामान्य आक्षेप हा घेतला जातो कीं हा सिद्धांत मनुष्याच्या हितांना देवाच्या गौरवापेक्षा अधिक महत्व देतो – म्हणजें हे शिक्षण माझ्या आनंदाला देवाच्या सन्मानाच्या वर स्थान देते. परंतु खरे पाहता, ख्रिस्ती हेडोनिझमचा हा अर्थ नाहीं हे मीं ठामपणें सांगतो.

ठामपणें सांगायचे तर, आम्हीं ख्रिस्ती हेडोनिस्ट म्हणून आमच्या सर्व शक्तीने आमचे हित आणि आमच्या आनंदाचा पाठपुरावा करण्याचा प्रयत्न करतो. आम्हीं तरुण जोनाथन एडवर्ड्स यांच्या पुढील संकल्पाचे समर्थन करतो : “संकल्प : मी माझ्यासाठीं दुसऱ्या जगात शक्य तितका आनंद मिळवण्याचा प्रयत्न करीन -सर्व शक्तीने, सामर्थ्याने, श्रमाने आणि आवेशाने, किबहुंना आक्रमक वृत्तीनेहि, माझ्याकडून शक्य होईल तितके, किंवा माझ्या मनांत येईल तितके, मीं अनुसरू शकतो अशा कोणत्याही मार्गाने.”

परंतु आपल्याला बायबलमधून (आणि एडवर्ड्सकडून!) ही ज्ञानप्राप्ती झालीं आहे कीं देवाला आपल्यावर -आम्हा पापी लोकांवर, ज्यांना त्याची नितांत गरज आहे- त्याची कृपा ओतण्याद्वारे त्याच्या गौरवाच्या परिपूर्णतेचा महिमा वाढवणें आवडते.

म्हणून, आपल्या हितांचा आणि आपल्या आनंदाचा पाठलाग करणें, मग त्यासाठीं आपल्याला आपलें जीवन गमवावे लागलें तरी, हे देवाचा सम्मान आणि त्याचा आनंद यांपेक्षा आणि देवाचे जे गौरव यापेक्षा कधीही वर नाहीं, तर हा पाठलाग नेहमीच देवामध्यें असतो. बायबलमधील सर्वात मौल्यवान सत्यांपैकीं एक हे आहे कीं देवाच्या कृपेच्या विपुलतेचा महिमा करणें हे पापी लोकांचे त्याच्यामध्यें आणि केवळ त्याच्यामध्यें आपला आनंद शोधणें आहे!

जेव्हा आपण लहान बालकांसारखे स्वतःला लीन-दीन करतो आणि मी माझा समर्थ या वृत्तीचे कुपोषण करतो, तर आपल्या पित्याच्या मिठीत असलेल्या आनंदाकडें हर्षाने धाव घेतो, तेव्हा त्याच्या कृपेचा महिमा वाढतो आणि आपल्या जिवाची तळमळ तृप्त होते. आपलें कल्याण आणि त्याचे गौरव परस्पर विलीन झालें.

जेव्हा येशू मत्तय 6: 6 मध्यें असे अभिवचन देतो, “तुझा गुप्तदर्शी पिता तुला उघडपणें तिचे फळ देईल,” तेव्हां हे ते फळ आहे ज्याच्या पाठीस आपण लागावें अशी देव आपल्याठायीं इच्छा बाळगतो. तो आपल्याला अशा आनंदाचे आमिष देत नाहीं जो तो आपल्याला देऊ करत नाहीं! पण हे फळ – हा आनंद –जेव्हां आम्हीं लोकांनी आपलें गौरव करावें या वृत्तीपासून दूर जातो आणि देवाचा शोध घेण्यासाठीं आपल्या खोलीत जातो तेव्हां काठोकाठ वाहणारा तो हा आनंद आहे.

यास्तव, ख्रिस्ती हेडोनिस्ट, म्हणजें सुख हेच अंतिम उद्दिष्ट या सिद्धांतावर विश्वास ठेवणारे लोक, हे त्यांच्या आनंदाला देवाच्या गौरवावर उंच स्थान देत नाहींत. तर ते आपल्या आनंदाचा शोध प्रत्यक्ष देवामध्यें घेतांत, आणि ‘जेव्हा आपण देवामध्यें सर्वात जास्त तृप्त असतो, तेव्हा देव आपल्यामध्यें सर्वात जास्त गौरव पावतो’ हे महान सत्य शोधून काढतांत.

27 सितम्बर : रहस्यमय प्रावधान

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27 सितम्बर : रहस्यमय प्रावधान
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“दूसरे दिन हम ने सैदा में लंगर डाला, और यूलियुस ने पौलुस पर कृपा करके उसे मित्रों के यहाँ जाने दिया कि उसका सत्कार किया जाए।” प्रेरितों 27:3

प्रेरितों 7:58 में लिखा है कि तरसुस का शाऊल उन लोगों के वस्त्रों की रखवाली कर रहा था जो सर्वप्रथम शहीद स्तिफनुस का पथराव कर रहे थे। इसके तुरन्त बाद, शाऊल (जो बाद में पौलुस कहलाया) उस उत्पीड़न का अगुवा बना जिसके कारण मसीही लोग यरूशलेम से तितर-बितर होकर आस-पास के प्रदेशों में भाग गए और उनके साथ सुसमाचार भी फैलता गया (प्रेरितों 8:3-4)! और फिर शाऊल का मन-परिवर्तन हुआ: जब वह “प्रभु के चेलों को धमकाने और घात करने की धुन में था” (प्रेरितों 9:1), तभी मसीह उसे विश्वास में ले आया और उसे प्रेरित नियुक्त किया।

इस प्रकार प्रेरितों 27:3 तक, शाऊल के—जो अब केवल पौलुस कहलाता था—सैदा में मसीही मित्र थे, जो सम्भवतः उस समुदाय के सदस्य थे जो स्तिफनुस की मृत्यु के बाद हुए उत्पीड़न और बिखराव के समय उस नगर में स्थापित थे। सैदा में पौलुस के लिए उपलब्ध मित्र वहाँ इसलिए थे क्योंकि तरसुस का शाऊल इतना भयानक उत्पीड़क रहा था। सचमुच, परमेश्वर “अपने आश्चर्यकर्म करने के लिए रहस्यमय रीति से कार्य करता है।”[1]

यदि हम उन लोगों में होते जिन्हें शाऊल ने सताया था, तो सम्भव है कि हम उनके विलाप में शामिल होते और कहते, हे प्रभु, हम सब तितर-बितर हो रहे हैं। हमारे परिवार बिखर रहे हैं। हमारे समुदाय टूट रहे हैं। क्या यह भयानक और दुखद बात नहीं है? उनके दृष्टिकोण से यह निश्चय ही ऐसा प्रतीत होता। फिर भी, इतनी बड़ी त्रासदी के बीच हम परमेश्वर के रहस्यमय प्रावधान को देखते हैं: पौलुस स्वयं—जो अब मसीही था—उसी नगर की कलीसिया से मसीही कृपा प्राप्त कर रहा था, जो आंशिक रूप से इसलिए अस्तित्व में आई थी क्योंकि वह स्वयं इतना दृढ़ उत्पीड़क रहा था।

समय आने पर, हमारे वर्तमान जीवन की उलझी हुई गड़बड़ियाँ, हमारी कठिनाइयाँ और निराशाएँ, सब अपने उचित परिप्रेक्ष्य में रखी जाएँगी। हमें यह स्मरण रखना चाहिए कि…

जो वह आशीष देता है वही हमारा भला है,

और जो आशीष-रहित भला है वह बुरा है;

और जो सबसे गलत प्रतीत होता है वह भी सही है,

यदि वह उसकी मधुर इच्छा हो! [2]

पौलुस के जीवन की यह छोटी-सी घटना उस सत्य को दोहराती है जिसे यूसुफ ने अपने भाइयों से उस समय कहा था जब उन्होंने उसे मिस्र में बेचने के लिए उससे क्षमा माँगी थी: “यद्यपि तुम लोगों ने मेरे लिए बुराई का विचार किया था; परन्तु परमेश्‍वर ने उसी बात में भलाई का विचार किया” (उत्पत्ति 50:20)। परमेश्वर मनुष्यों की बुरी मनशाओं को भी अपनी सन्तान के लिए अपनी योजनाओं की पूर्ति में सम्मिलित कर सकता है। वह विश्वासयोग्य और अपरिवर्तनशील है। उसके रहस्यमय प्रावधान में शान्ति पाएँ, यह जानते हुए कि वह आप पर ऐसा कुछ भी नहीं आने देगा जिसे अन्ततः आपके भले और उसकी महिमा के लिए उपयोग न किया जाए।

  उत्पत्ति 45:4-15

पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: यहेजकेल 18–19; यूहन्ना 12:1-26 ◊


[1] विलियम कूपर, “गॉड मूव्स इन अ मिस्टीरियस वे” (1774).

[2] फ़्रेडरिक डब्ल्यू. फ़ैबर, “आई वर्शिप दी, स्वीट विल ऑफ़ गॉड” (1849).

27 September : अधिक उत्तम अभिवचनाचे सामर्थ्य

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27 September : अधिक उत्तम अभिवचनाचे सामर्थ्य
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मी मोकळेपणाने चालेन, कारण मी तुझ्या नीतिनियमांचा आश्रय केला आहे. (स्तोत्र 119:45, माझे भाषांतर)

स्वातंत्र्य हे पूर्णानंदाचा एक आवश्यक घटक आहे. आपल्याला ज्या गोष्टीचा तिटकारा वाटतो तिजपासून जर आपण बंधमुक्त नाहीं आणि ज्यां गोष्टीवर आपण प्रीति करतो ती करण्यासाठीं जर आपण स्वतंत्र नाहीं तर आपल्यापैकीं कोणीही आनंदी असणार नाहीं.

आपल्याला हे खरे स्वातंत्र्य कुठे मिळते? स्तोत्र 119:45 म्हणते, “मी मोकळेपणाने चालेन, कारण मी तुझ्या नीतिनियमांचा आश्रय केला आहे.”

येथें जे चित्र आहे ते मोकळेपणाने वावरण्यासंबंधीचे आहे. वचन आपल्याला क्षुल्लक शहाणपणापासून बंधमुक्त करते. “परमेश्वराने शलोमोनला……समुद्रकाठच्या वाळूप्रमाणें मोजमाप काढता येत नाहीं इतके फार मोठे शहाणपण व अगाध समज दिली होती” (1 राजे 4:29). वचन आपल्याला आपल्या जिवावर उठलेल्या बंदिवासातून बंधमुक्त करते. “त्यांनी मला प्रशस्त ठिकाणी आणले” (स्तोत्र 18:19).

येशूनें म्हटलें, “तुम्हांला सत्य समजेल व सत्य तुम्हांला बंधमुक्त करील” (योहान 8:32). तो हे बोलत असतांना त्याच्या मनात जे स्वातंत्र्य होते ते पापाच्या गुलामगिरीपासून मुक्तीचे स्वातंत्र्य होते (योहान 8:34). किंवा, सकारात्मक दृष्टिने सांगायचे तर, ते स्वातंत्र्य पवित्रतेसाठीं असलेले स्वातंत्र्य आहे.

देवाच्या कृपेची अभिवचने ते सामर्थ्य देतांत ज्यामुळें देवानें आम्हांकडून पवित्र जीवनाविषयी केलेंली अपेक्षा आम्हांला भीतीदायक आणि बंधन वाटण्या ऐवजी स्वातंत्र्याचा अनुभव बनवते. पेत्राने देवाच्या अभिवचनांच्या बंधमुक्त करणाऱ्या सामर्थ्याचे वर्णन यां शब्दांत केलें : “त्यांच्या योगे मोलवान व अति महान अशी वचने आपल्याला देण्यात आली आहेत, ह्यासाठीं कीं, त्यांच्या द्वारे तुम्हीं वासनेपासून उत्पन्न होणारी जगातील भ्रष्टता चुकवून ईश्वरी स्वभावाचे वाटेकरी व्हावे” (2 पेत्र 1:4 ).

याचा अर्थ असा कीं, आपण देवाच्या अभिवचनांवर विश्वास ठेवतो, तेव्हा आपण अधिक उत्तम अभिवचनाच्या सामर्थ्याने भ्रष्टता व कामवासना यांचे मूळ उपटून काढतो.

काल्पनिक खोट्या सुखांचे सामर्थ्य मोडून टाकणारे हे वचन किती आवश्यक आहे! तर मग, देवाच्या वचनाने आपला मार्ग प्रकाशित व्हावा आणि ते आपल्या मनात जपून राहावे म्हणून आपण किती जागरूक असले पाहिजे!

“तुझे वचन माझ्या पावलांसाठीं दिव्यासारखे व माझ्या मार्गावर प्रकाशासारखे आहे” (स्तोत्र 119:105). “मी तुझ्याविरुद्ध पाप करू नये म्हणून मी आपल्या मनात तुझे वचन जपून ठेवले आहे” (स्तोत्र 119:11).

26 सितम्बर : जीवन का मुकुट

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26 सितम्बर : जीवन का मुकुट
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“धन्य है वह मनुष्य जो परीक्षा में स्थिर रहता है, क्योंकि वह खरा निकलकर जीवन का वह मुकुट पाएगा जिसकी प्रतिज्ञा प्रभु ने अपने प्रेम करने वालों से की है।” याकूब 1:12

आवश्यक कक्षाएँ लिए बिना स्नातक होने की चाहत रखना आसान है। परन्तु कक्षाएँ लिए बिना परीक्षा के लिए तैयार होना सम्भव नहीं, और परीक्षा के बिना स्नातक होना सम्भव नहीं। जो बात शिक्षा के क्षेत्र में सत्य है, वह हमारे विश्वास के विषय में भी सत्य है: यह सोचना मूर्खता होगी कि हम मसीही जीवन में आवश्यक पाठ्यक्रम लिए बिना और परीक्षाओं से गुज़रे बिना परिपक्वता और पूर्णता तक पहुँच सकते हैं।

जब याकूब उस विश्वासी के विषय में लिखता है जिसने “खरा निकलकर” स्थिरता दिखाई है, तो वह dokimos शब्द का प्रयोग करता है, जिसका अर्थ है—परखा हुआ, ताया हुआ और स्वीकृत। ऐसे व्यक्ति के जीवन पर परमेश्वर की स्वीकृति की मुहर होती है, और यह उसकी स्थिरता के द्वारा और अधिक स्पष्ट होती जाती है।

“जीवन का वह मुकुट” या अधिक सटीक रूप से वह मुकुट जो जीवन से बना है, “अनन्त जीवन का चित्र”[1] है, जिसे देने की प्रतिज्ञा परमेश्वर ने अपने लोगों से की है। यह इस विचार को दर्शाता है कि समापन रेखा पर परमेश्वर हमारा स्वागत करेगा और हमें सम्मान, आशीष और अनन्त जीवन का मुकुट पहनाएगा। इसलिए परीक्षा की अवधि हमारे सारे जीवन की अवधि है। हमारी परीक्षा तब तक चलती है जब तक मसीह लौट नहीं आता या हमें अपने पास नहीं बुला लेता—और इसलिए यह अन्त तक स्थिर रहने का बुलावा है।

यही दृष्टिकोण और यह प्रतिज्ञा हमारे जीवन की सबसे कठिन घड़ियों का सामना करने के ढंग को बदल देती है। हम अक्सर व्यक्तिगत परीक्षाओं को घुसपैठिए मानते हैं और उन्हें “आनन्द की बात” नहीं समझते (याकूब 1:2)। परन्तु जब हम समझ जाते हैं कि हमारा पूरा जीवन ही परीक्षाओं की एक शृंखला है, तो यह हमें आश्वस्त करता है और हमें यथार्थवादी दृष्टि से अपने अनुभवों पर विचार करने का अवसर देता है। हम निश्चय के साथ जान सकते हैं कि भविष्य में हमारे लिए यीशु के साथ अनन्त जीवन का मुकुट धरा है, और हमारी परीक्षाएँ धीरज सीखने और मसीह के समान बनने के अवसर हैं, जो संसार को यह घोषित करता है कि जिसकी ओर हम बढ़ रहे हैं, वह न केवल जीवन के लिए, बल्कि आनन्द के लिए भी पर्याप्त है।

मसीही जीवन में वास्तविकता से पहले कोई अभ्यास-चरण नहीं है; यह हर समय, हर दिन, वास्तविक अनुभव है। हमें यह जानने का अवसर नहीं मिलता कि हम अपने बच्चों का पालन-पोषण कैसे करेंगे, किसी प्रियजन की अचानक मृत्यु से कैसे निपटेंगे, या जो कुछ भी हमारे सामने आएगा उस पर कैसे प्रतिक्रिया देंगे—जब तक कि वे बातें वास्तव में हमारे सामने न आ जाएँ। यही वे वास्तविक जीवन की कक्षाएँ हैं जिन्हें हमें आत्मिक परिपक्वता की उपाधि पाने के लिए लेना होता है। आज आप किन परीक्षाओं से गुजर रहे हैं? ये वही कक्षाएँ हैं—भले ही आपने इन्हें चुना न हो—जिनके द्वारा प्रभु जानता है कि आप स्थिर रहना सीखेंगे और अपने मुकुट के लिए तैयार होंगे। आज तूफानों में उसकी कृपा से स्थिर रहते हुए स्मरण रखें कि आप “धन्य” हैं—अभी एक आसान जीवन की झूठी आशीष से नहीं, बल्कि आने वाले “जीवन के मुकुट” की अनन्त आशीष से।

  याकूब 1:2-4

◊ पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: यहेजकेल 16–17; यूहन्ना 11:28-57


[1] डेरेक प्राइम, फ्रॉम ट्रायल्स टू ट्रायम्फ्स (रीगल, 1982), पृ. 28.

26 September : देवाच्या सार्वभौम सामर्थ्यावर विश्वास ठेवत जगणें

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26 September : देवाच्या सार्वभौम सामर्थ्यावर विश्वास ठेवत जगणें
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जे आपण विश्वास ठेवणारे त्या आपणांविषयीच्या त्याच्या सामर्थ्याचे अपार महत्त्व. . . (इफिस 1:19)

देवाचे अपार सामर्थ्य हे देवाच्या सार्वकालिक गौरवांत असलेले युगानुयुगाचे व खंबीर आश्रयस्थान आहे मग या पृथ्वीवर कोणत्याही परिस्थिती उद्भवल्या तरी त्यानें काहीं फरक पडत नाहीं. आणि हाच दृढ विश्वास देवानें केलेंले पाचारण पूर्ण आज्ञाधारकपणें अनुसरण्याचा स्रोत आणि सामर्थ्य आहे.

सर्वसमर्थ देव हा तुमचा आश्रय आहे या सत्यापेक्षा अधिक स्वतंत्र करणारे, अधिक पराक्रमी किंवा अधिक बळकट करणारे काहीं आहे का — तेहि दिवसभर, दररोज, जीवनातील सर्वसामान्य आणि असामान्य अशा सर्व घडामोडींमध्यें?

जर आपण यावर विश्वास ठेवला, जर आपण खरोखरच देवाच्या सर्वसमर्थपणाचे हे सत्य समजून घेतले तर आपल्या वैयक्तिक जीवनात आणि आपल्या सेवाकार्यात किती बदल घडून येतील! तारण करण्याच्या देवाच्या संकल्पांसाठीं आपण किती नम्र आणि सामर्थ्यवान बनू!

देवाचा सर्वसमर्थपणाचा गुणविशेष हा देवाच्या लोकांसाठीं आश्रयस्थान आहे. आणि सर्वसमर्थ देवाचा हा सर्वसमर्थपणाचा गुणविशेष तुमचे आश्रयस्थान आहे असा विश्वास तुम्हीं ठेवतां, तेव्हा तुम्हांला असा आनंद, असे एक स्वातंत्र्य आणि असे सामर्थ्य प्राप्त होते जे आमच्या जीवनाला येशू ख्रिस्ताप्रत मौलिक आज्ञाधारकपणाने व्यापून टाकते.

देवाचा सर्वसमर्थपणाचा गुणविशेष हा त्याच्या कराराच्या लोकांसाठीं आदर, शत्रूकडून सूड आणि आश्रयस्थान आहे.

मी तुम्हांला त्याच्या कृपेच्या कराराच्या अटी स्वीकारण्यासाठीं आव्हाहन करतो : आपल्या पापापासून वळा आणि प्रभु येशू ख्रिस्तावर विश्वास ठेवा; आणि सर्वसमर्थ देवाचा सर्वसमर्थपणाचा जो गुणविशेष आहे तो तुमच्या जिवासाठीं आदर, तुमच्या शत्रूंकडून सूड आणि तुमच्या जीवनाचा आश्रय ठरेल – सर्वकाळासाठीं.