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22 नवम्बर : स्वर्ग का चित्र

“मैंने दृष्‍टि की, और देखो, हर एक जाति और कुल और लोग और भाषा में से एक ऐसी बड़ी भीड़, जिसे कोई गिन नहीं सकता था, श्वेत वस्त्र पहने और अपने हाथों में खजूर की डालियाँ लिए हुए सिंहासन के सामने और मेमने के सामने खड़ी है, और बड़े शब्द से पुकारकर कहती है, ‘उद्धार के लिए हमारे परमेश्‍वर का, जो सिंहासन पर बैठा है, और मेमने का जय–जय कार हो!’” प्रकाशितवाक्य 7:9-10

स्वर्ग के बारे में हमारे कई विचार और गीत वास्तव में बाइबल कम आधारित हैं और विक्टोरियन युग के ईसाई धर्म तथा यूनानी दार्शनिक प्लेटो की शिक्षा पर आधारित ब्रह्मांड-दृष्टिकोण पर अधिक आधारित हैं। कुछ कलाकारों ने जैसा दिखाया है कि हम बादलों पर बैठकर वीणा बजाते रहेंगे—ऐसा स्वर्ग में नहीं होगा। हम इससे कहीं अधिक बेहतर काम करेंगे। पवित्रशास्त्र हमें दिखाता है कि हम परमेश्वर की स्तुति और मेमने की आराधना करेंगे।

प्रकाशितवाक्य की पुस्तक हमें मेमने के चारों ओर के प्रशंसा के सतत बढ़ते हुए घेरे को देखने के लिए आमन्त्रित करती है। पहले घेरे में हम चार जीवित प्राणी और चौबीस प्राचीनों को देखते हैं, जो धूप चढ़ाते हैं और स्तुति का नया गीत गाते हैं (प्रकाशितवाक्य 5:8-9)। दूसरे घेरे में, पद 11-13 में, हजारों-हजार स्वर्गदूत उसे आदर देते हैं, और फिर समस्त सृष्टि के सारे प्राणी इस गीत में सम्मिलित हो जाते हैं।

इसके बाद, प्रकाशितवाक्य की पुस्तक उन लोगों को उजागर करती है, जो मेमने के लहू से छुड़ाए गए हैं (7:4, 9)। उन्हें 1,44,000 की निश्चित संख्या में और एक ऐसी भीड़ के रूप में दर्शाया गया है, जिसे कोई गिन नहीं सकता। वे एक ओर इस्राएल की बारह जातियों से हैं, और दूसरी ओर हर जाति और भाषा के लोगों का समूह हैं। ये विवरण एक-दूसरे के विरोधी लग सकते हैं, लेकिन परमेश्वर के दृष्टिकोण से यह बिल्कुल संगत है। निश्चित संख्या पूर्णता और समाप्ति को दर्शाती है; परन्तु मनुष्य की दृष्टि से वह भीड़ इतनी विशाल है कि उसे गिना नहीं जा सकता।

परमेश्वर की दृष्टि में, जो लोग छुड़ाए गए हैं, वे उसके चुने हुए बेटे और बेटियाँ हैं, और हर जाति का प्रतिनिधित्व करते हुए। वह हर एक को व्यक्तिगत रूप से जानता है। फिर भी, उसकी प्रजा सभी लोगों में से बुलाई गई है। यह परमेश्वर की पूर्ण और सम्पूर्ण विजय का दृश्य है—और उसकी प्रजा उसकी जयजयकार करते हुए उसकी विजय में आनन्दित होती है।

इसलिए, हालाँकि इस दृश्य का आरम्भ चार जीवों और चौबीस प्राचीनों से होता है, लेकिन यह हजारों-हजारों की भीड़ तक पहुँचता है, जैसा कि पौलुस कहता है: “जो स्वर्ग में और पृथ्वी पर और पृथ्वी के नीचे हैं, वे सब यीशु के नाम पर घुटना टेकें” (फिलिप्पियों 2:10, विशेष बल दिया गया है)। हमारी स्तुति उस अनगिनत भीड़ की स्तुति से जुड़ जाएगी, और हम सभी यह घोषणा करेंगे कि मसीह वह मेमना है जो बलिदान हुआ, कि उसके लहू से हमारे पाप धो दिए गए हैं, कि हम धार्मिकता को धारण किए हुए हैं, और कि उसकी संगति में हम अनन्तकाल तक जीवित रहेंगे।

एक दिन हम मसीह के चारों ओर इस स्तुति के घेरे में शामिल होंगे, और हमारा प्रिय दूल्हा विजयी सिंह और दीन मेमने के रूप में आगे बढ़ेगा। लेकिन हमें तब तक प्रतीक्षा करने की आवश्यकता नहीं है, क्योंकि हम अभी भी उसकी ओर अपनी दृष्टि लगाए हुए आराधना का गीत गा सकते हैं। एक दिन आप उसके सामने खड़े होंगे और उसे देखेंगे! और तब तक, आप प्रतिदिन उस दिन की ओर बढ़ते जा रहे हैं।

प्रकाशितवाक्य  7:1-17

पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: 2 इतिहास 4– 6; लूका 5:17-39 ◊

21 नवम्बर : चुप रहो और सुनो

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21 नवम्बर : चुप रहो और सुनो
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“हाय उस पर जो काठ से कहता है, जाग, या अबोल पत्थर से, उठ! क्या वह सिखाएगा? देखो, वह सोने चाँदी में मढ़ा हुआ है, परन्तु उसमें आत्मा नहीं है। परन्तु यहोवा अपने पवित्र मन्दिर में है; समस्त पृथ्वी उसके सामने शान्त रहे।” हबक्कूक 2:19-20

हबक्कूक के समय का संसार उथल-पुथल अवस्था में था और ऐसा प्रतीत होता था कि अब उसकी कोई सुध नहीं ली जा सकती। उसका अपना हृदय भी बहुत व्याकुल था, जिससे वह परमेश्वर से यह पूछने को प्रेरित हुआ कि जो कुछ हो रहा है, वह उसे क्यों होने दे रहा है (हबक्कूक 1:2-3)। भविष्यवक्ता चाहता था कि कुछ किया जाए। वह उत्तर चाहता था। वह परिवर्तन चाहता था। और परमेश्वर ने हबक्कूक से कहा, याद रखो कि मैं अब भी राज्य करता हूँ। याद रखो कि मैं कौन हूँ, और तुम कौन हो। परमेश्वर अब भी “अपने पवित्र मन्दिर में” उपस्थित था, और सम्पूर्ण पृथ्वी पर सम्प्रभुता के साथ शासन कर रहा था। उसने पहले ही उस योजना को निश्चित कर दिया था जिसके द्वारा उसकी इच्छा पूरी होनी थी। इस सच्चाई को स्वीकार करना हबक्कूक के लिए नम्रता और मौन का बुलावा था। यद्यपि उसके पास प्रश्न और शिकायतें थीं, और यद्यपि परमेश्वर ने उसे उन्हें उठाने की अनुमति दी थी, परन्तु उससे भी अधिक आवश्यक यह था कि वह परमेश्वर की बातों को सुने और उन पर विचार करे।

हम इस मौन के बुलावे को सम्पूर्ण पवित्रशास्त्र में देखते हैं। परमेश्वर भजनकार के माध्यम से कहता है, “चुप हो जाओ, और जान लो कि मैं ही परमेश्‍वर हूँ” (भजन संहिता 46:10)। नए नियम में, जब यीशु अपनी स्वर्गिक महिमा में रूपान्तरण पर्वत पर पतरस, याकूब और यूहन्ना के सामने प्रकट हुआ और पतरस ने डर के कारण जो पहली बात मन में आई, कह दी, तब यह दिव्य वाणी शिष्यों ने सुनी: “यह मेरा प्रिय पुत्र है, जिससे मैं प्रसन्न हूँ : इसकी सुनो” (मत्ती 17:5, विशेष बल दिया गया)।

जब समय कठिन होता है, तो हम में से कुछ लोग अपने स्वभाव के अनुसार एक कार्यकर्ता की तरह प्रतिक्रिया करते हैं: समस्या को हल करना है, इसलिए हम स्वयं को समाधान खोजने में झोंक देते हैं। हममें से कुछ निराशावादी हो जाते हैं: इस समस्या का कोई समाधान नहीं है, इसलिए हम उसके नीचे दब जाते हैं या उससे बचने के लिए व्यर्थ की गतिविधियों में लग जाते हैं। दोनों ही प्रतिक्रियाएँ इस कारण होती हैं कि हम परमेश्वर के सामने शान्त होकर उसकी बातों को सुनने और विचार करने के लिए रुकते नहीं हैं। हम एक शोरगुल से भरी दुनिया में जीते हैं: शब्द, शब्द, शब्द—विशेषज्ञों, प्रोफेसरों और नेताओं की निरन्तर बकबक। लेकिन यदि हम परमेश्वर की नहीं सुनेंगे, तो अन्ततः हम किसी ऐसी मूरत पर भरोसा कर बैठेंगे जो बोल ही नहीं सकती (हबक्कूक 2:18-19)। मूरतें न हमारे जीवन के बारे में, न ही हमारे संसार की परिस्थितियों के बारे में कोई सत्य बात कह सकती हैं।

जब कठिन दिनों का सामना होता है, तो हबक्कूक हमें स्मरण कराता है, “समस्त पृथ्वी उसके सामने शान्त रहे।” हमारे पास सभी उत्तर नहीं हैं, और न ही विशेषज्ञों के पास हैं। प्रश्न करना या समाधान खोजना गलत नहीं है, परन्तु यदि ऐसा करते हुए हम परमेश्वर के वचन को सुनने और उसकी आवाज़ पर ध्यान देने को अनदेखा कर दें, तो यह गलत है। हमारे चारों ओर चाहे जो कुछ भी हो रहा हो, हमें सबसे अधिक आवश्यकता इस बात की है कि हम याद रखें कि प्रभु अपने पवित्र मन्दिर में है, और वह अपने सिंहासन से अपने लोगों की भलाई के लिए इतिहास का संचालन कर रहा है। यही वह नींव है, जिस पर हम इस संसार में परमेश्वर के कार्य को समझने की समझदारी की रूपरेखा बना सकते हैं।

क्या आपको ऐसा लगता है कि राष्ट्र क्रोधित हो रहे हैं और राज्य हिल रहे हैं? क्या पर्वत डगमगा रहे हैं और लहरें उछाल मार रही हैं (भजन 46:2-3, 6)? शान्त हो जाएँ, जान लें कि परमेश्वर ही परमेश्वर है, और उसकी सुनें।

भजन 46

◊ पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: 2 इतिहास 1–3; लूका 5:1-16

20 नवम्बर : धन्यवाद से अभिभूत होना

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20 नवम्बर : धन्यवाद से अभिभूत होना
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“उसी में चलते रहो, और उसी में जड़ पकड़ते और बढ़ते जाओ; और जैसे तुम सिखाए गए वैसे ही विश्‍वास में दृढ़ होते जाओ, और अधिकाधिक धन्यवाद करते रहो।” कुलुस्सियों 2:6-7

यदि हम एक भरे हुए गिलास को लेकर चल रहे हों और अचानक कोई हमसे टकरा जाए, तो जो कुछ भी उस गिलास में है, वही बाहर निकलेगा। यही सिद्धान्त हमारे चरित्र पर भी लागू होता है: यदि हमारे भीतर कड़वाहट, कृतघ्नता, ईर्ष्या या जलन भरी हुई है, तो थोड़ा-सा “धक्का” ही इन भावनाओं को बाहर लाने के लिए पर्याप्त होता है।

जब पौलुस ने कुलुस्से के मसीही विश्वासियों को लिखा, तो उसने उन्हें इस बात के लिए प्रोत्साहित किया कि वे एक आभारी हृदय से पहचाने जाएँ—जो कि मसीही जीवन की एक प्रमुख विशेषता है। पौलुस ने इस धन्यवाद को व्यक्त करने के लिए जिस शब्द का उपयोग किया है, “अधिकाधिक” (कुलुस्सियों 2:7), वह यूनानी शब्द perisseuo है, जिसका अर्थ होता है “बहकर निकलना” या “उफन पड़ना।” पौलुस का तात्पर्य स्पष्ट है: जब लोग इन विश्वासियों से “टकराएँ,” तो जो बाहर निकले वह कृतज्ञता होनी चाहिए।

जब स्त्री-पुरुष मसीह द्वारा परिवर्तित नहीं होते, तो उनके जीवन में अक्सर कृतघ्नता का ही शासन होता है—और उसके फलस्वरूप कड़वाहट, शिकायत, क्रोध और द्वेष भी उनमें भरा रहता है। परन्तु मसीह में विश्वासियों का जीवन इस प्रकार बदलता है कि वे कृतघ्नता की जगह धन्यवाद, कड़वाहट की जगह आनन्द, और क्रोध की जगह शान्ति को अपनाते हैं। हमने परमेश्वर की सम्पूर्ण सच्चाई में प्रकट हुए अनुग्रह की खुशखबरी को सुना है और मन फिराकर तथा विश्वास करके उसकी ओर लौटे हैं। हमारे पाप क्षमा कर दिए गए हैं। हमारे भीतर उसका आत्मा वास करता है। हम परमेश्वर की कलीसिया में एक नए परिवार का हिस्सा हैं। हमारे सामने अनन्त जीवन है। हम प्रार्थना के द्वारा स्वर्गिक सिंहासन तक पहुँच सकते हैं। दूसरे शब्दों में कहें तो, हमारे पास आभारी होने के लिए काफी कुछ है। कृतज्ञता मसीही जीवन का गीत बन जाती है—जो भीतर से उफनता रहता है।

इस प्रकार की कृतज्ञता के गहरे प्रभाव होते हैं। यह हमारी दृष्टि को परमेश्वर की ओर मोड़ देती है और हमें स्वयं पर तथा अपनी परिस्थितियों पर केन्द्रित रहने से हटा देती है। यह हमें शैतान की कानाफूसी से बचाती है, जो हमें निराशा की ओर खींचती है और परमेश्वर की कही बातों पर अविश्वास करने को प्रेरित करती है। यह हमें घमण्ड से भी सुरक्षित रखती है, और हमारे शब्दकोश से ऐसे वाक्य मिटा देती है जैसे—“मुझे इससे ज्यादा मिलना चाहिए था” या “मेरे साथ ऐसा नहीं होना चाहिए था।” और यह हमें इस सच्चाई में विश्राम करने देती है कि परमेश्वर अपनी प्रेमपूर्ण योजना को केवल सुखद और उत्साहवर्धक अनुभवों में ही नहीं, बल्कि अस्थिर और पीड़ादायक परिस्थितियों में भी पूरा करता है। केवल अनुग्रह के द्वारा ही हम यह सीख सकते हैं: “हर बात में धन्यवाद करो” (1 थिस्सलुनीकियों 5:18, अतिरिक्त बल दिया गया है)।

कृतघ्नता का एकमात्र इलाज मसीह के साथ मेल में ही पाया जाता है। क्या आप अपने भीतर यह अनुभव करते हैं कि परमेश्वर ने आपको जो नहीं दिया, उसके लिए कोई कड़वाहट या असन्तोष अब भी बाकी है? तो उस भावना को मसीह के चरणों में ले आएँ, मसीह से क्षमा माँगें, और उससे यह प्रार्थना करें कि वह आपको दिखाए कि उसने अपने सुसमाचार में आपको कितना कुछ निशुल्क दे दिया है। हर दिन कुछ समय निकालें और परमेश्वर से प्राप्त आशिषों को लिखें और उन्हें स्वयं को याद दिलाएँ। तब आप वास्तव में कृतज्ञता से उफनने लगेंगे।

भजन 103

पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: 1 इतिहास 28–29; लूका 4:31-44 ◊

19 नवम्बर : आत्म-सन्तोष पर एक चेतावनी

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19 नवम्बर : आत्म-सन्तोष पर एक चेतावनी
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“मैं तुमसे सच कहता हूँ कि ऐसा कोई नहीं, जिसने मेरे और सुसमाचार के लिए घर या भाइयों या बहिनों या माता या पिता या बाल–बच्चों या खेतों को छोड़ दिया हो, और अब इस समय सौ गुणा न पाए, घरों और भाइयों और बहिनों और माताओं और बाल–बच्चों और खेतों को, पर सताव के साथ और परलोक में अनन्त जीवन। पर बहुत से जो पहले हैं, पिछले होंगे; और जो पिछले हैं, वे पहले होंगे।” मरकुस 10:29-31

यीशु की प्राथमिकता यह नहीं है कि हम आरामदायक जीवन जीएँ।

जब एक धनी युवक ने यीशु से अनन्त जीवन पाने की बात की, लेकिन अपनी सम्पत्ति को त्यागने को तैयार न होकर दुखी होकर चला गया, तब यीशु ने अपने शिष्यों से कहा: “परमेश्‍वर के राज्य में धनवान के प्रवेश करने से ऊँट का सूई के नाके में से निकल जाना सहज है।” (मरकुस 10:25) इसके उत्तर में पतरस ने—जो ऐसे अवसरों पर अक्सर तुरन्त बोल पड़ता था—यह इंगित किया कि उसने और बाकी शिष्यों ने यीशु का अनुसरण करने के लिए बहुत कुछ त्याग दिया है (पद 28)।

सम्भवतः पतरस इस बात की पुष्टि चाहता था कि वह और अन्य शिष्य यीशु की उस चेतावनी से “सुरक्षित” हैं, क्योंकि उन्होंने अपनी सम्पत्ति छोड़ दी है। और वास्तव में, यीशु ने उत्तर में उन्हें उत्साहवर्धक आश्वासन दिया कि जो कोई भी उसके और सुसमाचार के लिए बहुत कुछ त्याग देता है, वह भरपूर प्रतिफल पाएगा। दूसरे शब्दों में, इस जीवन में और आने वाले युग में भी परमेश्वर उनकी देखभाल करेगा। लेकिन यीशु केवल अपने शिष्यों को अच्छा महसूस कराने में रुचि नहीं रखता था। इसलिए उन्होंने इसके साथ एक गम्भीर चेतावनी भी जोड़ दी: “बहुत से जो पहले हैं, पिछले होंगे; और जो पिछले हैं, पहले होंगे।”

हम कल्पना कर सकते हैं कि पतरस ने ये शब्द सुनकर स्वयं की तुलना उस धनी युवक से की होगी और राहत महसूस की होगी। लेकिन शायद यीशु का उद्देश्य यही नहीं था। धन के विषय में तो वह पहले ही बात कर चुका था। बल्कि ऐसा प्रतीत होता है कि यीशु अपने शिष्यों को चेतावनी दे रहा था: सावधान रहो कि कहीं आत्म-सन्तुष्टि तुम्हें न घेर ले। ऐसे लोग हैं जो अपने आप को “पहले” समझते हैं—ऐसे बहुत सारे लोग हैं, जिन्हें या तो संसार या फिर कलीसिया कहती है कि वे “पहले” हैं—परन्तु एक दिन यीशु का न्याय उन्हें चौंका देगा। वे लोग जो चुपचाप, बिना मान्यता पाए, अपना सब कुछ यीशु के लिए अर्पित करते हैं, उन्हीं के लिए यीशु सबसे ऊँचा सम्मान सुरक्षित रखता है।

शायद हम भी पतरस की तरह अपने आप को यीशु की सम्पत्ति सम्बन्धी चुनौती से सुरक्षित मानते हैं—या तो इसलिए कि हमारे पास सम्पत्ति है ही नहीं, या फिर इसलिए कि हमने पहले ही बहुत कुछ त्याग दिया है। हमें हमेशा कोई न कोई ऐसा जरूर मिलेगा जो हमसे अधिक धनी है या जिसने हमसे कम त्याग किया है—और फिर हम अपनी आत्मिक सुरक्षा की भावना उसी तुलना पर आधारित कर देते हैं। लेकिन यीशु का उद्देश्य हमें आरामदायक महसूस कराना नहीं है। बल्कि वह हमें आत्म-सन्तोष से बाहर बुलाता है और समर्पण के साथ उसका अनुसरण करने के लिए बुलाता है। सापेक्ष गरीबी कोई गुण नहीं है, वैसे ही जैसे कि सापेक्ष सम्पन्नता कोई दोष नहीं है। यीशु ने हमें यह प्रतिज्ञा दी है कि वह हमारी देखभाल करेगा, और हमें बुलाया है कि हम अपनी सुरक्षा उस कार्य में खोजें जो उसने हमारे लिए पूरा किया है—न कि उस कार्य में जो हम उसके लिए कर रहे हैं। दूसरों से तुलना करके उत्पन्न आत्म-सन्तोष के आगे मत झुकें। बल्कि यीशु के उस बुलावे को सुनें जो उसने बाद में पतरस को तब दिया जब पतरस ने पूछा कि यूहन्ना का जीवन उसके जीवन से अलग होगा या नहीं: “तू मेरे पीछे हो ले!” (यूहन्ना 21:22)।

भजन 73

◊ पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: 1 इतिहास 25–27; लूका 4:1-30

18 नवम्बर : मूल बात का सार

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18 नवम्बर : मूल बात का सार
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“जैसे मनुष्यों के लिए एक बार मरना और उसके बाद न्याय का होना नियुक्त है, वैसे ही मसीह भी बहुतों के पापों को उठा लेने के लिए एक बार बलिदान हुआ; और जो लोग उसकी बाट जोहते हैं उनके उद्धार के लिए दूसरी बार बिना पाप उठाए हुए दिखाई देगा।” इब्रानियों 9:27-28

अन्तिम और निश्चित आँकड़ा यही है कि हर एक व्यक्ति को मरना है। मृत्यु जीवन की एकमात्र सुनिश्चितता है। एक मसीही के रूप में, यद्यपि हम मृत्यु की घटना से डर सकते हैं, परन्तु हमें उसके परिणाम से डरने की आवश्यकता नहीं है।

हमें डरने की ज़रूरत इसलिए नहीं है, क्योंकि यीशु केवल हमारे सुखों में वृद्धि करने, हमें जीवन में सफलता या सांसारिक समृद्धि देने के लिए नहीं आया, बल्कि वह पापियों को उद्धार देने और न्याय से बचाने के लिए आया।

बाइबल सिखाती है कि जिन लोगों के नाम जीवन की पुस्तक में नहीं पाए जाते, उन पर परमेश्वर का न्याय और अनन्त दण्ड आएगा (प्रकाशितवाक्य 20:11-15)। तो फिर हम कैसे सुनिश्चित हो सकते हैं कि हमारे नाम उस पुस्तक में लिखे होंगे? इसका केवल एक ही उपाय है: प्रभु यीशु में विश्वास करना। हमें मसीह की ओर देखना है, जो खुले हृदय से उन सब को क्षमा करता है और धर्मी ठहराता है, जो मन फिराकर और विश्वास से उसके पास आते हैं। और यीशु के पास आना केवल बौद्धिक सहमति देना नहीं है—यद्यपि वह आवश्यक है। केवल मसीही सिद्धान्तों को समझना ही पर्याप्त नहीं है। हमें यह पहचानना होगा कि हमने परमेश्वर के साथ सही व्यवहार नहीं किया है। हमने उसे अस्वीकार किया है और उसका विरोध किया है। हमें अपने जीवन को उसकी प्रेमी प्रभुता के अधीन कर देना है और पूरी तरह उस पर निर्भर होना है जो मसीह ने क्रूस पर हमारे लिए किया, ताकि हम परमेश्वर के सामने स्वीकृत हो सकें।

मूल प्रश्न यह नहीं है कि क्या हम यीशु या बाइबल के बारे में कुछ तथ्य मानते हैं, या क्या हमने अपनी जीवनशैली को सुधार लिया है। असली सवाल यह है: क्या हम कभी आत्मिक रूप से इतने प्यासे हुए हैं कि हमने पुकारा हो, “हे प्रभु यीशु मसीह, मुझे अपना जीवन जल दे ताकि मैं फिर कभी प्यासा न रहूँ”?

लेकिन क्या होगा यदि यीशु हमें ठुकरा दे? क्या होगा यदि हमारा नाम जीवन की पुस्तक में दर्ज होने ही नहीं वाला? यीशु ने स्वयं यह प्रतिज्ञा करते हुए इस डर का उत्तर दिया: “जो कोई मेरे पास आएगा, उसे मैं कभी न निकालूँगा।” (यूहन्ना 6:37)

क्या आपने परमेश्वर के इस बुलावे की करुणा को पहचाना है? क्या आपने यीशु में शरण लेने के लिए परमेश्वर का बुलावा सुना है? क्या आप उसे हर दिन नए सिरे से सुनते हैं और उसके पंखों की छाया में शरण लेते हैं (भजन 57:1)? हम भजन लेखक के साथ कह सकें:

मैं जैसे था वैसे ही यीशु के पास आया,

थका हुआ, बोझिल और दुखी;

मैंने उसमें विश्राम का स्थान पाया,

और उसने मुझे आनन्दित कर दिया।[1]

क्योंकि यदि हमने पुत्र में शरण ली है, तो हम यह निश्चित तौर पर जान सकते हैं कि उसने हमारे पापों को अपनी मृत्यु में उठा लिया है, और जब वह लौटेगा, तब हमें भयावह दण्ड नहीं, बल्कि महिमामय स्वागत मिलेगा। और फिर हम यह सत्य सुन सकते हैं कि “मनुष्यों के लिए एक बार मरना नियुक्त है”, और फिर भी हमारा हृदय शान्त बना रह सकता है।

  भजन 49 पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: 1 इतिहास 22–24; लूका 3 ◊


[1] होराटियस बोनार, “आई हर्ड द वोयस ऑफ जीज़स सेय” (1846).

17 नवम्बर : आशिषें और श्राप

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17 नवम्बर : आशिषें और श्राप
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“फिर अपने परमेश्‍वर यहोवा की सुनने के कारण ये सब आशीर्वाद तुझ पर पूरे होंगे … परन्तु यदि तू अपने परमेश्‍वर यहोवा की बात न सुने, और उसकी सारी आज्ञाओं और विधियों के पालने में जो मैं आज सुनाता हूँ चौकसी नहीं करेगा, तो ये सब शाप तुझ पर आ पड़ेंगे।” व्यवस्थाविवरण 28:2, 15

मोआब के मैदानों में यरदन नदी के किनारे इस्राएली लोग अन्ततः उस देश में प्रवेश करने पर थे, जिसे परमेश्वर ने उन्हें देने की प्रतिज्ञा की थी। मूसा ने लोगों को अन्तिम बार सम्बोधित किया, यह सुनिश्चित करने की कोशिश करते हुए कि वे पिछली पीढ़ी की तरह अवज्ञा करके परमेश्वर के साथ अपने सम्बन्ध को खराब न करें। उसने उन्हें स्मरण कराया कि परमेश्वर ने अतीत में क्या कहा और क्या किया, और उसने उन्हें परमेश्वर के महान हस्तक्षेप के और वाचा निभाने वाली विश्वासयोग्यता के आधार पर परमेश्वर के लिए एक अलग किए हुए लोग बने रहने का आग्रह किया।

मूसा की शिक्षाओं के माध्यम से परमेश्वर ने अपने लोगों के सामने दो स्पष्ट विकल्प रखे—और अपेक्षाएँ बहुत ऊँची थीं। उसने उन्हें आशीर्वाद की एक प्रतिज्ञा दी और फिर एक चेतावनी दी। उसने उनसे एक सरल प्रश्न किया: वे कैसा जीवन जीने वाले हैं? क्या वे वाचा का पालन करेंगे और देश में आशीर्वादों का आनन्द लेंगे, या वे अवज्ञा करेंगे और उस देश से निकाल दिए जाएँगे?

जो लोग उस देश की सीमा पर एकत्रित हुए थे, उन्होंने शायद परमेश्वर के वचनों को सुनकर कहा होगा, अरे नहीं, ऐसी अवज्ञा तो हमसे कभी नहीं होगी! लेकिन कुछ सौ वर्षों के बाद हम उन्हें कहाँ पाते हैं? “बेबीलोन की नहरों के किनारे हम लोग बैठ गए, और सिय्योन को स्मरण करके रो पड़े . . . हम यहोवा के गीत को, पराए देश में कैसे गाएँ?” (भजन 137:1, 4)। विदेशी लोगों के बन्दी बनकर इस्राएली पीछे मुड़कर देखते हैं और सोचते हैं कि वे इस दशा तक कैसे पहुँच गए।

एक पतित संसार में जीते हुए प्राणी के रूप में आप और मैं बहुत ही असुरक्षित, प्रलोभन के खतरे में, और बार-बार परीक्षा में पड़ने के खतरे में बने रहते हैं। हम अवज्ञा से और परमेश्वर से दूर हो जाने से केवल एक निर्णय की दूरी पर होते हैं। हमें परमेश्वर की सहायक कृपा की अत्यन्त आवश्यकता है। दुख की बात यह है कि बहुत से लोग जो कभी समर्पित, प्रतिबद्ध और प्रतिज्ञा किए हुए देश की ओर बढ़ते प्रतीत होते थे, वे सिर्फ लड़खड़ाए नहीं, बल्कि अविश्वास में गिर पड़े। और हमारी सबसे बड़ी गलती यह सोच है, “अरे नहीं, यह तो मेरे साथ कभी नहीं होगा!”

दुष्ट एक झूठ फैलाना पसन्द करता है—कि परमेश्वर ने हमें अपना व्यवस्था-विधान और आज्ञाएँ इसलिए दी हैं ताकि वह हमारे जीवन को फीका बना दे, हमें आनन्द से वंचित कर दे, और हमारे दिन दुखों और पीड़ाओं से भर दे। यह सब झूठों में सबसे बड़ा झूठ है। परमेश्वर ने अपना वचन हमारे भले के लिए दिया है! पवित्रशास्त्र की सभी चेतावनियाँ इसलिए दी गई हैं कि जब हम विनाश के कगार पर खड़े हों तो हमें चेताएँ और हमें नियन्त्रण में रखें; पवित्रशास्त्र की सभी प्रतिज्ञाएँ इसलिए दी गई हैं कि जब हम भयभीत और अनिश्चित हों तो हमें सम्भालें; और पवित्रशास्त्र की सभी आज्ञाएँ इसलिए दी गई हैं कि हमें परमेश्वर के संसार में, परमेश्वर की उपस्थिति में, परमेश्वर की आशिषों से भरे जीवन में ले जाएँ। हमारी भलाई के लिए उसकी प्रतिबद्धता सबसे पूर्ण रूप से उसके पुत्र में प्रकट होती है, जो हमारी अवज्ञा के शाप को सहने के लिए आया, ताकि हम वह आशीष पा सकें जो केवल वही पाने के योग्य था।

क्या आप परमेश्वर से प्रेम करते हैं? क्या आप जानते हैं कि परमेश्वर आपसे प्रेम करता है? तो फिर उसकी चेतावनियों पर ध्यान दें, उसकी आज्ञाओं का पालन करें, और उसकी प्रतिज्ञाओं की सान्त्वनाओं को संजो कर रखें।

गलातियों 3:10-14

◊ पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: 1 इतिहास 19–21; लूका 2:22-52

16 नवम्बर : उद्देश्यपूर्ण काम का बुलावा

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16 नवम्बर : उद्देश्यपूर्ण काम का बुलावा
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“जो कुछ तुम करते हो, तन मन से करो, यह समझकर कि मनुष्यों के लिए नहीं परन्तु प्रभु के लिए करते हो; क्योंकि तुम जानते हो कि तुम्हें इस के बदले प्रभु से मीरास मिलेगी; तुम प्रभु मसीह की सेवा करते हो।” कुलुस्सियों 3:23-24

काम परमेश्वर की सृजनात्मक योजना का हिस्सा है, और इस कारण हमारे जीवन के उद्देश्य का भी एक अभिन्न अंग है।

काम पतन (पाप में गिरने) से पहले भी था—परमेश्वर ने आदम और हव्वा को अदन में इसलिए रखा था ताकि वे उसमें “काम करें और उसकी रक्षा करें” (उत्पत्ति 2:15)। हम ऐसे नहीं बनाए गए थे कि हम केवल बैठे रहें और कुछ न करें! बल्कि हम उस परमेश्वर के स्वरूप में बनाए गए हैं, जिसे काम करना और सृजन करना पसन्द है।

नए नियम के लेखक विश्वासियों से अपेक्षा करते हैं कि वे काम करें—न केवल हमारे सृष्टिकर्ता का अनुकरण करने के लिए, बल्कि इसलिए भी कि हम “आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए अच्छे कामों में लगे रहना सीखें ताकि निष्फल न रहें” (तीतुस 3:14)। “तन मन से” काम करने का यह बुलावा हमारी मानवीय क्षमता से परे की बात नहीं है। बल्कि यह एक निमन्त्रण है कि हम शान्तिपूर्वक जीवन बिताएँ, अपने कामों पर ध्यान दें, और अपने हाथों से परिश्रम करें (1 थिस्सलुनीकियों 4:11), ताकि हम न केवल अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति कर सकें, बल्कि उन लोगों की भी सहायता कर सकें जिन्हें विशेष रूप से सहायता की आवश्यकता है। हमारे जीवन की दैनिक गतिविधियाँ हमारे लिए ईश्वरीय प्रावधान हैं, जिनमें हम “तन मन से काम करते हैं, यह समझकर कि मनुष्यों के लिए नहीं परन्तु प्रभु के लिए करते हैं।” हमारे सभी दैनिक उत्तरदायित्वों और प्रतिबद्धताओं में—चाहे वे करोड़ों का निवेश करना हो या बच्चों की देखभाल करना, किसी फैक्ट्री की असेम्बली लाइन पर काम करना हो या खेत जोतना या बोर्डरूम में बैठना—हम उन्हें उन साधनों के रूप में देख सकते हैं जिनका उपयोग परमेश्वर अपने उद्देश्यों की पूर्ति और अपने नाम की महिमा के लिए करेगा।

परमेश्वर ने हमारे लिए जो सीमाएँ निर्धारित की हैं, उनके भीतर परिश्रम करने से हमारी यह चिन्ता समाप्त हो जाती है कि हमारे पास बैठा व्यक्ति क्या कर रहा है। आखिरकार, न तो हमें उनसे हिसाब लेना है और न ही उन्हें हमसे! परमेश्वर, जो उस काम में हमारी निष्ठा से प्रसन्न होता है जिसे उसने हमें सौंपा है, वही उस दिन पुरस्कार देगा जब हम उसके सामने खड़े होंगे। हमारे काम के बारे में हमारी सोच, हमारे काम के प्रति हमारा व्यवहार, और हमारे काम को लेकर परमेश्वर की स्वीकृति ही सबसे महत्त्वपूर्ण है, इसमें प्राथमिक रूप से हमारे बॉस, हमारे सहकर्मियों, या हमारी अपनी स्वीकृति मायने नहीं रखती।

पौलुस की शिक्षाओं में बचाव का कोई रास्ता नहीं है। यह सीधे-सीधे काम करने और मन लगाकर काम करने का आग्रह है। पवित्रशास्त्र में अन्य स्थान पर पौलुस तीमुथियुस को यह भी प्रोत्साहित करता है कि वह विश्वासियों को आदेश दे कि वे अपने परिवार वालों, विशेषकर अपने घर के सदस्यों की आवश्यकताओं की पूर्ति करें, “ताकि वे निर्दोष रहें” (1 तीमुथियुस 5:7)। इसका संकेत स्पष्ट है: जब परमेश्वर का अनुग्रह हमारे जीवन में कार्य कर रहा होता है, तो हम अपने आश्रितों और जरूरतमंदों की आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए प्रतिबद्ध रहते हैं।

आप परमेश्वर के स्वरूप में बनाए गए हैं और अच्छे कामों के लिए सृजे गए हैं। चाहे जीवन में आपकी स्थिति या अवस्था कुछ भी हो, आज आपके पास परमेश्वर की सृष्टि में काम करने का अवसर है। इस काम को तन मन से और अपनी सर्वोत्तम क्षमता से करें। किसी मनुष्य के बजाय परमेश्वर की राय को सर्वोपरि मानते हुए अपने काम को भक्ति के साथ करें। आपका काम चाहे कितना भी सामान्य, दोहराव वाला, या कठिन क्यों न हो, इसे आनन्द के साथ करें, क्योंकि ऐसा करते हुए आप मसीह की सेवा कर रहे हैं और उसके नाम की महिमा कर रहे हैं। यही बात किसी भी काम को महिमामय बना सकती है!

नीतिवचन 24:30-34

पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: 1 इतिहास 16–18; लूका 2:1-21 ◊

15 नवम्बर : पिता की कोमल देखभाल

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15 नवम्बर : पिता की कोमल देखभाल
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“इसलिए तुम चिन्ता करके यह न कहना कि हम क्या खाएँगे, या क्या पीएँगे, या क्या पहनेंगे। क्योंकि अन्यजाति इन सब वस्तुओं की खोज में रहते हैं, पर तुम्हारा स्वर्गिक पिता जानता है कि तुम्हें इन सब वस्तुओं की आवश्यकता है। इसलिए पहले तुम परमेश्‍वर के राज्य और उसके धर्म की खोज करो तो ये सब वस्तुएँ भी तुम्हें मिल जाएँगी।” मत्ती 6:31-33

परमेश्वर की सृष्टि में जीवों के रूप में, हम न तो भाग्य के भरोसे हैं और न ही संयोग की दया पर निर्भर हैं। हम किसी अंधी और निर्जीव शक्ति के बहाव में नहीं बहे जा रहे, और न ही हमें ज्योतिष, ग्रह-नक्षत्रों की चाल, या ऐसी अन्य भटकाने वाली बातों की चिन्ता करने की आवश्यकता है।

परन्तु जो लोग परमेश्वर को अपने स्वर्गिक पिता के रूप में नहीं जानते और उस पर विश्वास नहीं करते, उनके लिए यह संसार ऐसा ही प्रतीत होता है। इसलिए पवित्रशास्त्र स्पष्ट रूप से बताता है कि “अन्यजाति”—अर्थात वे लोग जिन्हें सच्चे परमेश्वर में कोई रुचि नहीं है—“इन सब वस्तुओं की खोज में रहते हैं।” ऐसे लोग निश्चित तौर पर नहीं जानते कि क्या कभी कोई सृष्टिकर्ता था, और यदि था भी, तो वह अब इस सृष्टि से नाता तोड़ चुका है। उनके विचारों में मानव इतिहास के सारे उतार-चढ़ाव केवल संयोग हैं—हम सभी एक विशाल, निर्जीव यन्त्र की पकड़ में फँसे हुए हैं।

यह एक अंधकारमय दृष्टिकोण है। परन्तु परमेश्वर का वचन हमें इससे भिन्न और आशाजनक सच्चाई बताता है। बाइबल के अनुसार, सब कुछ मसीह के द्वारा और मसीह के लिए रचा गया है, और वह अब भी अपनी सृष्टि में सक्रिय रूप से कार्य कर रहा है (कुलुस्सियों 1:16-17)। इस भाव से मत्ती 6:26–33 में परमेश्वर-पुत्र मानो हमसे यह कहता है: तुम भोजन, वस्त्र या अन्य किसी बात की चिन्ता क्यों करते हो? यह सब बातें अन्यजाति खोजते हैं। परन्तु तुम? तुम बस मुझ पर ध्यान लगाए रखो—मैं तुम्हारी देखभाल करूँगा। आकाश के पक्षी भी मेरी दृष्टि से छिपे नहीं हैं। खेत की घास तक को मैं अपने सामर्थ्य से वस्त्र देता हूँ। तो क्या मैं तुम्हारा ध्यान नहीं रखूँगा?

वास्तव में, मसीह और पिता की देखभाल की यह प्रतिज्ञा रोमियों 8:28 में अद्‌भुत रूप से प्रतिध्वनित होती है: “उनके लिए सब बातें मिलकर भलाई ही को उत्पन्न करती हैं; अर्थात् उन्हीं के लिए जो उसकी इच्छा के अनुसार बुलाए हुए हैं।” यदि हम मसीह में हैं, तो हमारे जीवन के हर दिन, हर इच्छा, हर आशा, हर पीड़ा, हर भय और हर असफलता—सब कुछ परमेश्वर की बुद्धिमान, अनुग्रहपूर्ण और प्रेमपूर्ण इच्छा के अनुसार कार्य में लाया जा रहा है।

यदि आप आज अकेले हैं, या बीती रात अकेले बिताई, या आप टूटे या कठिन सम्बन्धों की आशंका में आने वाले सप्ताह से भयभीत हैं—तो परमेश्वर के वचन को अपने हृदय में प्रवेश करने दें। वह आपके हृदय को पिता के प्रेम और उपस्थिति की गर्माहट से भर देगा। यदि आप आर्थिक चिन्ताओं से दबे हुए हैं, तो यीशु को आपके भय को शान्त करने दें। वह कहता है कि वह आपको वह सब कुछ देगा जिसकी आपको वास्तव में आवश्यकता है। यदि आप शारीरिक या मानसिक स्वास्थ्य की कठिनाइयों से जूझ रहे हैं—तो निश्चिन्त रहें: वह जानता है, वह परवाह करता है, और वह आपको पार ले जाएगा। चाहे कुछ भी हो, जीवन कितना भी कठिन क्यों न लगे—परमेश्वर स्वयं आपकी देखभाल करेगा, क्योंकि उसे आपकी चिन्ता है।

मत्ती 6:19-34

◊ पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: 1 इतिहास 13–15; लूका 1:57- 80

14 नवम्बर : परिवर्तन की वास्तविकता

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14 नवम्बर : परिवर्तन की वास्तविकता
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“न वेश्यागामी, न मूर्तिपूजक, न परस्त्रीगामी, न लुच्‍चे, न पुरुषगामी, न चोर, न लोभी, न पियक्‍कड़, न गाली देनेवाले, न अन्धेर करनेवाले परमेश्‍वर के राज्य के वारिस होंगे। और तुम में से कितने ऐसे ही थे, परन्तु तुम प्रभु यीशु मसीह के नाम से और हमारे परमेश्‍वर के आत्मा से धोए गए और पवित्र हुए और धर्मी ठहरे।” 1 कुरिन्थियों 6:9-11

मसीही आस्था का प्रमाण उसके सामर्थ्य में है। केवल मसीह का सामर्थ्य ही खोए हुए, शर्म से डूबे हुए पुरुषों और महिलाओं को परमेश्वर के पुत्र-पुत्रियाँ बना सकता है। ऐसा कोई अपराध या लज्जा नहीं है जो किसी व्यक्ति को परमेश्वर के क्षमा करने वाले अनुग्रह से वंचित कर सके।

जब पौलुस एक लम्बी, कुरूप पापों की सूची को समाप्त करता है, तो वह कहता है, “तुम में से कितने ऐसे ही थे।” यह वाक्य पछतावे की नहीं, बल्कि विजय की पुकार है। यह भूतकाल है, वर्तमान नहीं। क्यों? यीशु के रूपान्तरित करने वाले सामर्थ्य के कारण! कोई पुरुष स्वयं को नहीं बदल सकता; कोई स्त्री स्वयं को नहीं बदल सकती—परन्तु यीशु उन्हें बदल सकता है!

क्या हम वास्तव में विश्वास करते हैं कि सम्पूर्ण व्यक्तिगत रूपान्तरण सम्भव है? हम अक्सर लोगों को सतही समाधान देने का प्रयास करते हुए उनसे कहते हैं कि वे अनुग्रह से उद्धार तो पा गए हैं, लेकिन अब उन्हें अपने पिछले पापों के कारण जीवनभर लड़खड़ाते हुए चलना होगा, या यह कि अब उन्हें स्वयं को बदलने के लिए कड़ी मेहनत करनी होगी। यह सन्देश हमने कहाँ से सीखा?

क्या यीशु ने कभी किसी से कहा, मैं तुम्हें छूऊँगा और थोड़ा-बहुत बदल दूँगा—बाकी अब तुम्हारे ऊपर है? नहीं! उसने कहा, मैं तुम्हें अन्दर से बाहर तक बिल्कुल नया बना दूँगा। मैं तुम्हारा रूपान्तरण करूँगा, तुम्हें मुक्त करूँगा, तुम्हें बदल दूँगा। यही यीशु का सुसमाचार है। और यही गवाही कुरिन्थुस के मसीहियों की भी थी—वे पहले एक प्रकार के लोग थे: पाप में डूबे हुए, न्याय के पात्र। लेकिन फिर वे बदल दिए गए। अब वे भिन्न थे। तो यह रूपान्तरण कहाँ से आरम्भ होता है? अपने पाप को स्पष्ट रूप से देखने से।

यदि मैं स्वयं को पापी नहीं समझता, तो मैं स्वयं को उद्धार पाने योग्य कैसे समझूँगा? हमें अपनी विकृति की गहराई का सामना करना होगा, ताकि जब परमेश्वर का वचन हमें बताए कि यीशु जीवन की हर उलझन और कठिनाई से लोगों को बचाने आया और उन्हें भीतर से बदलने के लिए अपना आत्मा देना चाहता है, तो हम पूरे मन और दोनों हाथों से उसकी ओर बढ़ें। यही उद्धार है! यही रूपान्तरण है!

हर मसीही विश्वासी इस सच्चाई का जीवित प्रमाण है कि परमेश्वर जीवनों को बदलता है। हर जगह ऐसे पुरुष और महिलाएँ हैं जो मसीह की सृजनात्मक और जीवन-परिवर्तक सामर्थ्य के जीवित प्रमाण हैं। तो क्या हम ऐसी कलीसिया के लिए तैयार हैं, जिसके सदस्य पहले व्यभिचारी, व्यसनी, शराबी, और छल करने वाले लोग थे—जो अब मसीह में बदल दिए गए हैं? क्या हम यह स्वीकार करने को तैयार हैं कि हम भी पहले ऐसे ही थे, परन्तु अब परमेश्वर के अनुग्रह से बदल गए हैं? या हम केवल ऐसी कलीसियाएँ चाहते हैं जो बाहर से अच्छी तरह सजे हुए, “स्वीकार्य” लोगों से भरी हों, जिन्हें यीशु की ज़रूरत ही महसूस नहीं होती?

यीशु बचाता है और यीशु बदलता है। विश्वास के द्वारा, आप अब वह नहीं हैं जो पहले थे—और अगले महीने, अगले वर्ष, आप फिर कह सकेंगे: “मैं अब भी वैसा नहीं हूँ जैसा पहले था।” आपको कौन ऐसा लगता है जो पाप में इतना डूबा है कि वह मसीह के पास नहीं आ सकता? उसके लिए प्रार्थना करें कि परमेश्वर उसे रूपान्तरित करे। आपके जीवन का कौन सा भाग आपको ऐसा लगता है कि कभी नहीं बदलेगा? उसके लिए भी प्रार्थना करें कि परमेश्वर उसे रूपान्तरित करे। आप किसी को भी नहीं बदल सकते, यहाँ तक कि खुद को भी नहीं। लेकिन जो काम आप नहीं कर सकते, उसे करने के लिए मसीह सामर्थी है।

2 कुरिन्थियों 3:17 – 4:6

पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: 1 इतिहास 10–12; लूका 1:39-56 ◊

13 नवम्बर : प्रभु में सहमति

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13 नवम्बर : प्रभु में सहमति
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“मैं यूओदिया को भी समझाता हूँ और सुन्तुखे को भी, कि वे प्रभु में एक मन रहें। हे सच्चे सहकर्मी, मैं तुझ से भी विनती करता हूँ कि तू उन स्त्रियों की सहायता कर, क्योंकि उन्होंने मेरे साथ सुसमाचार फैलाने में, क्लेमेंस और मेरे अन्य सहकर्मियों समेत परिश्रम किया, जिनके नाम जीवन की पुस्तक में लिखे हुए हैं।” फिलिप्पियों 4:2-3

विभाजन कलीसियाओं को भीतर से खोखला कर देता है।

इसी कारण पौलुस ने फिलिप्पी की कलीसिया की दो स्त्रियों—युओदिया और सुन्तुखे—के आपसी मतभेद की खबर को गम्भीरता से लिया। उसने अपने पत्र में उन्हें समझाया कि “वे प्रभु में एक मन रहें।” और इस असहमति को सम्बोधित करते हुए प्रेरित पौलुस हमें मेल-मिलाप का एक उपयोगी आदर्श प्रस्तुत करता है। वह स्पष्ट करता है कि हमें यह याद रखना चाहिए कि हम “प्रभु में” अपने भाइयों और बहनों से जुड़े हुए हैं। यह वाक्यांश हमारी असली पहचान को दर्शाता है: हम अपने नहीं हैं; हम मसीह के हैं।

इसलिए पौलुस युओदिया और सुन्तुखे से आग्रह करता है कि वे “प्रभु में” अपनी एकता को याद करें और परमेश्वर की उस शिक्षा के अधीन हो जाएँ जो प्रेरितों के द्वारा आई थी—वैसे ही जैसे आज हम बाइबल के माध्यम से परमेश्वर के वचन के अधीन होते हैं। बाइबल यह स्पष्ट करती है कि मसीही जीवन में हमें पहले परमेश्वर से प्रेम करना है और उसकी सेवा करनी है। और जब हम उसे प्रसन्न करने का प्रयास करते हैं, तो वह हमारे हृदयों में ऐसा कार्य करता है कि हम अपने पड़ोसियों की भलाई के लिए उनकी सेवा करने की लालसा रखते हैं, ताकि उन्हें उन्नति मिले (रोमियों 15:2)।

जब हम यह भूल जाते हैं कि हम पूरी तरह मसीह के हैं, तो हम जल्दी ही अपने स्वार्थों को बढ़ावा देने लगते हैं, अपने उद्देश्यों को स्थापित करने लगते हैं, अपने अधिकारों की लड़ाई लड़ने लगते हैं, और अपने घमण्ड पर सवार होकर उनसे झगड़ने लगते हैं जो हमसे असहमत हैं। विश्वासियों के बीच कलह हमें अक्सर छोटी-छोटी बातों में उलझा देती है, जो केवल विवाद में पड़े लोगों की नहीं बल्कि पूरी कलीसिया की ऊर्जा को समाप्त कर देती हैं। परिणामस्वरूप, कलीसिया बाहर की ओर हाथ बढ़ाने की बजाय अन्दर की ओर केन्द्रित हो जाती है। यह अत्यन्त असंगत बात है कि हम जबरदस्ती अपनी बात मनवाने की कोशिश करें, जबकि हमारा उद्धारकर्ता कभी ऐसा नहीं करता था। यदि यीशु भी हमारी तरह स्वार्थी भाव से अपने बारे में सोचता, तो न तो वह देहधारण करता, न क्रूस पर मरता, न हमें क्षमा मिलती, और न ही स्वर्ग की कोई आशा होती।

हमें यह दिखावा नहीं करना चाहिए कि विश्वासियों के बीच असहमति नहीं होती—वह होती है। लेकिन छुड़ाए गए लोगों के समूह के रूप में हमें “प्रभु में” अपनी एकता की नींव पर खड़े होकर असहमतियों को हल करना है। हमारा ध्यान हमारे स्वयं पर केन्द्रित नहीं रह सकता। टूटे हुए सम्बन्धों को चंगा करने में हमें मसीह का अनुकरण करते हुए मेल-मिलाप की पहल करनी चाहिए।

यह हम सभी के लिए एक बुलाहट है। यदि आज आप युओदिया और सुन्तुखे की स्थिति में हैं, तो आपके लिए बुलावा स्पष्ट है, भले ही यह चुनौतीपूर्ण हो: “प्रभु में एक मन रहें।” चाहे और कुछ भी विभाजित करता हो, मसीह में आपकी एकता उससे कहीं अधिक गहरी है। और यदि आप ऐसी कलीसिया में हैं जहाँ युओदिया और सुन्तुखे हैं, तो आपसे भी वही भूमिका निभाने की अपेक्षा की गई है, जो पौलुस ने अपने “सच्चे साथी” से करने को कहा था: जो विभाजित हैं, उन्हें मेल कराने में सहायता करें। सच्चा प्रेम पहल करता है। सच्चा प्रेम हस्तक्षेप करता है। सच्चा प्रेम विभाजन को बढ़ने नहीं देता, बल्कि उस एकता के लिए प्रयास करता है जो कलीसिया को मजबूत करती है।

यूहन्ना 17:1-26

◊ पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: 1 इतिहास 7–9; लूका 1:21-38