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22 दिसम्बर : आलस्य के विरुद्ध चेतावनी

“मैं आलसी के खेत के पास से और निर्बुद्धि मनुष्य की दाख की बारी के पास से होकर जाता था,तो क्या देखा कि वहाँ सब कहीं कंटीले पेड़ भर गए हैं;और वह बिच्छू पौधों से ढँक गई है;और उसके पत्थर का बाड़ा गिर गया है . . . छोटी सी नींद,एक और झपकी,थोड़ी देर हाथ पर हाथ रख के और लेटे रहना. . .नीतिवचन 24:30-31, 33

कल्पना करें कि आप सड़क पर गाड़ी चला रहे हैं और एक ऐसे घर के पास से गुजरते हैं जो पूरी तरह से टूटा-फूटा है और जहाँ हर ओर झाड़ियाँ उग आई हैं। पहले तो आप यही सोचेंगे कि शायद यहाँ कोई नहीं रहता। लेकिन फिर आप एक टूटी खिड़की से किसी व्यक्ति को देखते हैं। आप सोचते हैं, शायद मालिक बीमार है और अपने घर की देखभाल नहीं कर पा रहा। फिर वह व्यक्ति बाहर आता है—और पूर्णतः स्वस्थ दिखाई देता है। तब आप समझ जाते हैं: वह केवल आलसी है।

इस नीतिवचन में इसी दृश्य को वर्णित किया गया है: एक आलसी व्यक्ति उस भूमि पर रहता है, और उसकी दाख की बारी उसके आलस्य की गवाही देती है।

आलसी लोग गरीबी और अपमान में जीने की इच्छा लेकर नहीं उठते। बल्कि जब उन्हें परिश्रम करने की चुनौती मिलती है, तो उनका रवैये में कुछ ऐसे लक्षण दिखाई देते हैं, जो हममें से कई लोग अपने भीतर पहचान सकते हैं यदि हम परमेश्वर के वचन के दर्पण में झाँकने को तैयार हों।

एक आलसी व्यक्ति केवल अपने बिस्तर का आनन्द नहीं लेता—वह मानो एक किवाड़ के समान उस पर झूलता रहता है। वह हिल-जुल तो बहुत करता है, परन्तु किसी वास्तविक कार्य की ओर कोई प्रगति नहीं करता (नीतिवचन 26:14)। वह किसी कार्य को करने से सीधे मना नहीं करता, बल्कि धीरे-धीरे, एक क्षण से दूसरे क्षण तक, उसे टालता जाता है—और अपने आप को धोखा देता है कि वह कभी-न-कभी उसे कर ही लेगा।

आलसी व्यक्ति बहाने बनाने में निपुण होता है। कार्य करने की इच्छा न होने के कारण, वह हमेशा कुछ न कुछ कारण खोज लेता है ताकि वह अपनी निष्क्रियता को जारी रख सके। कूड़ेदान बाहर फेंकना कोई कठिन कार्य नहीं है, परन्तु आलसी व्यक्ति उस सरल कार्य को भी टालने के लिए कोई-न-कोई तर्क गढ़ ही लेता है।

आश्चर्यजनक रूप से, आलसी व्यक्ति हमेशा तृप्ति की भूख में रहता है, क्योंकि उसकी आत्मा की स्थिति के कारण उसे वह कभी नहीं मिलती। वह सन्तोष को कहीं दूर “बाहर” खोजता है, परन्तु उसे कभी प्राप्त नहीं करता। आलसी व्यक्ति लालसा तो बहुत वस्तुओं की करता है, परन्तु प्राप्त कुछ भी नहीं करता, इसलिए नहीं कि वह इसमें सक्षम नहीं है, बल्कि इसलिए कि वह इसके लिए अनिवार्य परिश्रम नहीं करता। विश्राम की अधिकता में भी वह बेचैन रहता है।

जब आलस्य हमारे जीवन की पहचान बन जाता है, तो हम स्वयं को यह समझाने लगते हैं कि हम दस मील दौड़ने के लिए तैयार हैं, उस लेख को लिखना आरम्भ करने जा रहे हैं, या उस परियोजना को पूरा करने ही वाले हैं—लेकिन जब तक परमेश्वर का सामर्थ्य और अनुग्रह हमारी वास्तविकता को नहीं बदलते, तब तक ये बातें केवल कल्पनाओं में ही रहती हैं।

आलस्य को कभी छोटा या तुच्छ दोष समझने की भूल न करें। आलस्य कोई कमजोरी नहीं है, बल्कि एक पाप है। धीरे-धीरे यह हमारे पूरे जीवन को प्रभावित कर सकता है, और बिना हमें महसूस कराए, अपनी शक्ति में बढ़ता जाता है—और शैतान यही चाहता है कि हम निष्क्रियता में हार मान लें। आप किन क्षेत्रों में आलस्य के प्रति आकर्षित होते हैं? क्या कोई ऐसा कार्य है जिसे आप टाल रहे हैं या जिसके लिए आप बहाना बना रहे हैं? क्यों? क्या आप इस पाप का सामना करेंगे और परमेश्वर से माँगेंगे कि वह आपकी सहायता करे कि आप इस पाप से निर्दयता, अनिवार्यता और निरन्तरता के साथ निपटें?

2 थिस्सलुनीकियों 3:6-15

पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: नहेम्याह 10–11; लूका 20:27-47 ◊

21 दिसम्बर : अधीनता और दीनता

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21 दिसम्बर : अधीनता और दीनता
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“सदा सब बातों के लिए हमारे प्रभु यीशु मसीह के नाम से परमेश्‍वर पिता का धन्यवाद करते रहो। मसीह के भय से एक दूसरे के अधीन रहो।इफिसियों 5:20-21

जब लोग एक ऑर्केस्ट्रा का हिस्सा बनते हैं, तो वे अपनी व्यक्तिगत पहचान का कुछ अंश पीछे छोड़ देते हैं। एक सिम्फनी एक एकल प्रस्तुति नहीं होती। यद्यपि संगीतकार अपनी पहचान नहीं खोते, फिर भी वे स्वयं को उस समूह में समाहित कर देते हैं। एक समूह का सामूहिक स्वरूप किसी एक व्यक्ति की तुलना में अधिक महत्त्वपूर्ण होता है, और वह सामूहिक रूप से ऐसा कुछ उत्पन्न करता है जिसे कोई एकल संगीतज्ञ कभी उत्पन्न नहीं कर सकता।

पौलुस भी कुछ ऐसा ही विचार व्यक्त करता है जब वह लिखता है: “एक दूसरे के अधीन रहो”—हालाँकि यहाँ समूह कोई ऑर्केस्ट्रा नहीं, बल्कि कलीसिया है।

हालाँकि अधीनता जैसे शब्दों के प्रति हमारी प्रतिक्रियाएँ भिन्न-भिन्न हो सकती हैं, तौभी हमें यह स्वीकार करना होगा कि बाइबल इसे सीधा-सीधा और बार-बार उपयोग करती है। पौलुस के लिए कलीसिया की एकता और स्वास्थ्य इस बात पर निर्भर करते हैं कि मसीही विश्वासी अधीनता को सही रूप से समझें और इसे एक-दूसरे के प्रति व्यवहार में लाएँ।

विश्वासियों के परस्पर अधीन होने को गम्भीरता से लेना कैसा दिखता है? आंशिक रूप से इसका अर्थ यह है कि हम में से हर एक यह समझे कि हमारे पास अपने आप पर गर्व करने या किसी अन्य से श्रेष्ठ समझने का कोई कारण नहीं है। दूसरे शब्दों में, हम नम्रता धारण करके परस्पर अधीनता को प्रदर्शित करते हैं। यह कार्य हमारे अहंकार के कारण कठिन अवश्य होता है—जो हम सभी के लिए एक बड़ी चुनौती है, और जो उस संस्कृति में और अधिक तीव्र हो जाती है जो हमें लगातार अपने आपको सबसे आगे रखने के लिए उकसाती है।

परन्तु कलीसिया को ऐसी संस्कृति में भी अलग दिखना चाहिए। परमेश्वर की प्रजा के रूप में, हम जानते हैं कि परमेश्वर की सहायता के बिना तो हम सुबह को उठ भी नहीं सकते। सत्य यही है कि हम पूरी तरह से उस पर निर्भर हैं (प्रेरितों 17:24-25)। सुसमाचार ही सच्ची नम्रता की कुंजी है, क्योंकि यह हमें याद दिलाता है कि परमेश्वर ने यीशु में हमारे लिए वह कार्य किया है जिसकी हमें सबसे अधिक आवश्यकता थी और जिसे हम स्वयं कभी कर ही नहीं सकते थे।

सच्ची नम्रता आत्म-निन्दा नहीं है; यह स्वयं से स्वतन्त्रता है। यह स्वयं को भूलकर भी स्वयं होने की स्वतन्त्रता है। यह वह स्वतन्त्रता है जो इस सच्चाई से आती है कि हम अपनी दुनिया का केन्द्र नहीं हैं। जब आप इस प्रकार की नम्रता को ध्यान में रखते हैं, तो आप दूसरों के अधीन होने के लिए तैयार होते हैं—अपनी सम्पूर्णता को लेकर, दूसरों के हित को प्राथमिकता देते हुए, दूसरों के मार्गदर्शन में सेवा करने को तत्पर होते हैं। तब आपकी कलीसिया कुछ सुन्दर उत्पन्न कर सकती है—एक ऐसी मण्डली जो सुसमाचार को प्रकट करती है। इसलिए इस प्रतीक्षा में न रहें कि आपकी कलीसिया के अन्य लोग पहले ऐसे मसीही बनें। आज ही, नम्रता से संकल्प लें कि आप वह मसीही होंगे।

इफिसियों  4:1-16

◊ पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: नहेम्याह 7–9; लूका 20:1-26

20 दिसम्बर : अंगीकार और राहत

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20 दिसम्बर : अंगीकार और राहत
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“दाऊद ने [बतशेबा को]बुलवाकर अपने घर में रख लिया, और वह उसकी पत्नी हो गई, और उसके पुत्र उत्पन्न हुआ। परन्तु उस काम से जो दाऊद ने किया था यहोवा क्रोधित हुआ . . . तब यहोवा ने दाऊद के पास नातान को भेजा।” 2 शमूएल 11:27; 12:1

यदि हम अपने पाप को स्वयं ढाँकने की कोशिश करना छोड़ दें, तो परमेश्वर उसे ढाँकने के लिए तैयार रहता है।

दाऊद का बतशेबा के साथ व्यभिचार (या सम्भवतः बलात्कार) का पाप और फिर उस पाप को छिपाने के लिए ऊरिय्याह की हत्या की योजना, एक के ऊपर एक पाप थे। परन्तु ऐसा प्रतीत होता था कि उसकी योजना सफल हो गई थी। दाऊद ने बतशेबा से विवाह कर लिया और सब कुछ सामान्य लगने लगा। एक समय तक धोखे और मौन का वातावरण रहा। दाऊद सोचता था कि उसने सब कुछ सम्भाल लिया था। पाप अक्सर हमें इसी प्रकार धोखा देता है। परन्तु लोग जो हमारे विषय में सोचते हैं और परमेश्वर जो हमारे विषय में जानता है, वे दो भिन्न बातें होती हैं।

परमेश्वर वह जानता था जो लोग नहीं जानते थे। उसने नातान भविष्यद्वक्ता को राजा के पास भेजा। परन्तु नातान सीधे जाकर दाऊद पर दोषारोपण नहीं करता। वह उसे एक कहानी सुनाता है—एक धनी व्यक्ति ने, जिसके पास बहुत सी भेड़ें थीं, एक निर्धन व्यक्ति की एकमात्र भेड़ को छीन लिया। यह कहानी सुनकर दाऊद को उस निर्धन व्यक्ति के प्रति सहानुभूति और उस धनी व्यक्ति पर क्रोध आया। तब नातान ने वह घातक वाक्य कहा: “तू ही वह मनुष्य है!” (2 शमूएल 12:7)

“यहोवा ने दाऊद के पास नातान को भेजा।” यह छोटा सा वाक्य परम अनुग्रह के शब्दों से भरा है! यहोवा ने अपने सेवक दाऊद को उसके पाप में आराम से बसने नहीं दिया। यद्यपि अपने पाप का सामना करना राजा के लिए कठिन और अप्रिय था, फिर भी परमेश्वर ने नातान को इसलिए भेजा क्योंकि वह दाऊद से प्रेम करता था। परमेश्वर ने दाऊद को वह अनुग्रह दिया जिसकी वह पात्रता नहीं रखता था, और दाऊद ने नातान के वचनों के प्रति नम्रता और पश्चाताप के साथ प्रतिक्रिया दी। क्योंकि परमेश्वर ने हस्तक्षेप किया और दाऊद ने स्वीकार किया, इसलिए यह कहानी अपराध-बोध और निराशा में नहीं, बल्कि उद्धार और अनुग्रह में समाप्त हुई (भजन संहिता 32:5-6 देखें)। डेरिक किडनर लिखते हैं, “नीचे उतरने का हल्कापन और जो अनुग्रह वहाँ मिलता है . . . वह उस कीमत से कहीं अधिक है जो चुकानी पड़ी।”[1]

यह बात हमारे लिए भी उतनी ही सत्य है जितनी दाऊद के लिए थी। हमें डर लग सकता है कि यदि हमने अपने पाप को छिपाना छोड़ दिया, तो हमारी प्रतिष्ठा को क्षति पहुँचेगी। लेकिन यदि आप अपने जीवन में किसी प्रकार के अनैतिकता को जगह दे रहे हैं, तो यह कोई मायने नहीं रखता कि आप उसे दुनिया से कितनी अच्छी तरह छिपा सकते हैं। अन्ततः यह दुनिया कोई महत्त्व नहीं रखती: परमेश्वर आपके हृदय को जानता है। अपनी विश्वासयोग्यता के कारण ही परमेश्वर हमें खोजता है और हमें हमारी अवज्ञा और विद्रोह में शान्ति से बसने नहीं देता। यद्यपि हमारे पास नातान जैसा कोई भविष्यद्वक्ता नहीं है, हमारे पास परमेश्वर का वचन है, जो हमारे सामने खुला है: यह “जीवित, और प्रबल, और हर एक दोधारी तलवार से भी बहुत चोखा है . . . मन की भावनाओं और विचारों को जाँचता है। सृष्टि की कोई वस्तु उससे छिपी नहीं है” (इब्रानियों 4:12-13)। इसमें इन शब्दों को लिखने वाला भी शामिल है और इन्हें पढ़ने वाला भी शामिल है। परमेश्वर हमारे पापों को उजागर करता है, ताकि हम उन्हें उसके पास ले आएँ और वह अपने पुत्र के लहू से उन्हें ढाँक सके।

अब वह आपको किस बात की ओर इंगित कर रहा है? क्या आप उसके लिए कोई बहाना बना रहे हैं, उचित ठहराने की कोशिश कर रहे हैं, या छिपा रहे हैं? अब समय है कि आप नीचे उतर आएँ और इसे छिपाना बन्द कर दें। पाप की कीमत जितनी भी हो, क्षमा के लाभ उससे कहीं अधिक हैं।

2 शमूएल 11:1 – 12:25

पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: नहेम्याह 4– 6; लूका 19:28-48 ◊


[1] साम्स 1-72, किडनर क्लासिक कॉमैण्ट्रीज़ (1973; पुनः प्रकाशित आई.वी.पी., 2008), पृ. 151.

19 दिसम्बर : भविष्य की महिमा

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19 दिसम्बर : भविष्य की महिमा
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“विश्‍वास ही से यूसुफ ने, जब वह मरने पर था, तो इस्राएल की सन्तान के निकल जाने की चर्चा की, और अपनी हड्डियों के विषय में आज्ञा दी।” इब्रानियों 11:22

उत्पत्ति की पुस्तक यूसुफ की मृत्यु के साथ समाप्त होती है, लेकिन वह कहानी का अन्त नहीं था। बल्कि यह परमेश्वर के प्रावधान और उद्धार की कहानी का आरम्भ था, जो पूरी बाइबल में और आज हमारे जीवनों में भी जारी है।

यूसुफ ने इस पर विशेष ध्यान दिया कि उसकी मृत्यु के बाद उसके अवशेषों के साथ क्या होगा। यह किसी विकृत रुचि के कारण नहीं था, बल्कि यह दिखाने के लिए था कि परमेश्वर ने अतीत में कैसा प्रावधान किया था और भविष्य में छुटकारे की प्रतिज्ञा की थी। उसके अवशेष इस्राएल की भावी पीढ़ियों को उन प्रतिज्ञाओं की ओर इंगित करते थे, जो तब तक पूरी नहीं हुई थीं।

यूसुफ का जीवन कई अद्‌भुत परीक्षाओं और अनुभवों से भरा था—अपने भाइयों द्वारा विश्वासघात किया जाना, पोतीपर की पत्नी द्वारा झूठा आरोप लगाया जाना, फिरौन द्वारा सम्मानित किया जाना, मिस्र की राजसभा में ऊँचा स्थान पाना, अपने परिवार से पुनर्मिलन होना इत्यादि—लेकिन इब्रानियों की पत्री के लेखक ने इनमें से किसी को भी मुख्य रूप में नहीं चुना, बल्कि उसने उसके उस विश्वास को रेखांकित किया जो उसने भविष्य की आशा के लिए रखा था। क्यों? क्योंकि वह विश्वास अत्यन्त महत्त्वपूर्ण था।

यूसुफ नहीं चाहता था कि उसका परिवार मिस्र में अपनी जड़ें बहुत गहराई तक जमाए। वह जानता था कि प्रतिज्ञात देश आने वाला है। इसलिए उसने कोई भव्य अन्तिम संस्कार नहीं माँगा—केवल यह कहा कि उसके मृत शरीर पर लेप लगाकर मिस्र में एक पेटी में संरक्षित किया जाए (उत्पत्ति 50:22-26)। क्यों? क्योंकि वह नहीं चाहता था कि उसके मृत शरीर को दफनाया जाए। वह चाहता था कि उसका शरीर तैयार रहे कि जब समय आए, तब उसे प्रतिज्ञात देश में ले जाया जाए। वह जानता था कि वह पेटी अपने आप में यह स्मारक होगी कि प्रतिज्ञात देश की आशा उतनी ही निश्चित थी, जितनी परमेश्वर की कोई अन्य प्रतिज्ञा। जब भविष्य में कठिन दिन आएँगे—जैसा कि उसने कल्पना भी की होगी—तो वह चाहता था कि आने वाली पीढ़ियाँ उस प्रतिज्ञा की ओर देख सकें। वे उसके अवशेषों की पेटी की ओर देख सकते थे और कह सकते थे: यूसुफ निश्चय जानता था कि हम यहाँ से निकलेंगे। यदि वह निश्चित न होता, तो वह अपनी हड्डियों को इस प्रकार हमारे साथ न रखता।

आज, आपके पास यूसुफ के अवशेषों की पेटी नहीं है—आपके पास एक खाली कब्र है, जो आपको परमेश्वर के पिछले प्रावधान और आपके भविष्य की आशा की याद दिलाती है। मसीह ही “हमारे अतीत की सहायता और आने वाले वर्षों की आशा है।” वही “हमारा शाश्वत निवासस्थान” है।[1] उसी के कारण हम कठिन दिनों में जीवित रह सकते हैं, और अपने अन्तिम दिन में विश्वास के साथ और स्वर्ग की सुनिश्चित आशा के साथ मर सकते हैं, जो हमारा महान प्रतिज्ञात देश है।

  लूका 23:32-43

◊ पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: नहेम्याह 1–3; लूका 19:1-27


[1] आईज़क वॉट्स, “ओ गॉड, आवर हेल्प इन एजेस पास्ट” (1719).

18 दिसम्बर : इसकी सुनो

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18 दिसम्बर : इसकी सुनो
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“पतरस ने यीशु से कहा, ‘हे रब्बी, हमारा यहाँ रहना अच्छा है : इसलिए हम तीन मण्डप बनाएँ; एक तेरे लिए, एक मूसा के लिए, और एक एलिय्याह के लिए।’ क्योंकि वह न जानता था कि क्या उत्तर दे, इसलिए कि वे बहुत डर गए थे। तब एक बादल ने उन्हें छा लिया, और उस बादल में से यह शब्द निकला, “यह मेरा प्रिय पुत्र है, इसकी सुनो।’” मरकुस 9:5-7

पतरस के लिए यीशु के रूपान्तरण से पहले के दिन भावनाओं के उतार-चढ़ाव से भरे थे। एक क्षण वह घोषणा कर रहा था, “तू जीवते परमेश्वर का पुत्र मसीह है” (मत्ती 16:16), और अगले ही क्षण यीशु उसे डाँटते हुए कह रहा था, “हे शैतान, मेरे सामने से दूर हो! तू मेरे लिए ठोकर का कारण है; क्योंकि तू परमेश्‍वर की बातों पर नहीं, परन्तु मनुष्यों की बातों पर मन लगाता है” (पद 23)। पतरस उस ऊँचाई तक उठ चुका था जहाँ उसने उस पुरुष की सच्ची पहचान प्रकट की थी, जिसने उसे मनुष्यों का मछुआरा बनने के लिए बुलाया था; परन्तु फिर वह ऐसी गहराई तक गिर पड़ा कि जीवते परमेश्वर के पुत्र ने उसे यह कहकर ताड़ना दी कि वह दुष्ट से प्रेरित हो रहा है और पुत्र के कार्य में बाधा बन रहा है। लेकिन वह इससे भी नीचे गिरने वाला था और फिर उससे भी ऊँचा उठने वाला था (मत्ती 26:69-75; प्रेरितों 4:5-20)। यदि मेरे समान आपका मसीही जीवन भी उतार-चढ़ाव से भरा हुआ लगता है, तो पतरस का उदाहरण आपके लिए एक उत्साहजनक प्रेरणा हो सकता है।

मत्ती 17 में, पतरस अचानक खुद को एक पहाड़ पर रूपान्तरित और तेजोमय यीशु के साथ पाता है, जो मूसा और एलिय्याह के साथ बातचीत कर रहा था। स्वाभाविक रूप से, पतरस “न जानता था कि क्या उत्तर दे” क्योंकि वह और उसके दो साथी “बहुत डर गए थे” (मरकुस 9:6)। वह नहीं जानता था कि वह क्या कह रहा है (लूका 9:33)—लेकिन फिर भी वह बोल पड़ा!

उस महिमा की एक झलक ने पतरस को स्तब्ध कर दिया। वह प्रभु और पुराने नियम के इन दो महान भविष्यवक्ताओं के लिए झोंपड़ियाँ बनाने का सुझाव दे ही रहा था कि अचानक, जैसे यीशु के बपतिस्मा के समय हुआ था, स्वर्ग से एक स्वर आया जिसने उसे यह बताया कि इस दर्शन पर सही प्रतिक्रिया क्या होनी चाहिए: बस, पतरस! अब यीशु की सुनने का समय है। यह मेरा प्रिय पुत्र है, जिससे मैं प्रेम करता हूँ; इसकी सुनो।

यह परमेश्वर की लगातार पुकार है—हर समय, हर स्थान पर, हर व्यक्ति के लिए। परमेश्वर का वचन आज भी पवित्रशास्त्र के माध्यम से उतना ही जीवित और प्रभावी है, जितना तब था जब पतरस ने उसे रूपान्तरण पर्वत पर सुना था। जब हम बाइबल पढ़ते हैं और पवित्र आत्मा हमारे हृदयों में कार्य करता है, तो हमें वैसे ही स्वर्गिक वैभव की झलक और महिमा की अनुभूति मिल सकती है, जैसी पतरस, याकूब और यूहन्ना को मिली थी।

हम, पतरस की तरह, अपने मसीही जीवन को “कभी गहराइयों में डूबा हुआ . . . और कभी ऊँचाइयों को छूता हुआ पाते हैं।”[1] लेकिन जब परमेश्वर का अटल और शाश्वत वचन हमारे जीवन में प्रवेश करता है, तो वह हमें यीशु की ओर मोड़ता है—उस प्रिय पुत्र की ओर जो सदा पिता को प्रिय था और जो स्वयं को हमारे लिए प्रकट करता है। प्रश्न यह है: क्या हम उसकी सुनेंगे?

2 पतरस 1:16-21

पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: यहोशू 22–24; लूका 18:18-43 ◊


[1] ओक्टेवियस विनस्लो, सोल-डेप्थ्स ऐण्ड सोल-हाईट्स (बैनर ऑफ ट्रुथ, 2006), पृ. 1.

17 दिसम्बर : आवश्यक परीक्षाएँ

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17 दिसम्बर : आवश्यक परीक्षाएँ
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“हम क्लेशों में भी घमण्ड करें, यह जानकर कि क्लेश से धीरज . . . उत्पन्न होता है।” रोमियों 5:3

जीवन के किसी भी क्षेत्र में सही दृष्टिकोण अत्यन्त महत्त्वपूर्ण होता है। कला के क्षेत्र में, यह कलाकार को एक ऐसी छवि बनाने में सहायता करता है कि उसके द्वारा बनाया गया प्याला इतना वास्तविक लगता है कि मानो उसे अभी पानी से भर दिया जाए, या उसके द्वारा बनानी गई कुर्सी इतनी वास्तविक लगती है कि वह हवा में झूलती हुई नहीं बल्कि जमीन पर टिकी हुई प्रतीत होती है। इसी प्रकार, जीवन की परीक्षाओं में भी सही प्रतिक्रिया देने के लिए सही दृष्टिकोण आवश्यक है। यदि हम इनका सही अर्थ नहीं समझते, तो हम इनका सामना भी सही तरीके से नहीं कर सकते।

परीक्षाएँ हमारे विश्वास को परखने का साधन हैं जिनके द्वारा यह परखा जाता है कि क्या हम केवल यीशु में भरोसा रखते हैं या नहीं। ये यह भी निर्धारित करने में सहायता करती हैं कि हमारा विश्वास सच्चा है या दिखावटी? जब जीवन सुचारू रूप से चलता है, तो आत्मविश्वास महसूस करना आसान होता है। लेकिन जब समस्याएँ सिर उठाती हैं—जब परिवार बिखरने लगता है, जब शरीर या मन कमजोर हो जाता है, जब हमारी आशाएँ टूट जाती हैं—तब हमें पता चलता है कि हमारा विश्वास कितना दृढ़ है। और जब परीक्षाओं में हमारा विश्वास सच्चा सिद्ध होता है, तो हमें आनन्द होता है, क्योंकि ऐसा विश्वास “आग से ताए हुए नाशवान सोने से भी कहीं अधिक बहुमूल्य है” (1 पतरस 1:7)।

कठिनाइयाँ हमारे विश्वास की वृद्धि को परखने में भी सहायता करती हैं—कि हम बढ़ रहे हैं या रुक गए हैं। निराशाएँ और आँसू अक्सर हमें आत्मिक रूप से आगे बढ़ाते हैं, क्योंकि तब हम परमेश्वर के वचन को उन तरीकों से लागू करने लगते हैं, जिनकी हमने पहले कल्पना भी नहीं की थी। हम मसीह के अतुलनीय मूल्य को उन तरीकों से समझने लगते हैं, जिन्हें हम पहले कदाचित नहीं समझते थे। एक लेखक ने लिखा है, “कष्टों की आँधी मिथ्या विश्वास, कपट और सन्देह की भूसी को उड़ा देती है, और केवल वही बचता है जो सच्चा और शुद्ध चरित्र होता है।”[1]

परीक्षाएँ हमें सहनशीलता विकसित करने में भी सहायता करती हैं। मसीही जीवन कुछ सौ मीटर की दौड़ नहीं, बल्कि जीवनभर चलने वाली मैराथन है। मैराथन धावकों को कई कठिन मीलों से गुजरना पड़ता है, जहाँ वे थकान और पीड़ा महसूस करते हैं, लेकिन वे दौड़ जारी रखते हैं। उन्हें आश्चर्य नहीं होता कि यह कठिन क्यों है; वे पहले से जानते हैं कि ऐसा होगा। लेकिन वे यह भी जानते हैं कि इन कष्टों के पार ही विजय का मुकुट है। इसी तरह, जीवन में हमें मिलने वाली परीक्षाएँ हमें आत्मिक रूप से मजबूत बनाती हैं, ताकि हम अपनी दौड़ अच्छी तरह पूरी कर सकें।

यदि आप किसी ऐसे मसीही को देखें, जिसकी आँखें कोमल और हृदय दयालु है, तो आपको लगभग निश्चित रूप से यह पता चलेगा कि उन्होंने यह विनम्रता और करुणा कठिन परीक्षाओं के माध्यम से प्राप्त की है। हम अक्सर बिना परिश्रम के अच्छे परिणाम चाहते हैं, लेकिन ऐसा कभी नहीं होता। परमेश्वर आमतौर पर हमारे विश्वास को दुखों की मिट्टी में ही उगने देता है।

प्रश्न यह है: “क्या मैं इस पर विश्वास करता हूँ?” यदि आपका उत्तर हाँ है, तो यह आपके दृष्टिकोण और जीवन की कठिनाइयों के प्रति आपकी प्रतिक्रिया को पूरी तरह बदल देगा। परीक्षाएँ अब भी आपको पीड़ा, भय और अनिश्चितता से भर सकती हैं, लेकिन साथ ही, आप उन्हें आनन्द के साथ स्वीकार कर पाएँगे, यह जानते हुए कि वे आपके आत्मिक धैर्य को विकसित कर रही हैं और आपको अन्त तक पहुँचने की शक्ति दे रही हैं।

1 पतरस 1:3-9

◊ पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: यहोशू 19–21; लूका 18:1-17


[1] जेम्स बी. ऐडमसन, दि एपिस्टल ऑफ जेम्स, द न्यू इण्टरनैशनल कॉमैण्ट्री ऑन द न्यू टेस्टामेण्ट (अर्डमंस, 1976), पृ. 54.

16 दिसम्बर : दया वहाँ महान थी

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16 दिसम्बर : दया वहाँ महान थी
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“क्योंकि हम भी पहले निर्बुद्धि, और आज्ञा न मानने वाले, और भ्रम में पड़े हुए और विभिन्न प्रकार की अभिलाषाओं और सुख-विलास के दासत्व में थे, और बैर भाव, और डाह करने में जीवन व्यतीत करते थे, और घृणित थे, और एक दूसरे से बैर रखते थे। पर जब हमारे उद्धारकर्ता परमेश्‍वर की कृपा और मनुष्यों पर उसका प्रेम प्रगट हुआ, तो उसने हमारा उद्धार किया; और यह धर्म के कामों के कारण नहीं, जो हम ने आप किए, पर अपनी दया के अनुसार नए जन्म के स्नान और पवित्र आत्मा के हमें नया बनाने के द्वारा हुआ।” तीतुस 3:3-5

यदि आपके घर में आग नहीं लगी है, तो आपको अग्निशमन दल की जरूरत नहीं है; उसी प्रकार, यदि आप पूरी तरह स्वस्थ हैं, तो कोई डॉक्टर आपको बेवजह ड्रिप नहीं लगाएगा। यह निरर्थक होगा! इसी तरह, जब तक हमें वास्तव में यह एहसास नहीं होता कि हमें क्षमा की आवश्यकता है, तब तक परमेश्वर के अनुग्रह और दया की कहानी हमारे लिए कोई विशेष अर्थ नहीं रखती। हमें यह अप्रासंगिक लगती है।

कई बार हम यह गलती कर बैठते हैं कि दूसरों की स्थिति देखकर तो हम महसूस करते हैं कि उन्हें क्षमा की बहुत अधिक आवश्यकता है, लेकिन वहीं हम क्षमा की अपनी जरूरत को अनदेखा कर देते हैं। हम मन ही मन सोचते हैं (चाहे हम इसे स्वीकार न करें), “धन्यवाद परमेश्वर, मैं उनके जैसा नहीं हूँ।” लेकिन परमेश्वर के अनुग्रह से, हमें जल्दी ही यह एहसास होता है कि हम भी कभी-कभी कठोर हो जाते हैं, हम भी ऐसी बातें बोल देते हैं और ऐसे काम कर देते हैं जो नहीं करने चाहिएँ, या हम वे काम करने में चूक जाते हैं, जो हमें करने चाहिएँ। जब हम इस अपराध-बोध को महसूस करते हैं, तब हमें अपने लिए क्षमा की आवश्यकता समझ में आती है, और जब हमें वे लोग क्षमा करते हैं, जिनका हमने अपमान किया था, तो हम कृतज्ञता से भर जाते हैं।

क्षमा का आनन्द प्राप्त करने से पहले हमें अपने पाप की वास्तविकता को स्वीकार करना आवश्यक है। सबसे पहले, हमें स्वयं को सही दृष्टिकोण से देखना होगा: हम स्वभाव से खोई हुई भेड़ें हैं, परमेश्वर के विरुद्ध विद्रोही हैं, और खाली पात्र हैं जिन्हें भरने की आवश्यकता है। हमें यह स्वीकार करना होगा कि चाहे हम मसीही जीवन में कितना भी आगे क्यों न बढ़ जाएँ, और चाहे परमेश्वर का आत्मा हमें कितना भी बदल दे, हम कभी भी अनुग्रह की आवश्यकता से परे नहीं हो सकते, क्योंकि हम अपनी पापमय प्रकृति से कभी पूरी तरह मुक्त नहीं होते। जब तक हमें यह एहसास नहीं होता कि हमारे पापों के लिए हमारा क्या परिणाम होना चाहिए था, तब तक हम इस अद्‌भुत सत्य के आगे नहीं झुकते कि एक सिद्ध उद्धारकर्ता ने हमारे स्थान पर प्राण दिए और हमारे समस्त ऋण को चुका दिया ताकि हम परमेश्वर की पूर्ण क्षमा प्राप्त कर सकें।

हमारी सबसे बड़ी आवश्यकता है कि हम निरन्तर विश्वास और पश्चाताप के साथ मसीह की ओर मुड़ते रहें। हम चाहे मसीही जीवन में कहीं भी हों, हम सभी को प्रार्थना करनी चाहिए कि परमेश्वर हमें स्वयं के बारे में और हमारे उद्धारकर्ता के बारे में सत्य प्रकट करे। फिर, जैसे-जैसे हम यह समझते जाएँगे कि हम वास्तव में क्या पाने के योग्य थे, वैसे-वैसे हम अपने उद्धारकर्ता से और अधिक प्रेम करने लगेंगे। हम परमेश्वर के प्रेम और यीशु के कार्यों से विस्मित होते रहेंगे।

अतः अभी एक क्षण रुकें। परमेश्वर से प्रार्थना करें, “मुझे मेरा वास्तविक स्वरूप दिखा,” और अपने पापों पर विचार करें। फिर प्रार्थना करें, “मुझे मेरा उद्धारकर्ता दिखा,” और उसकी दया और अनुग्रह की वास्तविकता में आनन्दित हों। तब उसकी करुणा और दया आपके हृदय को पूरी तरह भर देगी, और आप आनन्दपूर्वक इस गीत को गा पाएँगे:

दया वहाँ महान थी, और अनुग्रह भरपूर था;

क्षमा वहाँ मुझ पर अपार थी;

वहाँ मेरे बोझिल हृदय को स्वतन्त्रता मिली

कलवरी पर।[1]

इफिसियों  2:1-10


[1] विलियम आर. न्यूएल, “ऐट कैलवरी” (1895).

15 दिसम्बर : धर्मी क्यों दुख उठाते हैं

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15 दिसम्बर : धर्मी क्यों दुख उठाते हैं
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“उससे पहले कि मैं दुखित हुआ,मैं भटकता था;परन्तु अब मैं तेरे वचन को मानता हूँ . . . मुझे जो दुख हुआ वह मेरे लिए भला ही हुआ है, जिससे मैं तेरी विधियों को सीख सकूँ।” भजन 119:67, 71

जब हम अपने जीवन में या दूसरों के जीवन में दुखों का सामना करते हैं, तो अक्सर यह प्रश्न उठता है: हम जो परमेश्वर में विश्वास रखते हैं, हमें अब भी कष्ट क्यों सहने पड़ते हैं?

क्या परमेश्वर हमसे प्रेम नहीं करता? हमारे दुखों में उसकी क्या योजना हो सकती है?

जब बाइबल पीड़ा और कष्ट के विषय में बात करती है, तो वह इस सत्य को स्थापित करती है कि परमेश्वर भला और सर्वशक्तिमान है तथा उसकी एक शाश्वत योजना है—वह एक ऐसी प्रजा को रच रहा है जो पूरी तरह उसकी अपनी हो, उन्हें अपने पुत्र के स्वरूप में ढाल रहा है और उन्हें महिमा तक सुरक्षित पहुँचा रहा है (तीतुस 2:14; रोमियों 8:29; 2 तीमुथियुस 4:18)। इस उद्देश्य की पूर्ति के लिए जो भी आवश्यक होगा, परमेश्वर वह करेगा—भले ही उसमें अस्थायी दुखों की अनुमति क्यों न शामिल हो।

यहाँ कुछ कारण दिए गए हैं कि दुख किस प्रकार हमें लाभ पहुँचा सकता है:

  • दुख सामान्यता लाता है। अधिकांश पीड़ा केवल इस असिद्ध, पतित संसार में जीने की वास्तविकता है। हम सभी को पीड़ा, बीमारी और शोक का अनुभव होता है। धर्मी और अधर्मी दोनों ही सूर्य की रोशनी देखते हैं और वर्षा का अनुभव करते हैं (मत्ती 5:45)। उसी प्रकार, दोनों ही अपने-अपने जीवन में दुखों का सामना करते हैं।
  • दुख सुधारात्मक होता है। जिस प्रकार एक पिता अपने बच्चों को अनुशासित करता है ताकि वे सही कार्य करना सीखें, उसी प्रकार परमेश्वर कभी-कभी हमें सही मार्ग पर वापस लाने के लिए दुखों का उपयोग करता है (इब्रानियों 12:5-13)।
  • दुख रचनात्मक होता है। यह केवल हमें सुधारने के लिए नहीं, बल्कि हमारे चरित्र को भी मजबूत करने के लिए कार्य करता है (याकूब 1:2-5)। क्या आपने कभी किसी को देखकर सोचा है, “यह व्यक्ति इतना आशावान कैसे हो सकता है? वह मेरे टूटे हुए मन की इतनी गहराई से समझ कैसे रखता है?” यह सम्भवतः इसलिए है क्योंकि उन्होंने दुखों का सामना किया, उनसे सीखा, और इसके द्वारा दूसरों की परवाह करना जाना।
  • दुख महिमामय होता है। परमेश्वर हमेशा दुखों के माध्यम से अपनी महिमा प्रकट करता है, चाहे वह वर्षों, दशकों, या पीढ़ियों बाद ही क्यों न हो। यूहन्ना 9 में जन्म से अन्धे व्यक्ति के साथ ऐसा ही हुआ था—परमेश्वर ने उसकी पीड़ा का उपयोग अपने सामर्थ्य के एक अद्‌भुत प्रमाण के रूप में किया। कई बार हम अपने कष्टों के पीछे कारण नहीं समझ पाते, लेकिन जीवन के किसी मोड़ पर हमें यह एहसास हो सकता है, “ओह, इसलिए मुझे यह कष्ट सहना पड़ा—ताकि इस क्षण में परमेश्वर की महिमा प्रकट हो।
  • दुख लौकिक होता है। हालाँकि हर दुख किसी महान आध्यात्मिक युद्ध का हिस्सा नहीं होता, फिर भी कुछ दुख निश्चित रूप से ऐसे होते हैं। अय्यूब इसका सबसे गहन उदाहरण है—परमेश्वर ने उसे शैतान के सामने यह दिखाने के लिए चुना कि एक व्यक्ति परमेश्वर से केवल इसलिए प्रेम कर सकता है कि वह कौन है, न कि इसलिए कि वह उससे क्या प्राप्त कर सकता है (अय्यूब 1)।

सत्य यह है कि अपने जीवन में हम दुखों से नहीं बच सकते। लेकिन हमें दुखों में निराश होने की आवश्यकता नहीं है। हम परमेश्वर की महान योजनाओं को स्मरण कर सकते हैं। अन्त में, हमें यह नहीं पूछना चाहिए, “क्यों?” बल्कि हमें यह पूछना चाहिए, “क्या मैं…?” क्या मैं परमेश्वर की प्रतिज्ञाओं पर विश्वास करूँगा? क्या मैं उसकी योजना को अपनाऊँगा? क्या मैं उस पर भरोसा रखूँगा?

अय्यूब 1

◊ पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: यहोशू 13–15; लूका 17:1-19

14 दिसम्बर : योग्य उद्धारकर्ता

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14 दिसम्बर : योग्य उद्धारकर्ता
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“जब समय पूरा हुआ, तो परमेश्‍वर ने अपने पुत्र को भेजा जो स्त्री से जन्मा, और व्यवस्था के अधीन उत्पन्न हुआ, ताकि व्यवस्था के अधीनों को मोल लेकर छुड़ा ले, और हम को लेपालक होने का पद मिले।” गलातियों 4:4-5

किसी संस्कृति की मान्यताओं का एक अच्छा नमूना प्राप्त करने का सबसे सरल तरीका है—बच्चों से बात करना। उदाहरण के लिए, एक बार जब एक ब्रिटिश बच्चे से पूछा गया कि यीशु कौन था, तो उसने उत्तर दिया, “वह वही था जो अमीरों को लूटकर गरीबों में बाँटता था!” (ऐसा प्रतीत होता है कि उसने यीशु और उनके शिष्यों को रॉबिन हुड और उनके साथियों से मिला दिया था!) इसी तरह, जब किसी अन्य बच्चे से पूछा गया, “एक मसीही कौन होता है?” तो उसने उत्तर दिया, “क्या वे वही लोग नहीं हैं जो अपनी सब्जियाँ खुद उगाते हैं?”

वर्ष के इस समय में, जब कई लोग ग्यारह महीनों तक परमेश्वर के बारे में अधिक नहीं सोचते, वे स्वयं को यीशु के जन्म के कारणों पर विचार करते हुए पाते हैं। हमारे कई मित्र, सहकर्मी और परिवारजन शायद यही कहेंगे कि यीशु एक रहस्यमयी व्यक्ति है। ये प्रतिक्रियाएँ हमें यह याद दिलाने के लिए पर्याप्त हैं कि मसीही विश्वास का सन्देश हमारे पड़ोसियों के लिए उतना स्पष्ट नहीं है जितना शायद हम सोचते हैं। यदि हमें दूसरों से यह सन्देश साझा करना है, तो पहले यह हमारे अपने हृदय में स्पष्ट और मूल्यवान होना चाहिए।

यीशु अन्य धार्मिक, ऐतिहासिक और मानवता के महान व्यक्तियों से अलग है, क्योंकि केवल वही इस संसार का उद्धारकर्ता बनने के योग्य है। प्रेरित पौलुस ने उसके आगमन को कोई आकस्मिक हस्तक्षेप नहीं माना, बल्कि इसे एक दिव्य नियुक्ति बताया। जब पौलुस कहता है, “परमेश्वर ने अपने पुत्र को भेजा,” तो इसका अर्थ यह है कि यीशु को उसकी पूर्व विद्यमान अवस्था से भेजा गया था। यीशु का जीवन तब आरम्भ नहीं हुआ जब वह बैतलहम में “एक स्त्री से जन्मा”—बल्कि वह तो समय के आरम्भ से पहले से विद्यमान था (यूहन्ना 1:1-3)। अपने परमेश्वरत्व को छोड़े बिना, उसने मानव रूप धारण किया, “व्यवस्था के अधीन जन्मा,” पिता के प्रति पूर्ण और सिद्ध आज्ञाकारिता को पूरा किया—जो सम्पूर्ण मानव इतिहास में केवल वही कर सका।

यदि परमेश्वर हमें बचाने वाला है, तो उद्धारकर्ता को स्वयं परमेश्वर होना चाहिए। यदि मनुष्य ने पाप किया है और उसे ही दण्ड भुगतना चाहिए, तो उद्धारकर्ता को मनुष्य भी होना चाहिए। और यदि वह मनुष्य जो पाप का दण्ड वहन करता है, स्वयं निष्पाप होना चाहिए, तो यीशु मसीह के अलावा और कौन इन योग्यताओं को पूरा करता है? केवल वही परमेश्वर के उद्धार की योजना को पूरा करने के लिए अनोखे रूप से योग्य है।

कोई और अच्छा न था,

जो पाप की कीमत चुका सके;

केवल उसी ने स्वर्ग का द्वार खोला,

और हमें भीतर आने दिया।[1]

यीशु कौन है? वह परमेश्वर का पुत्र है, जो मनुष्य के रूप में जन्मा। वह सिद्ध व्यवस्था-पालक है, जिसने उन लोगों को स्वतन्त्र करने के लिए अपने प्राण दिए जो व्यवस्था का पालन नहीं कर सके। फिर एक मसीही कौन है? वह व्यक्ति जो पाप के दण्ड से मुक्त किया गया है और परमेश्वर के परिवार में अपना लिया गया है। यह वह सन्देश है जिसे हमें प्रतिदिन स्वयं को स्मरण दिलाना चाहिए और यह प्रार्थना करनी चाहिए कि हमें इसे किसी और के साथ साझा करने का अवसर मिले। क्योंकि यह संसार का सबसे चौंकाने वाला और सबसे महिमामय सन्देश है।

गलातियों 3:23 – 4:7

पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: यहोशू 10–12; लूका 16 ◊


[1] सेसिल फ्रांसिस एलेक्ज़ेण्डर, “देयर इज़ ए ग्रीन हिल फार अवे” (1848).

13 दिसम्बर : बहुतों की छुड़ौती

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13 दिसम्बर : बहुतों की छुड़ौती
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“क्योंकि मनुष्य का पुत्र इसलिए नहीं आया कि उसकी सेवा टहल की जाए, पर इसलिए आया कि आप सेवा टहल करे, और बहुतों की छुड़ौती के लिए अपना प्राण दे।” मरकुस 10:45

मुझे बिल भरना अच्छा लगता है। शायद मुझे बिलों का आकार या उनकी बारम्बारता पसन्द न हो, परन्तु जब वे पूर्ण रूप से चुका दिए जाते हैं, तो वह अद्‌भुत अनुभूति होती है। पुराने समय में जब बिल आमतौर पर दफ्तर में जाकर भरे जाते थे, तो मुझे विशेष सन्तोष होता था जब मैं अपना बिल भुगतान के साथ काउण्टर पर देता और वह वापस PAID की मुहर के साथ लौटता था।

इन पदों में इस छोटे से वाक्य के माध्यम से यीशु अपनी मृत्यु की ओर संकेत करता है: “बहुतों की छुड़ौती के लिए।” पुराने नियम के कुछ उदाहरण यीशु द्वारा “छुड़ौती” शब्द के उपयोग का सन्दर्भ प्रदान करते हैं।

यहूदी व्यवस्था-विधान के अनुसार, यदि किसी मनुष्य का बैल किसी को मार डालता था, तो बैल और उसका स्वामी दोनों मृत्यु-दण्ड के अधिकारी होते थे। परन्तु यदि स्वामी पर छुड़ौती का दण्ड लगाया जाता, तो वह उस धनराशि को देकर अपने प्राणों को छुड़ा सकता था (निर्गमन 21:29–30)। अर्थात्, बैल का स्वामी एक निश्चित मूल्य देकर अपने जीवन को वापिस खरीद सकता था। यही बात उस स्थिति में भी लागू होती थी जब किसी परिजन को दासत्व से मुक्त कराना होता या किसी खेत या सम्पत्ति को बन्धक से छुड़ाना होता (लैव्यव्यवस्था 25 देखें)। इन सभी उदाहरणों में छुड़ौती का अर्थ होता था एक निर्णायक और मूल्यवान हस्तक्षेप, जो किसी को बन्धन से मुक्ति दिलाता था।

पुराने नियम की ये सभी परिस्थितियाँ भौतिक समस्याएँ थीं। किन्तु यीशु जिस बात की ओर संकेत कर रहा था, वह नैतिक संकट था। हम पाप के अधीन हैं और हमने परमेश्वर को ठेस पहुँचाई है। यीशु ने स्पष्ट किया कि केवल उसका निर्णायक हस्तक्षेप—हमारे जीवन के लिए दिया गया यह अनमोल मूल्य—ही हमें स्वतन्त्र कर सकता है और सम्पूर्ण बना सकता है। जैसा कि भजन का लेखक कहता है: “उसने मेरे पाप और दुख अपने ऊपर ले लिए, उन्हें अपना ही बना लिया।”[1]

मसीह हमारी छुड़ौती है। उसने “जो हमारे लिए शापित बना, हमें मोल लेकर व्यवस्था के शाप से छुड़ाया” (गलातियों 3:13), ताकि जब हम उस पर विश्वास करें, तो बन्धन से मुक्त हो सकें। अपनी मृत्यु के द्वारा, यीशु ने उन सभी पर लगाए गए न्याय को पूर्ण रूप से चुकता कर दिया जो उस पर विश्वास करते हैं। जब उसने पुकारा, “पूरा हुआ” (यूहन्ना 19:30), तो उसने यूनानी शब्द टेटेलेस्टाई कहा, जो उस समय के बिलों पर यह दिखाने के लिए लिखा जाता था कि वह पूरा चुकता हो गया है। अपने पुत्र के पुनरुत्थान में पिता ने उस भुगतान की रसीद प्रदान की। वह ऋण, जो हमारे विरुद्ध न्यायपूर्वक खड़ा था और जो हमारे सामर्थ्य से बाहर था, अब स्पष्ट रूप से मुहरबन्द है: “चुका दिया गया है।”

कई बार शत्रु हमें दोष देगा, और हमारा अपना हृदय हमें दोषी ठहराएगा: “क्या तुम वास्तव में क्षमा किए गए हो? यह पाप तो बहुत अधिक है! क्या वास्तव में परमेश्वर तुमसे प्रेम करता है? क्या वास्तव में तुम्हारे लिए अनन्त महिमा में कोई स्थान है?” जब आप ऐसी फुसफुसाहटें सुने, तो स्मरण करें कि मसीह न्याय के सिंहासन तक गया और आपके विरुद्ध खड़ा पूरा लेखा-जोखा चुकता कर दिया। पिता ने उसे मृतकों में से जीवित किया; इसलिए आप इस सत्य में पूर्ण सुरक्षा पा सकते हैं कि वह अब कभी भी उस भुगतान की पुनः माँग नहीं करेगा। आपका खाता हमेशा के लिए चुकता कर दिया गया है। आपकी छुड़ौती दे दी गई है।

  कुलुस्सियों 2:8-15

◊ पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: यहोशू 7–9; लूका 15:11-32


[1] चार्ल्स एच. गेब्रिएल, “माई सेवियर्ज़ लव” (1905).