16 दिसम्बर : दया वहाँ महान थी

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16 दिसम्बर : दया वहाँ महान थी
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“क्योंकि हम भी पहले निर्बुद्धि, और आज्ञा न मानने वाले, और भ्रम में पड़े हुए और विभिन्न प्रकार की अभिलाषाओं और सुख-विलास के दासत्व में थे, और बैर भाव, और डाह करने में जीवन व्यतीत करते थे, और घृणित थे, और एक दूसरे से बैर रखते थे। पर जब हमारे उद्धारकर्ता परमेश्‍वर की कृपा और मनुष्यों पर उसका प्रेम प्रगट हुआ, तो उसने हमारा उद्धार किया; और यह धर्म के कामों के कारण नहीं, जो हम ने आप किए, पर अपनी दया के अनुसार नए जन्म के स्नान और पवित्र आत्मा के हमें नया बनाने के द्वारा हुआ।” तीतुस 3:3-5

यदि आपके घर में आग नहीं लगी है, तो आपको अग्निशमन दल की जरूरत नहीं है; उसी प्रकार, यदि आप पूरी तरह स्वस्थ हैं, तो कोई डॉक्टर आपको बेवजह ड्रिप नहीं लगाएगा। यह निरर्थक होगा! इसी तरह, जब तक हमें वास्तव में यह एहसास नहीं होता कि हमें क्षमा की आवश्यकता है, तब तक परमेश्वर के अनुग्रह और दया की कहानी हमारे लिए कोई विशेष अर्थ नहीं रखती। हमें यह अप्रासंगिक लगती है।

कई बार हम यह गलती कर बैठते हैं कि दूसरों की स्थिति देखकर तो हम महसूस करते हैं कि उन्हें क्षमा की बहुत अधिक आवश्यकता है, लेकिन वहीं हम क्षमा की अपनी जरूरत को अनदेखा कर देते हैं। हम मन ही मन सोचते हैं (चाहे हम इसे स्वीकार न करें), “धन्यवाद परमेश्वर, मैं उनके जैसा नहीं हूँ।” लेकिन परमेश्वर के अनुग्रह से, हमें जल्दी ही यह एहसास होता है कि हम भी कभी-कभी कठोर हो जाते हैं, हम भी ऐसी बातें बोल देते हैं और ऐसे काम कर देते हैं जो नहीं करने चाहिएँ, या हम वे काम करने में चूक जाते हैं, जो हमें करने चाहिएँ। जब हम इस अपराध-बोध को महसूस करते हैं, तब हमें अपने लिए क्षमा की आवश्यकता समझ में आती है, और जब हमें वे लोग क्षमा करते हैं, जिनका हमने अपमान किया था, तो हम कृतज्ञता से भर जाते हैं।

क्षमा का आनन्द प्राप्त करने से पहले हमें अपने पाप की वास्तविकता को स्वीकार करना आवश्यक है। सबसे पहले, हमें स्वयं को सही दृष्टिकोण से देखना होगा: हम स्वभाव से खोई हुई भेड़ें हैं, परमेश्वर के विरुद्ध विद्रोही हैं, और खाली पात्र हैं जिन्हें भरने की आवश्यकता है। हमें यह स्वीकार करना होगा कि चाहे हम मसीही जीवन में कितना भी आगे क्यों न बढ़ जाएँ, और चाहे परमेश्वर का आत्मा हमें कितना भी बदल दे, हम कभी भी अनुग्रह की आवश्यकता से परे नहीं हो सकते, क्योंकि हम अपनी पापमय प्रकृति से कभी पूरी तरह मुक्त नहीं होते। जब तक हमें यह एहसास नहीं होता कि हमारे पापों के लिए हमारा क्या परिणाम होना चाहिए था, तब तक हम इस अद्‌भुत सत्य के आगे नहीं झुकते कि एक सिद्ध उद्धारकर्ता ने हमारे स्थान पर प्राण दिए और हमारे समस्त ऋण को चुका दिया ताकि हम परमेश्वर की पूर्ण क्षमा प्राप्त कर सकें।

हमारी सबसे बड़ी आवश्यकता है कि हम निरन्तर विश्वास और पश्चाताप के साथ मसीह की ओर मुड़ते रहें। हम चाहे मसीही जीवन में कहीं भी हों, हम सभी को प्रार्थना करनी चाहिए कि परमेश्वर हमें स्वयं के बारे में और हमारे उद्धारकर्ता के बारे में सत्य प्रकट करे। फिर, जैसे-जैसे हम यह समझते जाएँगे कि हम वास्तव में क्या पाने के योग्य थे, वैसे-वैसे हम अपने उद्धारकर्ता से और अधिक प्रेम करने लगेंगे। हम परमेश्वर के प्रेम और यीशु के कार्यों से विस्मित होते रहेंगे।

अतः अभी एक क्षण रुकें। परमेश्वर से प्रार्थना करें, “मुझे मेरा वास्तविक स्वरूप दिखा,” और अपने पापों पर विचार करें। फिर प्रार्थना करें, “मुझे मेरा उद्धारकर्ता दिखा,” और उसकी दया और अनुग्रह की वास्तविकता में आनन्दित हों। तब उसकी करुणा और दया आपके हृदय को पूरी तरह भर देगी, और आप आनन्दपूर्वक इस गीत को गा पाएँगे:

दया वहाँ महान थी, और अनुग्रह भरपूर था;

क्षमा वहाँ मुझ पर अपार थी;

वहाँ मेरे बोझिल हृदय को स्वतन्त्रता मिली

कलवरी पर।[1]

इफिसियों  2:1-10


[1] विलियम आर. न्यूएल, “ऐट कैलवरी” (1895).

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