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10 जनवरी : सब कुछ साझे का

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10 जनवरी : सब कुछ साझे का
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और सब विश्वास करने वाले इकट्ठे रहते थे, और उनकी सब वस्तुएँ साझे में थीं।”  प्रेरितों के काम 2:44

आस-पास के मूर्तिपूजक संसार की नजर में आरम्भिक कलीसिया के प्रति सबसे बड़ा आकर्षण था उसकी सामुदायिक जीवनशैली। ऐसा क्या था जो इतने अलग-अलग लोगों, अर्थात यूनानी और यहूदी, खतना किए हुए और खतनारहित, जंगली और स्कूती, दास और स्वतन्त्र लोगों को एक साथ जोड़ता था (कुलुस्सियों 3:11)? वह था यीशु मसीह। इन मसीहियों के इकट्ठे रहने की समानता के लिए उसके अतिरिक्त कोई वास्तविक व्याख्या नहीं थी।

उन दिनों से लेकर अब तक, कलीसिया सदैव बहुत कुछ साझे का होने के कारण एक अनूठी संगति में एकजुट रही है। पहली साझा बात है इसका साझा विश्वास।  आरम्भिक कलीसिया जाति, शिक्षा, रुचियों या किसी और बात के आधार पर इकट्ठा नहीं होती थी; इसके विपरीत, वे अपने अलग-अलग जीवनों को अपने उद्धारकर्ता के रूप में यीशु मसीह को स्वीकारते हुए एक साझे विश्वास में लेकर आए। आज के समय में प्रभु भोज इसी एकता की एक स्पष्ट अभिव्यक्ति है; हमारे लिए एक ही रोटी और एक ही प्याला है, जिसमें हम एक देह के रूप में सहभागिता करते हैं। यीशु वह जीवन की रोटी है, जो हमारा पोषण करना है और हमें जोड़ता है।

दूसरी साझा बात है हमारा एक साझा परिवार।  जब हम यीशु को अपना उद्धारकर्ता मान लेते हैं, तो हमें अन्य विश्वासियों के साथ उसके परिवार में सहर्ष स्वीकारा जाता है, जिसमें सब का एक ही स्वर्गिक पिता है। यह पारिवारिक बन्धन सांसारिक परिवारों से भी अधिक बढ़कर है, क्योंकि विश्वास का परिवार अनन्त परिवार है। इसी कारण, हमें अपने आत्मिक भाइयों और बहनों के हितों का ध्यान रखना चाहिए। हमारे लिए विश्वासियों के रूप में एक दूसरे से प्रेम न करना न केवल दुखद होगा, परन्तु विरोधाभासी भी होगा, क्योंकि “जो कोई परमेश्वर से प्रेम रखता है वह अपने भाई से भी प्रेम रखे” (1 यूहन्ना 4:21)।

तीसरी साझा बात है, परमेश्वर के अनुग्रह में होकर सच्ची कलीसिया एक साझी भावना  का अनुभव भी करती है। हम खेल के आयोजनों में इसका एक छोटा संस्करण देख सकते हैं। प्रत्येक प्रशंसक अलग होता है किन्तु एकसाथ मिलकर वे एक साझी भावना, विश्वास और लक्ष्य साझा करते हैं। कभी-कभी वे एक साथ उत्साहित होते हैं और कभी-कभी वे एक साथ निराश होते हैं। इसी प्रकार, एक ही परिवार के सदस्य के रूप में हम एक-दूसरे के आनन्द, शान्ति, दर्द और दुख में भागीदार होते हैं। जैसा कि पौलुस ने भी कहा है, “यदि एक अंग दुख पाता है, तो सब अंग उसके साथ दुख पाते हैं और यदि एक अंग की बड़ाई होती है, तो उसके साथ सब अंग आनन्द मनाते हैं” (1 कुरिन्थियों 12:26)। उस अध्याय में पौलुस द्वारा उपयोग किया गया रूपक कलीसिया को एक देह के रूप में दर्शाता है। विश्वासियों के रूप में हम अलग-अलग हैं और हमारे गुण और निर्बलताएँ अलग-अलग हैं, और इसलिए हम एक ऐसी देह निर्मित करते हैं, जो अलग-अलग होने की तुलना में एक साथ अधिक भली रीति से काम करती है। मेरी सीमाएँ और निर्बलताएँ आपके गुणों के द्वारा पूरित होती हैं, और इसके उलटे क्रम में भी ऐसा ही है।

सभी परिवारों में कठिनाइयाँ और संघर्ष होते हैं, और हम सभी पापी हैं; इसलिए परमेश्वर के लोगों के साथ सम्बन्ध में होने के विशेषाधिकार को भूल जाना सरल होता है। अन्तिम बार ऐसा कब हुआ था कि आपने अपने पिता को अपनी कलीसिया के परिवार के लिए धन्यवाद दिया था? अन्तिम बार कब ऐसा हुआ था कि जब वे रविवार को एक साथ इकट्ठा थे, तो आप अपने भाइयों और बहनों की ओर देखकर यह जानते हुए उत्साहित हुए थे कि अनुग्रह के द्वारा आप भी इस परिवार का एक भाग हैं?

हमारा संसार, प्रेरितों के दिनों के समान ही, विभाजन और अकेलेपन से भरा है। लोग छिन्न-भिन्न, भयभीत और खोए हुए हैं। परन्तु हम, मसीह की संयुक्त देह, इस संसार को एक प्रगाढ़ संगति और अनन्तता का आशा से भरा भविष्य दे सकते हैं। जब आप लोगों को परमेश्वर के परिवार में लाते हैं, तो उनके जीवनों का हिस्सा बनने के द्वारा आपको अपने स्वर्गिक पिता के हाथ और पैर बनने का अवसर मिलता है। क्या आप इस अवसर को अपने अधिकार में लेंगे?

  कुलुस्सियों 3:5-17

9 जनवरी : सभी निमन्त्रणों से बड़ा निमन्त्रण

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9 जनवरी : सभी निमन्त्रणों से बड़ा निमन्त्रण
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“हे सब परिश्रम करने वालो और बोझ से दबे हुए लोगो, मेरे पास आओ; मैं तुम्हें विश्राम दूँगा।”  मत्ती 11:28

जब भी आपको कोई निमन्त्रण मिलता है, तो हो सकता है कि आप अपने आप से एक ही तरह के प्रश्न पूछते हों कि यह किसकी ओर से है? यह किसके लिए है? यह महत्त्वपूर्ण क्यों है? यह पद पूरे नए नियम में सबसे प्यारे निमन्त्रणों में से एक प्रस्तुत करता है, परन्तु इसे भली-भाँति समझने के लिए हमें वही प्रश्न पूछने होंगे।

सबसे पहले, यह एक व्यक्तिगत निमन्त्रण है। यह किसी कार्यक्रम के लिए निमन्त्रण नहीं है, न ही यह हिन्दू धर्म, बौद्ध धर्म, कन्फ्यूशीवाद, न्यू एज-इज़म, मानवतावाद या किसी अन्य “वाद” के साथ जुड़ जाने के लिए किसी धर्म या दर्शन द्वारा दिया गया निमन्त्रण है, जो आज के समय के वैश्विक दृष्टिकोणों में पाया जाता है। यह स्वयं यीशु की ओर से एक निमन्त्रण है। वह हममें से प्रत्येक को यह निमन्त्रण दे रहा है कि “मेरे पास आओ।”

निमन्त्रण का महत्त्व इस बात में निहित है कि यह किसकी ओर से है। सुसमाचारों में यीशु यह घोषणा करता है कि वह कौन है, कि वह जगत का उद्धारकर्ता मसीह है, परमेश्वर का पुत्र है (यूहन्ना 4:25-26; 1 यूहन्ना 4:14 देखें)। इस पहचान के आधार पर यीशु इसके प्रति प्रत्युत्तर करने की माँग कर सकता था, परन्तु इसके विपरीत वह एक निमन्त्रण दे रहा है।

और वह किसे आने के लिए निमन्त्रण दे रहा है? “सब परिश्रम करने वालों और बोझ से दबे हुए लोगों को।” यह निमन्त्रण सब लोगों के लिए है। यह किसी बड़े समूह में से किसी एक समूह को अलग नहीं कर रहा है, अपितु पूरी मानवता का वर्णन कर रहा है। हममें से प्रत्येक को ये शब्द सुनने की आवश्यकता है, क्योंकि ऐसा कोई व्यक्ति नहीं है जो चिन्ताओं, दायित्वों, डर और असफलताओं से भरे प्रतीकात्मक ठेले को धकेलता न हो, जो उसके जीवन की रचना करते हैं।

यह सब महत्त्व की बात क्यों है? ऐसा इसलिए है, क्योंकि यीशु हमें “हमारी आत्माओं को विश्राम” देने के लिए निमन्त्रण दे रहा है। वह अनन्त के सन्दर्भ में एक ऐसे विश्राम के बारे में बोल रहा है, जो कभी विफल नहीं होगा। वह हमें भोज के लिए बुलाता है और वह हमसे भोज के अनुकूल परिधान लाने के लिए भी नहीं कह रहा। हम भोज में उसी प्रकार आते हैं जैसे हम हैं। परमेश्वर उन सभी “अच्छे कर्मों” रूपी परिधानों को लेता है, जिन्हें हममें से बहुत से लोग पहनना पसन्द करते हैं, और वह उनको चिथड़े कहता है और उन्हें एक ओर फेंक देता है। वह उन सभी “बुराइयों, गड़बड़ियों, और निराशाओं” रूपी परिधानों को भी लेता है और उन्हें भी एक ओर फेंक देता है। उनके स्थान पर वह हमें “धार्मिकता के वस्त्र” (यशायाह 61:10) पहनाता है, जो स्वयं यीशु मसीह के द्वारा प्रदान किए जाते हैं। जब हम यीशु के पास आते हैं और उससे हमको वह सब मिल जाता है जिसकी हमें आज आवश्यकता है और जिसकी हमें भविष्य में भी आवश्यकता पड़ सकती है, तो हम अपने आप को किसी प्रकार स्थापित कर लेने या अपने लिए स्वर्ग का मार्ग प्रशस्त करने के अपने प्रयास से विश्राम ले सकते हैं।

यह सभी निमन्त्रणों से बड़ा निमन्त्रण है। आज ही, पहली बार हो या फिर हजारवीं बार, अपने बोझ को उसके पास लेकर आएँ। उसका विश्राम ग्रहण करें।

जैसा मैं हूँ बगैर एक बात, पर तेरे लहू से हयात

और तेरे नाम से है नजात, मसीह, मसीह, मैं आता हूँ। [1]

 मत्ती 11:25-30

8 जनवरी: कड़वाहट से जूझना

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8 जनवरी: कड़वाहट से जूझना
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“अरामी लोग दल बाँधकर इस्राएल के देश में जाकर वहाँ से एक छोटी लड़की बन्दी बनाकर ले आए थे और वह नामान की पत्नी की सेवा करती थी। उसने अपनी स्वामिनी से कहा, ‘यदि मेरा स्वामी शोमरोन के भविष्यद्वक्ता के पास होता, तो क्या ही अच्छा होता! क्योंकि वह उसको कोढ़ से चंगा कर देता।’”  2 राजाओं 5:2-3

पीड़ा अपने आप में किसी व्यक्ति को परमेश्वर के साथ घनिष्ठ सम्बन्ध में नहीं ले जाती। जो लोग परमेश्वर का वचन सुनते तो हैं परन्तु उस पर विश्वास के साथ प्रत्युत्तर नहीं देते, उनके समान हम भी जब विश्वास और आशा के बिना पीड़ा का सामना करते हैं, तो हम कड़वाहट से भर जाएँगे, क्योंकि हमारा हृदय परमेश्वर के प्रति नरम होने के विपरीत कठोर हो जाएगा। दूसरे शब्दों में, पीड़ा हमें या तो परमेश्वर की ओर भागने पर बाध्य कर देगी या उससे दूर कर देगी। परखे जाने पर हमें अपने आप से यह पूछना चाहिए, “क्या यह परीक्षा मुझे कड़वा और कठोर बना रही है, या यह मुझे प्रेमपूर्ण और कोमल बना रही है?”

2 राजाओं की पुस्तक के मध्य में, राजाओं और भविष्यद्वाक्ताओं की कहानियों के बीच, एक छोटी इस्राएली लड़की के उदाहरण के माध्यम से हम बहुत बड़ी व्यथा से सामना होने पर कोमलता और दीनता का एक असाधारण चित्र देखने पाते हैं। अरामी लोग एक आक्रमण के समय इस छोटी लड़की को बन्दी बनाकर ले आए थे; वे उसे उसके परिवार और इस्राएल से दूर ले गए थे और उसे एक अरामी सेनाध्यक्ष नामान की सेवा करने के लिए बाध्य किया गया था। उस छोटी बच्ची और उसके परिवार के लिए यह एक अति-अकल्पनीय त्रासदी थी!

फिर भी, उसकी इतनी अधिक पीड़ा में भी हम उसके कोमल हृदय की एक झलक पाते हैं। यह जानने पर कि उसके स्वामी को कुष्ठ रोग है, इस बच्ची ने नामान की पत्नी को बताया कि वह कैसे ठीक हो सकता है। यदि उसने अपने आप को कड़वाहट से भरने दिया होता, तो जिस समय घर में यह बात फैली थी कि उसका स्वामी बीमार है, वह कहती कि अच्छा हुआ, यह इसी के लायक था।  परन्तु उसने ऐसा नहीं किया। वह अपने शत्रु के लिए सबसे उत्तम बात चाह रही थी, न कि सबसे बुरे होने की आशा कर रही थी। यह एक उल्लेखनीय बात है। वह ऐसा कैसे कर पाई थी? क्योंकि सम्भवतः अपने खालीपन और अपने परिवार से अलग हो जाने के दुख से सामना होने पर वह बार-बार अपने प्रेममय परमेश्वर और उसकी प्रतिज्ञाओं की ओर देखती होगी।

जब हम पीड़ा से होकर जा रहे हों और जब हम उन लोगों की सेवा करना चाहते हों जो गम्भीर यातनाओं में हैं, तो हमें एक कोमल और खुले हृदय को विकसित करना नहीं भूलना चाहिए। क्या ऐसा करना सरल होगा? कदापि नहीं! किन्तु परमेश्वर की विश्वासयोग्यता इतनी विस्तृत, इतनी व्यापक है, कि वह हमें हमारी सबसे तीव्र पीड़ा में भी सहारा दे सकती है। इसलिए प्रत्येक परिस्थिति में परमेश्वर की ओर मुड़ें और उसकी विश्वासयोग्यता और प्रावधान द्वारा शान्ति प्राप्त करें। ऐसा करने पर आप “उस शान्ति के कारण जो परमेश्वर हमें देता है, उन्हें भी शान्ति दे सकें जो किसी प्रकार के क्लेश में हों” (2 कुरिन्थियों 1:4)।

2 कुरिन्थियों 5:6-21

7 जनवरी: सुसमाचार की अभिव्यक्ति

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7 जनवरी: सुसमाचार की अभिव्यक्ति
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“केवल इतना करो कि तुम्हारा चाल–चलन मसीह के सुसमाचार के योग्य हो।”  फिलिप्पियों 1:27

प्रति दिन . . . जिस तरह से हम कपड़े पहनते हैं, जिस तरह से हम मुस्कुराते हैं या गुस्सा करते हैं, जिस तरह से हमारा चाल-चलन होता है, हम जो बोलते हैं और हमारे बोलने का लहजा, उसके द्वारा हम सदैव अपने आस-पास के लोगों को बताते रहते हैं कि कौन सी बात वास्तव में महत्त्व रखती है और जीवन वास्तव में क्या है।

मसीहियों के लिए ऐसी अभिव्यक्तियाँ सुसमाचार के अनुरूप होनी चाहिए। इसलिए पौलुस ने फिलिप्पियों को उनके विश्वास और उनके व्यवहार, अर्थात उनके द्वारा अपनाए गए विश्वास वचन और उनके द्वारा प्रदर्शित आचरण के बीच की खाई को पाटने का बुलावा दिया। आज के समय में हमारे लिए मसीह की बुलाहट इससे भिन्न नहीं है। फिर भी, चाहे हम अपने विश्वास में कितने भी परिपक्व क्यों न हों और हम इस खाई को कितना भी क्यों न पाट लें, कुछ न कुछ उससे बढ़कर करने की आवश्यकता सदा बनी रहती है।

पौलुस का वाक्यांश “तुम्हारा चाल-चलन” यूनानी भाषा के क्रिया शब्द politeuesthe से आया है, जिसका अनुवाद अंग्रेजी की NIV बाइबल “तुम्हारा आचरण” के रूप में करती है। इस शब्द का उद्‌गम polis शब्द से हुआ है, जिसका अर्थ है “नगर,” और यही हमें पुलिस (police) और राजनीति (politics) जैसे अन्य शब्द प्रदान करता है। बहुत वास्तविक अर्थों में, पौलुस मसीही नागरिकता और आचरण को सम्बोधित कर रहा है। जबकि हम अपने आप को परमेश्वर के नगर के वासी समझते हैं, तब हम यह सीखने पाते हैं कि उस दूसरे नगर, अर्थात मनुष्य के नगर में परदेसी और राजदूत के रूप में रहने का क्या अर्थ है। जब हम विश्वास और व्यवहार के बीच की खाई को पाटते हैं, तभी अन्य लोगों को उनके साथ किए गए हमारे व्यवहार के द्वारा स्वर्ग का पूर्वाभास मिल सकेगा।

तो हमारे कार्यों से किस तरह की अभिव्यक्ति होनी चाहिए? केवल इतनी कि मसीह का सुसमाचार प्रेम का सुसमाचार है। हम इसे यूहन्ना के शब्दों में इस प्रकार देखते हैं, “प्रेम इसमें नहीं कि हमने परमेश्वर से प्रेम किया, पर इसमें है कि उसने हमसे प्रेम किया और हमारे पापों के प्रायश्चित के लिए अपने पुत्र को भेजा। हे प्रियो, जब परमेश्वर ने हमसे ऐसा प्रेम किया, तो हमको भी आपस में प्रेम रखना चाहिए” (1 यूहन्ना 4:10-11)। दूसरे शब्दों में, जैसे परमेश्वर हमसे प्रेम करता है, वैसे ही हमें अपने आस-पास के लोगों से भी प्रेम करना चाहिए। यहाँ तक कि उन लोगों से भी जिन्हें हम या दूसरे लोग अनाकर्षित या अप्रिय मानते हैं, और हमें यह प्रेम आशा और आनन्द के साथ करना चाहिए! प्रेम का यह सन्देश वह चुनौती है जो पौलुस हमें देता है।

केवल तुम्हारे कहे गए शब्दों में ही नहीं,

केवल तुम्हारे द्वारा अंगीकार किए गए कामों में ही नहीं,

परन्तु सबसे अनजानी रीतियों से मसीह प्रकट होता है। [1]

तो आज आप कैसे कपड़े पहनेंगे, आज जब आप मुसकुराएँगे और जब क्रोधित होंगे, आज आपका चाल-चलन कैसा होगा, और आज आपके बोलचाल और उसका लहजा क्या होगा, इन सबके बारे में थोड़ा रुककर सोचें। आप संसार के सामने किस तरह की अभिव्यक्तियाँ प्रदान कर रहे हैं? उन्हें ऐसी होने दें जो प्रेम के सुसमाचार के अनुरूप हों।

1 यूहन्ना 4:7-21

6 जनवरी: परमेश्वर के वचन को संजोना

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6 जनवरी: परमेश्वर के वचन को संजोना
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“हे मेरे पुत्र, मेरी बातों को माना कर, और मेरी आज्ञाओं को अपने मन में रख छोड़। मेरी आज्ञाओं को मान, इससे तू जीवित रहेगा, और मेरी शिक्षा को अपनी आँख की पुतली जान; उनको अपनी उँगलियों में बाँध, और अपने हृदय की पटिया पर लिख ले।”  नीतिवचन 7:1-3

जब मुझे भूख लग रही हो तब खाने के सामान की खरीदारी करना मेरे लिए जोखिम भरी बात होती है। मुझे लगता है कि मैं खाने की ऐसी चीजें खरीदने के लिए प्रलोभित हो जाता हूँ, जो सामान्य परिस्थितियों में मुझे कदापि पसन्द न आएँ। परन्तु मैं अकेला ऐसा व्यक्ति नहीं हूँ, राजा सुलैमान के अनुसार: “सन्तुष्ट होने पर मधु का छत्ता भी फीका लगता है, परन्तु भूखे को सब कड़वी वस्तुएँ भी मीठी जान पड़ती हैं” (नीतिवचन 27:7)।

यही सिद्धान्त पवित्रता की हमारी खोज पर भी लागू हो सकता है। आत्मिक रूप से भूखे रहकर अपने दिन बिताना एक वास्तविक संकट है, क्योंकि हमने परमेश्वर के वचन को भोजन के रूप में अच्छे से खाया नहीं है।

यदि हम अपनी पवित्रता बनाए रखने के लिए कोई सार्थक प्रयास करने जा रहे हैं, तो यह आवश्यक है कि हम न केवल परमेश्वर के वचन को पढ़ें; किन्तु उसे संजो कर भी रखें।  जब सुलैमान, इस्राएल का वह राजा जिसे परमेश्वर ने ऐसी बुद्धि दी जो सबसे बढ़कर थी (1 राजाओं 3:3-14), अपने बेटे से कहता है कि उसके वचनों को “माना कर,” उन्हें “मन में रख छोड़,” उन्हें “अपनी आँख की पुतली जान,” उन्हें “बाँध” रख, और उन्हें अपने हृदय पर “लिख ले,” तो वह ऐसी भाषा का प्रयोग करता है, जो परमेश्वर के वचन को संजोने के भाव तक पहुँचा देती है।

परमेश्वर के वचन को इस तरह से समझने के लिए हमें बाइबल का उपयोग अध्ययन किए जाने वाली किसी पाठ्यपुस्तक, या तर्कों के लिए प्रमाण-पत्रों की किसी पुस्तक, या फिर एक प्रतिज्ञा की किसी पुस्तक से कहीं बढ़ कर करना होगा, जिन्हें हम कभी-कभार ही देखते हैं। परमेश्वर के वचन को संजोने के लिए हमें भजनकार के उस दृष्टिकोण की खोज करने की आवश्यकता है, जो अपने समय के घमण्डियों और ठट्ठा करने वालों से अपने आप को दूर रखते हुए परमेश्वर के साथ चलने वाले व्यक्ति के बारे में यों कहता है, “वह तो यहोवा की व्यवस्था से प्रसन्न रहता; और उसकी व्यवस्था पर रात दिन ध्यान करता रहता है” (भजन संहिता 1:2)।

 परमेश्वर के वचन से प्रसन्न रहने, अर्थात उसे अपने जीवन को चलाने और मार्गदर्शन करने देने, तथा पवित्रता के लिए सरगर्मी रखने के बीच एक सीधा सम्बन्ध है। यदि हम पवित्रशास्त्र को संजोने में विफल रहते हैं, तो प्रश्न यह नहीं है कि क्या  हम पवित्रता के सन्दर्भ में ठोकर खाएँगे या नहीं,  परन्तु प्रश्न यह है कि ऐसा कब  होगा।

हममें से प्रत्येक व्यक्ति परमेश्वर के वचन को अपने हृदय में छिपे रहने का स्थान देकर अपनी चाल को शुद्ध रख सकता है (भजन संहिता 119:9)। क्या आपने पवित्रशास्त्र को कण्ठस्थ करने की कोई योजना बनाई है? मैं आपको प्रोत्साहित करना चाहता हूँ कि आप बाइबल के किसी एक पद को स्मरण करने का संकल्प लें, चाहे आप हर दूसरे दिन, प्रतिदिन, साप्ताहिक रूप से या जैसे भी ऐसा करना चाहें। एक योजना बनाएँ और उस पर टिके रहें।

परमेश्वर के वचन का आनन्द लें और सन्तुष्ट रहें। पवित्रशास्त्र को संजोएँ और पवित्र बनें।

     भजन संहिता 119:1-16

5 जनवरी : हमारा महान महायाजक

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5 जनवरी : हमारा महान महायाजक
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“क्योंकि हर एक महायाजक मनुष्यों में से लिया जाता है और मनुष्यों ही के लिए उन बातों के विषय में जो परमेश्वर से सम्बन्ध रखती हैं, ठहराया जाता है कि भेंट और पाप बलि चढ़ाया करे . . . यह आदर का पद कोई अपने आप से नहीं लेता, जब तक कि हारून के समान परमेश्वर की ओर से ठहराया न जाए। वैसे ही मसीह ने भी महायाजक बनने की बड़ाई अपने आप से नहीं ली, पर उसको उसी ने दी, जिसने उससे कहा था, ‘तू मेरा पुत्र है, आज मैं ही ने तुझे उत्पन्न किया है’; इसी प्रकार वह दूसरी जगह में भी कहता है, ‘तू मलिकिसिदक की रीति पर सदा के लिए याजक है।’”  इब्रानियों 5:1, 4-6

याजक पद और बलिदान पद्धति की अवधारणा हमारे समकालीन संसार से बहुत भिन्न है, किन्तु इसे समझना मसीही जीवन का आधार है। पुराने नियम के इस्राएल में पशु बलि की प्रथा कोई मानव निर्मित व्यवस्था नहीं थी जिसे परमेश्वर तक पहुँचने और मनुष्यों को उसके लिए स्वीकार्य बनाए जाने के निरर्थक प्रयास के रूप में ठहराया गया था। इसके विपरीत, इसका उद्देश्य परमेश्वर के वाचा के लोगों को उसके चरित्र, उसकी अपेक्षाओं और उसके छुटकारे की योजना की भव्यता को समझने में सहायता करना था (और वह आज भी इस तरह से हमारी सहायता कर सकती है)। इसके सभी सूक्ष्म विवरणों के द्वारा परमेश्वर अपने लोगों को प्रभु यीशु मसीह के पूर्ण और सिद्ध कार्य की ओर इंगित कर रहा था, जो उसके लोगों का महान महायाजक और उनकी ओर से चढ़ाए जाने वाले एक सिद्ध बलिदान दोनों के रूप में आने वाला था।

ऐतिहासिक रूप से इस्राएल का महायाजक मूसा के भाई हारून की वंशावली से आया होगा और उसे “अपने भाइयों में प्रमुख” माना जाता होगा (लैव्यव्यवस्था 21:10)। इस व्यक्ति ने उन्हीं सामाजिक परिस्थितियों, दबावों और परीक्षणों का अनुभव किया होगा, जिनका वह प्रतिनिधित्व कर रहा था जिससे उसे उनकी ओर से एक अति-करुणामय मध्यस्थ बनने में सहायता मिली होगी।

तथापि यीशु के आगमन से बहुत पहले हेरोदेस महान और अन्य शासकों ने महायाजकीय नियुक्तियों का ऐतिहासिक रूप भ्रष्ट कर दिया था, जो अपने लिए महायाजकों का चयन स्वयं किया करते थे। वे यह नहीं समझते थे कि महायाजक का पद मनुष्य द्वारा दिया जाने वाला कोई सम्मान नहीं होता अपितु परमेश्वर की ओर से एक बुलावा होता है, जैसा कि हारून के लिए ठहराया गया था। महायाजकों का काम किसी राजनीतिक समूह का प्रतिनिधित्व करना नहीं था; उनका कार्य था परमेश्वर के लोगों का प्रतिनिधित्व स्वयं परमेश्वर के सामने करना।

यही एक कारक है जो यीशु को सबसे उत्कृष्ट महायाजक बनाता है: उसके महायाजक बनने की महिमा में उसकी पहल सम्मिलित नहीं थी; इसके विपरीत, उसे उसके पिता द्वारा ठहराया गया था। उसने स्वीकार किया कि “यदि मैं आप अपनी महिमा करूँ, तो मेरी महिमा कुछ नहीं; परन्तु मेरी महिमा करने वाला मेरा पिता है, जिसे तुम कहते हो कि ‘वह तुम्हारा परमेश्वर है’” (यूहन्ना 8:54)। उसने उन्हीं कठिनाइयों को सिद्धता के साथ सहन किया जिनका हम सामना करते हैं। पापरहित होने के बाद भी वह हमारे पापों के कारण सर्वशक्तिमान परमेश्वर के समक्ष गया। दीनता की आत्मा में होकर यीशु हमें धार्मिकता की ओर प्रेरित करता है। क्योंकि उसने वास्तव में सिद्ध बलिदान चढ़ाया, क्योंकि वह स्वयं सिद्ध बलिदान था, इस कारण आप और मैं अभी और सदा के लिए परमेश्वर की उपस्थिति का आनन्द उठा सकते हैं। कोई भी पाप या पीड़ा, कोई भी निराशा या हताशा, इस महिमामय वास्तविकता को नहीं बदल सकती कि आपके पास सदा के लिए एक याजक है, और इसलिए आपके पास सदा के लिए उसके साथ एक स्थान है।

 इब्रानियों 4:14-5:10

4 जनवरी: मसीह में सन्तुष्ट

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4 जनवरी: मसीह में सन्तुष्ट
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“मैंने यह सीखा है कि जिस दशा में हूँ; उसी में सन्तोष करूँ। मैं दीन होना भी जानता हूँ और बढ़ना भी जानता हूँ।”  फिलिप्पियों 4:11-12

हम असन्तोष से भरे समाज में रहते हैं। विज्ञापन हमें ईर्ष्यालु बनाने के लिए प्रशिक्षित करते हैं। यद्यपि वास्तविक समस्या वह समाज नहीं है, जिसमें हम रहते हैं परन्तु हमारे अपने हृदय और मन की स्थिति है। हम उन बातों के द्वारा सन्तुष्टि से बहुत दूर कर दिए जाते हैं, जो हमारा ध्यान आकर्षित करने के लिए शोर मचाती हैं, जैसे कि उपाधियाँ, सम्पत्ति, प्रभाव या प्रसिद्धि। फिर भी, ये सभी और अन्य बहुत-सी ऐसी बातें हमें यह विश्वास दिलाकर कि इतना तो कभी पूरा नहीं पड़ेगा, हमें उसमें आनन्द मनाने की भावना को लूट लेना चाहती हैं, जो हमें परमेश्वर ने दिया है। और इन्हें प्राप्त कर लेने का यह प्रयास कभी खत्म नहीं होता।

यद्यपि पौलुस न केवल यह कह सकता था कि वह सन्तुष्ट था, अपितु यह भी कि वह “जिस दशा में” भी हो, वह उसमें सन्तुष्ट रह सकता है। यही तो वह चीज है, जिसको हर कोई खोज रहा है! तो फिर इसका रहस्य क्या था? यह था प्रभु यीशु मसीह की पर्याप्तता में अपनी व्यक्तिगत पहचान और जीवन के प्रति अपने दृष्टिकोण को स्थापित करना। पौलुस ने प्रतिकूल परिस्थितियों का सामना करते हुए धैर्य और लचीलापन बनाए रखने का समर्थन नहीं किया या आत्मनिर्भरता का कोई झूठा सुसमाचार प्रस्तुत नहीं किया। कदापि नहीं, उसका सन्तोष परमेश्वर की इच्छा के आगे अपने हृदय और मन को अधीन करने का परिणाम था, भले ही वह किसी भी परिस्थिति का सामना क्यों न करे।

सब लोग हर प्रकार की परिस्थिति में नहीं रह चुके हैं। सब लोग नहीं जानते कि किसी दूसरे की परिस्थिति में रहना कैसा होता है। परन्तु पौलुस यह जानता था। वह जानता था कि धनवान होना और पोषित होना क्या होता है, और वह जानता था कि निर्धन होना और वंचित रहना क्या होता है। यदि उसका सन्तोष परिस्थितियों का परिणाम होता तो उसका जीवन लगातार उतार-चढ़ाव भरा होता, एक क्षण वह मोहक विलासिता में चूर होता और अगले ही क्षण उस विलासिता की अनुपस्थिति से पूरी तरह पराजित। ऐसी अस्थिर आत्मा ने पौलुस को निष्क्रिय कर दिया होता, जिससे वह मसीह की सेवा करने में असमर्थ हो जाता।

पौलुस सामान्य आवश्यकताओं वाला एक सामान्य व्यक्ति था। रोम की एक कालकोठरी से तीमुथियुस को लिखे एक पत्र में पौलुस ने लिखा कि “मेरे पास शीघ्र आने का प्रयत्न कर . . . बागा . . . और पुस्तकें विशेष करके चर्मपत्रों को लेते आना” (2 तीमुथियुस 4:9, 13)। दूसरों ने उसे छोड़ दिया था और उसके पास कुछ वस्तुओं की घटी थी। हाँ, पौलुस को कपड़े, पुस्तकें और एक साथी चाहिए था। किन्तु वह जानता था कि वह इनके बिना भी ठीक से रह सकेगा, क्योंकि उसकी शान्ति उनसे किसी बड़ी बात में निहित थी।

पौलुस की तरह आपका सन्तोष भी अन्ततः यीशु के साथ आपके मेल किए जाने पर आधारित हो सकता है और ऐसा होना भी चाहिए। पूरी तरह से उसके हो जाने और पूरी तरह से उसके अधिकार के अधीन रहने के अतिरिक्त अन्य सभी महत्वाकांक्षाओं का परित्याग कर दें। जब आप मसीह को जान लेते हैं और जान जाते हैं कि वह कितना अद्‌भुत है, कि वह आपका सब कुछ है, चाँदी से अधिक मूल्यवान है, सोने से अधिक महँगा है, हीरों से अधिक सुन्दर है, और आपके पास जो कुछ भी है, वह उसके तुल्य कुछ भी नहीं है,[1] तब आपका अपनी परिस्थितियों को देखने का तरीका और आपकी सन्तुष्टि का मापदण्ड पूरी तरह से बदल जाएगा।

भजन संहिता 73.

3 जनवरी : प्रत्येक प्रतिज्ञा की पूर्ति

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3 जनवरी : प्रत्येक प्रतिज्ञा की पूर्ति
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“अब्राहम की सन्तान, दाऊद की सन्तान, यीशु मसीह की वंशावली।”  मत्ती 1:1

हो सकता है कि नए नियम का आरम्भ हमें पहली बार देखने पर प्रेरणादायक न लगे। वास्तव में, यदि कोई पहली बार बाइबल पढ़ रहा हो और मलाकी की पुस्तक के अन्त तक पहुँच गया हो, जो कि आगे आने वाले की ओर प्रत्याशा से संकेत करती है, तो अगली पुस्तक का आरम्भ उनके इस उत्साह को डगमगा सकता है, जो वंशावली से होता है। हो सकता है कि वे (और हम भी!) मत्ती को छोड़ किसी दूसरे सुसमाचार से आरम्भ करने के लिए प्रलोभित हो जाएँ।

तथापि इस बात को स्मरण रखें कि पुराने नियम में परमेश्वर ने अपने लोगों से जो प्रतिज्ञाएँ की थीं, वे सभी अपने पूरे होने की प्रतीक्षा कर रही थीं। जब हम नए नियम को पढ़ते हैं, तब हमें आभास होता है कि वास्तव में वह इससे अधिक उपयुक्त रीति से आरम्भ नहीं हो सकता था क्योंकि मत्ती की वह वंशावली अब्राहम से लेकर दाऊद तक और अन्ततः यीशु तक की एक रेखा खींचती है, जो इन सभी प्रतिज्ञाओं की पूर्ति करता है।

इसी प्रकार मरकुस भी अपने पूरे सुसमाचार में हमें उन भविष्यद्वक्ताओं की ओर वापस लेकर जाता है, जिन्होंने उस आने वाले की ओर संकेत दिया था। मरकुस इस असाधारण वास्तविकता के लिए परिवेश तैयार करने के लिए पुराने नियम का उपयोग करता है, जब वह अगले वाक्य को “जैसा यशायाह भविष्यद्वक्ता की पुस्तक में लिखा है . . .” (मरकुस 1:2) से आरम्भ करता है। और जब वह यीशु के कहे पहले शब्दों को इस प्रकार दर्ज करता है कि “समय पूरा हुआ है, और परमेश्वर का राज्य निकट आ गया है” (पद 15)। यीशु के चेलों को वह देखने का सौभाग्य मिला, जिसे भविष्यद्वक्ता और राजा देखने की लालसा करते थे (लूका 10:24 देखें)—एक ऐसा सौभाग्य जो आज भी परमेश्वर के वचन के ज्ञानवर्धक कार्य के माध्यम से जारी है।

नया नियम हमें यह दिखाता है कि जिस साधन के द्वारा परमेश्वर की प्रतिज्ञाएँ पूरी होती हैं, उसे दो शब्दों में अभिव्यक्त किया जा सकता है। वे शब्द हैं यीशु मसीह।  परमेश्वर ने इस्राएल से उन शब्दों और श्रेणियों का उपयोग करके अपनी प्रतिज्ञाएँ कीं जिन्हें वे समझ सकते थे, अर्थात राष्ट्र  और मन्दिर  जैसे शब्द। मसीह के आगमन ने सुसमाचार के प्रकाश में पुराने नियम की इन अवधारणाओं को दोबारा से परिभाषित किया। हम पाते हैं कि पुराने नियम की सभी भविष्यद्वाणियाँ मसीह में, अर्थात मसीह के व्यक्तित्व द्वारा और मसीह के व्यक्तित्व में पूरी होती हैं। इस कारण इस्राएल के राज्य में किसी नए मन्दिर की खोज करने के विपरीत हम उसके पुत्र प्रभु यीशु के द्वारा परमेश्वर से मिलते हैं; उसके आत्मा के द्वारा हममें से प्रत्येक में उसके वास करने का आनन्द उठाते हैं; और हमारे जीवन को अभी और सदा के लिए बदल देने के लिए मसीह के राज्य की वास्तविकता को देखते हैं।

परमेश्वर के पुत्र का आगमन पुराने नियम की श्रेणियों की सीमाओं को तोड़ देता है। यह परमेश्वर के लोगों के लिए बेचैनी उत्पन्न करने के लिए नहीं, अपितु रोमांच से भर देने के लिए है! मसीह परमेश्वर की सभी प्रतिज्ञाओं की पूर्ण पूर्ति है। वह परमेश्वर के सभी भव्य आश्वासनों की वास्तविकता है। तो अब यह देखने के लिए और प्रतीक्षा न करें कि परमेश्वर अपनी प्रत्येक प्रतिज्ञा को कैसे पूरा करेगा। अब हम जानते हैं कि इनमें से प्रत्येक प्रतिज्ञा मसीह के द्वारा तृप्त हुई थी, हुई है और सदा होती रहेगी। उसने आपके साथ रहने, आपके लिए और आपके द्वारा कार्य करने और आपको पूर्णता के एक अनन्त राज्य में लाने की प्रतिज्ञा की है। ऐसे समय अवश्य आते हैं, जब उन प्रतिज्ञाओं को थामे रखना कठिन होता है। जब वे समय आते हैं तो हम अब्राहम और दाऊद की वंशावली से उत्पन्न हुए उस व्यक्ति की ओर फिर से देखते हैं, जो आत्मा के द्वारा गर्भ में आया, जो यह घोषणा करने में सक्षम था कि “समय पूरा हुआ है, और परमेश्वर का राज्य निकट आ गया है” और जो क्रूस पर लटका और कब्र से निकल आया, जिससे कि परमेश्वर की सभी प्रतिज्ञाएँ उसमें “हाँ” बन जाएँ।      मत्ती 1:1-18.

2 जनवरी: अपने परमेश्वर को देखो

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2 जनवरी: अपने परमेश्वर को देखो
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“हे सिय्योन को शुभ समाचार सुनाने वाली, ऊँचे पहाड़ पर चढ़ जा; हे यरूशलेम को शुभ समाचार सुनाने वाली, बहुत ऊँचे शब्द से सुना, ऊँचे शब्द से सुना, मत डर; यहूदा के नगरों से कह, ‘अपने परमेश्वर को देखो!’”  यशायाह 40:9

भविष्यद्वक्ता यशायाह के जीवनकाल में परमेश्वर के लोगों को एक पराए देश में बन्दी बना लिया गया था। वे निराश हो चुके थे, यहाँ तक कि प्रभु की स्तुति के गीत भी नहीं गा पा रहे थे (भजन संहिता 137:1-4 देखें)। फिर भी जब वे बँधुआई की उस स्थिति में थे, तब परमेश्वर अपने लोगों के पास शान्ति प्रदान करने वाले शब्दों के साथ आया (यशायाह 40:1), वह शान्ति जो केवल उसकी प्रतिज्ञा के पूरे होने में ही मिलती है: कि यहोवा का तेज प्रगट होगा और ऐसा केवल इस्राएल के लिए नहीं परन्तु सम्पूर्ण मानवजाति के लिए होगा।

यह शुभ समाचार ऐसा नहीं था कि इस बारे में चुप रहा जा सके। अवश्य था कि परमेश्वर के लोग विजयी जयघोष करते और अपनी आशा की महिमा से एक-दूसरे को मोहित कर देते। इसका वर्णन एक बार इस प्रकार भी किया गया था कि “जो लोग अन्धियारे में चल रहे थे” उन्होंने “बड़ा उजियाला देखा” (यशायाह 9:2)।

इस पतित संसार के अन्धकार और स्वर्ग के उजियाले के बीच का अन्तर एक अनोखा चित्रण है, जो यशायाह की पूरी पुस्तक में और निस्सन्देह पूरी बाइबल में दिखाई देता है। अन्धकार वह परिणाम है जो परमेश्वर के लिए उदासीनता होने, उसके विरुद्ध विद्रोह करने और उसके कहे अनुसार कार्य करने की अनिच्छा के होने से आता है। केवल एक ही ऐसा सन्देश है जो ऐसे अन्धकार में उजियाला लेकर आता है, जो हृदय और मन को तरोताजा कर देता है, और वह यह है “अपने परमेश्वर को देखो!”

यह सन्देश आज भी परमेश्वर के लोगों के लिए उतना ही प्रासंगिक है जितना कि यशायाह के समय में था। प्रायः अन्धकार बहुत अधिक लगता है और कभी-कभी उजियाला बहुत धुँधला दिखाई देता है। फिर भी, प्रायः इन अनिश्चित समयों में आशा का सन्देश भी प्रकट होता है। परमेश्वर ने प्रतिज्ञा की है कि “तब यहोवा का तेज प्रगट होगा और सब प्राणी उसको एक संग देखेंगे; क्योंकि यहोवा ने आप ही ऐसा कहा है” (यशायाह 40:5)। अन्ततः परमेश्वर ने इस प्रतिज्ञा को पूरा किया, जब उसने देह धारण किया और हमारे बीच में अपनी उपस्थिति ठहराई।

जब यूहन्ना ने अपना सुसमाचार लिखा, तो उसने उसी दृश्य को देखा जिसकी ओर यशायाह ने देख रहा था, और कहा कि “और वचन देहधारी हुआ; और अनुग्रह और सच्चाई से परिपूर्ण होकर हमारे बीच में डेरा किया, और हमने उसकी ऐसी महिमा देखी, जैसी पिता के एकलौते की महिमा” (यूहन्ना 1:14)। वह जगत की ज्योति था—वह  स्वयं—और “ज्योति अन्धकार में चमकती है, और अन्धकार ने उसे ग्रहण न किया” (पद 5)। यशायाह उसका वर्णन कर रहा था जो आने वाला था। परन्तु हम यूहन्ना की तरह उस पूरे किए गए कार्य पर विचार करने में सक्षम हैं कि यही वह महिमा है, जिसकी प्रतिज्ञा की गई थी और जो अब प्रकाशित हुई है।

हमारे अन्धकार को मिटाकर और उद्धार को लेकर परमेश्वर हमारे पास आया है। आप अपने परमेश्वर को पहले चरनी में, फिर क्रूस पर, फिर कब्र से बाहर निकलते हुए और अब ऊँचे स्थान पर राज्य करते हुए देख सकते हैं। अन्धकार को देख पाना कठिन नहीं है, किन्तु फिर भी हमें ज्योति की ओर देखना चाहिए क्योंकि वहाँ हमें आशा मिलती है, जो भय को दूर करती है और वह शुभ समाचार मिलता है, जो इस योग्य है कि उसे सबको सुनाया जाए। इसलिए आज अपने परमेश्वर को देखें!

1 जनवरी: सृष्टि का राजा

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1 जनवरी: सृष्टि का राजा
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“आदि में परमेश्वर ने आकाश और पृथ्वी की सृष्टि की।” उत्पत्ति 1:1

ऐसा कोई समय नहीं था जब परमेश्वर अस्तित्व में नहीं था। समय से पहले, कुछ भी होने से पहले, परमेश्वर था। और चूंकि उसका गुण अपरिवर्तनीय है, इसलिए वह सदा से त्रिएकता, अर्थात, परमेश्वर पिता, परमेश्वर पुत्र और परमेश्वर पवित्र आत्मा में होकर सदा से ही अस्तित्व में रहा है।

बाइबल पढ़ते समय हम पाते हैं कि त्रिएकता का प्रत्येक सदस्य सृष्टि के सृजन में सम्मिलित था: परमेश्वर पिता ने पहल की, परमेश्वर आत्मा को सबके ऊपर “मण्डराते हुए” वर्णित किया गया है, और जो कुछ भी उत्पन्न हुआ उस सब के सृजन का कर्ता परमेश्वर पुत्र था (उत्पत्ति 1:2-3; यूहन्ना 1:3)।

“सभी वस्तुएँ उज्ज्वल और सुन्दर, सभी प्राणी बड़े और छोटे” इन सब को हमें विस्मय में डाल देना चाहिए; ये सभी परमेश्वर की आज्ञा से रचे गए थे। और वह न केवल इन सभी का सृष्टिकर्ता है; वरन वह उन सब का प्रभु भी है जो उसने बनाया है। सारी प्रकृति उसके हाथों में है, उसके नियन्त्रण में है। जब हम लहरों को किनारे से टकराते हुए देखते हैं, तो यह जानना बहुत ही प्रोत्साहक होता है कि उनमें से प्रत्येक, परमेश्वर के सम्प्रभु प्रभुत्व के परिणामस्वरूप वहाँ है। वह अपनी सृष्टि से दूर कहीं चला नहीं गया है, न ही वह कभी जाएगा।

यह याद रखना महत्त्वपूर्ण है कि परमेश्वर सर्वोपरि भी है। वह सबसे ऊपर, सबसे परे, और उसने जो कुछ भी बनाया है उस सबसे अलग, अपने सिंहासन पर विराजमान है। यही बात मसीहियत को सर्वेश्वरवाद से अलग करती है, अर्थात इस सोच से कि प्राकृतिक संसार परमेश्वर की अभिव्यक्ति है और इसलिए सब कुछ किसी न किसी तरह उसका एक भाग है। इस आस्था के अनुसार, हम किसी मक्खी को मारने या चींटी पर पैर रखने का दुस्साहस कदापि न करेंगे क्योंकि वे कीड़े दिव्य हैं। इसी प्रकार, हम पेड़ नहीं काटेंगे, न ही माँस खाएँगे, क्योंकि ये भी “परमेश्वर के अंग” हैं। इस तरह की शिक्षाएँ गलत और भ्रमित करने वाली होती हैं और मूर्तिपूजा की ओर ले जाती हैं। पवित्रशास्त्र बार-बार यह स्पष्ट करता है कि लोग “सृजनहार को छोड़कर सृष्टि” की उपासना करना पसन्द करेंगे (रोमियों 1:25)। जब हम किसी अच्छी चित्रकारी को देखते हैं, तो हम उस चित्रकारी की प्रशंसा करते हैं और उसका आनन्द लेते हैं, और फिर हम चित्रकार की प्रशंसा करते हैं, और यह उचित भी है। सम्पूर्ण सृष्टि परमेश्वर का चित्र-फलक है, और यह सब “उसके अनदेखे गुण, अर्थात उसकी सनातन सामर्थ्य और परमेश्वरत्व” (पद 20) का वर्णन करता है।

केवल परमेश्वर की ही आराधना की जानी चाहिए, क्योंकि सृष्टि उसके सामर्थ्य से और उसकी महिमा के लिए ही अस्तित्व में है। उसके अस्तित्व का कोई आरम्भ या अन्त नहीं है, और वह सदा तक राज्य करेगा। वही राजा है। आज उसकी बढ़ाई उसी रीति से करें, जिसके योग्य केवल वही है। टहलते समय या खिड़की से बाहर देखते हुए, जैसे-जैसे आप उसकी बनाई हुई वस्तुओं में उसकी सुन्दरता को देखते जाएँ, उसकी स्तुति करते जाएँ। उसकी स्तुति करें, जब वह अपने सम्प्रभु हाथ से आपको थामे हुए सृष्टि पर राज्य करता है।