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21 जनवरी : किसी अन्य देश के नागरिक

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21 जनवरी : किसी अन्य देश के नागरिक
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“क्योंकि बहुत से ऐसी चाल चलते हैं, जिनकी चर्चा मैंने तुम से बार-बार की है, और अब भी रो रोकर कहता हूँ कि वे अपनी चाल–चलन से मसीह के क्रूस के बैरी हैं। उनका अन्त विनाश है, उनका ईश्वर पेट है, वे अपनी लज्जा की बातों पर घमण्ड करते हैं और पृथ्वी की वस्तुओं पर मन लगाए रहते हैं। पर हमारा स्वदेश स्वर्ग पर है; और हम एक उद्धारकर्ता प्रभु यीशु मसीह के वहाँ से आने की बाट जोह रहे हैं। वह अपनी शक्ति के उस प्रभाव के अनुसार जिसके द्वारा वह सब वस्तुओं को अपने वश में कर सकता है, हमारी दीन–हीन देह का रूप बदलकर, अपनी महिमा की देह के अनुकूल बना देगा।  फिलिप्पियों 3:18-21

“हम यहाँ के नहीं हैं।” पहली सदी के यूनानी शहर फिलिप्पी के निवासियों ने भी, यहाँ तक कि वहाँ पैदा हुए लोगों ने भी यही कहा होगा, क्योंकि वे रोमी कानून के अनुसार रहते थे, रोमी वस्त्र पहनते थे और अपने दस्तावेज प्राचीन रोमी भाषा में लिखते थे। वे रोमी नागरिक थे। वह पूरी जगह रोम के जैसी दिखती थी किन्तु वह रोम था नहीं। फिलिप्पी के नागरिक यूनान में थे परन्तु रोम के नागरिक के रूप में रह रहे थे।

पौलुस ने उनसे कहा कि मसीही होना ठीक ऐसा ही है। हम मसीही राजधानी से दूर रहते हुए भी मसीही जीवन जी रहे हैं। आपको यह जानकर राहत मिलेगी कि वाशिंगटन डीसी या लन्दन नहीं है! वास्तविक “सदन की सीढ़ियाँ” इससे कहीं अधिक ऊँची और कहीं अधिक भव्य हैं। हमारी नागरिकता स्वर्ग की है और जब हम यहाँ पर परदेशी होकर रहते हैं, ऐसे लोगों के रूप में जो यहाँ के नहीं हैं, तो हम अपने आस-पास के संसार में परिवर्तन लेकर आएँगे।

मसीहियों के रूप में हमें प्रतिदिन यह महान अवसर मिलता है कि हम एक और दिन अलग दिखाई दें, अर्थात वैसे जीएँ जैसे हम वास्तव में हैं, अर्थात स्वर्ग के नागरिक, ऐसे लोग जो यहाँ के नहीं हैं। हम लोगों को हमारे बारे में ऐसे कहते हुए पाएँ, “अरे, मैं तुम्हारे जीवन जीने के तरीके और बात करने के तरीके से बता सकता हूँ कि तुममें कुछ अलग है।” इसका अर्थ यह है कि जब आप अपने जीवन के बारे में सोचते हैं, तो आपको अपने आप से कुछ प्रश्न पूछने की आवश्यकता है, जैसे कि, मेरी भक्ति का उद्देश्य क्या है, वह कौन सी बात है जो मुझे प्रेरित करती है और मेरे अस्तित्व को निर्मित करती है? क्या यह मेरा रूप है? क्या यह मेरा पद है? क्या यह मेरी इच्छाएँ और खुशियाँ है? मैं किस लिए जी रहा हूँ?

बाइबल चेतावनी देती है कि यदि हम “पाप में थोड़े दिन के सुख” के लिए जीते हैं (इब्रानियों 11:25), तो अन्ततः वे हमें खा जाएँगे और हमारे जीवन का अन्त कर देंगे। इसके विपरीत हमें भविष्य की महिमा की आशा में जीना चाहिए। वह समय आ रहा है, जब हमारा रूपान्तर होगा; हमारे पास “उसकी महिमामय देह के समान” नए शरीर होंगे। हमारे स्वर्गिक शरीर पाप, स्वार्थ-पूर्ण अभिलाषाओं के कारण या शक्ति के क्षीण होने के द्वारा फिर दुर्बल नहीं होंगे। हम एक दिन घर पहुँच जाएँगे, और यह बहुत अद्‌भुत होने वाला है!

यदि लोगों को आपके जीवन से ऐसा लगता है और आपकी बातचीत से पता चलता है कि आपके पास स्वर्ग की नागरिकता है, कि आप एक जीवित परमेश्वर की सेवा करते हैं, और आप अपने घर जाने की आतुरता से प्रतीक्षा कर रहे हैं जहाँ आपका जीवन पूरी तरह से बदल जाएगा, तो आज नहीं तो कल उनमें से कुछ लोग आप से अवश्य पूछेंगे कि आप उन्हें “अपनी आशा का कारण” बताएँ (1 पतरस 3:15)।

इसलिए इस बात को स्मरण रखें कि आप कहाँ से हैं। परमेश्वर की अधीनता में सुसमाचार का प्रभाव सीधे-सीधे मसीह के समान जीने की आपकी इच्छा से सम्बन्ध रखता है। अपनी स्वर्गिक नागरिकता के कौतूहल से भावुक और करुणामय होते रहें, जब आप उन लोगों के बीच चलते-फिरते हैं जो “क्रूस के बैरी” हैं (फिलिप्पियों 3:18)। यह निश्चित है कि मसीह वापस आएगा, और जब वह आएगा तो वह दिन आ जाएगा जब आप अपने निवासस्थान पहुँचेंगे। यदि आज के दिन ऐसा नहीं होता है, तो आज फिर आपके लिए अलग दिखने का एक अवसर उपलब्ध है। आप उस अवसर का लाभ किस प्रकार उठाने वाले हैं?

     1 पतरस 2:9-17

20 जनवरी : अपने दिन गिनना

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20 जनवरी : अपने दिन गिनना
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“हम को अपने दिन गिनने की समझ दे कि हम बुद्धिमान हो जाएँ।”  भजन संहिता 90:12

अपनी पुस्तक इफ ओनली इट वर ट्रू  में मार्क लेवी पाठकों को एक ऐसे बैंक की कल्पना करने के लिए प्रोत्साहित करते हैं, जो हर सवेरे उनके खाते में 86,400 डॉलर जमा करता है। इस खाते में पिछले दिन की राशि जमा नहीं रखी जाती और जितनी राशि पिछले दिन से बकाया बची होती है वह खाते से हटा ली जाती है। अब आप क्या करेंगे? निस्सन्देह उसमें से आप आखरी सिक्का तक निकाल लेंगे!

फिर वह बताते हैं कि हम सभी के पास वास्तव में  ऐसा ही एक बैंक है, जिसे समय कहते हैं। हर सवेरे हमें 86,400 सेकेण्ड दिए जाते हैं। हम वह सारा समय खो देते हैं, जिसे हम बुद्धिमानी से उपयोग करने में विफल हो जाते हैं। इसमें न तो कुछ शेष बचता है और न ही निर्धारित राशि से अधिक मिलता है। हम केवल आज की राशि का ही उपयोग कर सकते हैं और इससे अधिकतम लाभ उठाने की आशा कर सकते हैं।[1]

यद्यपि मसीही लोगों के पास अनन्त जीवन की निश्चित आशा है, फिर भी इस धरती पर हमारा समय सीमित है। इसीलिए भजन संहिता 90 में मूसा हमारे मानव अस्तित्व की संक्षिप्तता और परमेश्वर की अनन्तता के प्रकाश में हमें अपने दिनों को सावधानी से गिनने के लिए स्मरण दिलाता है कि हम बुद्धिमान हो जाएँ।

सम्भवतः हमारी व्यस्त संस्कृति में हम भविष्य के बारे में सोचे बिना वर्तमान समय के सुखों का आनन्द लेने में इतने व्यस्त हो जाएँ कि हम अपनी नश्वरता और पाप के बीच के सम्बन्ध को पहचान ही न पाएँ। यदि हमारे पास मृत्यु का कोई उत्तर नहीं है और हम उससे डरकर भी जीना नहीं चाहते, तो फिर सबसे अच्छा तो यही है कि हम उसको अनदेखा कर दें और ऐसे जिएँ जैसे कि हमारे दिन सीमित हैं ही नहीं।

परन्तु यीशु मसीह के पुनरुत्थान में हमारे पास मृत्यु का उत्तर है और हमें उससे डरने की भी आवश्यकता नहीं है। हमारे जीवन परमेश्वर की ईश्वरीय देखभाल पर भरोसा कर सकते हैं और उसके साक्षी हो सकते हैं जो हमारे अस्तित्व को तत्व, आधार और अर्थ देता है। इस सत्य को हमारे हृदयों और मनों में स्पष्ट रूप से समझाने के लिए हमें परमेश्वर की आवश्यकता है।

समय बीतने के साथ परमेश्वर के आत्मा द्वारा किए जाने वाले आन्तरिक परिवर्तन और अनन्त काल के प्रकाश में अपने समय का उपयोग करने के सतर्क प्रयास ही हमें अपने दिनों को उचित रीति से गिनना सिखाते हैं। और अपने दिनों को उचित रीति से गिनना आरम्भ करने के लिए आज से भला और कोई दिन नहीं है! हम इस समय में एक और पल के लिए भी नहीं रहेंगे। जब आप ऐसे वृद्ध मसीही पुरुषों और स्त्रियों से मिलते हैं, जो गूढ़ बुद्धि का प्रदर्शन करते हैं और अपने जीवन को सन्तोषजनक रीति से बिताते हैं, तो ऐसा उनके द्वारा युवावस्था में की गई प्रतिबद्धताओं के कारण होता है। उनके उदाहरणों के द्वारा हमें सभोपदेशक में दिए गए इस मार्गदर्शन का पालन करने की प्रेरणा मिलनी चाहिए, “अपनी जवानी के दिनों में अपने सृजनहार को स्मरण रख, इससे पहले कि विपत्ति के दिन और वे वर्ष आएँ, जिनमें तू कहे कि ‘मेरा मन इन में नहीं लगता’” (सभोपदेशक 12:1)।

इस जीवन में समय नष्ट करने से बचने के लिए उतना ही दृढ़ रहें, जितना कि अपने बैंक खाते में जमा धन को लुटाने से बचने के लिए रहते हैं। साधारण और महत्त्वहीन लगने वाले क्षणों को संजोएँ और परमेश्वर से प्रार्थना करें कि वह आपकी आत्मा के लिए और आपके आस-पास के लोगों के लिए कुछ बदलाव लाने में उनका उपयोग करे। इस बात पर ध्यान दें कि हम अपना समय किस प्रकार मसीह के लिए व्यतीत कर रहे हैं।

2 तीमुथियुस 4:1-8

19 जनवरी : कोई दूसरा नाम है ही नहीं

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19 जनवरी : कोई दूसरा नाम है ही नहीं
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“किसी दूसरे के द्वारा उद्धार नहीं; क्योंकि स्वर्ग के नीचे मनुष्यों में और कोई दूसरा नाम नहीं दिया गया, जिसके द्वारा हम उद्धार पा सकें।”  प्रेरितों के काम 4:12

शिकागो के बाहरी इलाके में स्थित नॉर्थवेस्टर्न यूनिवर्सिटी  के परिसर के पास बहाय धर्म द्वारा निर्मित एक विशाल मन्दिर है। वह एक भव्य भवन है जिसमें नौ बरामदे हैं, जो नौ प्रमुख विश्व धर्मों में से प्रत्येक के लिए हैं। ये सभी बरामदे एक मुख्य सभागार की ओर ले जाते हैं। इसकी वास्तुकला का उद्देश्य “सत्य” तक पहुँचने के कई मार्गों को दर्शाना है, क्योंकि बहाय लोगों का मानना है कि सत्य को किसी एक मत में, व्यक्ति में या इकाई में नहीं पाया जा सकता।

यह मानसिकता उस सांस्कृतिक परिवेश से बहुत अलग नहीं है, जिसमें प्रेरित पौलुस रहता था। रोमी समाज बहुत खुले विचारों वाला, कई तरीकों से सोचने के लिए बहुत इच्छुक और सभी प्रकार के धर्मों को अपनाने के लिए तैयार था। सच में, रोम ने अपने देवालयों में मूर्तियों और देवी-देवताओं का एक विशाल संग्रह रखा हुआ था, और यह मान्यता रखता था कि सत्य तक पहुँचने के एक से अधिक मार्ग हैं।

तो फिर, ऐसी बहुवादी, खुले विचारों वाली, बहु-ईश्वरवादी संस्कृति मसीहियों को कोलोसियम (रोमी काल का एक बड़ा कलागृह) में शेरों के सामने भोजन के तौर पर कैसे परोस सकती थी? सम्राट नीरो ने विश्वासियों पर लक्ष्य क्यों साधा, और यहाँ तक कि अपने समारोहों में प्रकाश के लिए उनके शरीरों को मानव मशालों के रूप में उपयोग क्यों किया?

इसका उत्तर एक साधारण तथ्य में निहित है कि रोमी संस्कृति मसीहियत को न तो सहन कर सकती थी  और न ही सहन करती थी,  क्योंकि मसीही लोग मसीह को मनगढ़ंत देवताओं में सम्मिलित करने के लिए तैयार नहीं थे। इसके विपरीत, वे इस सत्य पर अटल रहे कि यीशु के अतिरिक्त किसी अन्य नाम में उद्धार नहीं है, जिस प्रकार पतरस और यूहन्ना ने उसी यहूदी महासभा से साहसपूर्वक यह कहा था जिसने प्रभु यीशु को मृत्युदण्ड की सजा सुनाई थी। पहली सदी की रोमी संस्कृति में जैसे ही लोग इस विश्वास को स्वीकार करते, वैसे ही उनका तिरस्कार किया जाता, उनका ठट्ठा उड़ाया जाता और कभी-कभी तो उन्हें मृत्युदण्ड भी दिया जाता था।

जो लोग बहुदेववाद के दृष्टिकोण को अस्वीकार कर देते हैं कि सभी मार्ग समान रूप से मान्य हैं, उनको वह सह नहीं सकता। वास्तव में, वह प्रायः उन लोगों के प्रति निर्दयतापूर्वक अत्याचारी हो जाता है। हमें यह स्वीकार करना होगा कि लगभग 2,000 साल बाद भी हम ऐसे परिवेश में जी रहे हैं जो रोमी साम्राज्य से ज्यादा अलग नहीं है, यद्यपि इतना तो है कि इसके सताव के तरीके कम क्रूर हैं। बाइबल पर आधारित मसीहियत, जिसका मसीह महिमा में लौटेगा, और अचूक बाइबल, और त्रिएक परमेश्वरत्व, एक बहुदेववादी संसार के लिए घिनौनी बातें हैं।

हमारे आस-पास का संसार भले ही जो भी मानता हो, यीशु ऐसा नहीं है जिसे अन्य झूठे देवी-देवताओं या धार्मिक मूर्तियों के बगल में कोई स्थान दिया जाए। वह सत्य की ओर ले जाने वाले एक और बरामदे से कहीं बढ़कर है। जैसे पलिश्ती देवता दागोन, यहोवा के सन्दूक के सामने गिर कर टूट गया था (1 शमूएल 5:1-4), वैसे ही बाकी सब भी उसके सामने व्यर्थ ठहरेंगे। इस तरह का सन्देश लोकप्रिय नहीं है, किन्तु यह सच है और अद्‌भुत है, क्योंकि यदि कोई क्रूस पर चढ़ाया गया उद्धारकर्ता नहीं होता तो अनन्त जीवन का कोई मार्ग ही नहीं होता, क्योंकि बाकी सभी रास्ते केवल मृत्यु की ओर ले जाते हैं। एक दिन बुद्ध, मुहम्मद और प्रत्येक झूठा नबी परमेश्वर पिता की महिमा के निमित्त यीशु के चरणों में झुकेगा और यह घोषणा करेगा कि वह प्रभु है। जब ​​तक वह दिन नहीं आता, तब तक सत्य को थामे रहिए और लोगों को उस एक अनोखे व्यक्ति के बारे में बताने का प्रयास करते रहिए, जो वह  मार्ग, वह  सत्य और वह  जीवन है जिसकी हम सभी को आवश्यकता है (यूहन्ना 14:6)। वे सब मसीही ही थे, जिन्होंने यूहन्ना और पतरस के हार मानने या चुप रहने से इनकार कर देने के उदाहरण का अनुसरण किया, जिसके कारण रोमी समाज बदल गया; परमेश्वर के अनुग्रह से हम भी उनके पदचिह्नों पर चलते हुए आज संसार को बदल सकते हैं।

प्रेरितों के काम 4:1-22

18 जनवरी : प्रार्थना के लिए प्रतिबद्धता

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18 जनवरी : प्रार्थना के लिए प्रतिबद्धता
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“[दानिय्येल] अपनी रीति के अनुसार जैसा वह दिन में तीन बार अपने परमेश्वर के सामने घुटने टेककर प्रार्थना और धन्यवाद करता था, वैसा ही तब भी करता रहा।”  दानिय्येल 6:10

क्षणिक प्रतिबद्धता कोई बहुत कठिन बात नहीं है। अनुशासनबद्ध स्थिरता हमारे लिए अधिक कठिन होती है, फिर भी वह आत्मिक विकास की कुंजी होती है। हमारी प्रतिबद्धताएँ जो प्रायः कम समय के लिए ही होती हैं, उन्हें अल्पकालिक व्यायाम सम्बन्धी योजनाओं में, बाइबल को कण्ठस्थ करने में, या पुस्तकें पढ़ने की योजनाओं में और नए साल के आगमन पर लिए जाने वाले संकल्पों में देखा जा सकता है। हममें से कितने लोग किसी काम का आरम्भ तो बहुत अच्छी तरह से करते हैं, किन्तु बाद में उसे छोड़ देते हैं! परन्तु इसके साथ-साथ आपने ऐसे लोगों को भी देखा होगा जो अविश्वसनीय रूप से अटल और अनुशासित होते हैं। वे प्रतिदिन एक ही समय अपने कुत्ते को टहलाने निकलते हैं या सदैव इतने सटीक समय पर अपनी चिट्ठियाँ इकट्ठी करते हैं कि आप अपनी घड़ी को उसके अनुसार मिला सकते हैं; और जब वे कोई कार्य करने या कोई नया कौशल सीखने के लिए अपने आप को प्रतिबद्ध कर लेते हैं, तो वे ऐसा इतनी लगन से करते हैं कि आपको कोई सन्देह नहीं रहता कि वे उसे पूरा कर लेंगे।

दानिय्येल एक ऐसा ही व्यक्ति था जिसने प्रार्थना के बारे में ऐसी अनुशासित स्थिरता दिखाई। उसका जीवन ऐसा नहीं था कि एक समय पर तो वह अति-उत्साहित था और फिर लम्बे समय तक वह निष्क्रिय हो गया था। यह स्पष्ट है कि वह प्रार्थना करता था चाहे उसे ऐसा करने का मन हो या न हो। यह सम्भव है कि ऐसे समय भी रहे होंगे जब वह अपने घुटनों से उठकर वास्तव में खुशी महसूस करता होगा और अन्य समय वह सच में उदास महसूस करता होगा, परन्तु फिर भी वह प्रार्थना में लगा रहता था। वह प्रार्थना में निरन्तर लगा रहता था, चाहे परिस्थितियाँ कैसी भी हों। इसी को अनुशासन कहते हैं!

जब संकट का समय आया तो उसने दानिय्येल की अनुशासित जीवनशैली का सृजन नहीं किया; अपितु उसने उसे प्रकाशित किया। राजा दारा द्वारा एक आदेश जारी करने के बाद, जिसमें तीस दिनों तक उसके अतिरिक्त किसी अन्य देवता या मनुष्य से प्रार्थना करना अवैध था (दानिय्येल 6:7), दानिय्येल राजा के प्रति आज्ञाकारिता को प्रभु के प्रति आज्ञाकारिता के स्थान पर तर्कसंगत ठहरा सकता था। वह यह तर्क दे सकता था कि चूंकि उसने इतने वर्षों की प्रार्थना के बल पर इतना अधिक श्रेय अर्जित कर लिया था, इसलिए एक महीने के लिए उसे छूट दी जा सकती है। परन्तु ऐसा विचार उसके मन में कभी नहीं आया। इसके विपरीत उसने “अपनी रीति के अनुसार” प्रार्थना करना जारी रखा।

निश्चित रूप से उस समय के सबसे शक्तिशाली राजा की आज्ञाकारिता करने के विपरीत इस्राएल के परमेश्वर की आज्ञाकारिता करने में दिखाई गई बहादुरी तथा दानिय्येल के प्रार्थनापूर्ण जीवन के बीच एक सम्बन्ध था। हमारे प्रभु ने हमसे भी यही कहा कि हमें “नित्य प्रार्थना करना चाहिए और हियाव नहीं छोड़ना चाहिए” (लूका 18:1)। यदि हमें प्रार्थना करने का मन न हो या हमारे पास कुछ अवधि के लिए खाली समय न हो, तो भी हमें प्रार्थना करना बन्द नहीं करना चाहिए। यदि हम दबाव में होने पर भी यीशु के लिए जीना चाहते हैं, तो हमें अपनी प्रार्थना में निरन्तरता बनाए रखनी चाहिए। हमें प्रार्थना को अपने विश्वास का केवल एक अच्छा पूरक ही नहीं मानना चाहिए, अपितु उसे विश्वास का एक मौलिक तत्व मानना ​​चाहिए।

आपके लिए भी प्रार्थना के प्रति उसी प्रकार की अटल प्रतिबद्धता दिखाने का द्वार खुला है, जैसी दानिय्येल ने दिखाई थी। नियमित अनुशासन के द्वारा प्रार्थना आपके जीवन की प्रत्येक परिस्थिति के लिए आपकी स्वाभाविक प्रतिक्रिया बन सकती है। क्या आपके लिए यह आवश्यक है कि आप प्रतिदिन प्रार्थना करने का एक निश्चित समय ठहराएँ और अपने परमेश्वर को धन्यवाद दें, चाहे कुछ भी हो जाए? परमेश्वर हमें जहाँ भी ले जाए, हम जो भी करें, उसकी योजना चाहे जो भी हो, ऐसा हो कि हमारी प्रार्थनाएँ निरन्तरता के साथ होती रहें।

     इफिसियों 3:14-21

17 जनवरी : शोक के समय में भी आशा हो सकती है

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17 जनवरी : शोक के समय में भी आशा हो सकती है
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“हे भाइयो, हम नहीं चाहते कि तुम उनके विषय में जो सोते हैं, अज्ञानी रहो; ऐसा न हो कि तुम दूसरों के समान शोक करो जिन्हें आशा नहीं। क्योंकि यदि हम विश्वास करते हैं कि यीशु मरा और जी भी उठा, तो वैसे ही परमेश्वर उन्हें भी जो यीशु में सो गए हैं, उसी के साथ ले आएगा।”  1 थिस्सलुनीकियों 4:13-14

आज नहीं तो कल, जब आपका कोई प्रिय जन इस जीवन को छोड़ कर चला जाएगा, तो आपको शोक का सामना करना पड़ेगा। प्रश्न यह नहीं है कि आप शोकित होंगे या नहीं; प्रश्न यह है कि आपके शोक करने का तरीका कैसा  होगा।

थिस्सलुनीके के कुछ मसीही लोग यीशु मसीह की वापसी और मृतकों के पुनरुत्थान के बारे में व्याकुल थे। उनकी समझ की कमी के कारण वे परेशान हो रहे थे। वे समझ नहीं पा रहे थे कि वे उन संगी मसीहियों के बारे में क्या कल्पना करें, जो यीशु के लौटने से पहले मर गए थे? अब वे मसीही लोग कहाँ थे, और उनका क्या होगा?

पौलुस ने विश्वासियों को परमेश्वर के लोगों और बाकी मानवजाति के बीच के अन्तर को स्मरण दिलाते हुए इस प्रकार आरम्भ किया, “जिनके पास कोई आशा नहीं है।” हम भी कभी उन्हीं के समान थे; “स्मरण करो कि [हम लोग] उस समय मसीह से अलग . . . और आशाहीन और जगत में ईश्‍वररहित थे” (इफिसियों 2:12)। परन्तु अब हमें छुड़ाया गया है और परिवर्तित कर दिया गया है। हमें निराशा से आशा की ओर लाया गया है। यह बदलाव हमारे लिए एक बड़ा प्रोत्साहन होना चाहिए। यह जीवित व्यक्तिगत विश्वास ही है, जो हमें “दूसरों” से अलग करता है।

इसके अतिरिक्त, “जो सोते हैं” का उल्लेख करते हुए पौलुस विश्वासियों के लिए मृत्यु के अस्थाई स्वरूप पर बल दे रहा है; यह कोई स्थाई दशा नहीं है। फिर भी, जबकि सो जाने का रूपक हमें यह समझने में सहायता करता है कि मृत्यु के क्षण में हमारे शरीर के साथ क्या होगा, यह इस बात की सम्पूर्णता को स्पष्ट नहीं करता है कि उस क्षण में आत्मा के साथ क्या होता है। इसका उद्देश्य यह विचार व्यक्त करना नहीं है कि मृत्यु और पुनरुत्थान के बीच की अवधि में आत्मा बेसुध होती है। यीशु ने स्पष्ट रूप से सिखाया कि मृत्यु के बाद खुशी या कष्ट का एक तात्कालिक एहसास होगा (उदाहरण के लिए, लूका 16:22-24 देखें)। पवित्रशास्त्र में यह स्पष्ट है कि मृत्यु विश्वासी को उसी क्षण यीशु के निकट समृद्ध और पूर्ण अनुभव में ले जाती है (लूका 23:42-43; फिलिप्पियों 1:21-24)।

मृत्यु के अस्थाई स्वरूप के बारे में यह बात मसीही शोक की हमारी समझ को दिशा देती है। किसी शोकाकुल अविश्वासी के लिए मृत्यु केवल निराशा का नीरस विलाप और एक गहरा खालीपन लेकर आती है, जिसे कोई भी मन की कामना या कोई भी बेतुकी प्रचलित बात भर नहीं सकती। वहीं एक विश्वासी के लिए यह एक वास्तविक, आँसुओं भरा दुख तो होता है, परन्तु इसके साथ आशा का एक बड़ाई करने वाला भजन भी होना चाहिए क्योंकि जब प्रभु वापस लौटेगा, तो वह “अपने साथ उन लोगों को भी ले आएगा जो सो गए हैं।” किसी मसीही का अन्तिम संस्कार सदा के लिए विदाई देने का समय नहीं होता है, अपितु यह “फिर मिलेंगे” कहने का समय होता है। आपके प्रियजन की अनुपस्थिति अस्थाई होती है और जो पुनः मिलन होगा वह स्थाई होगा।

जब जीवन के ये सबसे गहन प्रश्न हमें निराशा की ओर ले जाना चाहें, तो हम यह जानकर विश्राम प्राप्त कर सकते हैं कि परमेश्वर का वचन सभी बातों के लिए पर्याप्त है, और इसमें मृत्यु के बारे में हमारी समझ भी सम्मिलित है। इन पदों को अपने हृदय को प्रभावित करने दें और उन्हें अपनी स्मृति में अंकित कर लें क्योंकि वह दिन आएगा जब आपको उनसे कसकर लिपटने की आवश्यकता पड़ेगी। और इन बातों को अपनी प्रार्थना बना लें, “प्रभु यीशु, मुझे आपके वचन में मग्न रहने वाला व्यक्ति बनने में सहायता करें, ताकि मैं अब किसी भ्रम या बेचैनी के साथ न जियूँ, इसके विपरीत मैं ऐसे व्यक्ति के समान जियूँ जो आपकी संगति में रहता है। मैं आपके ज्ञान से भर जाऊँ, जिससे मैं आशा के साथ जी सकूँ और आशा के साथ शोक कर सकूँ।”

1 थिस्सलुनीकियों 4:13-18

16 जनवरी : कठिन दिनों के लिए ताजगी

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“परन्तु वह स्वयं जंगल में एक दिन के मार्ग पर जाकर एक झाऊ के पेड़ के तले बैठ गया, वहाँ उसने यह कह कर अपनी मृत्यु माँगी, ‘हे यहोवा, बस है; अब मेरा प्राण ले ले, क्योंकि मैं अपने पुरखाओं से अच्छा नहीं हूँ।’ वह झाऊ के पेड़ तले लेटकर सो गया और देखो एक दूत ने उसे छूकर कहा, ‘उठकर खा।’”  1 राजाओं 19:4-5

हम सभी ने अपने आप को निश्चित रूप से उस समय भयावह आत्मिक घाटी में पाया होगा, जब हम पर्वत शिखर पर होने की अपेक्षा कर रहे होंगे। शायद हमें उस समय शारीरिक थकान लगने लगी होगी, या हमें निराशाजनक समाचार मिला होगा, या कोई परेशान करने वाला पाप हमें पीड़ा देने के लिए वापस आ गया होगा, जिस समय हमने ऐसा होने की सबसे कम अपेक्षा की होगी। हमारे जीवन में परेशान करने वाली परिस्थितियाँ प्रायः एक साथ आती हैं, जो हमारे विश्वास को डर में बदल सकती हैं।

भविष्यद्वक्ता एलिय्याह मरुभूमि में इसलिए जा छिपा, क्योंकि उसके ध्यान का केन्द्र बदल गया था। उसने अपनी परिस्थितियों को परमेश्वर के माध्यम से देखने के विपरीत अपनी परिस्थितियों के माध्यम से परमेश्वर को देखना आरम्भ कर दिया था। वह अपने जीवन की कठिनाइयों के बारे में बढ़ा-चढ़ाकर सोचने लगा और इस बात ने उसे पंगु बना दिया। जैसे ही उसने विश्वास के विपरीत अपने सामने खड़ी परिस्थितियों के अनुसार चलना आरम्भ किया, उसकी शान्ति जाती रही और उसकी आत्मिक समृद्धि घटती चली गई।

एलिय्याह “निज व्यक्तित्व” के जाल में फँस गया था। परमेश्वर के प्रति इस्राएलियों की अनेकों असफलताओं पर ध्यान केन्द्रित करते-करते वह इस धारणा का शिकार हो गया था कि वही वह अकेला व्यक्ति था जो परमेश्वर की सेवा कर रहा था (1 राजाओं 19:10)। उसके विश्वास और आशा का स्थान असन्तोष और शान्ति की कमी ने ले लिया था। आत्म-दया में होकर वह मरुभूमि की ओर भाग गया। काम करने के बदले वह एक झाऊ के पेड़ के नीचे लेट गया और मरने की प्रार्थना करने लगा। फिर भी उसका न्याय करने या उसे दण्डित करने के स्थान पर परमेश्वर एलिय्याह के पास आया और उसको खाना-पीना देकर तरोताजा करने के द्वारा उसे आगे की यात्रा के लिए तैयार किया। एक शान्त फुसफुसाहट में प्रभु ने अपने निराश सेवक पर अपने आप को फिर से प्रकाशित किया और उसे पुनः स्थापित किया और उसे पूरा करने के लिए कर्तव्यों की एक नई सूची दी (पद 4-16)।

कठिन समयों में प्रायः हम आत्म-दया को अपने अन्दर बस जाने देते हैं। हम सोचने लगते हैं कि हम अकेले ही ऐसी परीक्षाओं का सामना कर रहे हैं। हममें से कुछ लोग एलिय्याह के अनुभव को समझ सकते हैं; अतीत में प्रभु ने हमें बहुत उपयोग किया था और एक समय हममें सुसमाचार के लिए प्रभाव हुआ करता था, किन्तु किसी कारण से हम अब उस पर्वत शिखर से बहुत दूर हो चुके हैं। हो सकता है कि परमेश्वर हमें बहुत नीचे तक गिर जाने दे, किन्तु वह हमें वहाँ कभी छोड़ नहीं देता। जैसे एलिय्याह की घाटी में उसके पास वह दूत था, वैसे ही हमारी परिस्थितियों में परमेश्वर का आत्मा हमारे साथ रहता है।

यदि आप अपने आप को मरुभूमि में पाते हैं, तो हम झाऊ के पेड़ के नीचे लेट जाने का प्रयास न करें। यह न सोचें कि आपके उत्तम दिन बीत चुके हैं। परमेश्वर के पास आपके और मेरे लिए एक उद्देश्य है। वह जो आरम्भ करता है उसे पूरा भी करता है (फिलिप्पियों 1:6)। परमेश्वर की उपस्थिति को स्मरण करके तरोताजा हो जाएँ और उस काम में लगे रहें जिसके लिए उसने आपको बुलाया है।

2 कुरिन्थियों 4:7-18

14 जनवरी : अपने आप से स्वतन्त्रता

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14 जनवरी : अपने आप से स्वतन्त्रता
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“फिर वे कफरनहूम में आए; और घर में आकर उसने उनसे पूछा, ‘रास्ते में तुम किस बात पर विवाद कर रहे थे?’ वे चुप रहे, क्योंकि मार्ग में उन्होंने आपस में यह वाद–विवाद किया था कि हममें से बड़ा कौन है। तब उसने बैठकर बारहों को बुलाया और उनसे कहा, ‘यदि कोई बड़ा होना चाहे, तो सबसे छोटा और सब का सेवक बने।’”  मरकुस 9:33-35

प्रतिस्पर्धा जीवन का अभिन्न अंग है। किसी टीम में मित्रतापूर्ण प्रतिस्पर्धा का होना एक-दूसरे को प्रेरित करने का एक साधन बन सकता है, जिससे टीम के सदस्यों को आगे बढ़ने में या प्रभावशाली बनने में सहायता मिलती है। परन्तु जब प्रतिस्पर्धा स्वार्थ और ईर्ष्या का कारण बन जाती है, तो यह एकता को दुर्बल बना देती है।

कफरनहूम के मार्ग में यीशु चेलों को उपदेश देते हुए यह कह रहा था, “मनुष्य का पुत्र, मनुष्यों के हाथ में पकड़वाया जाएगा, और वे उसे मार डालेंगे; और वह मरने के तीन दिन बाद जी उठेगा” (मरकुस 9:31)। सम्भवतः जब यीशु उनके आगे-आगे चल रहा था, तब उसने अपने पीछे एक-दूसरे को धकेलते हुए चल रहे चेलों की बातचीत के कुछ अंश सुने होंगे। उनकी चर्चा उनकी अपनी महानता को लेकर ईर्ष्या-पूर्ण प्रतिस्पर्धा से भरी हुई थी।

वैसे तो यह किसी भी स्थिति में बातचीत का एक बुरा विषय है, परन्तु इस सन्दर्भ में विशेष रूप से यह बुरा है। यह कितनी बेतुकी बात है कि जब यीशु उन्हें अपने दुख और मृत्यु के बारे में निर्देश दे रहा था, उस समय वे अपने पद और महानता के बारे में चिन्तित थे!

यीशु ने उनसे उनकी बातचीत के बारे में पूछा कि वह इसे निर्देश देने के अवसर के रूप में उपयोग करे। एक वाक्य में ही उसने महानता के मानवीय विचारों को पूरी तरह से उलट दिया। उसके राज्य में सच्ची महानता का अर्थ अपने आप को सबसे पीछे रखना और बाकी सभी के लिए सेवक की तरह काम करना है। स्वर्गिक राज्य का राजा इसी तरह रहता था और आज भी रहता है, क्योंकि वह “इसलिए नहीं आया कि उसकी सेवा टहल की जाए, पर इसलिए आया कि आप सेवा टहल करे, और बहुतों की छुड़ौती के लिए अपना प्राण दे” (मरकुस 10:45)।

यदि हम सच्चे हैं, तो जब हम इस दृश्य पर विचार करते हैं तब हम चेलों में अपने चेहरे देख सकते हैं। हम अपने विचार को उनके विचारों में गूँजते हुए सुन सकते हैं। उनके समान हम अपने आप को भी पदवियाँ पाने के लिए संघर्ष करते हुए पाते हैं। स्वार्थ से भरी प्रतिस्पर्धा अप्रत्याशित स्थानों में प्रायः सतह पर आ ही जाती है। फिर भी इसका उपचार सदैव एक ही होता है और वह है दीनता। डेविड वेल्स लिखते हैं कि हम सभी को एक ऐसी दीनता की आवश्यकता है, जो “अपने आप से उस तरह की स्वतन्त्रता दे दे, जो हमें ऐसी अवस्थाओं में रहने में सक्षम बना दे जिसमें न तो हमारी पहचान हो, न ही महत्त्व, न ही कोई शक्ति और न ही हम कहीं दिखाई देते हों, यहाँ तक ​​कि हमें हानि का अनुभव भी होता हो, और फिर भी हमें आनन्द और खुशी मिले . . . और वह स्वतन्त्रता है यह जान सकने की स्वतन्त्रता कि हम जगत के केन्द्र में नहीं हैं, यहाँ तक ​​कि अपने निजी संसार के केन्द्र में भी नहीं।”[1]

इस विषय को सीख पाना कठिन है। फिर भी, हममें प्रतिस्पर्धा के होने पर और दीनता न होने पर यीशु हमें छोड़ नहीं देता है। इस दृश्य में अपने चेहरे को देख पाना मानो ऐसा है, जैसे हमें यह स्मरण दिलाना कि शिष्यता के मार्ग पर चलते समय हमें लगातार परमेश्वर के अनुग्रह की आवश्यकता होती है। केवल परमेश्वर का अनुग्रह ही आपका ध्यान अपने आप से हटा सकता है और आपको अपने आप से स्वतन्त्र कर सकता है। केवल उस व्यक्ति को ताकने से ही, जो स्वर्ग की महिमा को छोड़ कर आपके लिए क्रूस पर मर गया, आपका हृदय इस प्रकार बदल सकता है कि आप सेवा करना चाहें, सेवा टहल करवाने के इच्छुक न रहें, और दूसरों की भलाई के बारे में सोचने की तुलना में अपनी प्रतिष्ठा की कम चिन्ता करें। यीशु आज आपको सेवा करने का बुलावा दे रहा है, वैसे ही जैसे वह आपकी सेवा करता है।

रोमियों 12:3-13

13 जनवरी : सच्ची मित्रता

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13 जनवरी : सच्ची मित्रता
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“मित्रों के बढ़ाने से तो नाश होता है, परन्तु ऐसा मित्र होता है, जो भाई से भी अधिक मिला रहता है।”  नीतिवचन 18:24

कोई भी व्यक्ति अकेला होना और बिना किसी दोस्त के रहना पसन्द नहीं करता। हम सभी दोस्ती के महत्त्व को और एक सच्चे दोस्त के रूप में मिले अनमोल वरदान के महत्त्व को पहचानते हैं। घनिष्ठ मित्रता, जिसमें अनुरूपता, सच्चाई और भावुकता पाई जाती है, एक ऐसा मानक है जिसे बाइबल हमारे लिए प्रदर्शित करती है।

सुलैमान कहता है कि एक सच्चा मित्र सदैव निष्ठावान रहता है, चाहे परिस्थितियाँ कैसी भी हों: “मित्र सब समयों में प्रेम रखता है” (नीतिवचन 17:17)। हम अपने दोस्तों को ठीक वैसे ही देखते हैं, जैसे वे हैं और फिर भी हम उनके प्रति अपनी निष्ठा में अटल रहते हैं। इसके अतिरिक्त, सच्चे मित्र ऐसे घाव देने से भी नहीं डरते, जिनसे उनके मित्र वह सब बन सकें जो परमेश्वर उन्हें बनाना चाहता है, “जो घाव मित्र के हाथ से लगें वह विश्वास योग्य हैं” (नीतिवचन 27:6)। हो सकता है कि हम इसे विशेष रूप से पसन्द न करें, किन्तु हममें से प्रत्येक को ऐसे मित्रों की आवश्यकता है जो हमसे गलती होने पर हमें जवाबदेह ठहराएँ। और हममें से प्रत्येक को भी ऐसा ही मित्र बनने का बुलावा दिया गया है।

हमें अपनी भाषा के उपयोग पर भी विचार करना चाहिए, जैसा कि पौलुस कहता है कि “कोई गन्दी बात तुम्हारे मुँह से न निकले, पर आवश्यकता के अनुसार वही निकले जो उन्नति के लिए उत्तम हो, ताकि उससे . . . अनुग्रह हो” (इफिसियों 4:29)। आप केवल एक शब्द से किसी का दिल तोड़ सकते हैं, और हो सकता है कि उसे ठीक करने में पूरा जीवन लग जाए।

जो पुरुष और स्त्रियाँ इन सिद्धान्तों को गम्भीरता से लेते हैं, हो सकता है कि वे अपने आप से पूछें कि “क्या सच में कोई ऐसा दोस्त है जिसमें ऐसी विशेषताएँ होंगी? क्या मेरी जानकारी में ऐसा कोई है, जो हमेशा स्थिर रहता है, जो मुझे प्रेम में होकर झिड़कता है, जो मेरे साथ अपने सभी वार्तालापों में अनुग्रह और संवेदनशीलता दिखाएगा?” और अन्ततः इन सभी प्रश्नों का उत्तर मसीह में पाया जाता है। प्रभु यीशु की मित्रता का विस्तार अद्‌भुत है! उसने सबसे अजीब व्यक्तियों से मित्रता की। वह एक महसूल लेने वाले से बात करने के लिए एक पेड़ के नीचे रुका, उसने एक भ्रष्ट स्त्री से पानी माँगा, और एक कोढ़ी की सुधि ली। वह अपने प्रेम में अटल था; वह सत्य के वचन बोलने के लिए तैयार था, चाहे वह करना कितना भी चुनौतीपूर्ण क्यों न हो; उसने दूसरों की उन्नति की। श्रेष्ठ रूप में, वह वही है जिसने अपने मित्रों से इतना प्रेम किया कि उनके लिए अपना जीवन दे दिया (यूहन्ना 15:13)। वह पापियों का मित्र है:

यीशु कैसा दोस्त प्यारा, दुःख और बोझ उठाने को!

क्या ही उम्दा वक़्त हमारा, बाप के पास अब जाने को! [1]

यीशु की मित्रता हमारे लिए स्वर्णिम मानक है। मसीह के मित्रों के रूप में, हमें भी दूसरों से प्रेम करने और उनसे मित्रता करने का बुलावा मिला है जैसा कि उसने किया। वास्तव में, यीशु ने कहा, “जो आज्ञा मैं तुम्हें देता हूँ, यदि उसे मानो तो तुम मेरे मित्र हो” (यूहन्ना 15:14)। हमें उन लोगों के साथ उसकी इस मित्रता के विस्तार को बाँटने के लिए प्रत्येक अवसर का लाभ उठाना चाहिए, जो मित्रहीन हैं और त्यागे हुए हैं।

हम ऐसे संसार में रहते हैं, जहाँ जान-पहचान के लोग तो प्रायः अनगिनत होते हैं और “फेसबुक के दोस्त” बहुत सारे होते हैं। परन्तु यह सच्ची मित्रता नहीं है। क्या आपके पास ऐसे मित्र हैं जो अटल, घनिष्ठ और मसीह-समान हैं? यदि हैं, तो उन्हें संजो के रखें। यदि नहीं हैं, तो प्रार्थना करें कि आपको ऐसे कुछ मित्र मिलें, और आज आप स्वयं दूसरों के लिए उस तरह के मित्र बनें। आप किसी के अकेलेपन का हल या किसी के विनाश से बचाव का कारण बन सकते हैं।

याकूब 5:13-20

12 जनवरी : सामर्थ्य और पवित्रता

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12 जनवरी : सामर्थ्य और पवित्रता
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“छः दिन के बाद यीशु ने पतरस और याकूब और उसके भाई यूहन्ना को साथ लिया, और उन्हें एकान्त में किसी ऊँचे पहाड़ पर ले गया। वहाँ उनके सामने उसका रूपान्तर हुआ, और उसका मुँह सूर्य के समान चमका और उसका वस्त्र ज्योति के समान उजला हो गया।”  मत्ती 17:1-2

जैसा कि जॉन लेनन और पॉल मैक्कार्टनी ने एक बार व्यक्त किया था कि ऐसी जगहें हैं जिन्हें हम जीवन भर याद रखेंगे।[1] निश्चित रूप से पतरस, याकूब और यूहन्ना के लिए यह पहाड़, जहाँ उन्होंने मसीह का रूपान्तर देखा था, ऐसा ही स्थान रहा होगा। निश्चित रूप से पतरस इसे कभी नहीं भूला (2 पतरस 1:17-18)।

रूपान्तर में क्या-क्या हुआ था? सबसे पहले, यीशु का रूप बदल गया। उसका चेहरा “चमक उठा।” स्पष्ट रूप से यह साफ होने के कारण नहीं था, अपितु अलौकिक परिवर्तन के कारण ऐसा हुआ था। उसके चेहरे पर एक उज्ज्वल तेज था, जिसे मत्ती “सूर्य के सामान” वर्णित करता है। उसके कपड़े ज्योति के सामान उजले हो गए थे, इतने उजले जितने आपने या मैंने कभी न देखे होंगे, जो स्वर्ग की अतुलनीय शुद्धता को दर्शाता है।

पुराने नियम में परमेश्वर का वर्णन करने के तरीकों में से एक यह है कि वह “उजियाले को चादर के समान ओढ़े रहता है” (भजन संहिता 104:2)। और यीशु पहाड़ की चोटी पर ऐसा ही दिख रहा था। ऐसा कौन करता है? केवल परमेश्वर! यह कोई संयोग नहीं था, परन्तु यह एक संकेत था कि रूपान्तर केवल परमेश्वर की ओर से एक प्रकाशन ही नहीं था अपितु स्वयं परमेश्वर का एक प्रकाशन था। इस दृश्य में मसीह ने अपने आप को अभूतपूर्व रीति से परमेश्वर के रूप में प्रकट किया था। पवित्रशास्त्र हमें बताता है कि यीशु “उसकी महिमा का प्रकाश” है (इब्रानियों 1:3)। फिर भी जब वह हमारी दुनिया में आया तो मसीह की दीन मानवता में परमेश्वर की महिमा पर्दे में ढँकी हुई थी। रूपान्तर वह काम था जिसे जॉन कैल्विन ने “उसकी महिमा का एक अस्थायी प्रदर्शन” कहा था।[2] यह पर्दे को थोड़ा-सा हटाने जैसा था, मानो पहाड़ की छोटी पर और इन तीन चेलों के मनों में एक छोटी-सी झलक। परमेश्वर पतरस, याकूब और यूहन्ना के लिए यह सम्भव बना रहा था कि वे उस वस्तु का स्वाद चख लें, जिसे वे अभी तक पूरी तरह से समझ नहीं पाए थे, किन्तु भविष्य में अनन्त काल तक उसका आनन्द लेंगे।

पवित्रशास्त्र में जब कभी परमेश्वर की महिमा का प्रदर्शन हुआ है, तो लोग प्रायः अपने मुँह के बल गिर जाया करते हैं। ये चेले कुछ अलग नहीं थे, वे भी अत्यन्त डरे हुए थे। किन्तु यीशु ने उनसे दया के साथ कहा, “उठो, डरो मत” (मत्ती 17:7)।

क्या आप और मैं मसीह के पास उसकी सिद्ध पवित्रता और पारलौकिकता के प्रति इस प्रकार भय-युक्त प्रेम के साथ आते हैं? या क्या ऐसी सम्भावना है कि परमेश्वर के बारे में हमारा दृष्टिकोण कभी-कभी बहुत छोटा होता है? उसके समक्ष इस प्रकार आएँ कि आप उसके सामर्थ्य और उसकी पवित्रता पर विचार करते हुए अपने आप को मुँह के बल गिरे हुए पाएँ। फिर उसकी दया में उसे यह कहते हुए सुनें, उठो। तुम्हें डरने की आवश्यकता नहीं है।  आज और प्रति दिन, भय-युक्त प्रेम और आनन्द में जीने का यही तरीका है, जब तक कि आप स्वयं हमारे महिमामय प्रभु को न देख लें।

 मत्ती 17:1-9

11 जनवरी : अन्धकार के समय में स्तुति

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11 जनवरी : अन्धकार के समय में स्तुति
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“तब अय्यूब उठा, और बागा फाड़, सिर मुँड़ाकर भूमि पर गिरा और दण्डवत करके कहा, ‘मैं अपनी माँ के पेट से नंगा निकला और वहीं नंगा लौट जाऊँगा; यहोवा ने दिया और यहोवा ही ने लिया; यहोवा का नाम धन्य है।’ इन सब बातों में भी अय्यूब ने न तो पाप किया, और न परमेश्वर पर मूर्खता से दोष लगाया।”  अय्यूब 1:20-22

कठिनाई में धीरज रखने का सम्भवतः सबसे बड़ा बाइबल का उदाहरण अय्यूब है। एक निष्कलंक और खरा व्यक्ति होने के बाद भी एक ही दिन में उसने अपने बच्चों की मृत्यु देखी और लगभग अपनी सारी सम्पत्ति खो दी। फिर भी, उसकी पहली प्रतिक्रियाओं में से एक यह थी कि बहुतायत और घटी में, आनन्द की परिस्थितियों को लाने में और दुखद परिस्थितियों को लेकर आने में, उसने परमेश्वर की सम्प्रभुता को स्वीकार किया। जब उथल-पुथल, निराशा और कष्ट उस पर छा गए तो उसने अपना सिर मुँड़ा लिया, अपना फटा हुआ बागा पहना और भूमि पर बैठ, न केवल पीड़ा में अपितु आराधना के भाव में उसने ऐसा किया।

उल्लेखनीय रूप से इस कष्ट के अन्धकार में “अय्यूब ने न तो पाप किया और न परमेश्वर पर मूर्खता से दोष लगाया।” इसके विपरीत, अपने आँसुओं में उसने परमेश्वर के प्रावधान पर भरोसा किया। दूसरे शब्दों में, उसने इस बात को पहचाना कि परमेश्वर जानता है कि वह प्रत्येक परिस्थिति में क्या कर रहा है। सबसे कठिन परिस्थितियों में भी परमेश्वर हमारी स्तुति के योग्य है। अय्यूब जानता था कि उसके सब दिन परमेश्वर के हाथों में हैं (भजन संहिता 31:15)।

हममें से अधिकांश लोग व्यथा की चीखों और आँसुओं के कुण्डों से होकर गए हैं। हम जानते हैं कि तूफान के बीच में परमेश्वर की सम्प्रभुता और भलाई का अंगीकार करना कितना कठिन हो सकता है। हमें सन्देह होता है कि वह कहाँ है। कष्ट के प्रति हमारे मानवीय प्रत्युत्तर में हम में परमेश्वर के प्रावधान के बारे में कही गई बातों को नीरस या पुराने ज़माने की बातें समझने का झुकाव होता है, परन्तु ऐसा नहीं है। वास्तव में, समय बीतने या परिस्थितियों के बदलने के साथ हम पीछे मुड़कर देख सकते हैं और पहचान सकते हैं कि ऐसी कोई दुखद परिस्थिति नहीं है, जिसकी अनुमति परमेश्वर ने सम्प्रभुता में होकर न दी हो। वह सभी बातों को अपने हाथों से होकर जाने देता है और उनमें से कोई भी उसे आश्चर्यचकित नहीं करती।

हमें एक-दूसरे के कष्ट को कम नहीं आँकना चाहिए या उनको सहज उत्तर प्रदान नहीं करने चाहिए। इसके विपरीत, हमें कठिनाई के समय में एक-दूसरे को मसीह के समान बनने के लिए प्रेरित करने के लिए बुलाहट दी गई है, एक-दूसरे को स्मरण दिलाते हुए कि परमेश्वर ने हमें अनन्त जीवन और अटल प्रेम दिया है और उसकी चौकसी में हमारे प्राणों की रक्षा हुई है (अय्यूब 10:12)। और निश्चित रूप से हम इतिहास में पीछे देखकर जान सकते हैं कि हमारे परमेश्वर ने इस संसार के अन्धकार में प्रवेश किया है और उस पीड़ा को परख के पूरी तरह समझा है। वह एक ऐसा परमेश्वर है जो जानता है कि मनुष्य को अपने जीवन में कैसा महसूस होता है। वह एक ऐसा परमेश्वर है, जिसने हमारे सामने एक ऐसा भविष्य रखा है जहाँ कोई कष्ट या रोना नहीं है।

जीवन की कठिनाइयों और कष्ट की गहराइयों में भी परमेश्वर का पिता-सदृश प्रावधान हमारी भलाई और उसकी महिमा के लिए सब बातों के होने की अनुमति देता है। उसने यह प्रमाणित कर दिया है कि वह जानता है कि वह क्या कर रहा है। इस कारण हम अन्धकार में भी उसकी स्तुति कर सकते हैं।

भजन संहिता 22