“परन्तु वह स्वयं जंगल में एक दिन के मार्ग पर जाकर एक झाऊ के पेड़ के तले बैठ गया, वहाँ उसने यह कह कर अपनी मृत्यु माँगी, ‘हे यहोवा, बस है; अब मेरा प्राण ले ले, क्योंकि मैं अपने पुरखाओं से अच्छा नहीं हूँ।’ वह झाऊ के पेड़ तले लेटकर सो गया और देखो एक दूत ने उसे छूकर कहा, ‘उठकर खा।’” 1 राजाओं 19:4-5
हम सभी ने अपने आप को निश्चित रूप से उस समय भयावह आत्मिक घाटी में पाया होगा, जब हम पर्वत शिखर पर होने की अपेक्षा कर रहे होंगे। शायद हमें उस समय शारीरिक थकान लगने लगी होगी, या हमें निराशाजनक समाचार मिला होगा, या कोई परेशान करने वाला पाप हमें पीड़ा देने के लिए वापस आ गया होगा, जिस समय हमने ऐसा होने की सबसे कम अपेक्षा की होगी। हमारे जीवन में परेशान करने वाली परिस्थितियाँ प्रायः एक साथ आती हैं, जो हमारे विश्वास को डर में बदल सकती हैं।
भविष्यद्वक्ता एलिय्याह मरुभूमि में इसलिए जा छिपा, क्योंकि उसके ध्यान का केन्द्र बदल गया था। उसने अपनी परिस्थितियों को परमेश्वर के माध्यम से देखने के विपरीत अपनी परिस्थितियों के माध्यम से परमेश्वर को देखना आरम्भ कर दिया था। वह अपने जीवन की कठिनाइयों के बारे में बढ़ा-चढ़ाकर सोचने लगा और इस बात ने उसे पंगु बना दिया। जैसे ही उसने विश्वास के विपरीत अपने सामने खड़ी परिस्थितियों के अनुसार चलना आरम्भ किया, उसकी शान्ति जाती रही और उसकी आत्मिक समृद्धि घटती चली गई।
एलिय्याह “निज व्यक्तित्व” के जाल में फँस गया था। परमेश्वर के प्रति इस्राएलियों की अनेकों असफलताओं पर ध्यान केन्द्रित करते-करते वह इस धारणा का शिकार हो गया था कि वही वह अकेला व्यक्ति था जो परमेश्वर की सेवा कर रहा था (1 राजाओं 19:10)। उसके विश्वास और आशा का स्थान असन्तोष और शान्ति की कमी ने ले लिया था। आत्म-दया में होकर वह मरुभूमि की ओर भाग गया। काम करने के बदले वह एक झाऊ के पेड़ के नीचे लेट गया और मरने की प्रार्थना करने लगा। फिर भी उसका न्याय करने या उसे दण्डित करने के स्थान पर परमेश्वर एलिय्याह के पास आया और उसको खाना-पीना देकर तरोताजा करने के द्वारा उसे आगे की यात्रा के लिए तैयार किया। एक शान्त फुसफुसाहट में प्रभु ने अपने निराश सेवक पर अपने आप को फिर से प्रकाशित किया और उसे पुनः स्थापित किया और उसे पूरा करने के लिए कर्तव्यों की एक नई सूची दी (पद 4-16)।
कठिन समयों में प्रायः हम आत्म-दया को अपने अन्दर बस जाने देते हैं। हम सोचने लगते हैं कि हम अकेले ही ऐसी परीक्षाओं का सामना कर रहे हैं। हममें से कुछ लोग एलिय्याह के अनुभव को समझ सकते हैं; अतीत में प्रभु ने हमें बहुत उपयोग किया था और एक समय हममें सुसमाचार के लिए प्रभाव हुआ करता था, किन्तु किसी कारण से हम अब उस पर्वत शिखर से बहुत दूर हो चुके हैं। हो सकता है कि परमेश्वर हमें बहुत नीचे तक गिर जाने दे, किन्तु वह हमें वहाँ कभी छोड़ नहीं देता। जैसे एलिय्याह की घाटी में उसके पास वह दूत था, वैसे ही हमारी परिस्थितियों में परमेश्वर का आत्मा हमारे साथ रहता है।
यदि आप अपने आप को मरुभूमि में पाते हैं, तो हम झाऊ के पेड़ के नीचे लेट जाने का प्रयास न करें। यह न सोचें कि आपके उत्तम दिन बीत चुके हैं। परमेश्वर के पास आपके और मेरे लिए एक उद्देश्य है। वह जो आरम्भ करता है उसे पूरा भी करता है (फिलिप्पियों 1:6)। परमेश्वर की उपस्थिति को स्मरण करके तरोताजा हो जाएँ और उस काम में लगे रहें जिसके लिए उसने आपको बुलाया है।
2 कुरिन्थियों 4:7-18